आश्रम जाम की सत्या कथा

मास्कों पोस्टिंग के बाद जब वह दिल्ली आया तो इस शहर को देख कर बौरा गया। अपनापन ढूंढने की चाह में इस शहर की गंदी चीज़ भी उसे हीरे की तरह चमकती नज़र आने लगी। वो आश्रम चौराहे से ठीक पहले लाजपत नगर चौराहे के पास ढाबे में दाल फ्राई खाना चाहता था। दाल की छौंक की गंध उसे बार बार इस रास्ते पर ले आती। भारतीय विदेश सेवा में चुने जाने से पहले मनोज प्रकाश लाजपत नगर के ही एक जर्जर मकान में रहता था। मकान में खिड़की नहीं थी। सिर्फ दरवाज़ा था। रेल का डब्बा लगता था उसका कमरा। इस कमरे की सडांध से निकलने के बाद उसे आश्रम चौराहे पर ही खुली हवा मिलती थी। बात नब्बे के दशक की है। बाबरी मस्जिद गिर चुकी थी। राजनीति गरम हो चुकी थी। मनोज बीच रात को सेक्युलर और मुक्त आकाश की आकांक्षा में आश्रम और लाजपत नगर के बीच टहलने लगता था। रिंग रोड के दोनों किनारे पर बने मकान को लेकर वह पूंजीवाद के प्रति क्रिटिकल हो जाता था। मार्क्स और मनमोहन सिंह के बीच के द्वंदवाद को समझते समझते उसकी जवानी अपना मतलब ढूंढ रही थी।

उसका एक और मित्र आकाश नया नया सिगरेट पीना सीख रहा था। उसके लिए यह जगह एक किस्म की आज़ादी थी। तब न तो लाजपत नगर चौराहे पर कोई फ्लाईओवर था न आश्रम पर। वो ज़माना कुछ और था जब जाम में फंसे लोग अख़बारों में पढ़ा करते थे कि आश्रम फ्लाईओवर का काम कब पूरा होगा। कब इस जाम से मुक्ति मिलेगी। मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुष्मा स्वराज सबने कहा था कि मस्जिद गिरने का गम आश्रम पर बनने वाले फ्लाईओवर से हलका हो जाएगा। यह वो समय था जब पुल और सड़क के सहारे अपनी राजनीति चमकाने का दौर शुरू हो रहा था। विकास की राजनीति की ओट में सियासत के झूठे बर्तन मांजे जा रहे थे। मनोज प्रकाश और आकाश सिगरेट पीते पीते यही सोचा करते कि रात को दिल्ली देखने का अपना ही मज़ा है। बिहार में ऐसी रात तो होती ही नहीं। लालू के राज में जब से पिछड़ों को आवाज़ मिली है तब से वहां बाकी चीज़ों का बेड़ा गर्क हो गया है। कम से कम लाजपत नगर से लेकर आश्रम के बीच का रास्ता उन्हें काफी खुला लगता। पूरे भरोसे के साथ सिगरेट पीते टहला करते थे कि इस वक्त तो कोई नहीं देखेगा। जवानी में सिगरेट सेवन कितना भी बेफ़िक्री का आलम क्यों न हो लेकिन इस एक फ़िक्र के बिना सिगरेट नहीं पी जा सकती।

चुटकी लेते हुए आकाश मनोज से पूछ बैठा,यार तुम कम्युनिस्ट ही सिनिकल क्यों होते हैं? मनोज का जवाब था क्योंकि हम क्रिटिकल होते हैं। मनोज कहने लगा पता है सीताराम येचुरी भी एक दिन इसी जाम में होगा। उसकी गाड़ी फंस जाएगी। आकाश बोल उठा साले ये तो तुम्हारा नेता है। तुम तो इसके लिए पोस्टर लगाते हो, नारे लिखते हो। मनोज ने सिगरेट का कश अंदर तक खींचा और कहा कि पता है कम्युनिस्ट आंदोलन सिर्फ एक स्लोगन साहित्य है। साहित्य से विचारधारा नहीं पनपती। प्रकाशक पनपते हैं। आलोचक पलते हैं। पता है कि दास कैपिटल के प्रसार के लिए कितने पेड़ काट कर लाखों प्रिंट छापे गए, कितने लाइब्रेरियन को कमीशन दिया गया। तुम्हें कुछ नहीं पता। लोकतत्र से कम्युनिस्ट आंदोलन नहीं लड़ सकता। वो गठबंधन का हिस्सा होकर अमरीकी नीतियों का विरोध ही कर सकेगा। आने वाले वक्त में जब हरकिशन सिंह सुरजीत बूढ़े हो जाएंगे तब सीताराम यही करेंगे। सरकार में रह कर उसे धमकी देंगे।

