बोर्नभिटा ब्वॉय और पोलिटिक्स

कमज़ोर प्रधानमंत्री या मज़बूत प्रधानमंत्री क्या होता है? कोई दंगल खोल रखा क्या सेभुन रेसकोर्स में भाई लोग? अजब हाल है पोलिटिक्स का। बुढ़ारी में आडवाणी जी जवान हो रहे हैं। ऐसे फोटू खिंचा रहे हैं जैसे तीन बोतल सिंकारा और पांच बोतल मुगली घुट्टी गटक चुके हैं। कॉप्लान से लेकर बॉर्नभिटा तक दूध में फेंट कर गटा गटा पी चुके हैं। क्या भाई? सेभुन रेसकोर्स में क्या आप कुश्ती करने वाले हैं? दिमाग से ही काम करेंगे न?

और मनमोहन भाई को क्या हो गया है? ऐसा कौन सा काम आप कर दिये हैं कि मजबूती बखान रहे हैं। पीएम की रक्षा करती है सोनिया...लाइफब्वाय है जहां तंदुरुस्ती है वहां। अकेले निकल के जरा बोलिये न। पांच साल बाद अब जाके मुंह से बकार निकला है। वैसे जवाब सही दिया है भाई ने बड़े भाई को। चिरयुवा आडवाणी जी की बोलती बंद कर दी। दो कौड़ी का मुद्दा है ये कमज़ोर प्रधानमंत्री वाला। अटल जी मज़बूते थे तो क्या गठबंधन की मजबूरी से निपट लिये का। काहे नहीं बनवा दिये राम मंदिर। वीएचपी वाले डिजाइन,ईंटा सिमेंट लेकर घूमते रहे। बाप रे,पाठकों पूछो मत,कहां से एनडीए वाले एक ठो फ्राड शंकराचार्य को पकड़ लाए। कांची वाले। जो बाद में हिंदू धर्म की रक्षा करते हुए जेल भी गए। जिनके जेल जाने को लेकर गर्व करने वाले किसी फंटूस हिंदू का खून ही नहीं ब्वायल हुआ। मंदिर नहीं बना सके। बहुत मज़बूत थे अटल जी तो मोदी के आगे काहे झुके। जब मोदी ठीक ही थे बेचारे तो राजधर्म की रक्षा का सबक काहे दिये। पोलिटिक्स पढ़ाते हैं का हमको। बूझते नहीं हैं। त्याग कर देते न राम की तरह अयोध्या का राज पाट। किसी नायडू को खड़ाऊं देकर निकल जाते। आंदोलन करने। आंदोलन कहते हैं न भाई लोग।


दरअसल दोस्तों, राजनीति ताकत का खेल नहीं है। ये कोई सर्वशक्तिमान सीरीयल नहीं है। प्लीज़। अक्षय कुमार को बना दीजिए न प्रधानमंत्री। मनमोहन सिंह किसी काम के प्रधानमंत्री नहीं है। लेकिन ईमानदार हैं। हां मजबूर हैं। गठबंधन में मजबूरी एक कला है। इस कला का सम्मान करके ही अपने अटली जी नेता हुए। मनमोहन सिंह भी तो यही कर रहे हैं। आर्थिक मंदी पर क्या बकते हैं यही जाने। अर्थशास्त्र कुछ बेसी पढ़ लिये हैं। मनमोहन सिंह को कहना चाहिए कि हां मैं कमज़ोर हूं। कमज़ोर नहीं रहता तो मेरा चुनाव इस पद के लिए नहीं होता। प्रणब और अर्जुन सिंह थे न मजबूत एंड कांप्लान ब्वाय। अर्जुन सिंह रामशरण जोशी जी से संस्मरण लिखवा रहे हैं। राजनीति में मरण की घड़ी में संस्मरण ही काम आते हैं।

खैर मजबूत नेता कोई नहीं है। जे बा से इ बात ठीक कह रहे हैं। न अटल मजबूत हुए न आडवाणी न मनमोहन। बकवास मुद्दा है। मज़बूती का। सवाल सेभुन रेसकोर्स की मर्यादा का नहीं है। सवाल काम का है। आपके काम से पब्लिक को फायदा हुआ या नहीं। जे बताइये पब्लिक को। कितना दंड पेल कर और नाश्ते में दो दुकड़ा पपीता खाकर जवान बने हुए हैं ये मत बताइये।

