मुझे सिकंदर चाहिए, दिल्ली नहीं

पता है मुझे मेट्रो पसंद नहीं है। मेट्रो सिर्फ भागती है। धड़कती नहीं है। सिकंदर उखड़ा हुआ था बेवजह। ख़ुद को पकड़ नहीं पाता है तो हर भागने वाली चीज़ दुश्मन नज़र आने लगी। मॉल के खंभे के पीछे खड़ी सानिया चुपचाप सुनती रही। सिकंदर ने ऑटो से लेकर लोगों के बात करने की तहज़ीब को लपेटे में ले लिया। सांसों को भूल वो सेंस को गरियाने लगा। ट्रैफिक सेंस,टॉकिंग सेन्स। वो भीतर से जल रह था मगर धुआं किसी और की चिमनी से उठ रहा था। सानिया को समझ आने लगा। हल्के से पूछ लिया पर तुम भागना क्यों नहीं चाहते? हम इन खंभों के पीछे भाग कर ही तो आए हैं। सिकंदर के भीतर की चिन्गारी पर जैसे किसी ने राख डाल दी हो। सामने दूर तक खाली टाइल्स में लिपटे फ़र्श की चमक में किसी की परछाई भी नहीं बन पा रही थी। सिकंदर दूसरी तरफ देखने लगा। दूसरे खंभे के पीछे खड़े दो प्रेमियों की मौजूदगी किसी ख़ामोशी की तरह शोर कर रही थी। वे दोनों शहर को लेकर परेशान नहीं थे। सानिया..मुझे भागने से नहीं,जगह बदलने से डर लगता है। दूसरे खंभे के नीचे खड़े प्रेमी इन बहसों से दूर एक दूसरे को छू लेने की बेताबी से सतर्क थे। इससे पहले कि ख़रीदारों की भीड़ आस-पास से गुज़रने लगे,वो किसी अजनबी की तरह एक दूसरे को देखने लगे,सुबह के इस वक्त को प्रेमी की तरह जी लेना चाहते थे। ख़ामोश ज़ुबान मगर सांसें बोल रही थीं। किसी भाप ईंजन वाली रेडगाड़ी के डिब्बे की तरह धड़क रही थीं। सिकंदर ने सानिया से हाथ छुड़ा लिया। एक-एक कर खुल रही दुकानों के शटर की आवाज़ से पर्स में पड़े सिक्के दुबकने लगे थे।

सिकंदर अपने एकांत में सानिया के साथ एक शहर में बदला जा रहा था। डीटीसी की लाल ख़ूबसूरत बसों में सवार मुर्झाये चेहरे पंद्रह रुपये के टिकट का दर्द दबाए बैठे हुए थे। उसकी नज़र पटरी पर अकड़ चुके उन बूढ़े नौजवान शरीरों पर थी जिन्हें दिल्ली बेघर कहती है। भीतर से सानिया से मिलने की कशिश और मॉल के खंभे पर किसी और जोड़े के पहुंच जाने की घबराहट घेर रही थी। उधर खंभों के नीचे दुबकी सानिया अपने प्रेम के इन पलों में सिर्फ सिकंदर से मुख़ातिब होना चाहती थी। भागने से ख़ौफ़ खाए सिकंदर से नहीं,बल्कि ठहरे हुए आशिक से। अक्सर कहती थी मेरा सिकंदर आता है तो लगता है पूरा शहर आ गया है। मुझे बस अब तुम्हारे भीतर के इस शहर से दूर ले चलो।

मेरी ग़लती थी सिकंदर जो मॉल के इन खंभों को महफूज़ जान कर तुम्हें यहां ले आई। एयरकंडीशन एकांत तो तुम्हें भी अच्छा लगा था न। मगर यहां आकर सपने भी कैसे होने लगे हमारे। है न। अजीब से। क्या कह रही थी उस दिन मैं। मॉल के इन खंभों की क़सम मौलवी से यहीं निकाह पढ़वाऊंगी। सिकंदर तुम सेहरा बांधे उस खंभे से इस खंभे तक आना। तब हम पहली बार इस मॉल में बेख़ौफ बिना खंभों के दुनिया के सामने होंगे। हम दो खंभों के बीच एक दूसरे का हाथ थामे खड़े हो जायेंगे। एक लड़की एक लड़के के दामन में...इस तरह सरेआम। नहीं नहीं...सिकंदर तुम मेरे दामन में होना। मॉल में आने-जाने वाले लोग हमारे इस पल को किसी फ्री आइटम की तरह अपनी ख़रीदारी की यादों में रख लेंगे।

