ये पप्पू पास हो गया, आपका क्या होगा जनाबेआली..

( हिंदी न्यूज़ चैनलों के फटीचर काल में कम ही पत्रकार ऐसे हुए हैं जो अपना ढिंढोरा नहीं पीटते। फटीचर होने का न सबसे बेहतर होने का। किसी तरह इस किस्म के लोग न्यूज़ रूम की धक्का मुक्की में बचे रह जाते हैं। याद दिलाने के लिए कि फटीचर काल से ऊब के वक्त इनसे भी काम चलाया जा सकता है। प्रभात शुंगलू IBN-7 में संपादक हैं। अपने बारे में कम हांकते हैं और हर आती जाती चीज़ों पर मुस्कुरा देते हैं। आजकल लिखने लगे हैं तो मान लेना चाहिए कि शांत स्वभाव वाला यह लेखक फिलहाल एक वोटर बन कर अपनी बेचैनियों को सामने रखना चाहता है। श्रेष्ठता की हिंसक दावेदारियां जताने के हमारे पेशे के इस दौर में प्रभात शुंगलू के इस लेख को पढ़िये। यह लेख आज नई दुनिया में भी है।)

आडवाणी जी,
आप नहीं समझेंगे कंधमाल का खौफ। आप नहीं समझेंगे कैथलिक स्कूल में पढ़े सेक्यूलर कल्चर में पले बढ़े नवीन पटनायक का दर्द। हांलाकि आप भी उसी कैथोलिक स्कूल के प्रोडक्ट हैं। फर्क ये है कि आप ग्रैजुएशन करने हेडगेवार और गुरू गोलवाल्कर की यूनिवर्सिटि में चले गये। इसलिये आप गुजरात दंगे में मारे गये सैंकड़ो मुसलमानों का दर्द नहीं समझ पाये। आप समझते तो आप इंडिया शाइनिंग का स्लोगन नहीं देते। वाजपेयी जी ने समझना चाहा मगर फिर हकीकत से मुंह मोड़ लिया। मोदी को छोटी सी फटकार लगायी कि राजधर्म निभाओ। सोचा ये कहने भर से एनडीए की सेक्यूलर इमेज कायम रहेगी। मगर जनता ने वाजपेयी की शाइन गायब कर दी।

आज आप नवीन पटनायक को कोस रहे कि उसने धोखा किया। ग्यारह साल पुराने रिश्ते पर हैंड ब्रेक लगा दिया। लेकिन नवीन ऐसा क्यों नहीं करते। आपने उनकी सेक्यूलर पॉलिटिक्स के लिये सस्पेस ही कब छोड़ी थी। कंधमाल में जो हुया उसके लिये आपकी पार्टी नेताओं ने, संघ परिवार के फेवरिट सन बीएचपी ने उन्हे कितना कोसा। उन्होने बताया कि वहां हिन्दुत्व के ही कायदे कानून चलेंगे। जो उनके टाइप का हिन्दु है वही रहेगा। वही काम जो आपके येदुरप्पा अब कर्नाटक में कर रहे। अपने कनिष्ट भ्राता मुथालिक के सर पर हाथ रख कर।

आप क्यों नहीं समझ पा रहे इंडिया की असलियत। इंडिया का सेक्यूलर इतिहास। उसकी सर्वधर्म सम्भाव की विलक्षण क्षमता। उसकी पहचान। आप फिरकापरस्त ताकतों को मोबालाइज करके 2 से 180 तो पहुंच सकते हैं पर इससे आगे बढ़ना टेढ़ी खीर है। क्योंकि ये देश किसी भी तरह के एक्सट्रीमीज्म को नकारता आया है। इस देश नें सनातन हिंदुत्व को भी जगह दी। मगर बुद्ध का मिडिल पाथ जब निर्वाण की नई ऊर्जा ले कर आया तो उसे गले से लगा लिया। इस देश ने औंरगजेब को सहा मगर मोहम्मद जलालउद्दीन को अकबर की उपाधि से नवाजा। डकैत गज़नी को धिक्कारा, आलिम दारा को पुचकारा। जिन्नाह को तड़ी पार किया। नेहरू को आशीर्वाद दिया। आरएसएस और मुस्लिम लीगी पॉलिटिक्स को टिकने नहीं दिया। नक्सलिज्म को पसरने नहीं दिया। और यही भारत दैट इज इंडिया आतंकवाद से भी लड़ रहा। मगर भारत ने किसी तरह की चरमपंथी, डिस्ट्र्क्टिस सोच को न कभी सींचा और न ही उसे फलने फूलने दिया।

