गाय एक चौपाया जानवर है

इसमें कौन सी बड़ी बात है। गाय है ही चौपाया। हर दिन देखते थे। गांव से शहर आने के बाद भी गाय पालने की आदत बनी रही। पटना में आज भी घर में गाय है। बहुत लोगों के घर में गाय होती है। खासकर वैसे इलाकों में जो गांव और कस्बों के करीब होते हैं। तो घर में गाय होने के कारण गाय के बारे में बहुत कुछ जानता था। गाय को खाने के लिए कुट्टी लाते थे। इसे लेदी या मानक हिंदी में चारा भी कहते हैं। हम बक्कू यानी बोरे में चारा भर कर ठेले पर लाद कर लाते थे। गाय को नाद में लेदी के साथ पानी मिला कर खाने के लिए देते थे। फिर दुहने वाला आकर दूध दूह लेता था। यही काम निपुणता से नहीं कर पाते थे। लेकिन गाय को अठई(चमोकन) धर लेता था तो नीम के पत्ते से रगड़ते थे। रात में चट्टी(बोरे की चादर)ओढ़ा देते थे ताकि सर्दी न लगे। जहां गाय रहती थी उसे गैमेक्सिन पाउडर से धो देते थे ताकि अठई न लगे। हम सब्ज़ी के बचे हुए हिस्से को गाय के चारे में मिला देते थे। गाय जब बच्चा देती थी तो बांस के पत्ते खिलाते थे। मेरी ये जानकारी आज से बीस साल पुरानी है। तब शायद गाय के बारे में इससे भी ज़्यादा मालूम होगा।

लेकिन मैं गाय के बारे में अपनी जानकारी बघारने के लिए यह नहीं लिख रहा। न ही अपनी किसानी की पृष्ठभूमि जताने कि देखो इस तरह की ज़िंदगी अपनी भी रही है इसलिए महानता के थोड़े बहुत हकदार हम भी है। नहीं। मैं जताने के लिए नहीं बल्कि बताने के लिए लिख रहा हूं। अपनी स्कूली शिक्षा को समझने के लिए लिख रहा हूं। ऐसा ही अनुभव आपके साथ भी हुआ होगा।

होता यह था कि सातवीं के बाद से कई बार अंग्रेज़ी की कक्षा में गाय पर लेख लिखने के लिए कहा जाता था। अंग्रेज़ी के बारे में मैं गाय से भी कम जानता था। लेकिन अंग्रेज़ी में गाय के बारे में दो लाइन भी नहीं लिख पाता था। वो भी ओरीजनल जानकारी। मुझे मालूम नहीं था और शायद कभी ध्यान ही नहीं गया कि जिस गाय को रोज खिलाते हैं,उस पर लेख लिखने के लिए इतना रट्टा क्यों मारते हैं। अब यहीं पर हमारी शिक्षा प्रणाली की समस्या झांकती हुई लगती है। तब गाइड बुक समाधान लगते थे। आज भी लगते हैं।

जब भी गाय पर लेख लिखने को कहा जाता, मैं भारती भवन के गाइड बुक पर आश्रित हो जाया करता था। उसमें गाय पर भी एक लेख था। निबंधों के कई गाइड बुक छपे हैं और तमाम पीढ़ियों ने इसे पढ़े भी हैं। लेकिन ये कौन सी व्यवस्था थी कि मैं गाय पर जानते हुए भी उस पर लेख तब लिख पाता था जब गाइड बुक के लेख को रट्टा लगाता था। जब एकाध लाइन भूल जाते थे तो लेख अधूरा रह जाता था। कमज़ोर अंग्रेजी या अंग्रेज़ी के खौफ ने मूल ज्ञान को कितना छिन्न भिन्न किया होगा। कभी किसी टीचर ने सवाल नहीं किया कि सारे बच्चे गाय पर एक जैसा ही लेख क्यों लिखते हैं। उनके लेख भी मेरे ही जैसे होते थे जिन्हें अच्छी अंग्रेज़ी आती थी और जिनके घर में गाय नहीं थी या जो गाय पर मुझसे कम जानते थे। कभी कोई टीचर बोर नहीं हुआ।

