किसने कहा हंसना मना है

बहुत दिनों बाद टीवी पर आडवाणी जी को हंसते देखा। राजनेता को हंसना चाहिए। डॉक्टर से लेकर योगी तक कहते हैं हंसा कीजिए। आडवाणी जी सार्वजनिक जीवन में कम हंसते हैं। हंसते हैं तो आंखें बंद हो जाती हैं। हंसते हुए ऐसी झेंप बहुत कम नेताओं के मुख मंडल पर अवतरित होती है। अटल बिहारी वाजपेयी खुल कर हंसते थे। गंभीर मुद्दों पर भी हंस देते थे। मनमोहन सिंह मुस्कुराते हैं। हंसते नहीं हैं। स्माइल टेक्नॉलजी में एम ए हैं। सोनिया गांधी हंसती हैं। एनडीटीवी इंडिया के संवाददाता विक्रांत सिंह ने जब सोनिया गांधी से पूछा कि राहुल गांधी कब आएंगे तो सोनिया विक्रांत के सवालों पर ठिठोली करने लगीं। मेनिफेस्टो उठा कर बोली कि कहां दिखते हैं राहुल। प्रकाश करात थोड़ा थोड़ा हंसते हैं। मुलायम और मायावती हंसने के खिलाफ लड़ रहे हैं। अरुण जेटली हर सवाल पर इतने गंभीर हो जाते हैं कि जैसे तुर्की व तुर्की ऑपरेशन करके ही दम लेंगे। वो अपनी दलीलों को लेकर सीरीयस हो जाते हैं। जैसे हर समय मी लॉर्ड सामने हों और दलील देते वक्त हंसना मना हो। रविशंकर प्रसाद थोड़ा खुल कर हंस लेते हैं बल्कि कई बार ठठा कर हंस देते हैं। शत्रुध्न सिंहा की हाहा हंसी निराली है। अमर सिंह भी खूब हंसते हैं। वो हर प्रकार की हंसी का प्रयोग करते हैं। हाहा से लेकर हीही और खी खी तक की हंसी। उनके पास ज़्यादा भेरायटी है।

अशोक गहलोत न ही हंसे तो अच्छा। हंसते हुए भी लगता है रोते हैं। भूपेंद्र सिंह हुडा के चेहरे से हंसी पर फैलने सिकुड़ने वाली सभी प्रकार की चमड़ी और धमनी गायब है। शिवराज सिंह चौहान थोड़ी खिलखिलाती हंसी का इस्तमाल करते हैं। रमन सिंह मुस्की छाप मुस्कुराते हैं। नरेंद्र मोदी हंसते नहीं पर व्यंग्य कर लेते हैं। शरद पवार हंसाते नहीं बल्कि हंसते हुए कुछ कह देते हैं। हंसी पर पवार का यह अहसान सदियों याद किया जाएगा। नीतीश कुमार भी बोर हैं। ऐसे बड़े हुए हैं जैसे मां बाप से डांट खाते हुए बड़े हुए हों जहां हंसने पर एक लप्पड़ रसीद कर दिया जाता हो। नीतीश ही नहीं हमारे ज़्यादातर नेताओं का यही हाल है। सार्वजनिक जीवन की तमाम छवियां इन्हीं की बनाईं हुई हैं। एक हंसने की बना देते तो कोई क्या बिगाड़ लेता।

रही बात लालू प्रसाद यादव की तो ये हंस कर ही सबसे अलग हो गए। अब लालू ने हंसाना बंद कर दिया है। हंसाने के सारे मुहावरे लालू के गायब हो चुके हैं। जिस टीवी ने लालू को ‍ड्राइंग रूम में पहुंचाया उसी ने लालू को ड्राइंग रूम का स्थायी नेता बना दिया। लालू की छवि टीवी वाली है। जब से लालू यादव ने विकास की राजनीति का फैसला किया है तब से वे हंसना छोड़ आंकड़ों को रटने लगे हैं। बहुत दिनों से लालू ने कोई नया मुहावरा या लतीफा नहीं गढ़ा। फिर भी लालू की हंसी का जवाब नहीं। लालू हंसते हैं तो सब हंसते हैं। अब लालू के पास जाइये तो हंसी को लेकर सीरीयस हो जाते हैं। उनके सलाहकारों ने गलत सलाह दे दी है कि अब आप मत हंसिये वर्ना आईआईएम अहमदाबाद और हावर्ड वाला सीरीयसली नहीं लेवेगा।

