सूफ़ी संत सचिन

सुबह से ही सचिन ऐसे खेल रहे थे जैसे वे गुज़िश्ता चौबीस साल के एक एक लम्हे को फिर से जी लेना चाहते हों । जैसे विदाई के वक्त बेटी आख़िर तक  अपने उस आँगन को मुड़ मुड़ कर देखती हुई वहाँ गुज़ारे चौबीस या तीस साल के तमाम पलों को सहेज लेना चाहती है । सचिन लोगों को याद दिला रहे थे कि देखो ऐसे ही देखा था तुमने सचिन को । इसी तरह के शाट के दरम्यान तुमने सचिन को प्यार करना सीखा था । सचिन आज सचिन की तरह खेल रहे थे । बल्ले से हुई दो चार चूकें भी आश्वस्त कर रही थीं कि नहीं देखो । देखते रहो । यह वही सचिन है । अपनी लय में है । पहले पचास फिर सत्तर फिर चौहत्तर । सौ वाला सचिन है ये तो । जा रहा है धीरे धीरे शतक की ओर ।

आउट ! स्टेडियम में उदासी पसर गई । लेकिन सचिन की तरह दर्शक भी संभले हुए थे । सब खड़े हो गए । इस महान खिलाड़ी को विदाई देने ।  एक शानदार पारी खेल कर जा रहे थे । ऐसा नहीं हुआ कि सचिन का विकेट हवा में उड़ गया । शतक सचिन का मुकुट है । लेकिन बादशाह हमेशा मुकुट के ही जँचते हो ज़रूरत नहीं । सचिन ने जो सल्तनत क़ायम की थी वो सिर्फ मीडिया और मार्केट की बनाई सल्तनत नहीं है । उनकी बादशाहत का यही तो कमाल है कि वो सचिन के क्रिकेटीय करामातों की बुनियाद पर क़ायम है । हर समाज अपने महान खिलाड़ी को ऐसे ही देखता है । सचिन उस दौर के खिलाड़ी हैं जिन्हें सबने कभी न कभी देखा है । हो सकता है बहुतों ने कभी कपिल गावस्कर को टीवी पर । देखा हो। रेडियो पर सुना हो और अख़बारों में पढ़ा हो । सचिन की हर पारी चाहे वो देश की है विदेश की, देखी गई है । सचिन की कोई न कोई छवि सबके दिलों में बड़े हैं । वे गांधी और नेहरू से कभी बड़े नहीं हो सकते । यही पर खेल का ग्लैमर राजनीति से मार खा जाता है । गावस्कर को क्या मालम था कि कोई सचिन आ जाएगा । क्या सचिन को मालूम होगा । 

क्रिकेट के सूफ़ी संत हैं सचिन । आनंद के चरम पर ले जाते है । खेल और मनोरंजन के उस एकात्म की तरफ़ जिसे देखने वाले महज़ श्रद्धा मान बैठते हैं । जबकि सचिन की संतई इसी बात की है कि उसमें हम सब अपना चेहरा देखने लगते हैं । सूफ़ी संत इशा मोड़ पर आकर ख़ुदा और बंदों के बीच माध्यम बन जाते हैं । सचिन हमारे और क्रिकेट के बीच वो माध्यम हैं जिसका सिलसिला उन्होंने ही क़ायम की और उन्हीं के साथ समाप्त भी हो जाएगा । 

संघ का सरदार कौन

सार्वजनिक मुद्दों की एक ख़ास बात होती है । इनके गुप्त और ज़ाहिर पहलु और तथ्य इतने होते हैं कि आप राय रखते समय सबसे नहीं गुज़र रहे होते हैं । कुछ न कुछ छूट जाता है । कुछ लोग उन तथ्यों को ला लाकर संतुलन की दावेदारी करते रहते हैं तब भी कई तरह से सोचना रह जाता है । नेता का कमाल यही है कि वो ऐसे ही मुद्दों को उछाले ताकि वो सही ग़लत से ऊपर उठकर लोगों की चर्चा में बना रहे । 

सरदार पटेल पर हो रही बहस में यही हो रहा है । हर कोई मूलत कांग्रेस और बीजेपी की विरासत के बीच मोदी की नई दावेदारी में उलझा हुआ है । इसी बहस को मैंने शुरूआत में सरदार को कुर्मी समाज के नायक के रूप में पेश कर नीतीश को चुनौती देने की नज़र से देखा था । गुजरात के पटेल और बिहार के पटेल दोनोंं सरनेम एक तो हैं मगर सरदार कुर्मी नहीं थे । इसके बावजूद नीतीश ने लालू से अलग होकर कुर्मी रैली की थी तब उस पोस्टर में सरदार पटेल भी मौजूद थे । यू ट्यूब पर कई वीडियों हैं जो पटेल जयंती के मौक़े पर अलग अलग कुर्मी समाज की सभाओं की रिकार्डिंग हैं । सरदार पटेल की जयंती पर कुर्मी समाज की सभा ? तो मैंने इसी लिहाज़ से देखा कि नरेंद्र सरदार को किसान बनाकर बिहार में नीतीश और यूपी में बेनी प्रसाद वर्मा की दावेदारी को धक्का मारेंगे । 


