काम न होने का मानसिक तनाव- भाग दो

दोस्तों । काम न होने का मानसिक तनाव पर कई लोगों ने अपनी राय भेजी हैं । सबकी सलाह से एक सामाजिक दस्तावेज़ बन रहा है । काम न कर पाने के मानसिक तनाव से प्रेरित होकर प्रमोद सिंह अप्रगतिशील साहित्य आंदोलन चलाने जा रहे हैं । चलाएं । बहुत प्रगति हो ली दुनिया में । कुछ अप्रगति भी हो । इससे कई लोगों को काम मिल सकता है । अभय तिवारी तो कभी खाली रहे ही नहीं इसलिए उनके पास इस मसले पर कोई सलाह नहीं है । अविनाश मुझे संत बनाना चाहते हैं ताकि मैं नौकरी छोड़ कर ईश्वर की खोज में भीख मांगने लगूं । गिरिजेश ने ठीक पकड़ा है । आस पास की ज़मीन गीली है तभी तो बात निकली है । जितेंद्र जी ने काम न होने की स्थिति में मीटिंग करने की सलाह दी है और इशारा किया है कि खाली वक्त में रसूख का इस्तमाल कर ब्लाग का प्रचार करें । ये इशारा मैं समझ गया । पर किसी रसूख का इस्तामाल नहीं हुआ था कि कस्बा और मोहल्ला के ज़िक्र में । अपने चैनल में हर शनिवार नारद की चर्चा करता हूं और दो ब्लाग की अलग से । उसमें कस्बा मोहल्ला नहीं होता । अभी तक बारह अलग अलग ब्लाग की चर्चा टीवी पर हो चुकी है । आगे होती रहेगी । पर मीटिंग प्रधान देश वाली बात कामचोरों की घोषणापत्र में पहले तीन में रखी जाएगी । ये एक बेहतर आइडिया है । मीटिंग कर काम न होने के तनाव को दूसरे पर टाला जा सकता है जो काम करते हैं । अनिल इतना व्यस्त रहते हैं कि सांस लेने की फुर्सत नहीं । कहीं दफ्तर में सबसे ज़्यादा सताए तो नहीं जा रहे । पर कस्बा में जाने के वक्त को वो काम की तरह देखते हैं । वाह वाह । ओम, लगता है काम न होने की स्थिति में ज़्यादा बहादुर हो जाते हैं । तनाव की जगह दबाव बनाने लगते हैं कि भई दफ्तर में हमेशा काम हो यह मुमकिन नहीं । मज़ा आया इस आइडिया पर । काम न होने की स्थिति का बहादुरी से सामना करने का सकारात्मक संदेश पढ़ कर । राजेश रौशन ने नब्ज़ पकड़ी है कि कोई इंसान खाली नहीं रह सकता । अगर खाली है तो उसे उसकी मदद करनी चाहिए जो काम के बोझ से दबा हुआ है । यह बेहतर सुझाव है । इससे दूसरों से सीखने का मौका मिल जाएगा और काम भी । बशर्ते काम के बोझ से दबा हुआ व्यक्ति किसी बेकार को अपने साथ काम करने दे । कई बार सारा क्रेडिट लेने के चक्कर में लोग किसी को शामिल ही नहीं करते । ब्लाग इलेक्ट्रानिक मीडिया का जवाब भी काबिले तारीफ है । इनका कहना है कि खाली है इसका मतलब आप अपनी भूमिका तक सीमित हैं । ऐसी स्थिति में लोगों को अपनी भूमिका से बाहर सोचने की कोशिश करनी चाहिए । इलेक्ट्रानिक मीडिया ने यह भी कहा है कि टीवी में दिखने और तारीफ की बीमारी लग जाती है । हर वक्त लगता है कि चर्चा में रहें । यह बात ठीक है मगर कोई ईमानदारी से कबूल नहीं करेगा । एक सुझाव और है कि दफ्तरों में खाली वक्त व्यतीत करने की व्यवस्था होनी चाहिए । कोई जगह होनी चाहिए जहां खाली वक्त का इस्तमाल हो सके । मगर ख़तरा है। वो यह कि किसी नियत जगह पर खाली वक्त में बैठने पर निठल्लों की जमात जैसे दाग आपके दामन पर लग सकते हैं । हो सकता है कि ऐसी जगह बन जाए और आप खाली होने के बाद भी लोक लाज के भय से वहां न जाएं । तब वह जगह खाली ही रह जाएगी जो खाली वक्त में भरने के लिए बनाई जाएगी । वी की अपनी दलीलें हैं । कहते हैं खाली वक्त में एक और खाली बैठे व्यक्ति की तलाश करें और चर्चा करते हुए चमचों के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास करें । फिर घर चले जाएं । सागर चंद नाहर जी मेरी ही बात से जवाब निकाल लेते हैं । लिखते हैं यार इतना टेंशन मत लो । ज़िंदगी काम से बड़ी नहीं । उसकी कीमत है । दफ्तर तो बदल जाएगा । जिंदगी नहीं मिलेगी ।

ये आलेख मेरे काम न होने का मानसिक तनाव के पहले खंड पर आई प्रतिक्रियाओं से तैयार हुआ है । मगर अभी भी कई सुझावों की संभावना है । मैं सोच रहा हूं कि इस मानसिक तनाव पर एक घोषणापत्र तैयार हो जो प्रामाणिक हो । यह तभी होगा जब और सुझाव आएंगे । जो पहले भेज चुके हैं वो दुबारा भी भेज सकते हैं । कई बार अच्छा आइडिया बाद में आता है ।

6 comments:

तिर्यक विचारक said...

