मदीना ढाबा संग संग शिवा ढाबा


शाकाहारी हैं तो क्या हुआ बाज़ार के सेकुलर स्पेस पर सबका दावा होता है। मुरादाबाद हापुड़ के बीच किसी जगह पर आपको यह अद्भुत नज़ारा दिखेगा। शिव ढाबा नाम के कई ढाबे आपस में असली होने की होड़ करते हुए भी सेकुलर बने हुए हैं। कोई बीस साल पुराना है तो किसी की जगह बदल गई है। शायद शिव नाम के किसी मुखिया का परिवार बंट गया होगा या फिर भगवान शिव इतने बड़े शाकाहारी ढाबे के ब्रांड बन गए होंगे कि तीन तीन ढाबे वालों ने थोड़ा थोड़ा शिव का अंश लेकर असली शिव होने का दावा ठोंक दिया होगा।


लेकिन इस सड़क की ख़ास स्थिति ने ढाबे के बाज़ार को अनोखी मंज़िल दे दी है। यह सड़क सीधा आपको दिल्ली ले जाती है और मामूली दायें बायें होते हुए अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड़्डा। पूरे रास्ते में आपको हज मुबारक की स्ट्रीकर वाली गाड़ियां दिखेंगी। टवेरा,इनोवा और वैगन आर टाइप की कारें हाजियों को विदा करने जा रहे रिश्तेदारों से भरी होती हैं। अब ये रास्ते में कहीं न कहीं रूकेंगे तो सही। चाय पानी के लिए। तो शिव ढाबा वाले कैसे इतने बड़े बाज़ार को हाथ से जाने दें। इसलिए मामा यादव जो किसी एक शिव ढाबा के मालिक हैं नमाज़ी टोपी और कंधे पर किफ़ाया रखे नज़र आ रहे हैं। मामा यादव ने नमाज़ पढ़ने के सुविधा भी उपलब्ध करा दी है। और आपको विश्वसनीय सेकुलर लगें इसलिए समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान भी होर्डिंग पर नामूदार हैं। शिवा ढाबा की तमाम होर्डिंग पर हज यात्रियों को तहेदिल से मुबारकबाद दिया जा रहा है। शाकाहारी ढाबा है लेकिन हज यात्रियों को ये न लगे कि यहां नहीं रुका जा सकता है इसलिए पुराने हिन्दू होटलों की तरह ठसक नहीं है। सब पर हज मुबारक लिखा हुआ है। बस इतना ज़्यादा सेकुलर हो गए हैं कि हज में एक नुक़्ता ज़्यादा लगा दिया है। हज की जगह हज़ लिख दिया है।


लेकिन इस प्रेम के पीछे प्रतियोगिता का गहरा भाव है। अस्तित्व की लड़ाई भी है क्योंकि इस मार्ग पर कई ऐसे ढाबे खुल गए हैं जो मुस्लिम पहचान लिये हुए हैं। इतना ज़्यादा कि एक ढाबे का नाम लिखा था चौधरी मूस्लिम(मुस्लिम नहीं) ढाबा। मुरादाबाद और अन्य मुस्लिम इलाकों से गुज़रने वाली यह सड़क कई मुस्लिम पहचान वाले ढाबों को ख़ूब मौका दे रही है। आप इसे मुस्लिम समाज के कारोबारियों में आ रहे नए आत्मविश्वास की तरह देखिये। जैसे शिव ढाबे वालों का आत्मविश्वास है कि वे हज यात्रियों को भी अपना ही ग्राहक समझ रहे हैं। नमाज़ की सुविधा दे रहे हैं। लेकिन अल शमीम ढाबा और शादाब ढाबा को अलग से नहीं लिखना पड़ रहा है कि हमारे यहां नमाज़ की भी सुविधा उपलब्ध है। हो सकता है कि गाड़ी चलाते वक्त मेरी निगाह से यह लाइन ओझल हो गई हो मगर दिल्ली मुरादाबाद मार्ग पर कई मुस्लिम ढाबों की उपस्थिति पहचान के नए आत्मविश्वास के दौर का भी प्रतीक है । कम से कम वे इस नाम के साथ शिव ढाबा की ग्राहक खींचने की क्षमता को चुनौती देने आ गए हैं। बिस्मिल्लाह ढाबा भी है। लेकिन शिव ढाबा की तरह मदीना ढाबा का नाम खूब उभर कर सामने आ रहा है। मदीना ढाबा पंजाबी ढाबा की तरह नया ब्रांड हो गया है। कई जगहों पर मदीना ढाबा दिखा। कोरमा,नेहारी और इश्टू की लज़ीज़ तस्वीरें शान से होर्डिंग पर प्रदर्शित की गई हैं जैसे कई जगहों पर गणेश ढाबे वाले अपनी खीर और पनीर का प्रदर्शन करते हैं। मदीना ढाबा किसका है मालूम नहीं लेकिन होर्डिंग पर राजीव चौधरी का भी नाम है और मोहम्मद आलम का भी।


