चाय, फ़ेसबुक और सैमसंग

आज पांडव नगर में दिलीप कुमार से मिला । दिलीप यहाँ पिछले सोलह साल से चाय बेच रहे हैं । इनके पास सैमसंग गैलक्सी मोबाइल फ़ोन है । दिलीप अनपढ़ हैं । कभी स्कूल नहीं गए । बिहार के भागलपुर से दिल्ली काम करने आए तो पहले साल कूरियर कम्पनी में काम किया था । वहीं उन्होंने पहली बार ए बी सी डी लिखना पढ़ा सीखा और अंग्रेज़ी में लिखे पतों को पढ़ने लगे ।


दिलीप ने जब मेरी तस्वीर लेकर फ़ेसबुक पर डाला तो हैरान रह गया । उनके दोस्तों ने कहा कि ये वीडियो यू ट्यूब पर अपलोड कर देगा । हम अपने बदलते हिन्दुस्तान को देख नहीं पा रहे हैं । दिलीप को आम आदमी से उम्मीदें हैं । 


जब मैंने दिलीप से कहा कि किया ने जानते हैं कि नरेंद्र मोदी चाय वाले हैं । दिलीप ने कहा कि दो तीन दिन पहले सुना कि चाय बेचते थे । मुझे अच्छा लगता है कि कोई संघर्ष कर आगे बढ़ता है । मोदी चाय वाले हैं तो क्या आप एक चाय वाले को वोट नहीं देंगे । देखो जी वोट देंगे या नहीं देंगे ये तो बाद की बात है । सिर्फ चाय बेचने से कोई चाय वालों का नेता नहीं हो जाता । जब जनरल इलेक्शन होगा तो सोचेंगे । विचार करेंगे ।


लेकिन क्या आप हर तबके में स्मार्ट फ़ोन और फ़ेसबुक की घुसपैठ को समझ पा रहे हैं । फ़ेसबुक पर होने को बाद भी यह सूचना दिलीप के पास अभी पहुँची है कि मोदी चाय बेचते थे । जबकि महीनों से यह ख़बर चल रही है । दिलीप के फ़ेसबुक पेज पर अश्लील तस्वीरें भी आ गईं हैं । उन्हें नहीं पता था कि कैसे टैग को ब्लाक किया जाता है । दिल्ली की यह कहानी कुछ रोचक नहीं लगी ! 

हवा महल

मोदी और साहू जी

जाति से जोड़ कर देखता हूँ चाय से नहीं । और आपकी जाति के नहीं होते तो ? तब देखते । जयपुर के ज़ौहरी बाज़ार( चौड़ा रास्ता ) मेंं साहू चाय वाले से नरेंद्र मोदी के चाय वाले प्रसंग के बारे में पूछ रहा था । साहू जी ने कहा कि समाज के काम के लिए फ़ोन किया था उनके पीए को मगर नहीं आए । कौन सा काम ? सामूहिक विवाह समारोह के लिए । साहू जी कम बोलने वाले व्यक्ति मालूम पड़े । मोदी के चाय बेचने की अतीत और अपने वर्तमान के बीच कनेक्ट कर पाने के अकादमिक सवाल से चुप हो गए ।


यह बातचीत हो ही रही थी कि एक सज्जन और आए । चार बार कहा कि सुन लीजिये मैं अनपढ़ हूँ । अटल जी बग़ीची में भांग घोंटा करते थे प्रधानमंत्री बन गए । भैरों सिंह शेखावत तीन सौ रुपये रिश्वत लेने के आरोप में जेल गए लेकिन क्या हुआ । सीएम बन गए कि नहीं । गिरधारी लाल भार्गव यहीं मेरे साथ भांग पीया करते थे, पता है जयपुर से कितनी बार सासंद बने । ललाट पर हाथ फेरते हुए कहा कि इसका क्या करोगे जो लिखा है । मैंने कहा सही कह रहे हैं लेकिन जो बात कहीं क्या वो भी सही है ? इतने पे सज्जन उखड़ गए । मुझसे कहा, अरे चाय की दुकान पर क्या कर रहे हो, लाइब्रेरी जाकर राजनीति की दो चार किताबें पढ़ लो । बंदे ने ऐसी डाँट पिलाई कि क्या रहें । बाप रे सर मुँड़ाते ओले पड़े । ये मोदी के चक्कर में पिट जाऊँगा एक दिन । उनके चेलों ने गाली देकर पहले ही तंग किया हुआ है । 

