बीजेपी में मोदी का विरोध नौटंकी है

पिछले कुछ दिनों से यक़ीन होने लगा है कि बीजेपी में सबसे बड़ा पद चुनाव प्रचार समिति का है । अध्यक्ष और संसदीय दल से भी बड़ा ? बीजेपी के प्रधानमंत्री के भावी दावेदार नरेंद्र मोदी के कारण यह पद महत्वपूर्ण हो गया है । जो प्रधानमंत्री का उम्मीदवार होगा वही चुनाव प्रबंधक भी होगा ये कमाल की व्यवस्था है । इस पद को लेकर भी उसी तरह की मारामारी है जैसे प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर । चुनाव प्रचार समिति चुनाव के समय बड़ी अहम संस्था होती है पर टिकट के लिए अलग कमेटी है । संसदीय बोर्ड प्रधानमंत्री तय करने जैसे फ़ैसलों को लिए है ही तो फिर चुनाव प्रचार समिति कौन सा बड़ा भारी पद है । क्या इसी पद से बीजेपी अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार लाँच करेगी ? क्या अटल जी आडवाणी जी भी चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष थे  ।


बीजेपी कवर करने वाले जानते होंगे । बीजेपी धीरे धीरे उत्सुकता बढ़ा रही है और उसे बनाकर रख रही है । कई बार लगता है कि सब रणनीति के तहत हो रहा है । एक ख़बर आती है आडवाणी मोदी के ख़िलाफ़ हैं फिर अगले ही दिन ख़बर आती है कि आडवाणी ने मोदी के नाम पर मंज़ूरी दे दी है । आडवाणी क्या इतने महत्वपूर्ण हैं कि पार्टी में आदरणीय रूप से हाशिये पर रहते हुए भी मंज़ूरी देते हैं । विरोधी कौन है इसका नाम कोई नहीं छापता । एक रणनीति के तहत सब आडवाणी को मोहका बना रहे हैं ताकि लगे कि मोदी की राह आसान नहीं है । मीडिया द्वारा सृजित इस कृत्रिम द्वंद के कारण मोदी लगातार चर्चा में हैं । रणनीति भी यही है कि मोदी लगातार ख़बरों में बने रहें । आज सही में गाँव गाँव में लोग मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में देखने लगे हैं । जानने लगे हैं और असहमत होने लगे हैं । प्रचार की यह शानदार रणनीति है । मोदी का नंबर भी तय हो गया । वे 'वन' पर हैं और शिवराज 'थ्री' पर । बाक़ी नेता किस पोडियम पर है पता नहीं । राजनाथ सिंह मोदी को सबसे लोकप्रिय बताते हैं । मोदी के विरोध की ख़बरें ही चली हैं अभी तक । एक भी ख़बर ये नहीं आई हैं जिसमें ये विरोधी मोदी को किसी भी रूप में रोक पाये हों । हर विरोध के बाद मोदी एक क़दम और चल के आ जाते हैं । 

हो सकता है कि ख़बरें सही भी हों मगर मोदी के विरोधी हैं बड़े कमज़ोर । पर्दे के पीछे से वार और सामने से नमस्कार करने वाले ये विरोधी ख़ाक मोदी का विरोध कर पायेंगे । मोदी ने बीसीसीआई के श्रीनिवासन की तरह बीजेपी में सबको हरा दिया है । ये हारे हुए लोग पत्रकारों के ज़रिये कभी इस कमेटी के बहाने तो कभी उस रैली के नाम पर अपना सिक्का चला रहे हैं । मोदी बाहर से कार्यकर्ताओं के ज़रिये अपने नाम की घोषणा कर चुके हैं । बाद में यही विरोधी कहेंगे कि सारा विरोध मीडिया प्रायोजित था । मोदी ही हमारे नेता है । क्या अब बीजेपी के पास ऐसा कोई मौक़ा रह भी गया है कि वह कहे कि मोदी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नहीं होंगे । क्या बीजेपी और संघ ने मोदी के नाम के प्रचार की छूट नहीं दी ? आडवाणी जी जो लिखें और कहें अंत में सब बेअसर हैं । आडवाणी की बातें ब्लाग के लायक ही हैं । मीडिया क्यों नहीं बताता कि बीजेपी मे मोदी के विरोध का वैचारिक राजनीतिक आधार क्या है ?

दरअसल बीजेपी में मोदी का कोई विरोध नहीं है । ये आने वाले दिनों में और साफ़ हो जाएगा । हो चुका है । मोदी के विरोधी भी बीसीसीआई के सदस्यों की तरह है । जो बाहर तेवर दिखाते है और अंदर स्वागत करते हैं । मोदी ही बीजेपी हैं और बीजेपी मोदी । बाक़ी सब बातें लेख लिखने के लिए हैं । अटकलों के लिए है । पत्रकारों की ख़बरों के लिए हैं । इस कृत्रिम विरोध का मज़ा लीजिये जो दरअसल है ही नहीं ।  मुझे पता है आप यक़ीन नहीं करेंगे ।

