भैंस का पुनर्मूल्यांकन

हमारे समाज में भैंस का जितना सामाजिक अनादर हुआ है। उतना किसी भी पालतू और फालतू जानवर का नहीं हुआ है। कोई काला है या काली है तो भैंस, भैसे जैसा है या जैसी है। रंग भेदी सोच भैंस पर बहुत ज़ुल्म करती है। कभी आपने सोचा है भैंस किसी का क्या बिगाड़ती है?

महमूद का वो गाना याद आता है- मेरे भैंस को डंडा क्यों मारा वो भैंस तो चारा चरती थी। तेरे बाप का वो क्या करती थी। कुछ ऐसा ही गाना था। यहां भी भैंस बेचारगी की अवस्था में आवारगी की सज़ा पाती नज़र आती है। गीतकार कवि उसकी निश्चलता को नहीं देख पाता । वो सिर्फ बेचारगी देखता है। कई बार तटस्थ लोग मुझे भैंस लगते हैं। दफ्तर आते हैं । चुपचाप काम करके बिना इतिहास को बताए घर चले जाते हैं। ऐसे भैंस नुमा लोगों की दुनिया दुश्मन। कोई उसके रंग पर तो कोई उसकी सोच पर हंसता रहता है। कोई सीधा समझ उसे हिस्सेदारी से बाहर कर देता है।

जबकि शालीन जानवारों में एक है भैंस। आप खेलते दौड़ते उसकी पीठ पर चढ़ जाइये। कुछ नहीं बोलेगी। वह चरती रहती है और चलती रहती है। कई बार बच्चे उसकी सींग पकड़ माथे पर लात धर पीठ पर चढ़ते हैं। तब भी भैंस कुछ नहीं कहती है। वह अपना काम करती रहती है। मुझे लगता है महात्मा गांधी को अंहिसा का दर्शन भैंस से मिला होगा। भैंस की सहिष्णुता का फल है उसका दूध। कहते हैं भैंस की दूध में ताकत होती है। भैंस भी वही काम करती है जो गाय करती है। पर गाय को इतना सम्मान क्यों? क्या सिर्फ रंग के कारण वह हंसी की पात्र हो गई? क्या भैंस दलित है और गाय ब्राह्मण? भैंस के नखरे नहीं होते। तेज़ गर्मी में वह कीचड़ में भी धंस जाती है। गाय की तरह किनारा नहीं करती। भैंस मांग नहीं करती। मांग की पूर्ति करती है। गाय की तरह। गाय को कितना संभाल कर रखा जाता है जबकि भैंस को दुत्कार कर।

भैंस का सामाजिक ओहदा क्या है? ओहदा या जगह। गांधी की सहिष्णुता दर्शन है और भैंस की सहिष्णुता मूर्खता। भैंस से दर्शन चुराने के बाद भी कांग्रेस ने चुनाव चिन्ह गाय बछड़े को बनाया । भैंस को नहीं। उसकी इतनी बड़ी मूर्खता कि बीन बजाते रहिए कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या पता भैंस बीन बजते ही आनंद में डूब जाती होगी। वह कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहती होगी जिससे बीन बजाने वाले की साधना भंग हो। लेकिन हमने उसकी इस एकाग्रता का कितना मज़ाक उड़ाया है। भैंस के पुनर्मूल्यांकन का वक्त आ गया है। हम भैंस के बारे सोचें। उसकी शालीनता से सीखें । न कि मज़ाक उड़ाए। हो सके तो हमें भैंस की तरह बनना चाहिए। चुपचाप काम करना चाहिए। चरना चाहिए और कोई मांगे तो दूध देकर कीचड़ में धंस जाना चाहिए। अहंकार की गर्मी अपने आप निकल जाएगी।

18 comments:

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

मजाक-मजाक में गंभीर बातें कहने की अदा कोई आपसे सीखे। भैंस के बहाने अच्छा सवाल उठाया है आपने। विचार होना चाहिए। भैंस का भी और भैंसनुमा लोगों का भी।

अनिल रघुराज said...

भैंस का प्रतीक जमा नहीं। भैंस की कहावत ये भी है कि भैंस के आगे बीन बजावय, भैंस ख़ड़ी पहुराय। भैंस की इस महिमा से तो वे लोग महिमामंडित हो रहे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि सब ते भले वे मूढ़, जिन्हैं न ब्यापै जगत गति। दलित की दयनीयता मत देखिए, उसमें छिपा ओज और सबलता देखिए जो इस देश की सूरत बदलने का माद्दा रखती है।

Pramod Singh said...

गाय की बजाय यह भैंस समय होता तो देश की बड़ी मुश्किलें कम हुई होतीं. आइए, सब मिलकर भैंस राग गाएं.

अनामदास said...