पता ही नहीं चला कब बातों बातों में सिकंदर का सर सानिया के कंधे पर टिक गया। लगा कि कुछ देर के लिए इन खंभों की तरफ कोई नहीं आएगा। एक ऑटो उतरता है। दोनों दायें बायें देखते हैं। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के काउंटर से दस रुपये का टिकट लेकर इतिहास के खंडहरों में अपने प्रेम का भविष्य तलाश रहे हैं। डेढ़ सौ साल पुरानी नीम के नीचे की हल्की हवा सिकंदर और सानिया को बादशाह और बेगम के खेल में उलझाने लगी। सिकंदर बेखौफ वादे करने लगा। पता है सानिया, एक दिन मैं भी कुछ ऐसा करूंगा कि दुनिया कहेगी कि देखो जितना सिकंदर ने सानिया को प्यार किया उतना ही हम तुमसे प्यार करते हैं। एक महल बनवा दूंगा। एक ख़ूबसूरत बाग़ भी होगा जिसमें पक्षियों की चहचहाहट होगी। सानिया तुम उधर से आना। ख़ूब सारी चूड़ियां पहने। दोनों सपनों की एक पूरी फिल्म में खोने लगे। तभी जोड़ी सलामती की दुआ देने वालों की ताली से नींद टूट गई। अचानक सिकंदर मॉल में सेल की लूट में शामिल भीड़ देखकर बेचैन हो उठता है। उनका एकांत फिर से छिन गया है। सिकंदर शहर में उलझ जाता है। दस बजे ही इन्हें दुकान का सारा माल ख़रीद लेना है। दिल्ली है या साली दुकान। ख़रीदार भी दुकानदार लगते हैं। एक दुकान से सामान लिया फिर अपने घर को गोदाम बना दिया।

सानिया धीरे-धीरे कहने लगी। देखा सिकंदर,जब से हम मॉल में आने लगे हैं,तुम्हारे साथ शहर आने लगा है। हम कल से यहां नहीं आएंगे। फिर से चलेंगे पुराना क़िला। ये क्या जगह है। तुम्हारे हाथों के स्पर्श से भी ट्रैफिक जाम की तिलमिलाहट का अहसास होता है। मॉल में आकर हम कितने लाचार महसूस करने लगते हैं। यहां की दुकानें तुम्हें हिला देती हैं सिकंदर। मुझे इनसे कुछ नहीं चाहिए। सेल की लूट से भी मतलब नहीं। न ही किसी ब्रांड से। मुझे सिर्फ सिकंदर का सपना चाहिए। मॉल में सपने नहीं देखे जा सकते। पुराना क़िला में हम कितने सपने देखते थे। यहां तुम सपनों से डर जाते हो सिकंदर। तुम्हारे घर महंगे हो जाते हैं,ईएमआई बड़ी हो जाती है। कारें बहुत हो जाती हैं। सैलरी,प्रमोशन,बॉस की बातें करने लगते हो। कम से कम वहां हमें मालूम था कि ऐसा क़िला फिर कभी नहीं बनेगा,फिर भी सपने देखा करते थे। मॉल में सब कुछ पाने की बेचैनी तुम्हें पूरे शहर से भिड़ा देती है। और तुम मुझको भूल जाते हैं।

चलो न। सच्चे ख़्वाब देखने से अच्छा है,कुछ झूठे ख़्वाब देख आएं। उसी नीम के नीचे बैठ कर दो चार बादाम के टुकड़े हम चिड़ियों में भी बांटा करेंगे। तुमको देखने का मौका तो मिलेगा। मुझे सिर्फ सिकंदर चाहिए। दिल्ली नहीं। इस मॉल से निकलते हुए अक्सर लगता है सिकंदर,हम प्रेम के पलों को नहीं,सेल के झेमेलों को जी कर निकल रहे हैं। तुम भी मुझे कम, मैनिक्विन को ज्यादा देखने लगते हो। देखो...पुरानी दिल्ली के चितली क़बर से ख़रीदा है मैंने यह चूड़ीदार। अब मत कहना कि दीपिका के जैसा है। ये मैं हूं। सानिया...तुम्हारी सानिया सिकंदर।

23 comments:

नीरज बसलियाल said...