नोट- हमारे सहयोगी अखिलेश शर्मा ने बताया है कि चुनाव प्रचार समिति की कमान 99 तक आडवाणी के पास हुआ करती थी। 2004  में इसका जिम्मा प्रमोद महाजन के पास था जब बीजेपी हारी थी। 2009  में जेटली ने ज़िम्मेदारी ली थी तब आडवाणी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया गया था और वे खारिज हो गए थे। इस बार ये ज़िम्मेदारी नरेंद्र मोदी को मिल रही है जो घोषित-अघोषित तौर पर खुद ही प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हैं। 

लक्स मार्का मर्द

" असली मर्द गिराते नहीं बचाते हैं " । टीवी पर आज लक्स कोज़ी के विज्ञापन में एक असली मर्द दिखा । ये असली मर्द लफ़ंगों के कारण स्वींमिंग पुल में गिरा दी गई लड़की को तौलिये से ढंक देता है । फिर धीरे धीरे नंगे बदन ऐसे चलता है जैसे हर्निया का आपरेशन हुआ हो । कैमरा उसकी इस चाल चलन के राज़ पर फ़ोकस करता है । लक्स कोज़ी लिखा है । यानी असली मर्द की गुप्त पहचान । ये मर्द छेड़खानी करने वाले लड़कों को धक्का देकर बचा लेता है । इससे पहले के पर्दे के मर्द लड़की पर अपनी शर्ट डाल छेड़ने वाले का कचूमर निकाल दिया करते थे ।  लक्स कोज़ी बिल्कुल कोज़ी है । ये असली मर्द समझौता कर लेता है और मुड़कर अपने अंडरवियर पर इतराता लौट आता है । 

ये कौन से असली मर्द हैं । लगते नक़ली से हैं । इनकी मर्दानगी अंडरवियर समानुपाती है । जैसा अंडरवियर होगा वैसी मर्दानगी होगी । जैसे अंडरवियर न हुआ सबलोक क्लिनिक हो गया । इस तरह के मर्द गढ़े जा रहे हैं रोज़ाना । पता नहीं असली औरत क्या होती होगी । स्वाभाविक है जब असली  मर्द होते होंगे तो असली औरत भी धरती पर कहीं न कही होगी । उसके आने का इंतज़ार कर रहा हूँ । 


विज्ञापनों के इस अंडरवियर काल पर पहले भी कई बार टिप्पणी कर चुका हूँ । ख़बर पढ़ते समय या देखते समय अचानक बीच में बनियान में वोट करते और अंडरवियर में फ़्लोट करते दिख जाते हैं तो खुद के सूट बूट में लदे ढँके होने पर घबराहट होने लगती है । असली मर्द तो बिना कपड़े के चला जा रहा है । जो पूरे पहने हैं वो क्या हैं फिर । एक सवाल और वो ये कि अंडरवियर और बनियान वाले मर्द ज़्यादातर स्वींमिंग पुल, समंदर किनारे या गली में गुंडों से ही भिड़ते क्यों दिखते हैं । ये किसी लैब में किसी दफ्तर में भी तो यूँ आते जाते दिख सकते हैं । 

मर्दानगी को फटीचर कर दिया है इन होज़ियरी वालों ने । मर्दानगी चिरकुट अवधरणा है भी । एक बात और ये सब ब्रांड अंग्रेज़ी के दर्शक नहीं पहनते क्या । क्या आपने अंग्रेज़ी चैनलों पर अंडरवियर बनियान के विज्ञापन देखे हैं ? मुझे ध्यान नहीं आता । क्या अंडरवियर सिर्फ हिन्दी भाषी दर्शकों की राष्ट्रीय चाहत है ? अंग्रेज़ी वाले क्या बिना असली मर्द हुए ही ? राम राम । मैं भी क्या क्या लिखता रहता हूँ । गिली गिली थू थू । एक ही डर है । इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर लोग पतलून क़मीज़ पहनने का आइडिया ही न छोड़ दें । 

चलते चलते: जैसे ही टीवी पर चैनल बदला प्रधानमंत्री नक्सल समस्या पर भाषण दे रहे थे । उनकी तस्वीर के नीचे डाॅलर बनियान का स्लोगन फ़्लैश कर रहा था । फ़िट है बाॅस । बस अब मुझे गेस नहीं करना है । 

जिया की जान मत लो चैनल वालों

जिया ख़ान आज दिन भर चैनलों पर मरेगी । उसने ख़ुदकुशी कर ली है । चैनल उसकी मौत के करणों का ख़ुलासा चाहते हैं । इस युवा अभिनेत्री का जाना शोक का विषय नहीं है । उत्सव है । हम कितने क्रूर हैं । चैनलों के पास दलील भी हैं कि एक चमक भरी दुनिया के अंधेरे में जिया ने जान दे दी । यह ख़बर है । 

