कमला दास सुरैया की कविताओं में कुत्ता

१. प्यार

मैंने तुम्हें पाने तक
मैंनें कविताएं लिखीं, तस्वीरें बनाईं,
और, दोस्तों के साथ गई बाहर
सैर के लिए......
और अब मैं तुम्हें प्यार करती हूं
एक बूढ़े पालतू कुत्ते की मानिंद लिपटी
मेरी जीवन बसा है,
तुम में...

२. बारिश
हमलोगों ने उस पुराने घर को छोड़ दिया
जब मेरा कुत्ता वहां मर गया,
दफनाने के बाद, दो दो बार खिले गुलाब को,
जल्दी में जड़ों से उखाड़कर
अपनी किताबों,कपड़ों और कुर्सियों के साथ
लादने के बाद,
हम एक नए घर में रहते हैं अब,
और,इसकी छत नहीं रिसती, लेकिन
जब बारिश होती है यहां, मैं देखती हूं बारिश
भिगोती है
वह खाली घर, मैं सुनती हूं इसका बरसना
जहां अब मेरा पप्पी सोया है
अकेला...

( दैनिक हिंदुस्तान से साभार)

8 comments:

sanjaygrover said...

जीवन में जो सबसे पहली आत्मकथा मैंने पढ़ी वो शायद कमला दास की ही थी। तब मैं बहुत छोटा था और उस किताब को छुपकर पढ़ता था और छुपाकर रखता था।
बहरहाल, कुत्ते और कुत्तपने पर अपना एक शेर याद आ गया:-

खाल-बाल और चाल-ढाल जो झट से बदला करते थे,
सोच-समझ की बात करें तो अभी भी कुत्ते की दुम थे।

आदर्श राठौर said...

मैं देखती हूं बारिश
भिगोती है
वह खाली घर, मैं सुनती हूं इसका बरसना
जहां अब मेरा पप्पी सोया है
अकेला...



भावनाओं का इतना सुन्दर अभिव्यक्तिकरण कम ही देखने को मिलता है...

JC said...

कमला दास सुरैय्या जी की कविता ने मेरे मानस-पटल पर कलियुग में साधारणतया असहाय 'मालिक'/ 'मालकिन' का अपने से अधिक असहाय जीव के प्रति प्रेम व सहानुभूति के भाव को 'हिन्दू मान्यता' के अनुसार संपूर्ण श्रृष्टि के मालिक, भगवान् विष्णु, का नंगे पाओं गज को ग्रह (स्वयं के प्रथम अवतार मगरमच्छ) से छुडाने दौडे चले आने की झलक समान एक प्रस्तुति पाया...

मीराबाई का कृष्ण-प्रेम में पागलपन के सन्दर्भ में एक कहानी भी साथ साथ याद आ गयी...एक पागलखाने के चार पढ़े लिखे डॉक्टरों ने पाया कि वे नदी पर बने पुल पार करने में असमर्थ थे क्योंकि उनकी गाड़ी कि ऊँचाई पुल कि ऊँचाई के ठीक बराबर होने के कारण वह उससे गुजर नहीं सकती थी. उनको याद आया कि पागलखाने में भर्ति होने से पहले एक मोटर मिकैनिक था. उसे बुला लिया गया. उसने आते ही चारों पहियों कि थोडी थोडी हवा निकाल दी और कार पुल से गुजरने लायक हो गयी!

डॉक्टर आश्चर्य से उसे बोले, हम तुम्हें तो पागल समझ रहे थे!!!
उसने जवाब दिया, मैं पागल हूँ मूर्ख नहीं!

Science Bloggers Association said...

हिन्दुस्तान का पाठक होने के नाते ये कविताएं तो उसमें भी पढी थीं, आज फिर रिवाईज हो गयीं।
मेरी समझ में कमला दास जी ने कुत्ते के प्रति आदमी की जी आत्मीयता हो जाती है, उसी को ध्यान में रखकर उसका उल्लेख किया है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

गिरीन्द्र नाथ झा said...

गीतों और कविताओं में कुत्तों का जिक्र तो अब मिलता ही नहीं हैं। हां, फिल्म गुलाल के एक गीत में जरूर पीयूष मिश्रा ने कुत्ते के रोने का जिक्र किया है।

niranjan said...

भैया प्रेम और कुत्ते का जबरदस्त कॉम्बिनेशन

रंजना said...

Bahut hi bhavpoorn....

मुनीश ( munish ) said...

U know Ravi, dog has alvez got itz due in our literature. for example in 'Mahabharata' dog is said to be the only companion of Yudhishthir when he reached heaven.
Even i love my labrador more than my blog!