बातचीत करते करते दोनों भोगल तक चले जाते और धुंआ छोड़ते छोड़ते वापस आ जाते। यह सड़क उनके जवान होने की प्रक्रिया का हिस्सा बनने लगी। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि फ्लाईओवर बनने से रिंग रोड के इस हिस्से की किस्मत बदल जाएगी। कुछ साल बाद उनकी किस्मत बदल गई। मनोज प्रकाश विदेश सेवा के लिए चुन लिया गया और आकाश किसी कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट हो गया। इस बीच फ्लाईओवर का काम पूरा हो गया।

लेकिन तब दोनों दिन के उजाले में जाम के कारण ही सड़क आसानी से पार कर लेते। और पहुंच जाते उस ढाबे पर। दाल तड़का और तंदूरी रोटी खाने। दाल की छौंक दोनों के ज़हन में इस कदर उतर गई कि उसकी याद हर वक्त सताने लगती। एक बार आकाश थाईलैंड में मसाज करवा रहा था तभी वह दाल की छौंक की गंध से तड़प उठा। वो चिल्लाने लगा कि आश्रम पहुंचना है, वहां फ्लाईओवर से उतरते ही लाजपत नगर चौराहे पर एक ढाबा है जहां कोई उसके लिए दाल तड़का बना रहा है। मसाज करने वाली मोहतरमा को लगा कि उसका कस्टमर पगला गया है।

छौंक की इस गंध से मनोज प्रकाश भी परेशान रहा करता था। लेनिनग्राद की चौड़ी और विशालकाय सड़के भी वो मज़ा नहीं देती जो मजा उसे आश्रम और लाजपत नगर के बीच के रास्ते को याद कर मिलता। वो अक्सर अपनी पत्नी को कहता दिल्ली चलना तुम्हें वो सड़क दिखाऊंगा। मूलचंद और आश्रम के बीच का हिस्सा मेरा है। वहां से गुज़रना किसी सपने को बार बार हासिल करने जैसा लगता है। मास्को से दिल्ली लौटते ही मनोज प्रकाश डीएनडी एक्सप्रैस वे से सीधा आश्रम फ्लाईओवर पहुंचा। वहां से लाजपत नगर फ्लाईओवर पर पहुंच कर नीचे उस ढाबे को देखने लगा। दाल तड़के की गंध ऊपर तक आ रही थी। सीएनजी के कारण प्रदूषण मुक्त दिल्ली में दाल की छौंक की गंध मिलते ही मनोज प्रकाश को उसका वजूद मिल गया था। उसकी पत्नी हैरानी से देखने लगी। मन ही मन सोचने लगी कि क्या दाल की गंध के कारण ही आश्रम से इतना रोमांस है या फिर कहीं कोई और तो नहीं है। मनोज हंसने लगा। कहने लगा कि बिहार से आकर हम अपने में ही डूबे हुए थे। किसी से प्रेम करने का वक्त ही नहीं मिला। धीरे धीरे मनोज इसी रास्ते से विदेश मंत्रालय जाने लगा। उसे प्रगति मैदान से इंडिया गेट होते हुए विदेश मंत्रालय जाना अच्छा नहीं लगता था।

और वापसी के इसी क्रम में एक दिन मनोज प्रकाश ने कानून तोड़ दिया। हैंड्स फ्री कान में लगाई और मुझे फोन कर दिया। अरे तुम्हें पता है मैं कहां हूं। सवाल में ही जवाब था। उसकी बेकरारी बता रही थी कि वो आश्रम के जाम में है। और उसे कोई परेशानी नहीं। मनोज कहने लगा परेशानी किस बात की। याद नहीं नब्बे के दशक के उन दिनों में भी तो ऐसा ही जाम लगा करता था। तब कौन सा यहां से गाड़ियां दनदनाती हुई गुज़रा करती थी। मनोज ने आईआईटी के उस प्रोफेसर के एक संपादकीय लेख की याद दिलाते हुए कहा कि तुम भूल गए उस प्रोफेसर ने कहा था कि फ्लाईओवर से ट्रैफिक जाम की समस्या का हल नहीं होता। मैंने कहा हां, उसकी बात तो सही निकली यार।