शरीर नश्वर है। आत्म न मर सकती है न कोई इसे मार सकता है। हम सबमें एक ऐसी आत्मा है। उस अमर आत्मा की सुनिये और काम कीजिए। लबरई मत हांकिये। लबरई का मतलब झूठ होता है। इसलिए प्रिय पाठकों,बात कुछ नहीं है। बुढ़ापे में आडवाणी और मनमोहन को जवान दिखने का शौक चढ़ गया है। बूढ़ घोड़ी के लाल लगाम। भोजपुरी में कहावत है।

जवान होना प्राइवेट मसला है। इसके लिए कोई बाबा रामदेव के पास जाए या मर्दाना ताकत बढ़ाने वाली दवाओं का विज्ञापन काट कर रखे। इसको पब्लिक में मत डिस्कस यानी चर्चा करो। चुपचाप तंबू में घुसो,नाक से बोलने वाले बाबाओं की सुनो और शिलाजीत खाकर निकल आओ। जहां आजमाना है वहां आजमाओ। पोलिटिक्स को ताकत रहित रहने दो। अखाड़ा नहीं है न जी।


खिजाब लगाकर हर दिन वो हो रहे हैं जवान।
सफेद बालों को छोड़ जवानी कब की जा चुकी है।

25 comments:

prabhat gopal said...

samajh me nahi aata hai ki ye neta moddo par bat kyo nahi karte hai. sarkar banana koi individual game nahi hai.ye team work hai. team work ke hisab se har bat ko bolna aur rakhna chahie.

JC said...

Satya vachan! Kintu satahi...

Jaisa Ravishji aapne bhi kaha, kya hamare gyani nahin kah gaye ki jagat mithya hai - kewal atma hi satya hai? Ant mein to Hindu atma 'Rama nam satya hai' (shayad Ram mandir nahin!) sunte hue shayad agle chchra paane nikal pardti hai...

Aur yeh bhi ki hamari aapki atma kaal-chakra mein Brahma ji ke din se chaloo ho gayi thi, alag alag mukhote pehan pehan ke ati rahi hai...Aur, ab unke naye aur purane chehre ek saath jhalak rahe hain akhare mein - jaise natak mein aur film, TV adi mein bhi ek shodashi kanya bhi ek vriddha mahila ka role kar leti hai - jitna darshak ko moorkha banale utni tareef:)...Aur TV ke 'anchor', yani jahaj ke langar jaise (use sthir rakhne hetu), adi bhi powder lipstick adi laga ke public ko sunder aur jawan lagne ka prayas karte hain:)

Such to yeh hai ki 'Mithya bazaar mein jhoot hi bikega' - lagbhag her 'pardha-likha Hindu' to kam se kam shayad yeh sunta aya hai, aur yeh bhi ki Kaliyuga mein natak sab-se boring hota hai - Satyuga ke natak ko adarsh maante hue. Arambhic Atma aur us-se jurde shareer ne to wo bhi dekha hoga, isi liye adhiktar aaj kahte sunai dete hain, "Ye dil ye pagal dil mera kyoon bujh gaya, Awaragi?...Hum log to ukata gaye/ Apni suna Awaragi...":)

आदर्श राठौर said...

जनता में जागृति आ रही है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि प्रधानमंत्री कमज़ोर है मज़बूत... अंतत: वो वही फैसला लेगा जो उस सही लगेगा। नेताओं को चाहिए कि इस बकवास से ऊपर उठकर जनहित में काम करने की सोचें। इलेक्शन जीतना है तो सही मुद्दों को जनाता के बीच ले जाएं। भाषणबाज़ी से उक्ता चुके हैं लोग।

वर्षा said...

मज़ेदार है

Suresh Chiplunkar said...

