अंग्रेजो वाली रौब नहीं रही अंग्रेजी की


उदारीकरण के बीस सालों में हिन्दुस्तान के मध्यमवर्ग का जो नवीनीकरण और विस्तार हुआ है उसने इसकी भाषा में बड़ा बदलाव किया है। एक ऐसा दुभाषिया मध्यमवर्ग बन गया है जो अपने खानपान और रहनसहन से लगता तो अंग्रेज़ी वाला है मगर वो हिन्दी वाला भी है। उदारीकरण से पहले हिन्दी और अंग्रेजी का मध्यमवर्ग अलग अलग था।  अंग्रेजी वाले मध्यमवर्ग की पहचान सत्ता, अमीरी और बोर्डिंग स्कूल से पढ़कर आई पीढ़ी के खानदान वाली थी तो हिन्दी की पहचान विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभाग,अकादमियों,दफ्तरों में  खपाये गए बाबुओं के विशाल मध्यमवर्ग से होती थी। लेकिन अब क्या कोई अंग्रेजी भाषी और हिन्दी भाषी मध्यमवर्ग में फर्क कर सकता है। क्या दोनों मध्यमवर्ग की आकांक्षाओं में कोई अंतर रह गया है।

मुझे लगता है अंग्रेजी और हिन्दी की दीवार टूट गई है। अंग्रेजी अब गोरों की भाषा नहीं रहे। अब आप अंग्रेजी बोलकर अंग्रेज़ नहीं कहलाते। अंग्रेज़ी का उपनिवेशवाद वाला केंचुल उतर गया है। अंग्रेजी माध्यम वाले पब्लिक स्कूल की प्रकृति भी बदल गई है। ब्रिटिश सेना की कैंटोनमेंट इलाकों में बने इंगलिश मीडियम स्कूलों, रजवाड़ों के छोड़े गए महलों या भव्य इमारतों वाले स्कूलों, दार्जीलिंग शिमला या नैनिताल की पहाड़ियों वाले स्कूलों का वर्चस्व टूट गया है।  इस दायरे से निकालने में मिशनरी कावेंट स्कूलों का बड़ा हाथ रहा। जब ऐसे स्कूल बेतिया,गोरखपुर से लेकर रांची और दिल्ली के उन इलाकों में चलते हुए कई दशक पूरे कर चुके थे जहां से अंग्रेज़ी बोलने वाला वो मध्यम वर्ग बन रहा था जो अंग्रेजी की सत्ता की दुनिया के दूसरे दर्जे के काम में खपाया जा रहा था। इनका ज्यादातर संबंध मैनेजर वाले कामों से रहा।

इसके बाद दौर शुरू हुआ पब्लिक स्कूलों का जो धीरे धीरे एक व्यापारिक श्रृंखला में बदलता हुआ एक ही नाम से देश के कई शहरों में खुलने लगा। जिनसे निकलने वाले लोगों को अंगेजी की सत्ता की दुनिया में तीसरे पायदान पर खड़े होने का मौका मिला। अब इन तीनों पायदानों में काफी कुछ बदल गया है। बदलाव इतना तेज था कि तीसरे पायदान का अंग्रेजी भाषा कब पहले पायदान पर पहुंच गया पता ही नहीं चला। जानकार इसे छोटे शहरों की कामयाब कहानियों से आगे देख ही नहीं सके। व्याकरण और शेक्सपीयर जैसी शुद्ध अंग्रेजी का दंभ टूट गया । आप किसी भी तरह से और कितने भी प्रकार से अंग्रेजी बोल सकते हैं। गांवों में इंग्लिश मीडियम स्कूलों के बच्चे भले ही पूरी अंग्रेजी न जानते हों, सही तरीके से नहीं बोल पाते हो मगर उन्हें यह पता लग गया है कि अंग्रेजी क्या है। इसीलिए वे होटल,शापिंग माल से लेकर डिस्को के बाहर दरवान बन कर खड़े होते हैं और आराम से दो चार लाइन अंग्रेजी बोल जाते हैं। यह धारणा टूट गई है कि कोई अंग्रेजी बोलेगा तो आप यही सोचेंगे कि किसी शाही खानदान का होगा।

यहीं वो बिन्दु है जहां हिन्दी और अंग्रेजी का मध्यमवर्ग एक दूसरे मिलता जुलता लगने लगता है। उदारीकरण के दौर में सरकारी सिस्टम के बाहर जो अवसर पैदा हुए उसमें एक ऐसा मध्यम वर्ग पैदा हो गया जो दुभाषिया था। उसने काम अंग्रेजी में किया लेकिन मनोरंजन हिन्दी में। अपने गांव से निकल कर पब्लिक स्कूलों से हासिल अंग्रेजी के सहारे वो बंगलुरू से लेकर अमेरिका तक गया मगर उस समृद्धि से पीछे अपने परिवार की हिन्दी को भी समृद्ध करता रहा। इस प्रक्रिया से कई भारतीय भाषाओं के पास आर्थिक शक्ति आ गई। हिन्दी वाला मध्यमवर्ग भी वही होंडा सिटी कार रखता है जिसे अंग्रेजी वाला चलाता है। वाशिंग मशीन से लेकर एलसीडी टीवी तक के उपभोग में समानता आ चुकी है। पहनावे से आप हिन्दी अंग्रेजी टाइप में फर्क नहीं कर सकते। वो जमाना जा चुका था जब उपभोग की ऐसी वस्तुओं पर उन्हीं का एकाधिकार था जो अंग्रेजी की सत्ता से आते थे और विदेशों से स्मगल कर लाते थे। यही वो दुभाषिया मध्यमवर्ग है जो अंग्रेजी को बाहर और हिन्दी को भीतर की भाषा मान कर जीता है। जिस तक पहुंचने के लिए हिन्दी के तमाम सीरियलों की बोलियों में आई विविधताओं को गौर करना चाहिए। किसी में गुजराती टोन है तो किसी में बिहारी तो किसी में अवधी। जन माध्यमों में मनोरंजन का हिस्सा सबसे बड़ा है। इसलिए पहले का यह सिद्धांत टूट गया कि जनमाध्यम होने के कारण मनोरंजन की एक स्टैंडर्ड भाषा होनी चाहिए। इस प्रक्रिया ने हिन्दी और अंग्रेजी के तनाव को कम कर दिया। दोनों के अहंकार को तोड़ दिया।

लिहाज़ा दोनों को आपस में घुलना मिलना था ही। हिन्दी फिल्मों के गानों में अंग्रेजी हिन्दी की तरह आ गई है। उनके नाम अंग्रेजी हिन्दी युग्मों के होने लगे हैं। कई बार पूरी तरह से अंग्रेजी के ही होते हैं। आम जीवन में हम इसी तरह से दोनों भाषाओं को टर्न कोट की तरह बरतने लगते हैं। अदल बदल कर पहन लेते हैं। दूसरी बात यह भी हुई कि यह धारणा टूट गई कि रोज़गार के अवसर से ही भाषा का विकास जुड़ा है। मैथिली की पत्रिकाओं का वितरण इसलिए बढ़ा है क्योंकि इस भाषा को बरतने वाले अमरिका में जाकर समृद्ध हुए हैं। इन लोगों ने कमाया तो अंग्रेजी से मगर हिस्सा मिला मैथिली को भी। हिन्दी को भी। इसी तरह से हिन्दुस्तान के भीतर अवसरों की तलाश में जो विस्थापन हुआ है उसने भी अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं को संजीवनी दी है। दिल्ली के कई इलाकों में भोजपुरी,बुंदेलखंडी और मैथिली,कुमाऊंनी के म्यूजिक वीडियो घरों में देखे जाते हैं। चुपचाप इनका एक बाज़ार बन गया है। दिल्ली में ही मैथिली भाषा में एक न्यूज़ चैनल चलता है। दिल्ली में लाखों की संख्या में आए मज़दूर अपने मोबाइल फोन पर अपनी भाषा के म्यूजिक वीडियो डाउनलोड कर सुनते रहते हैं और जैसे ही कोई ग्राहक आता है दो चार लाइन अंग्रेजी के बोलकर सामान्य हो जाते हैं।

कहने का मतलब है कि भाषा का विकास अकादमी और व्याकरण से नहीं होता है। व्याकरण का अपना महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन व्याकरण कोई ज़ड़ चीज़ नहीं है। अगर यह जड़ होता तो आज लाखों लोग अंग्रेजी बोलने का साहस नहीं कर पाते और इसी प्रकार से हिन्दी बोलने का भी साहस नहीं कर पाते। सिर्फ इतना ही नहीं इससे भाषाओं की राजनीतिक पहचान भी बदली है। हिन्दी अब राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को व्यक्त करने वाली एकमात्र भाषा नहीं रही। वो हमेशा गरीबों की आवाज़ वाली भाषा नहीं रही। हिन्दी अब मध्यमवर्गीय आकांक्षाओं की भी भाषा है। अंग्रेजी भी औपनिवेशिक संस्कारों वाले तबके की भाषा नहीं रही। अंग्रेजी भी मध्यमवर्गीय आकांक्षाओं की भाषा है। इन दोनों का राजनीतिक मिलन देखना हो तो आप अन्ना आंदोलन और दिल्ली गैंगरेप के बाद रायसीना हिल्स पर आ धमके हज़ारों से लेकर लाखों युवाओं के स्लोगन को देखिये। उनमें हिन्दी भी है और अंग्रेजी भी है। जिसकी चिन्ता में वो देश आ गया है जो अब तक सिर्फ हिन्दी की चिन्ताओं में थी। हिन्दी की चिन्ताओं में नागरिकता को वो बोध आ गया है जो अब तक अंग्रेजी की चिन्ताओं में ही थी। इस बदलाव में सोशल मीडिया का एक बड़ा रोल है। जिसके एक ही पन्ने पर हिन्दी भी सरकती है और अंग्रेजी भी। दोनों लड़ते नहीं,साथ-साथ जीना सीख गए हैं।
(यह लेख जनवरी में राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)