रोज़ाना जीये रोज़ाना मरे तेरी यादों मे हम । निशब्द का ये गाना बज रहा है । बार बार बज रहा है । आमिर और अक्षय के साथ उसके अभिनय के सीन चलाये जा रहे हैं । चैनल उसके बंद दरवाज़ों को कवर कर रहे हैं । रिपोर्टर बता रहा है कि दरवाज़ा बंद है । हम नाॅक कर रहे हैं मगर खुल नहीं रहा है । लोगों को पता है कि मीडिया को जवाब देना पड़ेगा इसलिए नहीं खोल रहे हैं । एक एंकर कहते हैं कि जिसका नाम जिया हो उसने ही जीने में कर दी आना कानी । निशब्द फ़िल्म थी जिया की इसलिए हर लाइन के बाद स्तब्ध की जगह निशब्द का इस्तमाल हो रहा है । 

हम क्रूर हो गए हैं । जिन पत्रकारों को इस धंधे में रहना है वे मेरी बात से बिल्कुल प्रभावित न हो बल्कि वही करने का इरादा करें जिसकी मैं आलोचना कर रहा हूँ । वे ऐसा ही करें किसी के मरने पर । मुझसे प्रभावित न हो जाएं वर्ना इस पेशे के किस सुरंग में धकेल दिये जायेंगे, पता भी नहीं चलेगा । इस मीडिया को आलोचना से कोई असर नहीं होता इसीलिए मैंने श्रीनिवासन को सपोर्ट किया था कि उसे इस मीडिया से कोई असर नहीं हुआ । पहली बार किसी ने खुलेआम मीडिया की तरह बिहेव यानी बर्ताव किया है । 

खैर । एक मासूम ज़िंदा चेहरा स्क्रीन पर तैर रहा है । उसके मरने की ख़बर हम उसकी चलती फिरती तस्वीरों के साथ देख सुन रहे हैं । दर्शकों की फंतासी में ज़िंदा और सेक्सी जिया को ठेला जा रहा है । कोई आँसू नहीं है । ग़म नहीं है । अजीब त्रासदी है । पचीस साल की मासूम लड़की । क्या ज़िंदगी रही होगी । सचमुच ख़ामोश हो जाने का वक्त है । मगर चैनल आपको नया संस्कार दे रहे हैं । आपके घर में कोई मर जाये तो उनकी वीडियो रिकार्डिंग निकाल कर मेहमानों को दिखाइयेगा और फिर उसके बाद श्मशान जाइयेगा । वीडियो न हो तो अल्बम निकालियेगा । 

ये क्या मीडिया समाज है । कहीं बेहूदा मनोवैज्ञानिक घटिया विश्लेषण दे रहे हैं तो कहीं उनके पुराने निर्देशक । आज सब सफलता को सुसाइड योग्य बता रहे हैं । इन सब बातों के बीच क्लिप चल रही है । 
शिखर को किसी तनाव का बखान हो रहा है । 

जिया मर गई है । काश वो लड़ती । और जीती रहती । हम सब से गुमनाम होकर । उसके बाद अब हम सब मिलकर उसकी बुज़कुशी कर रहे हैं । टीवी के सामने बैठकर अपने भीतर ज़िया का गला घोंट रहे हैं । ब्रेक के बाद ज़िया लौट आई है । बच्चन उसे पाइप से भिंगो रहे है । 

जिया हमें आपके इस तरह जाने का बेहद अफ़सोस है । वैसे 

ये जवानी है दीवानी

इस फ़िल्म की कहानी इसके गानों से ही चलती है । सुंदर चित्रहार है । मेक माई ट्रीप डाॅट काॅम के लिए यह फ़िल्म बनी है । सिनेमा हाल में लोग जिस तन्मयता से देख रहे थे उससे हैरान हो गया । लोग शायद फ़िल्म से यही उम्मीद करते हैं कि उसमें कहानी नहीं  हो न सही मगर सपनों के इतने टुकड़े हों कि हर सपना देखने वाले के किसी अधूरे कोने को छू कर गुज़र जाए । हमारा दर्शक बहुत उदार है । कहता है मन लग गया । ये जवानी है दीवानी किसी ट्रैवेल कंपनी का प्लाट लगती है जिसमें नायक उन जगहों को देखने का सपना पालता है जहाँ ले जाकर आपको कोई भी कंपनी कमाने का सपना पालती होगी । वेनिस को मुंबई का धारावी बताता है और उदयपुर के होटल के सौंदर्य का लाभ उठाते हुए एक शाही और आवारा शादी का प्रदर्शन करता है । 

रणबीर कपूर की कलाई पर आवारा लिखा देखा तो ख्याल आया कि नायक इस फ़िल्म में दादा राजकपूर की सिनेमाई विरासत से जुड़ कर दिखना चाहता है । कोई बुराई नहीं । लेकिन इस फ़िल्म की कहानी ट्रेवेल एजेंट के मंसूबों के पीछे पीछे चलती है । दुनिया देखने का सपना एक ऐसे ख़्वाब की तरह पेश किया जाता है जैसे जीवन के बने बनाए सिस्टम से निकलने का यही आख़िरी रास्ता हो । ऐसा सपना लिये कोई नायिका अभी खुलकर पर्दे पर नहीं आई है । ये सपना सिर्फ हीरो के लिए रिज़र्व है । कैमरे और ट्रायपोड लाद लेने की दुनिया भी उसी बनी बनाई पैटर्न पर काम करती है । वहां भी तो घुटन है । बताऊं क्या अभी । खैर कुलमिलाकर रणबीर का यह सपना अपनी नौकरी बेकार और दूसरे की अच्छी लगने वाली आदत से ज़्यादा की नहीं है । रणबीर कपूर नब्बे परसेंट के इस दौर में अपने न पढ़े लिखे होने का जश्न मनाते हुए टीवी शो की दुनिया में घुस जाता है । जहाँ टैलेंटेंड होने की निशानी कंधे पर कैमरे का टंगा होना है । जैसे दीपिका का डाक्टर होना अभिशाप हो गया । ट्रीप पर वो अपने लिये जाती है या माय ट्रीप डाट काॅम के लिए । 