यह नया हिन्दुस्तान है जो पुराने हिन्दुस्तान के बीच किसी किसी कोने से निकलता रहता है। इनके बीच हरियाणा के मुरथल वाले भी मुरथल नाम का ढाबा खोल रहे हैं। मुरथल के साथ बड़ा अन्याय हो गया है। दिल्ली चंडीगढ़ मार्ग पर कई फ्लाईओवर बन जाने के कारण मुरथल पराठे वालों का ढाबा मुख्य मार्ग से कट गया है। इसलिए वे मुरथल ब्रांड के साथ फरीदाबाद मथुरा मार्ग और दिल्ली मुरादाबाद मार्ग पर अपना वजूद खोज रहे हैं। बीकानेरवाला और मोगा वालों ने अपना एसी ढाबा भी खोल रखा है। ढाबों को अपना अस्तित्व बचाने के लिए पहचान का सहारा लेना बिल्कुल जायज़ है। पहचान भी एक ब्रांड है जैसे कोई ब्रांड पहचान। मुस्लिम ढाबा और शिवा ढाबा का स्वागत। एक ही स्पेस में मदीना और शिवा की होड़। वाह। अति सुन्दर।

जब मंजू ने पहली बार हाल में सिनेमा देखा

अरे मंजू आई नहीं आज शाम, क्या हुआ ? आज आई नहीं तुम । रात के साढ़े आठ बज रहे हैं। नयना ने जब मंजू को फोन किया तो लगा कि वो बीमार हो गई है। क्यों मंजू तबीयत तो ठीक हैं न। नहीं दीदी। घबराहट बढ़ गई है।   कुछ लौउकिये नहीं रहा है । क्या हो गया तुमको। दीदी हाल में सिनेमा देखने चले गए थे। उहें अंधेरा हो गया,आ जब बाहर निकसे न अउर अंधेरा लगने लगा। कुछ बुझा नहीं रहा था । घबराहट बढ़ गई त हम घर चले गए । सोसायटी की गुप्ताइन आंटी है न उहे सिनेमा ले गई थी । हम पहीलका बार हाल में सिनेमा देखे । अंधेरा हो गया था । पर्दा पर सब बड़का बड़का लउक(दिख) रहा था । बाप रे दीदी एतना ठंडा था कि क्या कहे ।

