विज्ञापन का अंडरवियर काल

लक्स,डॉलर,रूपा,स्वागत। ये वो ब्रांड हैं जो ब्रेक में टीवी पर सेक्स,क्राइम और क्रिकेट के कार्यक्रम ख़त्म होते ही उनकी कमी पूरी कर देते हैं। इन दिनों टीवी पर ऐसे विज्ञापनों की भरमार हैं। देख कर तो लगता नहीं कि इनके स्लोगन किसी प्रसून जोशी या पियूष पांडे जैसे विज्ञापन विप्रों ने लिखी हो।

इन विज्ञापनों को बहुत करीब से देखने की ज़रूरत भी नहीं। देख सकते हैं क्या? देखना चाहिए। हर विज्ञापन में मर्द अपनी लुंगी तौलिया उतार कर बताता है कि अंडरवियर पहनने की जगह कौन सी है। क्या पता इस देश में लोग गंजी की जगह अंडरवियर पहन लेते हों। इसीलिए डायरेक्टर साहब ठीक से कैमरे को वहां टिकाते हैं। उक्त जगह पर अंडरवियर देखते ही युवती चौंक जाती है। डर जाती है। फिर सहज और जिज्ञासु हो जाती है। मर्दानगी,सेक्सुअलिटी और अंडरवियर का पुराना रिश्ता रहा है।


हमने वेस्ट से नकल की है। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत आने के बाद से ही पश्चिम मुखी भारतीयों ने अंडरवियर को स्वीकार किया होगा। पहला खेप मैनचेस्टर से उतरा होगा बाद में अपने कानपुर में बनने लगा होगा। इसमें किसी को शक हो तो एक भी विज्ञापन ऐसा दिखा दे जिसमें लंगोट के मर्दानापन की दाद देते हुए उसके टिकाऊ होने का स्लोगन रचा गया हो। भारतीय संस्कृति के प्रवर्तकों के बाद समर्थकों के इस युग में कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो लंगोट को भारतीय मर्दानगी का प्रतीक बनाने के लिए कंपनी बनाये,टीवी पर विज्ञापन दे। कहे-लंगोट- चोट न खोट। सब के सब इस पाश्चात्य अंडरवियर काल में बिना प्रतिरोध किये जी रहे हैं।

आप चाहे जितना कमज़ोर हों होज़ियरी के अंडरवियर बनियान को पहनते ही ताकतवर हो जाते हैं। विज्ञापनों में अंडरवियर प्रदर्शन के स्थान का भी आंकलन कीजिए। पता चलेगा कि अंडरवियर पहनने या उसे प्रदर्शित करने की जगह बाथरुम,बेडरुम या स्वीमिंग पूल ही है।अभी तक किसी विज्ञापन में अंडरवियर पहनन कर कारपोरेट रूम में आइडिया देते हुए शाहरूख़ ख़ान को नहीं दिखाया गया है।अंडरवियर के विज्ञापनों में कोई बड़ा माडल नहीं दिखता। नाकाम और अनजान चेहरों की भीड़ होती है। सनी देओल जैसे बड़े हीरो सिर्फ गंजी या बनियान के विज्ञापन में ही नज़र आते हैं।

