अख्तरुल-ईमान की एक नज़्म

अख्तरुल-ईमान की ग़ज़लों का कोई सानी नहीं । हमारे पूर्व सहयोगी और मौजूदा मित्र देवेश जब उनकी रचना सुनाते थे तो रग़ों में रवानी आ जाती थी । एक लड़का- अख्तरुल-ईमान की चर्चित रचना है । कस्बागत जगत के लिए पेश किया जा रहा है । भारी भरकम शब्दों के मायने नीचे दिए गए हैं ।

एक लड़का

दियारे-शर्क की आबादियों के ऊंचे टीलों पर
कभी आमों के बाग़ों में, कभी खेतों की मेंड़ों पर
कभी झीलों के पानी में, कभी बस्ती की गलियों में
कभी कुछ नीम-उरियां कमसिनों की रंगरेलियों में
सहर-दम, झुटपुटे के वक्त, रातों के अंधेरे में
कभी मेलों में, नाटक-टोलियों में, उनके डेरे में
तआक्कुब में कभी गुम, तितलियों के, सूनी राहों में
कभी नन्हें परिन्दों की निहुफ्ता ख़ाबगाहों में
बरहना-पांव, जलती रेत, यख़बस्ता हवाओं में
गुरेज़ां बस्तियों से, मदरसों से, ख़ानकाहों में
कभी हमसिन हसीनों में बहुत खुशकामो-दिलरफ्‍ता
कभी पेचां-बगूला-सां, कभी जूं चश्मे-खूं-बस्ता
हवा में तैरता, ख़ाबों में बादल की तरह उड़ता
परिंदों की तरह शाखों में छिपकर झूलता, मुड़ता
मुझे इक लड़का, आवारा-मनश, आज़ाद, सैलानी
मुझे इक लड़का, जैसे तुंद चश्मों का रवां पानी
नज़र आता है, यूं लगता है, जैसे यह बला-ए-जां
मेरा हमज़ाद है, हर गाम पर, हर मोड़ पर जौलां
इसे हमराह पाता हूं, ये साये की तरह मेरा
तआक्कुब कर रहा है, जैसे मैं मफ़रूर मुलज़िम हूं
ये मुझसे पूछता है , अख़्तरुल- ईमान तुम ही हो ?

दियारे-शर्क – पूरब देश । नीम-उरियां कमसिन- अर्धनग्न बच्चे । सहर-दम- सुबह के समय । तआक्कुब-पीछा । निहुफ्ता खाबगाहों में- गुप्त शयनगारों में । बरहना-पांव- नंगे पांव । यख़बस्ता- बर्फीली । गुरेज़ां- भागा हुआ । पेचां-बगुला-सां-घूमता हुआ चक्रवात । चश्मे-ख़ूं-बस्ता- आंखों में ख़ून के आंसू लिये हुए । तुंद-तेज़ । हमज़ाद-साथी । जौलां- दौड़ता हुआ । मफ़रूर- भागा हुआ ।

2 comments:

Raman Kaul said...

बहुत ख़ूबसूरत नज़्म है। पर यह ग़ज़ल नहीं है। शीर्षक में ठीक कर लें। धन्यवाद।

Pratyaksha said...

वाह ! मज़ा आ गया ।बेहद खूबसूरत !