मोहाली के मैच के दिन मेरे दिमाग़ में एक प्रेम कथा भुकभुकाने लगी। फेसबुक स्टेटस में वर्ण कैरेक्टर की सीमा में लिखी गई इस कथा को क्रमवार पढ़े। रैव्स और रिया डिसूज़ा की प्रेम कथा।
(1)
पटना के भिखना पहाड़ी के एटीसी ने सीटी बजा दी। पैड और हेल्मेट से लैस मैं फाइटर प्लेन लेकर मोहाली के आकाश में।नीली जर्सी में रिया डिसूज़ा थिंकिंग मुद्रा में-यू नो रैव्स..डिंट नो नैशनलिझम कैन बी सो फनी।तभी फाइटर प्लेन एफएम पकड़ लेता है। बलैती पी गए देसी अभी बाकी है।डैडी है नाराज़ पार्टी...खुश हो ले तू तो..बारूद अभी बाकी है। रैव्स और रिया नीचे न्यूज़ चैनलों के सेट को देखते हैं। मुर्गा छाप बम का कोई भरोसा नहीं। धड़ाम।
(2)
मैं मैड हूं या कंट्री मैड है। रिया यू कांट ब्लेम मी ओनली। बीच हवा में नीली जर्सी वाली रिया का मूड बादलों सा छंट गया। मैं मोहाली के हाई फ्लोर से मैच देखने के लिए ईगर था। रिया डिसूज़ा अचानक हॉकी,कबड्डी को लेकर डिप्रैस हो गई। आय नो रिया। वी हैव प्रॉब्लम। बट यू नो जर्नलिस्ट भी तो नैसनलिस्ट है। कांट आई बी। दिस इझ महायुद्ध। वी आर सेफ हीयर। नो नो..गेट मी डाउन रैव्स। डोंट ड्राइव मी मैड।
(3)
तभी भिखना पहाड़ी एटीसी से कॉल...रैव्स चाची का फोन।ऐ गुड्डू तू दिशासूल में काहे उड़ा रहे हो। पच्छिम के जत्रा नईखे। मोहाली ओनही नू बा।चाची शट अप। रिया भोजुपरी सुन कर एंग्री हो जाती है।सी हेट काउ बेल्ट लैंग्वेज।चाची बाद में...। यू नो रिया माय विलेज कनेक्शन इझ लाइक इंडियन हिस्ट्री। लेट्स गो टू द होटल भेयर पीएम ही स्टेयिंग....रिया चिल न। यू सूड रेस्पेक्ट भोजपुरी। वी आर नॉट गेंजेटिक बार्बेरियन्स। आय एम अ झर्नलिस्ट।
(4)
रिया गुस्से में शकीरा को रिंग करती है।शकीरा दिझ इंडियन्स कांट प्रोनाउन्स योर सांग। वाका वाका इझ वाघा-वाघा। डोंट टेल में रिया। हू आर यू विद। सेम..गेंजेटिक प्लेन वाला। ओ..रैव्स। माय गॉड। आय टोल्ड यू न। दिस मैन इझ क्रिकेट क्रेज़ी। हाउ कैन ही फ्लाई अ फाइटर प्लेन। यू नो शकीरा ही इझ नंबर वन जुगाड़ू। गॉट अ लाइसेन्स फ्राम राजस्थान फ्लाइंग क्लब। फेक है। झर्नलिस्ट है साला। मैनेज कर लेता है। शट अप रिया। यू लभ हिम।
(5)
और रैव्स को मोहाली ब्लूज़ होने लगा। उदासी के पल में उसका फाइटर प्लेन भी गड़गड़ाने लगा। रिया समझ गई। बोली चलो रैव्स भिखना पहाड़ी पर उतरते हैं. वहीं रिमझिम होटल में अंजुम जी के साथ पेट सिस्टम में खा लेंगे। नो रिया। कांट गो बैक। लेट्स गो टू खोड़ा खुर्द एट गाज़ीपुर बोर्डर। एटीसी को बोलता हूं। तुम जर्नलिस्ट लोग अपने ही ट्रैप में फंस गए। है न रैव्स। या...आय थॉट इट विल बी अ महायुद्ध। बट ये तो महाफुस्स निकला। चिल रैव्स।
(6)
पोस्ट स्क्रीप्ट बाय शेक्सपीयर- और रैव्स एक कमजो़र इंसान निकला....बल्लेबाज़ों के ख़राब प्रदर्शन के बाद ही मोहाली से भाग निकला। जर्नलिस्ट होते ही ऐसे हैं। विजेता का पीछा करने वाले। रिया एक समझदार लड़की थी। वो अब भोजपुरी बोलने लगी। एक गांव में सेल्फ हेल्प ग्रुप के साथ काम करने लगी। रैव्स ने एक हिट फिल्म की कहानी लिखी- मोहाली का महापापी कौन। दोनों जुदा हो गए। आज भी पटना म्यूज़ियम में रैव्स का फाइटर प्लेन रखा है।
(7)
भिखना पहाड़ी एटीसी की फिर सीटी बज गई। पटना म्यूज़ियम से फाइटर प्लेन लेकर रैव्स मोहाली की तरफ उड़ चला। रिया को लगा कि रैव्स मैच्योर हो रहा है। क्राइसस एन्ज्यवॉय करने लगा है। धोनी रमाए टीमिंडिया के गेंदबाज़ धौंक रहे थे। रिया ने कहा तुम न्यूज़ करते करते सेन्सिटिभ हो गए हो। थोड़ा मिक्स करो। प्रोफेशन के क्राउड में। अदरभाइझ लोनली हो जाओगे। रैव्स ने हां में हां कह दिया। और फाइटर प्लेन उड़ाने में बिझी हो गया।
(8)
...फाइटर प्लेन में रिया लेज़ी लम्हे सुनते हुए मोहाली के आसमान में चमकते सितारे गिनने लगी। पोएटिक मूड में रिया को देख रैव्स रंजन ऋतुराज के स्टेटस का वो गाना गुनगुनाने लगा...सिमटी हुई ये घड़िया..फिर से न बिखर न जाएं....इस रात में जी ले हम, इस रात में मर जाएं। रिया डिसूजा दोस्तों को मैसेज करने लगी। आय टोल्ड यू न ही इझ ए नाईस गाई। गेंजेटिक बार्बेरियन्स। रैव्स ने भिखना पहाड़ी एटीसी की लाइन काट दी।
(9)
और...रिया ने रैव्स को हग कर लिया...फाइटर प्लेन टिल्ट हो गया....मोहाली के आसमान में उठती आतिशबाज़ियों की लपटों से फाइटर प्लेन में माइनर फायर हो गया...समय रहते बुझा लिया गया...भिखना पहाड़ी के एटीसी को घंटा न पता चला.....बीच मैच से भागा रैव्स मिस्वा को आउट होते देख बहादुर फील करने लगा। मैनली। ओनली रिया उसके जज़्बात को समझ सकी। इसी के साथ मोहाली स.फा. की इस प्रेम कथा का सुखांत होता है।
लोकसभा टीवी का लोकरूप
लोकसभा टीवी को देखना ऐसा लगता है जैसे अचानक शहरी भीड़-भाड़ से निकल कर किसी जैविक फार्म हाउस में आ गया हूं। जहां कुछ भी खाना स्वास्थ्यवर्धक लगने लगता है। वैसा ही कुछ लोकसभा टीवी को देखते हुए लगता है। बिना किसी चिकमिक-चिकचिक और बेवजह के ढूंसे गए ऊर्जा वितरक स्टिंग और वाइप के कार्यक्रम चलते रहते हैं। निजी न्यूज़ चैनलों में बातचीत चल रही हो तो बीच-बीच में थ्री डी एनिमेशन की तरह स्टिंग और वाइप आते जाते रहते हैं। हुर्र.ज़ू...भ्रू...श्रू करते हुए। इनका मकसद यह बताया जाता है कि इससे ऊर्जा आती है। किसी ज्ञात सर्वे और शोध के आधार पर कहना मुश्किल है कि दर्शक इन्हीं सब टिटिमाओं की वजह से ही किसी कार्यक्रम में टिकता है। लोकसभा टीवी आपके घर का वो ड्राइंग रूम हैं जहां आप जीवन की व्यस्तताओं के कारण उठना-बैठना भूल जाते हैं। वक्त मिले तो देखा कीजिए।
बाज़ार के दबाव और केबल वितरण के खर्चे में डूबे निजी चैनलों का संकट बढ़ा दिया है। मार्केटिंग के गुरुओं की तरफ से कम से कम यही बताया जाता है। वो अब कंटेंट की कतरन ही पेश कर सकेंगे। इस भयानक आर्थिक स्थिति के अलावा तथाकथित अच्छे पत्रकारों के रचनात्मक आलस्य ने भी निजी चैनलों की रचनात्मकता को मार दिया है। जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब कंटेंट और फार्मेट को लेकर काफी सराहनीय प्रयोग हुए। टेलीविज़न की क्षमताओं का पता चलने लगा। बाद में बाज़ार के दबाव और उद्देश्य से भटक जाने के कारण निजी चैनलों के कंटेंट और फार्मेट एक जैसे होते चले गए। निजी चैनलों से लोक गायब होते चले गए और स्टुडियों में एंकरों के स्टारडम के भरोसे कंटेंट को रंग-रूप दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में लोकसभा टीवी के टिके रहने के आर्थिक पक्ष को समझा जा सकता है। शायद लोकसभा टीवी के सामने बाज़ार का दबाव नहीं है। सरकार आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाती है। सरकारी विज्ञापन आते हैं,ब्रेक भी है मगर हुड़दंग नहीं है। वहां वितरण का खर्चा नहीं है। सरकार का चैनल है तो केबल वालों को दिखाना ही होगा। केबल वालों ने चैनलों को चूस लिया है। बिना वजह टिकर नहीं हैं। स्क्रीन बड़ा और शांत दिखता है।
लेकिन क्या संतुष्ठ होने के लिए यही दलील काफी है? अगर निजी चैनलों में पैसा ही लग रहा है तो अच्छे कार्यक्रम क्यों नहीं बन रहे। क्यों वहां अब सब कुछ स्टुडियों से रचा जा रहा है। ऐसी बात नहीं कि निजी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम नहीं हैं। वी द पिपुल,आप की अदालत,ज़िंदगी लाइव,टोटल रिकॉल,ज़ायका इंडिया जैसे कई कार्यक्रम हैं जो आते ही स्क्रीन को दर्शनीय बना जाते हैं। लेकिन बाकी कार्यक्रमों को देखें तो लगता है कि ज़्यादा देर तक देखा तो आंख ही फोड़ देंगे। अब तो लोग ख़बरों की रफ्तार की तुलना बम,बंदूक और बुलेट से भी करने लगे हैं। जल्दी ही आप राजा भैया न्यूज़,शहाबुद्दीन खबर और दाऊट काउंटडाउन जैसे कार्यक्रम देखेंगे। जब ख़बरों की भाषा अपराध के सामान जैसी हो जाएगी तो एक दिन अपराधी भी ख़बर पढ़ने लग जाएंगे। बहरहाल इन सब आलोचनाओं का कोई मतलब नहीं है। कोई यही बता दे कि ऐसे कार्यक्रमों और भाषा से उनकी कमाई में कितना सुधार हो गया है।
हालांकि दूरदर्शन अभी भी पुराने ढर्र पर ही चल रहा है। उसकी गुणवत्ता वहीं ठहरी हुई है। लोकसभा टीवी तो पहले भी था। लेकिन पिछले एक साल से इसकी गुणवत्ता में गज़ब का सुधार है। साल भर पहले मैंने लोकसभा टीवी पर मराठी फिल्म सियासत देखी थी। बिना किसी ब्रेक के। राजनीति फिल्म के दौरान अपने स्टुडियो में प्रकाश झा के सामने सियासत का ज़िक्र कर दिया और कहा कि आपकी फिल्म नहीं देखी है मगर सियासत जैसी नहीं हो सकती है। लोकसभा टीवी अपने हिसाब से बदलता रहता है। फिल्म के वक्त फिल्म। न्यूज़ भी और उस पर चर्चा भी। होली के दिन किराये के कोख जैसे जटिल विषय पर शानदार चर्चा देखी थी। इतनी अच्छी चर्चा निजी चैनलों पर हो ही नहीं सकती। सबको बोलने दिया गया और सबको समझाने दिया गया। पहली बार इस विषय की जटिलताओं को गहराई से समझने में मदद मिली। लोकसभा टीवी के विषय भी अलग होते हैं।
जब भी टीवी के सामने होता हूं,लोकसभा टीवी भी देखता हूं। कुछ न कुछ आ ही रहा होता है जहां थोड़ी देर तक टिक जाता हूं और कई बार देर तक देखने लगता हूं। आज दूरदर्शन के पुराने चेहरे सुनीत टंडन का एक शो देखा- कंवर्शेशन। शांत सुनीत उतावले नहीं लगते। सवाल हैं तो हैं। जवाब महत्वपूर्ण हैं। बोलने देते हैं। दुनिया के मशहूर कलाकार सुबोध गुप्ता से उनकी बातचीत बेजोड़ रही। संत स्टीफेंस की अंग्रेजीयत वाले इस देश में सुनीत सुबोध गुप्ता की लिट्टी चोखा इंग्लिश के प्रति सहज दिखते हैं। जहां इज़ इझ है और पिपल पीपुल्स हैं। व्याकरण ठेंगे पे। काम की कामयाबी के सामने भाषा की संगतराशी कुछ भी नहीं है। संवाद और विचार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सुनीत पूरे सम्मान और आदर से सुबोध को अपने शब्द और वाक्य तलाशने के लिए छूट देते हैं। एक अच्छी बातचीत निकलकर आती है। मेरे जैसा बेचैन तबीयत वाला दर्शक भी ठहर कर सुनने लगता है।सुबोध की अंग्रेजी मेरे जैसी है। हिन्दी को इंग्लिश में बोलते हैं। इंग्लिश को इंग्लिश में नहीं। इसी वजह से सुबोध के जवाबों में एक किस्म की भारतीयता, देसीपन झलकता है। सुनीत एक कुलीन इंग्लिश वक्ता खानदान से आते हैं। मुस्कुराते हैं और अपने सवालों को धीरे से सुबोध के सामने रखते चलते हैं।
ऐसी बातचीत आज के समय में सिर्फ लोकसभा टीवी में ही दिख सकती है। लोकसभा टीवी में ही शंकर अय्यर से नताशा झा और एक और एंकर इंग्लिश हिन्दी में सवाल पूछ सकते हैं। नताशा के अंग्रेजी के सवालों के जवाब में पत्रकार शंकर अय्यर इंग्लिश में और दूसरी एंकर नेहा के हिन्दी के सवालों के जवाब हिन्दी में देते हैं। इस तरह का आइडिया आप निजी चैनलों में लेकर जायें तो लोग कपार फोड़ देंगे। मैं पर्सपेक्टिव कार्यक्रम की बात कर रहा हूं। वैसे यह उतना अच्छा नहीं लगा। सवाल है प्रयोग का। निजी चैनलों में प्रयोग बंद हो चुका है। प्रॉणजॉय गुहा ठाकुर्ता का हेड स्टार्ट भी अच्छा कार्यक्रम है। सरकार के भीतर काम कर रहे कई अनुभवी लोगों को भी सुनने समझने का मौका मिलता है।
