बड़की माई । जबसे हमारे गाँव में ब्याह कर आईं है तब से ही शायद वे सबकी बड़की माई हैं । होश संभालने के साथ ही सबको बड़की माई ही पुकारते सुना है । किसी ने उन्हें कभी बड़की तो कभी बड़किया ही पुकारा । वो हमेशा वैसी ही दिखीं । बड़ी और बूढ़ी । थोड़ी झुकी हुईं । हम सबकी बड़की माई धवल निर्मल केश वाली छोटी गोल मोल प्यारी सी । चुपचाप सामानों को सहेज कर रखती हुईं, सबके खाने की योजना बनाने वाली । बड़ा परिवार होता है तो उसके संबंधों में सैंकड़ों पेंच होते हैं और जब संसाधन सीमित होते हैं तो झगड़े भी कम नहीं होते मगर इन सबके बीच बड़की माई सबके लिए सरल और अथाह ही बनी रहीं । आशीर्वाद के अलावा उन्हें किसी और ज़ुबान में बोलते नहीं सुना । किसी से उरेब यानी ख़राब तरीके से बोलते नहीं सुना । गाँव का हर बच्चा और बूढ़ा सब उनकी एक आवाज़ पर चले आते हैं । गाँव के घर से वो भी दूर रहने लगी हैं लेकिन उस पुराने से घर की पहचान भी वही हैं । पूरा जीवन लगा दिया उस घर की रखवाली में । गर्मी की छुट्टियों में बड़की माई को खुद भी पीले रंग से दरवाज़े को रंगते देखा है । कुछ ख़ास नहीं था पर जो था उसी को ज़ेवर की तरह संभालते देखा है । छीका पर छिपा कर दही का नदियाँ टाँगते तो तरह तरह के अचार, खटाई और कसार बनाते देखा है ।
मुझे अंधेरे मुँह उठने की आदत उन्हीं से लग गई होगी । नदी से नहा कर लौटते, अड़हूल का फूल तोड़ते और पूजा करते ही देखा है । भारी पुजेरिन । यहाँ जल चढ़ाया वहाँ दो फूल रख दिये । कोई मिल गया तो मिश्री के दो दाने प्रसाद के पकड़ा दीं । जाने कितने नाती पोते और बेटियों के लिए मन्नत माँगी होगी । दिन भूखी रही होंगी । बड़की माई का जीवन बहुत ही बड़े परिवार को पाल कर बड़ा करने में गुज़रा है । हर किसी की याद में वे किसी न किसी रूप में हैं । मेरे बाबूजी से लेकर जाने कितने देवरों ने उनकी गोद में खेला होगा । सबका जन्म उनके आने के बाद ही हुआ । घर की कितनी औरतों ने उनके पाँव छुए होंगे लेकिन बड़की माई को कोई फ़र्क ही नहीं पड़ा । मेरी माँ की जीजी हैं बड़की माई ।
हमारे बाबूजी को शायद बहुत प्यार करती हैं । हर दूसरी लाइन में अपने दुलारे देवर को याद करती रहती हैं । वो कितना छोटा था मुझसे पहले दुनिया से चला गया । देवर था तो यहाँ ले गया वो दिखा दिया । देवर ने ही ये ख़रीद दिया वो खिला दिया । देवर था तो मेरा शान था । काश कि उनकी बातों को भोजपुरी में ही लिख पाता लेकिन कई लोग समझ नहीं पायेंगे । बाबूजी को भी किसी ग़ुस्से के क्षण में अपनी भौजी को बोलते नहीं सुना । कभी बोला होगा तो मुझे जानकारी नहीं । लेकिन बड़की माई अपने देवर को जिस निश्छलता से याद करती हैं उसे देखने का सुख विरले हैं । छठ के दौरान जितनी बार टकराया बस देवर की बात । " आज हमार देवर रहते त उ कोरा( गोद) में उठा के गाड़ी में बइठा देते । " जीप से किसी तरह उतार कर घर के भीतर ले जाते वक्त कुछ ऐसा ही बड़बड़ा रही थीं । तुमलोग आते रहो यहाँ । उनकी आत्मा यही हैं ।