इसीलिए हमारी कक्षाओं में मौलिक बातें नहीं हो पाती होंगी। मैं अंग्रेजी के डर से काउ पर एस्से रटता रहता था। गाइड बुक की गाय ही दिमाग पर छायी रही। काउ इज़ ए फोर फुटेड एनिमल। पहली पंक्ति। यह भी समझ में नहीं आया कि गाय पर हिंदी में लेख लिखने को क्यों नहीं कहा जाता था? हो सकता है कि कहा जाता हो लेकिन मुझे याद नहीं है। अस्सी के दशक की ये बातें कोई पाठक ही बता सकते हैं।

निबंध लेखन ने तमाम छात्रों की कल्पनाओं को कुंद किया है। निबंध लेखन को फाड़ फूड़ के फेंक देना चाहिए। मैं निबंध पर प्रतिबंध की बात नहीं करना चाहता लेकिन पढ़ाने के तरीके ने इसे एक फालतू विषय में बदल दिया है, जिसने सिर्फ गाइड बुकाचार्यों के धंधे चलवाये हैं। मुझे आज तक अफसोस है कि मैं जो जानता था,वो क्यों नहीं लिख पाया। ठीक है कि अंग्रेज़ी का हाल बुरा था लेकिन कोई टीचर यही कह कर हौसला बढ़ा देता कि ठीक है हिंदी में ही लिखो। जो जानते हो वही लिखो। अगर ऐसा होता तो गाय पर लिखे मेरे निबंध की पहली पंक्ति कभी न होती कि गाय एक चौपाया जानवर है।

40 comments:

रंगनाथ सिंह said...

very creative n original post. every one should post this question to so called expert on education in independent india . i admire ur insight in this regard.

रंगनाथ सिंह said...
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Shambhu kumar said...

अफसोस आपको गोबर और गाय की मूत साफ नहीं करनी पड़ी। और उससे बढ़कर पटना में आपके स्वर्गीय पिता जी ने गाय पाल रखी थी... अगर गांव में गाय होती ना तो चौर से दो किलोमीटर चलकर माथे पर रखकर जनेरा और ईंख का चारा लाना पड़ता... तब जाकर गाय के बारे में और जानकारी होती... और तब शायद आप ये दिल्ली आने लायक नहीं रहते... और अगर आ भी जाते तो ठेला पर लहसून धनिया और तरकारी बेच रहे होते... खैर आप ने पटना में रहकर गाय और भूसा का मर्म जानते हैं... हम जैसों के हौसले बढ़ाने के लिए यही काफी है... देखिएगा कहीं आपके चैनलवा में कोई मैम और सर आपको अंडर एस्टीमेट ना कर दे...

रंगनाथ सिंह said...

mr ravish
plz reconsider ur view about essay writing. essay writing is the best tool to develpo analytical n descriptive ability of any student.
otherwise u r correct that essay writing or any other mathod of teaching english in hindi belt's school is a failed experiment. it is a biggest tragedy that students who hv studied english up to 12th class can nt write n speak in english. i think u r making point aggainst poor education policy in hindi belt nt about utility of essay in huminities.

June 10, 2009 1:14 AM

प्रवीण जाखड़ said...

uff! ye nibandh. aap to nibandh se pratadit lagte hain. wo bhi school se... jarur bachhpan main baadam khaye hain. achha likhte hain, par jispar likhte hain uspar chad bathte hain. GAU maata ki jai ho, or aapke dard par humari tippani ka malham lage.
jai ho

Mired Mirage said...

निबन्ध लिखने का मूल उद्देश्य तो यहि था कि आप अपनी जानकारी को शब्दों में कैसे बताते हैं। अब जब शब्द ही पराई भाषा के हों तो क्या किया जाए।
वैसे काओ पर लिखे निबन्ध का बिटिया का अनुभव भी गजब का था। कभी उस पर भी लिखूँगी।
घुघूती बासूती

स्वप्नदर्शी said...

These thoughts come to me very often. Education system everywhere needs an overhaul.