फांसी पर एक पुराना प्रकाशित लेख


फांसी की सज़ा कौन तय करे? अदालत या सियासत? इंसाफ की परिभाषा कानून से तय हो या उस समाज की भावनाओं से जो राजनीति तय करती है। राजनीति तय करेगी तो कहां तक करेगी और किस किस मामले में करेगी। इसका इम्तहान राजनीति देगी। बलवंत सिंह राजोआना के मसले ने फांसी की राजनीति को बदल दिया है। बीजेपी की पुरानी सहयोगी अकाली दल ने बीजेपी और कांग्रेस के शुरूआती विरोध और चुप्पी के बाद भी जिस तरह से माफी के लिए पहल की उसे आने वाले वक्त में सियासी कसौटी पर परखा जाता रहेगा। अव्वल तो पंजाब में ही यह सवाल लंबे समय तक गूंजेगा कि प्रकाश सिंह बादल ने समझदारी का परिचय दिया या गर्म ख्याली संगठनों के आगे घुटने टेक दिये। बहुत गहराई से देखें तो कांग्रेस और बीजेपी ने चुप रह कर फांसी पर होने वाले फैसलों को सख्त या नरम राज्य की परिभाषा से मुक्त कर दिया है। अब फांसी पर राजनीतिक निर्णय लेना आसान हो जाएगा। ध्यान रखना होगा कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी जिसने अकाली दल की मांग को तुरंत स्वीकार कर लिया। राजोआना की फांसी टल गई।

जिस वक्त पंजाब के लोग सड़कों पर उतर रहे थे उसी दौरान दिल्ली में कहा जा रहा था कि यह पंजाब में गर्म ख्याली संगठनों का उभार है। कोई लोगों की भावना को राजनीतिक तौर पर नहीं पढ़ पा रहा था। आतंकवाद के दौर के बाद कई चुनावों में पंजाब ने अलगाववादी मुद्दों को छोड़ दिया है। इसी चुनाव में किसी भी ऐसे संगठन को जीत हासिल नहीं हुई जिन्हें कट्टरपंथी बताया जाता है। और फिर जिस वक्त लोग सड़कों पर उतरे उस वक्त सूबे में कोई चुनाव भी नहीं हो रहा था। ज़ाहिर है इस जनाक्रोश को आशंका के अलावा इस तरह से भी देखा जाना चाहिए कि पंजाब चौरासी के दंगों और आंतकवाद के दौर में हुई नाइंसाफियों पर बराबर का हिसाब चाहता है। उनकी बात को सुना जाना चाहिए जिन्होने कहा कि अगर चौरासी के दंगों के दोषियों को फांसी हुई होती तो कोई राजोआना के लिए सड़क पर नहीं उतरता। कहना मुश्किल है कि क्या होता मगर यह सवाल महत्वपूर्ण है। उतना ही जितना कि यह सवाल भी जो लोग आतंकवाद के शिकार हुए उनके हिसाब से इंसाफ कब और कैसे होगा। हमारी जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर सबको भरोसा होता तो ये सवाल अदालत के हर फैसले के साथ शांत होते जाते। भड़कते नहीं।

ऐसी बात नहीं है कि पंजाब में राजनीतिक दलों ने किसी अदम्य साहस का परिचय दिया है। एक फौरी समझदारी ज़रूरी दिखाई है। अगर साहस से सामना करना होता तो सरकारें बताती कि आतंकवाद के दौर में आम लोगों के साथ कैसी ज्यादातियां हुई, उनमें शामिल लोगों को सज़ा देती। तब इंसाफ उन्हें भी मिलता जिनके लोग आतंकवादियों के निशाने पर आए और जिनके लोग सिर्फ शक के आधार पर आतंकवादी बताकर मार दिये गए। लेकिन यह एक जटिल सवाल है। आसान सवाल यह है कि फांसी के सवाल पर लाइन ले ली जाए। इससे भावनाओं के तरफ होने में सहूलियत हो जाती है।यह कहना आसान है कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पहल कर इस मसले को कट्टरपंथी ताकतों के हाथ में जाने से बचा लिया। जो सवाल है उससे प्रकाश सिंह बादल भी नहीं टकराते।
बलवंत सिंह राजोआना ने कभी रहम की मांग नहीं की। वो फांसी पर चढ़ना चाहता है। लेकिन उसके उठाये सवाल जवाब मांगेंगे। यही कि दंगों में मारे गए निर्दोष सिखों के कातिल कहां हैं? पंजाब की धरती पर मारे गए नौजवानों की पहचान क्यों नहीं हुई? मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की रिपोर्टों और धरने प्रदर्शनों में धूल खा रहे इन सवालों को राजोआना ने आवाज़ दे दी है। उसने भी इस मौके का फायदा उठाया है ताकि लोग चौरासी के दंगों के ऊपर बात कर सके। जिसे बीजेपी ने भी छोड़ दिया है। राजोआना के मसले पर कांग्रेस और बीजेपी ने चुप रहकर अहसान नहीं किया है। अपनी मजबूरी स्वीकार की है। इसका एक फायदा ज़रूर हुआ कि पंजाब में इस मसले पर राजनीतिक टकराव नहीं हुआ। लोगों का सड़कों पर उतरना राज्य सरकार की नज़र में कानून और व्यवस्था का ही सवाल बना रहा है।

राजनीतिक दलों ने इन सवालों को सांप्रदायिक चश्मों से नहीं देखा। इसीलिए पूछा जा रहा है कि यह चश्मा तब भी पहनेंगे जब अफज़ल गुरू की फांसी को दया याचिका में बदलने की मांग जोर पकड़ेगी। हम अफज़ल के मसले पर कांग्रेस और बीजेपी का खेल देख चुके हैं। कांग्रेस चुप हो जाती है। बीजेपी उग्र हो जाती है। अकाली दल के इस फैसले ने आगे से बीजेपी को भी नई लाइन तय करने के लिए मजबूर किया है। अब बीजेपी को सफाई देनी पड़ेगी कि बलवंत सिंह राजोआना की फांसी पर वह चुप हो जाती है और अफज़ल गुरु को लेकर आक्रामक। क्या उसका विरोध धर्म आधारित है? अकाली दल के सांसद नरेश गुजराल कह रहे हैं कि वक्त आ गया है कि राजनीतिक दल मिलकर एक सख्त फैसला करें। फांसी की सज़ा के प्रावधान को हटा दें और हमेशा के लिए इस मजबूरी से आजा़द हो जाएं। शायद यही बेहतर ही होगा वर्ना बादल की यह लाइन बीजेपी के किसी भी लाइन को बहुत परेशान करेगी।


राजोआना के सवाल पर राजनीति को इतनी जगह नहीं मिलती अगर दंगों के सवाल पर हमारी राज्य संस्थाएं निष्पक्ष नज़र आती। पूछा तो जाएगा ही कि गुजरात दंगों का इंसाफ नहीं मिलता है, सिख दंगों का इंसाफ नहीं मिलता है लेकिन इनसे पैदा हुए हालातों से भटके कुछ लोगों को फांसी पर ज़रूर लटका दिया जाता है। यह कानून की निष्पक्षता के लिए भी ज़रूरी है कि हर सवाल के जवाब उससे मिले। इस सवाल का जवाब भी कि बलवंत सिंह राजोआना आतंकवादी क्यों बना? जिसके पिता को आतंकवादियों ने मार दिया वो लड़का आतंकवादी क्यों बना? क्यों उसके मुंहबोले डैडी के परिवार के साथ पुलिस ने ज्यादतियां की? क्यों उसकी मुंहबोली बहन और मां को भी मार दिया गया। बलवंत सिंह राजोआना शायद इसीलिए फांसी पर चढ़ जाना चाहता है ताकि वो हम सबकी बुज़दिली को आइना दिखा सके। पूछ सके जिन्हें शक या संबंध के आधार पर आतंकवादी बताकर मारा गया उनका क्या कसूर था? अगर उनका बलिदान ही था तो इतिहास कैसे दर्ज करेगा।

उन आंकड़ों का कोई फायदा नहीं कि आज़ादी के बाद साल में एक से भी कम लोगों को फांसी हुई। उन बातों का भी मतलब नहीं कि राष्ट्रपति को यह प्रावधान दिया गया है कि वो फांसी को रहम में बदलने से पहले जनहित की परिस्थितियों पर भी विचार करें। यह सवाल उन बातों से भी हल नहीं होंगे कि दुनिया भर में फांसी की सज़ा के खिलाफ जनमत है। यह सवाल उन बातों से भी हल नहीं होंगे कि अमेरिका के कई राज्यों में फांसी की सज़ा फिर से शुरू हो रही है। राजनीति से मिलेगी। भागलपुर के दंगों , गुजरात के दंगों और सिख विरोधी दंगों का इंसाफ सिर्फ अदालती फैसलों से नहीं निकलेगा।

इस सवाल का सामना करने का साहस अभी राजनीतिक दलों में नहीं आया है। जनता में आया है। इसीलिए वो कई दलों और सरकारों को माफ कर देती है और आगे बढ़ जाती है। मगर अधूरे सवाल जवाब मांगते हैं। उन सवालों का जवाब आप विधानसभाओं से फांसी के खिलाफ प्रस्ताव पास कर नहीं दे सकते। मेनिफेस्टों के किसी कोने में लिख कर नहीं दे सकते। बलंवत सिंह राजोआना के उठाये सवालों को फिर किसी मोड़ और मुद्दे के लिए अधूरा छोड़ दिया गया है। जिसका जवाब हम पुराने हथकंडों से नहीं दे सकते कि पंजाब में कट्टरपंथी ताकतें पांव पसार रही हैं। एक बार फिर से पंजाब के चुनावों में जनता की भागीदारी और पसंद को सामने रख लीजिएगा।



एक अरब औरतों की आवाज़


समय और स्थान के बंटवारे में भी औरतों के साथ नाइंसाफी हुई है। किस वक्त और किस रास्ते से अकेली गुज़रना है या किसी के साथ गुज़रना है ये हर शहर और हर घर के औरतों के लिए लगभग तय होता है। दुनिया को उनके लिए बराबर बांट तो देते हैं मगर देते नहीं। दिन और रात का हर पहर उनका नहीं है। अक्सर पूछा जाता है या टोका जाता है कि वो इतनी रात को उस रास्ते से क्यों जा रही थी। घर में ही बालकनी में क्यों खड़ी है से लेकर क्या पहन कर निकल रही है और घर में रह रही है। यह सब कानून व्यवस्था की खराबी के कारण ही नहीं हुआ है। इस तथाकथित संस्कार के कायदे को रचा गया है पितृसत्तात्मक सोच के आधार पर । औरतों की आज़ादी भी अपने आप कई बंदिशों के बीच की वो जगह है जहां वो थोड़ी देर के लिए आज़ाद लगती है।

इन्हीं सब जगहों पर अपना हक जताने के लिए और हमारे सोच के भरम को तोड़ने के लिए गुरुवार के दिन दुनिया के दो सौ से अधिक देशो में सौ करोड़ औरतें बाहर निकल आईँ। शहर की गलियों से लेकर गांवों तक में औरतों ने रैली निकाली, नाटक किये और डांस किया। ताकि हर एक औरत की आवाज़ पूरी दुनिया के औरतों की आवाज़ बन जाए। इतनी बड़ी संख्या में बाहर आने का मकसद यह भी था कि उनके खिलाफ जो सोच है उसे अल्पमत में दिखाया जा सके। यह संख्या यह बताने के लिए थी कि शहर के हर कोने की जगह औरतों की भी है जहां किसी हिंसा की आशंका में उसे जाने नहीं दिया जाता। जाने दिया भी जाता है तो कई तरह के पहनावों और पहरों की शर्तों के साथ। यह अपने आप में एक अद्भुत दृश्य रचना थी ।