अब तो टीवी वाले भी लालू को मिस नहीं करते। राजू श्रीवास्तव लालू के मुहावरे पर चलते हुए सामाजिक टीका टिप्पणी में आगे निकल गए हैं। राजू टीवी के नए लालू हैं और लालू अब जेंटलमैन होते जा रहे हैं। वे अब सत्तू, चोखा, लाठी और लोटा की बात नहीं करते। विकास की राजनीति के प्रतीक बनने के लिए इन सब मुहावरों की बलि दे दी लालू ने। पिछले २० सालों से दिल्ली और पटना के सिस्टम के पार्ट हैं। अब लालू के पास कोई नया चैलेंज नहीं बचा है इसलिए उनकी हंसी पुरानी पड़ रही है।

ऐसे में झेंप से ही सही कोई राजनेता या कहें कि आडवाणी हंसना शुरू करे तो स्वागत करना चाहिए। हंसने से तबीयत ठीक होती है और पता चलता है कि वरुण की तरह बोलकर हिंसक होने में कोई मज़ा नहीं है। रामायण सीरीयल में देखा था, राम वनवास के लिए निकल रहे थे लेकिन तब भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी। अपने नेता भाई लोग राम मंदिर बनाने रथ पर निकले तो हंसी वही पहिये के नीचे गाड़ दी। हंसते हंसते राम मंदिर नहीं बन सकता क्या। लड़ते लड़ते और बकते बकते कौन सा अचूक फार्मूला मिल गया है भाई लोगों को।

इन सब नेताओं को लाफ्टर चैलेंज दिखाया जाए। गंगूबाई से सीखना चाहिए। वर्ना अटल बिहारी वाजपेयी और लालू प्रसाद अब भी लाफ्टर चैंपियन बने हुए हैं। दुख इस बात का है कि ये चैंपियन भी अब पांच साल पहले के ओलंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट हैं। इस बार तो रिटायर से लगते हैं। इस बार के इलेक्शन में कोई ऐसा नेता ही नहीं है, जो हंसा कर मुद्दों को ज़रा गंभीर कर दे। इतना गंभीर कर देते हैं कि लगता है मुद्दों के लोड से नेता जी को स्पोडिलाइटिस हो जाएगा।

12 comments:

आदर्श राठौर said...

हा हा हा
रोचक पोस्ट..

Pramod Singh said...

हंसाके ज़्यादा फंसा, अइसे जी?

राकेश said...

ग़जब जमा किए गुरू. पासवानजी से कोई बैर है? छोड़ दिए. काश, ऐसी ही एक पोस्‍ट पत्रकारों पर लिखी जाती!

creativekona said...

रवीश जी ,
हँसाना ..हँसना ..मुस्कराना ..सब इन नेताओं की मजबूरी समझ लीजिये ..या फिर इनका पब्लिक को बेवकूफ बनाने का तरीका .....अब कुछ दिनों की ही बात और है फिर देखियेगा कौन कितना हँसता ..मुस्कुराता है ..
हेमंत कुमार

anil yadav said...

डाइनासोर की तरह बाल ठाकरे की हंसी भी कभी नहीं देखी.........................

vipin dev tyagi said...

हंसी हो तो दिल खोलकर...दिमाम,अक्ल,शक्ल पीछे छोड़कर...क्योंकि जिस हंसी के साथ दिमाग चलता है..दिमाग लगता है...वो हंसी..कहीं ना कहीं स्वार्थ..मौकापरस्ती..घमंड में फंसी होती है...मतलब के दांतों तले दबी होती है....हंसों तो सिर्फ और सिर्फ हंसने के लिये...खुश होने के लिये...खुद भी और दूसरों को हंसाने और खुशी देने के लिये...

manolok said...

वाह!भारतीय लोकतंत्र और कला का मनोहर संगम !कितना सुन्दर और अद्वितीय !एकदम दुनिया को दिखाने और सिखाने लायक !