तीन दोस्तों के बीच कुछ भी ऐसा नहीं जो पहले के सिनेमाई दोस्तों ने न किया हो । ये अमीर घर के लगते हैं जहां पचीस लाख नहीं होना गरीबी की निशानी है । फिलमों में ऐसे दिखाया जा रहा है हमारा युवा जिसे लेकर राजनीति में हड़बड़ी में बड़ी बड़ी संभावनायें देखी जा रही हैं । दरअसल यह फ़िल्म कई हिन्दी फ़िल्मों के प्लाट को फिर से ज़िंदा करती है । दोस्ती उस यथास्थिति का निर्माण करती है जहाँ कोई सवाल नहीं है । सब एक जैसा हो जाने की बारी का इंतज़ार करते हुए समाज के बनाए ढाँचे में ढलने का इंतज़ार करते हैं । क्या हो जाता गर हीरो शादी न करने, प्यार न करने के अपने फ़ैसले पर क़ायम रह जाता । वो बिना प्यार के पेरिस की सड़को से किसी लड़की को बुलाकर चुम्माचाटी ( चुंबन तो कत्तई नहीं ) कर भुल जाता है । मैं नैतिकता की बात नहीं करता । ये नार्मल है पर नायक की आज़ाद ख़्याली का ये कौन सा लंपट मुकाम है । फ़्लर्ट करने को सेहत के लिए ज़रूरी बताता है । बाद में शादी के ही सिस्टम में लौट भी जाता है । रणबीर का नाम कबीर है और काम कबीर जैसा कुछ नहीं । हिन्दी सिनेमा में कबीर नाम काफी चला हुआ है । अगर ऐसे ही दो चार कबीरों का नाम आता रहा तो लोग असली कबीर की कल्पना भी रणबीर कपूर के बग़ैर नहीं कर पायेंगे । 

यह एक देखी हुई फ़िल्म है जिसे ठीक से बनाया है । दीपिका के अभिनय की तारीफ़ हो रही है । कोई केंमिस्ट्री की बात कर रहा है । रणबीर दीपिका की जोड़ी मैच करा रहा है । पूरी फ़िल्म में दीपिका डाक्टर है । एक शाट अस्पताल या क्लिनिक का नहीं है पर वो पढ़ाई मेडिकल का कर रही है । उसके बाद भी किसी क्लिनिक की चिंता में कबीर के साथ दुनिया देखने नहीं जाती है । अमीर ग़रीब का सीन नहीं है । स्कूल में टापर दीपिका और भोंदू रणबीर के बीच क्लास डिवाइड बनाकर सेंटी सीन क्रिएट किया जा रहा है । 

इस फ़िल्म को स्पाट फ़िक्सिंग के संदर्भ में देखा जाना चाहिए । अवि बुकी है । सट्टेबाज़ । अवि इंडिया पाकिस्तान पर सट्टे लगाता है । किसी को उसके सट्टेबाज़ होने से समस्या नहीं । इनकी दोस्ती के रोमांटिक पल में सट्टेबाज़ी स्वीकृत हो जाती है । 

फ़िल्म चल गई है । ये जवानी है दीवानी । मन लगना ही प्राथमिकता है तो मन लगा लीजिये । दीपिका रोकर और पढ़ाई को बोझ बताकर सहानुभूति बटोर रही है । पढ़ी हुई लड़की का यह विचित्र रूप है । दया का पात्र बनी रहती है दीपिका । मैं तुलसी तेरे आँगन की मार्डन रूप धर कर । पर फ़िल्मी और हकीकी प्यार में यही होता है । इंसान इंतज़ार करने लगता है । रोता है । हँसता है । उसी के बारे में सोचता रह जाता है। ये होता है । उसमें बड़ा दर्द है भाई । 

कल्कि अवतार पर बात होनी चाहिए । कल्कि का अवतार पर्दे पर क्या इसी रोल के लिए हुआ है । ये हिप्पी रोल हिन्दी सिनेमा का घिसा हुआ है । कल्कि मे इतनी संभावनाएँ हैं लेकिन उसके लिए अब यही सब रोल बचे हुए हैं । लेदर जैकेट पहनने वाली, टैटू, सर पर गमछा, लड़कियों के बीच लड़कों जैसी । क्या है ये सब कल्कि । बल्कि तुम कल्कि मत करो ऐसे टाइम पास । इस तरह के रोल को उन नायिकाओं के लिए छोड़ दो जो संघर्ष कर रही हैं । जिन्हें पैसे और पहचान की भी ज़रूरत है । 

