शौचालय में अख़बार का फ्रेम





















शौचालय में अख़बार लेकर जाना पुरानी परंपरा है। इसकी शुरूआत किसी अंग्रेज़ अफसर ने की या किसी भारतीय ने,मेरी जानकारी में नहीं है। कमोड सिस्टम के आने के बाद ही शौचालय में अख़बारों को जगह मिली होगी। इंडियन सिस्टम में अखबार पढ़ना थोड़ा कष्टदायक ही होगा। शौचालय में अख़बार पढ़ने का सदुपयोग दीर्घशंका के वक्त ही किया जाता रहा होगा। मेरी इन तस्वीरों में पहली बार लघुशंका के अल्प समय का इस्तमाल अखबार पठन के लिए किया जाने लगा है। दिल्ली हवाई अड्डे के शौचालयों में अखबारों के पन्ने फ्रेम कर ऊपर टांग दिये गए हैं। हिंदी अंग्रेज़ी दोनों के अखबार हैं। कायदे से इनके पन्ने को फ्रेम में कस दिया गया है। इस फ्रेम में हर दिन अखबार बदल जाता है। जब मैंने तस्वीर ली तो उस पर सात जून की तारीख मौजूद थी। इस तारीख के कारण ही मैं यह पोस्ट लिख रहा हूं। हफ्ता भर पहले जब मैं दिल्ली हवाई अड्डे पर था तो लगा कि अखबारों के ये फ्रेम सजावट के लिए हैं। कई होटलों में इस तरह का फैशन है। लेकिन उस दिन भी ताज़ा अखबार टांगा गया था। आज देखते ही समझ गया कि यह एक नया प्रयोग है। कम से कम मेरी जानकारी में। चाय की दुकानों में खड़े खड़े पेपर पढ़ते ही थे अब शौचालयों में भी समय का सदुपयोग किया जा सकेगा। अब आपको न्यूज़ के लिए बेचैन होने की ज़रूरत नहीं। न्यूज़ आपतक पहुंचने के लिए बेचैन है। मोबाइल से लेकर शौचालय तक में। आप ख़बर से बच नहीं सकते। पढ़ना ही पड़ेगा। लोटा लेकर खेत खलिहानों की तरफ जाने के ज़माने में दुनिया भर के आख्यान चलते थे। प्राइवेट बाथरूम के ज़माने में बंद हो गए। बाद में पब्लिक टॉयलेट का ज़माना आया तो आरंभ में इतने साफ सुथरे नहीं होते थे। अब तो ये घर से भी बेसी साफ होते हैं। बात करना तो अभी भी मुश्किल है। लोग कान में ईयरफोन लगाए मोबाइल पर बतियाते हुए शौचनिवृत्त होते रहते हैं। कम से कम ख़बर पढ़ लेंगे तो जानकारी तो मिल जाएगी। हवाई अड्डों पर मुफ्त में बंटने वाले अख़बारों का यह एक अच्छा इस्तमाल लगता है। पूरा पेपर पढ़ने का टाइम तो नहीं मिलेगा लेकिन वो दिन दूर नहीं जब ऐसी जगहों के लिए पचास सौ सुर्खियों वाले अखबारों के पन्ने छपने लगेंगे और फ्रेम में कस कर टांग दिये जाएंगे।

21 comments:

रंजन said...

वाकई नया प्रयोग है.. लघु शंका तो चैन से कर ले आदमी..:)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

लघु, दीर्घ शंका, भोजन आदि तो बिना किसी व्यवधान के कर ले इंसान। यह बाजारवाद हमें न जाने कहाँ ले जाएगा।

RAJNISH PARIHAR said...

ये पश्चात्यता ना जाने कहाँ रुकेगी..निजता जैसी चीज़ बचेगी या नहीं..!आखिर कहीं तो जाकर आदमी दो घडी चैन लेगा या नहीं...

अजय कुमार झा said...

हे भगवान् ये तो गजब है...अपना तो ठीक है किसी से दोस्ती या बैर उतनी नहीं है...मगर नेताओं का क्या होगा यदि विरोधी दल की खबर पढ़ ली तो लूज मोशन का ख़तरा बढ़ सकता है....अखबार वालों को सुलभ शौचालयों के लिए भी एक आध पन्ना चिपकान चाहिए...आखिर स्लम डॉग मिल्लेनीयर का जामाना है...