अगले दिन जब मंजू मिली तो मैं पूछने लगा । गोरखपुर की मंजू गाँव से लेकर इस महानगर तक के सफ़र में, बचपन से लेकर पचास की होने के सफ़र में कभी सिनेमा हाल ही नहीं गई थी । रसोई में खड़ा पूछने लगा कि फिर मंजू क्या हुआ । अरे बाबू का बतायें । ओ माई गॉड बोल के सिनेमा रहल (था), जानते है बाबू, हीरो एकदम्मे से ताड़ लेखा बड़ा हो ग़या । हम त घबराहट में अंखवे बंद कर लिये । टीवीया पर त सब ननकी ननकी(छोटा छोटा) लगता है न, लेकिन हालवा में हउ बड़का बड़का। मंजू अपने रौं में आ गई थी। बोले जा रही थी कि छह गो मेमसाहब थीं आ हमनी तीन जाना नौकरानी । लेकिन उ दुन्नो नौकरानी लोग सिनेमा देख चुकी थी । गुप्ताइने आंटी और एक सौ पांच वाली मैडम बोलने लगी कि मंजू चलो सिनेमा देख के आते हैं। सब बुढ़ी बुढ़ी हैं न त हमनी नौकरानी सबन को ले गईं थी। लेकिन हम त बाबू अन्हार (अंधेरा) से ही घबरा गए। पसीना होने लगा, बाकी ठंडा बड़ी था। एसी चल रहा था का तो। बताते बताते मंजू शर्माने लगी , पहले मुँह पर आँचल रखा फिर हंसी को दबाते हुए दीवार की तरफ मुड़ कर लजाने लगी। उसके ज़हन में सिनेमा हाल का अनुभव फिर चलने लगा । शायद किसी अपराध की तरह कि मैंने हाल में सिनेमा देख लिया है। अच्छा तो इसलिए नहीं आई तुम। नहीं बाबू जब हॉलवा से निकले न त अन्हार (अंधेरा) हो गया । कुछ लउक नहीं रहा था । हमको लगा कि रस्तवे भुला जाएंगे त एहि से हम सोझा (सीधे) घर चले गए । लाजे किसी को बताए नहीं ।

मंजू हंसे जा रही थी । कभी लजाती तो कभी मुस्कुराती । अंत में मैंने कह दिेया कि मंजू टिकट जानती हो कितने का था, सौ रुपये का । बस पीछे पीछे कमरे तक चली आई, दीदी बाबू सही कह रहे हैं कि सौ रुपये का टिकस था । अब वो सिनेमा से ज़्यादा अवाक हो गई थी । बोलती बंद हो गई मंजू की । ताड़ जैसे हीरो । हम गाँव के लोगों के लिए ऊंचाई लंबाई का स्थानीय पैमाना ताड़ ही है । तड़कूल का गाछ । अपार्टमेंट यानी घरों की ऊंचाई ने ताड़ को छोटा कर दिया है लेकिन अब भी ताड़ किसी मंजू के  जीवन में ऊँचाई का सबसे बड़ा पैमाना है । इस बात के बावजूद कि दसवीं मंज़िल पर वो यह अनुभव मुझे बता रही थी । शुक्रिया उन बूढ़ी होती मेमसाहबों का जिन्होंने अपनी नौकरानियों को सिनेमा ले जाने का फैसला किया। सपोर्ट के लिए ही सही ।

अंग्रेज़ आ गया है।

खोड़ा से मीनू रोज़ बिना नागा काम करने आती हैं। गंगा की समय प्रतिबद्धता लाजवाब है। मैं सत्याग्रह और अहिंसा पर स्क्रिप्ट लिखने में व्यस्त था। अचानक मीनू अंदर आई और खुशी से लबालब नयना से बोलने लगीं। अरे भाभी मेरी बेटी को बेटा हो गया है। पता है सास ने एक हज़ार एक रुपये नर्स को दे दिये। उसकी सास बहुत ख़ुश है। तो अब सब ठीक हो गया मीनू घर में, हां भाभी, पोता होते ही बेटी से सबका व्यवहार बदल गया है। तभी तो हज़ार रुपये दिये नर्स को। क्या बताऊं, एक दम अंग्रेज़ जैसा है। उनकी फैमिली में तो सब कट हैं। ये एकदम कट नहीं है। तब मुझे मुड़ना पड़ा और पूछना पड़ा कि कट क्या होता है। कट मतलब किसी की शक्ल अच्छी नहीं है। सब के सब सांवले भी हैं। लेकिन मेरे नाती की शक्ल भैया बहुत अच्छी है। सही कह रही हूं लगता है अंग्रेज़ ही आ गया है। तो अब ठीक है न। सास तंग तो नहीं करेगी बेटी को। नहीं अब नहीं करेगी।