इसी ब्लाग पर मैंने यह भी लिखा है कि मोदी ने सरदार की प्रतिमा बनाकर आडवाणी की पटेल कहे जाने की विरासत को समाप्त कर दिया । आडवाणी जो खुद लौह पुरुष के विशेषण व्यंजन से आह्लादित होते रहे उन्होंने भी कभी सरदार की विरासत को इस स्केल पर ले जाने के बारे में नहीं सोचा था । मोदी कांग्रेस से उपेक्षा का वाजिब हिसाब मांग रहे हैं मगर इसमें एक सवाल आडवाणी जी से भी है कि आप सरदार बनकर भी सरदार को भूल गए । बीजेपी के किस नेता ने आडवाणी को लौह पुरुष नहीं पुकारा होगा । एक झटके में और वो भी बहुत आसानी से मोदी ने दुनिया को बता दिया कि सरदार पटेल को याद करने वाले वे पहले हैं । जबकि हक़ीक़त यह है कि बीजेपी में हमेशा नेहरू और पटेल रहे हैं । अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना नेहरू से होती रही जबकि आडवाणी की सरदार पटेल से । मोदी ने एक प्रतिमा से अटल के नेहरू होने और आडवाणी के पटेल होने की दावेदारी पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया या कहें तो दोनों को बेदख़ल कर दिया । अटल जी ने भी कभी नेहरू की विरासत को चुनौती नहीं दी जिस तरह से मोदी ने दी है । इसी ब्लाग पर अपने एक लेख में मैंने लिखा था कि गोवा में प्रचार अभियान समिति का चेयरमैन चुनें जाने के चंद दिनों में मोदी पटेल की प्रतिमा की बात करेंगे । मेरे पास इसकी कोई जानकारी नहीं थी मगर हुआ यही । लिखने से पहले एक पत्रकार से पूछा था तो यही कहा कि तीन साल से बात ही कर रहे हैं पटेल की प्रतिमा की मगर होगा कुछ नहीं । मगर गोवा से अहमदाबाद आते ही अगले एक दो दिनों में मोदी ने पटेल की प्रतिमा बनाने की घोषणा की थी । वे नक़ली सरदार आडवाणी को परास्त कर लौटे थे । दिल्ली में बीजेपी के प्रथम लौह पुरुष कोप भवन में रो रहे थे और अहमदाबाद में मोदी असली सरदार की बात करना शुरू कर चुके थे । अब बीजेपी में लौह पुरुष के दावेदार आडवाणी नहीं मोदी हैं । मोदी स्लेट पर लिखी हर पुरानी बात को मिटा रहे हैं । अपनी बात लिखने के लिए । 

मोदी ने इस तीर से एक काम और किया । बहुत दावे से तो नहीं लिख रहा मगर मन में बात है तो लिख रहा हूँ । असहमतियाँ हो सकती हैं । मुझे लगता है कि मोदी ने बीजेपी के भीतर सरदार पटेल की दावेदारी को फिर से उभार कर संघ को भी लपेटे में ला दिया है । इस पूरे विवाद में ज़्यादा बड़े सवाल संघ को लेकर ही खड़े हो रहे हैं । भले ही संघ की तरफ़ से गुरुमूर्ति और हमारे मित्र राकेश सिन्हा बचाव कर रहे हैं मगर क्या इस वक्त आर एस एस के संविधान और करतूत के बचाव की नौबत आनी चाहिए थी । मोदी ने संघ को भी धकियाया है । हर तरफ़ सरदार पटेल की वो चिट्टी ही छप रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि संघ ने सांप्रदायिक ज़हर फैलाया था जिसने आख़िरकार गांधी की जान ले सी । निशाने पर संघ है । कांग्रेस भी पटेल के बहाने संघ पर ही हमला कर रही है । बड़ी चालाकी से संघ का वो इतिहास व्यापक स्तर पर सार्वजनिक हो रहा है जिससे संघ बहुत दूर निकल आने की ख़ुमारी में होगा । संघ भले ही सरदार की तारीफ़ के भी पत्र निकाल रहा है मगर सरदार के ये पत्र भी तो बाहर आ रहे हैं कि कि वे संघ को लेकर कितने नाराज़ थे । गोपाल कृष्ण गांधी ,राजमोहन गांधी ने आसानी से बता दिया कि पटेल न तो हिन्दुत्ववादी थे और न इस्लाम विरोधी । उन्होंने कभी नेहरू का अपमान नहीं किया और हमेशा नेहरू को अपना नेता माना । आख़िर उस सरदार को बाग़ी कैसे मान सकते हैं जिन्होंने बीमारी के कारण दिल्ली छोड़ते वक्त एन वी गाडगिल का हाथ पकड़ कर वचन माँगा था कि लगता नहीं कि मेरी ज़िंदगी अब बची है इसलिए तुम मेरे बाद जवाहर का हाथ नहीं छोड़ोगे । 

आप इस पूरी बहस के स्केल को देखिये आर एस एस की भूमिका को लेकर कितने सवाल खड़े हो रहे हैं । मोदी ने कांग्रेस पर हमला किया मगर संघ का बचाव नहीं किया । बल्कि यह सवाल भी फ़िज़ा में घुम गया कि मोदी ने हेडगेवार,सावरकर, गोलवलकर, श्याम प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और कम से कम बीजेपी के इतिहास के अब तक के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी की प्रतिमा के बारे में क्यों नहीं सोचा । ज़रूर इसके सौ जवाब होंगे लेकिन मोदी ने इनको छोड़ा तो सही । मायावती ने जब मोदी से पहले महापुरुषों की प्रतिमा पार्क के बारे में सोचा तो वे किसी एक के बारे में तय नहीं कर पाईं । इसलिए सबको शामिल किया । मोदी ने एक को चुना । मोदी अपने रास्ते निकल पड़े हैं । संघ को लेकर जितनी कहानी बनानी हो बना लीजिये । संघ मोदी के साथ है और अब रहना ही होगा । मगर मोदी तो पटेल के साथ हैं ।