आपने पिछली पोस्ट में लिखा था "टीवी गोबर का पहाड़ है", उसी गोबर में NDTV का मुस्लिम तड़का लगाकर लिखी गई पोस्ट है यह आज की पोस्ट… एकदम बकवास और सदा की तरह भाजपा-संघ-हिन्दू विरोधी… आप सिर्फ़ "जय हो" कीजिये…

Kapil said...

अरे महाराज, ऐसी बतकही कइहों छुपाय रहे अब तलक।
अच्‍छी शैली में लिखा है लोगों की जबान में। उम्‍मीद है आगे भी ऐसी शैली का तीखापन पढ़ने को मिलेगा।

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

इस पुरे लेख में बाते तो पुराणी ही दुहराई गई है ! कामो बेश पिछले तीन चुनाव से कांग्रेस वही रट लगाती है मस्जिद मंदिर वाला ! आप भी उन्ही बातो का सहारा लिए हैं एन डी ए को धेराने के लिए |
एक बात आपने जबरदस्त कही " पाच साल बाद मनमोहन जी के मुहँ से बकार निकला है" ! देश जलता रहे, देश की समस्याएं आसमान छूती रहें वो नहीं बोले | लोग किस आधार पर इनको मजबूत कहे? देश के किसी भी ज्वलनशील मुद्दे पर देश का मुखिया छुपी छाए रखे तो क्या सोचेंगे लोग | मैं मनमोहन सिंह जी का बड़ा फैन हूँ लेकिन क्या ए सवाल नहीं कर सकता ?
मैं शाम को लगभग हर चैनल खंगारता हूँ और नेतावों का वक् युद्ध सुनता हूँ. एक बाद गौर करता हूँ की लगभग हर टी वि चैनल के एंकर कांग्रेस के नेतावों से सीधे सवाल करने से डरते हैं. बी जे पि के नेताओं को तो कहीं कहीं हड़का भी देते हैं लेकिन कांग्रेस के नेतावों के आगे भीगी बिल्ली बने उनके उत्तरों के हां में हां मिलाते नज़र आते हैं | बड़ा अजीब लगता है |

विनीत कुमार said...

धत् तेरी इसी को कहते हैं उत्तर-आधुनिक जुग। सैंकडों चेला लोगन को तटस्थता का पाठ पढ़ाकर बूढ़े हुए रामशरण जोशी जी अब जोशीजी का संस्मरण लिखने में जुटे हैं। अब चेला लोग इन्टर्नशिप खोजने के बजाए लोकल जोशी की जीवनी लिखने लग जाए तो इसमें बेजा क्या होगा।

अविनाश वाचस्पति said...

प्रधानमंत्री कमजोर हैं
ताकतवर हैं तो का भया
कुर्सी ताकतवर होनी चाहिए
पी एम की कुर्सी से ताकतवर
और कौन सी है
बस उसकी ताकत
उस पर बैठने वाले में ही
तो नहीं है
बिठाने वाले में तो है।

बैठने वाला तो
सिंह की तरह गरजेगा ही।
ऐसी कुर्सी के लिए
हर कोई तरसेगा ही।
आप अपने कस्‍बे में
चर्चा करते रह जाएंगे
वो जिसका लेना है
उसका वोट सरेआम
लूट कर ले जाएंगे
वोटलुटेरे हैं न भाई।

रंजना said...

अब राजनीति में कुछ करने की बिसात तो अपनी है नहीं,अभी तक भोटर आई डी तक नहीं जुगाड़ सके हैं....पर आलेख की शैली पढ़कर बहुत्ते आनंद आया..

रज़िया "राज़" said...

कभी रूलाते है,कभी हँसाते हैं।

आप भी बडे सयाने हैं रविशजी!

सभी को अपनी उँगलियों पर..........?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रवीश भाई बढ़िया लिखे हैं। राजनीति अगर ताकत का अखाड़ा हो गई तो अखाड़े वाले क्या करेंगे?

JC said...

Pehle 'Bharat' mein lardaiyan maidan-e-jung mein teer aur talwar adi se hoti thi...lagbhag ek cricket match ke saman, subah se sham tak.

Mahabharat ki lardai mein, dono taraf ke yoddha arambh mein ya to dhanush ki tankar se, ya shankhnad se dushman ka hausla past karne ka prayatna karte the...