हालांकि टीवी ने इसके शहरी दृश्यों को ही दिखाया जिससे लगा कि यह अभियान चंद महानगरों की हाई क्लास टाइप की औरतों का है। गौर से देखें तो इस हाई क्लास की अवधारणा में भी मर्दवादी सोच होती है जो औरतों को हाई क्लास की आजादी से दूर रखना चाहती है। अफ्रीका हो या टोक्यो या बैतूल या जयपुर। हर जाति धर्म की औरतों का यह चेन बता रहा था कि दुनिया के हर कोने में औरतों के खिलाफ होने वाली हिंसा के किस्से एक जैसे हैं । फिर क्यों न एक जैसी हिंसा की शिकार औरतों को एक साथ आवाज़ उठानी चाहिए ताकि दुनिया देख लें कि ये औरतों कम नहीं हैं। अब ये अपनी हिंसा के खिलाफ बाहर आ सकती हैं। इनमें यह ताकत हैं कि वे अपनी अकेली की लड़ाई को ग्लोबल लड़ाई में बदल सकें।

इसी का असर है कि कमला भसीन जैसी नारीवादी कार्यकर्ता टीवी पर आती हैं और पूरी दुनिया के सामने बोलने का साहस करती हैं कि उनके बचपन में कैसे चार से आठ साल की उम्र के बीच तेरह अलग अलग मर्दों ने गलत से तरीके से छूने की कोशिश की। वो अपने आप से सवाल करती हैं कि तब क्यों नहीं बोल पाई आज तक नहीं जवाब नहीं मिला है। जबकि मेरे घर में मां बाप सब बराबरी से बर्ताव करते थे। फिर तेरह मर्दों ने मेरे बचपन की यादों को ज़ख्म दे दिया। अनुष्का शंकर को पब्लिक में यह कहना पड़ा कि उनके पिता के मित्रों ने किस तरह से उनका यौन शोषण किया। फिल्म निर्देशक पूजा भट्ट को लेख लिखना पड़ता है कि उनके साथ शादी के भीतर हिंसा हो सकती है ये कभी सपने में भी नहीं सोचा था। उनके पति ने शराब के नशे में मारपीट की। सबसे सामने इस तरह की बातें बताने का एक मतलब है। वो यह कि वो न सिर्फ अपनी बल्कि तमाम औरतों की चुप्पी को आवाज़ दे रही थीं। वो यह हौसला दे रही थीं कि अब कम से कम इस हिंसा पर बात की जा सकती है । बिना लोकलाज औऱ इज्जत गंवाने के भय के। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। जब समाज के एक तबके को पता चल जाए कि कोई लड़की आज न सही मगर बीस साल बाद भी यह बोल सकती है तो एक बार सोचेगा। आप जानते हैं कि स्त्रियों के साथ सबसे अधिक यौन हिंसा घर के भीतर होती है और पहचान वाले करते हैं।

ये औरतें संसद में आरक्षण के सवाल पर नहीं निकली थीं । व्यवस्था में जगह देने के बाद भी समाज और सरकार की सोच में औरतों के प्रति जो हिंसा है उसकी लड़ाई कुछ अलग है। कई लोग कहते हैं कि औरतें भी बुरी होती हैं। यह पुराना तर्क है। मर्द भी तो अच्छे होते हैं। सही है कि कई औरतों ने दहेज के झूठे आरोपों में मर्दों को फंसाया है। यह भी ठीक है कि कुछ औरतों ने बलात्कार से लेकर छेड़खानी तक के झूठे आरोप लगाये हैं। यह पूरी तस्वीर नहीं है बल्कि औरतों के साथ होने वाली हिंसा की व्यापक तस्वीर का एक कोना भर ही हैं । क्या यह सही नहीं है कि कोई रिश्तेदार बच्चियों को गलत तरीके से छूता है, कोई पति अपनी पत्नी को मारता है, किसी राह चलती लड़की को अपनी संपत्ति समझ कर हिंसा करता है, प्रेम न करने पर तेजाब फेंक देता है। औरतों के खिलाफ हिंसा को गिनाने की ज़रूरत नहीं है। इसकी लड़ाई कैसे लड़ी जाएगी। जब तक घर की बात सड़क पर नहीं होगी यह लड़ाई न तो लड़ी जा सकती है न जीती जा सकती है। यही लड़ाई लड़ने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग दिल्ली के रायसीना हिल्स में पहुंच गए थे।

पूरी दुनिया के नारीवादी आंदोलन को दिल्ली गैंगरेप के बाद हुए ज़ोरदार प्रदर्शनों ने हौसला दिया है। बलात्कार सिर्फ भारत में नहीं होते लेकिन इस तरह के जनदबाव की मिसाल पिछले बीस साल की दुनिया में कम है। मणिपुर की मनोरमा सालों से अनशन पर हैं। उनके साथ भी बलात्कार हुआ मगर उन्हें लेकर कभी जनसैलाब नहीं उमड़ा। पिछले बीस सालों मे जिस तरह लड़कियों ने हर क्षेत्र में खुद को साबित किया है, अपने लिए जगह बनाई है उसका राजनीतिक नतीजा तो निकलना ही था। अभी भी हमारे राजनीतिक दल यह समझ रहे हैं कि हमारी लड़कियां और औरतें भाइयों और पतियों के कहने पर ही वोट कर रही हैं। वो यह देख नहीं पा रहे हैं कि औरतों का सबसे अधिक राजनीतिकरण हुआ है। शायद इसी बात ने नारीवादी संगठनों को उम्मीद से भर दिया है कि वे जिनके लिए वे सालों से काम करते करते हाशिये पर चली गईं थीं वो अब मुख्यधारा में अपनी आवाज़ को गूंजा देने की ताकत रखने लगी हैं। इस काम में फेसबुक और ट्विटर ने औरतों के राजनीतिकरण में बड़ी मुख्य भूमिका निभाई है। हो सकता है कि वे नारीवादी सिद्धांतों के अनुसार बराबरी के मसलों को न समझती हैं मगर वो अपने खिलाफ हिंसा और उसकी सोच को समझने लगी हैं। यह एक क्रांतिकारी बदलाव है और ये भारत में हुआ है जिसे दुनिया भर के नारीवादी संगठनों को एक रौशनी मिली है और उसी का नतीजा है एक अरब औरतों का यह अभियान।
(यह लेख आज के राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)


भारतीय मुसलमान ही विश्वरूप है।

यह फिल्म सबको आहत की क्षमता रखती है। एक फिल्म के लिए इससे बड़ी कामयाबी क्या होगी कि उसने आहत करने के बहाने सबको झकझोरा। जब मैं यह बात कह रहा हूं तब यह बिल्कुल मान कर नहीं चल रहा है कि मैंने कोई गाथा देखी है। लेकिन मैंने सामान्य रूप से एक अच्छी फिल्म ज़रूर देखी है। अफगानिस्तान के यथार्थ को हिन्दुस्तान दर्शकों के करीब लाने की कोशिश में विश्वरूप हिन्दुस्तान के मुसलमान नायक के ज़रिये एक ऐसे सिनेमाई समाधान को पेश करने की कोशिश करती है जो यहां की साझा संस्कृति में पला बढ़ा हुआ है। जब कमल हासन को लात पड़ती है तो चीख में कृष्णा निकल जाता है। तालिबानी सरगना हैरान होता है कि जो खुद को मुसलमान बता रहा है वो कृष्णा कैसे पुकारता है। उसका एक नाम विश्वनाथ कैसे हो सकता है। कमल हासन के किरदार का जवाब दिलचस्प है। कहता है कि हूं तो मुसलमान लेकिन कलाकार भी तो हूं । कृष्णा के कैरेक्टर में बह गया था। उसे लात पड़ती है लेकिन एक अच्छी फिल्म अपने पर्दे पर हर छोटी बात का वृतांत रचते चलती है। फिल्म शुरू होती है कमल हासन के कृष्ण रूप से। कृष्ण लीला में मगन एक कलाकार किरदार उस लीला में विलीन हो जाता है जिसे कोई और रच रहा है। कृष्ण का सारथी बना यह विश्वरूप अर्जुन की भूमिका में अफगानिस्तान की गुफाओं में पहुंचता है।

पहले हिस्से की कहानी उस अफगानिस्तान को हमारे नज़दीक लाती है जिसके रहस्यों को हम कुछ जानकारों और विदेश सचिवों की बपौती समझते हैं। यहीं पर मज़हब सिसायत की बिछाई बिसात के बीच कितना लाचार नज़र आता है, जिसके नाम पर ख़ून ख़राबा है,जिसके नाम पर बेगुनाहों की हिंसा है और जिसके नाम पर एक वाजिब लड़ाई भी जो पेट्रोल के लिए अमेरिका उसकी धरती पर खेल रहा है। इस पूरे ख़ून ख़राबे में इस्लाम भी फंसा हुआ नज़र आता है। कमल हासन उस फंसे होने की पीड़ा को सामने लाने की कोशिश करते हैं। जहां बच्चों बीबीयों को ऐसे भून दिया जाता है जैसे वो किसी मज़हब के बिना ही पैदा हो गए हों। मज़हब भी अपने आप में एक ऐसा वहशी मुल्क है जो अपने ही नागरिकों को मज़हब-बदर कर मार देता है। मुल्क की सरहद भी ऐसी ही होती है। वो कब दूसरे मुल्क को दूसरे मज़हब की सीमा समझ घुस जाता है और अपने हिसाब से हिंसा को अंजाम देता है। कमल हासन का किरदार वहां फंसा हुआ है। उसकी हिंसा पीड़ा को समझ रहा है। अपने ज़रिये हिंदुस्तान के आम दर्शकों के सामने परोस रहा है।

फिल्म पूरी तरह व्यावसायिक है। पैसे कमाने के लिए बनी है इसलिए गाथा बनते बनते अंत में जाकर सीआईडी सीरीयल की तरह खत्म होती है । क्लाइमेक्स हिन्दुस्तान के निर्देशकों की भयंकर कमज़ोरी रही है। मगर इस एक कमज़ोरी को छोड़ दें, प्रधानमंत्री के फोन को छोड़ दें तो फिल्म हमेशा हमारे भीतर की हिंसा की तमाम मंज़ूरियों को व्यावसायिक सिनेमा के स्तर पर बेहतरीन तरीके से उभारती रहती है। तभी कमल हासन का किरदार कहता हैं –“ to answer your question I am both-good or bad, hero or villain”  यह कोई सामान्य संवाद नहीं है। इस संवाद के बाद तस्वीरों का जो वृतांत रचा जाता है उसके ज़रिये कमल हासन हर कहानी को नायक और खलनायक, अच्छे और बुरे के महिमागान और हिसाब किताब के दायरे से बाहर निकाल कर उसकी बारीकियों से बने यथार्थ को दिखाने की कोशिश करते हैं।