लोकसभा टीवी में लोक है या नहीं,उनकी टीआरपी कितनी है नहीं मालूम। मगर अच्छा है। और अच्छा हो सकता है। सृजन की अपार संभावना रहती है। कुछ कार्यक्रम बोझिल भी हैं। लेकिन लोकसभा टीवी आज के समय में एक विकल्प तो है ही। टीवी के आलोचक भी बाज़ारू हो गए हैं। वो अच्छे कार्यक्रमों को नहीं ढूंढते। वो भी बेकार कार्यक्रमों पर ही बार-बार लिखते रहते हैं। शायद हम गरियाने में ज्यादा साधक लगते हैं,सराहना करने में कम। कई लाइफस्टाइल चैनलों में अच्छे कार्यक्रम आने लगे हैं।
लोकसभा टीवी के कई कार्यक्रम इस धारणा को तोड़ते हैं कि आप उनके स्टुडियो में बैठकर सरकार या नौकरशाही की आलोचना नहीं कर सकते। सुनीत के जवाब में सुबोध गुप्ता खुलकर ललित कला अकादमियों की फिज़ूल की नौकरशाही पर हमले करते हैं। इसे दिखाया भी जाता है। सुबोध कहते हैं कि भारत में लोग कला की बात नहीं करते हैं। कितने की बिकी यही पूछते रहते हैं। हद है। सुनीत मुस्कुराते रहते हैं। उनके जवाब को स्वीकार करते हैं। निजी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम एंकर के परफार्मेंस के लिए होता है। वो जवाब सुनने के लिए नहीं बल्कि परफार्म करने के लिए बैठा रहता है। सुनीत इस तरह के दबावों मुक्त हैं। वो बस हैं अपने सवालों के साथ। उनके लिए सुबोध गुप्ता महत्वपूर्ण हैं न कि वे खुद। सुनीत के एक सवाल के जवाब में सुबोघ गुप्ता ने कहा उन्हें नया नया आइडिया उत्साहित और प्रेरित करता है। निजी चैनलों को प्रेरणा कहां से मिलती है? एक दूसरे के कार्यक्रम से चुराने से। लोकसभा टीवी के सामने भी कम चुनौती नहीं है। उनके पास एक मौका है। वहां काम कर रहे पत्रकार,संपादक जब तक मौका मिले अच्छी रचना करें। नए प्रयोग करें। अपनी आज़ादी का बेहतर इस्तमाल करें। आलस्य न करें। आप अच्छे हैं सिर्फ इसी दलील से कोई नहीं देखेगा। आपको अच्छा होने का सबूत भी देना होगा। रोल मॉडल बन कर।
बाज़ार के दबाव और केबल वितरण के खर्चे में डूबे निजी चैनलों का संकट बढ़ा दिया है। मार्केटिंग के गुरुओं की तरफ से कम से कम यही बताया जाता है। वो अब कंटेंट की कतरन ही पेश कर सकेंगे। इस भयानक आर्थिक स्थिति के अलावा तथाकथित अच्छे पत्रकारों के रचनात्मक आलस्य ने भी निजी चैनलों की रचनात्मकता को मार दिया है। जब निजी चैनलों का दौर शुरू हुआ तब कंटेंट और फार्मेट को लेकर काफी सराहनीय प्रयोग हुए। टेलीविज़न की क्षमताओं का पता चलने लगा। बाद में बाज़ार के दबाव और उद्देश्य से भटक जाने के कारण निजी चैनलों के कंटेंट और फार्मेट एक जैसे होते चले गए। निजी चैनलों से लोक गायब होते चले गए और स्टुडियों में एंकरों के स्टारडम के भरोसे कंटेंट को रंग-रूप दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में लोकसभा टीवी के टिके रहने के आर्थिक पक्ष को समझा जा सकता है। शायद लोकसभा टीवी के सामने बाज़ार का दबाव नहीं है। सरकार आर्थिक ज़िम्मेदारी उठाती है। सरकारी विज्ञापन आते हैं,ब्रेक भी है मगर हुड़दंग नहीं है। वहां वितरण का खर्चा नहीं है। सरकार का चैनल है तो केबल वालों को दिखाना ही होगा। केबल वालों ने चैनलों को चूस लिया है। बिना वजह टिकर नहीं हैं। स्क्रीन बड़ा और शांत दिखता है।
लेकिन क्या संतुष्ठ होने के लिए यही दलील काफी है? अगर निजी चैनलों में पैसा ही लग रहा है तो अच्छे कार्यक्रम क्यों नहीं बन रहे। क्यों वहां अब सब कुछ स्टुडियों से रचा जा रहा है। ऐसी बात नहीं कि निजी चैनलों पर अच्छे कार्यक्रम नहीं हैं। वी द पिपुल,आप की अदालत,ज़िंदगी लाइव,टोटल रिकॉल,ज़ायका इंडिया जैसे कई कार्यक्रम हैं जो आते ही स्क्रीन को दर्शनीय बना जाते हैं। लेकिन बाकी कार्यक्रमों को देखें तो लगता है कि ज़्यादा देर तक देखा तो आंख ही फोड़ देंगे। अब तो लोग ख़बरों की रफ्तार की तुलना बम,बंदूक और बुलेट से भी करने लगे हैं। जल्दी ही आप राजा भैया न्यूज़,शहाबुद्दीन खबर और दाऊट काउंटडाउन जैसे कार्यक्रम देखेंगे। जब ख़बरों की भाषा अपराध के सामान जैसी हो जाएगी तो एक दिन अपराधी भी ख़बर पढ़ने लग जाएंगे। बहरहाल इन सब आलोचनाओं का कोई मतलब नहीं है। कोई यही बता दे कि ऐसे कार्यक्रमों और भाषा से उनकी कमाई में कितना सुधार हो गया है।
हालांकि दूरदर्शन अभी भी पुराने ढर्र पर ही चल रहा है। उसकी गुणवत्ता वहीं ठहरी हुई है। लोकसभा टीवी तो पहले भी था। लेकिन पिछले एक साल से इसकी गुणवत्ता में गज़ब का सुधार है। साल भर पहले मैंने लोकसभा टीवी पर मराठी फिल्म सियासत देखी थी। बिना किसी ब्रेक के। राजनीति फिल्म के दौरान अपने स्टुडियो में प्रकाश झा के सामने सियासत का ज़िक्र कर दिया और कहा कि आपकी फिल्म नहीं देखी है मगर सियासत जैसी नहीं हो सकती है। लोकसभा टीवी अपने हिसाब से बदलता रहता है। फिल्म के वक्त फिल्म। न्यूज़ भी और उस पर चर्चा भी। होली के दिन किराये के कोख जैसे जटिल विषय पर शानदार चर्चा देखी थी। इतनी अच्छी चर्चा निजी चैनलों पर हो ही नहीं सकती। सबको बोलने दिया गया और सबको समझाने दिया गया। पहली बार इस विषय की जटिलताओं को गहराई से समझने में मदद मिली। लोकसभा टीवी के विषय भी अलग होते हैं।
जब भी टीवी के सामने होता हूं,लोकसभा टीवी भी देखता हूं। कुछ न कुछ आ ही रहा होता है जहां थोड़ी देर तक टिक जाता हूं और कई बार देर तक देखने लगता हूं। आज दूरदर्शन के पुराने चेहरे सुनीत टंडन का एक शो देखा- कंवर्शेशन। शांत सुनीत उतावले नहीं लगते। सवाल हैं तो हैं। जवाब महत्वपूर्ण हैं। बोलने देते हैं। दुनिया के मशहूर कलाकार सुबोध गुप्ता से उनकी बातचीत बेजोड़ रही। संत स्टीफेंस की अंग्रेजीयत वाले इस देश में सुनीत सुबोध गुप्ता की लिट्टी चोखा इंग्लिश के प्रति सहज दिखते हैं। जहां इज़ इझ है और पिपल पीपुल्स हैं। व्याकरण ठेंगे पे। काम की कामयाबी के सामने भाषा की संगतराशी कुछ भी नहीं है। संवाद और विचार महत्वपूर्ण हो जाते हैं। सुनीत पूरे सम्मान और आदर से सुबोध को अपने शब्द और वाक्य तलाशने के लिए छूट देते हैं। एक अच्छी बातचीत निकलकर आती है। मेरे जैसा बेचैन तबीयत वाला दर्शक भी ठहर कर सुनने लगता है।सुबोध की अंग्रेजी मेरे जैसी है। हिन्दी को इंग्लिश में बोलते हैं। इंग्लिश को इंग्लिश में नहीं। इसी वजह से सुबोध के जवाबों में एक किस्म की भारतीयता, देसीपन झलकता है। सुनीत एक कुलीन इंग्लिश वक्ता खानदान से आते हैं। मुस्कुराते हैं और अपने सवालों को धीरे से सुबोध के सामने रखते चलते हैं।
ऐसी बातचीत आज के समय में सिर्फ लोकसभा टीवी में ही दिख सकती है। लोकसभा टीवी में ही शंकर अय्यर से नताशा झा और एक और एंकर इंग्लिश हिन्दी में सवाल पूछ सकते हैं। नताशा के अंग्रेजी के सवालों के जवाब में पत्रकार शंकर अय्यर इंग्लिश में और दूसरी एंकर नेहा के हिन्दी के सवालों के जवाब हिन्दी में देते हैं। इस तरह का आइडिया आप निजी चैनलों में लेकर जायें तो लोग कपार फोड़ देंगे। मैं पर्सपेक्टिव कार्यक्रम की बात कर रहा हूं। वैसे यह उतना अच्छा नहीं लगा। सवाल है प्रयोग का। निजी चैनलों में प्रयोग बंद हो चुका है। प्रॉणजॉय गुहा ठाकुर्ता का हेड स्टार्ट भी अच्छा कार्यक्रम है। सरकार के भीतर काम कर रहे कई अनुभवी लोगों को भी सुनने समझने का मौका मिलता है।
लोकसभा टीवी में लोक है या नहीं,उनकी टीआरपी कितनी है नहीं मालूम। मगर अच्छा है। और अच्छा हो सकता है। सृजन की अपार संभावना रहती है। कुछ कार्यक्रम बोझिल भी हैं। लेकिन लोकसभा टीवी आज के समय में एक विकल्प तो है ही। टीवी के आलोचक भी बाज़ारू हो गए हैं। वो अच्छे कार्यक्रमों को नहीं ढूंढते। वो भी बेकार कार्यक्रमों पर ही बार-बार लिखते रहते हैं। शायद हम गरियाने में ज्यादा साधक लगते हैं,सराहना करने में कम। कई लाइफस्टाइल चैनलों में अच्छे कार्यक्रम आने लगे हैं।
लोकसभा टीवी के कई कार्यक्रम इस धारणा को तोड़ते हैं कि आप उनके स्टुडियो में बैठकर सरकार या नौकरशाही की आलोचना नहीं कर सकते। सुनीत के जवाब में सुबोध गुप्ता खुलकर ललित कला अकादमियों की फिज़ूल की नौकरशाही पर हमले करते हैं। इसे दिखाया भी जाता है। सुबोध कहते हैं कि भारत में लोग कला की बात नहीं करते हैं। कितने की बिकी यही पूछते रहते हैं। हद है। सुनीत मुस्कुराते रहते हैं। उनके जवाब को स्वीकार करते हैं। निजी चैनलों में इस तरह के कार्यक्रम एंकर के परफार्मेंस के लिए होता है। वो जवाब सुनने के लिए नहीं बल्कि परफार्म करने के लिए बैठा रहता है। सुनीत इस तरह के दबावों मुक्त हैं। वो बस हैं अपने सवालों के साथ। उनके लिए सुबोध गुप्ता महत्वपूर्ण हैं न कि वे खुद। सुनीत के एक सवाल के जवाब में सुबोघ गुप्ता ने कहा उन्हें नया नया आइडिया उत्साहित और प्रेरित करता है। निजी चैनलों को प्रेरणा कहां से मिलती है? एक दूसरे के कार्यक्रम से चुराने से। लोकसभा टीवी के सामने भी कम चुनौती नहीं है। उनके पास एक मौका है। वहां काम कर रहे पत्रकार,संपादक जब तक मौका मिले अच्छी रचना करें। नए प्रयोग करें। अपनी आज़ादी का बेहतर इस्तमाल करें। आलस्य न करें। आप अच्छे हैं सिर्फ इसी दलील से कोई नहीं देखेगा। आपको अच्छा होने का सबूत भी देना होगा। रोल मॉडल बन कर।
चलने का अधिकार
क्या आपको नहीं लगता कि चलने का भी अधिकार होना चाहिए? क्या कभी हमने सोचा है कि ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों की गतिशीलता का माध्यम क्या होगा? क्या कभी हमने सोचा है कि शहर के भीतर आर्थिक रूप से चलने की अक्षमता ने लाखों लोगों को आर्थिक अवसरों से दूर रखा है और घर होते हुए भी बेघर बनाया है? ग्रामीण और शहरी ग़रीबों और बेघरों को सामाजिक सुरक्षा के तहत मिलने वाले अधिकारों के तहत चलने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए।
इन सवालों से टकराने का मौका मिला पिछले एक साल में। दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए ऐसे कई लोग मिले जो चलने में आर्थिक रूप से लाचार हैं। पश्चिम दिल्ली के बवाना और सावदा घेवरा में दिल्ली भर से उजाड़े गए लोगों को बसाया गया है। ज़्यादातर के लिए काम करने के जगह की दूरी पचीस से तीस किमी हो गई है। दक्षिण दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट के पास की झुग्गी से उज़ड़े परिवार को यहां बसाया गया तो उनका मुखिया बेघर हो गया। राजीव गांधी आवास योजना के तहत घर मिलने के बाद भी ज़रीना के पति हफ्ते में एक दिन घर आते हैं। बाकी दिन बेघरों की तरह पटरियों पर सोते हैं क्योंकि घर आने के लिए हर दिन पचास रुपये बस का किराया नहीं दे सकते। पांच लोगों के परिवार का मुखिया महीने में पंद्रह सौ रुपये बस में खर्च करेगा जो बाकी सदस्यों की गतिशीलता भी प्रभावित होगी। लिहाज़ा घर वाले बेघरों की संख्या बढ़ती जा रही है।