हमने तो भैंस का दूध खूब पिया है, लोग समझाते थे कि भैंस का दूध पीने से अकल मोटी हो जाती है लेकिन हम माने नहीं, अब अपनी अकल को रोते हैं, कहीं कमाई वाले धंधे में लगे होते...अब सोचता हूँ कि भैंस के साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, माता का खिताब गाय को दे दिया गया, और तो और मौसी बिल्ली हो गई. बेचारी भैंस. भैंस का पुर्नमूल्यांकन करके आप भी रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह जैसे आलोचकों की क़तार में पहुँच गए हैं जिन्होंने कई साहित्यकारों का पुनर्मूल्यांकन करके उन्हें ख्याति दिलाई. सभी भैंसो की तरफ़ से उनका दूध पीने वाले एक सुपुत्र का आभार.
अनामदास

अनामदास said...

एक बात और, हमारे घर जब सत्यनारायण कथा होती थी तो हमें गोबर लाने के लिए भेजा जाता था, हम अक्सर गर्मागर्म भैंबर ले आते थे जो आसानी से उपलब्ध था. परम ज्ञानी पंडित जी कभी न पहचान सके, श्रद्धाभाव से गोबर गणेश की स्थापना करके रोली, चंदन, पान, सुपारी चढ़वाते थे.
अनामदास

ravish said...

भैंस मींमासा बढ़ती जा रही है। अनामदास ने भैंबर शब्द का इस्तमाल कर दिया है। गोबर का विकल्प आ गया है। पंडित जसराज से कहा जाए कि वो भैंस राग कम्पोज़ करें। देश के चारागाहों में लोकप्रिय हो जाएगा। रघुराज जी मैं दलितों की दयनीयता नहीं देख रहा हूं। जो समाज में रहा है उसी से चीज़ें समझने की कोशिश कर रहा हूं। इसी ब्लाग पर कई लेख हैं जिनमें आपको दलितों की ताकत दिख जाएगी। सत्येंद्र जी ने भैंसनुमा शब्द दिए हैं। गायनुमा नहीं। हम सब भैंस हैं। मूर्ख नहीं। संवेदनशील और सहनशील। यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सींग भी रखते

सुभाष मौर्य said...

रवीश भाई भैंस पर आपका वार्तालाप अच्‍छा लगा लेकिन अब जमाना बदल गया है। बाजार ने भैंस को काफी हद तक वह इज्‍जत दिला दी है जो कभी सिर्फ गाय के पास हुआ करती थी। भैंस औसतन गाय से अधिक दूध देती है और उसका दूध कहीं अधिक पौष्टिक होता है। यही कारण है कि गाय का दूध सस्‍ता होता है और भैंस का महंगा। किसी ग्‍वाले से पूछिये तो वह यही कहेगा कि भैंस पालना फायदे का सौदा है। आपको दिल्‍ली की सड़कों पर आवारा गाय धूमती खूब दिखायी देंगीं लेकिन आवारा भैंसे कम ही दिखायी देती हैं। वैसे भी सत्‍ता का चक्र बदलने के बाद गाएं अब शीर्ष पर नहीं रहीं। पिछड़ी भैसों ने गायों को सत्‍ताच्‍युत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

संजय बेंगाणी said...

आज सुबह आपकी झाँसी होटल पर डोक्युमेंट्री देखी और ओफिस आया तो नारद पर भी आपका चहरा चमक रहा था. :) यानि छा गए.
अच्छा लिखा है :)
मगर दलित ब्राह्मण को बीच में घसीटना अजीब लगा.

अभय तिवारी said...

आप बेहतर जानते हैं.. देश भर में कैमरा ले के घूमते हैं.. मैने तो जीवन में एक डेढ़ गाय और दो चार भैंस देखी है..उनके स्वभाव के बारे में ठीक ठीक नहीं जानता.. कोई कहता है आकार प्रकार में एक जैसी होने के बावजूद दोनों में काफ़ी अन्तर है.. एक पानी में भगती है दूसरी पानी से भागती है.. दोनों के दूध में भी अन्तर है.. लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि दूध और घी की जितनी महिमा है.. सब गाय के घी की है.. धरती को भी गाय के सींग पर स्थित बताया है..आप के भीतर प्रगति शील चेतना ज़ोर मार मार कर आपको उकसा रही है कि गाय ने हजारों वर्षों तक भैस का हक छीना है..अब कुच गाय से छीनो.. मैं आप को आपके प्रगतिशील समाज का उन्मुक्त चित्र बनाने से नहीं रोकता.. बस इतना कहता हूँ कि गाय इस देश में प्लास्टिक खा रही है..भैस खली.. फिर भी आप को क्यों लगता है कि गाय से उसकी रही सही इज़्ज़त भी छीन लूँ.. आपका प्रिय जानवर मुझे नहीं पता कि क्या है.. मेरा प्रिय जानवर गाय है.. गाय के बारे में एक ही बुराई है जो मैंने सुनी है और देखी भी है.. गाय वक्त पड़ने पर हिंसक हो जाती है.. भैंस ज़्यादा सहिष्णु है.. आप सही हैं..