रवीश, खूबसूरत है ये टुकड़ा ... कई सारे रूपक को छुपाये बैठा है ये गद्य |

नॉएडा से मेडिकल तक का सफ़र तो कई बार कैब में हमने भी नापा है | दिल्ली अपने में ही एक लेखक है , बैठ जाओ बस, शहर अपने आप ही कहानियां बुनते रहता है |

Jeet jayenge hum tu agar sang hai said...

ravish is se accha likhte hain isliye ye lekh thoda sa kam accha laga

सागर said...

पता है आपको, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, आज से नहीं तकरीबन २ सालों से, जबसे आपको जाना, आपका प्रोफाइल, आपकी नज़र, आपका मनोविज्ञान, व्यंग शैली, सबका कायल हूँ मैं... कई बार लगता है की रविश कुमार की शक्ल में सागर जी रहा है...

पटना में टीचर बताते थे आपकी सफलता के कारण क्या हैं ? रविश की रिपोर्ट देखने को कहते.... २-३ लोग ही देखते थे वो प्रोग. ... कल भी चूने वाली रिपोर्ट देखी आपकी... "गरीबो का white हाउस" जैसे उपमा पर फ़िदा हो गया...

यह तो कहानी लिखी है, शादीपुर, और पटेल नगर में अक्सर घटता देखता हूँ, मैं लिखने वाला था पर अच्छा हुआ आपने कलम चला दी... आपका शुक्रगुज़ार हूँ, और आपको सलाम करता हूँ, हमारी नज़र से आप हमें रु -ब-रु कराने के लिए...

Karan Rajpal said...

आज आपकी कहानी पढ़ कर खुद कुछ लिखने का दिल किया, तो दोस्तों को, जो मुंबई में पिस रहे हैं, ऐसा कुछ लिख दिया.

पहले लाइन के कुछ शब्द आपकी कहानी से मिलते हैं.

ये शहर नहीं दुकान है,
इसमें जो थोड़े मकान है वो गोदाम हैं.
रिहायिश के अलग,
गाडी लगाने के अलग दाम है.

लोग एक दुसरे में लिपट चले जाते हैं,
रेल की पटरी के आस पास पिटे जाते हैं.
जब मेहनत कर घर पहुँचते हैं,
उसके फल चखने से पहले,
नींद के आगोश में,
कल की मेहनत के सपने देखते सो जाते हैं.

दरवाज़े यहाँ खुलते नहीं सरकते हैं, हवा के दायरे कोनों में थिरकते हैं.
अखबार कभी अनपढ़े, कभी रद्दी के ढेर में नज़र आते हैं,
जब कभी खोल दिए जाएँ, तो इश्तिहारों के पुलिंदे नज़र आते हैं.
लोग हजारो ज़बानों में, गांधी के पीछे भागते हैं,
जिन्हें गांधी न मिले, वो कभी भाषा, कभी प्रांत के नाम पर,
अधजले ख्वाब सजाते हैं.

समंदर अगर ना होता यहाँ, तो बस सपनो की एक दुनिया होती.
फिल्में बनती जिनमे, असली जिंदगी दिखती.
हजारों की भीड़ में, वो सुन्दर लड़की सचमुच अलग से दिखती.
आज तो बस एक ज्वार भाटा नज़र आता है,
दिन में स्टॉक मार्केट के नज़ारे,
शाम को विरार फास्ट के बुरे सपने सच हो जाते हैं.

कोलाबा में कभी मौन्दीस, कभी लीओस के आस पास हम नज़र आते हैं,
फिरंगियों के बीच, अपने आप को भी थोडा फेयर एंड लवली पाते हैं.
नकली विदेशी घडियों में अपना वक्त देख,
असली IMFL लगाते हैं.

जब थोडा सुरूर हो जाए,
तो सोने के बजाये,
थोडा चिंतन किये जाते हैं,

के
बम्बई मुंबई तो बन गयी,
इमारतें नयी नवेली सज गयी,
जो बेचारा सड़क पर बच गया,
वो आज गर्दन उचका देखता है,
सोचता है, एक दिन,
मैं भी एक 1 BHK खरीदूंगा,
घर के नीचे पार्किंग होगी,
उसमे अपनी एक बड़ी कार रखूंगा.
खारगर में है तो क्या हुआ,
इस सपनो की नगरी में अपना एक घर लूँगा.

नसीब के यही पुलिंदे लिए,
हम बम्बई चले आते हैं,
कुछ ले दे कर, जान बचा,
बड़ी मुश्किल से, कुछ यादें लिए,
दिल्ली भाग जाते हैं.