I feel that the real/practical knowledge also has roots in the land/soil and not merely in books.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

निबन्ध लेखन जीवन की दशा और दिशा बता देता है। आप माननीय अमन नम्र को तो जानते होंगे। वे जब छोटे थे तो उनके पिताजी ने उन्हे और उनके बडे भाई को पास के कारखाने की सैर के लिये भेजा। दोनो भाई मजे से कारखाने घूमे और लौट आये। फिर उन्हे इस पर निबन्ध लिखने को कहा गया। बडे वाले ने कारखाने के बारे मे विस्तार से लिखा जबकि अमन जी के निबन्ध मे रास्ते और प्रकृति का ज्यादा वर्णन था। पिताजी झट से समझ गये और उन्होने बडे वाले को इंजीनियर बनने के लिये प्रेरित किया और छोटे वाले को साहित्य की सेवा के लिये। आज दोनो अपने क्षेत्र मे शीर्ष पर है।

यह बात मैने उनके बाबूजी के मुँह से सुनी थी।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

रवीश जी, आप नाहक ही निबंध लेखन पर खफा हो बैठे हैं. निबंध लेखन बुरा नहीं है, हमारे अध्यापकों ने उसे बुरा बना डाला है. असल में तो गड़बड़ यह है कि हमारी पूरी ही शिक्षा पद्धति में मौलिकता के लिए कोई स्थान नहीं है. रट लो और उसे उगल दो. यही अपेक्षा रहती है. जो इस अपेक्षा पर जितना खरा उतरता है वह उतना ही 'मेधावी' घोषित कर दिया जाता है. नाराज़गी इस सोच पर होनी चाहिये थी. आपने सारा गुस्सा निबंध पर निकाल

JC said...

पचास के दशक में दिल्ली में हमारे स्कूल में हर जानवर 'वफादार' (faithful) होता था. सब जानवरों पर लड़के रट्टा लगा लेते थे. छोटे भाई की क्लास के इम्तहान में लेकिन टीचर ने 'My shoe' पर निबंध लिखने को दिया. उसने बताया कि सबके पसीने छूट गए और सभी बगलें झाँकने लगे. उसने अपने आगे बैठे बच्चे को देखा लिखते हुए 'My shoe is a faithful animal...' :)

अब में सोचता हूँ कि शायद वो बहुत गलत नहीं था क्यूंकि जूता भी तो किसी वफादार जानवर के चमडे से ही बना होता है और उसी कि तरह मेरे पैरों को कंकर-पत्थर, ठण्ड/ धूप आदि से बचाता है...

जहां तक काऊ का प्रश्न है, इन्टरनेट पर उसके उपर एक 'हिंदी प्रेमी' का इंग्लिश में लिखा सुंदर लेख चक्कर काट रहा था. अगर कभी कहीं दिखाई दिया तो आपको भी बता दूंगा.

एक लेख आप केले की मिठास और आम की मिठास के अंतर पर आज लिखने का प्रयास करें और दिखाएं जनता को भी तो बहुत कृपा होगी :)

ab inconvenienti said...

JC की टिप्पणी में जिस इंटरनेट पट चक्कर काटते हुए निबंध का उल्लेख है वह यह है.


CALCUTTA's Telegraph has got hold of an answer paper of a candidate at the
recent UPSC examinations. The candidate has written an essay on the Indian
cow:

"The cow is a successful animal. Also he is quadrupud, and because he is
female, he give milk,but will do so when he is got child.He is same like
God,sacred to Hindus and useful to man.But he has got four legs together.
Two are forward and two are afterwards.

"His whole body can be utilised for use. More so the milk. What can it do?
Various ghee, butter,cream, curd, why and the condensed milk and so forth.
Also he is useful to cobbler, watermans and mankind generally.

"His motion is slow only because he is of asitudinious species. Also his
other motion is much useful to trees, plants as well as making flat cakes in
hand and drying in the sun. Cow is the only animal that extricates his feeding
after eating. Then afterwards she chew with his teeth whom are situated in
the inside of the mouth. He is incessantly in the meadows in the grass.

"His only attacking and defending organ is the horn, specially so when he is
got child. This is done by knowing his head whereby he causes the weapons
to be paralleled to the ground of the earth and instantly proceed with great
velocity forwards.

"He has got tails also, but not like similar animals. It has hairs on the
other end of the other side. This is done to frighten away the flies which
alight on his cohoa body whereupon he gives hit with it.

The palms of his feet are soft unto the touch. So the grasses head is not
crushed. At night time have poses by looking down on the ground and he shouts
his eyes like his relatives, the horse does not do so.

