शाहजहां के आंसू

उस रात शाहजहां देखता रहा अपने ताज को
संगमरमर सी सफेद खड़ी अपनी मुमताज को
दे दिया जिसके लिए मोहब्बत का अपना वर्तमान
आने वाले सैंकड़ों सालों के शानदार इतिहास को
डूबा रहा एक गहरे अफसोस में शाहजहां पूरी रात
दीवारों में चुन कर मुमताज कितनी सफेद हो गई है
धड़कनें बंद हैं उसकी, पत्थर सी जड़ हो गई है
ढूंढने लगा शाहजहां ताज के चारों ओर मुमताज को
जिस तक आने के लिए सरकारें टिकट वसूल रही हैं
सैकड़ों संतरी खड़े हैं बंदूक लेकर,गाइड चिल्लाते हैं
प्रेम की यह इमारत दुनिया में है सबसे बेमिसाल
२२ सालों में गुज़र गईं कितनी सर्दियां, दिन रात,
याद करे दुनिया एक शहंशाह की मोहब्बत बेपनाह
आंसुओं को रोके रहा शाहजहां, पूछता रहा मुमताज से
लाखों लोगों की भीड़, तमाम पोस्टरों तस्वीरों के शोर में
दो पल बिताने को कम पड़ जाता है मुमताज ये ताज
ख्वाब में भी मेरे हर रात, इक इमारत ही चल कर आती है
मुमताज मुमताज पुकारो तो सारी दुनिया ताज पुकारती है
रोते रोते बोल पड़ा शहशांह ताजमहल में उस रात को
निकल भी आओ मुमताज,छोड़ भी दो अब इस ताज को
मोहब्बत की इस बार कोई लंबी कहानी नहीं बनाऊंगा
जी लूंगा तुम्हारा साथ जी भर,कोई इमारत नहीं बनाऊंगा

15 comments:

गिरीन्द्र नाथ झा said...

कभी लगता है कि शाहजहां यहां रूपक हैं..हर एक के अंदर तो शाहजहां हैं न। लोग प्यार की निशानी मानते हैं ताज को और अब मुमताज सफेद हो गई पत्थर हो गई....।
फिर इस शहर की आवोहवा की याद आती है-यहां दो पल बिताने के लिए समय नहीं मिलता है। मन कहता है कि कहूं- मेरे मेहबूब कहीं और मिलाकर मुझसे ।

अनिल कान्त : said...

बेहतरीन

JC said...

Bahut bardhiya koshish Shajahan ke man ko pardhne ki!

Sone ka taj sab Raja ek zamane mein pehente the. Shayad uske bhaar se yaad karne ko jo bhaar janata ka tha unke kandhon, aur sir per...

Congress ne Taj ke saman safed kintu halki khadi ki topi pehenli - bhaar kam ho gaya, apne aap! Utaar di to bhaar raha hi nahin!

Majboor, bete ka ghulam, Shahjahan ke aansoo shayad ab 'swatantra' aur phir bhi 'majboor public' ki hi aankhon mein jhalkte hain election ka drama dekh:(

Jai ho! Kehna hi prdega!
Navratri mein 'Mata' kripa kare!

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

सुन्दर ..जितनी प्रशंसा की जाय कम है,इस तल्ख हकीकत को शब्दों में सजाने वाले को मेरा प्रणाम

niranjan said...

इस फास्ट फॉरवर्ड युग में शाह जहाँ वाली बात तो नहीं हो सकती लेकिन समयाभाव में दिल से ताज को देखा जा सकता है और dristi को सुध रखने के लिए अपनी मुमताज़ का धयान कर कम चलाया जा सकता है

विनीत कुमार said...

अद्भुत,पंत की ताज कविता याद आ गयी

akanksha said...

खूबसूरत. बेहतरीन.

Vidhu said...

shukriyaa ji shaajahan ki takleeph ko samjhaa apne ...kahin kahin khyaalon main betarteebi hai, phir bhi sundar rachnaa...

neelima sukhija arora said...

बहुत सुंदर

himani said...

prem ko sabit karne ki nishani koi nahi hoti ye to bas ek dil se dusre dil tak ki ek kahani hai na koi taj na koi takht bas ek dusre ke ;liye mil jaye thoda vaqt aj yahi pyar ki nishani hai

gangesh kumar said...

in pangtiyon se ye aspast ho raha hai ki shahjahan apne kiye per pachta raha hai....akhir pachtaye bhi kyu na uske tajmahal karang jo phika per raha hai......

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह बहुत ही उम्दा रचना लिख डाली।

gangesh kumar said...

in pangtiyon se ye aspast ho raha hai ki shahjahan apne kiye per pachta raha hai.....aur pachtaye bhi kyu na aaj ka har majnu apni mahbooba ke liye tajmahal se bhi bada imarat bane ki kasme khate hai.....nahi banate hai wo alag baat hai.!!!

creativekona said...

ख्वाब में भी मेरे हर रात, इक इमारत ही चल कर आती है
मुमताज मुमताज पुकारो तो सारी दुनिया ताज पुकारती है
रोते रोते बोल पड़ा शहशांह ताजमहल में उस रात को
निकल भी आओ मुमताज,छोड़ भी दो अब इस ताज को
मोहब्बत की इस बार कोई लंबी कहानी नहीं बनाऊंगा
जी लूंगा तुम्हारा साथ जी भर,कोई इमारत नहीं बनाऊंगा

भाई रवीश जी ,
बहुत शानदार रचना ..बेहतरीन भावों के साथ ...
पढ़ कर आनंद आ गया .
हेमंत कुमार

JC said...

,,,जी लूंगा तुम्हारा साथ जी भर,कोई इमारत नहीं बनाऊंगा..."
Uski uperokta ichchha Aurangzeb ne puri kardi shayad, bani-banayi imaratein tord ker...

'Itihaskar' shayad achchhi tarah se bata sakein kyunki kuchh 'Hindu' bhi badle mein itihas dohrane ki sochte dikhai dete hain kai sau varshon beet jane per bhi, jabki ve 'Hindu' ko 'shanti-priya' batate aaye the...Bharat mata ki 'Jai ho!'