उत्तर प्रदेश- मनुवाद से मायावाद

लखनऊ में ग्यारह मई को ज़बर्दस्त उमस औऱ गर्मी थी। पसीने और तेज धूप से जान जा रही थी। मगर शाम को मौसम अच्छा हो गया। तेज आंधी चली, कुछ पेड़ गिरे और बारिश हो गई। बीएसपी की ऐतिहासिक जीत का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा। सालों तक दलित एजेंडे की उमस और गर्मी, फिर ब्राह्मणों और मुसलमानों के आने से बढ़ती धूप और ग्यारह मई को कुछ पुराने समीकरणों के पेड़ों के उखड़ जाने के बाद नतीजे की बारिश। राजनीति का मौसम अच्छा हो गया।

जातिवाद में धंसे उत्तर प्रदेश की जनता ने अपने जातिगत पापों का प्रायश्चित पूरा कर लिया। एक दलित की बेटी को अपना नेता मान लिया। जात पात को ढोने वाले ब्राह्मण उस दलित की टोली में चले गए जहां न जाने की लिए उन्होंने सदियों तक एक रेखा खींच रखी थी। हमने देखा था कि कैसे पंडित की बेटी घर आए बीएसपी के जाटव कार्यकर्ताओं के लिए रोटी बना रही थी। गुजरात के दंगे और बीजेपी से मिल जाने की अफवाहों को किनारे कर मायावती के साथ आ रहे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था। मुसलमान, ब्राह्मण और यूपी की जनता चुपचाप बदलने लगे। अच्छे शासन के लिए भी मायावती को वोट मिले हैं। लोगों का विश्वास हासिल हुआ कि मायावती यूपी के गुंडों का दम निकाल सकती हैं।

जो लोग जातिगत राजनीति की सीमा बता रहे थे उन्हें इसकी संभावना नज़र ही नहीं आई। जब खैरलांजी जैसी घटना हो रही हो, एक दलित को शादी के लिए घोड़ी पर चढ़ने से मना किया जा रहा हो उसी समय में देश के एक बड़े राज्य में ब्राह्मण अपने लिए एक दलित नेतृत्व स्वीकार कर रहा था। यह राजनीतिक बदलाव सामाजिक बदलावों के चलते भी आया है। ब्राह्मण अगर अपनी जातिगत मान्यताओं में जकड़े रहते तो इतनी बड़ी संख्या में बीएसपी को जीत नहीं मिलती। कांग्रेस में ब्राह्मणों से छिटक कर दलित बीएसपी में गए ही इसलिए थे क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी में उनके वर्चस्व से जातिगत बू आती थी। उनकी संख्या थी मगर नेतृत्व नहीं। दलित अपनी संख्या के दम पर चुनौती देना चाहते थे। मगर उनकी संख्या की एक सीमा थी। लिहाज़ा दलितों ने ब्राह्मणों से हाथ मिलाया। यह सिर्फ दो संख्या का जोड़ नहीं है। बिना सामाजिक बदलाव के संभव नहीं था। क्यों ब्राह्मण अपनी जातिगत भावों को छोड़ दलित के साथ चलता? क्या सिर्फ विधायक बनने के लिए? क्या विधायक बनना उसके तमाम जातिगत पूर्वाग्रहों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है? फिर रोटी बेटी की बात कहां चली गई? क्या एक ही जीप में दलितों के साथ बैठकर विधायक बनने का सपना देखते वक्त ब्राह्मण उम्मीदवारों की जातिगत मान्यताएं नहीं टूटी होंगी? नहीं भी टूटीं होगी तो क्या बीएसपी के ब्राह्मण विधायक हिम्मत कर पायेंगे अपने पूर्वाग्रहों को ज़ाहिर करने की। क्या सतीश मिश्रा ने सिर्फ विधायक बनने का सपना दिखाया होगा? क्या उन्होंने यह नहीं कहा होगा कि अपनी मान्यताओं को छोड़िये। ब्राह्मण के नाम पर कांग्रेस बीजेपी में सड़ने से क्या फायदा? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि दलित को नेता मानकर ब्राह्मण सामाजिक परिवर्तन में हिस्सेदार बन जाएं । मायावती ने यह काम किया उन्हें श्रेय मिलना चाहिए। जो लोग मायावती को विज़न वाली नेता नहीं मानते हैं उन्हें अपनी नज़र बदलनी चाहिए। मगर साथ साथ उन ब्राह्मणों की तरफ भी देखना चाहिए जो बदल रहे हैं। ठीक है कि बीएसपी के ब्राह्मण विधायकों में कई ऐसे हैं जो संघ और बीजेपी के हैं। मगर अब उन्हें अपनी पुरानी मान्यताएं छोड़नी होगी। वर्ना बीएसपी में दाल नहीं गलेगी। निश्चित तौर पर वो बीएसपी में संघ का एजेंडा चलाने का ख्वाब नहीं देख सकते।