कोई नहीं कहता कि अंडरवियर अश्लील है।यह बात अभी तक समझ नहीं आई है कि अंडरवियर के विज्ञापन में अचानक युवती कहां से आ जाती है।वो स्वाभाविक रुप से वहीं क्यों देखती है जिसके देखते ही आप रिमोट उठा लेते हैं कि ड्राइंग रूम में कोई और तो नहीं देख रहा।यही बात है तो कॉलेज के दिनों में लड़के ली की जीन्स और वुडलैंड की कमीज़ पर पैसा न बहाएं। सौ रुपया अंडरवियर पर लगाए और यही पहन कर घूमा करें। लड़कियां आकर्षित हो जाएंगी।एक सर्वे यह हो सकता है कि लड़कियां लड़कों में क्या खोजती है? अंडरवियर या विहेवियर। डॉलर का एक विज्ञापन है।लड़का समुद्र से अंडरवियर पहने निकलता है। पास में बालीवॉल खेल रहीं लड़कियों की उस पर नज़र पड़ती है।देखते ही वो अपना बॉल फेंक देती हैं। पहले अंडरवियर देखती हैं फिर नज़र पड़ती है ब्रांड के लेबल। अच्छे ब्रांड से सुनिश्चित हो लड़कियां अंडरवियर युक्त मर्द को घेर लेती हैं। अंत में एक आवाज़ आती है- मिडास- जिस पर सब फ़िदा। एक विज्ञापन में एक महिला का कुत्ता भाग जाता है। वो कुत्ते को पकड़ते हुए दौड़ने लगती हैं। तभी कुत्ते को पकड़ने वाले एक सज्जन का तौलिया उतर जाता है। सामने आता है अंडरवियर और उसका ब्रांड। युवती फ़िदा हो जाती है। इसी तरह अब लड़कियों के लिए भी विज्ञापन आने लगता है। एक विज्ञापन में टीवी फिल्म की मशहूर अदाकारा(नाम नहीं याद आ रहा) अचानक उठती हैं और लड़कियों को गाली देने लगती है कि तुम सब ठेले से क्यों खरीदती हो। उन्हें ललकार उठती हैं। यह ललकार उनकी क्लास रूम से बाहर जाती है। पूछती है कि जब लड़के पहन रहे हैं,तो आप लोग क्या कर रही हैं। दूसरी तरफ लड़कियों के उत्पादों में लड़के नहीं आते। वहां या तो एक लड़की होती है या कई लड़कियां। उन्हें पहनता देख या पहना हुआ देख कोई मर्द खीचा चला नहीं आता। यह विज्ञापन जगत का अपना लिंग आधारित इंसाफ है। अवमानना से बचने के लिए चुप रहूंगा।


मर्दानगी की सीमा कहां से शुरू होती है और कहां ख़त्म अंडरवियर कंपनी को मालूम होगा। इतने सारे विज्ञापन क्या बता रहे हैं? क्या अंडरवियर कंपनियों में यह विश्वास आ गया है कि वो अब टीवी पर भी विज्ञापन दे सकते हैं। हाईवे और हाट तक सीमित नहीं रहे। अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनलों पर इस तरह के विज्ञापन का आक्रमण कम है।कहीं ऐसा तो नहीं कि हिंदी प्रदेशों के उपभोक्ताओं का अंडरवेयर पहनने का प्रशिक्षण किया जा रहा है।प्रिंट में तो इस तरह के गुप्त वस्त्रों का विज्ञापन आता रहता है। लेकिन टीवी पर संवाद और संगीत के साथ इतनी बड़ी मात्रा में सार्वजनिक होता देख विश्लेषण करने का जी चाहा।


यह भी भेद बताना चाहिए कि गंजी के विज्ञापन की मर्दानगी अलग क्यों होती है। क्यों सनी देओल गंजी पहन कर गुंडो को मार मार कर अधमरा कर देता है। जबकि उसी कंपनी का गुमनाम मॉडल जब अंडरवियर पहनता है तो उसकी मर्दानगी दूसरी किस्म की हो जाती है। वो किसी को मारता तो नहीं लेकिन कोई उस पर मर मिटती है। ख़ैर इस बाढ़ से परेशानी हो रही है। मुझे मालूम है कि देश को स्कूलों में सेक्स शिक्षा से एतराज़ है। अंडरवियरों के विज्ञापन में सेक्सुअलिटी के प्रदर्शन से किसी को एतराज़ नहीं। इसका मतलब यह नहीं कि कल कोई मानवाधिकार आयोग चला जाए। यहां मामला इसलिए उठ रहा है कि इसे समझने की ज़रूरत है। इतने सारे विज्ञापनों का अचानक आ जाना संदेह पैदा करता है। इनका कैमरा एंगल बदलना चाहिए। हर उत्पाद का विज्ञापन होना चाहिए। उत्पादों को सेक्सुअलिटी के साथ मिक्स किया जाता रहा है। बस इसमें फर्क इतना है कि मामला विभत्स हो जाता है। बहरहाल न्यूज़ चैनलों को गरियाने के इस काल में उस विज्ञापन को गरियाया जाना चाहिए। कुछ हो न हो थोड़ी देर के लिए न्यूज़ चैनलों को आराम मिल जाए। वैसे भी एक अंडरवियर का विज्ञापन यही तो कहता रहा कई साल तक-जब लाइफ़ में हों आराम तो आइडिया आते हैं। लक्स अंडरवियर का विज्ञापन कहता है कि अपना लक पहन कर चलो।