मोदी के विरोधियों की एक दिक्क्त ये है कि वे उन्हें पुराने चश्मे से देखते हैं । जबकि मोदी एक तीर से कई निशाने लगाते हैं । जो नेता बिहार जाकर खुद को द्वारकाधीश कृष्ण का नुमाइंदा बताकर यादवों का रक्षक घोषित कर सकता है और लालू की तारीफ़ कर सकता है वो सरदार पटेल के बहाने सिर्फ कांग्रेस पर ही बोल रहा है ऐसा नहीं हो सकता । मोदी इस बहाने संघ और आडवाणी पर भी बोल रहे हैं । फ़र्क इतना है कि मोदी नहीं बोल रहे हैं उनकी जगह लोग बोल रहे हैं और संघ अपना बचाव कर रहा है । मोदी की यही बात राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले मेरे जैसे लोगों को कई तरह से सोचने पर मजबूर करती है । मोदी लगातार खुद को बहस को केंद्र में रख रहे हैं । एक बहस छेड़ते हैं और इससे पहले कि वो पूरी हो मोदी दूसरी बहस पर जंप कर जाते हैं । नीतीश ने जब उनके इतिहास बोध को ललकारा तो तेज़ी से पटेल पर शिफ़्ट हो गए और उल्टा वे कांग्रेस के इतिहास बोध से भिड़ गए । यह बहस भी पूरी होती तब तक वो लता मंगेशकर के पास जा चुके थे । उनकी हर बात पहले से तय है । सबकुछ उनके हिसाब से हो रहा है । बाकी लोग बाद में हरकत में आ रहे हैं । जब इतनी योजना और संसाधन से कोई लड़ रहा है तो उनके विरोधी सिर्फ लाचार नज़र नहीं आ सकते । यह भी सही है कि विरोधी भी धीरे धीरे उनकी रणनीति समझने लगे हैं । इसलिए वे मोदी को तुरंत पकड़ते हैं । नीतीश ने दो दिन के भीतर पकड़ा तो कांग्रेस ने उनके प्रतिमा शिलान्यास से पहले अहमदाबाद पहुँच कर सरदार को सेकुलर बता आई तो मोदी के बिहार जाने से पहले यह सवाल उठा दिया गया कि जो अहमदाबाद के नरोदा पाटिया के दंगा पीड़ितों से आज तक मिलने नहीं गया वो बिहार में हेलिकॉप्टर से उड़ उड़कर अपनी पार्टी के शहीद कार्यकर्ताओं से मिल रहा है । मुक़ाबला दिलचस्प हो रहा है । जो जीतेगा वही सिकंदर । फिर किसे पड़ेगा कि सिकंदर गंगा तक आया था या नहीं । 

बैंकाक इन वैशाली ।




लाश तुम सिर्फ एक लाश नहीं हो

प्रिय लाश, 

दुनिया तुम्हें समाप्त मान कर भूल जाये मगर मैं तुम्हें समाप्त नहीं मानता । तुम अपार संभावना होगा । सब तुम्हारा कुछ न कुछ करते हैं । इसलिए सोचा कि तुम्हारे नाम एक ख़त लिखूँ । तुमसे संवाद करूँ । तुम तो बोल नहीं पाओगी इसलिए तुमको सामने रख मैं चीख़ूँ । भाषण दूँ पर हमारा संस्कार है जिसके यहाँ कोई मरा हो वहाँ चीख़ते नहीं है । मौन धरकर जाया जाता है । लाश तुम इस ख़त को मेरा मौन समझना । छपरा में भी समझना, पटना में भी और नरोदा पाटिया और दतियां में भी । 


राजनीति के लिए तुम सिर्फ लाश नहीं होती हो । तभी यह तुम्हें मरने नहीं देती । ज़िंदा कर देती है । मरे हुए लोगों को पता तक नहीं चलता कि वो ज़िंदा कर दिया गया है और कंधे पर घूम रहा है । राजनेता हर लाश का कुछ नहीं करते पर कुछ लाश का बहुत कुछ करते हैं । तुम्हारी यात्रा निकालते हैं , बयान देते हैं और फिर फूँक देते हैं, फूँकने के बाद अस्थियाँ चुन लेते हैं और शहर शहर घुमाते हैं । तुम कहाँ कहाँ नहीं घुमाई गई हो । गुजरात में भी, बिहार में भी, यूपी में भी दिल्ली में भी । हिन्दुस्तान की राजनीति का तुम यूँ ही प्रिय विषय नहीं हो । लाशों की राजनीति । एक करता है और दूसरा नहीं करता है मगर तुम पर बोलता दोनों है । बोलने के लिए तुमको कैटेगरी में बदल दिया गया है । आम आदमी लाश, शहीद लाश, कार्यकर्ता लाश, नागरिक लाश । शहीद लाश भी दो प्रकार की होती हैं । सीमा पर मरने वाला शहीद और पार्टी की विचारधारा के लिए मरने वाला शहीद ।लाश तुम सिर्फ एक लाश नहीं हो । एक लाश में भी कई लाशें हो सकती हैं । कई लाशें भी एक लाश नहीं हो सकती हैं । कभी तुम ढेर हो कभी तुम एक हो । कभी तुम लावारिस तो कभी तुम लापता । कभी तुम बिछ जाती हो तो कभी गिर जाती हो ।

राजनेता तय करता है तुम्हारी राजनीति कब करनी है । पटना में कब करनी है, दतियां में क्यों नहीं करनी है, उत्तराखंड में कब करनी है, हैदराबाद में क्यों नहीं करनी है । गूगल में सर्च करोगी तो पता चलेगा कि हर दल के लोग तुम्हारी राजनीति करते है । कभी वे उसी दिन करते हैं जिस दिन तुम गिरती हो तो कभी तुम्हारी अंत्येष्टि के बाद । लेकिन सब एक साथ नहीं करते । एक टाइम पे एक पार्टी लाशों की राजनीति करती है तो दूसरे टाइप पर दूसरी पार्टी ।

