ईमानदार लोगों के नाम एक ख़त

भई आप लोग किस मिट्टी के बने हैं । इस देश में जहां सब लूट रहे हैं । आप बैठे हैं । क्यों पैसा अच्छा नहीं लगता । क्या नौकरी से पहले आप संतों के यहां काम करते थे । अब तो संत भी कमा रहे हैं । आप कब कमायेंगे । ईमानदार कैसे हो जाते हैं लोग । आप कुछ भी नहीं लेते । ये बड़ा ग़ज़ब है ।
दुनिया में एक से एक दाता मगर ईमानदार हैं कि लेंगे नहीं । आप लोग आय के बराबर या उससे कम की संपत्ति में रहते कैसे हैं ? ज़िंदगी भर पैदल ही चलेंगे । गाड़ी खरीदने का मन ही नहीं करता क्या । ईमानदार ।

मुझ घूसदाता को लगता है कि हर कोई बादाम के साथ घूस खा सकता है । घूस नहीं तो कमीशन ले सकता है । कमीशन नहीं तो कट ले सकता है । इतने सारे उपनाम हैं लेने के मगर मना करने के एक ही क्यो ? ईमानदार । घूसदाता को लगता है कि गांधी पैदा कर गए हैं ईमानदारों को इस देश में । तभी देश फटीचर हालत में है । अगर सभी रिश्वत लें तो गरीबी कितनी जल्दी दूर हो जाएगी । मुझे लगता है गरीब भी साला ईमानदार होगा । तभी वो ग़रीब ही रहता है । एक ईमानदार की घटती क्रयशक्ति से अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान होता होगा । कंपनी उत्पादों का माल ही नहीं बिकता होगा । अगर किसी देश में सब ईमानदार हो जाए तो मेरा दावा है कि स्टाक मार्केट क्रैश हो जाएगा । कंपनियां घाटे में चली जाएंगी । देश का नुकसान होगा । मेरे अटके पड़े काम का तो होता ही है । बढ़ते ईमानदारों से कहीं बेरोज़गारी तो नहीं बढ़ जाएगी ।

सिन्हा साहब अपनी बहत्तर मोडल अंबेसडर में दफ्तर आते थे । उनकी गाड़ी पर लाल बत्ती टिमटिमाती रहती थी । पैंट और शर्ट उदारीकरण के पहले के थे । चश्मा स्वदेशी मूवमेंट का बना था । मैं रिश्वत के पैसे देने के लिए तरकीबें निकालता रहता हूं । मगर करीब जाते जाते रुक जाता हूं । क्या आदमी है पास भी आने नहीं देता । सिन्हा साहब ऐसे लोगों से दूर रहते थे । आधी ताकत इसी में खर्च होती थी रिश्वत देने वाले कर्णों को भगायें कैसे । वो ईमानदार ही दफन होना चाहते थे । सिन्हा साहब का एक और नाम था । तबादला सिन्हा ।

तभी भारत में इतने कम ईमानदार हैं । वो सिर्फ रिटायर होते हैं । टैक्स भरते हैं । बिजली के बिल चुकाते हैं । और मर जाते हैं । अपने पीछे विशाल संपत्ति की विरासत भी नहीं छोड़ जाते । परचून की दुकान से सामान लेते हैं । उधार पर बेटी की शादी करते हैं । सेल में स्वेटर खरीदते हैं । ईमानदारों के आर्थिक आचरणों और प्रबंधनों का अध्ययन होना चाहिए । उनका डीएनए होना चाहिए । ताकि पता चले कि कैसे वो लक्ष्मी को ठुकरा देते हैं । लक्ष्मी कोड है घूस के पैसे का । माफ कीजिएगा । आस्था को ठेस नहीं पहुंचा रहा हूं । काम करवाने के तरीकों में अपनी आस्था ज़ाहिर कर रहा हूं । कहीं ऐसा तो नहीं कि ईमानदारों को ईश्वर से डर लगता है । डरपोक होते होंगे । क्या पता ईमान से जो डर जाए वही तो ईमानदार होता होगा ।

मैं एक सम्मानित घूसदाता हूं । ईमानदार के मानस को समझना चाहता हूं । क्या इंफ्लेशन ईमानदारों को टच नहीं करता ? क्या उनके बच्चे मुफ्त में पढ़ते हैं ? क्या उनकी बेटियों की शादी में खर्चा नहीं होता ? कहीं ईमानदार होना व्यक्तिगत फैसला तो नहीं । तभी तो सभी ईमानदार नहीं होते हैं । क्यों ईमानदारों को अलग लाइन का कहा जाता है ? क्यों ईमानदारों को पागल कहा जाता है ?