Azadi ke liye, Angrezon ko Bharatiyon ne vakilon ke madhyam se unke kanooni jaal mein 'loopholes' dhoond nak mein dum ker bahar kiya...

Lekin 'democracy' mein, jo vote batorne ki rajniti ban gayi hai, aaj TV adi ke madhyam se, unke studios mein athva rally adi mein her neta prayas karta hai dushmanon ke chakke chhurdane ka - jeebh ke prayog se, kyuki ise dudhari talwar se bhi tez mana jata hai...

'Do and deny principle' ka sahara le, aaj ke bhi sare vakil naqal ker, kanoon ki kamiyon ka sahara le kuchh bhi keh sakte hain, aur sab taraf se sataya hua aam aadmi, jise kanooni danv pench ki kuchh bhi samajh nahin hoti, kewal drishta-bhar rah jaata hai, kintu agyanta vash anand nahin le pata:(

Ho sakta hai langaron ko samajh na aye wo sun-sun ke bhi kuchh gyan hasil kar lete honge aur thorda bahut shayad anand uthane mein safal ho jaate honge :)

Madhaw Tiwari said...

जीवन में हमारे सामने कई तरह के सवाल आते हैं... कभी वो अर्थ के होते हैं... कभी अर्थहीन.. अगर आपके पास हैं कुछ अर्थहीन सवाल या दें सकते हैं अर्थहीन सवालों के जवाब तो यहां क्लिक करिए

JC said...

Tiwariji, maine uttar to de deiya hai, kintu sarvagunsampanna karta ki drishti se kuchh bhi arthheen nahin hai - sab apna apna role kar rahe hain, aur her ek vykti ko satya athva satva (essence) mil hi jaata hai kahin na kahin is anant shrishti mein...Kahavat hai, Angrezi mein, "Beauty lies in the eye of the beholder," aur Hindustani mein, "Dil laga gadhi se to pari ki kya bisat!"
Matlab to anand lene se hai:)

hamarijamin said...

Manmohan singh sabase kamjor pradhanmantri hain kahanae wale L K Adwani ko kabhi sune mein bhi is bat par aapati nahi ki we bhari imandar vyakti hain. Politics me aksar majbuti hi kamjori ban jati.
adwaniji apni majbuti ke karan hi Atalji se kamjor pad gaye--nahi to unko 'PM-IN-WAITING' NAHI RAHANA PADATA.

JC said...

'Hamarijamin'ji, Politics yani rajniti, ek gambhir vishaya, jise Pandit Vishnudatt Sharma ne pracheen kaal mein saral shabdon mein (tatkaleen Raja ke moorkha beton ke liye) 'Panchtantra' ki prasiddha janwaron ki kahaniyon dwara lokpriya kiya aur aaj bhi samjhane/ samjhaane ke kaam ati hein...

Aur Cricket, manoranjan ke liye khelon mein sabse adhik lokpriya hai.

Aur dono hi gathit team ki karyapatuta ya karya kushalta per nirbhar karte hain...Ho sakta hai Tendulkar/ Bradman ke karan team ke kai achchhe (kintu kum shaktishli) ballebaj hote hue bhi Captain/ PM na ban paye/ ya pate hon...Haarne ka gham, aur jeet ki khusi avasyambhavi hai...sikke ke do pehlu jaise...

Pracheen Bharat mein usiko satya mana jata tha jo samay ke prabhav se badalta na ho..."Satyam Shivam Sunderam" mein Sh-iv, Vi-sh ka ulta hai yani 'amrit' jo anant hai, jaise 'Sati' ya Shakti, yani energy jo vibhinna roopon mein parivartit to ho sakti hai parantu akshya hai...

Shyad hamein koi sharam nahin honi chahiye ki hamare poorvaj 'gyani' ya 'siddha purush' the...shayd kaal ke prabhav se...

JC said...

Jab logon ko laga ki Shaktishali Jawahar Lal Nehru ke retire hone ka samay agaya hai to tatkaleen media ne shor macha diya: Nehru ke baad kaun banega PM??