फिल्म कहीं से भी मुसलमान की छवि ख़राब नहीं करती है। बल्कि फिल्म बताती है कि बात नायक खलनायक की नहीं है। देखिये कि मज़हब और मुल्कों की सियासत में अच्छाई बुराई कैसे फंसी हुई है जहां इंसान आलू प्याज की तरह कट छंट रहा है। बल्कि यह फिल्म बहुत चालाकी से हिन्दुस्तान के मुसलमान को इस्लामी मिल्लत से अलग कर देती है। अगर आप इस नज़रिये से कमल हासन के मुसलमान को देखना चाहते हैं तो देख सकते हैं कि यह वो मुसलमान है जो अल कायदा के गढ़ में तटस्थ भाव से देख रहा है। उसके आंखों में आंसू है। वो देश के लिए एक दूसरे मुल्क की ज़मीन पर वो तबाही देख रहा है जिससे जुड़ने का ज़रिये उसके पास एक ही है और वो है इस्लाम। बल्कि कमल हासन ने दुनिया भर इस्लाम के नाम पर फैलाये और पैदा किये गए अमरीकी आतंक का जवाब हिन्दुस्तान के इस्लाम और मुसलमान से दिया है। यह फिल्म अपने व्यावसायिक हदों में जिरह करती हैं कि हिन्दुस्तान मुसलमान ही समाधान है। नज़ीर है। फिल्म दावा करती है कि भारतीय मुसलमान ही विश्वरूप हो सकता है।

यहीं पर फिल्म उस व्यापक कूटनीतिक दुनिया में दखल देने लगती है जिसे ओबामा अफगानिस्तान की ज़मीन पर भारत और पाकिस्तान के साथ खेल रहे हैं। अफगानिस्तान में भारत की भूमिका उसकी बेजान पहाड़ियों और खून से सनी मिट्टियों को हरा भरा करने की सियासत चल रही है। पाकिस्तान यहां आईएसआई के पिछलग्गू से ज्यादा कुछ नहीं है। इसलिए चेन्नई के जिन चौबीस मुस्लिम संगठनों ने इस फिल्म को देखने के बाद भी विरोध किया उन्होंने हिन्दुस्तान के मुसलमानों को बदनाम करने का काम किया है। अखिलेश यादव ने सही दिमाग लगाया और मुस्लिम वोट बैंक के दबाव में न आते हुए इस फिल्म को उत्तर प्रदेश में रीलीज होने दिया जिसके एक सिनेमा हाल में यह फिल्म देखकर मैं लिख रहा हूं। जयललिता चूक गईं और चेन्नई के मुस्लिम संगठन उनकी इस सियासी चूक के चारा बन कर रह गए।

चलते चलते- हां इस फिल्म ने ब्रा जैसे वर्जित वस्त्र को आम संवाद में लाने का भी प्रयास किया है। सफीना उबेराय की डाक्यूमेट्री याद आ गई जिसमें वो अपनी मां के विदेशीपन को पेश करने के लिए बालकनी में पैंटी और ब्रा को लहराते हुए दिखातीं हैं। मगर फिल्मों के स्तर पर ब्रा एक सामान्य वस्त्र कभी नहीं रहा। हमेशा नायिका की साड़ी या ब्लाउज के किनारे से सरक कर उन निगाहों का खुराक बनाकर पेश किया जाता रहा है जो औरत को भोग बनाती है। इस फिल्म के आखिर में कई बार बोला जाता है। कमल हासन की पत्नी से कि तुम्हारे कपबर्ड में ब्रा के पास वो सामान रखा हुआ है। कमल हासन की पत्नी हैरान है। उसकी हैरानी दो स्तर पर है। ब्रा के बोले जाने से और उसके निजी स्पेस में घुस आने से। हर कोई उसे याद दिलाता है कि जल्दी करो तुम्हारे ब्रा के पास वो चीज़ रखी हुई है ले आओ। निर्देशक चाहता तो यह भी कह सकता था कि तुम्हारे दुपट्टे के बगल में वो चीज़ रखी है। इस एक बात के लिए फिल्म का विशेष रूप से शुक्रिया। ब्रा को सामान्य बनाने के लिए। उस पर बात करने के लिए। वर्ना हिन्दुस्तान में उसे कभी खुली जगह नहीं मिली। बालकनी में भी नहीं। जहां वो या तो साड़ी के नीचे या कई कपड़ों के बीच में दुबका होता है। मुझे नहीं मालूम की ब्रा का जेंडर क्या है। ब्रा रखा गया है या ब्रा रखी गई है। मैं इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहता वर्ना आपसे यह पूछना पड़ेगा कि मूंछ स्त्री लिंग कैसे है और पेटिकोट पुल्लिंग कैसे हैं।

(मेरी समीक्षा से प्रभावित होकर फिल्म न देखें। क्योंकि आपकी शिकायत से मिज़ाज भड़क जाएगा। आइटम सांग देखने वाले दर्शकों की जमात की शिकायत को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। बाकी जो सिनेमा के दर्शक हैं उनकी पसंद नापंसद सर आंखों पर)

अखिल भारतीय सोशल कांग्रेस कमेटी


क्या सोशल मीडिया नए विपक्ष के रूप में देखा जाने लगा है? राजनीतिक प्रबंधन में सोशल मीडिया क्यों महत्वपूर्ण होने लगा है? इस पर बन रहे जनमत से हमेशा कांग्रेस ही क्यों दबाव में आती दिख रही है? नीतीश,अखिलेश,नवीन पटनायक,करुणानिधि,ममता बनर्जी या राज ठाकरे की राजनीति के लिए क्यों महत्वपूर्ण नहीं है। सिर्फ कांग्रेस या बीजेपी के हिसाब से ही क्यों सोशल मीडिया के मैदान में घमासान के नतीजे का मूल्यांकन किया जाता है। क्यों कांग्रेस को ही जयपुर के चिंतन शिविर में सोशल मीडिया के प्रभाव और इस्तमाल जैसे मुद्दे पर चिंतन करना पड़ रहा है? देश में कंप्यूटर लाने का श्रेय लेने वाली कांग्रेस आज इंटरनेट पर पसरे सोशल मीडिया के तंत्र को लेकर कभी भयभीत तो कभी दंभी तो कभी अजनबी क्यों नज़र आती है? क्या सचमुच कांग्रेस सोशल मीडिया को एक नए लोकक्षेत्र के रूप में देखना चाहती है? लेकिन क्या सोशल मीडिया पर कोई जनभावना ही नहीं है जिसे कोई भी राजनीतिक दल नकार दे। कोई नकारे भी न तो अरबों लोगों में फैले फेसबुक और ट्विटर अकांउट का पीछा कोई राजनीतिक दल कैसे कर सकता है। पीछा का मतलब नियंत्रण से नहीं है। पीछा का मतलब वहां मौजूद जनभावनाओं को राजनीतिक रूप से समझने में हैं।

एक मिनट के लिए मान लीजिए कि सोशल मीडिया न होता तो बाकी जनता से संवाद करने का मौजूदा तरीका सही है? क्या कांग्रेस शहरी मतदाताओं की उन आकांक्षाओं को सही समय पर समझ पा रही है जिसकी नाकामी की ज़िम्मेदारी वो सोशल मीडियो को ना समझ पाने की अपनी चूक पर डाल रही है। अन्ना आंदोलन हो या दिल्ली गैंगरेप के बाद रायसीना हिल्स पर पहुंचे लोगों का हुजूम ये सब सिर्फ सोशल मीडिया की पैदाइश नहीं हैं। इसके अपने राजनीतिक आर्थिक कारण भी हैं। इससे पहले मुंबई हमले के बाद लाखों लोगों की रैली हुई थी तब सोशल मीडिया नहीं था। आज भी देश में कई राजनीतिक रैलियां और लड़ाइयां बिना सोशल मीडिया के हो रहे हैं। तमिलनाडु के परमाणु संयंत्र का मामला हो या फिर फिर पिछले अक्तूबर में ग्वालियर से दिल्ली आ रहे किसानों का सत्याग्रह मार्च हो। इन आंदोलनों में भी जनभावना है लेकिन उसे सोशल मीडिया व्यक्त कर रहा है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस के नेता संवाद करने के पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। इसीलिए मीडिया पर मंत्रियों का बना एक औपचारिक समूह ही सबसे उपयुक्त और भारीभरकम मान लिया गया है। अब पार्टी को समझना चाहिए कि औपचारिक प्रेस कांफ्रेंस से ही एजेंडा तय नहीं होता। इसमें शामिल मंत्रियों को अनौपचारिक रूप से भी जनता से सीधे संवाद करना चाहिए। यह वो जनता है जो अपनी ताकत से न्यूज चैनलों के न्यूजरूम को ध्वस्त कर चुकी है। आज संपादक अपनी खबर को ट्विटर और फेसबुक पर चल रहे जनउभार के हिसाब से मोड़ने लगे हैं। जब गैंगरेप मामले में जन आंदोलन उभार पर था तभी सचिन तेंदुलकर के संयास लेने की खबर आ गई। तब सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया कि सरकार की तरफ से ये योजना होगी ताकि न्यूज़ चैनल गैंगरेप की स्टोरी को छोड़ सचिन की महानता के गुन गाने लगे। संपादकों को ट्विटर पर जाकर कहना पड़ा कि हम सचिन की स्टोरी की कीमत पर गैंगरेप की स्टोरी नहीं छोड़ेंगे। अब यह पत्रकारिता के लिए भी मसला है कि सोशल मीडिया की भीड़ इसी तरह ऐसे किसी मुद्दे पर दनदनाती हुई उसके न्यूजरूम में घुसकर मांग करने लगे जो खतरनाक हो तब वो कैसे खड़ी होगी। पूरी तरह से नकारेगी या कोई रास्ता निकाल कर उसे आवाज़ देगी। अभी इसका इम्तहान नहीं हुआ मगर होना बाकी है।