"This is the cow."

P.S.: We are informed that the candidate passed the exam.

Raag said...

हमने तो हिंदी और अंग्रेजी दोनों में निबंध लिखे. और निबंध लिखने का बड़ा फायदा हुआ दोनों ही भाषाओँ में. अपने विचारों को उचित शब्दों में व्यक्त कर पाना सबके बस की बात नहीं होती.

ravishndtv said...

मैं निबंघ पर प्रतिबंध की वकालत नहीं करना चाहता। हां अपनी प्रतिक्रिया में थोड़ा आगे बढ़ गया ताकि इस पर ध्यान दे।

श्यामल सुमन said...

उन दिनों के पढ़ाई का सही चित्रण है।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

आदर्श राठौर said...

निबंध वाली बात से बिल्कुल सहमत हूं रवीश जी। हिन्दी के निबंध हमेशा ही गाइड्स से उतारे जाते रहे हैं। यहां तक कि हमारी हिन्दी की अध्यापिका भी हमें गाइड से ही निबंध लिखवाया करती थीं। जहां कर अंग्रेजी की बात है, निबंध मात्र 10 नम्बर का मसाला हुआ करता था। कई लोग उसे रट लिया करते थे तो कई लोग चिट बनाकर नकल ले जाया करते थे। ऐसे में निबंध लेखन मात्र औपचारिकता ही है।

बाकी गाय, कुर्सी, स्कूल आदि पर निबंध लिखने की बात जहां तक है तो उसका मकसद अलग है। इन सरल विषयों पर निबंध लिखवाने का मकसद था कि बच्चा इन सरल विषयों के बारे में बहुत कुछ जानता है। इसलिए वह कम से कम अपनी जानकारी और विचारों को बिना किसी बाहरी मदद से खुद तो लिखे। लेकिन इन निबंधों को भी गाइड, कुञ्जी वगैरह से कॉपी किया जाता था। यानि मकसद नेक है लेकिन क्रियान्वयन में खोच है...

JC said...

भाषा एक माध्यम है. आप किसी भी भाषा में किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों से बोल कर या लिख कर अपने मस्तिष्क में किसी भी विषय पर उपजते विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं...

टीवी, इन्टरनेट आदि के माध्यम से आज आदमी की पहुँच का दायरा बढ़ गया है क्यूंकि आम आदमी की बात भी अमेरिका आदि देशों में रहने वाले रिश्तेदार आदि तक तत्काल पहुँच सकती है.

'आवश्यकता आविष्कार की जननी है'. इस कारण आज कंप्यूटर एक आवश्यकता बन गया है क्यूंकि यदि आविष्कार उपलब्ध है तो वह आवश्यकता भी बन जाता है...और हर किसी आविष्कार का सदुपयोग है तो दुरूपयोग होना भी आवश्यक है...

इसी प्रकार भाषा भी एक आविष्कार होने के कारण इसका दुरूपयोग तो संभव है ही और साथ-साथ अधिकतर देखा गया है कि हर भाषा में कमियां होने के कारण आप कभी कभी कहना कुछ चाहते हैं और दूसरा व्यक्ति कुछ और ही मतलब अनजाने समझ लेता है, या समझ सकता है जान-बूझ कर...

हमारी फ्रेंच भाषा की टीचर ने अपनी भाषा की तारीफ करते बताया की कैसे फ्रेंच में लिखा लेख यदि तीन पेज का होगा तो वही अंग्रेजी में दो पेज में ही आजायेगा किन्तु शायद अंग्रेजी लेख सही समझ न आये पाठक को...किन्तु फ्रेंच भाषा में भी यह कथन शायद १००% सही न होगा, लेख में फिर भी कई शब्द और वाक्य ऐसे पाए जा सकते हैं जिनसे अन्य अर्थ निकाले जा सकें...

हर लिखने वाले की भी तो अपनी-अपनी अलग-अलग लेखन शक्ति है, जो एक कला है, और जिस पर लेख का पाठक पर प्रभाव पूर्णतया निर्भर करता है... और "करत करत अभ्यास के जड़मति हो सुजान..."

sanjaygrover said...