मेरा ग़रीब तेरा ग़रीब

राहुल की रैलियाँ मोदी की तुलना में कम होती होंगी मगर उनके भाषणों की संख्या तो और भी कम है । मोदी पाँच जगहों पर पाँच बातें बोलते हैं लेकिन राहुल पाँच जगहों पर एक ही बात । बात सिर्फ मोदी के भाषणों के विवादास्पद तत्वों की नहीं है बात है भाषणों को सुनने की उत्सुकता की । इस लिहाज़ से राहुल गांधी का भाषण नीरस सा लगने लगा है । पता है क्या बोलेंगे । मोदी को बारे में लगता है कि देखें अब क्या बोल रहे हैं । दोहराने का ख़तरा तो मोदी में भी है लेकिन मोदी ने अपने कपड़ों से भी दूसरी रैली के लिए नया कर लेते हैं । उनके भाषणों के साथ मंच पर मोदी के पहने कपड़ों की तस्वीर एक जगह रखेंगे तो पायेंगे कि एक ही आदमी के कितने रुप हैं । 

राजनीति में नेता आमतौर पर एक ही प्रकार के कपड़े पहनते हैं । राहुल,अखिलेश,लालू,रमन सिंह, नीतीश । शिवराज रंगीन कुर्ता पहनते हैं मगर कुर्ते की वेरायटी उनकी पहचान का हिस्सा नहीं है । रैली का चलन कमज़ोर होता जा रहा है । रैली में लोग कैसे आते है हम यह भी जानते हैं लेकिन इसके बाद भी मोदी ने अपनी रैलियों में रोचकता पैदा करने का प्रयास किया है । आप इसमें साज सज्जा की भव्यता, नाटकीयता, शाह ख़र्चीला और ऊब भी जोड़ सकते हैं । लेकिन इन सबसे अलग भाषण की विविधता यहाँ चर्चा के केंद्र में है । मोदी और राहुल दो दुनिया से बातें कर रहे हैं । राहुल के भाषणों की दुनिया में ग़रीब ही ग़रीब है । मोदी के भाषण का की दुनिया ग़रीब वे ख़ुद हैं । राहुल कहते हैं बीजेपी अमीरों की पार्टी है । उनकी चिन्ता करती है । मोदी उनके इस दावे को खुद चाय वाला बता कर चुनौती देते हैं । तीन बार मुख्यमंत्री रहने वाला शख़्स आख़िर क्यों पहली बार( शायद) खुद को चाय वाला बता रहा है । ये मोदी की काट है । मीडिया या लोगों को राहुल के भाषणों में भले कम दिलचस्पी हो मगर मोदी की है । चाय वाला अमीरों की पार्टी का नेता है तो एक खाते पीते परिवार वाला खुद को ग़रीबों का नेता बता रहा है । सच में तो दोनों में से कोई ग़रीब नहीं है । ख़ैर । 

राहुल जिस ग़रीब को ढूँढ रहे हैं वो अब गाँवों में नहीं रहता । मैं एक प्रक्रिया के तहत बात रख रहा हूँ । राहुल गांधी का ग़रीब अब वो ग़रीब नहीं है जो इंदिरा के समय था । मैं सिब्बल टाइप भी बात नहीं कर रहा कि ग़रीब दो सब्ज़ी खाते हैं । हालाँकि खानपान में सकारात्मक बदलाव आया है पर ये सिब्बल की विश्वसनीयता की कमी है कि सही बात भी पलट जाती है । मैं कहना चाहता हूँ कि शहरीकरण का विस्तार और प्रसार हुआ है । आप इस बात को ऐसे मत देखिये कि कितने शहर बने हैं । यह भी एक दिलचस्प है कि शहरों या शहरी क्षेत्रों की संख्या कोई चार हज़ार से बढ़कर आठ हज़ार हो गई है । मैं यह कहना चाहता हूँ कि शहरी क्षेत्र का विस्तार गाँव गाँव तक में हुआ है । गाँव में रहने वाला भी अब ग्रामीण नहीं है । गाँवों की भी बड़ी आबादी खानपान से लेकर परिवार के सदस्यों की तमाम शहरों में आवाजाही के कारण शहरी हो गई है । आप इन्हें ' ग्रामीण अर्ध शहरी' कह सकते हैं । अभी तक क़स्बों या गाँवों के शहर में बदलने को अर्ध शहरी क्षेत्र या 'रूर्बन' कहा जाता रहा है मगर आबादी की बदलती जगहों और आदतों से भी शहरीकरण फैला है । जो मज़दूर पुणे या दिल्ली में काम करता है और गाँव जाता है वो पुणे में शहरी है और उसका परिवार गाँव में अर्ध शहरी । हर गाँव में कम से कम दस शहर रहता है । दस शहरों में उस गाँव के लोग रहते हैं । हिन्दुस्तान यहाँ बदला है । ग़रीब ग़ायब नहीं हुए हैं लेकिन ग़रीबी कम तो हुई ही है । मोदी इस आबादी को टारगेट कर रहे हैं । हमारे यहाँ का अमीर भी अपने घर को ग़रीबख़ाना कहता है । सबकी पहचान में ग़रीबी आती है । अतीत से या वर्तमान को कम कर बताने के लिए । यह वही अर्ध शहरी आबादी है जिसमें जात पात कमज़ोर हुआ है । मोदी इनके नेता हैं । 