जिसके घर में कोई मरा हो उसकी अस्थियाँ मांग कर ले जाते है । बदले में पहुँचकर नेता संवेदना और मुआवज़ा देते हैं और फिर भूल जाते हैं । उस परिवार की ग़मी से किसे लेना देना है । नेता अपने शहर में बिछी लाशों को छोड़ नेता दूसरे शहर की लाशों को कंधे पर उठा लेता है । नेताओं ने ही बताया था कि ये लाशों की राजनीति है । वो कर रहे हैं, हम नहीं । हम तो सम्मान कर रहे हैं । बात इसकी नहीं कि कोई गुजरात के दंगा पीड़ितों के शिविरों में गया या नहीं गया और बिहार क्यों गया । ये दलील तो ज़िंदा लोगों के मामले में भी लागू है कि किसान को पूछा तो जवान को नहीं । बात यह है कि हर दल की अपनी अपनी लाशें होती हैं । 

प्रिय लाश, ऐसा नहीं है कि सिर्फ तुम लाश हो और तुम्हारी राजनीति हो रही है । लाश हम भी हैं । नेता हमें भी लाश समझता है । सेकुलर लाश, स्युडो सेकुलर लाश, प्रांतीय लाश, राष्ट्रवादी लाश, मज़हबी लाश, धार्मिक लाश, गांधी लाश, पटेल लाश, टैगोर लाश, मीडिया लाश, सोशल मीडिया लाश, कांग्रेसी लाश, भाजपाई लाश । हे लाश तुम सर्वदलीय हो । हम सब लाश हो चुके हैं । कोई नेता आता है हमें कंधे पर उठाता है और घुमाते घुमाते हुए चला जाता है । हम हैं कि तुम्हारी तरह देखते रह जाते हैं । देखने वाला ही कहता है लाशों की तरह देखते हैं । 

इसलिए लाश तुम सिर्फ जला देने की चीज़ नहीं हो । राजनीति फ़िल्म का संवाद कितना अच्छा था । ठीक से याद नहीं पर ऐसा कुछ था कि राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं उखाड़े जाते हैं । ऐसा ही है । तुम सिर्फ जलाई नहीं जाती हो ज़िंदा भी की जो सकती हो । लाश तुम एक काश हो ।

तुम्हारा
रवीश कुमार 'एंकर'



डियर फ़ादर

आदरणीय राहुल जी,

भोत गल्त बात है । इतनी गल्त बात है कि लंबी चिट्टी का मूड नहीं बन रहा । नागपुर से लौटते वक्त कल हवाई जहाज़ में टाइम्स आफ़ इंडिया में एक ख़बर पढ़ी । परेश रावल को तो जानते हैं न आप । बहुत अच्छी एक्टिंग करते हैं और सिनेमा में सरदार पटेल भी बने थे मगर अपनी बड़ी बड़ी कामेडी वाली आँखों को सीरीयस बनाकर कबाड़ा कर दिया था( निजी राय) ।

अगर परेश रावल मोदी समर्थक और प्रचारक हैं तो क्या प्राब्लम । पिछले चुनाव में परेश भाई की एक ही मेजर ड्यूटी थी । नमो चैनल में बैठकर मोदी की वकालत करना और विरोधियों को धाराशाही करना । आप जानते हैं कि मोदी जी अपने मंच पर एक्टर वैक्टर टाइप के लोगों को रखना पसंद नहीं करते । उनकी इस बात का मैं भी समर्थक हूँ । पूरे गुजरात चुनावों के प्रचार में सिर्फ एक ग़ैर राजनीतिक आदमी को मंच पर रखा था । इरफ़ान पठान को । उनके कंधे पर हाथ भी रखा था । कहाँ तो लोग सिर्फ टोपी में ही फँसे हैं । खैर । 

अब यही परेश रावल एक नाटक कर रहे हैं डियर फ़ादर । अहमदाबाद में । आपके समर्थकों को लग रहा है िक इसमें आपकी कहानी है । डियर फ़ादर राहुल गांधी की कहानी है । मैं नहीं जानता असल में क्या है । उससे मुझे मतलब भी नहीं । लेकिन जब एन एस यू आई के लोग जाकर नारेबाज़ी करें और नाटक रोकने का प्रयास करें तब तो सीरीयस आपत्ति है । (ख़बर के मुताबिक़) । आप तो वही कर रहे हो जो एबीवीपी और बजरंग दल के लोग करते हैं । तभी लोग कहते हैं कि आप दोनों एक हैं । 

आपको परेश रावल का सम्मान करना चाहिए । आपकी जगह मैं होता तो प्ले देखने चला जाता । लोकतातंत्रिक होने का महत्तम प्रमाण देना पड़ता है सर । आपने क्या नई राजनीतिक संस्कृति बनाई है जो पहले से अलग है । अगर एतराज़ ही करना था तो एन एस यू आई के कार्यकर्ता नाटक देखते और वहाँ मौजूद लोगों को पर्चे देते । थियेटर के बाहर एक पोस्टर लगाते । ये सब क्यों नहीं करते आप लोग । नहीं कर सकते । कांग्रेस बीजेपी के पास इतनी सत्ता है सिर्फ सरकार ही नहीं पार्टी के भीतर भी कि उसके दम पर ये लोग नाटक पेंटिंग रोकने फाड़ने चले आते हैं । 