Ise vidhata ka khel hi kahenge ki nanhe sse Lal Bahadur Shastri agaye to thorde se hi samay mein sabne Nehru ko bhool unki karyakushalta ki daad deni shuru ker di - kintu ‘durbhagya’ se unhein shighra utha liya:(

bikram said...

अच्छा हो कि हमारे नेता थोडा अपने स्वास्थ्य के साथ साथ देश में मौजूद स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी थोडा ध्यान दे. हमारे देश में सरकारी महिला चिकित्सालय ऐसे हैं जहाँ कोई मादा पशु भी प्रसव ना करना चाहे. एम्स में पेट दर्द ठीक करने जायेंगे और अगर डाक्टर ने अल्ट्रा साउंड लिखा तो आपका नंबर २ महीने बाद आएगा. प्राइवेट में चाहे तो २०० का टेस्ट २२०० में करवा ले. मनमोहन अमेरिका के साथ परमाणु करार कि बड़ी दंभ भरते हैं. उन्हें उस देश से कोई स्वास्थ्य करार भी कर लेनी चाहिए. वहां सभी का स्वास्थ्य बीमा ज़रूरी होता है कुछ तो सीखते. पोस्ट से काफी अलग हट के कमेन्ट डालने के लिए माफ़ी चाहता हूँ. इन मुद्दों से जूझ रहा हूँ तो यही ध्यान आते हैं. और गुस्सा नेताओं पर आता है. लोक सभा चुनाओं की सुर सार शुरू हुए काफी वक्त हो गया लेकिन ये एक दूसरे की टांग ही खींच रहे हैं मुद्दों कि किसी को खबर नहीं. वाकई ये बुढापे में जवान दिखने की जुगत में हैं लेकिन जो जवानी में जान गवां रहे हैं उनकी इन्हें फिक्र नहीं.

JC said...

Bikram ji ne sahi kaha. Mujhe yaad aya kaise mein kisi lambi avadhi tak 'GNIT', 'DTC' adi buses se safar karta raha...aur sham ko apne bhai-behnon ko apni yatra ki dukh-gata sunata tha...Kintu ek din mere babuji ne mujhe motor cycle, yani bike, dila di...

Uske baad mein farrate se ek ke baad ek lambi kataron wale bus-stands dekh, khush hote hue, office ki ore nikal jata tha...meri bala se ab bus chale ya na chale...

Shayad aam aadmi is-se anuman laga sake kisi ki bhi mansik awastha ka jiske pas lal batti wali gardi hi nahin apitu ghar baithe baithe hi sukh-suvidha ke sab sadhan prapt hon - Angrezo dwara rachit vyastha ke karan jo unhone rajya karne ke liye banai thi, seva ke liye nahin:)

Ise durbhagya hhi kehna hoga ki hum do nav mein jaise bah rahe hain - 'munh munh mein Rama-Rama aur bagal mein chhuri' kahavat ko yatarth karte hue - ghor kaliyuga mein shayad:)

आपकी आवाज़ said...

sahi kaha aap ne.....

manolok said...

ये क्या कह डाला आपने? माना की दंगल की जरूरत नहीं पर...
एक प्रधान मंत्री विश्व पटल पर एक देश का परतिनिधित्व करता है . इसके व्यकतित्व का सशक्त होना आवश्यक है ताकि वह अपने देश के लिए हमेशा कुछ जीत कर लाये .उसे उर्जावान होने के साथ साथ कुशल वक्ता ,दृढनिश्चयी ,आत्म्वाश्वासी,दूरदर्शी और तर्कशक्ति से लैस बुद्धिमान होना चाहिए . प्रधानमंत्री वैसा होना चाहिए जिसमे अपनी वाक्पटुता और वाक्शैली से सामने वाले को सम्मोहित कर लेने की दक्षता हो . साथ ही वह अपने शक्तिशाली व्यक्तित्व से हठी से हठी और उदंड से उदंड व्यक्ति में भय का संचार कर उसे झुक जाने को मजबूर कर दे .