डा प्रवीण चोपड़ा said...

हमें भी यह खबर तो भई बहुत हैरतअंगेज़ लगी ।
धन्यवाद यह सब बताने के लिये।

मुनीश ( munish ) said...

It is a tribute to the kind of stuff news-papers are made of today . T.V. is already there in 5 star toilets. Why not papers?

Suresh Chiplunkar said...

भाई हमें तो यह प्रयोग अच्छा लगा, अखबार की खबरें पढ़कर खुशी के मारे, गम के मारे, गुस्से के मारे, हँसी के मारे, किसी भी बहाने सही लघु या दीर्घ कैसी भी शंका हो उसका निवारण जल्द से जल्द हो जायेगा। एक बात की कुशंका भी है कि कहीं लोग पूरा पेज पढ़ने के चक्कर में वहाँ खामखा ही न खड़े रहें देर तक… और इंतज़ार में पीछे खड़े व्यक्ति को अन्य ना-ना प्रकार की आशंकायें होने लगें उस व्यक्ति के बारे में… :) :)

kaustubh said...

कहीं तो बख्श दो यार ।
ठीक बात कही आपने रवीश भाई ! वैसे गहराई में जाकर देखें तो ऐसी सारी बेतुकी कवायदों की जड़ में आदमी का लालच ही नजर आता है । वह कहीं कोई मौका छोड़ना ही नहीं चाहता । अपना हित साधने का । ‘ थिंक पाजिटिव ’ वाहे हमारे कुछ बिरादर हमें छिद्रान्वेशी करार देते हुए इसका सकारात्मक पक्ष देखने की सलाह दे सकते हैं । वह कह सकते हैं कि यह तो फालतू समय का सदोपयोग हो रहा है । इससे तो लोगों में जागरूकता ही बढ़ेगी आदमी हर पल हर खबर से बाखबर रहेगा । शायद यह सकारात्मक हो भी सकता था, गोया कि हवाई अड्डों के मुत्तीखाने के बजाए अखबार वाले भाई लोग किसी दूरदराज के गांव में जाकर मुफ्त अखबार बांट देते । उन लोगों को जिनमें दुनिया को देखने जानने की जिज्ञासा और तमन्ना तो है, पर जेब में इतने पैसे नहीं कि तीन-चार रुपये का ‘महंगा’ जी अखबार खरीद सकें । महंगा शब्द का इस्तेमाल हमारे ‘ थिंक पाजिटिव ’ क्लब के साथियों को शायद यहां अटपटा लगे क्योंकि जीवन की सारी सुविधाओं और आसान सी जिंदगी में पाजिटिव थिंकिंग करने वाले इन जीवों को शायद अहसास न हो कि इस धरती पर और हमारे देश में ही बहुत बड़ी तादाद में ऐसे लोग हैं जो अखबार खरीदने की लग्जरी अफोर्ड नहीं कर सकते ।
अब जरा विचार करें समय के सदुपयोग के तर्क की । तो हमारा तो यही कहना है कि ऐसा भी समय का क्या सदुपयोग कि आदमी के पीछे-पीछे पाखाने में घुसे जा रहे हो अखबार लेकर । इन दो-चार मिनटों का सदुपयोग करके क्या टायलेट जाने वाले हर आदमी को बिल गेट्स या ओबामा बना दोगे ! भइया कहीं तो दो पल का सुकून ले लेने दो आदमी को । कल को नया आविष्कार कर दोगे कि सोते आदमी की नसों में ड्रिप खोंस के सोते में भी उसके तंत्रिका तंत्र के जरिए खबरें और विज्ञापन दिखाने लगोगे और कहोगे कि यह तो समय का सदुपयोग है । जो सोया, सो खोया, जो जागा सो पाया । समय का ‘सदुपयोग’ करने वालों कहीं तो बख्श दो आदमी को यार । नीत्ज़े ने सच ही कहा था कि नो न्यूज इज गुड न्यूज । वाकई खबर और खबरों के सहारे विज्ञापन का कारोबार करने वाले यह समाज के ‘पहरुए’ आदमी पर सूचनाओं की बेतहाशा बौछार कर उसकी जान लेने पर उतारू हैं ।
कोलाहल से कौस्तुभ किशोर

AlbelaKhatri.com said...

ha ha ha ha ha ha ha ha ha ha
YE BHI DIN AANE THE
ha ha ha ha ha ha ha

नितिन व्यास said...