17 comments:

sanjay patel said...

रवीश भाई ये उत्तेजना को भुनाने का कालखंड है.निश्चित रूप से होर्डिंग्स,टीवी और प्रिंट के ज़रिये ये इश्तेहार मनुष्य की समवेदनाओं को बाज़ारू बना रहे हैं.इन सब कार्यों में बाज़ार की अहम भूमिका है और दु:ख इस बात का है कि बाज़ार हमारे अवचेतन और कोमल मन को प्रदूषित करने में क़ामयाब है.पच्चीस बरस इश्तेहारों को दुनिया में काम करने के बाद ये भी कहना चाहूँगा कि अस्सी के दशक तक प्रिंट अभद्र अभियानों के लिये सतर्क नज़र आता था लेकिन अब वहाँ भी स्पेस को बेचना एक विवशता नज़र आ रही है.दिल खोल कर बातें करें जैसे अभियानों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है और किशोर से युवा होती पीढ़ी अब उनकी ओर आकृष्ट होकर अपने आप को बरबाद करने में लगी है.हम सूचना के अतिरेकी समय में जीने को मजबूर हैं.चिट्ठी का आना,धर्मयुग के आख़िरी पन्नो पर वी.पी.पी से मंगवाइये जैसे रोचक इश्तेहारों का अकाल है अब. अब टीवी. आउटडोर,प्रिंट को अपने को बेचना है तो उसके लिये कुछ भी बेच देंगे जनाब ...अंडरवियर तो क्या कल से.....

सुबोध said...

रवीश जी बड़ी सीरियसता से सोचा आपने...मनोहर श्याम जोशी के लेख का असर लगता है...आगे चलकर ये काल विज्ञापन का अंडरवियर काल कहलाएगा...और विज्ञापन के छात्र युग के नामकरण के लिए आपका शुक्रिया अदा करते नहीं थकेगें..इस गंभीरली चिंतन के लिए थैंक्यू...

ravish said...

संजय जी
अच्छा लगा आपकी टिप्पणी से। क्यों नहीं आप भी कुछ इस पर लिखते हैं। विज्ञापन का खुलापन, नैतिकता, संकट आदि। पच्चीस साल का अनुभव तो अपने आप में इतिहास की एक किताब है। हम सब पाठक भी इससे लाभान्वित होते और विज्ञापन को समझने का और मौका

ग़ुस्ताख़ said...

2007रवीश जी, मुमकिन है कि आपको याद हो, ब्लेडों और शेविंग क्रीम के एड भी बिना लड़कियों के पूरे नहीं होते। बेल्ट के उपर की मर्दानगी ्लग किस्म की होती है नीचे की अलग किस्म की। बेल्ट के ऊपर की मर्दानगी का सामना किसी दूसरे पुरुष को ही करना पड़ता है, नीचे वाली मर्दानगी का शिकार कोई औरत होती है। एक एड शायद आप उसका जिक्र करना भूल गए, जिसमें एक महिला अंडरवियर को देख कर ही उत्तेजित हो जाती थी। अमूल माचो का एड था शायद। बाद में सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उस पर रोक लगा दी। एक दूसर एड में लड़की खास ब्रांड के अंडरवियर में लड़के को सजा देखकर दरवाजा भेड़ देती है। ऐसे विग्यापनों पर दया आती है, और यह भी लगता है कि कैसे हमारा समाज उसे सहजता से ले रहा है। लेकिन एक और एड है जिसकी तारीप करने का मन कर रहा है लवह किसी हैवल कंपनी के केबल का है जिसे देखकर प्रेमचंद के हामिद वाली कहानी ईदगाह की याद आती है। मां के चेहरे पर आए प्यार के भाव देखने लायक हैं। उसका भी जिक्र करें किसी लेख में तो बढिया लगेगा।

JC said...

