अंग्रेज़ी से साक्षात्कार- पार्ट टू

गांव छूटने लगा। गांव और दिल्ली के बीच मेरा शहर पटना। इस बीच उन्नीस सौ तिरासी आ गया । कपिल देव की टीम विश्व कप जीत गई। हम सब खुशी के मारे पागल हो गए थे। मैं कपिल देव बनना चाहता था। दिन रात कपिल के ही सपने आते थे। मगर एक गेंद ठीक से नहीं फेंक पाने की हताशा परेशान कर रही थी। सपने में कपिल और पिच पर कपिल का घटिया फोटोकॉपी संस्करण। मैं । लोगों ने टीम में शामिल करना बंद कर दिया। मैं टुवेल्थ मैन हो गया। थर्ड मैंन से छूटी गेंदों को पकड़ कर खुश हो लेता था।

तभी क्रिकेट के अलावा कपिल के एक विज्ञापन से कुछ रास्ता दिखा। रैपिडेक्स इंग्लिश स्पिकिंग कोर्स । मैं यही सोचता रहता था कि विश्व विजेता टीम का कप्तान, हरियाणा के किसान का एक बेटा कैसे बिना अंग्रेजी के विव रिचर्ड से बात करता होगा । माइक गैटिंग और डेविड गावर जब कपिल को बधाई देते होंगे तो कपिल क्या कहते होंगे। क्या वाकई कपिल को रैपिडेक्स के कारण अंग्रेजी आ गई थी। रैपिडेक्स का विज्ञापन उम्मीद की किरण की तरह नज़र आता था। दुनिया का सबसे शक्तिशाली ऑलराउंडर और बिना अंग्रेजी के..मेरा खोया आत्मविश्वास वापस आने लगा था। रैपिडेक्स खरीदा जा चुका था। लेकिन रैपिडेक्स दिल्ली जाने के लिए नहीं अंग्रेजी सीख कर गांव लौटने के लिए खरीदा गया था।


रैपिडेक्स के सारे अभ्यास कर लिए । रटने के तर्ज पर। दोस्तों को पता नहीं था मैं रैपिडेक्स पढ़ता हूं। धीरे धीरे पता चलता गया कि रैपिडेक्स भी गोल्डन पासपोर्ट या किसी कुंजी की तरह ब्राउन कवर में छुपा कर रखने की चीज़ है। मगर यह पासपोर्ट से अलग था। क्योंकि पासपोर्ट से अंग्रेजी में पास हो सकते थे और रैपिडेक्स से अंग्रेजी बोल सकते थे। मैं सोमवार को कलकत्ता जाऊंगा। इस वाक्य को अंग्रेजी में बोल सकते थे। मगर वजन और आकार के कारण रैपिडेक्स कोर्स की किताबों में घुलमिल नहीं पाता था। वो अलग दिखता था। लोगों की नज़र पड़ जाती थी कि ये कौन सी किताब है। इसलिए उसे तकिये के नीचे रखता था। अक्सर पढ़ने से पहले कमरे का दरवाज़ा बंद कर देता था।


लेकिन दोस्तों से बिना बताये अंग्रेजी सीखने का अभ्यास कोई चमत्कार नहीं कर सका। एक दिन मेरा दोस्त अविनाश वॉकमैन ले आया। ये कोई सत्तासी अठासी की बात होगी। उसने कान में हेडफोन लगा दिया। मैं हैरान हो गया। बोला अविनाश ये तो अंग्रेजी का गाना है। अंग्रेजी में गाना भी होता है क्या? सारे दोस्त हंसने लगे। अविनाश ने कहा- तुम को पता ही नहीं अंग्रेजी में गाना होता है। मैंने कहा- नहीं। हम जीवन में बहुत कुछ नहीं जानते हैं। वो सब कुछ भी जिसके बारे में लगता है दुनिया जानती है। यही वो वक्त था जब मुझे पता चल गया कि अंग्रेजी एक भाषा है। पेपर वन और टू नहीं।