ईमानदार मौन-मौन सिंह भले ही sony-या बैटरी के दम पर सबसे हैवी ड्यूटी कठपुतली होने का दंभ भर लें पर दिखे तो वो हमेशा standby mode में ही .सारी चीजें अपने नियत स्थान पर ही अच्छी लगती हैं . मौन-मौन सिंह विद्वान अर्थशास्त्री हैं ,पर उनमे कुशल वक्तृत्व क्षमता और उनके व्यक्तित्व में दृढ़ता का आभाव दिखता है . भाषण देते हैं तो लगता है की किताब पढ़ रहे हों . न वो अपने भाषण से किसी को वशीभूत कर पाते हैं और न ही अपने दृढ व्यक्तित्व से सामने वाले पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना पाते हैं . मुझे अक्सर वो विडियो सीन याद आता है ,जब १२३ परमाणु समझौते के बाद बुश और मौन-मौन सिंह के संयुक्त मीडिया संबोधन के वक्त ,बुश मौन-मौन सिंह की गर्देन पकड़कर खड़े खिखिया और मुह बदोर रहे थे. क्या बुश ऐसा चीनी राष्ट्रपति के साथ कर सकते थे ?

अब कौन-रईस पार्टी का कैबिनेट भी तो देखे न . एकदम बेमेल . जहाँ छोटे प्राणी मुखर्जी पर बेरहमी से विदेश और वित्त मंत्रालय का पहाड़ लाद दिया गया हो . इन्हें corn-delicious rice और avid sillyband के साथ हाथ मिलाते वक्त आसमान की ओर ताकना पड़ता था . इनके पोर्टेबिलिटी को देखकर कौन डरेगा ?क्या ये किसी पर कुटनीतिक, राजनैतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में सक्षम हैं ?अब देखिये न भारत की क्या इज्जत देते हैं पाकिस्तान जैसे छोटे देश ,जब चाहे दो लात दे दिया और भारत चिल्लाता रहता है "अम्लिका अंकल पाकिस्तान ने मुझे माल दिया मुझे माल दिया एं ओयाँ ओयाँ उहूँ उहूँ ...पाकिस्तान को मालेंगे ,पाकिस्तान को मालेंगे ". अब चिंता-भ्रम जैसे स्कॉलर को देखिये अपना कारोबार छोड़कर घरेलु कारोबार देख रहे हैं . माने सोये-राज पाटिल के पौने पांच साल के राज में जनता इसलिए विस्फोटों में उड़ती रही क्योंकि कौन-रईस पार्टी के पास और कोई विकल्प नहीं थे ! क्या इतनी कमी हो गयी है योग्य राजनीतिज्ञों की ? वेतन और माल उड़ाने के लिए इतने मंत्री,बंदरबांट के लिए इतना बड़ा मंत्रिमंडल पर महत्वपूर्ण मंत्रालयों को ठीक ढंग से संभालने वालों की इतनी कमी ?

दूसरी तरफ आग-वाणी जी अपने वाणी की आग से न जाने कितने निर्दोषों का घर फुंकवा चुके . देश को नफरत की आग में धूं-धूं जलाकर इसे वे अपना पौरुष का प्रतीक मान रहे हैं .इनकी जमात के लोग "आंदोलनों" में निर्दोषों की मौत को जायज़ मानते हैं अब भले ही इनके "आंदोलोनों" में इनके नेता और प्रियजन कभी न मरते हों ,सिर्फ भेड़-बकरियां लड़ती-मरती हों . वैसे भी अपने मतलब के लिए दूसरों की बलि चढा देना कितना आसान है .ये कभी मौत के खौफ से पनाह मांगते वो पसीने और आसुओं से लथपथ मदद के लिए चीखते चेहरे को महसूस कर के देखें .कभी तलवारों और आग से घिरकर इधर उधर भागते-दौड़ते पुतलों को महसूस कर के देखें . क्या भाई ,क्या बहन ,क्या माँ ,क्या बाप ,क्या बेटा ,क्या बच्चे ,क्या बुजुर्ग ,एक तितर बितर हो चुके परिवार की वेदना महसूस कर के देखें.रोड पर भटकते लावारिस नौनिहालों को महसूस कर के देखें .गुजरात से महाराष्ट्र पहुँचकर हिन्दुओं के यहाँ पलने वाले जिगर के टुकडों को महसूस कर के देखें .कभी ये सब अपने परिवारों के साथ होता महसूस कर के देखें .कभी तो धर्म-जाति से ऊपर उठ इंसान बन महसूस कर के देखें .
असल में आग-वाणी जी की आज तक की "उपलब्धि" और कुछ नहीं . बस मन में प्रधान मंत्री बन जाने की लालच है और वो सपने में कई दिनों से अपने को गद्दी पर देखकर feelgood कर भी रहे हैं . इसके लिए पार्टी की भी बलि चढानी हो तो कोई बात नहीं .राम नाम का झाल बजा देने से आम आदमी का पेट नहीं भर जाता और न ही सारे बकाये काम हो जाते हैं . तालिबान,अलकायदा और आतंकवाद जिनका पड़ोसी हो जाए उसे खा जाता है .जहाँ घुसपैठ,आतंकवाद और भ्रष्टाचार जैसे भारत का अस्तित्व उखाड़ने वाले ज्वलंत मुद्दे पड़े हों उस समय राज-नाथ सिंह का राम मंदिर राग अलाप कर लोगों का ध्यान भटकाना मुद्दों से मुह छिपाकर भाग जाने की कायरता ही है .