सचमुच रवीश जी ..हमारे लोकतंत्र में अभिनय करने वालों और हसने-हसाने वालों की सख्त कमी हो गयी है .सुकर है कुछ पार्टियाँ कई दत्त , श्रीवास्त ,झा ,तिवारी ,प्रदा ,सिन्हा ..... को राजनीति में लाने के अथक प्रयास में जुटीं हैं .आज की आदर्श राजनीति में वैसे नेताओं की सख्त जरूरत है जो जनता के साथ अच्छा अभिनय और मजाक कर सकें .


(आपलोग ये ध्यान रखें की भारतीय रेल का कायापलट कोई जादू टोना से नहीं हुआ है बल्कि मज़बूत अर्थव्यवस्था के कारण हुआ है .)लिहाजा किसी को अपने विनोदी पहचान को बचा के रखना चाहिए .

JC said...

Kya karein hamse pehle hi sab shayar adi 'jiwan ka satya' shabdon mein bayan ker chuke hain... ab ghor kaliyuga mein kuchh naya kehne ko rah hi nahin gaya... Kisi ne shayad thik kaha tha, "Pehle her baat per ati thi hansi/ Ab kisi baat per nahin ati." 'Ab to rona hi aata hai'...natak dekh dekh sab bore ho gaye...

PM Jawahar Lal, Lal Bahadur... aur ab Lal Krishna, Lalu Prasad adi mein kewal LAL hi saman hai...jo khatre ka rang bhi hai, Lal China jaise, jinke jhande mein hathorda aur hansiya darane ke liye kafi hein...aur aap kahte ho ki wo khul ker hansein - aur public ke samne denture girne ka khatra uthayein:(
Janata ko awashya hans-ne ka mauka mil jayega aur 'channels' ko 24x7 uska 'action replay' dikha-dikha ker darshakon ko bore karne ka:(

MUKHIYA JEE said...

बिहार पर कुछ लिखिए हुज़ूर ! यह आपका गृह प्रदेश है ! आपके 'घरवाले' लालू की गोद में और आपके गोतिया / पट्टीदार जिन्हें आप नेस्तनाबूत करना चाहते हैं कोंग्रेस की गोद में बैठ चुके हैं !

JC said...

Shri Jamshedji, 'Ishwar' shabd 'nashwar' ka ulta hai - yani jo anant ya sthayi hai, samaya ke saath nahin badlta...Aur hum aur aap jaise sab asankhya prani asthayi hain jo roz bachhe/ ande se shuru ker badalte badalte ek din zameen ke saath mil jate hain - khak ban ker ya uske neeche kabra mein khak hone ke liye samaya ke saath...peechhe chhord auron ko rone ke liye jinke hum karibi hua karte the kabhi...

Ise 'kaal-chakra' ka hissa maana gaya hai jo 'Ishwar' chala rahe hain, shayad kisi majboori ke karan...jo her neta aur her janata ke madhyam se bhi shayad jhalkta hai, vibhinna karanon se...aur Hanuman jaise niswarth sewak hi kuchh madad ker sakte hain - aisa kuchh ka vishwas hai: Mano ya na mano, ya kisi aur ko man lo jo aapko pasand ho...Dukandar bhi kehta hai 'Babuji lena hai to lo...(varna jao - meri dukandari kharab mat karo!)...Channel bhi ab 100 ho gaye hain, NDTV dekho ya na dekho!

Harsh said...

sachmuch raveesh ji aapki apne blog par har post rochak hoti hai. sabdo ka achcha janjaal bunne ki kala aapme hai . aaj ki aapki yah post padkar mujse bhi jor se hase bina nahi rha gaya ....
is sundar post ke liye shukria

JC said...

Ravishji, Hansne ki baat chali hai to janjaal ya (Mayavati ka) mayajaal jaise, ek bunkar ne ek Raja ko ek aisa vastra lakh rupaiyye mein pehna diya jo sirf aur sirf 'buddhiman' ko hi dikhai de sakta tha, 'moorkha' ko nahin.

Sab chaploose durbari us vastra ki tareef per tareef karte chale gaye, kyunki koi bhi moorkha nahin kehlana chahta tha...Kintu jab wo rally mein bhi chala, aur dhindhora bhi pit chuka tha us vastra ki khasiyat per, her koi 'wah wah' karta gaya...Per antatogatva satya sabko pata chal hi gaya jab ek bachcha chillaya, "Areeee! Raja to nanga hai!"