मां से ज़िद कर दुबारा ट्यूशन मास्टर रख लिया। नेस्फिल्ड और रेन एंड मार्टिन ग्रामर की किताब। सत्तर के दशक तक बिहार के गांव गांव में नेस्फिल्ड ग्रामर की किताब गीता और रामायण की तरह मौजूद हुआ करती थी। मगर अस्सी तक नेस्फिल्ड पुराना हो गया। रेन एंड मार्टिन का ज़माना आ गया था। मैंने अपने पिता से सिर्फ दो ही चीज़ मांगी। बीबीसी सुनने के लिए रेडियो और अंग्रेजी सीखने के लिए रेन एंड मार्टिन की ग्रामर बुक। लाल रंग की किताब हाथ में आते ही आंखें चौंध गईं। तभी पिता जी ने ताना कस दिया। शायद वो किताब पर खर्च हुए पैसे से खिन्न थे। बोले अंग्रेजी सीखेंगे। क्या कीजिएगा। लेकिन अब मुझे पता था कि अंग्रेजी सीख कर बोल सकता हूं और गाने सुन सकता हूं। तभी चाचा जी ने मुज़फ्फरपुर का अंग्रेजी में स्पेलिंग पूछ लिया। एक जे या ज़ेड की कमी के कारण उन्होंने कहा कि तुम्हारी छड़ी से पिटाई होनी चाहिए।

दोस्तों बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि रैपिडेक्स और रेन एंड मार्टिन दोनों मुझे अंग्रेजी नहीं सीखा सके। दो ट्यूशन मास्टरों को भी इस नाकामी का श्रेय लेना चाहिए। वो भी नहीं सीखा सके। इस बीच हिंदी के एक शब्द का हिज्जे ग़लत लिखने पर मेरा दोस्त चिल्ला उठा- तुम्हें हिंदी नहीं आती। भाषा को लेकर मेरा आत्मविश्वास ख़त्म हो गया। अब मैं पन्ने को हाथ से ढंक कर हिंदी लिखने लगा । कहीं मेरी ग़लत स्पेलिंग पर किसी की नज़र न पड़ जाए। स्कूल के फेलियर छात्रों में गिने जाने के कारण नाकामी बर्दाश्त करने की ग़ज़ब की शक्ति थी। मगर दो दो भाषाओं की नाकामी से मेरा हौसला टूट गया।

11 comments:

Rajesh Roshan said...

pahle wale ke mukable ye thoda kam majedaar hai. pata nahi kyon mujhe ye lag raha hai ki bas kuch likhne ke liye hi aap ye likh rahe hain. kam se kam antim ke 2 paragraph. xplore anything new, first one is nice. :)

ravish said...

राजेश जी
मज़ेदार होने के लिए नहीं लिखा। अंग्रेजी को लेकर जो कुछ भी होता रहा उसे लिखने की कोशिश की है। कुंठाएं कैसे बनती हैं और कुंठा में मन क्या क्या करता है उसकी झलक है। लेकिन पाठक का ख्याल तो रखना ही होगा इसलिए आपकी बात सहर्ष स्वीकार करता हूं। आपकी प्रतिक्रिया के बाद इस लेख को और बेहतर करने की कोशिश करता हूं।

Pramod Singh said...

पहले हाथ से ढंककर लिखने की बात कहके.. और अब ये सारा खुल्‍लमखुल्‍ला आत्‍मविश्‍वास के साथ इस तरह सार्वजनिक कर रहे हैं.. ओह, आदमी कितना बदल जाता है! शर्मिला से गर्वीला हो जाता है!.. बड़ी तकलीफ हो रही है!

prabin said...

Ravishji aap k English se saksatkar part-1,2 k bich ka waqt bahut lamba laga...aap jaldi part 3 dede....dono main aap ne itni uchai par hone k bavajud aap ki kamjori bina kisi chal kapat k duniya k samne rakhi hai vo apne aap main 1 takat hai....gandhije ne asman ki bulndio ko chune k bad bhi apni aatmakatha(autobiography) main chori karna,juth bolna,masha har karna jo un k liye galat tha fir bhi bina jijak duniya k samne rakha tha...aap ne bhi kuch aasa hi kiya hai ye bahut muskil hai, aasan nahi jaha aapni tariff k ful bandne walo ki juthi duniya main hum ji rahe hai...apne bhutkal ko sahi tatola hai.….aap bhi safal hoge.....hamari shubkamnaye....aur ha part 3 jald de de intzar rahega...... hum yaha panna chupa kar nahi lik sakte hai to spelling mistake batayega….