रवीश भाई,
आप एक भले आदमी लगते हैं...आपको दो सुझाव दूंगा...एक गंभीर सैद्धांतिक और दूसरा व्‍यावहारिक...शायद व्‍यावहारिक वाला ज्‍यादा गंभीर बन जाए।

पहला, आपके सवालों का जवाब ढूंढती एक बड़ी अच्‍छी किताब मार्केट में आई है...The Making of a cybertariat: Virtual Work in a Real World यानी 'एक साइबर सर्वहारा की निर्मिति- वास्‍तविक दुनिया में अवास्‍तविक काम'। ज़रूर पढ़ लें।

यदि पढ़ने की आदत या मूड न हो तो एक काम करें...ज़रा सा साहस करें...एक बार को सारे लोन, ईएमआई और क्रेडिट कार्ड भूल कर ईमानदारी से नौकरी से मुक्‍त हो जाएं...वैसे भी आपको पहचान का संकट नहीं...कुछ दिन लिखें-पढ़ें, घूमें, प्रिंट में फ्रीलांसिंग करें, अपने सिर के ऊपर कितना पानी अब भी है इसे नापें, डीटीसी या ब्‍लूलाइन से चलें यदि नहीं चलते हों तो, बिजली का बिल जमा कराने जाएं और लाइन में एक घंटा लगें, एकाध किताब लिखें, जनरल बोगी से चलें...देखिएगा कि आपको कुछ राहत मिलेगी। आपकी दिक्‍कत खाई-पीई-अघाई दिक्‍कत है...लौट कर आएंगे तो नौकरी मिल ही जाएगी।

अबकी बार गुस्‍सा आए तो राय साब को इस्‍तीफा दे दीजिएगा...कितना दबेंगे आखिर ईएमआई व्‍यवस्‍था के नीचे।

आपका शुभचिंतक

avinash said...

भाई रवीश, आपने सही लय पकड़ी है। तिर्यक विचारक की बात का बुरा मत मानिएगा। ये ऐसे लोगों में हैं, जो पार्श्‍व से दर्शकों को टॉर्च दिखाना चाहते हैं। खाली बैठे-बैठे ये अंधेरे के आदी हो चुके हैं। और जब देखा कि खालीपन की सही व्‍याख्‍या आप कर रहे हैं, तो बौखला गये हैं। हे प्रभो आनंददाता, ज्ञान इनको दीजिए।

अनूप शुक्ला said...

भाई हम तो यही कहेंगे कि जब डर लगे तो गाना गा की तर्ज पर जब काम न हो तो आयोडेक्स मलिये फिर से काम पर चलिये जैसा कि राजू श्रीवास्तव ने अपने के शो में बताया! वैसे कुछ लोगों के जब तनाव नहीं होता तो वे तनाव में आ जाते हैं।

पाणिनी आनंद said...

ravish bhai, aap kaamgaaro ki tarah hi soch rahe hai par kaam keval gati se hi nahi hota...is duniya mein chintan sabse badaa kaam bataayaa gayaa hai. montek ahluwalia...vajpayee...lalkrishna...ahmed patel.. eise kitne hi loog hei jo sochte hein aur chintan ke dum per hi tike malum dete hein.

sochna aur kaam karna.. inke paraspar sambandh ki vyakhya pratap narayan mishra ke 'baat' nibandh ki tarah ho skti hai.

isliye kaam na ho to chintan karein. chintan tufaan se pahle ka sannataa bhi hota hai.

Anil Dubey said...

Ravish Bhaiya lag raha hai jab se aap punjab se ghum kar aaye hain sivaye blogging ke koi kam nahi hai.aisa kyoun hai main nahi janta hun.lekin ye sochkar dukh hota hai ki aap jaise logon ko koi kaam nahi.khair, yadi tiryak vicharak ke baton mein thoda bhi dam hai to aap unki salah maan lijiye.kyon dukhi kar rahe hain apne man ko.waise khali samay ka sabse achha upyog ye ho sakta hai ki aap kitab likhne ka prayas karen.aur waise bhi dainik kaljai rachnaon ka nirman to kar hi rahe hain.

V said...

ravish bhai ab aap UP ja hi rahe hain to khali hone ka koi matlab nahin reh jata, Aur ummeed hi nahin pura yakin hai ki UP ki woh tasveer dikhayenge jise dekh angrezidan type ke patrakar bhi samjhenge ki asli reporting kya hoti hai. Raha sawal ghosnapatra ka to UP se lautkar usko tayyar to karna hi padega.