JC said...

Nimnlikhit kahani ek ‘local’ ke hi munh se maine ‘sulagte uttar poorvi rajyon’, vishekar Assam, ke sandarbh mein koi teen dashak pehle suni thi aur ye sampoorna (Maha) Bharat per bhi sahi baithti dikhai de sakti hai…

Usne kaha ki yeh usi prakar hai jaise kisi rail ke unreserved compartment ka haal hota hai. Arambhik station se jo log baithte hain we araam se khule-khule baith jaate hain, aur unmein ekta aa jati hai, ek parivaar jaise, aur we yeh nishchaya kar lete hain ki kisi ko ab bhiter nahin aane denge! Darwaza band, kintu agle station per kuch shaktishali, bahubali, safal ho hi jaate hain pravesh pane mein. Tab log thorda sikurda jate hain aur unhein bhi bitha lete hain. Ab sab phir ek jut ho-ker agle station per auron ko rokne ki koshish karte hain, aur thorda bahut asafal rahte hain, jis-se phir sab-ko aur simatna perdta hai…Yeh silsila chalta rahta hai jabtak gantavya, yani aakhiri station na ajaaye, jahan sari train khali ho jaati hai…aur usko uski vapasi se pehle dhulai hoti hai…Yatra ke duraan yatriyon ki sari taqat train ke chalne ke ratti bher bi kaam nahn ati – sirf ek doosre ka sir phordne mein kharch ho jati hai:)

Aisa hi haal hamare gyani log bhi keh gaye prithvi ka hota hai jab sari atmayein (‘sarvbhoot’) gantavya per pahunch jaati hain, aur tab poori train ke saman uski bhi dhulai nischit hai … dharti to mote, patle, bhainge, kanrde, lambe, chhote, shatiheen, shaktishali, ityadi manavon ke aane se bahut pehle se ghoom-ti ayi hai! Kya hamne ab tak vibhinna prakar ke PM ko naheen jhela hai in 60 saalon mein hi?? Aur usse pehle anekanek videshiyon ko sadiyon se??

अवधेश कुमार मौर्या said...

ek chehra hai apne politics ka kya kareyega....

कुमार आलोक said...

दरअसल मूल मुद्दे से ध्यान हटाने में दोनों ही प्रमुख दल माहिर है । आडवाणी जी अमरीकी चुनाव की तर्ज पर लाइव बहस प्राममिनिस्टीरियल कैंडिडेट्स का कराना चाहते है । देश की प्रमुख समस्याओं में मेरे समझ से प्रधानमंत्री कौन होगा यह नही है। दोनों ही राष्ट्रीय दलों के घटक दल रोज टाटा बाय बाय कर रहे है । कम से कम दर्ज भर पीएम के उम्मीदवार है इसलिये सारे दल अपने गठबंधन के उसूलों को त्याग कर ज्यादा से ज्यादा सीट हासिलकर ब्रेन गेम के जुगाड में लगे बैठे है ..वैसे चुनाव के परिणाम आने दें बडे दंगल देखने को मिलेंगे।