भारत देश में ईमानदार कम हैं । इसीलिए ब्लाग पर लिख रहा हूं । कोई ईमानदार समझाये तो वो क्यों नहीं पैसे लेता है । उसकी बातें सामने आनी चाहिए । इससे प्रेरणा मिलेगी । हम आश्वासन देते हैं कि हम किसी और घूसदाता को यह बात नहीं बतायेंगे । किसी ईमानदार को मूर्ख नहीं कहा जाएगा । सिर्फ उसके मानस को समझा जाएगा ।

ईमानदारों के जवाब का इंतज़ार रहेगा । सिर्फ ईमानदार ही जवाब दें ।

9 comments:

OM said...

मैं ये कमेंट करने में थोड़ा धीरज भी रख सकता था। लेकिन ईमानदारी से आपको आगाह कर दूं कि आपके इस ब्लॉग को लोग पढ़ेंगे तो चटखारे लेकर। आस-पास के लोगों को भी पढ़ाएंगे। लेकिन इंतज़ार मुझे भी रहेगा आपके आमंत्रण पर आने वाले किसी ईमानदार का। बात बची मेरी... तो मेरी हैसियत ही बेईमानी करने की नहीं है।

शुक्रिया

Abhishek said...

अच्छा लिखा है रवीश भाई । ख़ास तौर पे ये लाइन तो बहुत एफ़ेक्टिव लगी मुझे... "सिन्हा साहब का एक और नाम था । तबादला सिन्हा ।" ...

सही स्थिति बयान की है आपने ।

अनूप शुक्ला said...

ईमानदारों की ईमानदारी भी एक लत की तरह होती है। लग जाती है तो फिर छूटती नहीं!

Sunil Deepak said...

गाँधी पुरस्कार मिले ईमानदार डाक्टर साहब को बच्चे उनके कहते थे कि बेवकूफ थे, इतनी अच्छी पोस्ट थी पर न खुद अपने लिए कुछ किया न बच्चों को कुछ दिया. और बूढ़े डाक्टर साहब घुट घुट कर, तड़प तड़प कर मरे, बड़े अफसर बने बेटे मिलने ही नहीं आते थे. आप के लेख ने कड़वीं यादों को ताजा कर दिया.

अभय तिवारी said...

भई, तंज़ का ये रंग जो आपने पकड़ा है वो सपाट बयानी से कहीं कारगर है और रंजक भी.. पकड़े रहिये..

indiaroad said...

बाकी लोगों को सांस-वांस लेने देंगे कि नहीं? कि पब्लिक सब काम-धाम छोड कस्बियाती ही रहे?

Shrish said...

बहुत खूब जी, सचमुच ईमानदार होना आजकल बेवकूफ समझा जाता है। लेकिन जैसा अनूप जी ने कहा ये भी एक किस्म की लत है।

littichokha said...

एक अरब की आबादी और कमेंट सिर आठ! वैसे इन आठ को लेकर भी मुगालते में मत रहियेगा... ये भी आप ही तरह रिसर्चर है. दावा करने की जगह आप ही से पूछता हूं... बचे भी हैं क्या ईमानदार नस्ल के इंसान? अगर होंगे भी तो इस खतरनाक जीव को खुला नहीं छोड़ा जा सकता समाज में... अगर एक आध बचे भी होंगे तो शर्तिया चिड़ियाघर में ही मिलेंगे. - शशि शिंह

priyankar said...

वे हैं और इसी दुनिया में हैं . लड़ते हुए,जूझते हुए,घाव खाते हुए . किसी ग्रीक हीरो की तरह नष्ट होते हुए. पर वे पराजित नहीं हैं .वे पराजित हो नहीं सकते .

वे जब पलट कर एक नज़र देख भर लेते हैं तो रिश्वत देने वाले सामने नहीं पड़ना चाहते, पर ज़मीन है कि फटती नहीं और सामना हो ही जाता है . सामना होते ही वे दलाल नज़रें चुराते हैं और दाएं-बाएं देखने का बहाना करते हैं. जल्दी से जल्दी पतली गली पकड़ना चाहते हैं.

रिश्वतखोरों की घिघ्घी बंध जाती है उनके समक्ष. अपने महलनुमा घरों में बैठ कर भी रिश्वतखोर अपने को उस ईमानदार की आभा के सामने स्याह और पराजित पाता है.

बिना किसी नेटवर्किंग के ईमानदार के सब काम होते हैं भले ही थोड़ी देरी से,थोड़ी परेशानी के बाद. ईमानदार जानता है अपनी ईमानदारी के संकट.वह उन्हें जानकर ही और जानकर भी ईमानदारी की राह पर बढा है.ईमानदारी उसकी मजबूरी नहीं स्वैच्छिक चुनाव है.

इस व्याभिचारी समय में अगर वह असफ़ल भी दिखाई दे तो दुःख के ऐसे कोई कारण नहीं दिखाई देते . क्योंकि उसका होना ही हमारा हौसला है. उसके होने से ही यह आकाश नीला है और यह गुलाब लाल. उसके होने से ही यह पृथ्वी रसवती है और सूर्य ऊष्मावान . उसका होना ही जीवन की कविता का बचा होना है.