कलर्स का भारत एक खोज

कलर्स के नए शो ने रियालिटी शो की तमाम बोरियतों को ध्वस्त कर दिया है। जिसने नहीं देखा उसने क्या देखा। बहुत दिनों बाद टीवी सेट के सामने एक घंटे से ज़्यादा बैठा रह गया। नसें उत्साहित रक्त संचारों से आह्लादित थीं। दिमाग उस भारत को खोजने निकलता ही था कि नज़रें लौटा लाती थीं कि जा कहां रहे हो,देखो न ये देखो। इसको देखो। अऱे ये क्या है। कौन लोग हैं ये। प्रतिभा को टीवी का इंतज़ार था। देश की तमाम गलियों में,मोहल्लों में ऐसे हुनरमंद लोगों की फौज बिना किसी मोर्चे पर गए प्राकृतिक मौत का शिकार हो रही थी। तमाम आरोपों और दोहनों की कहानी के बीच आज जो देखा,लगा कि टेलीविज़न क्या क्या कर सकता है। इसकी संभावनों का इस्तमाल करने वाला ही टीवी का बादशाह बनेगा। वर्ना टीवी गोबर का पहाड़ ही बनेगा। किसी ने इस गोबर के पहाड़ को उठा कर उसके नीचे से खजाना निकाल दिया है।

कोलकाता के टैलेंट हंट में उड़ीसा से आए ब्रेक डांसरों की कृष्ण लीला भूल नहीं रही है। चांदी की परतों में लिपटे नौजवान किस संतुलन से अपनी हड्डियों को मरोड़ते हुए रथ बन जा रहे थे,कृष्ण ने सुदर्शन चक्र उठाने की भंगिमा बनाई तो डांसरों की टोली रथ में बदल गई। उनकी हड्डियां में घोड़े की झलक दिखने लगी। उनकी आंखें कुरुक्षेत्र में रौद्र रूप धारण कर विहंगम नज़ारा पेश कर रही थीं। ग़ज़ब का संतुलन। अनोखा प्रदर्शन। शेखर कपूर को कहना पड़ा कि दुनिया में ऐसा प्रदर्शन नहीं देखा। इस रियालिटी शो ने ग़ज़ब का काम किया है। नहीं मालूम इसकी कमाई से कौन राजा बनेगा लेकिन जो लोगों को इसने दिखाया है,देखने वाले को राजा बना दिया है।

न्यूज़ चैनलों पर कुछ महीनों पहले लोग अजब ग़ज़ब के नाम पर टीआरपी बटोर कर लोग तालिबान पर चले गए। नाक में कील ठोंकने और बालों से ट्रक खींचने से आगे नहीं जा सके। पहचान ही नहीं सके कि भारत अद्भुत प्रतिभाओं का धनी देश है। जितने द्रोण पैदा नहीं हुए उससे कहीं ज्‍्यादा इस देश में एकलव्य पैदा हुए हैं। एक मोटा सा थुलथुल लड़का। बोल रहा था कि उसके पास लुक है न फिगर है। लेकिन जब उसने पूरब और पश्चिम की धुनों पर बेहतरीन संतुलित नृत्य पेश किया तो सब अवाक रह गए। उसके थुलथुल शरीर से ऐसी थिरकनें पैदा होने लगीं जैसे किसी ने बिरजू महाराज और किशनजी महाराज को एक साथ अपनी आत्मा में उतार लिया है।

इस तरह के लाखों प्रतिभाशाली बच्चे हर दिन भारत के तमाम स्कूलों में प्रदर्शन करते रहते हैं। लेकिन उन तक कैमरा नहीं पहुंचता। एनुअल डे का रस्मी फंक्शन समझ कर कैमरे वाले इग्नोर कर देते हैं। विकलांग बच्चों की टोली ने व्हील चेयर को नचा नचा कर भांगड़ा का जो नज़ारा पेश किया उससे आज भांगड़ा समृद्ध हो गया। और हां..वो बेली डांसर। कहती है कि दिमाग सर में नहीं बेट के बल में होता है। वाह। उसके पेट ऐसे झटक मटक रहे थे कि बंबइया लटक मटक वालियां उसके सामने पानी भर रही थीं। सबके सामने नाच कर बता गईं कि ये कला है। कैबरे नहीं। आपने नहीं देखा तो आप जानिये। मेरे मां बाप तो मुझे ऐसे नाच के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