Bahut bardhiya lekh aur comments bhi!
Shayad course ke bahar lagega ‘adhunik Hinduon’ ko, kintu kaliyuga mein yeh hona to nischit hi mana gaya hai gyaniyon dwara – manushya ka bartav bad se badtar dristigochar hona… Kintu sath hi unhone yeh bhi kaha ki ‘satya’ kal ke prabhav se achoota rahta hai, “kyunki wo under ki baat hai!” Shayad under-wear ki bhi (langoti ho ya kuch aur)! Yogeshwar Shiva arambh mein Digamber the – ardhanarishwar athva sampoorna…Drama to Sati ne Parvati ke roop mein Shiva se bhinna ho racha!
Aur, Yogi apke dwara ingit gupt kshetra ke bhiter shakti ka ‘mooladhar chakra’ darsate aye hain – jidher se Irda, pingla, aur sushumna nadiyon ki dharayein behti hain, jaise Ganga, Yamuna, Saraswati (athva Brahmaputra, Saraswati ke lupta ho jane ke paschat)…Samudra, vatavaran, aur dharati per vistarit jal usi ek ke pratimba saman vyapit hein!
Prabhu ki leela aparampar!

Rajesh Roshan said...

सभ्य समाज में अंडरवियर को लेकर बात नही की जाती. लेकिन रीमा लागू जब महिलाओ के अंडरवियर के बारे में बात करती है तो इसे नया प्रयोग के र्रोप में देखा जाता है. यह अश्लीलता कम जागरूकता का पुट समझ में आता है. अंडरवियर की ब्रांडिंग की जाती है. इसका आईडिया भी कोई एड एजेन्सी ही लेकर आता है.

मेरे समझ से ब्रांडिंग में कोई दिक्कत नही है लेकिन उसमे अश्लीलता न डाली जाए.

कुमार आलोक said...

आज सवेरे आफीस पहुंचा एक पत्रकार दोस्त लेटेस्ट टीआरपी का कापी दिखा रहा था ...न०-१ - इँडिया टीवी . न०-२ आजतक ..न०-३- स्टार न्यूज ...सबसे निचे था सत्य सवॆत्र और संपूणॆ (डीडी) ..प्रगतीशील लोग एनडी टीवी देखते है ..वो भी इस दौड से बाहर ही था । बाजार हर चीज को संचालित कर रहा है । आरुषी , सुसायड और हाल ही में घटित बालाजी टेली फिल्म के अधिकारी को टुकडों में काटकर जला देनी की घटना ...क्या आपको नही लगता सास बहू टाइप के सीरियलों ने ऐसे रोग को मैट्रो से छोटे शहरों तक पहुंचा दिया है ....रही बात अंडरवियर की ...आज की युवा पीढी लंगोट को हास्यास्पद करार देगी क्यूंकि ये पीढी आज लंगोट की कमजोर हो गइ है।

sanjay patel said...