ऐसा नहीं था कि मैं रणबीर और दीपिका से माओवाद की समस्या की पृष्ठभूमि में उनसे किसी महान भूमिका की उम्मीद में गया था । सच पूछिये तो मेरा भी मन लग ही गया । सुन कर जल्दी भुला दिये जाने वाले बेहतर गाने, शादी से पहले का संगीत, होटल, ये सब था और "प्यार हो जाएगा फिर से" सुनकर रणबीर दीपिका की असली प्रेम कहानी से थोड़ा कनेक्ट । फ़िल्म कमा रही है । हम सब उन देवी देवताओं और पीर बाबाओं के आदेश से देखने गए थे जिनके यहाँ फ़िल्म के हिट होने की दीपिका ने गुहार लगाई थी । मैं रणबीर की फ़िल्म देखता हूँ क्योंकि कुछ बात है इसमें । फिर भी इस फ़िल्म में वो कई लोगों को क्यूट लगा है । सारे डफ़र क्यूट हू क्यों लगते हैं ? आज तक मेरे लिए यह एक रहस्य है । 

श्रीनिवासन का आसन

प्यारे श्रीनी,

आज मैं भयंकर तनाव से गुज़र रहा हूँ (किसी और वजह से ) ऐसे में तुम्हारा इस्तीफ़ा न देना फिर से मुझे अपना स्टैंड बदलने पर मजबूर कर रहा है । कमाल हो तुम यार । तुम्हें मनमोहन सिंह की जगह होना चाहिए । टीवी चैनल के घंटों कवरेज से ऐसे दबाव में आने लगे तो हो चुका । ट्विटर अख़बार और फ़ेसबुक से तुम अकेले लड़े । तुम्हारी कुर्सी ज़रूर बड़ी होगी कि तुमने थोड़ी सी कमर खिसका कर ज़ग्गू दादा को जगह दे दी । वाह । किसी की मज़ाल नहीं हुई कि इस्तीफ़ा मांग ले तुमसे । ठीक किया तुमने । अब तुम अगले हफ़्ते भी छाये रहोगे । एंकर तुमसे इस्तीफ़ा माँगेंगे और तुम नहीं दोगे । 

मैंने पहले प्रेम पत्र में जो तुम्हारे बारे में बातें कहीं थीं वही सही निकलीं । जो माँगा ही न जाए उसे कैसे भला दिया जाए । नैतिकता मांग पर आधारित होती है । अगर इसकी डिमांड नहीं है तो जाए भाड़ चूल्हे में । सीमेंट ऐसे ही नहीं बेच लेते हो । धारणाओं का धारण नहीं करने वाला ही असाधारण होता है । गीता में कृष्ण लिखवाना भूल गए थे इसलिए उनके बिहाफ़ पर मैंने लिख दिया है । 

हठयोग की तरह तुमने पदयोग स्टार्ट कर दिया है । पद योग पद न छोड़ने का हठ है । तुम्हारी मानसिक बनावट का अध्ययन होना चाहिए । ये बंसल अश्विनी कितने कमज़ोर थे । 

श्रीनी तुम इस्तीफ़ा जैसी तुच्छ चीज़ों से ऊपर हो । ये क्या चीज़ है यार जो दिया जाए । स्टेप असाइड एक नया टर्म है जो अब चलेगा । वाह श्रीनी वाह । यार अब तो चार बोरी सीमेंट दे दो घर के सामने डिवाइडर बनानी है रोज़ वहाँ एक्सीडेंट हो जाता है । 

रही बात बीसीसीआई की छवि की तो उससे किसको फ़र्क पड़ता है । अब तुम्हारी राह पर मैं भी चलूँगा । हालाँकि मैं एक पदविहीन पत्रकार हूँ फिर भी इसे ही पद मानकर इससे कभी इस्तीफ़ा नहीं दूँगा । 

श्रीनी रियली कूल और कैट हो यार । थोड़े मेरी तरह फ़ैट हो । 

तुम्हारा

कोई नहीं तो क्या हुआ हूँ न मैं
रवीश कुमार 

ये जहाज़ और जहाज़ वाले ऐसे उड़ते क्यों हैं ?

कोलकाता एयरपोर्ट का अनाउसमेंट सिस्टम ख़राब है । आवाज़ चीख़ती है । जैसे जहाज़ में विलंब ग्राहक की वजह से हो गया हो । उसके तुरंत बाद रबींद्र संगीत दूसरे स्केल में ले जाता है । कोई सुन नहीं रहा पर बजा जा रहा है । लोगों ने अपने कानों में ईयरपीस ठूंस लिये हैं । कुछ के कान पर फ़ोन चिपके हैं । कोई बता नहीं रहा है कि रवींद्र संगीत का कौन सा धुन है और क्यों सुनना चाहिए । बस बजा जा रहा है । यह मानकर कि हम सब इस मामले में विशारद हैं । अब नई डिग्री आ रही है । बर्कलेट(शायद) । बकलोल के समानार्थक है । 