जो दोस्त यहाँ के होके रह गए,
सपनो में खो गए,
हम बार बार आयेंगे,
इस शहर की कभी कभी खिल्ली उड़ायेंगे,
कुछ दिनों के लिए,
इसके हो के रह जायेंगे.

क्योंकि ये वो दुनिया हैं,
जिसमे दोस्त हमारे बसते हैं.
अपनी जिंदगी बनाते, सपने बुनते,
रोज थोडा पिसते हैं.
हमें तरस थोडा, प्यार ज्यादा आता है,
कभी ऐसे बेकार फलसफे लिख कर,
कभी कुछ उल्टा सीधा बोल कर,
हम तुम्हे चिढाएंगे.
बाकी रोज, कभी facebook, कभी chat पर,
हाल चाल पूछ पायेंगे.

एस.एम.मासूम said...

लेख़ मैं दम है

संतोष कुमार said...

Ravish jee,
Bachpan me ek kahawat bahut suni thi sabne, "Jaha na pahuche ravi , woha pahuche Kaavi" , par aap ke sundarbh me ye baat galat hai. "Jaha pahuche Ravish , woha na pahuche koi ??" aisa hona chahaye. Aap dil ku chu lete hai. Ek wayangkar the Hari shankar Parsai , aap ke blog me unki jhalak dekh jati hai......

sanjay jha said...

jo mai kahna chahta tha....sagar ne kah diya.......

he prakhand vikas padadhikari.....aap
apne prakhan me ek khand dekar apni nagrikta de dijiye...........

"garibon ka white house"......bimb adhikar aayog wale kahin 'mr. black'
ko khabar leak na kar de......

pranam.

गुस्ताख़ मंजीत said...

हम रवीश की इस कला को बहुत दिन से मिस कर रहे थे। शानदार..

pratibha said...

yahan bhi report. ye to kahani ke saath nainsafi hai...

Gaurav said...

रविश ही,
बहुत खूब लिखा, शायद आपकी श्रेष्ठ में से एक.
बधाई

gaurav

प्रवीण पाण्डेय said...

जो लिखता हूँ, वही लिखता हूँ। काश यही हो जाये बस।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

कितना प्रवाहमयी लिखा आपने..... प्रभावी है आलेख....

Prem Kumar Sagar said...

सच्चे ख़्वाब देखने से अच्छा है,कुछ झूठे ख़्वाब देख आएं

Amit Kumar said...

आपकी इस रचना के लिए मेरी ओर से ढेरों बधाई, हमेशा की ही तरह बहुत खूब लिखा है।

मनहर said...

उस सच से वो झुठ अच्छा जो जीने से सलीके को बनाए रखे, बहूत खूब

pragya said...

शीर्षक और कहानी दोनों अच्छी लगी..

मधुकर राजपूत said...

बात में दम है लेकिन बुनावट कमजोर रह गई थोड़ी सी।

Minakshi Pant said...

हकीक़त को रूबरू करवाती रचना बहुत सुन्दर अंदाज़ मै लिखी है !

आजकल जीने का यही अनाज ही गया है सिर्फ भाग दोड़ और शोर और कुच्छ भी नहीं एसा लगता है जेसे इन्सान इसमें कुच्छ तलाश कर रहा है !

सुन्दर रचना !

Kishore Choudhary said...

बहुत खूब ! सच में क्या वही दुनिया बेहतर थी ?

Vivek Rastogi said...

आज भी दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें एसी से निकलने वाली लपटें पसंद नहीं हैं।

जो बातें आपने निकालने की कोशिश की है कामयाब हुए हैं, और हम आपकी लेखन से प्रभावित हैं, पर फ़िर भी अगर ऊपर दी गई टिप्पणियों को देखें तो उम्मीद कुछ ज्यादा सी हो गई लगती है।

Sonal Rastogi said...

हम कल से यहां नहीं आएंगे। फिर से चलेंगे पुराना क़िला।

अपने मन को कितनी मुश्किल से बाँधा था और trained किया था इस शहर में रहने के लिए ..और सारी रवायतें मानने के लिए ..आपके लेख ने इसकी वो गाँठ फिर खोल दी ..अब फिर बावला हो भागने को तैयार है

प्रदीप कुमार said...

kripya mere blog me jaye aur meri bhi kavita padhe.
www.pradip13m.blogspot.com

कुश said...

पहली बार पढ़ा आपको..
और
सांस रोंक कर पढ़ा ....