मैं सन्न रह गया। हिंदुस्तान को खोजना कितना बड़ा काम है। पत्रकार नहीं करेंगे तो बाज़ार तो करेगा ही। इस रियालिटी शो की खास बात ये है कि इसमें बंबइया लोकप्रिय गानों और नृत्यों की नकल नहीं है। सब ओरीजिनल है भाई। कुछ अजीबो गरीब से भी आए। मदारी बने। किसी ने मरकरी अपने शरीर पर फोड़ डाली। कालेजों में रफी चाचा के मेरी महुआ गीत पर न जाने कितने ऐसे मरकरी टूटते देखे हैं। तब लगता था कि ऐसे डांस किसी थर्ड ग्रेड शामियाने के नीचे बिछे मंच के लिए बने हैं। मगर आज इसी तरह की प्रतिभाओं को खोज कर कलर्स के इंडिया गॉट टैलेंट को अविश्वसनिय बना दिया है।

पता चलता है कि लोग अपने स्तर पर कितने प्रयोग कर रहे हैं। कितना जोड़ रहे हैं। हर तरफ कला का एक ऐसा संसार है जो न्यूज़ चैनलों और सीरीयलों की बोरियत को लात मारती है। पच्चीस जून को मुंबई में स्पाइन इंजरी के शिकार लोगों का पहली बार ऐसा ही एक शो हुआ। उनका प्रेस रीलीज़ तमाम जगहों पर घूमता ही रहा। कोई राष्ट्रीय चैनल नहीं गया होगा। किसी की दिलचस्पी नहीं बनी। किसी ने उसमें एक महान कहानी नहीं देखी। ऐसे ही किसी अनजान मंचों को अब हर रात आपके घरों तक पहुंचा देने के लिए यह शो आया है। हमें तो मालूम ही नहीं कि बिना किसी ख़बर के इन किस्सों का क्या करें। कलर्स ने कहा ख़बर छोड़ों जी,पहले प्रतिभाओं को सामने तो लाओ। ठीक है कोई और कमाता है लेकिन हुनर दिखाने वाला जानता है कि इतना भी कम नहीं। तभी तो उड़ीसा की टोली के मुखिया ने कहा कि आप महान लोगों को देखकर हमें भी अच्छा करने का जोश आ गया। क्या विनम्रता थी।

इसमें भी खराबियां होंगी। लेकिन आज नज़र नहीं आईं। आएंगी तो लिखूंगा। लेकिन आज हतप्रभ हूं तो वही लिखना चाहता हूं जो लग रहा है। वो नहीं लिखना चाहता जो सोचने पर लगेगा। शेखर कपूर कहते हैं कि आप सबने साबित कर दिया कि कला के लिए रिसोर्स यानी संसाधन और मौके की ज़रूरत नहीं होती। ज़रूरत होती है दिल की और साहस की। ब्रेक डांसरों का कृष्ण डांस भूल ही नहीं पा रहा हूं। अच्छा है। मेरे जैसा दर्शक जो पूरे हफ्ते दस मिनट भी टीवी नहीं देखता,आज एक घंटा बैठ गया। पता नहीं शो आधे घंटे का था या एक घंटे का। लगा कि घंटा गुज़रा है। वाह। मज़ा आ गया।

28 comments:

Priyankar said...

बहुत सही लिखा है आपने . भारत नाम के इस अजूबे में -- इसके गांव-कस्बों-ढांणियों में --रचनात्मकता का एक विस्फोट-सा हो रहा है,बस देखने वाली नज़र चाहिए . वे जो इस देश को सिर्फ़ भ्रष्ट नेताओं की जागीर,अकर्मण्य नौकरशाहों का चरागाह और बॉलीवुड की सस्ती पैरोडी समझते-समझाते रहे हैं उन्हें कुछ समय ठहर कर तसल्ली-से इस देश को एक बार फिर से देखने-समझने की कवायद करनी होगी . जो सामान्य लोगों की प्रज्ञा,तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ते-जूझते लोगों की सृजनात्मकता और ’इम्प्रोवाइजेशन’ की उनकी ललक को समझ सकेगा,वही इस देश को समझ पाएगा .

Sachin said...

प्रतिभा तो असली भारतीयों की है लेकिन शो का कन्सेप्ट उड़ाया हुआ है..ब्रिटेन हैज़ गॉट टेलेन्ट और अमेरिका जैसे शोज़ से...लेकिन चलिए..प्रतिभा की तलाश हो रही है तो बाक़ी मुद्दे गौण हो जाते हैं...भारतीय समाज में खोजी पत्रकारिता की क्रांति की दुंदुभी बजाने वाले न्यूज़ मीडिया को आख़िरकार एहसास हो ही गया कि भारत असीम प्रतिभाओं का देश है..फिर इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि यह एहसास न्यूज़ मीडिया को उसके अपने भाई एंटरटेनमेंट मीडिया ने कराया हो..एक बाज़ार के आगे बेबस है..दूसरा बाज़ार को मथ कर प्रतिभाओं को आगे ला रहा है..जय हो

Manish Kumar said...