कुछ बच्चे मज़ाक-मज़ाक में सच बोल देते थे क्या-
गाय हमारी माता है-
हमको कुछ नहीं आता है !?

himani said...

rightly said sir hamare shikshtantra ki vastvikta ko apne bakhubi byan kar diya hai

PD said...

kya maharaj.. aap gay ko hi chaupaya bolne par aitraj jata rahe hain.. ham to jis din ratta mare The ki "gay ek chaupaya janvar hai" usi din usko convert karke Papa par lekh likh diye the ki "Papa ek chaupaya janvar hai.." ;)

निरन्तर- महेन्द्र मिश्र said...

गाय हमारी माता है . हमको ढूध देती है . उसके दो थन होते है . चार पाँव होते है और एक पूँछ और दो सींग होते है . हा हा हा

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

कई बार विशेष तरह का प्रशिक्षण हमारा ब्रेन वाश भी करता है। गाय एक चौपाया जानवर है यह लाइन भी ब्रेनवाशिंग का ही नतीजा है। गाय की जानकारी से अधिक अंग्रेजी तर्जुमों और उन्‍हें क्रम में जमाने का फैशन अधिक अहम हो तो और क्‍या हो सकता है। फिर अंग्रेजी से हिन्‍दी का लेख बनेगा तो ठीक वही बनेगा जो इलाइट क्‍लास डिसाइड कर चुका है। यानि गाय एक चौपाया जानवर है :)

गिरिजेश राव said...

बेचारी गाय!

अब पता चला कि हमारे पुरखों ने गाय के हर अंग में देवता का वास क्यों बताया है। इंटर्नेट पर भटकती वायवीय गाय जब इतना धमाल मचा सकती है तो असली गाय तो.....

ताऊ क्यों हमेशा भैंसों की तरफदारी करते थे, अब समझ में आया । पालना तो दूर मृत्युपर्यंत उन्हों ने गाय के दूध या उससे बने किसी आइटम को हाथ नहीं लगाया ।शिक्षाविदों सीख लो उनसे ।

हमारी शिक्षा व्यवस्था को गाय नहीं भैंस का 'आविष्कार' करने वाले विश्वामित्र की आवश्यकता है। सर्वकल्याणी 'गायत्री' का दर्शन भी तभी होगा ।

JC said...

"काला अक्षर भैंस बराबर" और "तमसोमा ज्योतिर्गमय..." आदि द्वारा 'अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के उजाले की ओर ले जाने' में सक्षम केवल 'विद्या की देवी सरस्वती', ब्रह्मा (दिन में सूर्य) की अर्धांगिनी शक्ति ('सफ़ेद साडी वाली', यानि सूर्यकिरण), और रात में देवताओं को, विशेषकर शिव को, सोमरस प्रदान करने वाली पीतवर्ण चन्द्रकिरण, अर्थात 'इंदु', के लिए ही संभव जाना प्राचीन 'हिन्दू' ज्ञानियों ने...

विभिन्न पशुओं को, चौपाये हो या दो पाये हों, सबको काल-चक्र में फँसी आत्मा जाना जो ८४ लाख स्वरुप में दिखती हैं...

"सत्यम शिवम् सुंदरम" हमारी सबसे सुंदर पृथ्वी की ओर संकेत है, जो अनंत काल से विद्यमान है...

'सास भी कभी बहू थी' समान आदमी भी कभी भैंस भी था, कह गए ज्ञानी...मूर्ख को उल्लू के साथ जोड़ा जाता है, और इस प्रकार जोंक, मच्छर, आस्तीन के सांप, आदि आदि से भी अन्य कई को...

सुंदर स्त्री को चौदहवी के चाँद ('इंदु')से भी...

विश्वामित्र ने तो त्रिशंकु को पृथ्वी और स्वर्ग के बीच ही लटका दिया था...:)

गिरिजेश राव said...

@ JC
व्यंजना में अभिधा का तड़का लगाने के लिए नतमस्तक हूँ, आर्य।
अभिवादन स्वीकार करें।

sanjaygrover said...

वैसे इसका एक नितांत शर्मनाक पहलू यह भी है कि हमारे यहां कुछेक बार गायों की खातिर दलितों को जला दिया गया है।

दसवीं के और बारहवीं के बोर्ड के एग्ज़ामस् में मैंने तो यह किया था कि निबंध के लिए वे विषय चुने जिनको लेकर मेरी कोई तैयारी नहीं थी। पूरे निबंध मौके पर ही तैयार किए और अंक भी कोई बुरे नहीं आए थे।

JC said...