सोशल मीडिया राजनीतिक रूप से एक ऐसा मैदान है जहां किरदारों और मुद्दों की विविधता है। यह वो लोग हैं जो सरकार से बेहतर प्रदर्शन, पारदर्शिता और संवाद की उम्मीद करते हैं। यह वो लोग हैं जो अब नहीं समझना चाहते हैं कि एक योजना को पूरी तरह से लागू होने में कितने साल लगेंगे। ये हाई स्कूल में नब्बे फीसदी लाकर अच्छा कालेज नहीं पाते हैं तो आप इन्हें नहीं समझा सकते कि सरकार पांच फीसदी के ग्रोथ रेट पर चलती हुई महान कहला सकती है। मध्यमवर्ग की एक बड़ी आबादी अपनी मेहनत का खाती है। उसकी कमाई में सैलरी का हिस्सा है रिश्वत का नहीं। ये टैक्स देती है। बदले में बेहतर काम मांगती है। जब सिस्टम काम करेगा तो जनता से अपने आप संवाद होता रहेगा। जब सिस्टम काम नहीं करेगा तो सारे मंत्रियों के ट्विटर पर अकाउंट खोलने से सोशल मीडिय नहीं साधा जा सकता। आखिर प्रधानमंत्री के ट्विटर पर आ जाने से सोशल मीडिया में मौजूद उनकी छवि में कोई बदलाव आया? नहीं।

कांग्रेस के लिए जो राजनीतिक रूप से समझने वाली बात है वो ये कि बेहतर काम का प्रदर्शन और फिर तरीके से संवाद। उसे इस संकोच से निकलना होगा कि सरकार सिर्फ औपचारिक ज़बान में ही बात करती है। वो दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं के ज़रिये समानांतर संवाद का मंच तैयार कर नतीजा नहीं पा सकती। उसे समझना होगा कि सोशल मीडिया पर प्रबंधन की ज़रूरत नहीं है। वहां भी उसके लिए राजनीति का पुराना मैदान ही है। कांग्रेस सोशल मीडिया पर संगठित रूप से हावी दक्षिणपंथियों के मुकाबले कमज़ोर है। जिसे आप हिन्दू इंटरनेट कह लें या अलग अलग समूह में बंटे किसी नाम से पुकार लें। यह वो तबका है जो उन कमज़ोर नब्ज़ों पर मीडिया की गर्दन भी दबोच लेता है जिस पर मीडिया और सरकार दोनों चुप्प रह कर निकल जाना चाहते हैं। हैदराबाद में अकबरूद्दीन ओवैसी का मामला देखिये। कांग्रेस ने अपनी तरफ से क्यों नहीं ओवैसी के बयान को खतरनाक बताते ही कार्रवाई की बात की। वो क्यों सोशल मीडिया से होते हुए मीडिया के माइक के आने का इंतज़ार करती रही। गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया का यह सांप्रदायिक और दक्षिणपंथी गुट गायब हो गया। राजठाकरे और वरुण गांधी के सवालों पर चुप्पी मार गया। लेकिन इस सवाल को उठाने वाले कई तटस्थ लोग भी थे जो सही सवाल कर रहे थे कि कोई ऐसे कैसे बोल सकता है। क्या कांग्रेस उनकी भी चिंता कर रही थी।
कांग्रेस की वेबसाइट देखिये। कांग्रेस के नेताओं के कालम में गया तो सोनिया गांधी का ही चार साल पुराना भाषण पड़ा था। पार्टी की वेबसाइट नीरस और सरकारी नहीं हो सकती। वहां संवाद का क्या जरिया है। कांग्रेस के नेता टीवी की बहसों से गायब हैं। उसे समझना होगा कि टीवी की बहस भी सोशल मीडिया का ही विस्तार है। वहां जाने की कोई तैयारी नहीं है। बीजेपी के नेता तैयार होकर आते हैं तो इसमें सोशल मीडिया की क्या गलती है। कांग्रेस के बड़े मंत्री हिन्दी स्टुडियो से दूरी रखते हैं। यह भी पता होना चाहिए कि इस देश का मध्यमवर्ग अब दुभाषिया है। वो काम अंग्रेजी में करता है लेकिन संवाद हिन्दी में। वर्ना अंग्रेजी के चैनलों के दर्शकों की संख्या कुछ हज़ार में नहीं होती। इसके बाद भी कोई दल सोशल मीडिया को हौव्वा न बनाए। इसकी अपनी राजनीति भी कई मायनों में ताकतवर है तो संदिग्घ भी है।

(यह लेख आज के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)

विशाल का मंडोला: उदारीकरण का उड़नखटोला

कुछ फिल्में होती हैं जो साधारण सी लगने के बाद भी अपने चंद दृश्यों से असाधारण बन जाती हैं। मटरू की बिजली का मंडोला एक ऐसी फिल्म है जिसे हम उदारीकरण की आलोचना के साहसिक फ्रेम से बाहर निकल कर भी देख सकते हैं। तब जब एक फिल्मकार अपने कैमरे से उन दृश्यों को रच देता है जो हमारे अंतर्विरोधों को सहलाने लगते हैं। पंकज कपूर का किरदार जब शबाना आज़मी के साथ अपने सपने को बयां करने लगता है तब विशाल भारद्वाज का सिनेमा सचमुच कलात्मक अभिव्यक्ति की ऊंचाई को स्पर्श करने लगता है। मंडोला अपने ख्वाब का एक ऐसा संसार रचने लगता है जिसे सिनेमा के आम दर्शक की मनोवृत्ति से आप स्वीकार नहीं कर पाते। कई लोगों को उस प्रसंग पर सिनेमा हाल में भकुआए यानी भौंचक्क देखा। जब पंकज कपूर अपने सपने को बयां कर रहे होते हैं औऱ पर्दे पर दैत्याकार मशीने चलने लगती हैं, बड़ी बड़ी चिमनियों से धुआं फैलकर आसमान में छाने लगता है। विशालकाय क्रेन घूमने लगती हैं। खेती की ज़मीन बड़े बड़े गड्ढे में बदल जाती है जिसे विशालकाय इमारतों की बुनियाद से भरा जा रहा है। विशाल अपने बादलों को कथार्सिस के रूप से में रच देते हैं। वो सामान्य बादल नहीं हैं। शबाना को मंडोला के सपने में झूम जाना और फिर बादलों का बरसना। एक दर्शक के रूप में जैसे ही मंडोला के सपने में खो कर सहमने का मन करता है, बादल बरस जाते हैं और रोने कोई और लगता है। दरअसल किसान के पास सपने भी नहीं हैं। वही बादल जो बरस कर उसकी फसलों को लहलहा देते हैं,दूसरी बार बरस कर इस तरह से बर्बाद कर देते हैं कि उसका माओ के नेतृत्व से भरोसा ही उठ जाता है। तब लगता है कि मंडोला ठीक ही इस सपने की शुरूआत कुछ इस तरह से करता है कि जब भी मैं इन बदसूरत खेतों में बदमस्त फसलों को लहलहाते देखता हूं.....


फिल्म ऊब भी पैदा करती है। यूएफओ वाली ऊब। लेकिन बिना FARCE  और BIZZAR प्रसंगों के इस विषय को कैसे डील किया जा सकता था। विशाल शायद वही कर रहे हैं। भूमि अधिग्रहण की समस्या को मीडिया जिस तरह से देखता है एक फिल्मकार उसके विद्रूप को पेश करने के लिए और क्या कर सकता था। रिपोर्टर पल्प टेलीविजन का लिलपोर्टर लगता है। वो एक हवाई दुर्घटना को यूएफओ समझाने लगता है। मैं कई बार सोचता रहा कि विशाल भारद्वाज जैसा प्रतिभाशाली निर्देशक क्या सोच रहा होगा, इस कमज़ोर से लगने वाले दृश्य को रचने के लिए । शायद विशाल ऐसे प्रसंगों और विकास में मीडिया के अंधविश्वास को दिखाने के लिए मौजूद सभी फ्रेम से बाहर निकल जाना चाहते थे । बार बार लगा कि रात में हवाई जहाज़ उड़ाने का प्रसंग किसी घटिया लाफ्टर चैलेंज का लतीफा है जिसे देखते हाल से बाहर जाने की बेचैनी होने लगती है मगर जिस तरह से हम विकास को लेकर सोचने लगे हैं उसमें यूएफओ वाला भाव तो है ही। वर्ना दूसरा भाव है जो आलोचना तो करता है मगर विकल्प नहीं दे पाता।


यह दूसरा भाव है जब भैंसे माओ माओ बोलने लगती हैं। यहां विशाल भारद्वाज सिर्फ उदारीकरण के आलोचक की भूमिका से निकल कर इसकी आलोचना की कापीराइट रखने वाले कम्युनिस्ट आंदोलनों की नाकामी को भी रच देते हैं। उनके पास जो समझ है उसके फ्रेम में माओ किसी दूत से कम नहीं है। वो एक रहस्यमयी दूत है जो आकाशवाणी से उतरता है और अपने फरमानों के साथ पेड़ पर लहरा रहा होता है। माओ अपनी बात किसी और से बुलवा रहा है। मधुमक्खी वाले प्रसंग को दोबारा से देखिये। मटरू लाल रूमाल में चेहरा छुपाए हैं और नसीबन बोल रही है। मटरू जो भी बोलता है नसीबन दोहराने लगती है। क्या हमारे कम्युनिस्ट नसीबन हैं? क्या उनकी उपलब्धि और गंभीरता नसीबन की हैरानी वाले भाव से कुछ ज्यादा नहीं कि चल इस टोली में शामिल होते हैं और देखते हैं कि अब क्या होगा। लेकिन एक बारिश और गेंहूं की बर्बादी से माओ का भूत उतर जाता है। जेएनयू में बीड़ी पीने का संस्मरण और कम्युनिस्ट होने का ख्याल शक्ति भोग के दफ्तर के भीतर एक्टिविज्म के तमाम अनुभवों पर सवाल करता है। विशाल के पास कोई जवाब नहीं है इसलिए वो हर सवाल को हास्य प्रसंग में बदल देते हैं। हंसो और देखो की ये हमारी समस्या है और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं।


तभी वो मंडोला के भीतर ही कम्युनिस्ट ढूंढने की संभावना को तलाशने लगते हैं। क्या ऐसा हो सकता है कि कभी उद्योगपति ही कम्युनिस्ट जैसा हो जाए। वो किस स्थिति में ऐसा हो सकता है और होगा भी तो कैसा लगेगा, इस पहलु के बारे में विशाल ने ज़रूर सोचा होगा तभी गुलाबो की कल्पना साकार होती है। नशे में ही कोई उद्योगपति कम्युनिस्ट ख्याल का हो सकता है, होश आते ही वो सपना देखने लगता है। माल का सपना, बड़ी इमारतों और फैक्ट्रियों का सपना। भैंस का गुलाबी होना उस ख्वाब के गुलाबी होने जैसा है जो कभी हकीकत में होगा नहीं। सेज़ स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन की कथा और उत्तर कथा को विशाल हर तरह के फ्रेम से बाहर निकाल कर एक हवेली की बालकनी में पटक देना चाहते हैं। मंडोला की बिजली और अफ्रीका से लाए गए गुलाम। कई बार लगेगा कि इनका क्या रोल है। पर विकास के नाम पर जिस तरह अनाप शनाप आइडिया लाये जा रहे हैं जिनका हमारी हकीकत से कोई लेना देना नहीं है,उसे पेश करने के लिए एक अच्छी तरीका था। दर्शकों को पसंद आया कि नहीं यह अलग मसला है।