अभय तिवारी said...

ऑन डिमान्ड मत लिखिये.. अपने मन की बात और अपने मन के अंदाज़ में लिखिये.. मशीन थोड़ी है आदमी के चारों पैराग्राफ़ में बराबर मजा तौल के रखेगा.. जितना मिल रहा है लीजिये और धन्यवाद दीजिये.. मेरा धन्यवाद लीजिये रवीश..

काकेश said...

रेन एंड मार्टिन वाली बात तो हमारे साथ भी भी हुई थी भाई. अच्छा है.

विकास said...

हाल ही में पता चला कि हिंदी में ब्लोग्गिंग ख़ूब चल रही है और आपका ब्लोग ख़ूब प्रचलित है. लिखते रहिए. अपकी भाषा में धरम्युग और दिनमान कि मिठास है जो आज कहीँ खो गयी है.

जैसा एक और पाठक ने कहा है, स्व आनंद के लिए लिखें। पाठक ज्यादा आनंद लेंगे।

Rajesh Roshan said...

Nahi Ravish ji aapne meri baat ko shayad kuch galat tarike se samjha. Maine ye nahi kaha ki aap paathak ke liye likhe. Aap apne liye hi likhe lekin kewal likhne ke liye na likhe.

Aap apna natural lekh likhe jo aap likhte hain, jaise ki Rachna ji likhti hain, Agar aapne nahi dekha to jaroor dekhiye rachnabajaj.wordpress.com

Main yaha koi tulna nahi kar raha hu. bas yeh kah raha tha ki mujhe aap ke angregi se saaksthkaar part 2 ke antim 2 para laga ki aap kewal likhne ke liye likh rahe hain.

Rajesh Roshan said...

Sorry. This is the right url of Racana Bajaj http://rachanabajaj.wordpress.com/

ravish kumar said...

लेकिन मैंने लिखने के लिए नहीं लिखा है। वो सारे स्वाभाविक क्रम में आते गए हैं। बोरिंग हो सकता है मगर ज़बरन नहीं घुसाया है। छोड़िये एक नए ब्लाग का पता देने के लिए धन्यवाद । मैं रचना का ब्लाग देखूंगा। बहुत जल्द और बताऊंगा भी। शुक्रिया।

aziz said...

hello ravishji,
bahut badhiya lekh hai.....badhai....darasal, angrezi ke saath kai aur masle bhi jude hain..jaise aapka pahnaawa, aapka rahan-sahan aur aapka friend circle....
udaaharan, agar aap bahut hi acchi angrezi bolna jaante hain(with no regional touch) fir bhi "muzafarpur" ya 'lakhisarai' ke hone ke naate dilli aakar bhi wahi shirt-pant pahante hain, khane ke liye Mcdonalds jaana bilkul pasand nahi karte aur 'aam' logon se milnaa-julnaa pasand karte hain to afsos aap ab bhi 'hindiwaale' hi kahlaayenge....
mai Jamia se media ki padhai kar raha hu,wahi ki baat bataata hun....yaha log bade "deconstructive" hain...accha hai....yaha ke adhiktar logon se aap angrezi mein baat karein to aapko aapke apne angrezi-gyaan par sharmindagi mahsus hogi magar yadi aap hindi ke "laal bujhakkad" bhi
hain to log aapka "loha" manenge...abhi haal hi mein jab kamleshwarji kaa nidhan hua to maine yahi ki ek professor se unke baare me pratikriya maangi...unka jawaab tha "Who is Kamleshwar???"....to aapse yahi request hai ki angrezi ke apne sakhsaatkaar ko thoda vrihat roop dein aur shahron mein aaye "hindi" bolne waalon ke sangharshon aur top class institutes mein chatpataati hindi ko bhi apne blog par jagah dein....