और ये एन एस यू आई वाले कहाँ थे जब आपको मोदी के नेटी घुड़सवार पप्पू कह रहे थे । क्या आप नेट पर ऐसा कर सकते थे । क्या आपके पास एक भी एक्टर नहीं है जो मोदी पर नाटक लिखकर मंचन करे और आप मोदी को देखने का न्यौता देते । कितना मज़ा आता । दरअसल आप दोनों निहायत ही अलोकतांत्रिक होते जा रहे हैं । 

मेरी राय में जिस तरह से आपकी पार्टी के नेताओं ने आपको शहज़ादा कहा जाना स्वीकार किया है, पप्पू कहलाना स्वीकार किया है उसी तरह डियर फ़ादर को भी स्वीकार करना चाहिए । जब मोदी शहज़ादा कहते हैं तो आपकी पार्टी में सबका ख़ून सूख जाता है । आपके पास तो मोदी के लिए कोई चुनावी पुकार नाम ही नहीं है । जब रचनात्मकता और राजनीति की घोर कमी हो जाए तो उसकी भरपाई पोस्टर फाड़ कर नहीं की जाती है । मुक़ाबले का पोस्टर बनाना पड़ता है । 

और हाँ हो सके तो मोदी जी के पाँच सवालों में से एक का तो जवाब दे दीजियेगा । भ्रष्टाचार, आई एस आई में से किसी पर । मोदी फ़्रट फ़ुट पर खेलते हैं और आप हैं कि बैकफ़ुट की आदत हो गई है । 

आपका,
रवीश कुमार ' एंकर' 

( मैं ब्लाग पर एक पत्रकार के रूप में नहीं लिखता । ये भाषा भी किसी पत्रकार की नहीं हो सकती । चूँकि यह अनौपचारिक माध्यम है इसलिए मैं अपने मूड के हिसाब से लिखता हूँ । जिन मूर्खों को लगता है कि यहाँ मैं पत्रकारिता कर रहा हूँ वो न पढ़ें । ) 

छह महीने काम छह महीने आराम

आदरणीय मोदी जी,

माडल खोजने में आपका जवाब नहीं । खोजने से ही मिलता है । केंद्र सरकार जहाँ न खोजने का माडल है वहीं आप खोजने के । झाँसी में जो आपने कहा है उससे मेरी उम्मीदें बढ़ गई हैं । इसलिए आपके नाम एक चिट्टी तो बनती ही है । 

आपने कहा कि आपने कारखानेदारों को बुलाकर कहा कि आपकी फैक्ट्री में बिहार यूपी के मज़दूर काम करने आते हैं । एक कमरा लेकर बीस पचीस लोग रहते हैं । बाप रे । एक कमरे में पचीस लोग । वो भी उस गुजरात में जिसकी तारीफ़ अमरीका कर रहा है( राजनाथ ने झाँसी में कहा) । मैंने जब सूरत से यही रिपोर्ट बनाई तो आपके जाप समर्थकों ने गाली देकर धो दिया सर । चलिये आपने यह स्वीकार किया कि एक कमरे में पचीस मज़दूर रहते हैं । बाक़ी प्रदेशों में मज़दूरों की हालत सोचकर डर जाता हूँ । दिल्ली के कापसहेड़ा में भी यही हाल है सर । 

खैर तो आपने कारखानेदारों को बुलाकर कहा कि ये जो बिहार यूपी के मज़दूर काम करते हैं आठ घंटा और हफ़्ते में छह दिन । इनके आउटपुट का अध्ययन करो । ऐसा करो कि ये लोग आठ घंटे से ज़्यादा काम करें । बारह घंटे चौदह घंटे । ताकि ये लोग छह महीना काम करे । छह महीने में ही साल भर का काम कर दें और बाकी छह महीने छुट्टी दे दीजिये ताकि ये बिहार यूपी लौट कर वहाँ भी पसीना बहा सकें । आपने कहा कि अगर यह प्रयोग सफल हो गया तो । यक़ीन जानिये अगर ये प्रयोग सफल हो गया तो आप पूँजीवाद को समझने का कार्ल मार्क्स से भी बड़ा नज़रिया दे देंगे । सारे कम्युनिस्ट ताकते रह जायेंगे । 

क्या क्या सोचते हैं साहब । कौन सी कंपनी ये प्रयोग कर रही है बतायेंगे ज़रा । छह दिन बारह घंटे काम । पता कीजियेगा ये मज़दूर अभी भी इतना ही काम करते हैं । फिर भी ये कौन सा कारखानेदार होगा जो साल भर का काम छह महीने में करा कर अगले छह महीने के लिए बिहार यूपी भेज देगा । ये तो कांट्रेक्ट लेबर का ख़तरनाक रूप होगा । या तो कारख़ाने भी छह महीने बंद रहेंगे या बाकी छह महीने के लिए दूसरे मज़दूर रख लेंगे । इस दौरान उनकी क़ीमत यानी मज़दूरी में क्या उतार चढ़ाव होगा इसका अध्ययन करने के लिए बोले हैं कि नहीं । कोई कारख़ाना अपने मज़दूर से साल भर की उत्पादकता छह महीने में निकाल लेगा । साल भर का आर्डर भी ले आयेगा । इसके लिए आप लेबर क़ानून भी बदलेंगे । उम्मीद है आपने इस माडल का ड्राफ़्ट अंबानी अदानी और टाटा को भी भेजा होगा । वहाँ भी ये शुरू हो जाए न तो मज़ा आ जाये । हाँ यह क्लियर नहीं हुआ कि छुट्टी वाले छह महीने में पूरी सैलरी मिलेगी या आधी । कोई बात नहीं । अगली रैली में बता दीजियेगा ।