इसी बीच एक जहाज़ हुआं हुआं करता हुआ भरभराने लगता है और हां़य हां़य करता हुआ बादलों में घुस जाता है । बिना परवाह किये कि मोहल्ले के लौंडों की तरह एक्सलेटर मार कर स्कूटर चलाने की तरह हवाई जहाज़ उड़ाने से मेरे जैसों का कलेजा थोड़ा सिकुड़ जाता है । जहाज़ों ने चिड़ियों से उड़ना तो सीख लिया मगर उनकी तरह उड़ना नहीं आया । बताइये हम जैसे यात्री कबूतर की तरह दुबक जाते हैं । 

लोग हैं कि पोलिथिन में मिठाई का डिब्बा लिये हिलते डुलते चले आ रहे हैं । कई लोगों ने आम का काटन कसवा लिया है । जी भूरे वाले गत्ते के बक्से को काटन कहते हैं । एक हम थे जो कार्टून कहते थे । बल्कि कई लोग कार्टून कहते थे । जवानी के दिनों में कुछ दोस्त जो खुुद लड़कियों से सीख कर आये थे मुझ पर हँसने लगे । कार्टून नहीं रे बे काटन । तो लोगों ने आम कसवा लिये हैं । हम सब को गराज का माल खाने की आदत है । जिन शहरों को रोज़गार की ख़ातिर छोड़ दिया उनके गराज के माल के लिए तरसते रहते हैं । 

सारी टाइल्स यही लग गई है । जल्दी ही एयरपोर्ट के लिए नया जूता आएगा । जो टाइल्स फ्रैंडली हो । आजकल अधेड़ उम्र के लोग शाट्स खूब पहनने लगे हैं । लास्ट टाइम में कूल होने के लिए । लुंगी में क्या प्राब्लम है । बड़ा ही आयातीत लगता है । भारतीय परिधान वाले यहाँ ऐसे लगते हैं जैसे ट्रेन छूट जाने के बाद लास्ट मिनट में फ़र्स्ट एंड लास्ट टाइम के लिए आ गए हों । हज जाने वाले अलग ही ताव में रहते हैं । पूरा मोहल्ला टाटा सूमो में  लाद लाते हैं । बड़ा मौका तो होता है पर दूर से ही लग जाता है कि हैं भाई हज का बुलावा आया है । 

लैपटाप ऐसे खोल के बैठे हैं सब जैसे सारा काम निपटा आये हैं बस एक दो रह गया है । सारे एक्ज़ीक्यूटिव एयरपोर्ट पर काफी काम करते हुए दिखते हैं । मुझे गर्दन में सोने का मोटा चेन पहनने वाले पसंद आते हैं । लगता है कि इसी के लिए कमा रहा है । एयरपोर्ट लगता ही नहीं है कि इंडिया में है । सब यहाँ विदेशी फ़ील करते हुए चले जा रहे हैं । बाप रे कोई इसको मना करेगा । कैसे बोल रही है । मार दिया आज इसने । कान पे कटारी चला दी है । 


पुनश्च- दिल्ली एयरपोर्ट पर कुछ लोग हेल्प हेल्प कहते मिले । उनकी जेब पर पेड पोर्टर लिखा था । यानी एयरपोर्ट पर क़ुली यानी भार वाहक । पहले कभी नोटिस नहीं किया था । चलता भी तो साल में दो बार हूँ ।

श्रीनी तुम इस्तीफ़ा दो, कोई तुम्हारे साथ नहीं है

प्यारे श्रीनी,

लगता है मेरा सपोर्ट तुम्हारे काम नहीं आएगा । जो लोग तुम्हें बचा रहे थे वो अब गुर्राने लगे हैं वर्ना वे नहीं बच पायेंगे । जिन जिन दलों के बंदों को तुमने जुटा रखा था उनके आकाओं ने उनका खाका खींचने का मन बना लिया है । अब उनमें इस बात की होड़ मचेगी कि उनके कहने के बाद ही तुम्हारा इस्तीफ़ा संभव हो सका । ये तमाशा देखना है तुम्हें । तुमको सेट असाइड हो जाना था । स्टेप डाउन से तो वही अच्छा था । इस्तीफ़ा टाइप करते वक्त कोई मोरल और इमोशनल स्टैंड ले लेना । इस्तीफ़ा नार्मल है । 

अत: तुम रात-बिरात इस्तीफ़ा देकर छाता लेकर घनी बारिश में कही निकल जाओ । ये क्लब-कमेटी की पोलिटिक्स में ऐसा हो जाता है । समय ख़राब है ।  दुनिया अपने दामादों को बचाकर तुम्हारे दामाद को पीछे पड़ी है । बीसीसीआई तुम्हारे बाद इतना नैतिक और क्लीन हो जाएगी कि तुम दूर से ही देखकर दुख भरी साँस लोगे । अभी तक हिन्दी साहित्य में सुख भरी साँस थी लेकिन मैंने तुम्हारे लिए दुख भरी साँस लाँच किया है । अब तुम्हारी औकात हमेशा के लिए कम हो जाएगी । तुम सीमेंट बेचने ही लायक थे । वही बेचना । इंडिया में मकान बनाना और रन बनाना ये लाँग टर्म सपना है । चलेगा । थोड़ी रेत मिलाकर अपना घाटा पूरा कर लेना । 