इसी तरह दिल्ली शहर में कई लोग साइकिल चलाते मिलेंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए नहीं बल्कि किराया बचाने के लिए। हर दिन तीन से चार घंटे लगाकर पंद्रह से बीस किमी की दूरी साइकिल से तय करते हैं। कई लोग तीन चार स्टॉप तक पैदल चलते हैं ताकि बस का किराया बचा सकें। उस पर भी सरकार ने फुटपाथ और साइकिल ट्रैक दोनों खत्म कर दिये हैं। वैसे भी अलग से साइकिल ट्रैक बनाने का मुद्दा इस देश में सिर्फ दिल्ली में ही उठता है। मुंबई, जयपुर,भोपाल,लखनऊ में क्यों नहीं उठता? जबकि सभी शहरों का विस्तार हुआ है और शहर के भीतर की दूरियां पहले से काफी बढ़ गईं हैं। मेट्रो ने इस स्थिति को और भयानक बनाया है। ग़रीबों को तीव्र गतिशीलता से वंचित किया है। मेट्रो में किसी तरह की रियायत नहीं है। मेट्रो के पास बनी झुग्गियों में गया। वहां के लोग मेट्रो को अफसोस के रूप में देखते हैं। देश के किसी भी ग्रामीण इलाके में चले जाइये किराया बचाने के लिए लाखों लोग हर दिन जान पर खेल कर बस से लेकर ऑटो में लटक कर सफर करते हैं। किसी भी शहर में पचास पचीस लोग टाटा 407 में भी खड़े होकर सफर करते दिख जायेंगे। इनके पास किराये के पैसे नहीं होते इसलिए दो या पांच रुपया देकर खड़े होकर अपने काम या रहने की जगह पर पहुंचते हैं। गांव से शहर, शहर से महानगर पलायन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग साहूकारों की चपेट में भी आ रहे हैं।
हमारे देश में तीस करोड़ से ज्यादा लोग ग़रीब बताये जाते हैं। मुझे हैरानी होती है कि अभी तक इनके चलने-फिरने के अधिकार के बारे में क्यों नहीं सोचा गया? क्यों सरकार ने बीपीएल कार्डधारियों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा का एलान नहीं करती है? जवाहर लाला नेहरू नेशनल अर्बन रिनुअल मिशन के तहत सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने की बातें कहीं गईं हैं। इसके तहत कई शहरों को बस के लिए फंड दिए गए हैं। आप अपने शहर की बसों पर जेएनएनयूआरएम लिखा देख सकते हैं। ये सारी सुविधा पब्लिक के लिए है तो ग़रीब पब्लिक को क्यों वंचित रखा जा रहा है।
दिल्ली शहर में ऐसे सैंकड़ों लोगों से मुलाकात हुई जो सरकारी पैमाने से ग़रीब नहीं हैं मगर चलने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। दिल्ली परिवहन निगम के एक टिकट इंस्पेक्टर ने बताया कि बेटिकट यात्रियों में ज्यादातर वही लोग होते हैं जो पंद्रह रुपये का टिकट नहीं ख़रीद सकते। हज़ारों की संख्या में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड किराया लेने में सक्षम नहीं है। उनकी तनख्वाह पांच या छह हज़ार से ज्यादा नहीं है। बल्कि कई मामलों में इससे भी कम होती है। लिहाज़ा वो वर्दी पहनकर भी पचीस रुपये का टिकट नहीं ले पाते। उसी तरह हिन्दुस्तान में रिटेल क्रांति करवाने वाले लोगों को पता भी नहीं होगा कि दक्षिण दिल्ली के ही तमाम मॉल में काम करने वाले कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा बस में बिना टिकट सफर करने के लिए मजबूर है। सरकार या नीतियां बनाने वालों को इल्म नहीं है। शहरी क्षेत्रों में राजनीति करने वाले लोगों को भी इस तरह के मुद्दों को परखने के लिए वक्त नहीं है। ममता बनर्जी अच्छा खासा कमाने वाले पत्रकारों को परिवार के साथ साल में दो बार रेल यात्राएं करने की छूट देती हैं। वाहवाही लूटने के लिए। ग़रीबों को ऐसी छूट मिलेगी तो वाहवाही भी मिलेगी और वोट भी।
सरकारी बसों में स्वतंत्रता सेनानी, विकलांग, मान्यता प्राप्त पत्रकार, सांसद और विधायकों को मुफ्त आरक्षित सीटें देती है। इनमें से पहले दो को छोड़ दें तो बाकी तीन कैटगरी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। बीस लाख की कार में चलने वाला कौन सा सांसद या विधायक अब सरकारी बसों में चलता है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों में आम लोगो के लिए नॉन एसी बस का मासिक रियायती पास 815 रुपये का बनता है। अगर आप मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं तो यही पास 100 रुपये का बनता है। फिर इसी दलील से मान्यता प्राप्त ग़रीबों को बस और ट्रेन में चलने के लिए रियायती या मुफ्त का पास क्यों न हो? बस या ट्रेन में रियायत मिल सकती है तो मेट्रों में क्यों न मिले?
शहरी ग़रीबों या बीपीएलकार्ड वालों के लिए मेट्रो में भी फ्री कार्ड होना चाहिए। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट अस्पतालों में ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए बिस्तर आरक्षित है। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट स्कूलों में ग़रीबों के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित हैं। अदालतें भी इसके लागू होने की खोज खबर लेती रहती हैं तो उनकी निगाह से भी ग़रीबों के चलने का अधिकार कैसे छूट गया।
(साभार-राजस्थान पत्रिका)
इन सवालों से टकराने का मौका मिला पिछले एक साल में। दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए ऐसे कई लोग मिले जो चलने में आर्थिक रूप से लाचार हैं। पश्चिम दिल्ली के बवाना और सावदा घेवरा में दिल्ली भर से उजाड़े गए लोगों को बसाया गया है। ज़्यादातर के लिए काम करने के जगह की दूरी पचीस से तीस किमी हो गई है। दक्षिण दिल्ली के सरोजिनी नगर मार्केट के पास की झुग्गी से उज़ड़े परिवार को यहां बसाया गया तो उनका मुखिया बेघर हो गया। राजीव गांधी आवास योजना के तहत घर मिलने के बाद भी ज़रीना के पति हफ्ते में एक दिन घर आते हैं। बाकी दिन बेघरों की तरह पटरियों पर सोते हैं क्योंकि घर आने के लिए हर दिन पचास रुपये बस का किराया नहीं दे सकते। पांच लोगों के परिवार का मुखिया महीने में पंद्रह सौ रुपये बस में खर्च करेगा जो बाकी सदस्यों की गतिशीलता भी प्रभावित होगी। लिहाज़ा घर वाले बेघरों की संख्या बढ़ती जा रही है।
इसी तरह दिल्ली शहर में कई लोग साइकिल चलाते मिलेंगे। पर्यावरण को बचाने के लिए नहीं बल्कि किराया बचाने के लिए। हर दिन तीन से चार घंटे लगाकर पंद्रह से बीस किमी की दूरी साइकिल से तय करते हैं। कई लोग तीन चार स्टॉप तक पैदल चलते हैं ताकि बस का किराया बचा सकें। उस पर भी सरकार ने फुटपाथ और साइकिल ट्रैक दोनों खत्म कर दिये हैं। वैसे भी अलग से साइकिल ट्रैक बनाने का मुद्दा इस देश में सिर्फ दिल्ली में ही उठता है। मुंबई, जयपुर,भोपाल,लखनऊ में क्यों नहीं उठता? जबकि सभी शहरों का विस्तार हुआ है और शहर के भीतर की दूरियां पहले से काफी बढ़ गईं हैं। मेट्रो ने इस स्थिति को और भयानक बनाया है। ग़रीबों को तीव्र गतिशीलता से वंचित किया है। मेट्रो में किसी तरह की रियायत नहीं है। मेट्रो के पास बनी झुग्गियों में गया। वहां के लोग मेट्रो को अफसोस के रूप में देखते हैं। देश के किसी भी ग्रामीण इलाके में चले जाइये किराया बचाने के लिए लाखों लोग हर दिन जान पर खेल कर बस से लेकर ऑटो में लटक कर सफर करते हैं। किसी भी शहर में पचास पचीस लोग टाटा 407 में भी खड़े होकर सफर करते दिख जायेंगे। इनके पास किराये के पैसे नहीं होते इसलिए दो या पांच रुपया देकर खड़े होकर अपने काम या रहने की जगह पर पहुंचते हैं। गांव से शहर, शहर से महानगर पलायन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग साहूकारों की चपेट में भी आ रहे हैं।
हमारे देश में तीस करोड़ से ज्यादा लोग ग़रीब बताये जाते हैं। मुझे हैरानी होती है कि अभी तक इनके चलने-फिरने के अधिकार के बारे में क्यों नहीं सोचा गया? क्यों सरकार ने बीपीएल कार्डधारियों को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा का एलान नहीं करती है? जवाहर लाला नेहरू नेशनल अर्बन रिनुअल मिशन के तहत सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने की बातें कहीं गईं हैं। इसके तहत कई शहरों को बस के लिए फंड दिए गए हैं। आप अपने शहर की बसों पर जेएनएनयूआरएम लिखा देख सकते हैं। ये सारी सुविधा पब्लिक के लिए है तो ग़रीब पब्लिक को क्यों वंचित रखा जा रहा है।
दिल्ली शहर में ऐसे सैंकड़ों लोगों से मुलाकात हुई जो सरकारी पैमाने से ग़रीब नहीं हैं मगर चलने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं। दिल्ली परिवहन निगम के एक टिकट इंस्पेक्टर ने बताया कि बेटिकट यात्रियों में ज्यादातर वही लोग होते हैं जो पंद्रह रुपये का टिकट नहीं ख़रीद सकते। हज़ारों की संख्या में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड किराया लेने में सक्षम नहीं है। उनकी तनख्वाह पांच या छह हज़ार से ज्यादा नहीं है। बल्कि कई मामलों में इससे भी कम होती है। लिहाज़ा वो वर्दी पहनकर भी पचीस रुपये का टिकट नहीं ले पाते। उसी तरह हिन्दुस्तान में रिटेल क्रांति करवाने वाले लोगों को पता भी नहीं होगा कि दक्षिण दिल्ली के ही तमाम मॉल में काम करने वाले कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा बस में बिना टिकट सफर करने के लिए मजबूर है। सरकार या नीतियां बनाने वालों को इल्म नहीं है। शहरी क्षेत्रों में राजनीति करने वाले लोगों को भी इस तरह के मुद्दों को परखने के लिए वक्त नहीं है। ममता बनर्जी अच्छा खासा कमाने वाले पत्रकारों को परिवार के साथ साल में दो बार रेल यात्राएं करने की छूट देती हैं। वाहवाही लूटने के लिए। ग़रीबों को ऐसी छूट मिलेगी तो वाहवाही भी मिलेगी और वोट भी।
सरकारी बसों में स्वतंत्रता सेनानी, विकलांग, मान्यता प्राप्त पत्रकार, सांसद और विधायकों को मुफ्त आरक्षित सीटें देती है। इनमें से पहले दो को छोड़ दें तो बाकी तीन कैटगरी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए। बीस लाख की कार में चलने वाला कौन सा सांसद या विधायक अब सरकारी बसों में चलता है। दिल्ली परिवहन निगम की बसों में आम लोगो के लिए नॉन एसी बस का मासिक रियायती पास 815 रुपये का बनता है। अगर आप मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं तो यही पास 100 रुपये का बनता है। फिर इसी दलील से मान्यता प्राप्त ग़रीबों को बस और ट्रेन में चलने के लिए रियायती या मुफ्त का पास क्यों न हो? बस या ट्रेन में रियायत मिल सकती है तो मेट्रों में क्यों न मिले?