हम तो चाहेंगे कि आपका माडल सफल हो जाये । ताकि हम छह महीने लंबी छुट्टी का जीवन जी सके । ऐसा कमाल सिर्फ वही सोच सकता है जो हमारे मनमोहन सिंह की तरह अर्थशास्त्री नहीं है । क्या आइडिया है सर जी । अब समझ आया आप अपनी कामयाबी को माडल क्यों कहते हैं । ऐसा माडल शहज़ादे तो कभी सोच ही नहीं सकते । आप इस माडल का नाम छह महीने काम छह महीने आराम गारंटी योजना रख दीजिये । उनकी बोलती बंद हो जाएगी । झाँसी में आपने इसका एलान किया है इसलिए इसका नाम झाँसा माडल भी रख सकते हैं । 

बाक़ी तो आपने शहज़ादे को जो ठीक किया मज़ा आ गया । लेकिन आज मैं आपकी राजनीतिक प्रतिभा से ज़्यादा आर्थिक प्रतिभा का क़ायल हो गया । आर्थिक मामलों में कम समझ रखता हूँ इसलिए कम ही लोग मेरी इस तारीफ़ को समझ पायेंगे । 

आपका 

रवीश कुमार'एंकर' 


इतिहासकार जाँचेंगे मनमोहन का इतिहास

आदरणीय मनमोहन सिंह जी,

चीन से लौटते वक्त हवाई जहाज़ में आपको पत्रकारों से बात करते देख अच्छा लगा । आपकी प्रेस कांफ्रेंस जितनी ज़मीन पर नहीं हुई उससे कहीं ज़्यादा हवा में हुई है । क्या पता आप आसमान में ज़्यादा कंफर्टेबल फ़ील करते हों । नौ साल प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए कोई इतना निर्विकार कैसे हो सकता है कि वो अपनी भूमिका की कापी इतिहासकारों के पास जाँच के लिए छोड़ मगन हो जाए । आप सही कह रहे हैं । आपकी कापी चेक करना इतिहासकारों के ही बस की बात है । आम जनता नहीं कर सकती । इसलिए एक चिट्टी तो बनती है सर ।


यह जानकर खुशी हुई कि आपके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है । जितना था वो सब तो पता चल ही गया है । इससे ज़्यादा हो भी क्या सकता है । जो भी था वो लोग जान गए हैं । अब क्या लोग फ़ाइलें पढ़ेंगे । पुष्पक विमान में उस पत्रकार ने क्या चंपी कोच्चन मारा था कि " सीबीआई कह रही है वो आपसे सवाल कर सकती है । क्या आपको नहीं लगता कि आपने सीबीआई को बहुत ज़्यादा स्वायत्तता दे रखी है और वो अपनी लक्ष्मण रेखा क्रास कर रही है । " व्हाअट अ कोच्चन सर जी । आप इस पत्रकार को एक बार और विदेश यात्रा पर ले जाना । जिसका जवाब आप यह कह कर टाल जाते हैं कि मामला कोर्ट में है और मैं कमेंट करना नहीं चाहूँगा । वो तो कहिये कि एक दूसरे पत्रकार ने पूछ लिया कि विपक्ष कह रहा है सीबीआई को पीएम से पूछताछ करनी चाहिए तब आप जाकर यह कहिते हैं कि सीबीआई क्या कोई भी जिसके पास सवाल है मुझसे पूछ सकता है । मेरे पास छिपाने के लिए कुछ नहीं । क्या यू टर्न मारा सर । लेकिन ये दूसरे वाले पत्रकार को अब मत ले जाइयेगा ।

और टीवी पर हेडलाइन चली कि आप सीबीआई जाँच के लिए तैयार हैं । पहले सवाल में तो आप सीबीआई के सवाल को डंक ही मार गए दूसरे में तैयार वाली बात भी न कही । फिर भी । खैर मीडिया । आप तो जानते ही है न । कैसे घुमाया गया कि आप बड़े बेचैन हैं सीबीआई के सामने पेश होने को । सर ये सिम्पल गेम नहीं है । पारख और बिड़ला को लेपेटे में लेने का । अब न आपकी हर बात पर कान खड़े होने लगे हैं । आपका बयान जितना बीजेपी को जवाब नहीं होता उससे कहीं ज़्यादा कांग्रेस के एक तबके को दिया गया लगता है ।

सर ये चल क्या रहा है । कांग्रेस और आपके बीच । कुछ तो है बास । आप राहुल के गुरु हैं या सचमुच राहुल आपको अब गुरु समझने लगे हैं । ये होत्ती है न बात । आपने कभी सत्ता से जाने का नाम नहीं लिया । आप भावुकता को आस पास उचकने तक नहीं देते । कभी नहीं कहा कि मेरी जगह किसी और को ले आओ । कांग्रेस के दबाव में अश्विनी कुमार को बड़ी मुश्किल से हटाया वर्ना आप तो बचा ही ले गए थे । छिपाने के लिए कुछ नहीं था तो देखने के लिए क्या था सर जो अश्विनी कुमार फ़ाइलें पलटने लगें । जायसवाल कर रहे हैं कि ज़्यादातर फ़ाइलें मिल गईं हैं जिसके कस्टोडियन आप नहीं हैं । पूर्व सीएजी विनोद राय भी कह चुके हैं कि हिंडाल्को वाली डील सही है । पी सी पारख भी कह रहे हैं कि बिड़ला वाली डील सही है । फिर वो मीडिया में तरह तरह की चिट्ठियाँ लीक कर रहे हैं । यही कि कोयला मंत्रालय में माफ़िया भर गए हैं । जबकि मैंने कई बार पूछा था उनसे सर । यही जवाब मिला कि ऐसी कोई बात नहीं कहीं थी । 