अगर इंडिया ने आप सरीखी पॉलिटिक्स को स्पेस दी भी जैसा कि 1998 में हुया तो वो भी शर्तों के साथ कि मजहबी उन्माद नहीं फैलाओगे। लेकिन आपकी पेरन्ट बॉडी के टिड्डी दल ये कहां मानने वाले थे। वो तो गुजरात में एन्टी हिन्दु चांदमारी बना रहे थे। और 28 फरवरी 2002 को उन्होने इस चांदमारी का फौरी तौर पर उदघाटन भी कर दिया। बस तभी आप को समझ जाना था कि अब लुटिया डूबी। क्योंकि पब्लिक आपका हिडेन एजेंडा समझ चुकी थी। लेकिन आप तो सत्ता के खुमार में ऐसे औंधे पड़े थे कि बुरे वक्त की आहट नहीं सुन पाये।

नवीन ने एक गलती की। जैसी गलती इंडिया ने 1998 में की। नवीन ने आप पर भरोसा किया। आरएसएस के टिड्डी दल ने सोचा कैथोलिक स्कूल का पढ़ा, अंग्रेजी बोलने वाला, पेज थ्री और फैशन के गलियारों में घूमने वाला पप्पू ( नवीन की फैमिली में उन्हे इसी नाम से पुकारा जाता है ) गाड़ी चलायेगा। आप बैकसीट ड्राइविंग करेंगे। बुद्ध के सबसे बड़े शिष्य की धरती पर बजरंगी हिंदुत्व की ब्रांच खोलेंगे। इसके लिये आपके परिवार के टिड्डी दलों ने दारा सिंह जैसे लुम्पेन को हिंदुत्व की दीक्षा दी। और उसकी पोस्टिंग मयूरभंज की। वहां जाकर उसने मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उसके बेटे को जिंदा जलाकर आपके टिडड़ी दलों के फलसफे का परचम लहराया। आपने फिर वही खेल कंधमाल में रिपीट करना चाहा। मगर नवीन अब जवान हो चुका था। आपकी पॉलिटिक्स के आशियाने तले उसका दम घुट रहा था। वो इससे बाहर निकलने के लिये फड़फड़ा रहा था। अकेले कुछ करने के लिये दिल कुलांचे मार रहा था। बड़े भाई, मां-बाप के साये से दूर अपनी पहचान बनाने के लिये मचल रहा था। और फिर उसने दिल की सुनी और आपको छोड़ गया। बैरम खां बन कर आपने इतने सालों अपनी खूब मनमानी की। अब नवीन ने कहा टाटा। तुम भी हज जाने की तैयारी करो।


देखिये, उड़ीसा की कहानी से कहीं बिहार न इंस्पायर हो जाये। वो भी आपका पुराना साथी है। मगर यंग है। वो भी आपके साथ दस सालों से कदमताल कर रहा। कैथोलिक स्कूल में नहीं पढ़ा। प्योर देसी स्कूल में पढ़ा। वहीं जहां आपके कई नेता पढ़े हैं। मगर वो इन्क्लूसिव पॉलिटिक्स पर जोर दे रहा। बिहार को टर्नअराउंड का सपना बुन रहा। आपकी सुन जरूर रहा मगर अपने मन की कर रहा। देख लीजिये कहीं बिहार में भी बीजेडी के उड़ीसा के बीज तो नहीं बोये जा रहे।

आपको लगता है वक्त आपकी तकदीर पर एक बार दस्तक दे रहा। खुश रहने को ये ख्याल अच्छा है ग़ालिब। इंडिया बदल रहा। जिन्नाह को सेक्यूलर कहने भर से इंडिया आपको सेक्यूलर मान लेगा ये दूर की कौड़ी लगती है। अयोध्या में मंदिर गिरा कर संसद में घडि़याली आंसू बहाने से वोटर नहीं पिघलेगा। फेसबुक पर प्रोफाइल डालने से यंग इंडिया आपको समझेगा ये विशफुल थिंकिंग से ज्यादा कुछ नहीं। जो साथ थे, वो पास नहीं। जो साथ हैं वो साथ छोड़ने का मौका तलाश रहे। वो कहते हैं न यू कैन नॉट फूल ऑल द पीपिल ऑल द टाइम।

मुशर्रफ की तरह ये मत कहियेगा पीछे की बातें भूल जाओ। आगे की देखो। हिस्ट्री को भूलने का पाप इस देश ने जब जब किया उसे पछताना पड़ा। मुशर्रफ का झूठ पकड़ा जा चुका है। वैसे भी नया इतिहास रचने का मौका देश ने एक नहीं दो दो बार आपकी पार्टी को भी दिया। मगर गोधरा, बेस्ट बेकरी, नरोडा पाटिया, गुलबर्गा सोसाइटी में दंगो को अंजाम देकर आपके मोदीजी ने फिर देश को स्टोन एज की दहलीज पर खड़ा कर दिया। वो पप्पू तो पास हो गया मगर आप भारत दैट इज़ इंडिया को कैसे समझायेंगे कि आप ही देश के सर्वश्रेष्ठ मंत्रीपद पद के उपयुक्त दावेदार हैं। आप ही क्यों मोदी जी भी 2014 का ख्वाब देख रहे। पहले 16 मई को अपना रिपोर्ट कार्ड तो देख लीजिये।

एक भारतीय वोटर

12 comments:

इरशाद अली said...