आगे से एक बात का ध्यान रखना । बीसीसीआई में एमपी मत रखना । इनकी बहुत ज़्यादा वो नहीं होती है । वो बोले तो औकात । पार्टी अध्यक्ष को ही मेंबर बनाना । सांसदों को अध्यक्षों के हिसाब से चलना पड़ता है । वे जिस क्लब से होते हुए तुम्हारे क्लब में आते हैं उनके बाॅस की ज़्यादा चलती है । वर्ना वहाँ से बाहर हुए तो ज़ाहिर है तुम भी उन्हें नहीं रखोगे । 

टीवी मत देखना । तुम्हें बुरा लगेगा कि वहाँ इस्तीफे की घड़ी चल रही होगी । अब तुम्हें देना ही होगा । मुझे बहुत दुख है । तुम्हारे जाते ही सारे अनैतिक नैतिक हो जायेंगे । अपना प्लेन है न । ठीक है । एयरपोर्ट पर ज़्यादा प्रोब्लम नहीं होगी तब । 

दे दो जो तुम नहीं दे रहे थे । ये इस्तीफ़ा क्या चीज़ है तुम क्रिकेट से कुछ भी कमा सकते हो तो क्रिकेट के लिए कुछ कर भी सकते हो । साबित कर दो । कुछ ख़ुलासा तुभी कर दो । डरो मत । बक दो । शुक्ला जी और जेटली जी को छोड़ कर । इनसे बिगाड़ मत करना । चुनाव का टाइम है । बाद में दोनों में से कोई एक काम आ सकता है । बाक़ी की चिन्ता मत करो । उनको तो बीट रिपोर्टर ही निपटा देगा । 

श्रीनी तुम इस्तीफ़ा दो, कोई तुम्हारे साथ नहीं है । 

ये नया नारा है । 

तुम्हारे लिए । 

तुम्हारा एक प्रशंसक

रवीश कुमार 

तेंदुलकर ने बोला है भाई !

सचिन तेंदुलकर ने स्पाट फ़िक्सिंग पर बड़ी बात कह दी है । बहुत बड़ी बात । तभी मुझे लगा कि वे इतना टाइम क्यों ले रहे हैं । इस बड़ी बात को कहने के लिए उन्होंने क्लब से लेकर रणजी क्रिकेट प्लेयर का आह्वान किया है । आज के हिन्दुस्तान टाइम्स में राजदीप सरदेसाई का लेख पढ़ने के बाद(शायद) उनका यह बयान आया है । है तो तेंदुलकर का मगर अकेले तेंदुलकर नहीं हैं उस बयान में ा वैसे इस बयान में तेंदुलकर ने सभी क्रिकेटप्रेमियों की तरफ़ से बीसीसीआई में विश्वास जता दिया है । लो जी । सचिन अपने बयान के मुताबिक सिर्फ निराश और हताश हैं वैसे आईपीएल के फ़ाइनल में वे हताश बिल्कुल नहीं लग रहे थे । काफी गदगद थे । उसके बाद कोलकाता में उन्होंने टाइम्स ग्रुप की कोई पत्रिका भी लाँच की । उस आयोजन की छपी तस्वीरों में भी तेंदुलकर आहत नज़र नहीं आ रहे हैं । और माँगों इन बड़े खिलाड़ियों से बयान । मिल गया न । शोक संदेश वाला ।  एक शून्य, गहरा दुख और अपूरणीय क्षति टाइप । 

जब से राजीव शुक्ला को पेपरानुसार राहुल गांधी से कुछ पड़ी है तब से कांग्रेस के नेता श्रीनिवासन से इस्तीफ़ा मांग रहे हैं । राजीव शुक्ला की नक़ल में अनुराग ठाकुर भी बीसीसीआई की छवि को लेकर चिंतित हो गए हैं और आपात बैठक की मांग कर रहे हैं । अनुराग ठाकुर का भी विज़ुअल निकालो कोलकात फ़ाइनल का । कैसे राजीव शुक्ला के साथ बैठ कर कैसे खिलखिला रहे थे । क्या बढ़िया टीवी इवेंट बनेगा । वही लाल घेरा लगाकर तीर तीर वाला । 

नौटंकी है सब । आप भी कल काम छोड़ क्रिकेट देखेंगे । कोई आहत वाहत न है सर । अब एक से एक पकाऊ थकाऊ बयान झोलिये । 

आदम का आइफोन संस्करण

आइफोन आदम है । बाक़ी के फ़ोन उसकी संतानें । सब उसकी तरह दिखने लगे हैं । सारे ब्रांड के फ़ोन लंबे दुबले और चौड़े हो रहे हैं । बाज़ार में हर फ़ोन पतले हैं । आदमी मोटू है । तोंद बालकनी की तरह किनारे से लटके रहते हैं । पतला होना उसका सेल्फ़ है और स्मार्ट फ़ोन उसी सेल्फ़ का विस्तार । सब फ़ोन पर उँगलियाँ ऐसे रगड़ रहे हैं जैसे कोई माचिस की तीली सीमेंट की चिकनी सतह पर रगड़ रहा हो । 