शहरी ग़रीबों या बीपीएलकार्ड वालों के लिए मेट्रो में भी फ्री कार्ड होना चाहिए। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट अस्पतालों में ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए बिस्तर आरक्षित है। सरकारी ज़मीन पर बने महंगे प्राइवेट स्कूलों में ग़रीबों के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित हैं। अदालतें भी इसके लागू होने की खोज खबर लेती रहती हैं तो उनकी निगाह से भी ग़रीबों के चलने का अधिकार कैसे छूट गया।
(साभार-राजस्थान पत्रिका)
लघु प्रेम कथा-लप्रेक (फेसबुक फिक्शन)
फेसबुक के सीमित स्पेस और दिल्ली के असीमित स्पेस में प्रेम कथाओं का मतलब कई मोहल्लों से होकर गुज़रना है। हर दिन फैल जाने वाली दिल्ली में प्रेम का एक कोना कोई न कोई प्रेमी जोड़ा अपने लिए रच ही लेता है। ये वो कहानियां हैं जो काल्पनिक पात्रों के सहारे वास्तविक स्पेस में घटित हो रही हैं। हो चुकी होंगी। होने वाली होंगी। मालूम नहीं। यही सोचते-सोचते फेसबुक पर लघु प्रेम कथा लिखने लगा। जिसका संक्षिप्त नाम लप्रेक है। जैसा कि मेरी हर रचना के साथ है। एक ही शर्त होती है। ये सभी कालजयी नहीं हैं। महान नहीं हैं। फालतू वक्त की बेचैनियों को संभालने में साथी रही हैं। आप कस्बा या फेसबुक कहीं पर इसे पढ़ सकते हैं। सिर्फ प्रेमियों के मन में घुस कर शांत नहीं रह जाइयेगा। दिल्ली भी घूमिएगा। कथाकार यही चाहता है। फेसबुक का स्टेटस हमारा मानस मोहल्ला है। हम यहीं पर आकर कुछ भी बक देते हैं। दिल की बात से लेकर दिल्ली की परेशानी तक। वहीं से प्रजनित यह प्रेम कथा यहां पर लाई गई है। व्यापक वितरण के लिए।
(1)
बहुत देर से जाम में फंसा वो तेज़ी से रन लेने की ख्वाहिशों से भर गया। हर रन जान की बाज़ी लगाकर बनाने लगा। स्टेडियम से आ रही तालियों की आवाज़ में एक आवाज़ ताली वाली की भी थी। गाड़ियां वहीं की वहीं खड़ी रह गईं। मास्टर के गुस्से से पसीना आने लगा था। प्रेम पत्र को एक कार्ड कंपनी ने छाप कर बेचने का एलान कर दिया। फिर भी भागा जा रहा था। जाम में फंसने के बाद भी भागने के अहसास से भागा जा रहा था।
(2)
रेडियो की आवाज़ आने लगी थी। उसकी कार धौलाकुआं से मुड़ कर एम्स की तरफ दौड़ने लगी थी। लौटने के फैसले का साहस नहीं जुटा सकी। न ही वो मोतीबाग से यू टर्न लेकर उसके पीछे आया। एक दूसरे के आने और मनाने के इंतज़ार में दोनों बहुत दूर चले गए। गाज़ीपुर पहुंच कर सामने गाज़ियाबाद था। शिवमूर्ति के बाद गुड़गांव आ चुका था। शहरों की प्रेम कहानियां ऐसी ही होती हैं। ट्रैफिक में शुरू होती है और ट्रैफिक में गुम हो जाती है।(लघु प्रेम कथा)
(3)
मोबाइल के इनबॉक्स में सेव मैसेज को वो आधी रात ही भेज देना चाहती थी। पता नहीं इस वक्त फोन उसके सिरहाने होगा या नहीं। क्या पता कोई और पढ़ ले और डिलीट कर दे। क्या पता वो पढ़ ले लेकिन किसी और को फारवर्ड कर दे। इसी उधेड़बुन में पंद्रह दिनों बाद इनबॉक्स में सेव मैसेज अपने आप उड़ गए। बाद में उसे याद ही नहीं आया कि कहना क्या चाहती थी। बहुत दिनों से उसका इनबॉक्स खाली है। न उसने लिखा न उसका आया। (लघु प्रेम कथा)
(4)
मायापुरी से मेट्रो में चढ़ते ही वो सीपी के सेंट्रल पार्क में होने के ख़्यालों से भर गया। अलकनंदा से चलते वक्त उसने हर दुकान के शीशे में खुद को देख लिया था। दोनों के साथ पूरी दिल्ली मिल रही थी। सेंट्रल पार्क में पहुंचते ही पहले से तय खंभे पर कोई और जोड़ा एक दूसरे को छूने की कोशिश कर रहा था। वक्त पर आ कर भी दोनों लेट हो चुके थे। दोनों ने फैसला किया। कल फिर मिलेंगे। यहीं मगर इस जोड़े से पहले।(लघु प्रेम कथा)
(5)
खानपुर से बदरपुर की बस में ढूंसी भीड़ ने दोनों को ऐसे शहर में पहुंचा दिया जहां उनके अलावा सब अजनबी थे। हर स्टॉप पर चढ़ने वाली भीड़ के धक्के से दोनों और करीब होते जा रहे थे। बस भाग तो रही थी सीधी मगर उन्हें हर बार लगा कि किसी मोड़ पर तेज़ी से मुड़ रही है और गिरने से बचाने के लिए एक दूसरे को थामना ज़रूरी है। शहर में प्रेम के ऐसे कोने अपने आप बन जाया करते हैं। भीड़ में घूरे जाने के बाद भी (लघु प्रेम कथा)
(6)
अक्सर साउथ एक्स पहुंच कर कुछ हो जाता था। मज़ा आने लगता था कि हर बस को छोड़ने में। सेल की भीड़ में खो जाने का लुत्फ। सस्ते सामानों से खुद को और मुनिरका के घर को सजाने का सपना, हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता। पूरा करने के लिए अगले दिन दोनों यही करते। हर बस को छोड़ने लगते।(लघु प्रेम कथा)
(7)
कार में रेडियो शोर करने लगा। मुनाफ़ आखिरी गेंद के लिए दौड़ चला था। दोनों भीतर से खामोश हो गए। कमेंटेटर की उत्तेजना के बीच दोनों ने खुद को संभालने का नाटक कर लिया था। आंखें मूंद कर बाहों में भर लिया एक दूसरे को। जैसे गेंद कार के शीशे पर आ लगने वाली हो। दोनों एक दूसरे से जकड़े ही रह गए। जामिया के बाहर लोग नाच रहे थे। मैच टाई हो चुका था।(लघु प्रेम कथा)
(8)
उस रोज़ के बाद वो अक्सर मुखर्जी नगर में भटकती दिख जाती। उससे नोट्स हड़पने के बाद उसने अपना फ्लैट बदल लिया था। वो आदत से मजबूर हो चुकी थी। मुखर्जी नगर का हर कमरा अंधेरा लगता जिसमें वो अपने प्रेम के उजाले से झांका करती। लेकिन वो अब हकीकतनगर के एक कमरे में उसके ही लिखे नोट्स को रट रहा था। तय कर लिया था। पीटी के टाइम में प्रेमी नहीं होना है। दीवार पर हसीना की तस्वीर नहीं थी। टाइम टेबल था। उसके बाप का सपना था। (लप्रेक)
(9)
बुराड़ी से वो पैदल ही चल निकला,आईएसबीटी की तरफ। खान मार्केट की एनडीएमसी कालोनी से वो पुराना किला की तरफ भागी, ऑटो के लिए। इसी आपाधापी में उसका फोन पुराना किला के पास गिर गया। वहां से निकलते एक जोड़े ने फोन में आए मैसेज पढ़ लिए। चलो हम भी इनके पीछे भाग जाते हैं। दिल्ली को खाप बनने के लिए छोड़ जाते हैं। (लप्रेक)
(10)
सराय जुलैना की हसीना थी वो। एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती दिल के मरीज़ भी झांका करते, कैथ लैब की खिड़की से। छत पर आते ही उसके लोटस टेंपल तक हंगामा हो जाता था। चिराग दिल्ली का राजकुमार भिड़ गया मसीहगढ़ के प्रेमी से। होली फैमिली में दोनों भर्ती हो गए। तय नहीं हो सका कि वो किसकी है। नवभारत टाइम्स ने इस ख़बर को बॉटम में छाप कर खूब चटकारे लिए। पंजाब केसरी पीछे रह गया। (लप्रेक)
(11)
खिड़की के पीछे रखी चाबी से ताला खोल वो अंदर आ गई। किसी जासूस निगाह से कमरे को देखने लगी। उसके बक्से में वो तमाम ख़त मिले। जो आदमी इतने संबंधों में एक भी नहीं संभाल पाया वो उनके ख़तों को क्यों सहेजे हुए हैं। इसी उधेड़बुन में उसने एक खत लिखकर बक्से को बंद कर दिया। मैं जा रही हूं। हो सके तो मेरे ख़त को भी संभाल कर रखना। तुम्हें पता होगा पहले की तमाम प्रेमिकाएं मुझसे बेहतर लिखती हैं। मैंने जानबूझ कर कमतर लिखा है।(लप्रेक)
(12)
दक्षिण दिल्ली के महारानी बाग के पास का तैमूर नगर किस तैमूर की याद में बना है।पूछते ही वो भड़क गई। इतिहास के चक्कर में रहोगे तो प्रोफेसर बना कर सेमिनारों में गाड़ दिए जाओगे।चलो यहां से।किलोकरी गांव के पीछे से निकल कर यमुना के किनारे चलते हैं।अब बारी उसकी थी। वहां क्या करोगी।ओखला वालों ने नदी में मकान बना लिये हैं।अतिक्रमण सिर्फ प्रेम का नहीं मकानों,नदियों और हवाओं तक का हो चुका है। चैट करना सीख लो।(लप्रेक)
(13)
लाश बन कर वो बेवजन उसके बैग में घूमते हुए जाने किस सफर में स्टेशन पर छूट गई। किसके लिए बच गया था उसके बदन का गोदना। इस शहर में जिसे चाहना होता है,उसी के हाथों कटना होता है। टुकड़ों-टुकड़ों में बंटते हुए वो लड़की किन ख्यालों में खोई रही होगी और वो लड़का किसके ख्यालों से भाग रहा होगा। इश्क़ क़ातिल बना दे अच्छा, महबूब का क़त्ल हो जाए तो क्या अच्छा। प्रेमियों के बैग में क्या क्या होता है।(लप्रेक)
(14)
माइनस मुद्रिका में पीछे की किनारे वाली सीट मिल गई।उसने उसके कंधे पर सर टिका दिया।कब नींद आ गई और कब सरायकाले खां,आश्रम,धौलाकुआं,और वज़ीराबाद होते हुए जुबली हास्टल आ गया पता ही नहीं चला।वो खोई रही या सोई रही यह भी जान नहीं सका। वो तो बस उसकी तरफ आती हर निगाह से टकराने में भिड़ा रहा। उतरते वक्त उसने ठीक कहा,तुम मेरी कम दुनिया की फिक्र ज्यादा करते हो।कम से कम बैग के नीचे मेरा हाथ तो थामे रह सकते थे।बुज़दिल।(लप्रेक)
(15)
पहली बार दोनों अग्रवाल स्वीट्स में मिले। इसलिए वो उसे कभी डोडा तो कभी गुलाब जामुन बुलाने लगी। लाल रंग के इस बोर्ड को दोनों ने अपने इश्क का नेमप्लेट बना लिया। खाप वालों ने शहर के तमाम अग्रवाल स्वीट्स पर पहरा बिठा दिया। दोनों सुंदर नगर के नत्थू स्वीट्स कार्नर में मिलने लगे। उसने मिठाइयों के नाम से बुलाना छोड़ दिया। पूछने पर बस यही कहा,वो जगह अपनी थी। ये जगह अजनबी है। अब तुम्हारा नाम ही भरोसा है।(लप्रेक)
(16)
अच्छा है न। मल्टीप्लेक्स ने मार्निंग शो का मतलब बदल दिया। वर्ना तो आना और निकलना ही मुश्किल था। देखो अब मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं। अक्षय कुमार को जी भर कूदने दो। इस वक्त हॉल में हमीं हैं। हमारे जैसे कुछ और जोड़े। बस। खाली कुर्सियों का शुक्रिया। तुम हमेशा अंधेरे में मुझे क्यों खोजते हो? इस एक सवाल ने सिनेमा हॉल को थाने में बदल दिया। वो कॉफी लाने चला गया।(लप्रेक)
(17)
बिस्तर के नीचे चुरा कर रखे गए नोट्स को उसने देख लिया। एक-एक पन्ने की तरह करवटें बदलने लगी। इम्तहान के करीब वाले महीने में उनका प्यार फोटोकॉपी मशीन से निकले नोट्स के पन्ने पर कालिख की तरह धुंधला हो गया। वो भी असली नोट्स बक्से में रखता और किसी दूसरे के नोट्स पर अपना नाम लिख कर उसकी फोटोकॉपी बिस्तर के नीचे। इम्तहानों के मौसम में प्रेम कहानियों के एंगल बदल जाया करते हैं। इश्क आईने में नज़र नहीं आता।(लप्रेक)
(18)