राजीनित विशलेषण इसे कहते है, जिसमें फटकार भी हो, सच भी। प्रभात जी से कहो अपना ब्लाग शूरू करें। रही बात आडवाणी की तो उनकी सिर्फ ये ही एक अंतिम इच्छा है कि किसी भी कीमत पर, याद रखें किसी भी कीमत पर पर वह अपने स्वर्णिम सपने को पूरा करने चाहते है। ताकी आने वाली नस्लें कहे आडवानी जी भी प्रधानमंत्री रह चुके है। इसके लिए उन्हें भले ही लाशों के ढेर से ही क्यों ना गुजरना पड़ें। लोग अब ये समझ रहें है कि उनकी प्राथमिकता कोई मन्दिर-मस्जिद नही बल्कि प्रधानमत्रीं की कुर्सी तक पहुंचना है। बराहहाल प्रभात जी व्याकरण से चुस्त-दुरस्त दिखते है, अच्छें प्राससिंग तथ्य पेश करते है। उनको हिन्दी ब्लाग जरूर बनाना चाहिए।

Ek ziddi dhun said...

दिलचस्प है। पर नवीनों औरआडवाणियों में अब फर्क कम हो गया है। दुर्भाग्य यह है कि सेक्युलरिज्म अब चिंता का सबब नहीं है, पर्टियों केलिए।

Arvind Mishra said...

वाह एक खबरी की यह खबर्दारिया पोस्ट लोगों की घिघी बंद करने की ताकत रखती है -बढियां रवीश जी !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

खूब लिखा है।

विनीत कुमार said...

इतिहास के निशान इतने गहरे होते हैं कि वो कई बार हमारे वश की बात नहीं होती कि हम भूल जाएं। अडवाणी और उनके गुर्गों ने जो कुछ भी किया है,उनके लिए शायद ऐसा करना आसान हो,इसके वो अभ्यस्त हो चले हैं लेकिन जरा उनसे जाकर पूछिए जिन्हें भूलने की सलाह देते आए हैं।
पता नहीं क्यों, कोई भी जब गुजरात और बिहार को आमने-सामने रखकर देखता है तो मुझे नहीं लगता कि वो स्थिति बिहार में कभी आएगी। साधनों के मामले में बिहार गुजरात से बहुत कमतर हो लेकिन लोगों को एक-दूसरे को बर्दाश्त करने की क्षमता कहीं ज्यादा है। इसे भाईचारा न भी कहें तो समाज का समीकरण ही ऐसा है कि बीएचपी और संघ का पुड़िया आसानी से घुल नहीं पाता।

कुलवंत हैप्पी said...

रवीश कुमार को धन्यवाद, जिन्होंने ऐसे लेख से हम को अवगत करवाया..असली हकीकत बनाम ये लेख है..

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

वाह बहुत खूब है आपके विचार. धन्यवाद.

निखिल आनन्द गिरि said...

प्रभात जी की इ-मेल आईडी दें कि उनसे सीधा संपर्क हो सके....
निखिल आनंद गिरि

Pramod Singh said...

ओह, अडवाणियों के इश्‍क में. चलते रहे, गलते रहे?

रवीन्द्र प्रभात said...

बहुत सुन्दर और सारगर्भित विचारों को राजनीति के सन्दर्भ में परोसा है रबीश जी ने , बधाईयाँ !

SM said...

JOURNLIST HONE KA YE MATLAB NAHI KI JO MAN MEIN AYE LIKH DIJEY.LAGTA HAI KI PRABHAT JI NYE KISM KE ATANKWAD KA ANUBHAV NAHI KIYA HAI,YE MAHSOOS KARNA HAI, TO VARANASI KE MADANPURA, MEERUT KE HAPUR ROAD PE AYEE,APKO PATA CHAL JAYEGA KI POLITICS KYA HOTO HAI,SIRF APNE PICHE LATTH LEKER GHUMNE SE KUCH NAHI HOTA,CHURCH AUR MADRASO MEIN BHI GHUMIYA,ADWANI JI LALU,MANMOHAN AUR MAYAWATI SE ACHHE HI HAIN,RAHI BAT MODI KI,USE AP JASO NAMARDO KA VOTE NAHI CHAYIE,NAYI PEETHI APNE AP USE JITYAGI,

आदर्श राठौर said...

राजनीति का तो मामला ही अलग हो गया है। राजनीति देश चलाने के लिए होने वाली प्रक्रिया है लेकिन लगता है कि देश ही राजनीति के लिए चल रहा है या चलाया जा रहा है