भले रहो, खूब ढंग से जीयो । भगवान ठीक से रखें तुम लोगों को । यही दुआ हमें देती हैं , यही दुआ सबको देती हैं । अपने अनगिनत नाती पोतों को भी । तमाम बेटियों और दामादों को भी । बड़किया को कभी किसी से माँगते चाहते नहीं देखा है । कभी किसी से माँगा नहीं । न खाने की इच्छा जताई न पहनने के लिए कुछ माँगा । उनकी बेटियाँ बहुत सक्षम हैं और नाती पोते बहुत लायक । ज़रूर ही वो लोग बड़की माई को कलकत्ता मुंबई अमरीका ले गए होंगे । मैंने पूछा नहीं पर मेरे बाबूजी का नाम खूब जपती रहीं कि वो उनको हरिद्वार ले गए थे । जिसने भी दिया है बड़की माई को, जितना दिया नहीं उससे कहीं ज़्यादा उन्होंने सबको आशीष दिया है । याद रखा है । कुछ भी दे दीजिये बड़की माई उतना ही आशीर्वाद देंगी जितना सबको देती आईं हैं । जीते रहो, ख़ुश रहो । नाती पोता हो । बेटा हो । पर अब बेटियों को भी आशीर्वाद देने लगी हैं । मुझे कहा भगवान करे तुम्हारी बेटियाँ कलक्टर बने । बेटा बेटी कुछ नहीं होता है । वर्ना तो बेटे के अलावा, खैर । बार बार कहती रहीं देखना बेटियाँ कमाल करेंगी । वक्त अपने आप बदल देता है ।
बाबूजी के सबसे बड़े भाई हमारे बड़का बाबूजी । दोनों भाइयों के मछली ख़रीदने और खाने के क़िस्से मशहूर हैं । तमाम झगड़ों के बीच बाबूजी ने जब भी मछली ख़रीदा अपने भइया के लिए भी ख़रीदा । बन गई तो उसमें से भी मछली भैया को भिजवा देते थे । कुछ तो था दोनों के बीच जो आज भी बड़का बाबूजी की बातों से झलक जाता है । इस बार छठ में गाँव आए तो सबसे पहले अपने दिवंगत भाई की तस्वीर साफ़ कराई । नाती से कहा पहले साफ़ करो तब खायेंगे । बेहद कमज़ोर और बच्चे से हो गए हैं बड़का बाबूजी । सबको पहचान भी नहीं पाते लेकिन वाॅकर से चल चल कर बाबूजी की तस्वीर के पास जाकर देखते हैं । माले को इस तरह से हटवाया कि उनका चेहरा दिखता रहे । वो बोल नहीं पाते हैं मगर पता नहीं अपने छोटे भाई को कैसे मिस करते होंगे । उनके पास हम जैसों की तरह बोलने की शैली नहीं है मगर जब मेरे ही सामने किसी से तस्वीर से माले को किनारे करने को कहा तो इस प्यार को देखकर कलेजा फट गया । क्या है दोनों के बीच । क्या था ? था तो ज़िंदा रहते क्यों नहीं दिखा या हम समझ ही नहीं पाए ।
वही हाल बड़की माई का । कोई उनके सामने देवर की शिकायत करके देख ले । बाबूजी भी हम सबसे दूर अपने भैया भौजी को मिस करते ही होंगे । बड़का बाबूजी की आवाज़ में मेरे बाबूजी की आवाज़ ज़िंदा है । सुनकर सिहर जाता हूँ । ख़ून इसे कहते हैं ।बस यही अपना होता है क्या ? उनकी बहू ने बताया कि जब प्राइम टाइम आता है तो टीवी खोल देती हैं । अम्मा जी देख लीं राउर भतीजा आवतारे । बता रहीं थीं कि पूरे शो के दौरान बड़का बाबूजी मेरे बाबूजी को याद कर देखते रोते रहते हैं । बड़की माई मुझे देखकर रोती रहती है और वही आशीर्वाद देती रहती हैं । गाँव में मिलीं तो कहने लगी कि शिकायत है । मैं ठिठक गया । बोली कि जब तुम टीवी में दिखते हो तो हम तुमसे इतना बात करते हैं । खूब बात करते हैं और तुम खाली उन्हीं लोगों से बात करते रहते हो । थोड़ा हमसे नहीं बात कर सकते । उफ्फ । जान निकल गई मेरी । मैंने बड़की माई को टेक्नालजी नहीं समझाईं । बस कहा कि हाँ बात करना चाहिए । ग़लती हो गई ।
ज़िंदगी में वक्त कम पड़ जाता है । हम सब जब परिवार और घर छोड़ कर अपने जीवन की तलाश में दिल्ली मुंबई आ गए । न जाने कितनों ने अपनी किसी बड़की माई के साथ रहने का वक्त गँवा दिया । माँ बाप के साथ रहने जीने का वक्त गँवा दिया । बड़की माई थोड़ी और बड़ी हो गईं हैं । बूढ़ी हो गईं हैं । पता नहीं क्या क्या बोलती रहती हैं । देवर पहले क्यों गया । भगवान हमको क्यों नहीं ले गए । बड़की माई तुम सचमुच सबकी बड़की हो । हमने तुमको हमेशा बूढ़ी माई के रूप में देखा मगर तुम हमारी यादों में बिल्कुल जवान हो ।