त्यागराज नगर से साउथ एक्स होते हुए दोनों पैदल ही दौड़ पड़े दिल्ली हाट की तरफ। दूर से ही बांसुरी, ढोलक की आवाज़ आने लगी। कश्मीरी व्यंजनों की महक सांसों से पेट में उतरने लगी। अंदर आते ही उसकी निगाह मणिपुरी शॉल पर टिक गई। वो खादी की सदरी में खो गया। दोनों शॉल और सदरी में ख़ुद को देखने लगे। एक दूसरे को देखना भूल गए।(लप्रेक)
(19)
मार्च के महीने में हवाएं गरम होने लगी थीं। दोनों की ज़िद कि ऑटोवाला दोनों तरफ का पर्दा गिरा दे। ऑटो के शोर में भी भीतर गज़ब की खामोशी छा गई। चालक की एक आंख बैक मिरर पर टिक गई। दोनों बैक मिरर से बचने के लिए एक दूसरे में छिपने लगे। चालक ने मीटर का हिसाब छोड़ दिया। ऑटो तेज़ी से शंकर रोड की तरफ दौड़ने लगा।(लप्रेक)
(20)
वेंकटेश्वर कॉलेज। क्लास की बेंच पर वो उसका नाम लिखने लगी। रेनॉल्ड पेन की निब घिस-घिस कर। महीने भर में सारे बेंच पर एक नाम उकेर कर रख दिया। तमाम तरह की गालियों और फूलों के बीच बेंच पर नीले रंग से लिखे उस एक नाम पर किसी की नज़र नहीं गई। कोई समझा क्यों नहीं कि इतिहास की पढ़ाई ऐसे ही होती है। दस्तावेज़ों में नाम उकेर कर।वो दीवारों,लकड़ियों,पन्नों को अपना साक्षी बनाने लगी।(लप्रेक)
(21)
मगध एक्सप्रेस,बोगी नंबर एस वन।दिल्ली से पटना लौटते वक्त उसके हाथों में बर्नार्ड शॉ देखकर वहां से कट लिया।लगा कि इंग्लिश झाड़ेगी। दूसरी बोगियों में घूम-घूम कर प्रेमचंद पढ़ने वाली ढूंढने लगा।पटना से आते वक्त तो कई लड़कियों के हाथ में गृहशोभा तक दिखा था।सोचते-सोचते बेचारा कर्नल रंजीत पढ़ने लगा। लफुआ लोगों का लैंग्वेज प्रॉब्लम अलग होता है(लप्रेक)
(22)
गोला देने गया होगा। दोस्तों की खीझ को छोड़ वो रोज़ 4 बजे पी जी वूमेन्स हॉस्टल की तरफ चल देता। हॉस्टल के बाहर जीवन,ज़मीन और जानम के विमर्श में मार्क्सवाद ठेलता रहता। कभी खुद को गंगा पार का ज़मींदार बताता तो कभी ग़रीब। दिल्ली की लड़कियों में सुनने का धीरज न होता तो बिहार यूपी से आए प्रवासी बांकुरे गोलाबाज़ न हो पाते। 5 बजते ही वो हर बार यही कहती।बहुत कंफ्यूजिंग है बट इंटरेस्टिंग हैं। वो खुश हो कर लौट आता।(लप्रेक)
(23)
आर्ची समझ गया। बेज़ुबान प्रेमियों को एक कार्ड की ज़रूरत थी। पर यह भी समझ आ गया कि नाकाम प्रेमियों के भाई-बहन में बदल जाने पर कार्ड की ज़रूरत पड़ेगी। बहनों को दिये जाने वाले कार्ड आकार और दाम में गर्लफ्रैंड वाले कार्ड जैसे ही होते। साउथ एक्स के आर्ची कार्नर में न जाने कितने रिश्ते इधर से उधर होते रहे। राखी के दिन आर्ची की दुकानें खाली तो रह जातीं मगर साल भर इन कार्डों की बिक्री कम नहीं होती।(लप्रेक)
(24)
पैदल चलने वाले जोड़े अक्सर कार में बैठे जोड़े से जला करते। खालसा कॉलेज से निकलती कारों की ढिन चिकवा म्यूज़िक और सामने की सीट पर बैठी बाला। माल रोड तक चलते-चलते वो अमीरी के साइड इफेक्ट पर थीसीस रच देता। आर्थिक विषमता प्रेम के मायने बदल देती है। ग़रीबी रेखा से नीचे वालों का प्यार खालसा से निकलती कार वाले क्या जानेंगे। कमलानगर जाकर चाचा के यहां आइसक्रीम खा लेना ही इश्क का इम्तहान नहीं है।(लप्रेक)
(1)
बहुत देर से जाम में फंसा वो तेज़ी से रन लेने की ख्वाहिशों से भर गया। हर रन जान की बाज़ी लगाकर बनाने लगा। स्टेडियम से आ रही तालियों की आवाज़ में एक आवाज़ ताली वाली की भी थी। गाड़ियां वहीं की वहीं खड़ी रह गईं। मास्टर के गुस्से से पसीना आने लगा था। प्रेम पत्र को एक कार्ड कंपनी ने छाप कर बेचने का एलान कर दिया। फिर भी भागा जा रहा था। जाम में फंसने के बाद भी भागने के अहसास से भागा जा रहा था।
(2)
रेडियो की आवाज़ आने लगी थी। उसकी कार धौलाकुआं से मुड़ कर एम्स की तरफ दौड़ने लगी थी। लौटने के फैसले का साहस नहीं जुटा सकी। न ही वो मोतीबाग से यू टर्न लेकर उसके पीछे आया। एक दूसरे के आने और मनाने के इंतज़ार में दोनों बहुत दूर चले गए। गाज़ीपुर पहुंच कर सामने गाज़ियाबाद था। शिवमूर्ति के बाद गुड़गांव आ चुका था। शहरों की प्रेम कहानियां ऐसी ही होती हैं। ट्रैफिक में शुरू होती है और ट्रैफिक में गुम हो जाती है।(लघु प्रेम कथा)
(3)
मोबाइल के इनबॉक्स में सेव मैसेज को वो आधी रात ही भेज देना चाहती थी। पता नहीं इस वक्त फोन उसके सिरहाने होगा या नहीं। क्या पता कोई और पढ़ ले और डिलीट कर दे। क्या पता वो पढ़ ले लेकिन किसी और को फारवर्ड कर दे। इसी उधेड़बुन में पंद्रह दिनों बाद इनबॉक्स में सेव मैसेज अपने आप उड़ गए। बाद में उसे याद ही नहीं आया कि कहना क्या चाहती थी। बहुत दिनों से उसका इनबॉक्स खाली है। न उसने लिखा न उसका आया। (लघु प्रेम कथा)
(4)
मायापुरी से मेट्रो में चढ़ते ही वो सीपी के सेंट्रल पार्क में होने के ख़्यालों से भर गया। अलकनंदा से चलते वक्त उसने हर दुकान के शीशे में खुद को देख लिया था। दोनों के साथ पूरी दिल्ली मिल रही थी। सेंट्रल पार्क में पहुंचते ही पहले से तय खंभे पर कोई और जोड़ा एक दूसरे को छूने की कोशिश कर रहा था। वक्त पर आ कर भी दोनों लेट हो चुके थे। दोनों ने फैसला किया। कल फिर मिलेंगे। यहीं मगर इस जोड़े से पहले।(लघु प्रेम कथा)
(5)
खानपुर से बदरपुर की बस में ढूंसी भीड़ ने दोनों को ऐसे शहर में पहुंचा दिया जहां उनके अलावा सब अजनबी थे। हर स्टॉप पर चढ़ने वाली भीड़ के धक्के से दोनों और करीब होते जा रहे थे। बस भाग तो रही थी सीधी मगर उन्हें हर बार लगा कि किसी मोड़ पर तेज़ी से मुड़ रही है और गिरने से बचाने के लिए एक दूसरे को थामना ज़रूरी है। शहर में प्रेम के ऐसे कोने अपने आप बन जाया करते हैं। भीड़ में घूरे जाने के बाद भी (लघु प्रेम कथा)
(6)
अक्सर साउथ एक्स पहुंच कर कुछ हो जाता था। मज़ा आने लगता था कि हर बस को छोड़ने में। सेल की भीड़ में खो जाने का लुत्फ। सस्ते सामानों से खुद को और मुनिरका के घर को सजाने का सपना, हर बार कुछ न कुछ अधूरा रह जाता। पूरा करने के लिए अगले दिन दोनों यही करते। हर बस को छोड़ने लगते।(लघु प्रेम कथा)
(7)
कार में रेडियो शोर करने लगा। मुनाफ़ आखिरी गेंद के लिए दौड़ चला था। दोनों भीतर से खामोश हो गए। कमेंटेटर की उत्तेजना के बीच दोनों ने खुद को संभालने का नाटक कर लिया था। आंखें मूंद कर बाहों में भर लिया एक दूसरे को। जैसे गेंद कार के शीशे पर आ लगने वाली हो। दोनों एक दूसरे से जकड़े ही रह गए। जामिया के बाहर लोग नाच रहे थे। मैच टाई हो चुका था।(लघु प्रेम कथा)
(8)
उस रोज़ के बाद वो अक्सर मुखर्जी नगर में भटकती दिख जाती। उससे नोट्स हड़पने के बाद उसने अपना फ्लैट बदल लिया था। वो आदत से मजबूर हो चुकी थी। मुखर्जी नगर का हर कमरा अंधेरा लगता जिसमें वो अपने प्रेम के उजाले से झांका करती। लेकिन वो अब हकीकतनगर के एक कमरे में उसके ही लिखे नोट्स को रट रहा था। तय कर लिया था। पीटी के टाइम में प्रेमी नहीं होना है। दीवार पर हसीना की तस्वीर नहीं थी। टाइम टेबल था। उसके बाप का सपना था। (लप्रेक)
(9)
बुराड़ी से वो पैदल ही चल निकला,आईएसबीटी की तरफ। खान मार्केट की एनडीएमसी कालोनी से वो पुराना किला की तरफ भागी, ऑटो के लिए। इसी आपाधापी में उसका फोन पुराना किला के पास गिर गया। वहां से निकलते एक जोड़े ने फोन में आए मैसेज पढ़ लिए। चलो हम भी इनके पीछे भाग जाते हैं। दिल्ली को खाप बनने के लिए छोड़ जाते हैं। (लप्रेक)
(10)
सराय जुलैना की हसीना थी वो। एस्कॉर्ट अस्पताल में भर्ती दिल के मरीज़ भी झांका करते, कैथ लैब की खिड़की से। छत पर आते ही उसके लोटस टेंपल तक हंगामा हो जाता था। चिराग दिल्ली का राजकुमार भिड़ गया मसीहगढ़ के प्रेमी से। होली फैमिली में दोनों भर्ती हो गए। तय नहीं हो सका कि वो किसकी है। नवभारत टाइम्स ने इस ख़बर को बॉटम में छाप कर खूब चटकारे लिए। पंजाब केसरी पीछे रह गया। (लप्रेक)
(11)
खिड़की के पीछे रखी चाबी से ताला खोल वो अंदर आ गई। किसी जासूस निगाह से कमरे को देखने लगी। उसके बक्से में वो तमाम ख़त मिले। जो आदमी इतने संबंधों में एक भी नहीं संभाल पाया वो उनके ख़तों को क्यों सहेजे हुए हैं। इसी उधेड़बुन में उसने एक खत लिखकर बक्से को बंद कर दिया। मैं जा रही हूं। हो सके तो मेरे ख़त को भी संभाल कर रखना। तुम्हें पता होगा पहले की तमाम प्रेमिकाएं मुझसे बेहतर लिखती हैं। मैंने जानबूझ कर कमतर लिखा है।(लप्रेक)
(12)
दक्षिण दिल्ली के महारानी बाग के पास का तैमूर नगर किस तैमूर की याद में बना है।पूछते ही वो भड़क गई। इतिहास के चक्कर में रहोगे तो प्रोफेसर बना कर सेमिनारों में गाड़ दिए जाओगे।चलो यहां से।किलोकरी गांव के पीछे से निकल कर यमुना के किनारे चलते हैं।अब बारी उसकी थी। वहां क्या करोगी।ओखला वालों ने नदी में मकान बना लिये हैं।अतिक्रमण सिर्फ प्रेम का नहीं मकानों,नदियों और हवाओं तक का हो चुका है। चैट करना सीख लो।(लप्रेक)
(13)
लाश बन कर वो बेवजन उसके बैग में घूमते हुए जाने किस सफर में स्टेशन पर छूट गई। किसके लिए बच गया था उसके बदन का गोदना। इस शहर में जिसे चाहना होता है,उसी के हाथों कटना होता है। टुकड़ों-टुकड़ों में बंटते हुए वो लड़की किन ख्यालों में खोई रही होगी और वो लड़का किसके ख्यालों से भाग रहा होगा। इश्क़ क़ातिल बना दे अच्छा, महबूब का क़त्ल हो जाए तो क्या अच्छा। प्रेमियों के बैग में क्या क्या होता है।(लप्रेक)
(14)
माइनस मुद्रिका में पीछे की किनारे वाली सीट मिल गई।उसने उसके कंधे पर सर टिका दिया।कब नींद आ गई और कब सरायकाले खां,आश्रम,धौलाकुआं,और वज़ीराबाद होते हुए जुबली हास्टल आ गया पता ही नहीं चला।वो खोई रही या सोई रही यह भी जान नहीं सका। वो तो बस उसकी तरफ आती हर निगाह से टकराने में भिड़ा रहा। उतरते वक्त उसने ठीक कहा,तुम मेरी कम दुनिया की फिक्र ज्यादा करते हो।कम से कम बैग के नीचे मेरा हाथ तो थामे रह सकते थे।बुज़दिल।(लप्रेक)
(15)
पहली बार दोनों अग्रवाल स्वीट्स में मिले। इसलिए वो उसे कभी डोडा तो कभी गुलाब जामुन बुलाने लगी। लाल रंग के इस बोर्ड को दोनों ने अपने इश्क का नेमप्लेट बना लिया। खाप वालों ने शहर के तमाम अग्रवाल स्वीट्स पर पहरा बिठा दिया। दोनों सुंदर नगर के नत्थू स्वीट्स कार्नर में मिलने लगे। उसने मिठाइयों के नाम से बुलाना छोड़ दिया। पूछने पर बस यही कहा,वो जगह अपनी थी। ये जगह अजनबी है। अब तुम्हारा नाम ही भरोसा है।(लप्रेक)