यही मीनू दो महीने पहले भी आई थी। दहाड़ मार कर रोने लगी कि भैया कुछ करो। मेरी बेटी को पति और ससुराल वाले बहुत मारते हैं। दहेज़ में तीन लाख रुपये दे चुकी हूं। घर घर जाकर काम कर अपनी आजीविका चलाने वाली मीनू ने तीन लाख रुपये दहेज़ के कहां से लाए। जितना कमाती हूं सब ससुराल वालों को दे आती हूं। वे लोग और मांग रहे हैं। आप पुलिस वाले से बोल कर कुछ करा दो। बहुत तक़लीफ़ होती है जब बेटी को मारते हैं तो। देखा नहीं जाता है भैया। कभी यह काम किया तो नहीं है लेकिन उस दिन बोल ही दिया मीनू तुम दोनों को घर ले आना। पहले बात करूंगा और तुमको लगता है कि पुलिस से बात करने से कुछ हो सकता है तो चलूंगा। करोलबाग के एस एच ओ से मिलकर बात करते हैं। मीनू रोज़ आती रही मगर फिर कभी इस बात को नहीं छेड़ा।
मीनू आज भी खुश ही थी तो फिर मैंने पूछ लिया कि अब बेटी के साथ सब ठीक है। नहीं भइया। फिर से वही हो गया। पोता मिल गया न तो सास को लगता है कि मेरी बेटी चली भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है। उसको आपरेशन हुआ है और ज़ोर कर रही है कि नहा ले। सोच रहा हूं कि समाज में व्याप्त हिंसा कैसे जाएगी। कब जाएगी। आम ज़िंदगी में कितनी तक़लीफ़ है। इन मर्दों का कुछ करो भाई।
(मैंने नाम बदल दिया है। मीनू असली नाम नहीं है)

एक किराने वाले की कहानी

ध्यान से पढ़ें। किराना दुकानदार से मिलकर आ रहा हूं।उनकी जानकारी पर हैरान हूं। जो कहा वो लिख रहा हूं। उसने एक मिसाल दी। तीन चार साल पहले जब आशीर्वाद आटा आया तो थोक में गेहूं 11.50 रुपये प्रति किलो गेहूं मिल रहा था। उसी दाम पर हम आटा चक्की वाले आपको 130 रुपये प्रति दस किलो बेच रहे थे। तब हमारा 140 रुपये प्रति दस किलो था। चूंकी आशीर्वाद के पास पूंजी थी तो कम में बेचा और बाज़ार पर छा गया। लेकिन आज आशीर्वाद दस किलो आटा 240 रुपये का बेचता है और हम 180 रुपये का। थोक में गेहूं 15.50 रुपये प्रति किलो है। तो किसान को कहां ज़्यादा मिला। उपभोक्ता तो ज़्यादा दाम पर ही ख़रीद रहा है। इसलिए किसान के भले की बात पल्ले नहीं पड़ रही है। इतने सालों में दस किलो ग्राम आटे का दाम हमारी चक्की पर 40 रुपये बढ़ा और आशीर्वाद ने 110 रुपये बढ़ाये। इसने जमे जमाए शक्तिभोग की कमर भी तोड़ दी। उसी तरह से टाटा ने मूंग दाल लांच किया है। हाई क्वालिटी की है जो बाज़ार में 80 रुपये प्रति किलो में मिल रही थी । इससे खुदरा मूंग दाल वाले ग़ायब हो गए और अब टाटा की नई पैकेट 100 रुपये प्रति किलो की आ रही है। उसने कहा कि बड़ी कंपनियों के पास घाटा सहने की शक्ति है। जब पड़ोस में मोर का सुपर स्टोर खुला तो हम बर्बाद हो रहे थे लेकिन मंदी आ गई तो लोग दाम का हिसाब लगाने लगे। तब हमारा बिजनेस पिक अप करने लगा लेकिन तभी एक दूसरा मल्टी स्टोर ईजी डे में आ गया। हम पर फिर दबाव बढ़ गया। हम खत्म नहीं हो जायेंगे मगर ज़रूरत क्या है। यह क्यों कहा जा रहा है कि उपभोक्ता और किसान को फायदा होगा। जहां ज़रूरत है वहां निवेश करो। मेट्रो में निवेश का किसी ने विरोध किया। यह भी सही है कि मेट्रो के आने से कारों की बिक्री कम नहीं हुई लेकिन किसी की पूंजी की ताकत से हम कब तक लड़ेंगे। वालमार्ट जहां पर ताकत से खुलेगा वहां हम बर्बाद हो जायेंगे। अभी जो स्टोर खुलते हैं वो ज्यादा दिन नहीं टिक पा रहे हैं। इसलिए हम डूबते उतराते रहते हैं।