इस शो के बारे में ध्यान दिलाने का शुक्रिया। आपके द्वारा व्यक्त किए गए विचारों से मेरी पूरी सहमति है।

रंजन said...

दिखा तो था पर देखा नहीं.. आपके इस आलेख के बाद लग रहा है कि देख लेते तो अच्छा था.. राखी की शादी से तो बेहतर ही होगा.. अगली कड़ी सही,,

अजित वडनेरकर said...

जेब्बात...

Arvind Mishra said...

रवीश जी बिलकुल सही कह रहे हैं -उडीसा की उस कृष्ण टोली का दृश्य देखकर मैं खुद स्तब्ध रह गया था -अद्भुत ,नयनाभिराम अलौकिक प्रदर्शन था कला का -भारत सचमुच सिरमौर है विश्व का -हम इसकी प्रतिभावों को तो विश्व मंच तक ले जाएँ !

JC said...

"...कोलकाता के टैलेंट हंट में उड़ीसा से आए ब्रेक डांसरों की कृष्ण लीला भूल नहीं रही है। चांदी की परतों में लिपटे नौजवान किस संतुलन से अपनी हड्डियों को मरोड़ते हुए रथ बन जा रहे थे, कृष्ण ने सुदर्शन चक्र उठाने की भंगिमा बनाई तो डांसरों की टोली रथ में बदल गई...इत्यादि,"

रवीश जी के शब्दों के माध्यम से भी भारत भूमि अपने कण-कण में बसे नटखट नन्दलाल की आत्मा को सदैव उजागर करती रहती है...इसी लिए भारत महान है :)

जैसा मैंने पहले भी कभी कहा था, कृष्ण ने 'गीता' में कहा है कि यद्यपि सारी सृष्टि उनके भीतर समायी हुई है, हर जीव "माया" के कारण उन्हें अपने भीतर देखता है...बच्चों के
लिए लिखी कहानियों में भी दर्शाया जाता है कि मां यशोदा ने बाल-कृष्ण के मुंह में संपूर्ण ब्रह्माण्ड देखा :)

अब यदि कोई व्यक्ति, विशेषकर एक 'हिन्दू', "माया" को समझने का प्रयास ही न करे तो दोष किसका है? मैंने पहले भी लिखा था कि "ज्ञानी हिन्दू" इस पहेली को भी सुलझा चुके हैं - उन्होंने कृष्ण लीला को उल्टी चलाई गयी रील के समान बताया है...अर्थात यदि 'आज' भारत अगर 'पश्चिम' की नक़ल करता दीख रहा है तो वह यथार्त में संकेत है कि उत्पत्ति आरंभ हुई भारत से (काशी से) और उसके बाद 'पश्चिम' में पहुंची :)

रवीश जी इसे कृपया अन्यथा न लें...'सत्य' का ध्यान दिलाना भी किसी न किसी का रोल होना आवश्यक होगा कृष्णलीला में...भारत महान है!

सतीश पंचम said...

मैंने भी ये प्रोग्राम देखा है। प्रोग्राम ठीक ही है। कुछ बेकार से लोग भी दिखे जो अनाप शनाप हरकतें करते दिख रहे थे। कुल मिलाकर अभी तक तो ये टैलेंट हंट ठीक ठाक लग रहा है। आगे देखिये क्या होता है।

सुशील कुमार छौक्कर said...

हमारे ध्यान से उतर गया। और हम आखिर में पहुँचे। खैर अगली बार देखेगे।

आदर्श राठौर said...

इन दिनों टीवी नहीं देख पा रहा...
लेकिन अब देखना पड़ेगा

sharad said...

बढ़िया प्रस्तुतीकरण....मज़ा आया पढ़कर...

वेद रत्न शुक्ल said...

MERA BHARAT MAHAAN, lekin Media ko Up market-Down market ki mansikta se bahar aana hoga. Khaskar TV Journalism ko.

गुस्ताख़ said...

ऐसा ही शो एनडीटीवी में भी करवाइए ना.., जिसमें तालिबानी तिलिस्म न हो.. मेरा भारत महान टाइप...

पंकज said...

रवीश जी, उड़ीसा के जिस डांसरों की कला की बात आपने कही है, उनकी खोज का श्रेय रवि-नावेद-जावेद के शो बूगी-बूगी को जाता है. ये टोली कई बार उनके मंच को सुशोभित कर चुकी है और जजों और दर्शकों सभी ने उन्हें खड़े होकर सराहा है. जावेद जाफ़री ने तो उनके लिए शायद (याद नहीं आ रहा) लाख रुपए का विशेष इनाम भी दिया था. वर्षों से चल रहा कार्यक्रम बूगी-बूगी भी एक अनोखा कार्यक्रम है. आज भले की कितने चैनल डांस शो करे, लेकिन बूगी-बूगी की एक गरिमा है और कार्यक्रम शानदार भी है.