लेकिन वो इस बेकार बहस से निकल कर दाल तड़का पर आना चाहता था। तभी कार की पीछली सीट पर रखा उसका ब्रीफकेस अचानक मिरर में दिखना बंद हो गया। मनोज ने हैंड्स फ्री फेंक दिया।

तीन दिन बाद उसने पार्टी में यह कथा सुनाई। उसका ब्रीफकेस कोई लेकर भाग चुका था। पैसा तो नहीं था लेकिन पासपोर्ट, चेकबुक और विदेश मंत्रालय के कुछ कागज़ात थे। सोनीपत से उसे फोन आया कि जनाब आपका ब्रीफकेस यहां पड़ा है। मनोज तुरंत किराये की टैक्सी से वहां पहुंचा। पता चला कि डीटीसी बस से यह ब्रीफकेस मिला। खोला तो सब कुछ था। मनोज को हैरानी हुई। ब्रीफकेस सोनीपत कैसे। यह तो आश्रम जाम से गायब हुआ था। तभी उसकी नज़र एक खत पर पड़ी। शायद चोर ने लिखी थी।

प्रिय मनोज प्रकाश जी
आश्रम जाम में फंसी कारों से ब्रीफकेस उड़ाने का यह मेरा पहला प्रयास नहीं था। मुझे नहीं मालूम था कि आश्रम जाम में फंसे हुए लोग इतने कंगाल भी हो सकते हैं। उनके पास चेकबुक तो होता है मगर ब्रीफकेस में आठ आना नहीं। छह लाख की कार और जाम में फंसे होने का दर्द समझता हूं और बहुत अफसोस के साथ ब्रीफकेस लौटा रहा हूं। आगे से किसी और रास्ते पर ब्रीफकेस उड़ाया करूंगा। इस चोरी से तो अच्छा है कि मैं दाल रोटी ही खाकर गुज़ारा कर लूं।
आपका चोर

मनोज प्रकाश के होश उड़ गए। दाल की छौंक की गंध एक बार के लिए नाक और ज़हन से जाती रही। वो सोनीपत से लौट रहा था। नेशनल हाईवे पर उसकी कार दौड़ रही थी। फिर भी उसे लग रहा था कि वह कहीं फंसा हुआ है। उसकी कार नहीं चल रही। वो अब दाल नहीं खाना चाहता था। दिल्ली लौटते ही उसने विदेश सचिव से मुलाकात का वक्त मांगा। फिर से मास्को पोस्टिंग हो गई।

6 comments:

निशान्त said...

बहुत बढिया से मनोभावों को कागज कर उकेरे हैं. मज़ा आ गया पढ़ के. आज कल आप कम लिखने लगे हैं. थोड़ा वक्त हमारे लिए भी निकल लिया कीजिये.

madhukar said...

jam ka vahi paridrishya aaj bhi hai jo 18 sal pehle tha, kafi dilchasp andaz me kaha hai aapne ki halaat 90 jam se bhi badta r ho gaye hain. breefcase ki yatra uski bangi hai.

Abhishek Anand said...

priya ravish jee,,

bahut aacha likh rahien hain...aap...aapke karyakram bhi dekhta hoon main. tv pe.apna aacha kaam jaari rakhiye.............bhagwaan aap ko aur shkti de.......

naresh khinchi said...

kya baat hai...
logo ke man ke dard ka itna achacha prastutikaran... bahut khub.. badhai...

my link :
www.udaipur2ahmedabad.blogspot.com

dusara pahaloo said...

रांची से पटना जा रही बस में चोरी तो हुइ्र पर सारा सामान नगद सहित चोरों ने यात्रियों को लौटा दिया। दरसल थाने में दयिे जानेवाले कमीशन के बाद कुछ बचता नहीं तो लैटाना ही अच्छा लगा आप इसे जो समझें , भाई रवीश कुमार जी आप तो महान ब्लाग समीक्षक हैं। मैं ने भी ब्लाग के रूप में अपने कुद संसम्रण लिखे हैं। जरा मौका पाके एक नजर डालने की कोशिश शायद करें अच्छा लग जाए। कृपया मेरे बलाग का पता है - bahuranga.blogspot.com

dusara pahaloo said...

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