इसीलिए कहा कि राहुल का ग़रीब मोदी के ग़रीब  से अलग है । मोदी ने उस ग़रीब को चाय वाला बता कर पहचान दी है । चाय की दुकान वाला हर जात का होता है । वही चौक चौराहा है । राहुल अमूर्त ग़रीब को संबोधित कर रहे हैं । मोदी मूर्त को । यह चुनाव अमीर हो चुके मध्यमवर्गीय हिन्दुस्तान का है । सत्तर के दशक के ग़रीब हिन्दुस्तान का नहीं । ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी मानसिकता का प्रसार राहुल को नहीं दिखता जिसका श्रेय वे आसानी से ले सकते थे मगर जैसा कि मैंने पहले लेख ( गाँव से लौटकर) में लिखा है उनके पास इसकी दावेदारी का नज़रिया और विश्वसनीयता नहीं है । इसलिए राहुल के भाषण संदर्भ से बाहर लगते हैं । यह चुनाव उस शहरी हिन्दुस्तान का है जो गाँव से लेकर महानगरों में कई रुपों में रहता है । जिसका एक वतन सोशल मीडिया भी है । मोदी ने इस तबके को रटा रटा कर अपनी ओर खींचने का प्रयास किया है कि देश गया गुज़रा है । कुछ करना है । हर खाते पीते को ग़रीब कहलाना भी ठीक लगता है !  राहुल उस तबके में खुद को तलाश रहे हैं जो ग़रीब तो है मगर ग़रीब की पहचान का केंचुल अपने जीवन स्तर में धीरे धीरे आ रहे बदलाव के कारण उतार रहा है । राजनीति हवा में नहीं बदलती है । हमारे नेता भी कम समाजशास्त्री नहीँ होते । इसलिए राहुल जी भाषण पर मेहनत कीजिये । कुछ होगा तब तो दुनिया बात करेगी । हाँ इतिहास गड़बड़ मत कर दीजियेगा लेकिन आप तो वर्तमान ही नहीं समझ रहे ।

बड़की माई

बड़की माई । जबसे हमारे गाँव में ब्याह कर आईं है तब से ही शायद वे सबकी बड़की माई हैं । होश संभालने के साथ ही सबको बड़की माई ही पुकारते सुना है । किसी ने उन्हें कभी बड़की तो कभी बड़किया ही पुकारा । वो हमेशा वैसी ही दिखीं । बड़ी और बूढ़ी । थोड़ी झुकी हुईं । हम सबकी बड़की माई धवल निर्मल केश वाली छोटी गोल मोल प्यारी सी । चुपचाप सामानों को सहेज कर रखती हुईं, सबके खाने की योजना बनाने वाली । बड़ा परिवार होता है तो उसके संबंधों में सैंकड़ों पेंच होते हैं और जब संसाधन सीमित होते हैं तो झगड़े भी कम नहीं होते मगर इन सबके बीच बड़की माई सबके लिए सरल और अथाह ही बनी रहीं । आशीर्वाद के अलावा उन्हें किसी और ज़ुबान में बोलते नहीं सुना । किसी से उरेब यानी ख़राब तरीके से बोलते नहीं सुना । गाँव का हर बच्चा और बूढ़ा सब उनकी एक आवाज़ पर चले आते हैं । गाँव के घर से वो भी दूर रहने लगी हैं लेकिन उस पुराने से घर की पहचान भी वही हैं । पूरा जीवन लगा दिया उस घर की रखवाली में । गर्मी की छुट्टियों में बड़की माई को खुद भी पीले रंग से दरवाज़े को रंगते देखा है । कुछ ख़ास नहीं था पर जो था उसी को ज़ेवर की तरह संभालते देखा है । छीका पर छिपा कर दही का नदियाँ टाँगते तो तरह तरह के अचार, खटाई और कसार बनाते देखा है ।