एक दुकानदार अपनी समझ से बोले जा रहा था। पूछा कि आपको जानकारी कैसे मिलती है। कहा कि टीवी पर बकवास चलता है हम पेपर ध्यान से पढ़ते हैं।

टूट रही है कमर शहर की

राजस्थान और मध्यप्रदेश के कई शहर बारिश से तबाह हैं। बारिश के वक्त जो हालत मुंबई और दिल्ली की हुआ करती है वही हालत जयपुर, अलवर,सीकर और भोपाल की भी होने लगी है। जयपुर ने तीस सालों में सबसे अधिक बारिश देखी तो मरुभूमि में बूंदों के गिरने का उत्साह कई तरह की आपदाओं की तस्वीरों में ढल गया। चंद दिनों की बारिश से निपटने के लिए सेना बुलाने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ठीक ही कहा कि जयपुर में बाढ़ कहां आई है। दरअसल यह बाढ़ तो है नहीं यह तो उन शहरी ढांचों के चरमराने से बहने वाला मवाद है जिसे व्यक्त करने के लिए बाढ़ के अलावा कोई शब्द नहीं है। हम संज्ञा सर्वनाम और विशेषण की जगह अगर अपने शहरों को ठीक से देखने लगे तो जवाब अपने आप मिलता चला जाएगा। आखिर उस राजस्थान के शहरों की हालत इतनी बुरी क्यों हुई जो हिन्दुस्तान के शहरीकृत राज्यों की सूची में नीचे स्थान पाता है। मुंबई और दिल्ली की तरह भोपाल क्यों तबाह हो गया? क्या यहां का शहरी ढांचा भी अब एक दिन की बरसात झेलने के लायक नहीं रहा? जिस जयपुर को १७२७ में योजनाओं के अनुसार बसाया गया था वो आज कहां पहुंच गया है। क्या उसके बाद जयपुर ने आज की बढ़ती आबादी और उसकी ज़रूरतों के अनुसार खुद को बसाया है?
यह सवाल तो सिर्फ जयपुर से ही नहीं बल्कि भारत के ज्यादातर शहरों से पूछा जाना चाहिए। कागज़ पर  बहुत योजनाएं हैं लेकिन लगभग हर शहर नियोजन की कमी और अतिक्रमण की ज़्यादती का शिकार हो रहा है। जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार हम तेजी से शहरी हो रहे हैं लेकिन हमारे शहर उस तेज़ी से तैयार नहीं हो पा रहे हैं। यह तब है जब भारत में शहरीकरण करीब करीब शुरूआत की अवस्था में हैं। इतने बड़े देश में सिर्फ पैंतीस बड़े शहर हैं जिसकी आबादी दस लाख या दस लाख से अधिक है। कुल आबादी का तीस फीसदी हिस्सा ही शहरों में रहता है। बिल्डरों की बसाई कालोनी शहर की प्लानिंग की संकल्पना का हिस्सा नहीं बन सकती। सोसायटियों के बाहर जो शहर, सड़कें, ड्रेनेज, फुटपाथ, स्कूल, खेलने के मैदान हैं इन सबकी कोई ठोस प्लानिंग बराबर से नहीं दिख रही है।