विचित्र प्रकार से तमाम फ़ोनों का आइफोनीकरण हो रहा है । जैसे सारे चैनल एक से लगते हैं । उनका विवादीकरण हो गया है । हर तरफ डिबेट ही डिबेट । सारे शहर एक से लगते हैं । उनका अपार्टमेंटीकरण हो रहा है । आइफोन इसी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है । सारे शहर में गुमटियां एक सी हैं । वे भी छोटे माॅल की तरह लगते हैं । एयरपोर्ट एक से लगने लगे हैं । उनका सौंदर्यीकरण हो गया है । हर एयरपोर्र्ट में मामूली अंतरों के साथ चमकते टाइल्स के समंदर जगमगाते रहते हैं । 

सारे दल एक से लगने लगे हैं । उनका एकीकरण हो गया है । अलग नाम और नेता लेकर एक ही तरह का आचरण कर रहे हैं । शुक्ला जी और जैटली जी एक हैं । हर घर में ब्रेड अंडा नाश्ते में खाया जाने लगा है । इसी क्रम में फ़ेसबुक पर एक कमेंट के लाखों लाइक्स मिल रहे हैं । हमारी पसंद एक सी होती जा रही है । हम एक ही तरह से जंगली होते जा रहे हैं । एक ही तरह की पतलून और कमीज़ पहनने लगे हैं । अपने अपने 'एक' से तंग आने का समय आ रहा है । स्मार्ट फ़ोन ही ब्रांड है तो नोकिया ब्लैक बेरी और आइफोन का क्या काम ।

एक और विज्ञापन आने लगा है । एक आदमी सोफ़े पर बैठ कर उँगलियाँ भांज रहा है । छूमंतर टाइप और सोफ़े के सामने रखे टीवी में चैनल बदलने लगते हैं । अभी तो टच का ज़माना है बाद में बिना टच किये ब्राह्मणवादी तरीके से टीवी फ़ोन का कर्मकांड किया जाने लगेगा । हम सब पहले से कहीं ज़्यादा एक हैं । 

नगरी नगरी दुकाने दुकाने



कोई चालीस साल से यह दुकान कोलकाता के लेक गार्डन में क़ायम है । दुकानदार के दिवंगत संस्थापक  नेता जी को दिल से पसंद करते थे । इसीलिए मिठाई की दुकान का नाम नेताजी के नाम पर रख दिया । दुकानदार मे बताया कि एक संदेश भी है जिस पर बांग्ला में नेताजी लिखा है । मिठाई की डिब्बा पर भी । हमने देश भर में चौराहों पर उँगली ताने नेताजी की अनेक मूर्तियाँ देखी है पर उनके नाम पर मुँह मीठा करने का यह आइडिया पसंद आया है । 






इस दुकान का नाम गासिप फ़ास्ट फुट क्यों हैं आप समझ सकते हैं । फ़ेसबुक और ट्वीटर काल में गासिप फ़ास्ट फुड की तरह है बल्कि गासिप का इस्तमाल हम फ़ास्ट फ़ूड की तरह ही करते हैं । भोजपुरी में गासिप के लिए एक शानदार शब्द है- कचुराई । 


इस दुकान में घटते या कहें तो डूबते हुए से इस सज्जन को देख हैरान होता रहा । कैसे और किस साधना के तहत ये अपना दिन काट रहे हैं । इनी दुकान में सिर्फ एक बेंच है जिस पर ये खुद ही बैठे रहते हैं । बाबा लोकनाथ की तस्वीर है । यूँ ही स्थिर मुद्रा में ग्राहकों का इंतज़ार करते रहते हैं । ऐसी गुमटियां आज के आईफ़ोन के ऐप्स की तरह लगती हैं । ये सिर्फ आर्डर लेते हैं और सीमेंट और ईंट की सप्लाई करते हैं । आप एक दिन इस तरह से स्थितप्रज्ञ बैठ कर दिखा दें तो मानूँ । 


इस तरह से सुबह सुबह ख़रीदारी करते लोगों को देख अच्छा लगा । दफ्तर जाने से पहले के वक्त में हरी हरी सब्ज़ियाँ फूल और मछली । उफ्फ । मारक ।

नेशनल वुड क्राफ़्ट ऐसा कुछ नाम था इस दुकान का । संस्थापक बनर्जी साहब के नहीं रहने पर उनके इकलौता पुत्र ने पिताजी की कुर्सी पर उनकी तस्वीर रख दी है । भरत के खड़ाऊँ इफैक्ट । 

किन्नरी ब्यूटी पार्लर । अच्छा लगा यह नाम । हो सकता है कि इसका कुछ और मतलब हो लेकिन आम लोग किन्नर का जो मतलब समझते हैं उस लिहाज़ से ये नाम ज़्यादा समावेशी लगा । लेडीज़ ब्यूटी पार्लर है । एक पाठक ने बताया कि किन्नरी गुजराती लड़कियों के नाम होते हैं तो निश्चित रूप से ये किसी गुजराती की दुकान होगी । फिर भी जो यह नहीं जानते होंगे वो इस नाम को देख कर मेरी तरह ही चौंकेंगे ।