बढ़िया प्रयोग!! बाजारवाद जो ना कराये सो कम।
वो दिन दूर नहीं जब कमोड पर आदमी तभी बैठ सकेगा जब तक वह सामने लगी स्क्रीन पर २ विज्ञापन ना देख ले!

shubhi said...

please do not disturb us in atleast toilet

apne-apne ajnabi said...

aaj apki aalochna nahi kar paunga.shaandar observation

आदर्श राठौर said...

आज के दौर के हिसाब से देखा जाए तो सही है लेकिन ये एक उचित परंपरा नहीं...
हर चीज़ का अपना स्थान होना चाहिए, जो काम जहां करने योग्य है, वहीं करना चाहिए... शौचालय अध्ययन करने का स्थान नहीं है....

Anil said...

रोचक!

शरद कोकास said...

आजकल अखबारों में खबरें ही ऐसी होती हैं जिन्हे पढते ही.... हो जाती है.

Udan Tashtari said...

आईडिया बुरा नहीं है. :)

Ratan Singh Shekhawat said...

लघु, दीर्घ शंका, भोजन आदि तो बिना किसी व्यवधान के कर ले इंसान। यह बाजारवाद हमें न जाने कहाँ ले जाएगा।
दिनेश जी पूर्ण सहमत !

arun prakash said...

भैया हमने तो शौचालयों में साहित्यिक व सांस्कृतिक उक्तियों व अनंग पूजकों की टिप्पणिया ही पढ़ कर समय काटा है यह नै विधा कब से आ गयी जान कर आश्चर्य हुआ
कब्ज व पथरी के मरीजों के लिए यह खुश खबरी है

JC said...

सूचना के लिए धन्यवाद् !

प्राचीन भारत में ज्ञानी लोग कह गए कि 'उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता' (या 'पंछी भी पर नहीं मार सकता', आदि)...

'ज्ञानी हिन्दू' के अनुसार 'वो' शून्य काल और स्थान से जुडा है, अथवा 'उसने' संपूर्ण ब्रह्माण्ड शून्य काल में बना तो लिया होगा, किन्तु हाय रे! इंसान की मजबूरियों सामान, भगवान की मजबूरियाँ कि 'शून्य काल' में ही वह समाप्त भी हो गयी होगी! फिर यह 'लघु' अथवा 'दीर्घ' शंका कैसे?

उपरोक्त शंका का समाधान करते हुए उन्होंने , शून्य में समाधी ले, गहन चिंतन कर, प्रभु को (स्वयम्भू जो 'भू' अथवा धरती के पहले ही निराकार रूप में विद्यमान था), सर्वगुण संपन्न, सर्व व्यापी, इत्यादि इत्यादि जाना...और इस धरती को झूठा बाज़ार, मायावी, किसी भी फिल्म समान, जिसे 'वो' (निराकार ब्रह्म) योगनिद्रा में देख रहा है - अनंत काल से अनंत काल तक :) (और अस्थायी मानव रूपों को भी उसका आनंद उठाने का अवसर दे कर, भले ही थोडी सी देर के लिए ही क्यों न हो :)

मानो या न मानो, यह तो हर एक मिटटी के पुतले के डिजाईन पर निर्भर करेगा, जैसे कहानीकार आदि पर कोई भी फिल्म निर्भर करती है :)

Pankaj Upadhyay said...

sahee soncha hai aapne..microblogging ki tarah micronews paper bhi aayenge..news feed to kuch usi tarah ke cheez dikhti hai lekin jara sonchiye aapke haath mein ek page ka newspaper ho jismein sirf 20 words mein news ho..humari yuva peedhi jispar mujhe garv hai, samay ko bachane ke liye aisa sonch sakti hai.. pahli baar blog par aaya hoon..aapse milkar khushi hui..
namskaar

Mahendra Singh said...

Yeh to Bazarwad ki enteha Hai. Chain se mujhko kabhi jiya to jeene na diya zahar bhi chaha agar piya to peene na diya