मुझे अंधेरे मुँह उठने की आदत उन्हीं से लग गई होगी । नदी से नहा कर लौटते, अड़हूल का फूल तोड़ते और  पूजा करते ही देखा है । भारी पुजेरिन । यहाँ जल चढ़ाया वहाँ दो फूल रख दिये । कोई मिल गया तो मिश्री के दो दाने प्रसाद के पकड़ा दीं । जाने कितने नाती पोते और बेटियों के लिए मन्नत माँगी होगी । दिन भूखी रही होंगी । बड़की माई का जीवन बहुत ही बड़े परिवार को पाल कर बड़ा करने में गुज़रा है । हर किसी की याद में वे किसी न किसी रूप में हैं । मेरे बाबूजी से लेकर जाने कितने देवरों ने उनकी गोद में खेला होगा । सबका जन्म उनके आने के बाद ही हुआ । घर की कितनी औरतों ने उनके पाँव छुए होंगे लेकिन बड़की माई को कोई फ़र्क ही नहीं पड़ा । मेरी माँ की जीजी हैं बड़की माई । 

हमारे बाबूजी को शायद बहुत प्यार करती हैं । हर दूसरी लाइन में अपने दुलारे देवर को याद करती रहती हैं । वो कितना छोटा था मुझसे पहले दुनिया से चला गया । देवर था तो यहाँ ले गया वो दिखा दिया । देवर ने ही ये ख़रीद दिया वो खिला दिया । देवर था तो मेरा शान था । काश कि उनकी बातों को भोजपुरी में ही लिख पाता लेकिन कई लोग समझ नहीं पायेंगे । बाबूजी को भी किसी ग़ुस्से के क्षण में अपनी भौजी को बोलते नहीं सुना । कभी बोला होगा तो मुझे जानकारी नहीं । लेकिन बड़की माई अपने देवर को जिस निश्छलता से याद करती हैं उसे देखने का सुख विरले हैं । छठ के दौरान जितनी बार टकराया बस देवर की बात । " आज हमार देवर रहते त उ कोरा( गोद) में उठा के गाड़ी में बइठा देते । " जीप से किसी तरह उतार कर घर के भीतर ले जाते वक्त कुछ ऐसा ही बड़बड़ा रही थीं । तुमलोग आते रहो यहाँ । उनकी आत्मा यही हैं । 

भले रहो, खूब ढंग से जीयो । भगवान ठीक से रखें तुम लोगों को । यही दुआ हमें देती हैं , यही दुआ सबको देती हैं । अपने अनगिनत नाती पोतों को भी । तमाम बेटियों और दामादों को भी । बड़किया को कभी किसी से माँगते चाहते नहीं देखा है । कभी किसी से माँगा नहीं । न खाने की इच्छा जताई न पहनने के लिए कुछ माँगा । उनकी बेटियाँ बहुत सक्षम हैं और नाती पोते बहुत लायक । ज़रूर ही वो लोग बड़की माई को कलकत्ता मुंबई अमरीका ले गए होंगे । मैंने पूछा नहीं पर मेरे बाबूजी का नाम खूब जपती रहीं कि वो उनको हरिद्वार ले गए थे । जिसने भी दिया है बड़की माई को, जितना दिया नहीं उससे कहीं ज़्यादा उन्होंने सबको आशीष दिया है । याद रखा है । कुछ भी दे दीजिये बड़की माई उतना ही आशीर्वाद देंगी जितना सबको देती आईं हैं । जीते रहो, ख़ुश रहो । नाती पोता हो । बेटा हो । पर अब बेटियों को भी आशीर्वाद देने लगी हैं । मुझे कहा भगवान करे तुम्हारी बेटियाँ कलक्टर बने । बेटा बेटी कुछ नहीं होता है । वर्ना तो बेटे के अलावा, खैर । बार बार कहती रहीं देखना बेटियाँ कमाल करेंगी । वक्त अपने आप बदल देता है । 