रवीश भाई;
हम छोटे शहर वालों ने तो इश्तेहारों की दुनिया में कोई बड़ा कारनामा नहीं किया लेकिन इस बात का ख़ास इत्मीनान है कि भद्रता की मर्यादा हमसे कभी न टूटी न टूटेगी.मेरे साथ काम किये कई युवक/युवतियाँ आज मुंबई,दिल्ली में एजेंसियों मे काम कर रहे हैं वे जब मिलते हैं तो तथाकथित खुलेपन पर ज़रूर बात होती है. वे कहते हैं कि आप मिनी मेट्रो में बैठे हैं और वहीं आपको स्थानीयता के तक़ाज़ों में आपको अपनी बात कहनी है लेकिन हमें (यानी मुंबई/दिल्ली वालों को) पूरे देश से संवाद करना है...हर काम की जल्दी है...जल्द से जल्द ब्रॉड को पूरे देश में फ़ैकना है तो यह तो थ्रील या उत्तेजना पैदा किये बिना संभव नहीं (मै असहमत हूँ फ़िर भी बता भर रहा हूँ)तो ये सब तो रवीश भाई और संक्रामक होगा और इस तरह के इश्तेहारों की ब्राँड कैटेगरी भी विशिष्ट है. ऐसा नहीं कि अंडरवियर के इन इश्तेहारों से पूरी एडवरटाइज़िंग जमात को ख़ारिज किया जाए.डेरी मिल्क,वीआईपी लगेज,ओनीडा,ब्रुक बाँड,नैरोलैक,एशियन पेंट,और हा पर्सिस खंबाता वाले गार्डन साडी के इश्तेहार किसी कविता से कम नहीं थे.तीव्रता और तीव्रता के झमेले ये सारा तामझाम जुटाया जा रहा है रवीश भाई...आपका सुझाव सर माथे...अपने ब्लाँग पर (या आपने इजाज़त दी तो क़स्बे में आकर)ज़रूर अपने अनुभव को साझा करूंगा.

निखिल आनन्द गिरि said...

मस्त लगा अंडरवियर विशेषांक पढ़कर...समय का पहिया तेज़ी से घूम रहा है....जल्द ही लड़कियों के अंडरवियर में लड़के भी दिख जायेंगे....दिल्ली में तो आप जिधर से गुजरें, दर्जनों नौजवान मिल जायेंगे (लडकियां भी शामिल) जिनकी जॉकी जींस के बाहर झांकती है....जिनकी नहीं झांकती, आप समझ लें कि दिल्ली आकर उनका "आंतरिक" परिवर्तन अब तक नहीं हुआ है.....इस प्रक्रिया में समय तो लगता है मगर एक बार जॉकी दिखाने की कला आपने सीख ली तो फ़िर आप दिल्ली के "नॉट अमोंग्स्ट अस" वाले ग्रुप से हट जाते हैं...आप दिल्ली वाले हो जाते हैं...

रही बात गंजी की तो दिल्ली में गंजी पहनना एक विलुप्त होती प्रक्रिया है.....टी-शर्ट और जींस के बीच अगर कुछ आ सकती है तो सिर्फ़ चड्डी(माने जॉकी...) जिसकी जींस जितनी ज्यादा नीचे सरकती है, आधुनिकता की टी.आर.पी. में वो उतना ही ऊपर....जब दिल्ली नया आया तो एकाध दोस्तों को बोल भी देता था कि भाई, ज़रा संभल के बैठो....तुम्हारी अंडरवियर दिख रही है,....(लड़कियों को बोलने में झिझक होती है, नही तो आज भी मन करता है....) मगर अब समझ आ गया है कि शहर बदलने से आदतें बदलने लगती हैं... मेरा देखने का नजरिया क्यों नही बदला...जवाब ढूंढ रहा हूँ....

ravish said...

निखिल
मुझे बहुत मज़ा आ रहा है आप सब की प्रतिक्रिया देख कर। हर प्रतिक्रिया मूल लेख से आगे है। संजय जी बातें हों या राजेश और सुबोध की। सबमें कुछ न कुछ है।
आपकी बातों से लगता है कि पहले समाज में अडरवियर पहनने के मामले में बदलाव आया। फिर विज्ञापनों ने उसे सामाजिक बनाया। जैसा कि संजय पटेल जी कहते हैं कि इसी विज्ञापन की दुनिया में कुछ ऐसी बेहतरीन रचनाएं हैं कि वह तमाम क्षणिक या लघु किस्म की साहित्यों से ज़्यादा महान और सनातन है।
अब समझ में आया कि अंडरवियर दौर सामाजिक परिवर्तन के बाद की घटना है। मतलब पहले लोगों ने दिखाना शुरू किया जॉकी को। फिर विज्ञापनों में आ

डा० अमर कुमार said...