(16)
अच्छा है न। मल्टीप्लेक्स ने मार्निंग शो का मतलब बदल दिया। वर्ना तो आना और निकलना ही मुश्किल था। देखो अब मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं। अक्षय कुमार को जी भर कूदने दो। इस वक्त हॉल में हमीं हैं। हमारे जैसे कुछ और जोड़े। बस। खाली कुर्सियों का शुक्रिया। तुम हमेशा अंधेरे में मुझे क्यों खोजते हो? इस एक सवाल ने सिनेमा हॉल को थाने में बदल दिया। वो कॉफी लाने चला गया।(लप्रेक)
(17)
बिस्तर के नीचे चुरा कर रखे गए नोट्स को उसने देख लिया। एक-एक पन्ने की तरह करवटें बदलने लगी। इम्तहान के करीब वाले महीने में उनका प्यार फोटोकॉपी मशीन से निकले नोट्स के पन्ने पर कालिख की तरह धुंधला हो गया। वो भी असली नोट्स बक्से में रखता और किसी दूसरे के नोट्स पर अपना नाम लिख कर उसकी फोटोकॉपी बिस्तर के नीचे। इम्तहानों के मौसम में प्रेम कहानियों के एंगल बदल जाया करते हैं। इश्क आईने में नज़र नहीं आता।(लप्रेक)
(18)
त्यागराज नगर से साउथ एक्स होते हुए दोनों पैदल ही दौड़ पड़े दिल्ली हाट की तरफ। दूर से ही बांसुरी, ढोलक की आवाज़ आने लगी। कश्मीरी व्यंजनों की महक सांसों से पेट में उतरने लगी। अंदर आते ही उसकी निगाह मणिपुरी शॉल पर टिक गई। वो खादी की सदरी में खो गया। दोनों शॉल और सदरी में ख़ुद को देखने लगे। एक दूसरे को देखना भूल गए।(लप्रेक)
(19)
मार्च के महीने में हवाएं गरम होने लगी थीं। दोनों की ज़िद कि ऑटोवाला दोनों तरफ का पर्दा गिरा दे। ऑटो के शोर में भी भीतर गज़ब की खामोशी छा गई। चालक की एक आंख बैक मिरर पर टिक गई। दोनों बैक मिरर से बचने के लिए एक दूसरे में छिपने लगे। चालक ने मीटर का हिसाब छोड़ दिया। ऑटो तेज़ी से शंकर रोड की तरफ दौड़ने लगा।(लप्रेक)
(20)
वेंकटेश्वर कॉलेज। क्लास की बेंच पर वो उसका नाम लिखने लगी। रेनॉल्ड पेन की निब घिस-घिस कर। महीने भर में सारे बेंच पर एक नाम उकेर कर रख दिया। तमाम तरह की गालियों और फूलों के बीच बेंच पर नीले रंग से लिखे उस एक नाम पर किसी की नज़र नहीं गई। कोई समझा क्यों नहीं कि इतिहास की पढ़ाई ऐसे ही होती है। दस्तावेज़ों में नाम उकेर कर।वो दीवारों,लकड़ियों,पन्नों को अपना साक्षी बनाने लगी।(लप्रेक)
(21)
मगध एक्सप्रेस,बोगी नंबर एस वन।दिल्ली से पटना लौटते वक्त उसके हाथों में बर्नार्ड शॉ देखकर वहां से कट लिया।लगा कि इंग्लिश झाड़ेगी। दूसरी बोगियों में घूम-घूम कर प्रेमचंद पढ़ने वाली ढूंढने लगा।पटना से आते वक्त तो कई लड़कियों के हाथ में गृहशोभा तक दिखा था।सोचते-सोचते बेचारा कर्नल रंजीत पढ़ने लगा। लफुआ लोगों का लैंग्वेज प्रॉब्लम अलग होता है(लप्रेक)
(22)
गोला देने गया होगा। दोस्तों की खीझ को छोड़ वो रोज़ 4 बजे पी जी वूमेन्स हॉस्टल की तरफ चल देता। हॉस्टल के बाहर जीवन,ज़मीन और जानम के विमर्श में मार्क्सवाद ठेलता रहता। कभी खुद को गंगा पार का ज़मींदार बताता तो कभी ग़रीब। दिल्ली की लड़कियों में सुनने का धीरज न होता तो बिहार यूपी से आए प्रवासी बांकुरे गोलाबाज़ न हो पाते। 5 बजते ही वो हर बार यही कहती।बहुत कंफ्यूजिंग है बट इंटरेस्टिंग हैं। वो खुश हो कर लौट आता।(लप्रेक)
(23)
आर्ची समझ गया। बेज़ुबान प्रेमियों को एक कार्ड की ज़रूरत थी। पर यह भी समझ आ गया कि नाकाम प्रेमियों के भाई-बहन में बदल जाने पर कार्ड की ज़रूरत पड़ेगी। बहनों को दिये जाने वाले कार्ड आकार और दाम में गर्लफ्रैंड वाले कार्ड जैसे ही होते। साउथ एक्स के आर्ची कार्नर में न जाने कितने रिश्ते इधर से उधर होते रहे। राखी के दिन आर्ची की दुकानें खाली तो रह जातीं मगर साल भर इन कार्डों की बिक्री कम नहीं होती।(लप्रेक)
(24)
पैदल चलने वाले जोड़े अक्सर कार में बैठे जोड़े से जला करते। खालसा कॉलेज से निकलती कारों की ढिन चिकवा म्यूज़िक और सामने की सीट पर बैठी बाला। माल रोड तक चलते-चलते वो अमीरी के साइड इफेक्ट पर थीसीस रच देता। आर्थिक विषमता प्रेम के मायने बदल देती है। ग़रीबी रेखा से नीचे वालों का प्यार खालसा से निकलती कार वाले क्या जानेंगे। कमलानगर जाकर चाचा के यहां आइसक्रीम खा लेना ही इश्क का इम्तहान नहीं है।(लप्रेक)
ग़ज़ल-तहसीन मुनव्वर
फिर वही भूली कहानी है क्या
फिर मैरी आँख में पानी है क्या
फिर मुझे उसने बुलाया क्यों है
फिर कोई बात सुनानी है क्या
ज़िन्दगी हो गयी सुनते सुनते
हम को यह मौत भी आनी है क्या
आज फिर मुसकुरा के देखा है
आज फिर आग लगानी है क्या
मुझ क्यों देख रहे हो ऐसे
मैरी तस्वीर बनानी है क्या
रोज़ क्यों गिर रही है उसकी पतंग
उस को दीवार गिरानी है क्या
फिर मैरी आँख में पानी है क्या
फिर मुझे उसने बुलाया क्यों है
फिर कोई बात सुनानी है क्या
ज़िन्दगी हो गयी सुनते सुनते
हम को यह मौत भी आनी है क्या
आज फिर मुसकुरा के देखा है
आज फिर आग लगानी है क्या
मुझ क्यों देख रहे हो ऐसे
मैरी तस्वीर बनानी है क्या
रोज़ क्यों गिर रही है उसकी पतंग
उस को दीवार गिरानी है क्या
सोसायटी के सिटीजन

दक्षिण पश्चिम दिल्ली में योजना स्वरूप पैदा किया गया एक नगर है द्वारका। उसी के साउथ दिल्ली हाउसिंग सोसायटी में इस आइसक्रीम कार्ट पर नज़र पड़ गई। अपने आप में संपूर्ण किराने की दुकान। बल्कि आप इसे किराने की दुकान का एक्सटेंशन भी कह सकते हैं। इस दुकान में सब कुछ है। शेविंग क्रीम, टूथपेस्ट, मंजन, सॉस, शैम्पू,रेज़र,कोल्ड ड्रींक,मैगी,साबुन,सर्फ, मच्छर मारने वाला हिट,माचिस आदि आदि। चावल आदि के छोटे पैकेट। ज्यादा बड़ा ऑर्डर करना है तो फोन कर दीजिए शाम तक सामान आ जाएगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह ठेला-दुकान सोसायटी के अंदर खड़ी है। यानी सोसायटी की कमेटी ने इसकी अनुमति दी होगी। दरबान ने बताया कि मेरा भाई भी एक ठो दुकान खोला है। हिमालट सोसायटी में। सब कुछ मिलता है उसमें।
इस प्रवृत्ति पर ग़ौर करना चाहिए। हम दुकानों से घिरे बिना नहीं रह सकते। आप चाहें जितना मर्जी सेक्टर काट लें, हर सेक्टर में मार्केट दे दें मगर हम आदतन दुकान को अपने पड़ोस में ही देखना चाहते हैं। द्वारका के कई सेक्टरों में मार्केट है। फिर भी हर सोसायटी से मार्केट की दूरी अधिक है। कम से कम सौ दो मीटर तो होगी ही। अब आप इसे वक्त की कमी कह लें या फिर आलस्य की अधिकता,आदमी करे तो क्या करे। कितना फोन करे और कितना होम डिलीवरी करवाये। होम डिलीवरी से अच्छा है डोर डिलीवरी का ही जुगाड़ खोज लिया भाई लोगों ने। सोसायटी के भीतर ही दुकान खुलवा दी। दरबान के आस-पास के स्पेस का दुकान के लिए इस्तमाल। हम किराने और टीवी की दुकान में फर्क करने वाले लोग हैं। खुदरा-खुदरी के लिए हमारे ज़हन में अलग सा स्पेस बना हुआ है।
इससे एक हद तक यह भी ज़ाहिर होता है कि हमारे भीतर से मोहल्ला सिस्टम वाला सुकून अभी गया नहीं है। आजकल की सोसायटी लुक पर आधारित है। ताकि देखने में हैवन सिटी लगें हैवान सिटी नहीं। इसलिए दुकानों के प्रति असहनशीलता पैदा करने की नकली कोशिश की जा रही है। कई लोग मुझसे आकर कहते हैं कि इस पर रिपोर्ट बनाइये। आप अमेरिका तो गए होंगे वहां देखा है कभी। यहां तो कोई अनुशासन ही नहीं है। गेट पर ही दुकानें खुल गई हैं। पार्किंग में प्रॉब्लम होती है। सबकुछ पार्किंग तो नहीं तय करेगी न। मेरा उन्हें यही जवाब होता है कि भाई साहब हम हिन्दी के पत्रकार हैं। मुज़फ्फरनगर और हरिद्वार का ही भ्रमण-विश्लेषण करते रहते हैं। इसलिए न्यूयार्क की ठेलागीरी के बारे में ज़्यादा पता नहीं है।
दुकान हमारे लिए सेक्टर नहीं है। बल्कि घर का हिस्सा है। इसीलिए आप देखेंगे कि जहां भी सोसायटी खुलती है उसी के गेट पर सबसे पहले कपड़े प्रेस करने वाले का स्वागत किया जाता है। सोसायटी की दीवार से झोंपड़ी की छत टिकाकर काम चालू कर देता है। धीरे-धीरे गेट के आस-पास आइसक्रीम की ठेलागाड़ी खड़ी होने लगती है। फिर ठेले पर सब्ज़ी,आम और अमरूद लेकर खड़ा हो जाता है। कई बार सोसायटी के बाहर ठेले पर कालीन वाले लादकर आ जाते हैं। इंतज़ार करते रहते हैं। साइकिल पर झाड़ू,पोछा वाला सामान ले आता है। हर सोसायटी के खंभे में कई दुकानों के नंबर ठोक दिए गए हैं। सोसायटी के बाहर का स्पेस अस्थायी बाज़ार से भर जाता है। इसकी कुछ दुकानें हर दिन बदलती भी रहती हैं। एक दिन कूकर बनाने वाला आया तो एक दिन कंबल बेचने वाला आएगा। कुछ स्थायी होते हैं। जैसे दर्जी, धोबी। सोसायटियों में हर पखवाड़े एक पत्रिका आती है जिसमें सभी दुकानों के नाम,नंबर और तस्वीरें होती हैं। डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक का भी विज्ञापन दे देते हैं। पहले अच्छे डॉक्टर को पूरा इलाका जानता था अब पड़ोसी को ही नहीं मालूम है उनकी खासियत।
इस तरह से देंखे तो रिटेल का भी रिटेलीकरण होने लगा है। हम बड़े-बड़े मॉल से घिर गए हैं। फिर भी लघुतम दुकानों की महिमा अपरंपार बनी हुई है। अच्छा होता अगर हर सोसायटी में कपड़ा प्रेस करने वाले के लिए एक सुंदर सी जगह बना दी जाती। एक छोटी सी दुकान दे दी जाती है। जहां से चाय और साबुन शैम्पू की ज़रूरतें पूरी हो जातीं। आखिर सोसायटी की दरबानी में लगी फौज को भी दैनंदिन मार्केट चाहिए। चाय और चमचम बिस्कुट हेतु। मगर इसकी जगह हो यह रहा है कि कई सोसायटी जहां फ्लैट की संख्या ज्यादा है,अपने सामने के हिस्से को कमर्शियल एरिया में बदल रहे हैं। उनमें बड़ी-बड़ी दुकानें खुल रही हैं। स्पा से लेकर जिम तक। कुछ सोसायटी मिनी मॉल का निर्माण कर रही हैं। शायद इन्होंने भारतीय मानस को कुछ समझा है। कई सोसायटी तो अपनी बाउंड्री लाइन पर एटीएम काउंटर भी खोलने दे रही है। हर सोसायटी में एक मंदिर भी बनने लगा है। पुराना मोहल्ला सिस्टम हाउसिंग सोसायटियों में चुपके-टुपके और चोर दरवाजे से घुसने लगा है। मॉल की अवधारना बिखकर सोसायटी की दीवारों से चिपक रही है।