बाबूजी के सबसे बड़े भाई हमारे बड़का बाबूजी । दोनों भाइयों के मछली ख़रीदने और खाने के क़िस्से मशहूर हैं । तमाम झगड़ों के बीच बाबूजी ने जब भी मछली ख़रीदा अपने भइया के लिए भी ख़रीदा । बन गई तो उसमें से भी मछली भैया को भिजवा देते थे । कुछ तो था दोनों के बीच जो आज भी बड़का बाबूजी की बातों से झलक जाता है । इस बार छठ में गाँव आए तो सबसे पहले अपने दिवंगत भाई की तस्वीर साफ़ कराई । नाती से कहा पहले साफ़ करो तब खायेंगे । बेहद कमज़ोर और बच्चे से हो गए हैं बड़का बाबूजी । सबको पहचान भी नहीं पाते लेकिन वाॅकर से चल चल कर बाबूजी की तस्वीर के पास जाकर देखते हैं । माले को इस तरह से हटवाया कि उनका चेहरा दिखता रहे । वो बोल नहीं पाते हैं मगर पता नहीं अपने छोटे भाई को कैसे मिस करते होंगे । उनके पास हम जैसों की तरह बोलने की शैली नहीं है मगर जब मेरे ही सामने किसी से तस्वीर से माले को किनारे करने को कहा तो इस प्यार को देखकर कलेजा फट गया । क्या है दोनों के बीच । क्या था ? था तो ज़िंदा रहते क्यों नहीं दिखा या हम समझ ही नहीं पाए । 

वही हाल बड़की माई का । कोई उनके सामने देवर की शिकायत करके देख ले । बाबूजी भी हम सबसे दूर अपने भैया भौजी को मिस करते ही होंगे । बड़का बाबूजी की आवाज़ में मेरे बाबूजी की आवाज़ ज़िंदा है । सुनकर सिहर जाता हूँ । ख़ून इसे कहते हैं ।बस  यही अपना होता है क्या ?  उनकी बहू ने बताया कि जब प्राइम टाइम आता है तो टीवी खोल देती हैं । अम्मा जी देख लीं राउर भतीजा आवतारे । बता रहीं थीं कि पूरे शो के दौरान बड़का बाबूजी मेरे बाबूजी को याद कर देखते रोते रहते हैं । बड़की माई मुझे देखकर रोती रहती है और वही आशीर्वाद देती रहती हैं । गाँव में मिलीं तो कहने लगी कि शिकायत है । मैं ठिठक गया । बोली कि जब तुम टीवी में दिखते हो तो हम तुमसे इतना बात करते हैं । खूब बात करते हैं और तुम खाली उन्हीं लोगों से बात करते रहते हो । थोड़ा हमसे नहीं बात कर सकते । उफ्फ । जान निकल गई मेरी । मैंने बड़की माई को टेक्नालजी नहीं समझाईं । बस कहा कि हाँ बात करना चाहिए । ग़लती हो गई । 

ज़िंदगी में वक्त कम पड़ जाता है । हम सब जब परिवार और घर छोड़ कर अपने जीवन की तलाश में दिल्ली मुंबई आ गए । न जाने कितनों ने अपनी किसी बड़की माई के साथ रहने का वक्त गँवा दिया । माँ बाप के साथ रहने जीने का वक्त गँवा दिया । बड़की माई थोड़ी और बड़ी हो गईं हैं । बूढ़ी हो गईं हैं । पता नहीं क्या क्या बोलती रहती हैं । देवर पहले क्यों गया । भगवान हमको क्यों नहीं ले गए । बड़की माई तुम सचमुच सबकी बड़की हो । हमने तुमको हमेशा बूढ़ी माई के रूप में देखा मगर तुम हमारी यादों में बिल्कुल जवान हो । 

ध्यानचंद के लिए कोई नहीं !