इससे यह भी साफ हो गया कि संघ की कोई विचारधारा नहीं है। वो सिर्फ संघ में रह कर राजनीतिक करने तक सीमित है। संघ के लोग बीएसपी में जाकर अब दलित राजनीति और अंबेडकर की किताबें पढ़ेंगे। यह अंबेडकर की जीत है और संघ की हार।

फिलहाल दलित राजनीति की इस ऐतिहासिक कामयाबी पर अखबारों में छपने वाले उनके लेख ज़रूर पढ़े जो कल तक बीएसपी को एक सौ साठ से अधिक सीट नहीं दे रहे थे। जिन्हें नहीं दिख रहा था कि उत्तर प्रदेश में जातिगत ढांचे के भीतर नए जातिगत समीकरण बन रहे हैं। इस समीकरण के बनने में कुछ जातिगत मान्यताएं टूट रही हैं। पंकज पचौरी कहते हैं जातिगत राजनीति का लोकतांत्रिकरण हो रहा है।

14 comments:

संजय बेंगाणी said...

यह सत्ता की जीत है, इसके लिए सब चलता है, मुस्लिम शासन भी, अंग्रेजी शासन भी, और दलीत शासन भी.
फिर भी जो उत्तरप्रदेश में हुआ की ब्राह्मण, दलित व मुस्लिम एक ही पार्टी को मत दे कर जीता रहे है, वह सुखद है.

नीरिजा said...

ये बचपन मे दिल मे बसाये उल जलूल पुर्वाग्रह और हर वक्त का ये मनु वनु करना छोड दो नार्मल रहने की कोशिश करो तो बन्दे तो आप भी ठीक ठाक हो

Pramod Singh said...

'जातिगत राजनीति का लोकतांत्रिकरण'- ऐसा हुआ है?.. आप लखनऊ में रहकर आए हैं, ज्‍यादा नज़दीक से देखा होगा सामाजिक आचरण में किस तरह के फेर-बदल आए हैं.. सचमुच आ रहे हैं तो अच्‍छी बात है!

Rajesh Roshan said...

ye UP ke janta ki jeet hai. Mayawati ki "social engeniring" friday ko release hui aur hit ho gai. ab ye hafte nahi 5 saal tak chalega.

Aflatoon said...

रवीशजी, जरा देखिये कि इस बार सपा के कितने ब्राह्मण प्रत्याशी जीत कर आये हैं |पिछली बार की तुलना में इन दोनों दलों में संख्या उल्लेखनीय रूप से अधिक है |

अभय तिवारी said...

यह एक बड़ा परिवर्तन है हमें खुले दिल से इसका स्वागत करना चाहिये..एक ज़रूरी बदलाव जो होना चाहिये..

Jitendra Chaudhary said...