दिल्ली एक ऐसा महानगर है जिसकी नब्बे फीसदी जनता आबादी शहरी कही जाती है। शत प्रतिशत शहरी क्षेत्र। लेकिन यहां भी बारिश के दिनों में तबाही मच जाती है। सड़कों पर पानी भर आता है और ड्रेनज की सफाई की दिखावटी समीक्षा बैठकें होने लगती हैं। इतना खुला शहर होने के बाद भी इसकी यह हालत है। फ्लाईओवर और मेट्रो कायम करने से शहरी ढांचे की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं हो जाती हैं। हमने संसाधनों के इस्तमाल की कोई शहरी संस्कृति का विकास नहीं किया है। तालाबों का लोग ही अतिक्रमण करते हैं और फिर राजनीति से भरण पोषण की मांग करते हैं। अतिक्रमण हर शहर की पहचान है क्योंकि जिस तेजी से आबादी गांवों से शहरों में शिफ्ट हो रही है उसे रखने के लिए पहले से मौजूद शहरों में कोई व्यवस्था नहीं है। लिहाज़ा आप किसी भी शहर में देखिये, किरायदारों को जगह देने और उनसे कमाने के चक्कर में मकानों पर कैसे टेढ़े मेढ़े मकान बन गए हैं। शौच की भयंकर समस्या है। मैं रोज़ दिल्ली शहर में शौच के लिए जाती हुई महिलाओं को सड़क पार करते देखता हूं। किसी भी शहर में जाइये महिलाओं के लिए शौच की कोई व्यवस्था नहीं है।
कोरपोरेटर या पार्षद हमारे शहरी समाज का सम्मानित हिस्सा नहीं बन सके हैं। इनका काम भी राजनीतिक दलों की रैलियों के लिए अतिक्रमित बस्तियों से भीड़ लाने भर का रह गया है। इनकी मांगें कभी शहरी विकास मंत्रालय तक ठोस रूप में जगह हासिल नहीं कर पाती। हम इन्हें शहर के विकास के लिए ज़रूरी एजेंट के रूप में नहीं देखते। यहां तक कि नगर निकाय चुनावों में हम अपने शहर के स्वरूप और समस्या को लेकर गंभीर बहस और जवाबदारी की मांग तक नहीं करते। ज़ाहिर है हमारे शहर सबकी उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। जिन जिन इलाकों में पार्षदों की भूमिका अच्छी रही है वहां विकास के काम हुए हैं। दिल्ली ने इस समस्या को रेजिडेंट वेलफेयर समितियों को कुछ अधिकार देकर बहुत हद तक संभाला है लेकिन फिर भी शहर के स्तर पर योजनाओं की व्यापक कमी दिखती है। जो आप जयपुर से लेकर भोपाल तक में देख सकते हैं।
हमारी नाकामी से बारिश बदनाम हो रही है। आसमान से गिरती बूंदों को सोखने के लिए कहीं मिट्टी नहीं बची है। फुटपाथ तक कंक्रीट के बन चुके हैं। सड़कें भी अब सीमेंट की बन रही हैं। गलियों में भी पार्षदों को लगता है कि सीमेंट की सड़क विकास की नई पहचान है। नाली के ऊपर सड़क बनाकर वोट से काम हो जाएगा। लेकिन हमें यह समझना होगा शहर इन नालियों के ज़रिये सांस लेता है। इनकी सफाई का अभियान तभी क्यों होता है जब बारिश आती है। आम शहरी होने के नाते हमने क्या गुटका या प्लास्टिक की थैलियों को नालियों में बहने से रोका है। हालत यह हो गई है कि शहरी जानवर अब घास की जगह प्लास्टिक चरने लगे हैं। यह सारी बातें आपको मालूम हैं। आप तभी गुस्सा ज़ाहिर करते हैं जब नाली का पानी आपके घर आता है। जयपुर हमारी पहचान है तो हम जयपुर के लिए कौन सी पहचान कायम कर रहे हैं। यही सवाल हर शहर में अब लोगों से पूछा जाना चाहिए।