मुझे लगा था कि नेता मेजर ध्यानचंद को भारत रत्न दिये जाने की मांग ज़ोर शोर से करेंगे । यहाँ तो सब अपने अपने नेताओं को देने की मांग में लग गए । अजीब हालत है राजनीति की । जिसे मिला है कम से कम उसकी तो खुशी मना लेते । जैसे बच्चे करते हैं न । पप्पू को दिया तो बब्लू को भी दो । जब लोग सचिन और ध्यानचंद को देने की मांग कर रहे थे उसके लिए नियम बदलने की चर्चा हो रही थी तभी क्यों नहीं कहा कि सचिन ध्यानचंद को छोड़ो पहले अटल बिहारी वाजपेयी को दो, कर्पूरी ठाकुर को दो लोहिया को दो । हद है । मुझे लगा था कि ये ध्यानचंद के लिए कम से कम नक़ली आँसू तो बहायेंगे । मगर ये तो दो मिनट में भूल कर अपने नेताओं का जाप करने लगे । लगता है कहने कोसिए बेचैन हैं मगर कह नहीं पा रहे हैं कि सचिन को क्यों दिया । हमें क्यों नहीं । कोई विवेचना के लिए तैयार भी है कि वाजपेयी को क्यों मिलना चाहिए । कर्पूरी ठाकुर को क्यों मिलना चाहिए । कांशीराम को क्यों नहीं मिलना चाहिए ? कम से कम लोगों को पता तो चले कि इन्होंने ऐसा क्या किया था । और तो और एक और नया धंधा शुरू हो गया है कि पहले किसको दिया का । पटेल को बाद में दिया सचिन को जल्दी दिया । हर भारत रत्न के साथ यही कहानी है । लोकपाल को दे दीजिये वही तय करेगा किसे मिलना चाहिए । पहले लोकपाल बना तो दीजिये । 

राजनीति का सम्मान किया जाए

आदरणीय सी एन आर राव जी,

पहले तो बधाई आपको । इसलिए नहीं कि भारत रत्न मिला है बल्कि इसलिए कि इसके बहाने आपके बारे में जानने का मौक़ा मिला है । लगा कि कोई इतना भी काम कर सकता है । आप जैसों को ही भारत रत्न मिले तो इस पुरस्कार की महिमा बढ़ेगी । 

मगर सर । नेता मूर्ख होते हैं इस तरह के बयान मत दीजिये । राजनीति में नेताओं को चोर समझने वाले मूर्खों की कमी नहीं । इस देश में राजनीति ने जितना सामाजिक परिवर्तन किया है उतना विज्ञान ने नहीं । इस तरह के जनरल बयान वैज्ञानिकों के बारे में भी दिये जा सकते हैं । उचित ही आपने स्पष्टीकरण दे दिया । लेकिन राजनीति और सरकारी अस्पताल से दूर मत जाइये । जायेंगे तभी उसकी हक़ीक़त जानेंगे । बहुत लोग चोर हैं और मूर्ख भी मगर किसी अच्छे नेता और डाक्टर से आपकी मुलाक़ात हो ही जाएगी । आपने फ़ंड की कमी का रोना तो रो लिया सर लेकिन महज़ विचार के पीछे अपने घर से पैसे लगाकर राजनीति में दिन रात खपा देने वाला कार्यकर्ता तो किसी के पास रो भी नहीं सकता । वह भी राजनीति के किसी विचार से समाज कोसबदलने में खुद को समाप्त कर लेता है । कुछ लोग चोर बन जाते है को कुछ दलाल । इसीलिए राजनीति में हमेशा वही आगे रहेगा जिसके पास पैसा है । ज़मींदार है स्कूल है बिज़नेस है । ऐसे लोगों को बाहर करने और कार्यकर्ताओं और नेताओं को ऐसा न बनने देने पर विचार किया जाना चाहिए । न कि राजनेताओं को लतियाना गरियाना । विज्ञान जगत की भी समीक्षा कीजिये । समाज को एक अच्छे राजनेता और वैज्ञानिक दोनों की ज़रूरत है । उम्मीद हा आप राजनीति में लगे लोगों का हौसला बढ़ाने और सम्मान बनाए रखने में मदद करेंगे । बहुत दिक्क्त है तो भारत रत्न लौटा दीजिये लेकिन इससे क्या हासिल होगा । कुछ भी नहीं । 

आपका विज्ञान से घबराने वाला पत्रकार
रवीश कुमार

बकरी घास खाती है


खान पान की आदत तो सबकी बदली है । खान पान ही नहीं खाने की शैली भी । घास क़ीमती हो गई है शायद । किसान ने बताया कि घास को गठरी में बाँध देने से चारे की बर्बादी कम होती है । एक पक्ष यह भी होगा कि अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं । बकरी चराने या घास लाने के लिए कोई नहीं होगा । ऐसा नहीं है कि बकरियाँ चरती नहीं हैं । आख़िर की तस्वीर अन्य जगह की है । यहाँ बकरियाँ गाय की तरह टोकरी में खा रही हैं ।



बाल शाखा, नागपुर





भोजपुरी में सपा का छठ बधाई वाला पोस्टर