धमाके में मारे गए लोगों का वर्ग

बहुत कम एंकर थे जो शांत और धीर अंदाज़ में बताने की कोशिश कर रहे थे। जयपुर धमाके के बाद उत्तेजित टीवी एंकर यूं चीख रहे थे गोया उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा खोला हो। और तो और यह भी बताने लगे कि जहां धमाके हुए वो निम्न वर्गीय इलाका था। इस तरह का आर्थिक विश्लेषण सुन कर कई सवाल करने का जी चाहता है। भाई साहब लोग, धमाकों का निम्न या उच्च वर्ग से क्या ताल्लुक। अगर कोई निम्न वर्ग(ग़रीब का पर्यायवाची शब्द) का आदमी इस तरह की घटना में शामिल हो भी तो इससे धमाके का मकसद या उसकी रणनीति का कौन सा बड़ा पहलू सामने आता है। क्या कभी पता चल पाया है कि धमाकों में इस्तमाल किया जाने वाला आखिरी आदमी ग़रीबी के कारण इसकी चपेट में आया या फिर किसी और मकसद के कारण। इसका कोई पुख्ता जवाब नहीं मिल पाया है। एंकर तब भी पूछता है कि मध्यमवर्गीय या निम्नवर्गीय इलाका था.क्या इरादा रहा होगा यहां धमाका करने का? भई साफ है। आतंकवाद ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को निशाना बनाने की कोशिश करता है। इसलिए वहां पहुंचता है जहां लोगों की भीड़ होती है। दिल्ली के डिफेंस कालोनी में नहीं जाएगा जहां सभी घरों में बीस फुट ऊंचे दरवाज़े लगे होते हैं और बाहर सन्नाटा पसरा होता है।

फिर भी जवाब में रिपोर्टर बोलता है कि फ़ैज़ाबाद में भी अदालत में धमाका हुआ था तो वहां निम्नवर्गीय लोग ही जाते थे। वाराणसी में भी मंदिर में निम्न मध्यमवर्गीय लोग ही पूजा करने गए थे। जयपुर में भी हनुमान जी की पूजा करने के लिए लोग जमा हुए थे। यह इलाका कामगारों का है। यह मज़दूर रहते हैं। इस घटना से उनके वर्गीय चरित्र का क्या संबंध जुड़ता है समझना मुश्किल है। फिर भी एंकर घायलों और मारे गए लोगों का वर्ग जानने की कोशिश करता है।

क्यों? क्या हर आतंकवादी घटना आर्थिक कारणों की देन है? क्या आतंकवाद सिर्फ निम्नवर्गीय लोगों के सहारे किया जाता है और निम्नवर्गीय लोगों को निशाना बनाता है? क्या यह अपराध की तरह सभी वर्गों में सार्वभौम रूप से मौजूद नहीं है। इलाके का प्रोफाइल वर्ग से क्यों बताते हो पार्टनर। लगातार बोलने की मजबूरी का कुछ तो विकल्प होगा। एक बात तो समझ में आती है कि वर्गीय विश्लेषण इसलिए किया जाता है ताकि जहां धमाका हुआ उस इलाके के बारे में बताये। भारत जैसे देश में कुछ मोहल्लों को छोड़ दें तो बाकी जगहों को वर्ग के आधार पर बताना ठीक नहीं होगा। ग़रीब अमीर सब मिले होते हैं। और अमीरों के अमीर अंबानी जी तो हवामहल नहीं देखने जाएंगे न। हो सकता है हनुमान मंदिर के बाहर लाइन में खड़ा कोई भक्त शहर का धन्ना सेठ हो जो अपनी श्रद्धा से वहां जाता हो। एक समय में उस इलाके में तमाम वर्गों के लोग होते हैं। फिर कोई एक वर्ग की तलाश

11 comments:

aprajita said...

आपने ऑपरेशन चक दे वाली पोस्ट में लिखा था कि जब कोई चैनल अच्छा काम करे तो एक चैनल की बजाय उस चैनल का नाम क्यों ना लिखा जाए। अब एंकर-रिपोर्टर क्यों, उनके नाम क्यों नहीं? हादसों में ऐसे सवाल-जवाब करने वाले इन महान और बुद्धिमान रिपोटर्स और एंकर के बारे में सभी को पता हो । हो सकता है उनको बुरा लगे पर अगली बार शायद हादसा होने पर उसमें वर्ग न देखकर कोई और पहलू खोजें...

सुशील राघव said...

ravish ji news channels par chal rahe fotage mein jo kuch dikh raha tha use dekh kar varg ki baat karna baimani hai. jaipur ki galio mein hamne jo khoon dekha vo to vishesh rang ka na ho kar lal hi tha. kya hum hatahaton ko vargo mein bantna kanha tak tik hai? hum kab es mansikta se bahar niklenge.

हर्षवर्धन said...
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JC said...