हर किरदार अपनी स्थिति में फंसा हुआ है। शराब ही है जो हर किरदार को फंसी हुई स्थिति से निकालती है। हमारे गांव और किसान भी फंसे हुए हैं जो कभी निकल नहीं पाते हैं। अपनी ज़मीन हार ही जाते हैं। तब शायद शेक्सपीयर बचाव में आते हैं। मार्क्स नहीं। शायद वो मेरठ का स्वीमिंग पुल है। अगर है तो उसे मैंने भी शूट किया है । फिर भी उस स्वीमिंग पुल के भीतर मटरू और बिजली के बीच जो कुछ भी होता है, वो आर्तनाद है। अंतर्मन की चित्कार। हमारा प्रेम भी आर्थिक नीतियों के बीच घट रहा है और फंसा हुआ है। इसीलिए फिल्म ऊब पैदा करती होगी। क्योंकि कहानी सीधे सपाट फ्रेम वर्क की नहीं है। हीरो है जो हीरो की तरह नहीं है। तभी तो मंडोला बार बार कहता है मैं जैसा दिखता हूं वैसे हूं नहीं। इसमें कोई हीरो नहीं, कोई खलनायक नहीं है।
हां जब रात को किसान गोबर बम बनाकर हमला करते हैं तब वो सीन जीत के भाव से भर देती है। विशाल अंत अंत तक उनकी एकता पर ही भरोसा करते हैं। वो एक होकर अपनी जमीन हार जाते हैं और वो एक होकर अपनी ज़मीन जीत भी लेते हैं। गोबर बम से हमले का दृश्य वो क्रिटिक है जिसे मुख्य धारा की मीडिया भी पेश नहीं कर पाई। दरअसल मुख्यधारा की मीडिया ने कभी उदारीकरण पर इस तरह से सवाल ही नहीं किया है। सिनेमा कर रहा है जिसे आप शंघाई में भी देख सकते हैं और जिसे आप कई अन्य फिल्मों में भी देख सकते हैं।


यह फिल्म भी राजनीतिक है। वर्ना शबाना आज़मी यह न कहती कि मेरे सपनों का लोकपाल। क्या दृश्य और संवाद अनायास आया? दिल्ली में तुम्हारी गर्लफ्रैंड है, बिजली के इस सवाल पर मटरू का जवाब अनायास आ गया कि शीला दीक्षित है, मैंने शेक्सपीयर को पढ़ा ही नहीं तो मालूम नहीं कि उनकी कथाओं का क्या योगदान है और कैसे उन कथाओं का फिल्म में रूपांतरण किया गया है पर जब मंडोला नेता जनता जनता नेता,नेता जनता, जनता जनता, नेता नेता का खेल खेलने लगते हैं तो दहाड़ मार कर रोने का मन करता है। शबाना का वो संवाद याद आ जाता है कि देश की प्रगति की बात करो। अपनी बात मत करो। जबकि देश की प्रगति शबाना और मंडोला के क्रूर सपनों के बीच कहीं फंसी हुई है। जिससे कभी नेता खेलता है तो कभी नेता के साथ जनता खेलती है। इसीलिए मटरू की बिजली का मंडोला साधारण होते हुए भी असाधारण फिल्म है। मुझे लगी जिन्हें बकवास लगी वो अभी नेता जनता जनता नेता खेल रहे हैं, उनके इरादे का सम्मान किया जाना चाहिए और एक फिल्मकार को यह छूट देनी चाहिए कि वो हर आलोचना को पहले से तय विचारधारा के पैमानों से नहीं दर्शाएगा, बल्कि उसे नई ज़मीन खोजने की तड़प में ड्राई डे के दिन लिमोज़िने से दारू के ठेके को धक्का मारना ही होगा। तभी वो शराब और बैंड बाजे के साथ उन फ्रेम या सांचे से मुक्त होने का जश्न मना सकेगा जिसमें हम सब कैद हैं। जिन लोगों ने मटरू की बिजली का मंडोला नहीं देखा या नहीं झेला उनका शुक्रिया। विशाल भारद्वाज की यह सबसे अच्छी फिल्म है।

पल्प फिक्शन से पल्प टेलीविज़न तक

न्यूज़ चैनल अपने आस पास के माध्यमों के दबाव में काम करने वाले माध्यम के रूप में नज़र आने लगे हैं। इनका अपना कोई चरित्र नहीं रहा है। गैंग रेप मामले में ही न्यूज़ चैनलों में अभियान का भाव तब आया जब अठारह दिसंबर की सुबह अखबारों में इस खबर को प्रमुखता से छापा गया। उसके पहले हिन्दी चैनलों में यह खबर प्रमुखता से थी मगर अभियान के शक्ल में नहीं। यह ज़रूर है कि एक चैनल ने सत्रह की रात अपनी सारी महिला पत्रकारों को रात वाली सड़क पर भेज दिया कि वे सुरक्षित महसूस करती हैं या नहीं लेकिन इस बार टीवी को आंदोलित करने में प्रिंट की भूमिका को भी देखा जाना चाहिए। उसके बाद या उसके साथ साथ सोशल मीडिया आ गया और फिर सोशल मीडिया से सारी बातें घूम कर टीवी में पहुंचने लगीं। एक सर्किल बन गया बल्कि आज कल ऐसे मुद्दों पर इस तरह का सर्किल जल्दी बन जाता है। कुछ अखबार हैं जो बचे हुए हैं पर ज्यादातर अखबार भी सोशल से लेकर वोकल मीडिया की भूमिका में आने लगे हैं। टीवी के कई संपादक सोशल मीडिया के दबाव को स्वीकार करते हुए मिल जायेंगे। जैसे ही सचिन तेंदुलकर ने रिटायरमेंट की घोषणा की वैसे ही एक बड़े संपादक ने ट्विट किया कि गैंगरेप की खबरें पहले चलेंगी और सचिन की बाद में। इसी क्रम में इसी सोशल मीडिया पर मौजूद दक्षिणपंथी टीवी की आलोचना करने लगे कि ओवैसी की खबर सिकुलर मीडिया जानबूझ कर नहीं दिखा रहा है। चौबीस दिसंबर का भाषण अभी तक नहीं दिखाया जबकि सबको मालूम है कि उस दिन टीवी दिल्ली गैंगरेप के मामले में डूबा हुआ था लेकिन दक्षिणपंथी सोशल मीडिया के दबाव में कई चैनल जल्दी आ गए और गैंगरेप की ख़बरें छोड़ ओवैसी के पीछे पड़ गए। वैसे यह खबर भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी, चर्चा करनी ही चाहिए थी लेकिन तब सिर्फ यही खबर क्यों। सचिन तेंदुलकर वाली खबर क्यों नहीं। वो किस मामले में कम महत्वपूर्ण था। अलग अलग सामाजिक समूहों के दबाव में टेलीविज़न दायें बायें होने लगा है। इसी बहाने कुछ मुद्दे पर सरकार को भी चेतना पड़ा। ज़ाहिर है टेलीविजन का इकलौता प्रभुत्व और प्रभाव खत्म हो गया है। ख़ैर।


गैंगरेप मामले मे रिपोर्टिंग कैसी हुई इस पर आने से पहले कुछ बात कहना चाहता हूं। जैसे पल्प फिक्शन होता है वैसे ही पल्प टेलीविजन होता है। भारत में ये पल्प टेलीविज़न का दौर है। पहले आप यह बात हिन्दी न्यूज़ चैनलों के बारे में यह बात कह सकते थे लेकिन अब इंग्लिश चैनल भी यही हो गए हैं। भाषा,प्रस्तुति और प्रोग्राम के मामले में हिन्दी इंगलिस चैनलों का अंतर पहले से कहीं ज्यादा कम हो गया है। हिन्दी और इंग्लिश चैनलों पर ज़्यादतर बहसिया फार्मेट के ही कार्यक्रम चल रहे हैं। पल्प को हिन्दी में लुग्दी कहते हैं । बहुत लोग मुझसे पूछते हैं कि आप चैनल को लैनल क्यों कहते हैं तो मैं लुग्दी से लैनल बनाकर लैनल बोलता हूं। इसका मतलब यह नहीं कि जो पल्प है वो खराब ही है या उसकी लोकप्रियता कम है। बस उसके पेश करने की शैली का मूल्यांकन या विश्लेषण मीडिया के पारंपरिक मानकों से नहीं किया जा सकता । चैनलों की भाषा,संगीत और तस्वीर पर बालीवुड की भाषा और बहुत हद तक हिन्दी डिपार्टमेंट की दी हुई ललित निबंधीय हिन्दी का बहुत प्रभाव है मगर लुग्दी टच होने के कारण मैं चैनलों की हिन्दी को लिन्दी बोलता हूं। तो लिन्दी लैनल और इंग्लिश वाले इन्दी लैनल। क्योंकि अब इंग्लिश बोलने का टोन भी हिन्दी जैसा हो गया है। इसका मतलब यह नहीं कि टीवी पर अच्छी पत्रकारिता नहीं होती है, वो भी होती है और वो कभी कभी पल्प टेलिविजन के दायरे में भी होती है। गैंग रेप मामले में भी बहुत कुछ अच्छा भी हो गया। अंदाज़ी टक्कर में। शैलियों पर बालीवुड और हिन्दी डिपार्टमेंट की हिन्दी के अलावा एक और प्रभाव है टीवी पर । वो है मेरठ माइंडसेट का। हर कहानी को रहस्य और रोमांच में लपेट कर मनोहरकथा की तरह पेश करना। जैसे जाग गया देश, मां कसम बदलेगा हिन्दुस्तान, चीख नहीं जाएगी बेकार, मैं लड़की हूं। इस तरह के शीर्षक और वायस ओवर आपको सुनाई देंगे। सिर्फ गैंग रेप ही नहीं ऐसे किसी भी मामले में जिसे लेकर सोशल मीडिया से भरम फैलता है कि पब्लिक यही सोचती है तो उसकी सोच में बड़े पैमाने पर गाजे बाजे के साथ घुस चला जाए। लैनलों में जो संगीत का इस्तमाल होता है उसका अलग से अध्ययन किया जाना चाहिए। इसका ज्ञान मुझे कम है। सरसरी तौर पर लगता है कि रेप और डार्क सीन या रेघाने वाली आ आ की ध्वनियों का असर दिखता है। अब यह अलग सवाल है कि इसे व्यक्त करने का दूसरा बेहतर फार्मेट क्या हो सकता था, तो जो नहीं है और जो नहीं हुआ उस पर क्यों बात करें, जो हो रहा है उसकी कमेंटरी तो कर ही सकते हैं।