हाउसिंग सोसायटियों का नियोजन देखें तो एक किस्म का विस्थापन दिखता है। बड़ी-बड़ी सड़कें, अपनी दीवार,अपना गेट। कॉमन के नाम सबकुछ पर्सनल होता जा रहा है। सोसायटी में रहने वाले सिटीजन के अलावा बाकी सबको जबरन ठेल कर दूर किया जाता है। ग़ैर सोसायटी सिटीजन की कार अंदर नहीं आएगी। सोसायटी सिटीज़न की कार के लिए अलग से स्ट्रिकर होता है। आगंतुक के लिए कई नियम बना दिये गए हैं। आने से पहले रजिस्टर पर साइन करो, फिर फोन करो। इससे कुछ सुविधा तो है मगर अजनबीयत का भाव और गहरा कर जाता है। दरबान इस दबाव से मुक्त रहता है कि आने जाने वाले की पहचान करनी है। वो बस रजिस्टर पर आगंतुक के आधू-अधूरे पते और गिचमिच से दस्तखत को देखकर खुश हो लेता है। इन रजिस्टरों का अध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि एक किस्म के विरोध और झुंझलाहट में दस्तखत किये गए हैं। बहुत कम लोग हैं जो हर कॉलम में सही या पूरी जानकारी भरते हैं। कई बार तो दरबान से झगड़ा भी करते हैं। अब दरबान तो कोई नहीं कहता। गार्ड ही हो गए हैं दरबान साहब। मेरे बड़े भाई मिलने आए, गेट पर ही झगड़ बैठे। उन्हें अपमान लगा। सोसायटी भले ही उनके और मेरे बीच फर्क करे मगर भाई साहब के लिए तो मेरा घर भी उन्हीं का है और वो अपने घर में आने के लिए पहचान क्यों साबित करें।
यह भी उचित है कि सोसायटी भयंकर असुरक्षा भावों का समुच्य है। सुरक्षा के नियम तो सबके लिए एक से ही बनेंगे। लेकिन रोज़ाना होने वाले झगड़े बताते हैं कि ज्यादतर लोगों को यह व्यवस्था स्वीकार करने में दिक्कत आती है। अब कौन कार से उतरे और रिजस्टर पर साइन करे। गेट पर पहुंच कर लगता है कि दरवाज़ा खुले और लिफ्ट में। दरबानों से पूछिये उन्हें किस तरह से डांट खानी पड़ती है। रजिस्टर सिस्टम बेकार साबित हो रहे हैं। फिर भी लोग इनकी समीक्षा करने से कतराते हैं। इसके बाद भी सोसायटी से माल गायब हो रहे हैं। आखिर सुरक्षा का इंतज़ाम निजी स्तर पर नहीं हो सकता। हमें एक न एक दिन राज्य से पूछना होगा कि आप हमारी सुरक्षा के लिए क्या कर रहे हैं? प्राइवेट पुलिस से खास लाभ नहीं हो रहा है। फ्लैट में चोरियां हो रही हैं। जब तक इन दरबानों के अधिकार स्पष्ट नहीं किये जायेंगे,इनका होना या न होना बराबर है। सुरक्षा चांस की बात है।
इसी ज़रूरत ने सोसायटी के भीतर इंटर कॉम का बाज़ार पैदा कर दिया है। वीडियो इंटरकॉम से लेकर वॉयस इंटरकॉम तक का बाज़ार। हर सोसायटी का अपना परिचय पत्र सिस्टम है जो वहां आने वाली कामवालियों,ड्राइवरों को दिखाना होता है। आप किसी भी सोसायटी में जाए तो रजिस्टर के बगल में ढेरों आई कार्ड दिख जाएगा। कमला,आशा और सुनीता का। कुछ दिनों बाद कामवाली आई कार्ड फेंक कर चली जाती हैं। दरबान देखता भी नहीं। यानी वही पुराना सिस्टम। जब वह पहचानने लगता है तब वह बिना कार्ड की चेकिंग के अंदर आने देता है। मगर हम सारा विकल्प बाज़ार में ढूंढ रहे हैं। समाज में नहीं। जल्दी ही सोसायटी में डिजीटल सिग्नेचर बोर्ड लगने लगेंगे।
दीवाली और न्यू ईयर पार्टी दो ऐसे मौके हैं जहां सब आकर नाच खा जाते हैं। यह कहते हुए कि कम से कम इसी बहाने मिलना जुलना तो हो गया। सब हां हूं करके सहमति दे देते हैं। लेकिन अगले ही दिन सब एक दूसरे को भूल कर अपने अपने फ्लैट में गुम हो जाते हैं। गौर से देखिये तो सोसायटी में इन आशंकाओं की कीमत हम अपनी गाढ़ी कमाई से चुका रहे हैं। साल में हज़ारों रुपये देकर। अच्छा पहलू यह है कि सोसायटी भी रोज़गार पैदा कर रही है। हर हाउसिंग सोसायटी एक फैक्ट्री की तरह लगता है। जहां काम करने हर दिन सैंकड़ों किस्म के लोग आते हैं। ड्राइवर, दरबान, कामवाली, खाना बनानेवाली, बढ़ई, धोबी, केबल वाला आदि-आदि। इनकी बदौलत कुछ पेड़ पौधों की संख्या भी बढ़ गई है। मेरे कहने का मतलब यह है कि हमें हाउसिंग सोसायटी की कुछ खूबियों और पुराने मोहल्ला सिस्टम की कुछ खूबियों को मिलाकर नए सिरे से प्लानिंग करनी चाहिए।
हम भारतीय लोग इस तरह से रहने के अभ्यस्त नहीं हैं। यह सही है कि सोसायटी के सिटीजन एक दूसरे से कम परिचित होते हैं इसलिए असुरक्षा भाव ज्यादा होता होगा। पुराने मोहल्ला या शहरी सिस्टम में लोग पड़ोसी के रिश्तेदार तक का नाम और गांव जानते थे। अब तो कोई किसी के घर से सामान लेकर जा रहा हो तो फ्लैट वाले पड़ोसी इस लिहाज़ से नहीं टोकेंगे कि किसी को बुरा न लग जाए। पुराने मोहल्लों में दरबान नहीं होते थे। घर से निकलिए कि बाहर बुढ़ापा काट रहे कोई दादा जी टोक देते थे। कहां से ला रहे हो और किसके घर जा रहे हैं। हमने अजनबीयत का जो संस्कार ज़बरन ओढ़ा है उसके लिए खूब कीमत चुका रहे हैं। सोसायटी में हर महीने डेढ़ से तीन हज़ार का मेंटेनेंस कॉस्ट देकर। अजीब-अजीब वर्दियों वाली निरीह सेना खड़ी करके। इनके ख़ून में यह संस्कार अभी तक आया ही नहीं है कि सोसायटी की रक्षा करते हुए कैसे शहीद हुआ जाए। ज़रा सा धमका दीजिए, तीन हज़ार से भी कम पर काम करने वाला गार्ड आपको रास्ता दे देगा। गार्ड भी क्या करे। हर तीन महीने पर उसे भी तो बदल दिया जाता है।
हम चाहें जितनी सोसायटी बना लें और उनके नाम यूरोपीय रख दें। रॉयल कासल,गार्डेनिया या फिर ड्रीम सिटी। हमारी तबीयत में वह नहीं है जो आर्किटेक्ट अपने नक्शे में खींचता है। इसीलिए आप ग्रेटर नोएडा से गुज़रे तो उसकी प्लानिंग पर दिल आ जाए मगर उस जगह से दिली रिश्ता नहीं बनता है। ज़ाहिर है प्लानिंग में सामाजिकता की बड़ी कमी है। उसमें हमारे रहने के तौर तरीके या संस्कार का समायोजन नहीं है। तभी तो सोसायटी के आदेश से दक्षिण दिल्ली हाउसिंग सोसायटी ने ठेलागीरी को अंदर आने की अनुमति दे दी है। कब तक आप ढोंग करेंगे। यह कहानी सिर्फ दिल्ली की नहीं है। भोपाल,जयपुर,मेरठ हर शहर एक जैसे हो रहे हैं। कुछ दिनों में जयपुर और भोपाल में फर्क नहीं रहेगा। वहां भी गार्डेनिया और यहां भी गार्डेनिया। वहां भी ओमेक्स, डीएलएफ यहां भी ओमेक्स,डीएलएफ। शहर बनता है अपने समाजों के संयोजन से न कि इमारतों के रंगरोगन से।
कौन बनेगा किसान
खेती के उत्पादन संबंध जस के तस है। एक गन्ने के खेत में काम कर रहीं सभी बीस महिलाएं हरिजन थीं। सभी बेगार काम कर रही थीं। नकद मज़दूरी की जगह सभी तीस किलो चारे के लिए गन्ने की कटाई कर रही थीं। आठे घंटे की मज़दूरी की कीमत घास है। खेती के जटिल किस्सों को पंद्रह मिनट में समेटना मुश्किल है लेकिन देखियेगा आज रात साढ़े नौ बजे रवीश की रिपोर्ट। कौन बनेगा किसान। शनिवार रात साढ़े दस बजे विश्व कप के कारण नहीं आएगा। रविवार साढ़े ग्यारह बजे देख सकते हैं।
गांवों का पब्लिक ट्रांसपोर्ट
सहारनपुर गया था। गांवों की सड़कें काफी टूटी हुई मिलीं। रास्ता पूछते-पूछते इस ट्रैक्टर पर नज़र पड़ी। गांवों में स्कूलों ने बच्चों को ढोने के लिए तरह-तरह के जुगाड़ निकाले हैं। ट्रैक्टर की ट्राली में तिरपाल जैसी टिन की छत से ढंक दिया गया है। ट्रॉली बड़ी है। बीच में दोनों तरफ से बैठने के लिए बेंच लगे हैं। किनारे किनारे भी बेंच लगे हैं। बच्चों को बैठे देखा तो विचित्र लगा। खड्डे जैसी सड़कों में जब यह ट्रैक्टर गचक-गचक करता होगा तो काठ की बेंच में बैठे बच्चे भी कूदने लगते होंगे।
वैसे एक बात और ध्यान देने लायक है। इंग्लिश माध्यम पब्लिक स्कूलों को गांवों ने अपने तरीके से अपनाया है। शहरों में जाते होंगे हाई मिडिल क्लास के शहज़ादे टाई पहनकर एयरकंडीशन पीली बस में। स्कूल बसों का रंग पीला ही होने लगा है। दिल्ली में तो एक से एक विशालकाय वोल्वो टाइप की स्कूल बसें दिखती हैं जैसे स्कूल नहीं जयपुर जा रहे हों। गांवों ने भी पीले रंग को अपनाया है। ट्रैक्टर की ट्राली को पीले रंग से रंग दिया गया है और सवार बच्चे टाई लगा कर बैठे हैं। हिन्दुस्तान कम से कम में एडजस्ट करना जानता है। हमी महानगर वाले फालतू में मनी फूंक देते हैं।
गांवों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट का विकास नहीं हुआ। पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बहस शहर की बपौती मान ली गई। इसलिए आज भी गांवों में लोग भैंसा गाड़ी और बैलगाड़ी से चल रहे हैं। कम पैसे वाले स्कूल बस नहीं रख सकते तो तीन चार ट्रैक्टर में ट्रालियां लगाकर ही सौ रुपये महीने के रेट से बच्चों को ढो रहे हैं। स्कूल के काम के बाद ट्रैक्टर खेती के काम आ सकता है। टू इन वन हो गया। बारात भी इसमें जा सकती है।
दिल्ली का मार्कोपोलो
पैंसठ और पैंतालीस लाख वाली डीटीसी की हरी और लाल बसों के मॉडल का नाम है मार्कोपोलो। तेरहवीं सदी का यात्री। इटली से आया था और एशिया घूमते हुए कोरोमंडल के तटीय इलाकों में पहुंचा था। आज मार्को दिल्ली आ जाए तो उसका माथा ख़राब हो जाए। बसों में घूमते हुए दिल्ली की एक अलग संस्कृति का पता चलता है। जो पहले से अलग है और बेहतर भी हुई है। कुछ संस्कृतियां पहले वाली ही चली आ रही हैं। जो डीटीसी हर दिन दस लाख किमी की यात्रा करते हुए तीस लाख यात्रियों को ढोती है उसकी कामयाबी या परेशानी की कोई कहानी नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है? बिना किसी नायक या गाथा के इसकी बसें हर दिन सुबह पांच बजे से लेकर चौबीसों घंटे दिल्ली की सड़कों पर होती हैं। अख़बारों में मेट्रो ही मेट्रो है। मेट्रो की परेशानियां मीडिया द्वारा गढ़ी गई उसकी छवि को भी नहीं तोड़ पाती है। दूसरी तरफ डीटीसी है जो बिना किसी छवि के ही चली जा रही है।