महामंत्री - तस्लीम said...

अरे, मुझसे यह कार्यक्रम छूट गया। इस बार ध्यान से देखूंगा। शुक्रिया।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Sushila Puri said...

ravish ji
aapne 'kalars' ko badrang karke nek kam kiya hai.........badhi.

Amit said...

मैंने शो तो नहीं देखा, लेकिन आपका लेख पढ़कर अंदाज़ा लगा सकता हूं कि इसे ना देखकर क्या कुछ मिस किया है। अभी इसका टाइम पता करता हूं और अगले एपीसोड से ही देखना शुरू करता हूं। धन्यवाद

anupam mishra said...

बहुत सुंदर...ये टीवी वाले ससुर के नाती...लोगों की अपंगता को भी भुनाने से नहीं चूके....

sushant jha said...

अब...न्यूज वाले इंटरटेंनटेंनमेंट के डोमेन में ही घुसे रहेंगे तो इंटरटेंनमेंट वाले तो न्यूज तलाश ही लेंगे न...अगर ये दुर्लभ और लुप्त होता टेंलेंट न्यूज के परिभाषा पर सटीक उतरता है तो ताज्जुब है कि न्यूज चैनल वाले इतने दिन कर क्या रहे थे।

ravishndtv said...

पंकज
बूगी वूगी शायद ध्यान से नहीं देखा है। लेकिन देखने की कोशिश करूंगा।

Meenakshi Kandwal said...

भारत के हुनर को समेटना सचमुच आसान नहीं है। लेकिन मैं इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखती कि हुनर को साधनों और मौकों की ज़रुरत नही होती... हुनर के मौलिक रुप को तो साधन ही निखार सकते हैं, और फिर अगर वो हुनर किसी मौके के अभाव में खो गया तो उन्हीं घिसे-पिटो को टीवी पर देखकर, तालियां पीटी जाती रहेंगी।

JC said...

बूगी-वूगी के रवि-जावेद-नवेद ने भी आरंभ में नहीं सोचा था कि कार्यक्रम इतना लोकप्रिय हो जायेगा...शेक्स्पीअर ने इस संसार को एक स्टेज बताया ('आनंद' में राजेश खन्ना का भी उसी पर आधारित एक मर्मस्पर्शी डायलोग था)...किसी कवि ने भी कहा कि रेगिस्तान में भी, जहाँ मानव की भी पहुँच न हो, सुंदर फूल खिलते हैं और अपनी सुगंध फैलाते हैं - किसके लिए?

JC said...

पानी की सतह पर तरंग उठाने वाला पत्थर स्वयं किन्तु डूब जाता है, और तरंगें भी कुछ समयोपरांत शांत हो जाती हैं जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो! इस लिए कृष्ण को भी धरा रूपी स्टेज पर बार बार जन्म लेना पड़ता है...

kimuza creations said...

यार आपने इतनी तारीफ़ कर दी है इस शो की, कि मैने जोश मे आकर जैसे ही टीवी खोला और ’कलर्स’ लगाया तो ये देखकर आशचर्य-मिश्रित खुशी हुई कि उसी शो का रिपीट टेलीकास्ट आ रहा था. वाकई ये शो काफ़ी हट कर है. --मुईन शमसी

परा वाणी - अरविंद पाण्डेय said...

यथार्थ और सुन्दर विश्लेषण किया आपने.......

shitcollector said...

Ravishsaab likhte toh accha hai par channel me kya dikhta hai yeh bhi toh dekhein...NDTV india pe Mumbai central..11 baje ka show dekh raha tha, reality show pe...bhagwan bachaye itne galat information se...
http://moifightclub.wordpress.com/2009/07/14/ndtv-india-which-moron-decides-mumbai-centrals-content/

shitcollector said...

Ravishsaab, comment ko moderate kar diya kya ?

khushboo said...

mere ghar me sab ne ye program dekha bus nahi dekha tha to mere papa ne, sarkari nokari hi esi he ki fursat nahi milti, per jab unhone dekha to bus 1 ghante ke liye TV se ese chipke ki khane ke liye bhi nahi uthe .... sach ne bahut acha laga dekh kar ki bharat me itna kuch chipa hai bus kisi ne dekha nahi tha aj dekha to bus itna hi bol paye "sare jahan sare accha, hindustan hamara..........."