खैर अचानक ये तोता आपका नाम क्यों रट रहा है । कहीं वो पहला पत्रकार यह तो नहीं कहना चाहता था कि सीबीआई को आपने इतनी स्वायत्तता दे रखी है कि कांग्रेस के कुछ लोग सीबीआई चला रहे हैं । सर सच्ची बोलना । आपमें और दस जनपद में कुछ चल रहा है क्या है । आय मीन कुछ ठीक नहीं लग रहा । ख़ाली इतिहासकार ही जानेंगे या पत्रकारों का भी कुछ हक़ बनता है । वैसे यूपीए द्वितीय में दिलचस्प सत्ता संघर्ष चल रहा है । आप कितने कोल्ड थे भोजन गारंटी को लेकर, लोग यही कहते हैं कि आप भी नहीं चाहते थे और देखिये राहुल गांधी ऐसे भुना रहे हैं जैसे ये सब सोनिया जी की वजह से हुआ । आपके सिग्नेचर से नहीं । सर कुछ तो 'टस्सल' है । जो सरकार क्रोनि कैपिटलिज्म से घिरी रही उसे चलाने वाली पार्टी का उपाध्यक्ष बाग़ी बना घूम रहा है । प्रो पूअर हो गए हैं । आपको सीधे सीधे तो नहीं कह सकते इसलिए बीजेपी को कह रहे हैं वो सिर्फ उद्योगपतियों की बात करती हैं । 

आप निर्विकार हो । सुख में दुख में समभाव । कुर्सी पर भी सम भाव । मगर माया के इस खेल को खूब समझते हो । पूरी पार्टी परेशान है और आप प्रशांत । इसे कहते हैं राजनीतिक प्रधानमंत्री । आपने दिल से ही कहा होगा कि तीसरी बार भी जीतेंगे । चौदह के नतीजे चकित करने वाले होंगे । कौन चकित होगा । मोदी या राहुल । मने पूछ रहे हैं । सरकार भले आप चलाते हैं मगर पार्टी को आप नहीं जीताते न । अब आप नेता हो गए हो । ये बीजेपी बहुत बाद में कहेगी सर कि आप कमज़ोर नहीं बल्कि सयाने और मज़बूत प्रधानमंत्री रहे । सर एक और बात सच्ची सच्ची कहना । ऐसे ही एक हवाई जहाज़ में आपने तीसरी बार प्रधानमंत्री की बात कह किसे डराया था ? मोदी को या कांग्रेस में किसी को ।

तभी तो जब आसमान में पत्रकार ने पूछा कि इतने घोटाले हुए । टू जी, कामनवेल्थ । आपकी साख कमज़ोर हो चुकी है । निम्नतम स्तर पर हैं तो आप जवाब क्या देते हैं । कि आप जिन स्कैम की बात कर रहे हैं वो यूपीए वन में हुए थे यूपीए टू में नहीं हुए । यूपीए वन के बाद के जनरल इलेक्शन में कांग्रेस पार्टी चुनाव जीत गई थी । सही में सर । अब ये इतिहासकार ही बता सकता है कि यूपीए वन में प्रधानमंत्री कौन था । टू जी और कामनवेल्थ घोटाला यूपीए वन में हुआ या टू में । कहीं आप घोटाले को स्वीकार तो नहीं कर रहे । ( सर आपके हवाई प्रेस कांफ्रेंस का जो ट्रांसक्रिप्ट हमें मिला है उसी को पढ़कर लिखा है ) 

चलता हूँ । उम्र और पद के लिहाज़ करते हुए ख़त लिखते हुए मर्यादा का पालन किया है । इतना निर्विकार आदमी सत्ता का अंगीकार किये हुए हैं । कैसे ? 

आपका

रवीश कुमार ' एंकर' 

हाँ मैं अमीर हूँ

प्यारे भाइयों और बहनों और आपके कज़िन्स,

मैंने एक सपना देखा है । मैं जानता हूँ कि सपने देखने का क्या आनंद होता है । जब लाइफ़ में हो आराम तो आइडिया आता है । लक्स का यह विज्ञापन । बिल्कुल वैसा ही । तो मित्रों पता है मैं सपने क्यों देखता हूँ । ग़रीब आदमी सपने नहीं देखता उसे दिखाया जाता है इसलिए मैं सपने देखता हूँ । आज मैं अपने मुँह से अपनी बात बताता हूँ । सपना वही देखता है जो अमीर होता है । जिसके घर में एसी होता है । कमरे में प्ले स्टेशन होता है । जिनके पास खेलने के मैदान नहीं वो सपने नहीं देखते । 

किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी । साउथ दिल्ली के आनंद लोक में पैदा हुआ था । बचपन से ही बड़ी बड़ी कारें देखी हैं मैंने । मैं जानता हूँ अमीरी क्या चीज़ होती है । जब दोस्तों की मारुति अठ वंजा में घूमता था तब पता चलता था सिम्पल कार का दर्द । मुझे उनके लिए दुख होता था तब मैं उनके लिए सपने देखता था । मेरे पापा के पास छह बीएमडब्ल़्यू कारें थीं । जब मेरे पापा के पास हो सकती हैं तो ग़रीबों के पास क्यों नहीं । मित्रों एक अमीर ही एक ग़रीब का दर्द समझ सकता है । मैं हावर्ड गया । इंडिया की ग़रीबी पर चिंतन करने लगा । विवेकानंद को पढ़ा । मार्क्स को पढ़ा । तब से मैं आपकी भलाई के लिए सपने देख रहा हूँ । जब मैं कम्पनी चलाकर रोज़गार सृजन कर सकता हूँ तो प्रधानमंत्री बनकर कितना करूँगा ज़रा सोचिये । 