ज़र्रा नवाजी के लिए शुक्रिया राव साहिब!
यह तो 'गिरिजेश' की ही कृपा है जिन्होंने भाग्यवश (सौभाग्य या दुर्भाग्य) अभी भी पीटना नहीं छोडा है वैसे ही जैसे हमारे समय में हमारे स्कूल टीचर भी पीटते थे. पर अब गुरु लोग स्वयं पिटते नजर आते हैं - पित्जा कल्चर के कारण शायद...:)

rituraj said...

maza aa gaya cow par post padhke.
khair, kuchh na kuchh dikkat to hai edacation ke format me. Nahi to jaante hue baat ko bhi na likh pana ajeeb baat hai.

ashish tiwari said...

lekin sir kuch log aise bhee to hote hain jo yeh likh dete hain ki gaay hamari mata hai humko kuch nahi aata hai.........

ashish tiwari said...
This comment has been removed by the author.
Surendra said...

english nahi aati to janab ndtv me kaise tik gaye is par bhi ek nibandh likhe...

manolok said...

भैया गाय के चार पैर होते भी हों पर हमारी शिक्षा व्यवस्था बेपाया जानवर है जिसके न सिर हैं ना पैर .

कभी दूरदर्शन पर आने वाले ignou के कार्यक्रम को देखें और फिर उसके बाद डिस्कवरी या नेशनल जिओग्राफिक चैनल देखें ,और प्रस्तूतिकरण की तुलना करें .लगता है कि कार्यक्रम रस्म अदायगी के लिए प्रस्तुत हो रहा है जिसका ध्येय विद्यार्थी को कुछ सिखाने का नहीं है.

हमारे यहाँ रोट लर्निंग की रौटेन व्यवस्था हावी है . अभी अपनी शिक्षा व्यवस्था को बहूत कुछ शिक्षा लेने कि जरूरत है.
वैसे भी हमारे गाँव देहातों के स्कूलों में शिक्षकों के लिए शिक्षा का मतलब घर बैठे हाजरी बनवाकर पगार उठाना है,और विद्यार्थियों के लिए नक़ल कर ,दूसरे से पेपर लिखवाकर या नंबर खरीदकर सर्रटीफिकेट जुगाड़ कर लेना है.अब तो ये सब मेडिकल और इंजीनेअरिंग कालेजों में भी हो रहा है .

हाँ तो अब हमारे यहाँ पैदा होने वाले यही बोपदेव डॉक्टर और बोपदेव साइंटिस्ट लोग आगे चलकर सुव्यवस्थित-चीन को टक्कर देने के लिए भारत को तैयार करेंगे .

jia raja banaras said...

गुरू,
इस लेख से एक निबंध और याद आया। पोस्टमैन पर ज़रा याद करिए 'पोस्टमैन इज़ ए गर्वमेंट सर्वेंट ही वियर्स खाकी यूनीफार्म'। पर तब का छात्र बहुत कुछ जानता भी था ये अलग बात थी कि भाषाई बैरियर ने उसको बांध दिया था। अब हालात और भी बदतर है आज की कानवेंट शिक्षा में पढ़ने बढने वाले बच्चे शायद हिंदी में भी गाय पर निबंध न लिख पाएं। और आगे आने वाले समय में कोई रवीश कुमार इतनी संवेदनशीलता के साथ इस सरल सी बात के ज़रिए गंभीर सवाल उठाएगा का शक है।

RAJ SINH said...

बहुत सही कहा आपने . अगर मुझे कोइ पूर्व निश्चित विषय ना मिलता तो मैं अपने मन से ' भैंस ' पर लिखता . :)

यहाँ टिप्पणियों में गंभीर विवेचन भी हुआ है .
शंभू कुमार जी की टिप्पणी का दर्द समझ सकता हूँ . क्योंकि मैं भी गाँव का ही हूँ (था) .

इंडिया और भारत तो चोदिये गाँव और कसबे में भी बहुत फर्क होता है !

sanjaygrover said...