हमारे शहर रोज़ाना संकट से गुज़र रहे हैं। मामूली भीड़ पार्किंग की समस्या को विकराल कर देती है। अभी तक हम अपने शहरों के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का विश्वसनीय सिस्टम नहीं विकसित कर पाए हैं। मेट्रो को ही अंतिम विकल्प मान लिया है क्योंकि यह विकास के प्रतिमान के रूप में दिखता है। दिल्ली में मेट्रो के बनने के बाद भी सड़कों से भीड़ खत्म नहीं हुई हैं। आए दिन हम पानी के संकट से गुज़र रहे हैं। नगरपालिकाओं के पास पानी नहीं है और बाज़ार में पानी का करोड़ों का कारोबार हो रहा है। ग़रीब आदमी को सड़क पर पानी भी नहीं मिल रहा है। क्या हमारे शहर सिर्फ बहुमंज़िला इमारतों में रहने वाले अमीर मध्यमवर्ग के लिए ही बने हैं। पूरी दुनिया में अब यह नई थ्योरी चल रही है कि भीड़ भाड़ वाले इलाके आर्थिक रूप से ज्यादा उपयोगी होते हैं। ये शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। क्या हम अपनी शहरी भीड़ को बेहतर सुविधाओं के बल पर आर्थिक संभावनाओं में नहीं बदल सकते? विकास को लेकर हमारा सब्र समंदर जैसा है मगर घुटने भर पानी का जमाव हमें ऐसे कूदने के लिए बेचैन कर देता है जैसे हम इनके कारण को जानते ही न हों। यह आसमान से आया ज़लज़ला नहीं है बल्कि जो आप जयपुर या भोपाल में देख रहे हैं उसे हम सभी ने पैदा किया है।
(राजस्थान पत्रिका के लिए लिखा था)

सोशल मीडिया : माध्यम दोषी है या मानसिकता

सरकार और सोशल मीडिया के विवाद की गहराई में जाने के लिए पाठकों से गुज़ारिश है कि वे इस लेख को पढ़ने के बाद थोड़ी मेहनत और करें। अगर आपमें से चंद लोग भी इंटरनेट तक पहुंच रखते हैं तो गूगल में आफ्टर दि रायट्स टाइप करें। यह सौ से अधिक पन्नों की रिपोर्ट है जो पिछले अगस्त लंदन में हुए दंगों पर तैयार की गई है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के कहने पर बनी एक कमेटी ने दंगों के कई कारणों की पड़ताल करते हुए सोशल मीडिया और मुख्य धारा की मीडिया के बारे में भी थोड़ी बहुत टिप्पणी की है। आप जब यह रिपोर्ट पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि कैसे वहां की कमेटी दंगों के कारणों की वृहत जांच करती है। यहां तक कि बच्चों अभिभावकों के संबंधों, स्कूल से लेकर तमाम सरकारी एजेंसियों से समाज के रिश्ते में आई दरार,उनके प्रति अविश्वास,अमीरी ग़रीबी में बढ़ती खाई और बाज़ार का दबाव जैसे कारणों को दंगों से जोड़ती है। आप हैरान हो जाएंगे कि रिपोर्ट के अनुसार पचासी फीसदी लोग मानते हैं कि युवाओं को टारगेट करने वाले विग्यापनों के दबाव ने महंगे और ब्रांड उत्पादों की लूट हुई। इसके समाधान में सत्तर फीसदी लोगों ने माना है कि इन विग्यापनों को सीमित किया जाना चाहिए। किसी ने सोशल मीडिया को मुख्य कारण नहीं बताया है। ये और बात है कि यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर एकाध टिप्पणी करती है।