ये लोकतंत्र की जीत है। मायावती बेहतर विकल्प के रुप मे सबके सामने थी, वो अपनी पुरानी गलतियों से सबक सीखकर सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा को सबके सामने रखने मे सक्षम रही। चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव कराए, बीजेपी को सीडी कांड का घाटा हुआ, कांग्रेसी तो मुंह छिपाए घूम रहे है(वैसे उम्मीद उनको भी यही थी)। और सपा? उनकी तो साइकिल ही पंचर हो गई(बेचारे अनिल और सुब्रतो का पैसा जाया गया।)

सही है भाई
यूपी (की जनता) मे बड़ा दम है, क्योंकि.....

Sundip Kumar SIngh said...

क्या बात कही रविश जी आपने । आपकी लेखनी में भी वही बात है जो आपकी प्रस्तुती में होता है । हमारा समाज बदल रह है और चाहे-अनचाहे सभी वर्ग इसे स्वीकार कर रहे है । उत्तर प्रदेश चुनावो के परिणाम इस बात को ओर पुख्ता कर रहे है ।

Neeraj said...

माया में कोई मायावी हुनर नहीं. महज़ जातिगत समीकरणों में संतुलन बिठाया है और जीत गईं. यह वही माया हैं जिन्होंने अपनी दलित राजनीति ऊंची जातियों के प्रति घृणास्पद वक्तव्यों से शुरू की थी. बीजेपी और सपा से छिटकते जातीय समूहों को साथ लेकर उन्होंने वोटबैंक बढ़ाया.
यह सामाजिक बदलाव नहीं बल्कि राजनीति लालसाएं हैं जो ऊंची जातियों के नेताओं को दिखनी शुरू हो गई थीं. वे तो तैयार बैठे थे कि उन्हें कोई गोद ले. इस पूरे गणित में मार्के की बात यह है कि ऊंची जातियों के नेताओं ने दलित नेता को अपना नेता भी मान लिया. इससे पहले दलित वोटों के आसरे ऊंची जातियों के नेता सत्तासीन होते थे. अब उल्टा हुआ. बहुमत का गणित है. राजनीतिक लालसाएं है. जनता जाति देख सकती है किंतु नेता कभी भी पाला बदल सकते हैं, कोई भी जाति-मज़हब अपना लेते हैं बशर्ते सत्ता मिलती दिख रही हो.
मैं प्रसन्न हूं कि किसी रास्ते से ही सही. दलित नेता आज सत्ता में है. फ़ैसले लेने की आज़ादी है.

ओम said...

ये एक परिवर्तन है। जिससे बड़े-बड़े पत्रकार भी अनजान रहे। दुख सिर्फ इसी बात का है कि सब उसी पर बोलते हैं जो हो जाता है। और अनुभव सिर्फ जो हो गया उस पर ज्यादा से ज्यादा बोलने में ही काम आ रहा है। हां दो चार लोग और ज़्यादा कूद सकते हैं कि जिन्होंने पहले भी इस परिवर्तन के तुक्के लगाएं हों। वोटों की गिनती के रोज़ भी शुरुआती रुझान और पूरे परिणाम आने के बीच जिस तरह से चैनलों के बड़े-बड़े मठाधीशों ने बयान बदले उससे भी कम मोहभंग नहीं हुआ।

ख़ैर, सरकार बदलनी ही चाहिए थी। मेरे नज़रिए में भी सपा और बीजेपी की जगह मायावती का आना ही बेहतर था। लेकिन जितने आशावान आप दिख रहे हैं वैसा भी कुछ नहीं है। न हीं वोटों के ख़िसकने की वजह जितनी ख़ूबसूरत आपने बताई है, उतनी हैं। कुछ भी नहीं बदला हैं यहां। स्वार्थ अब भी मौजूद है। जातिवाद की जड़ें ज़रा भी कमज़ोर नहीं हुई हैं। जिस स्वार्थ से मायावती ने अपना नारा बदला है, उसी स्वार्थ से ब्राह्मण भी उनसे जुड़े हैं। और वोटर भी परमार्थी नहीं हुआ है।

lovey said...

aap jaise bade reprter to nahi hai....abhi media mein 4 saal hi hua hai lekin aap ko padhkar accha lagta hai............jab roz ka kaam karte karte dimagi thakaan si hone lagti hai to aap ke lekh tonic ka kaam karte hai.......

manjit said...