लैनलों ने जो अभिव्यक्ति के लिए जो फार्मेट गढ़े थे उसका त्याग कर दिया है। स्टोरी टेलिंग की जगह स्टेटस अपटेडिंग हो गई है। लैनल सोशल मीडिया का एक्सटेंशन हो गया है । इसकी समस्या यह है कि अखबार की तुलना में स्पीड की दावेदारी सोशल मीडिया ने खत्म कर दी है। ऐसे मौकों पर न्यूज रूम ध्वस्त हो जाते हैं। न्यूज रूम का पूरा ढांचा ध्वस्त हो जाता है। अमिताभ बच्चन कबीर बेदी, किरण बेदी और राहुल बोस जैसों के ट्विट से शुरू होता है और लैनलों पर घटना को लेकर पूरा माहौल बन जाता है। टीवी अपनी खोजी और गढ़ी हुई खबरों की अनुकृति कम करता है। कुल मिलाकर चैनलों का ट्विटराइजेशन यानी ट्वीटरीकरण हो गया है। स्क्रीन पर चौबीस घंटे बक्से बने होते हैं उसमें लोग बोल रहे होते हैं। ट्विटर या फेसबुक की तरह। आयें बायें सायं। गैंगरेप की घटना के बाद टीवी भी सोशल मीडिया का एक्सटेंशन बन गया। आप कह सकते हैं कि रायसीना हिल्स का विस्तार बन गया। जिस तरह सोशल मीडिया में बाते होती हैं उसी तरह से टीवी में होने लगी। एक टीवी पर एक लड़की को बास्टर्ड बोलते सुना। खुद मेरे शो में कुछ लोग अनाप शनाप शब्दों का इस्तमाल कर गए। स्मृति ईरानी और संजय निरुपम का प्रसंग को ट्वीटरीकरण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। यह टीवी की नहीं, सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति है। ट्वीटर और फेसबुक अकाउंट से ओपिनियन और सवाल लिये जाने लगे। खाताधारियों को बुलाया जाने लगा। आप ध्यान से देखिये, लैनल सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति के माध्यम बन गए हैं। कम से कम ऐसे मौकों पर तो बन ही जाते हैं। स्क्रीन पर बगल में तस्वीर चल रही है लेकिन सब अपने अपने दिमाग के हिसाब से बोलते जा रहे हैं। कोई परंपरा की बात कर रहा है, भारतीय मूल्यों की बात कर रहा है तो कोई पाश्चात्य मूल्यों को दोष दे रहा है। अनियंत्रित गुस्सा, गाली सब प्रसारित हो रहा है। इससे क्या हुआ कि मेन स्ट्रीम मीडिया का जो अंग था टीवी उसका मार्जिनलाइजेशन होने लगा। वैसे तो सारे मीडिया अब सोशल मीडिया पर है इसलिए सोशल मीडिया ही मेनस्ट्रीम मीडिया है। एंकर लिंक से लेकर पीटूसी तक सब सोशल मीडिया के रिफ्लेशक्शन लगते हैं। इसमें आप हिन्दी और इंगलिस चैनलों में अंतर नहीं कर सकते हैं। जनमत के नाम पर हर तरह के मत हैं। बस हंगामे की शक्ल होनी चाहिए। इस काम में कई ऐसे मुद्दे ज़रूर आए जिनसे सरकार की शिथिलता टूटी है। यह भी देखना चाहिए। टीवी के सोशल मीडिया में बदलने से,उसके रायसीना में बदलने से बहुत फर्क आ रहा है। यह एक तरह का एक्टिविज्म है जर्नलिज्म नहीं है। उसमें भी खास तरह का एक्टिविज़्म है। इंटरनेट की धड़कन से टेलीविज़न चल रहा है न कि संपादक पत्रकार की हरकतों से।

तो हम दिल्ली गैंगरेप मामले में सिर्फ रिपोर्ट नहीं कर रहे थे। हम बहाव में बह रहे थे। चैनल जल्दी ही अपनी बनाई हुई कैटगरी से आज़ाद हो गए। तभी ल्यूटियन ज़ोन के कई बड़े पत्रकार इस बात से हैरान थे कि ये रायसीना तक कैसे जा सकते हैं, कैसे प्रधानमंत्री राष्ट्रपति से मिलने की बात कर सकते हैं, हमें तो इंटरव्यू मिलता नहीं, इन्हें प्रक्रिया प्रोटोकोल नहीं मालूम है। पीएम सिर्फ विदेश यात्रा से लौटते वक्त अपने प्लेन में मीडिया से बात करते हैं। वो या तो ऐसी बातें कह रहे थे या फिर इन बातों की पृष्ठभूमि में भीड़ की आलोचना करने लगे। उन्हें लगा कि ल्युटियन ज़ोन तो प्रोटेक्टेड जोन है यहां कैसे लोग आ सकते हैं वो भी बिना नेता के, वो भी बिना गरीब हुए, किसान हुए। अभिजित मुखर्जी ने तो बाद में डेंटेट पेंटेड की बात कही लेकिन इस भीड़ को कमोबेश इन्हीं शब्दों में पहले से भी खारिज किया जा रहा था। हो सकता है कि ये आलोचनाएं सही हो मगर ल्युटियन कंफर्ट ज़ोन में सिस्टम का पार्ट बन चुके या सिस्टम की आदतों को आत्मसात यानी इंटरनलाइज कर चुके कई बड़े पत्रकारों ने संदेह की नज़र से देखा। यह भी एक कारण तो था ही।
अब इस बहस में अखबार की रिपोर्टिंग को भी लाना चाहिए लेकिन वो मेरा विषय नहीं है। उनकी भाषा और प्रस्तुति पर भी बात होनी चाहिए जो हम नहीं करते हैं। लैनलों की रिपोर्टिंग नीयत में सही थी । वो आजकल चालाक नेता की तरह जनभावना भांप लेते हैं और बयान देने की तर्ज पर अभियान चलाने लगते हैं।  वो तो इसी भाव में रिपोर्ट कर रहे थे कि जैसे आंदोलन के साथ हैं। इस जनाक्रोश के साथ हैं लेकिन जो रिपोर्टिंग हो रही थी और जिस शैली में हो रही थी वो अपने आप में समस्याग्रस्त (प्रोब्लेमेटिक) है। आप उस टीवी से अचानक नारीवादी होने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं, जो चार महीने पहले करवां चौथ के मौके पर अपने डिबेट के एक बक्से में चांद को लाइव काट कर रखे हुए था। महिला एंकर तक करवां चौथिया लिबास या भाव में डूबी हुईं थीं। बता रही थीं कि करवां चौथ कैसे करें । टीवी तो भारतीय पंरपरा में नारी के गुण कर्तव्य और अवधारणाओं को इन त्योहारों के कवरेज से गढ़ता चलता है। कभी तो उसने सवाल नहीं किया कि देवी रूप का क्या मतलब है। तो वो रायसीना या जंतर मंतर से अपनी रिपोर्टिंग में देवी के रूप की कैसे आलोचना कर सकता है। बल्कि एंकर से लेकर रिपोर्टर तक की बातों में इस तरह की पंक्तियां आ रही थीं। जिस देश में देवी को पूजा जाता है उस देश में कैसे हो गया। ये भाव था। वही मानव संसाधन जो साल भर घोर पारंपरिक या कई मामलों में स्त्री विरोधी छवियों को गढ़ता है उसी को आप चार दिनों में नारीवादी मूल्यों के प्रति सचेत कैसे बना देंगे। यह ज्यादती होगी।

तो टीवी के पास कोई अपनी भाषा तो नहीं थी। उसके पास अपनी कोई छवि नहीं है। इतनी आलोचना होने के बाद सभी लैनलों पर एक शर्मसार बैठी हुई, सिसकती हुई नारी के ही ग्राफिक्स चल रहे हैं। सिलुएट के अंधेरे में गुम नारी की तस्वीर है। जैसे ही तीन मंत्रियों ने तीन बेटी होने की बात की एक चैनल पर स्टोरी ने क्लास वार के रूप में टर्न ले लिया। आपकी तीन बेटिया हर वक्त सलामी के पहरे में रहती होंगी, क्या वो ऐसे सुनसान बस स्टैंड पर जाती होंगी, बिना जाने कि उनकी क्या स्थिति है,लेकिन रिपोर्टर उनकी विशिष्टता को चुनौती देने लगा। थोड़ी देर के लिए वर्ग युद्ध छिड़ गया। बाद में यह बात भी आई कि बेटी का पिता होने से संवेदनशीलता विशिष्ठ हो जाए यह ज़रूरी नहीं है। दूसरी तरफ मैं लड़की हूं टाइप मेरठ फ्रेम की आत्मकथाएं चलने लगी। फर्स्ट पर्सन अकाउंट में। टीवी भी सोशल मीडिया की तरह फैला हुआ था। हालांकि इसी बीच वो एडवोकेसी भी कर रहा था लेकिन उसकी भाषा स्लोगन और छंदों में इतनी फंसी हुई लगी कि ऊब और आक्रोश के अलावा समझ की गुजाइश कम नज़र आ रही थी। हिंसा को ही एक्शन मान कर दिखाया गया। शर्म की ढलती शाम के ढांचे टूट रहे हैं, सहमी हुई सांसे बोल रही हैं, दुबके परिंदों की पांखें बोल रही हैं, अब कौन कहे कि दुबके परिंदे का मतलब क्या है। क्या अभी तक आप उन लड़कियों को दुबके परिंदे बोल रहे थे। आप ही जब ऐसा समझ रहे थे तो सरकार और सिस्टम और समाज की क्या बात करें। हालांकि टीवी इस मामले में अपनी भूमिका को सकारात्मक तरीके से देखेगा और कई मामलों में हुआ भी,उसके चाहते हुए और न चाहते हुए दोनों। लेकिन वही बात है जैसे कई लड़के जो खुद को अच्छा समझते हैं या जिन्हें लड़कियां भी अच्छा समझते हैं वो पूरी तरह से अच्छे नहीं होते कम से कम नारीवादी संदर्भ में। सबकुछ नाटकीय क्यों लगने लगता है ये समझ नहीं आता। कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे ही लगता है। यह लेख तमाम लैनलों को ध्यान में रखकर लिखा गया है।

