प्रिय लाश,
दुनिया तुम्हें समाप्त मान कर भूल जाये मगर मैं तुम्हें समाप्त नहीं मानता । तुम अपार संभावना होगा । सब तुम्हारा कुछ न कुछ करते हैं । इसलिए सोचा कि तुम्हारे नाम एक ख़त लिखूँ । तुमसे संवाद करूँ । तुम तो बोल नहीं पाओगी इसलिए तुमको सामने रख मैं चीख़ूँ । भाषण दूँ पर हमारा संस्कार है जिसके यहाँ कोई मरा हो वहाँ चीख़ते नहीं है । मौन धरकर जाया जाता है । लाश तुम इस ख़त को मेरा मौन समझना । छपरा में भी समझना, पटना में भी और नरोदा पाटिया और दतियां में भी ।
राजनीति के लिए तुम सिर्फ लाश नहीं होती हो । तभी यह तुम्हें मरने नहीं देती । ज़िंदा कर देती है । मरे हुए लोगों को पता तक नहीं चलता कि वो ज़िंदा कर दिया गया है और कंधे पर घूम रहा है । राजनेता हर लाश का कुछ नहीं करते पर कुछ लाश का बहुत कुछ करते हैं । तुम्हारी यात्रा निकालते हैं , बयान देते हैं और फिर फूँक देते हैं, फूँकने के बाद अस्थियाँ चुन लेते हैं और शहर शहर घुमाते हैं । तुम कहाँ कहाँ नहीं घुमाई गई हो । गुजरात में भी, बिहार में भी, यूपी में भी दिल्ली में भी । हिन्दुस्तान की राजनीति का तुम यूँ ही प्रिय विषय नहीं हो । लाशों की राजनीति । एक करता है और दूसरा नहीं करता है मगर तुम पर बोलता दोनों है । बोलने के लिए तुमको कैटेगरी में बदल दिया गया है । आम आदमी लाश, शहीद लाश, कार्यकर्ता लाश, नागरिक लाश । शहीद लाश भी दो प्रकार की होती हैं । सीमा पर मरने वाला शहीद और पार्टी की विचारधारा के लिए मरने वाला शहीद ।लाश तुम सिर्फ एक लाश नहीं हो । एक लाश में भी कई लाशें हो सकती हैं । कई लाशें भी एक लाश नहीं हो सकती हैं । कभी तुम ढेर हो कभी तुम एक हो । कभी तुम लावारिस तो कभी तुम लापता । कभी तुम बिछ जाती हो तो कभी गिर जाती हो ।
राजनेता तय करता है तुम्हारी राजनीति कब करनी है । पटना में कब करनी है, दतियां में क्यों नहीं करनी है, उत्तराखंड में कब करनी है, हैदराबाद में क्यों नहीं करनी है । गूगल में सर्च करोगी तो पता चलेगा कि हर दल के लोग तुम्हारी राजनीति करते है । कभी वे उसी दिन करते हैं जिस दिन तुम गिरती हो तो कभी तुम्हारी अंत्येष्टि के बाद । लेकिन सब एक साथ नहीं करते । एक टाइम पे एक पार्टी लाशों की राजनीति करती है तो दूसरे टाइप पर दूसरी पार्टी ।
जिसके घर में कोई मरा हो उसकी अस्थियाँ मांग कर ले जाते है । बदले में पहुँचकर नेता संवेदना और मुआवज़ा देते हैं और फिर भूल जाते हैं । उस परिवार की ग़मी से किसे लेना देना है । नेता अपने शहर में बिछी लाशों को छोड़ नेता दूसरे शहर की लाशों को कंधे पर उठा लेता है । नेताओं ने ही बताया था कि ये लाशों की राजनीति है । वो कर रहे हैं, हम नहीं । हम तो सम्मान कर रहे हैं । बात इसकी नहीं कि कोई गुजरात के दंगा पीड़ितों के शिविरों में गया या नहीं गया और बिहार क्यों गया । ये दलील तो ज़िंदा लोगों के मामले में भी लागू है कि किसान को पूछा तो जवान को नहीं । बात यह है कि हर दल की अपनी अपनी लाशें होती हैं ।
प्रिय लाश, ऐसा नहीं है कि सिर्फ तुम लाश हो और तुम्हारी राजनीति हो रही है । लाश हम भी हैं । नेता हमें भी लाश समझता है । सेकुलर लाश, स्युडो सेकुलर लाश, प्रांतीय लाश, राष्ट्रवादी लाश, मज़हबी लाश, धार्मिक लाश, गांधी लाश, पटेल लाश, टैगोर लाश, मीडिया लाश, सोशल मीडिया लाश, कांग्रेसी लाश, भाजपाई लाश । हे लाश तुम सर्वदलीय हो । हम सब लाश हो चुके हैं । कोई नेता आता है हमें कंधे पर उठाता है और घुमाते घुमाते हुए चला जाता है । हम हैं कि तुम्हारी तरह देखते रह जाते हैं । देखने वाला ही कहता है लाशों की तरह देखते हैं ।
इसलिए लाश तुम सिर्फ जला देने की चीज़ नहीं हो । राजनीति फ़िल्म का संवाद कितना अच्छा था । ठीक से याद नहीं पर ऐसा कुछ था कि राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं उखाड़े जाते हैं । ऐसा ही है । तुम सिर्फ जलाई नहीं जाती हो ज़िंदा भी की जो सकती हो । लाश तुम एक काश हो ।
तुम्हारा
रवीश कुमार 'एंकर'