रवीश भाई,
आपके ब्लाग का नियमित रीडर हूं। प्रतिक्रियाएं भी देता रहता हूं। लेकिन अगर मेरी बातों पर आपकी प्रतिक्रिया भी सामने आए, तो यह लगेगा कि आपने हमारी बातों पर भी गौर किया है। बहरहाल, माया की जीत पर आपका लेख पढ़ा। निश्चित तौर पर यह एक बड़ा बदलाव है। मुसलमानों की ही तर्ज़ पर सवर्ण तबके को भी पहले कांग्रेस ने फिर बीजेपी ने वोटबैंक की तरह इस्तेमाल किया। वोट तो था लेकिन नेतृत्व नहीं। जो भी हो, माया की जीत और दलित-ब्राह्मण केमिस्ट्री सिर्फ एक जीत नहीं है। यह एक फिनोमिना है। गोबरपट्टी में गोइठे यानी उपलों को तो आप जानते ही होंगे। इसकी आग धीमी होती है, लेकिन बहुत देर तक रहती है। उत्तर प्रदेश में यह आज हो रहा है। अगले तीन-चार बरस में बिहार में भी होगा। और फिर सारे देश में यह लहर फैलेगी। जातिगत राजनीति का अपनी सीमाएं होती हैं, और इन सीमाओं से परे जाकर इसके दायरे फैलने के दिन आ गए हैं। अच्छा है कि किसी बहाने, सत्ता और राजनीति के ही बहाने जाति की रस्सी के कस-बल ढीले पड़ रहे हैं।

सादर
मंजीत, डीडी न्यूज़

Neeraj said...

रवीश भाई,हालांकि मैं आपके ब्लाग का नियमित पाठक नहीं हुँ।लेकिन माया की माया या यों कहे कि सिंहासन के लिए फैंका गया मायाजाल पर आपका लेख निश्चित रूप से एक बदलाव को दशाॻ रहा है। समस्या ये है कि राजनीति से शुरू हुए इस तथाकथित सामाजिक बदलाव की हवा कहां तक चलेगी। सिफॻ उत्तर-प्रदेश,बिहार या देश के दूसरे हिस्सों में भी। इस बात पर भी गौर करना होगा कि ये बदलाव कितना स्थायी होगा। कहीं ऐसा तो नहीं सत्ता से अलगाव के कारण जिस प्रकार कांग्रेस और बीजेपी से सवणोंॻ का मोहभंग हुआ है,मुसलमानों ने मुल्ला-मुलायम से अपना हाथ छटका है कहीं आगे चलकर वो सब बीएसपी के साथ न हो क्यों कि अगर ऐसा होता है तो इस बदलाव के मायने बदल जायेंगे।ब्राह्मण की वेटी दलित के लिए रोटी तो बनाती है। लेकिन यहां इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि वो रोटी सवणॻ उम्मीदवार को जीताने के लिए बना रही है या दलित के लिए,आखिर रवीश भाई ये रोटी सिफॻ चुनावों के समय ही क्यों बनती है आम दिनों में क्यों नहीं। उम्मीद है आप उत्तर-जरूर देगें।
सादर
नीरज सिंह,डीडी न्यूज़

pradeep said...

ravish sir, maya per aapne wohi likha hai jo ek samvedensheel journo likhta...aap wonha gaye jab media maya 135 seat de raha tha..uss din bhi wonhio the jab maya ki maya dikhi...kya wakai yeh dalit-brahmin gatjor ka kamal tha...ya up ke log her halat me mulyam se mukti chate the...muze lagta hai agar maya ko iss bar samaz ke her tabke se vote mile hain..aap se gujarish hai ki jara rahul gandhi ki kosisoen aur unke future per likhen...wohi jo aapne up ki janta me unko lekar feel keya ho....hain english wala episode bhi bhadana chieye...aapko flash back me jana hoga...

with regards.