मित्रों, मेरा एक विज़न है । स्लम मुक्त भारत । सबको डीपीएस स्कूल मिले । सारे सरकारी अस्पतालों को बारात घर में बदल दे । सरकार प्राइवेट अस्पतालों का ख़र्चा उठाये । पता है मित्रों जब मैं बचपन में शापिंग के लिए सिंगापुर जाता था तो मुझे एक बात का दुख होता था । जब सिंगापुर चमक सकता है तो एक सौ पच्चीस करोड़ का इंडिया क्यों नहीं । मित्रों मैंने कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं की । मुझे पता है कि अगर आपकी लाइफ़ से कमी दूर कर दूँ तो कितना आनंद आएगा । आप भी सपने देखने लगोगे ।  और ये सोच एक अमीर घर में पले बढ़े मेरे जैसे नेता में ही आ सकती है । जो ग़रीब रहा वो क्या जानेगा अमीरी का सुख । 

मित्रों विरोधी मेरा मज़ाक़ उड़ाते हैं । मैं सरकारी स्कूल में नहीं गया । भूख क्या होती है नहीं जानता । ये सही नहीं है । भूख मुझे भी लगती है । क्रेविंग समझते हैं न । डोम्नोज़ पित्ज़ा की क्रेविंग होती थी । पापा अलग अलग दुकानों में कार भेज देते थे । जहाँ से जल्दी मिले वहीं से ले आओ । उसी को देखकर डोम्नोज़ ने थर्टी मिनट में होम डिलिवरी शुरू की । अरबों का कारोबार हो गया । फ्रैंड्स, मैं समझता हूँ आपको साथ क्या गुज़रती होगी । मैं महानगर में पला बढ़ा । क्या भारत महानगर में नहीं है । क्या वोट के लिए विरोधी दल माँ भारती के ऐसे टुकड़े करेंगे । क्या भारत बिना महानगर हुए चीन का मुक़ाबला कर सकता है । क्या सिर्फ स्लम ही भारत है ।  

मैं उस पोलिटिक्स के ख़िलाफ़ हूँ जिसमें नेता अपनी ग़रीबी बताते हैं । भई पब्लिक को ये बताओ न कि आपकी ग़रीबी कैसे दूर हुई । कहाँ से पैसे आ रहे हैं महँगी रैलियों के । आइडियाज़ शेयर करने पड़ते हैं लोकतंत्र में । लोकतंत्र चलता है विज़न और आइडियाज़ से । हर नेता को ट्विटर पर युवाओं को बताना चाहिए कि उन्होंने अपनी ग़रीबी कैसे दूर की । यह सही है कि मेरे पास मनीष मल्होत्रा के एक से एक डिज़ाइनर कुर्ते हैं । यहाँ युवा बैठे हैं । आप में से कितने फ़ैशन करते हैं । सब करते हैं । ये जवाब है आज के युवा का । तो मित्रों एक अच्छे नेतृत्व के ज़रूरी है एक अच्छा कुर्ता । जब आप खुद अच्छा नहीं पहनोगे तो दूसरों को क्या पहनने के सपने दिखाओगे । 

फ्रैंड्स ये पहली बार होने जा रहा है । मैं देख रहा हूँ कि भारत में एक अंधड़ चल रही है । पहली बार अमीरी में पैदा हुए, मेट्रो में ऐश की ज़िंदगी जीने वाले एक नेता में लोग अपना भरोसा ज़ाहिर कर रहे हैं । अभी तक इंडिया में सारे लोग अपनी ग़रीबी बेचते रहे हैं । चुनाव आते ही सारे नेता खुद को दे दाता के नाम तुझको अल्ला रक्खे गाने लगते हैं । जनता ने ऐसे नेताओं को नकार दिया है । मैं पूछना चाहता हूँ मेरे ग़रीब नेताओं तुम्हारी ग़रीबी दूर हो गई बाक़ियों की कब होगी । ग़रीबी कौन दूर करता है । ग़रीब या अमीर ? पैसा हमारा और राज तुम्हारा नहीं चलेगा । मैं सभी ऐसे युवाओं से गिल्ट फ़्री पोलिटिक्स में आने की अपील करता हूँ । ये नेता हम जैसे खाते पीते घर वालों को पोलिटिक्स से दूर करना चाहते हैं । 

मित्रों क्या यह मेरा अपराध है कि मेरा बचपन ग़रीबी में नहीं बीता । क्या उद्योगपति का बच्चा होना अपराध है । मैं विरोधी दलों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वे उद्योग नहीं खोलेंगे । क्या वो किसी को अमीर नहीं बनने देंगे । क्या अमीर को चुनाव नहीं लड़ने देंगे । हमसे चंदा पर हम नेता नहीं । ये नहीं चलेगा । मुझे कोई गिल्ट नहीं कि मैं खाता पीता घर का हूँ । क्या मेरी कोई राजनीतिक पहचान नहीं । ये जो नेता स्टोरी बेच रहे हैं बहुत हो गया । फाड़ के फेंक दीजिये ऐसी स्टोरी को । मैं भारत का भविष्य हूँ । मुझे और मेरी पार्टी को वोट दीजिये । मेरे दादा जी कहते थे जो कंपनी नहीं चला सकता वो देश क्या चलायेगा । कंपनियाँ ही पीछे से देश चलाती हैं । जिसको दूध बेचना है बेचे पपीता बेचना है बेचे । रिटेल चेन में काम करके महान बन गए और हम जो पोलिटिक्स की असली मैन्यूफ़ैक्चरिंग करते हैं वो राज न करें । रोयें अपने अतीत पर और ये गायें अपनी ग़रीबी पर । नहीं होने देंगे । गर्व से कहो हम अमीर हैं । 

आपका एक ग़ैर ग़रीब बट अमीर उम्मीदवार,
रवीश कुमार'एंकर'