आज से अंडरवियर पहनना बन्द, यह मेरा संकल्प !!

निखिल आनन्द गिरि said...

प्रभु जोशी जी का एक बड़ा ही सटीक आलेख है "हिन्दी के हत्यारे"....(मैंने उदय प्रकाश जी के ब्लॉग पर पढी थी..) उन्होंने बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से बताया है कि कैसे हिन्दी के अखबार ही हिन्दी को सिरे से मिटाने के लिए दिन-रात एक कर जुटे हैं (पहले ये शामत उर्दू पर आई थी)....
ठीक वैसे ही हमारे लंगोट गायब करने में हम हिन्दुस्तानी सबसे ज्यादा तत्पर हैं...लंगोट तो खैर मेरे होश संभालने से पहले ही अपने दिन गिन रहा था, अब तो देसी जान्घिये भी बगलें झाक रहे हैं....जॉकी "स्टेटस सिम्बल" है...
रवीश जी, आपने सही कहा, पहले हमारे पहनावे में बदलाव आया...बाद में कैमरे की नज़र हमारे अंतर्वस्त्रों पर गई और विज्ञापन बने...ये हमारी सभ्यता के इतिहास में एक अध्याय बन सकता है...

बहरहाल, ये अमर जी ने कैसा संकल्प ले लिया...अंडरवियर नही पहनेंगे तो काम कैसे चलेगा...खैर, रवीश जी इसपर दूसरा अंक लेकर भी ज़रुर आयें...तब बात और भी बढेगी....हाँ, एक बात और...वो जोच्केय के प्रचार को जो तरीका मैंने बताया, उसमें लडकियां ज्यादा आगे हैं...आप सर्वे करा सकते हैं....

Ranjitt Khomne said...

How thought-provoking! But will it set them thinking, Ravish?! I also fail to understand who likes such ads or stories and how are these encouraged..How come the producer approves of these things..Who suggests the rating? The surveys or the TRPs? Or the intellectual heads at the top who seem so eager to fall to the bottom so often? There are so many surveys every few days now which grab page 1 of newspapers. Perhaps, we all doubt the veracity of these surveys. More or less same can be said about the TRPs..Otherwise, such undergarment ads and stories like 'Aur jinda nikla magarmachha ke muh se char sal ka bachcha...' won't be showing on channels which rule the so-called top charts..What do you say?!

Rang Nath said...

aap ka blog dekhata hu. aapka concern jahir taur par apne humpesha logo se vyapak h. mai is post par pratikriya dene ko majboor hua. mujhe ye nhi samajh aaya ki aap log underwear ke khilaf likh rahe h ya uske commercilisation pe. isi tarz pe aslilta aur aur underwear ke bazarikaran ke bich fark karna muskil dikh raha h. bat chalani h ti aurat ke commercial use pe chalayi. har chij ke commodity me badal jane ke upar chalayiye. aap logo ne jo chintaye jatayi h un chijo se america me 20,30 ke decade me hi jujha ja chuka h. noam chomsky media ke isi bazarikaran aur autocratic nature ko reveal karne ke karan charcit huye the varna wi ek bhasavid hi the

mintofresh said...

guru ye electronic media to poori sanskriti ko duba denge

Seetu said...

maine ek bar kisi channel par aise vigyapano ki shikayat darz karane wala ek vigyapan dekha tha.kyo nahi hum log inki madad lete hai kyonki baccho aur sex ko lekar aise ghatiya vigyapano ki bharmar hai.bhuudijeevi sirf bhashanbaji ke hi liye hai kya?

indscribe said...

Ravish sahab,

Aadab Arz

Aapne umda likha hai. Urdu mein ham ise zer-jaama kahte haiN aur yeh afsos ki baat hai ki yeh sab pesh kiya ja raha hai.

Lekin is ke khilaaf koi rad-e-amal society se nazar nahiiN aata. iski kyaa vajeh hai?

Filhaal to Hindustani mard ka 'bulge' har naye underwear ke ishtehaar mein baDhtaa hi jaa raha hai.