पाणिनी आनंद said...

यह विषयांतर बहुत अच्छा लगा. इसके बाद उलूक, गर्धव और सूकरों को भी स्थान दें.

Jitendra Chaudhary said...

भई भैस पुराण शुरु कर दिया आपने। अच्छा लग रहा है।

बचपन मे हम कई कई बार भैंस के चट्टे पर दूध लेने जाया करते थे। वहाँ पर दूध निकालने वाले भइया द्वारा भैंस को इन्जेक्शन लगता देख दिल को बहुत चोट पहुँचती थी, इच्छा तो होती थी, इन्जेक्शन छीन कर ठोकने वाले को ही वापस लगा दें, लेकिन क्या करते, मोहल्ले का मामला था। अलबत्ता हम इत्ता जरुर करते थे, सूखे कन्डे से उस भइया को दूर से निशाना साधा जाता। जाहिर है कन्डा भैंबर का ही होता। यानि भैंस ने अपना बदला ले लिए, हम तो सिर्फ़ जरिया मात्र थे।

Gurnam Singh Sodhi said...

sach me aapki abhivyakti ka koi jawaab nahin, aapki rachnayen padh kar kuch kehne ke liye shabd hi nahi bachte.....

नीरिजा said...

http://pangebaj.blogspot.com/2007/05/blog-post_19.html

भैंस महीमा यहॉं पर भी है।

sunita (shanoo) said...

रवीश भाई भैस माहतम बहुत लाजवाब लगा है,..भैस कीतनी सीधी होती है ये तो हम शुरू से देखते आ रहे है,...मगर कितनी आलसी भी होती है अपने चेहरे से मक्खी तक नही उड़ाती है,.हाँ आपने भैस से बहुत सारी बातें सीखा दी है,...
बहुत-बहुत बधाई भैस पुराण पर।
सुनीता चोटिया(शानू)

ओम said...

गांधी जी ने भैंस से प्रेरणा ली या नहीं अब इसका तो ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है। ली भी हो तो मुझे कतई ऐतराज़ नहीं है। लेकिन भैंस के सहिष्णु स्वभाव को आज आपने ही लोगों के सामने रखा है। और वो भी सौ आने सच हो सकती है। फिर भैंस के जिस स्वभाव की पहचान ही आपने की है तो लोगों से क्या शिकायत है कि वो गांधी के सहिष्णुता को क्यों दर्शन मानते हैं और भैंस की सहिष्णुता को क्यों मूर्खता मानते हैं। आप पहले से इसे जानते थे तो आप की राय ही ज्यादा मायने रखती थी। हमें आज मालूम हुआ है आगे गांधी जी और भैंस को कम-से-कम इस मामले में एक नज़र से देखने की कोशिश करेंगे। आगे भी हमारी भूल-चूक सुधारते रहें।
http://kharikhoti.wordpress.com

amit said...

रविश जी

भैस का चित्रण शायद ही किसी ने इस तरह से किया हो। आपका लेख पढ़ सचमुच भैस के बारे में अब सोचने को मन करता है। दूध देती है... पर सीधी रहती है। दूध निकलने पर भी कुछ नहीं कहती। लेकिन समाज की गाय जो लात मारती है.. फिर भी पूजी जाती है। ये गाय भैज का भेद कब तक ... यदि हमने इसी तरह भेस को निरादर किया तो एक दिन अच्छी अच्छी प्रतिभाएं दम तोड़ देंगी। आत्महत्या कर लेंगी। आपका चित्रण और विचार वाकई काबिले तारीफ है।

chashmish said...

garam bhains ki matwali chal se wakif honge. uske uddam kamuk alaap ko background music ki tarah sune. ek choti si cheentdaar, salme-sitare wali skirt pahnakar kya remix ka ek naya album nahi nikal sakta. koi bhi remixia bhains ke jariye uddipan ke adim shrot tak pahunch sakta hai. tv screen ko apne chapal pairon se khodti kamneeya bhaison ki smriti jagane ke liye ravish bhai badhai.

Prabin Barot said...

ravish ji,bhaisn sahi main bahut hi fayde mand hai....gujarat k kaie chote gavo main bhaisn hona mahetvaka mana jata hai,kai ghar ka gujran bhaisn ki badolat hi chalte hai,aaj bhi kisi bap ko aapni beti ko bihana hai to vo aasa ghar dhundta hai jis ghar main bhaisn ho,beti khus rahegi...gujarat main gai k sath main bhaisn ko bhi ijjat di jati hai.....