Itihas darshata hai ki ‘Bharatiya’ kabhi bhi ek na ho saka hai, aur shayad kabhi na ho sakega. Dosh kiska hai pata hote hue bhi pata nahin! Pracheen Bharatiya ise kal ka prabhav keh gaye…
'Sapta-dweep' ka nam Bombay sadiyon tak chala. Kintu ab 'rajniti' karne ke liye dharati-putra aur TV channels dhyan batane ka kam karte nazar ate hein aur is prakar atankiyon ko mauka de rahe hain wahan pahunchne ka jahan ‘Ravi’ bhi pahnchne ki himmat nahin kar sakta hai...Rajasthani Rani Mirabai jaisi ‘Kavi’ ki kami khal rahi hai - kuch ek ‘Hinduon’ ko…

संजय बेंगाणी said...

मरने वालो की जात न पूछी कम्बख्तो ने?

Rajesh Roshan said...

रवीश मैं सम्पादकीय का आदमी हू. अभी कल ऑफिस में अप और अफ्प पर चाइना की भूकंप की तस्वीरे देख रहा था. Xinhua ने जो इमेज issue की थी उनमे एक खून का दाग नजर नही आ रहा था. AP और AFP की अपनी Images में ३ में मृत और एक में खून दिखा.

यहाँ तो uncut भी बनता है तो खून से सराबोर जमीन ये बताने के लिए काफ़ी होता है की VT काटने वाले लोग और उनको निर्देशित करने वाले लोग कैसे होते हैं!!!!

Sarvesh said...

media is happless and cofused to what to show what not to show. What to speak or what not to speak on national channels. Although I was shocked and shattered by the incidence, prefered not to watch on confused channels.

कुमार आलोक said...

सर विस्फोट के दिन गया था जयपुर कवर करने। लाइव इनपुट्स भी देना था सो दिया। कैसे कोइ वर्ग के बारे में पूछता है ऐसी घटनाओँ के बाद ...आतंकवादियों की ना तो कोइ जाति है ना ही मजहब..उनका गोल एक ही था ..पहले तो विस्फोट और उसके बाद उन्हें उम्मीद थी सांप्रदायिक देंगे की जिसे जयपुर की जनता ने उनके मंसूबे पर पानी फेर दिया ..मंदिरों के आसपास ही क्यूं विस्फोट कराये गये..रही बात वर्ग की तो इसमें निश्चित रुप से वही लोग ज्यादा चपेट में आए जो कामगार थे..चांदपोल बाजार के हनुमान मंदिर में एक धनाढ्य बृद्ध महिला रोज अपनी महंगे गाडी से उतरकर वहां के भिखारियों के लिए खाना लेकर आती थी और खिलाती भी थी..उस दिन भी आइ थी अपने दो नन्हें मुन्ने नातियों को लेकर ..उनके बच्चे गाडी में ही बैढे थे ..वृद्ध महिला खाना खिला रही थी विस्फोट हुआ .महिला तो बच गइ लेकिन उसके दोनों बच्चे मौत की आगोश में सो गये ..कैसे आप डिफाइन करेंगे वर्ग का ..
एक बात ने मुझे और उद्देलित किया विस्फोट के 24 घंटे भी नही हुए थे 14 तारिख की शाम 6:30 में विभिन्न चैनलों के प्रसारण पर जरा ध्यान देंगे।
1.
आज तक :- कामेडी शो ( राजू के रंग , गब्बर की केबीसी,गब्बर के संग नाची बसंती)
2.
समयः- बालीबुड की दुनीया
3.
तेज :- ग्रह गोचर से संबंधित कार्यक्रम
4.
इंडिया टीवी : (कार्यक्रम : कामेडी का ओवरडोज)
5.:
इटीवी (राजस्थान) : फैशन की दुनिया से संबंधित कार्यक्रम
6. ऐमेच 1 : स्वास्थ्य संबंधित कार्यक्रम
चैनलों के लिए शायद इतनी बडी खबर साढे 22 घंटे में ही बासी हो गइ।

Suresh Chandra Gupta said...

क्या बम फटने से पहले यह पूछेगा कि तेरी जति क्या है या तू किस वर्ग को बिलोंग करता है? वह तो समय आने पर फट जाएगा. अब यह आश्चर्य कि बात है या आतंकवादियों की प्लानिंग कि फटते बम के आसपास राजनीतिबाज नहीं होते? मरते बस आम आदमी हैं.

Sarvesh said...

आलोक जी उस समय एन डि टी वि पर क्या चल रहा था. पुरा देश मे इस बात पर चर्चा हो रहि है कि मारे गये लोगो क मजहब नहि मालुम. मारे गये लोगो मे सारे मजहब के लोग थे. लेकिन बिहार उत्तर प्रदेश के लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि उनका वर्ग क्या था, अमिर थे कि गरिब, २७% वाले मे थे कि १५% वाले मे के, कि उसके बाहर वाले. कब सुधरेन्गे हम.

कुमार आलोक said...

सर्वेश भाइ बदकिस्मती से एनडीटीवी ट्यून नही हो पा रहा था हां लाइव इंडिया जरुर स्पेशल कर रहा था विस्फोट पर।