वैसे आदमी की ‘‘जुगाली’’(तोतारटंत) भैंस की जुगाली से कई गुना ज्यादा खतरनाक और ‘बोरिंग’ होती है।

JC said...

ग्रोवरजी की तुलना सही लगी...एक स्कूल के होशियार सहपाठी की याद दिला दी जो स्कूल छोड़ने के कई वर्ष बाद अचानक मिला और उसको भी पुरानी बात याद आगई कि कैसे मुझे पता था कि वो पहले ७-८ बार एक पेज पढ़कर उसको हूबहू लिख पाता था... उसने बताया कि खड़गपुर से पास कर वो तब आईबीएम कंप्यूटर कंपनी में काम कर रहा था और अब वो केवल एक बार ही एक पेज पढ़ उसे वैसा ही लिखने में सक्षम हो गया था!

कृष्ण ने भी अर्जुन को बताया था कि वो केवल एक निमित्त मात्र, एक माध्यम था जिसका काम केवल क्षत्रिय धर्म निभाना था...

वेद रत्न शुक्ल said...

उत्तम...। यह भी उत्तम कि "निबंध लेखन ने तमाम छात्रों की कल्पनाओं को कुंद किया है। निबंध लेखन को फाड़ फूड़ के फेंक देना चाहिए।" कक्षा छह से स्नातकोत्तर तक जो हालत है उसको देखकर तो यही उचित है। लेकिन अगर प्रश्न के साथ यह शर्त जोड़ दी जाये कि निबन्ध 'मौलिक' होना चाहिए और उसी अनुसार अंक दिये जायें तो निबन्ध लेखन बहुत अच्छी चीज है। इससे लेखन की कला सुधरती और निखरती है। पूरा कोर्स विधिवत पढ़ाया कहां जाता है? उतने दिन कक्षायें ही नहीं चलतीं। कभी यह छुट्टी, कभी वह छुट्टी तो कभी हड़ताल। नहीं तो निबन्ध पर पूरा अभ्यास हो, सम्बन्धित विषय का अनुशीलन हो तो स्वाभाविक रूप से अच्छा लेखन हो पायेगा।
रही बात अंग्रेजी में एक्सप्रेशन की तो हिन्दी भाषी और हिन्दी माध्यम से पढ़ने वालों के साथ दिक्कत तो होगी ही। उन्हें तो रटना पड़ेगा ही। मैं तो सोचता हिन्दी में था और उसे अंग्रेजी में जिस प्रकार अनुवाद करके लिख पाता था लिख देता था। ठीक-ठाक ही लिखा जाता था। वैसे 18-20 साल पहले देहात में मैं अंग्रेजी का बहुत भारी विद्वान माना जाता था। अब तो सोचकर हंसी आती है। बड़ा हाईप क्रिएट किये थे लोग। वैसे उतनी ही अंग्रेजी अभी भी आती है जितनी आठ साल की उम्र में आती थी। बल्कि ग्रामर गायब हो गया है। यथा- नैरेशन, पंक्चुएशन, एक्टिव-पैसिव। दिल्ली आकर सिर्फ शब्दकोश में कुछ इजाफा हुआ है। लम्बी टिप्पणी के लिए मुआफ़ी।

pankaj mishra said...

bahoot accha hai raveesh ji isse pata chalta hai ki aap jameen se jude hue hai. vaise aaj hi aapki chaand fiza ki special report dekhi, bahoot shaandaar thi. aapko badhaai.

Seetu said...

baat kaha se kaha le jani hai yah koi apse seelhe...choti baat ko uthakar badi baat kah jana yah shayad apki sabse badi khasiyat hai

Seetu said...

baat kaha se kaha le jani hai yah koi apse seelhe...choti baat ko uthakar badi baat kah jana yah shayad apki sabse badi khasiyat hai

amit said...

Hi Everyone,

The post is no doubt great and touches the deepest sensibilities of a person. However, I take strict exception to the "essay allegedly written by some Civil Service aspirant". So far my knowledge is concerned, such an essay topic has never been given in the UPSC's Mains examination. The people spreading the 'item' are good-for-nothing journalists like the people at Loksatta, The Telegraph etc. who do not even apply their mind before publishing such things. A person who writes such an essay can never ever clear the UPSC's examination. Do you think a future bureaucrat will be asked to write an essay on "Cow"?!!