अमानत के गुमनाम दोस्त के नाम

मुझे मालूम है 
तुम सच्चे दोस्त थे उसके,
चाहा था उसे जीने के लिए,
लड़े भी उसकी ज़िंदगी के लिए,
कितना चाहा होगा तुमने उसे,
कितना चाहा होगा उसने तुम्हें,
तुम दोनों ने कितना प्यार किया होगा,
कितने सपने रखे होंगे सिरहाने,
उन सबको हटाकर एक दिन
देखने का मन करता है,
जानने का मन करता है
बताने का मन करता है 
इक दोस्त ऐसा भी होता है 
चुपचाप अकेले में रोता है 
जान पर खेल कर लड़ता है
तुम्हारी आँखों में वो मंज़र 
दर्ज भी होगा और क़र्ज भी,
नहीं बचा सकने की पीड़ा,
तुम्हारी करवटों को कैसे कैसे,
काटती होगी रात भर,
तुम तो मुआवज़े के एलान से भी 
कर दिए गए हो बाहर,
तुम तो इंसाफ़ की लड़ाई से भी 
कर दिए गए हो बाहर,
तुम्हारा दर्द तुम्हीं में जज़्ब हो गया,
जैसे वो दफ़्न हो गई हमेशा के लिए,
हम सबकी नाकामियों में,
दोस्त,
मैं तुम्हारी दोस्ती को चूमना चाहता हूँ,
बाँहों में कस कर रोना चाहता हूँ,
दोस्त,
वो कितना तड़पेगी तुम्हारे लिए,
जन्नत या दोज़ख़ की दीवारों के पीछे,
जाने तुम उसे ढूँढा करोगे कहाँ कहाँ पर,
सिनेमा हाल की सीट पर,
मुनिरका के बस स्टाप पर,
तुमने जो प्यार खोया है,
तुमने जो दोस्ती पायी है,
मैं मिलना चाहता हूँ तुमसे, 
तुम्हारी चाहत के बचे हिस्से में,
अपनी चाहत का इम्तिहान देना चाहता हूँ ।

(ये उस दोस्त के लिए है जो ग़ायब है हमारे बीच होकर भी, जिसकी मोहब्बत अब लौट न सकेगी कभी, इंसाफ़ की तमाम लड़ाइयाँ जीतने के बाद भी)

झांसी का किला बना गुजरात-मोदी की दिलचस्प लड़ाई


एक तय सा लगने वाला चुनाव इतना सपाट भी नहीं होता जितना बताया जाता है गुजरात चुनाव की ऐसी भविष्यवाणियों के बाद भी चुनावी टक्कर कई तरह के उतार चढ़ाव और आशंकाओं से गुज़र रही है जानकार नतीजे का एलान कर स्टुडियो में नरेंद्र मोदी की दिल्ली की पारी पर चर्चा करने में खो गए हैं लेकिन नरेंद्र मोदी टेस्ट खिलाड़ी की तरह एक एक गेंद देख कर खेल रहे हैं उनकी निगाह सिर्फ़ चुनाव पर है और पारी बचाने वाले उस बल्लेबाज़ की तरह जिसकी एक चूक मैच का पासा पलट सकती है

इसीलिए नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव में थ्री डी टेक्नोलॉजी से ख़ुद को कई गुना मोदी में बदल दिया है वे लोगों से कहते हैं कि आपसे से हर कोई मोदी है उनके भाषणों के तेवर और रणनीतियों को देखें तो साफ लगता है कि वे इस मैच को जीता हुआ समझ कर नहीं खेल रहे हैं हालांकि उन्होंने कांग्रेस का समूल नाश का नारा दिया है और पोस्टरों में गुजरात के नक्शे पर चारों तरफ कमल खिला हुआ दिखाया जा रहा है लेकिन उनकी पुरानी आक्रामकता की जगह बचाव की मुद्रा वाली बल्लेबाज़ी दिखाई देती है शायद खिलाड़ी परिपक्व होने पर इसी तरह खेलना पसंद करता है वे दिन में कई सभायें करते हैं उनके भाषणों से लगता है कि इतनी व्यस्तता के बाद भी वे सोनिया गांधी,मनमोहन सिंह और राहुल गांधी को काफ़ी ध्यान से सुनते हैं जब ये लोग अपना भाषण समाप्त कर दोपहर तक दिल्ली लौट जाते हैं तब मोदी उनकी हर बात को हास्य में बदल देते हैं जैसे बिहार में लालू यादव खूब हंसाते थे वैसे बल्कि इस कला में मोदी लालू से भी दस क़दम आगे हैं वे विरोधी की हर बात को ऐसे घुमा देते हैं कि काउंटर करने का मौका भी नहीं मिलता और लोगों को हंसा कर चल देते हैं उनके भाषणों में राजनीतिक रसरंजन के तत्व बहुत हैं

शायद कांग्रेस भी नरेंद्र मोदी के इस हुनर को देखकर रणनीतियां बना रही है वो मोदी को कम से कम मौका देना चाहती है जानकार कहने लगे थे कि राहुल गांधी हार के भय से गुजरात नहीं रहे हैं उत्तर प्रदेश में दो सौ से ज्यादा रैलियां करने वाले राहुल गांधी गुजरात में एक भी रैली नहीं कर रहे लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस राहुल गांधी को आखिरी दौर में उतार कर आज़माना चाहती थी ताकि मोदी को राहुल को घेरने के लिए कम से कम मौका मिला लेकिन ऐसा हुआ नहीं राहुल ने कहा कि हमारी सरकारें टेलिकाम क्रांति लाएंगी तो मोदी ने पलटवार करते हुए लोगों से पूछ दिया कि आपको मोबाइल चाहिए या नौकरी तो जवाब में तालियां बजने लगती है कांग्रेस के बड़े नेता हास्य में कमज़ोर हैं वे अपना भाषण गंभीरता से देते है और मोदी उनके भाषणों को कहीं ज़्यादा गंभीरता से लेते भी हैं उनके किसी भी भाषण लीजिए सोनिया मनमोहन और राहुल का ख़ूब ज़िक्र होता है

इससे उनका आत्मविश्वास तो झलकता है पर इरफान पठान को मंच पर लाकर वो अपनी कमज़ोरी ही ज़ाहिर कर रहे हैं सद्भावना यात्रा के दौरान टोपी पहनने से मना करने वाले मोदी ने खुद ही अहमद मियाँ पटेल का राग छेड़ा वो बार बार कांग्रेस को अपनी मांद में बुला रहे हैं कांग्रेस ने दब तूल नहीं दिया तो मुंबई की शाहिन का किस्सा उछाला कि महाराष्ट्र में फेसबुक पर लिखने के कारण शाहिन को जेल भेेजा और अब शाहिन गुजरात में सुरक्षित महसूस करती है मोदी ने आसानी ने शाहिन के गिरफ्तार होने की पृष्ठभूमि को किनारे कर दिया कि बाल ठाकरे की अंतिम यात्रा पर मुंबई बंद को लेकर शाहिन ने सवाल किया था तो कैसे शिव सैनिकों ने शाहिन उसकी दोस्त को धमकाया था बाद में जब शाहिन ने गुजरात में बसने से इंकार किया तो मोदी ने शाहिन के मुद्दे को छोड़ने में ज़रा भी देरी नहीं की। मोदी बार बार कह रहे हैं कि गुजरात में अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की राजनीति ख़त्म हो गई है लेकिन क्या इरफान पठान को मंच पर लाना सिर्फ़ एक क्रिकेटर के साथ साझा करना ही समझा जाएगा मोदी तरह तरह से चुनौती दे रहे हैं मगर इस चुनौती के केंद्र में विकास ही है

इस बहाने यह हो रहा है कि दोनों पक्षों के नेता एक दूसरे को विकास की अवधारणाओं को जमकर चुनौती दे रहे हैं यह बहुत अच्छा है गुजरात का चुनाव थोड़े अपवादों को छोड़ दें तो मूल रूप से विकास के मुद्दे पर हो रहा है भाषणों में आंकड़ों की भरमार है इसी बहाने जनता भी ऐसे मुद्दें के प्रति संवेदनशील हो रही है हमारे देश में विकास की राजनीति की शुरूआत मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार जाने से हुई थी जब बिजली सड़क पानी के सवाल पर राजनीति ने दिशा बदली थी और तब से इन्हीं तीन सवालों पर कई सरकारें चली गईं और कई जीत कर दोबारा तिबारा लौटती भी रही हैं इस राजनीति के करीब दो दशक होने को रहे हैं, देखना चाहिए कि गुजरात का चुनाव बिजली सड़क पानी के सवालों से आगे विकास के उन मुद्दों पर क्या जनादेश हासिल करता है जिनका संबंध विकास की अवधारणा से है यह तभी होगा जब गुजरात के बाद के चुनाव भी विकास का मतलब सिर्फ़ बिजली सड़क पानी तक सीमित रह जाए नौकरी, पर्यावरण, भूमि अधिग्रहण के सवालों पर बात होने लगी है

भाषण चुनावी राजनीति की ऊपरी सतह है इससे अंदाजा मिलता है कि नीचे की सतह पर सियासत किस तरह से करवट ले रही है गुजरात में कांग्रेस कमज़ोर बताई जा रही है लेकिन नरेंद्र मोदी उसी कमज़ोर बताई जाने वाली कांग्रेस से काफ़ी शिद्दत से लड़ रहे हैं ताकि जीत का स्वाद भी ऐसे हो कि लगे कि बांग्लादेश की टीम को हराकर लौट रहे हों कांग्रेस भी इस चुनाव को हारी हुई लड़ाई समझ कर नहीं लड़ रही है सही है कि कांग्रेस बिना चेहरे की टीम से लड़ रही है, कई बार ऐसे अभ्यासों से ही कोई चेहरा निकल आता है 2002 और 2007 में कांग्रेस ने औपचारिकता ही निभाई थी इस बार फ़र्क यह है कि पचास ओवर तक टिका रहा जाए ताकि कम से कम इतना तो लगे कि मुकाबला हुआ इस बार कांग्रेस लड़ रही है तभी मोदी कांग्रेस से लड़ रहे हैं

इसलिए जानकारों के फैलाये इस भ्रम में रहें कि गुजरात में चुनाव नहीं हो रहा है बल्कि इसी बार गुजरात में चुनाव हो रहा है बीजेपी और कांग्रेस दोनों की तैयारियों से ऐसा नहीं लगता है कि जीत का एलान हो चुका है गुजरात एक दिलचस्प चुनावी दौर से गुज़र रहा है गुजरात के चुनावों में रुचि बना़ये रखिये नतीजा आने से पहले मैच का मज़ा तो लीजिए

(यह लेख पिछले हफ्ते राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है)