आपने देखा होगा कि मेट्रो से जुड़ी सभी बड़ी और सुखद ख़बरें ज्यादातर अंग्रेज़ी अखबारों में आती हैं। टेलीविजन के पत्रकारों को मेट्रो में झांकने का मौका तभी मिलता है जब कहीं से कहीं की मेट्रो को झंडा दिखाया जाता है। मेट्रो ने जानबूझ कर टीवी को दिल्ली में बन रही इस आधुनिक लोक संस्कृति से दूर रखा है। मैंने भी कई बार कोशिश की। कई महीनों तक। जवाब यही मिलता है कि सुरक्षा के कारण मेट्रो में कैमरे की अनुमति नहीं है। वैसे अंग्रेजी के कुछ अत्यंत बड़े संपादकों के साथ श्रीधरण जी अपने टनल में बतियाते मिल जाते हैं। पा फिल्म की शूटिंग में मेट्रो को भीतर से देख लेने से कोई खतरा नहीं पैदा हुआ। मगर टीवी रिपोर्टर के लिए अजीब-अजीब दलीले हैं। वो शायद इसलिए इन बौराये और उत्साही रिपोर्टरों को साधना मुश्किल है। वो जो दिखेगा वैसा दिखा देंगे। ये तो भला हो उस टेक्निकल स्नैग का जिसके कारण थोड़ी बहुत मेट्रो की आलोचना हो जाती है। वैसे आलोचना भी नहीं होती है। मेट्रो के प्रेस मैनेजमेंट ने बहुत चालाकी से एक छवि बनाई है।
मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि मेट्रो के आने जाने का दिल्ली को कोई लाभ नहीं है। मेट्रो आठ साल से चल रही है। रोज़ाना दस लाख यात्री ही ढो पाती है। चालीस हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश किया गया। इससे दशांश भी डीटीसी में निवेश नहीं हुआ। फिर भी डीटीसी आज मेट्रो से तीन गुना ज़्यादा यात्रियों को ढोती है। डीटीसी के कर्मचारी और अधिकारी शिकायत करते मिले कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दो महीने तक घर नहीं गए। हमारी एफिशियेंसी सौ फीसदी रही। एक भी बस का ब्रेक डाउन नहीं हुआ। हमने बस के पीछे बस लगा रखे थे। विदेशी यात्रियों ने हमारे बारे में इतनी अच्छी बातें लिखीं हैं मगर हमारा किसी ने ज़िक्र तक नहीं किया।
मेट्रो में जिस तरह छवियों को लेकर नियंत्रण का जुनून है डीटीसी में नहीं है। चेयरमैन नरेश कुमार के इंटरव्यू के बाद भी अधिकारी बेखौफ अपने दिल की बात बोलते रहे। डीटीसी के लोगों ने सबसे पहले अपनी कमियों को ही दिखाया और माना। कहा कि हम सुधर रहे हैं। जल्दी ही हम मुनाफे में आने वाले हैं। डीटीसी की डेमोक्रेसी मुझे मेट्रो के छवि नियंत्रण से बेहतर लगी। किसी ने मुझे मैनेज करने की कोशिश नहीं की। बल्कि नरेश कुमार ने फोन कर कहा जो भी फीड बैक मिला है, मुझे बतायेंगे। मैंने कहा कि ड्राईवरों के रहने का कमरा बहुत ख़राब है। उसे ठीक कर दीजिए। उन्होंने कहा कि हम कर देंगे। लोगों ने कितनी गाली दी ये भी बता दीजिए।
मेरा फोकस इस पर नहीं है कि डीटीसी देर से आती है या नहीं आती है। मेरा फोकस इस बात पर है कि बत्तीस हज़ार से अधिक कर्मचारियों का यह महकमा चलता कैसे हैं। बिना किसी श्रीधरण साहब जैसे कद्दावर शख्सियत के। नरेश कुमार ने कुछ श्रेय ही लेने की कोशिश नहीं की। ऐसे इंटरव्यू दिया जैसे आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं। ड्राईवरों से ही बात कर लीजिए। अब मैं क्या कह सकता हूं। सबका सहयोग है चल रहा है। बस दो तीन महीने में हम घाटे से उबर जायेंगे। एक डेढ़ साल पहले डीटीसी चालीस रुपये प्रति किमी के घाटे में चल रही थी अब यह घाटा कम हो कर पांच सात रुपये प्रति किमी रह गया है। डीटीसी में हर दिन हर बस के चलने, ईंधन की खपत, यात्रियों की संख्या और कमाई का हिसाब लिखा जाता है। अगले दिन आपको पूरा डिटेल मिल जाएगा कि कितने लोगों ने सफर की और बस ने फेरे लगाने में कितनी चूक की।
डीटीसी के नंबरों की शुरूआत छब्बीस से शुरू होती है। चार सौ बीस नंबर की बस नहीं है लेकिन सौ नंबर की है। मुद्रीका का एक फेरा एक सौ दस किमी का होता है। ज्यादातर ड्राईवर बिना ब्रेक के इसे साढ़े पांच घंटे में पूरी करते हैं। उसके बाद छुट्टी। डीटीसी का दावा है कि मुद्रीका का अधिकतम किराया पंद्रह रूपये है। एक सौ दस किमी इतने सस्ते में कहीं नहीं जा सकते। मुद्रीका रिंग सेवा को कहते हैं। यह भी पता चला कि डीटीसी के ज़्यादतर ड्राईवरों के नाम अनिल, सुनील और राजेश हैं। एक से बेवकूफी भरा सवाल किया तो सही जवाब दिया मुझे। राहुल गांधी नाम होता तो कांग्रेस के अध्यक्ष न बन जाते। ड्राईवरी नहीं करनी पड़ती।
यह भी पता चला कि डीटीसी में ढाई हज़ार पुरानी बसें हैं। जिनकी बुक वैल्यू ज़ीरो है। मगर वो भी ढुलाई और कमाई में पैंतालीस और पैंसठ लाख की बसों से कम नहीं हैं। कुछ राजनीति रूट भी हैं जो नेताओं के दबाव में चलाईं गईं हैं। इनमें काफी घाटा है। प्राइवेट बस वाले अपने स्टाफ बिठा देते हैं डीटीसी की बसों में ताकि डीटीसी को कम यात्री मिले। बेटिकट यात्रियों का अलग सामाजिक अध्ययन किया जा सकता है। लड़के और लड़कियां दोनों ही टिकट न लेने में माहिर हैं। टिकट चेक करने वालों के साथ पकड़े जाने पर किये जाने वाले बहानों के किस्से सुन कर खूब मजा आया। कोशिश यही है कि हम एक संगठन को भीतर से देख सकें कि वो कैसे पिछले तिरेसठ सालों से दिल्ली की जीवन रेखा है। इसी डीटीसी को समझने की कोशिश की है इस बार रवीश की रिपोर्ट में। देखियेगा। FRI-9:30PM, SAT-10:30AM, 10:30PM, SUNDAY-11:30PM, MONDAY-11:30AM
आपने देखा होगा कि मेट्रो से जुड़ी सभी बड़ी और सुखद ख़बरें ज्यादातर अंग्रेज़ी अखबारों में आती हैं। टेलीविजन के पत्रकारों को मेट्रो में झांकने का मौका तभी मिलता है जब कहीं से कहीं की मेट्रो को झंडा दिखाया जाता है। मेट्रो ने जानबूझ कर टीवी को दिल्ली में बन रही इस आधुनिक लोक संस्कृति से दूर रखा है। मैंने भी कई बार कोशिश की। कई महीनों तक। जवाब यही मिलता है कि सुरक्षा के कारण मेट्रो में कैमरे की अनुमति नहीं है। वैसे अंग्रेजी के कुछ अत्यंत बड़े संपादकों के साथ श्रीधरण जी अपने टनल में बतियाते मिल जाते हैं। पा फिल्म की शूटिंग में मेट्रो को भीतर से देख लेने से कोई खतरा नहीं पैदा हुआ। मगर टीवी रिपोर्टर के लिए अजीब-अजीब दलीले हैं। वो शायद इसलिए इन बौराये और उत्साही रिपोर्टरों को साधना मुश्किल है। वो जो दिखेगा वैसा दिखा देंगे। ये तो भला हो उस टेक्निकल स्नैग का जिसके कारण थोड़ी बहुत मेट्रो की आलोचना हो जाती है। वैसे आलोचना भी नहीं होती है। मेट्रो के प्रेस मैनेजमेंट ने बहुत चालाकी से एक छवि बनाई है।
मेरे कहने का मतलब यह नहीं कि मेट्रो के आने जाने का दिल्ली को कोई लाभ नहीं है। मेट्रो आठ साल से चल रही है। रोज़ाना दस लाख यात्री ही ढो पाती है। चालीस हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश किया गया। इससे दशांश भी डीटीसी में निवेश नहीं हुआ। फिर भी डीटीसी आज मेट्रो से तीन गुना ज़्यादा यात्रियों को ढोती है। डीटीसी के कर्मचारी और अधिकारी शिकायत करते मिले कि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान दो महीने तक घर नहीं गए। हमारी एफिशियेंसी सौ फीसदी रही। एक भी बस का ब्रेक डाउन नहीं हुआ। हमने बस के पीछे बस लगा रखे थे। विदेशी यात्रियों ने हमारे बारे में इतनी अच्छी बातें लिखीं हैं मगर हमारा किसी ने ज़िक्र तक नहीं किया।
मेट्रो में जिस तरह छवियों को लेकर नियंत्रण का जुनून है डीटीसी में नहीं है। चेयरमैन नरेश कुमार के इंटरव्यू के बाद भी अधिकारी बेखौफ अपने दिल की बात बोलते रहे। डीटीसी के लोगों ने सबसे पहले अपनी कमियों को ही दिखाया और माना। कहा कि हम सुधर रहे हैं। जल्दी ही हम मुनाफे में आने वाले हैं। डीटीसी की डेमोक्रेसी मुझे मेट्रो के छवि नियंत्रण से बेहतर लगी। किसी ने मुझे मैनेज करने की कोशिश नहीं की। बल्कि नरेश कुमार ने फोन कर कहा जो भी फीड बैक मिला है, मुझे बतायेंगे। मैंने कहा कि ड्राईवरों के रहने का कमरा बहुत ख़राब है। उसे ठीक कर दीजिए। उन्होंने कहा कि हम कर देंगे। लोगों ने कितनी गाली दी ये भी बता दीजिए।
मेरा फोकस इस पर नहीं है कि डीटीसी देर से आती है या नहीं आती है। मेरा फोकस इस बात पर है कि बत्तीस हज़ार से अधिक कर्मचारियों का यह महकमा चलता कैसे हैं। बिना किसी श्रीधरण साहब जैसे कद्दावर शख्सियत के। नरेश कुमार ने कुछ श्रेय ही लेने की कोशिश नहीं की। ऐसे इंटरव्यू दिया जैसे आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं। ड्राईवरों से ही बात कर लीजिए। अब मैं क्या कह सकता हूं। सबका सहयोग है चल रहा है। बस दो तीन महीने में हम घाटे से उबर जायेंगे। एक डेढ़ साल पहले डीटीसी चालीस रुपये प्रति किमी के घाटे में चल रही थी अब यह घाटा कम हो कर पांच सात रुपये प्रति किमी रह गया है। डीटीसी में हर दिन हर बस के चलने, ईंधन की खपत, यात्रियों की संख्या और कमाई का हिसाब लिखा जाता है। अगले दिन आपको पूरा डिटेल मिल जाएगा कि कितने लोगों ने सफर की और बस ने फेरे लगाने में कितनी चूक की।
डीटीसी के नंबरों की शुरूआत छब्बीस से शुरू होती है। चार सौ बीस नंबर की बस नहीं है लेकिन सौ नंबर की है। मुद्रीका का एक फेरा एक सौ दस किमी का होता है। ज्यादातर ड्राईवर बिना ब्रेक के इसे साढ़े पांच घंटे में पूरी करते हैं। उसके बाद छुट्टी। डीटीसी का दावा है कि मुद्रीका का अधिकतम किराया पंद्रह रूपये है। एक सौ दस किमी इतने सस्ते में कहीं नहीं जा सकते। मुद्रीका रिंग सेवा को कहते हैं। यह भी पता चला कि डीटीसी के ज़्यादतर ड्राईवरों के नाम अनिल, सुनील और राजेश हैं। एक से बेवकूफी भरा सवाल किया तो सही जवाब दिया मुझे। राहुल गांधी नाम होता तो कांग्रेस के अध्यक्ष न बन जाते। ड्राईवरी नहीं करनी पड़ती।
यह भी पता चला कि डीटीसी में ढाई हज़ार पुरानी बसें हैं। जिनकी बुक वैल्यू ज़ीरो है। मगर वो भी ढुलाई और कमाई में पैंतालीस और पैंसठ लाख की बसों से कम नहीं हैं। कुछ राजनीति रूट भी हैं जो नेताओं के दबाव में चलाईं गईं हैं। इनमें काफी घाटा है। प्राइवेट बस वाले अपने स्टाफ बिठा देते हैं डीटीसी की बसों में ताकि डीटीसी को कम यात्री मिले। बेटिकट यात्रियों का अलग सामाजिक अध्ययन किया जा सकता है। लड़के और लड़कियां दोनों ही टिकट न लेने में माहिर हैं। टिकट चेक करने वालों के साथ पकड़े जाने पर किये जाने वाले बहानों के किस्से सुन कर खूब मजा आया। कोशिश यही है कि हम एक संगठन को भीतर से देख सकें कि वो कैसे पिछले तिरेसठ सालों से दिल्ली की जीवन रेखा है। इसी डीटीसी को समझने की कोशिश की है इस बार रवीश की रिपोर्ट में। देखियेगा। FRI-9:30PM, SAT-10:30AM, 10:30PM, SUNDAY-11:30PM, MONDAY-11:30AM
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