असम और बंगलुरू से पहले लंदन दंगों की रिपोर्ट की टिप्पणी करने की मंशा यह है कि आप जान लें कि कैसे हिन्दुस्तान में सही कारणों को पता लगाने की बजाए एक खलनायक की पहचान कर ली जाती है और उसी के आस पास राजनीति घूमने लगती है। न तो आपको कारणों का पता चलता है और न समाधान का। हर राजनीतिक दल की सरकार का यही रिकार्ड है। आफ्टर दि रायट्स रिपोर्ट में सोशल मीडिया के बारे में जो टिप्पणी की गई है वो बस इतनी है कि दंगे फैलने में इनकी भूमिका थी लेकिन कारण महत्वपूर्ण थे, माध्यम नहीं। वर्ना इसी दौरान मेट्रोपोलिटन पुलिस के ट्वीटर अकाउंट को फौलो करने वालों की संख्या ४५०० से बढ़कर ४२००० नहीं हुई होती। मतलब साफ है कि लोग सही जानकारी के लिए भी ट्वीटर का इस्तमाल कर रहे थे। रिपोर्ट में सुझाव है कि पुलिस को अपनी संचार प्रणाली में सुधार लाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना चाहिए। जबकि यही रिपोर्ट मुख्य धारा की मीडिया पर गंभीर टिप्पणी करती है। कहती है कि एक ही तस्वीर बार बार दिखाने से और कई बार सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों को ख़बरों का आधार बनाने से स्थिति बिगड़ी। ज़रूरी है कि ऐसे वक्त में सख्त संपादकीय गाइडलाइन का पालन होना चाहिए क्योंकि यह देखा गया है कि सामाजिक राजनीतिक तनाव की स्थिति में लोग स्थानीय रेडियो और टीवी स्टेशनों पर ज़्यादा निर्भर होने लगे थे। ऐसे वक्त में उनका भरोसा मुख्यधारा की मीडिया पर बढ़ जाता है।


हिन्दुस्तान में चल रहे विवाद पर आने से पहले इतना कहना इसलिए ज़रूरी था ताकि साफ हो सके कि हम आज भी अपने पूर्वाग्रहों आशंकाओं को ही सच मानते हैं और उन्हीं की जड़ों की तलाश में अनाप शनाप कार्रवाई करने में यकीन रखते हैं। यह काम हम व्यक्तिगत जीवन से लेकर राजनीतिक और सरकारी संस्थाओं में हर जगह करते हैं। असम में जो कुछ हुआ और उसकी प्रतिक्रिया में देश भर में जो कुछ हुआ उसके मूल में सोशल मीडिया कम,हमारी व्यवस्थाएं ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं। क्या असम के भीतर पांच लोग सोशल मीडिया के कारण विस्थापित हुए या फिर सरकारी और राजनीतिक संस्थाओं के नाकाम होने के कारण इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी हुई। क्या सरकार ने किसी भी स्तर पर यह पता लगाने में तेज़ी दिखाई कि जो ज़िम्मेदार है उसे पकड़ा जाए ताकि विस्थापित हुए पांच लाख लोगों में सरकार के प्रति भरोसा हो और वे अपने गांव घरों की तरफ लौट पड़े। जब असम जल रहा था तब सरकार ने ऐसी त्वरित कार्रवाई की। उसकी नींद तो तब टूटी जब बंगलुरू से हज़ारों की संख्या पूर्वोत्तर के हमारे भाई बहन शहर से पलायन करने लगे। उनका यह कदम हमारी सरकार से लेकर सोच तक पर गहरा तमाचा था। सरकार ने एस एम एस के ज़रिये फैल रहे अफवाहों को तात्कालिक कारण माना और कई साइट्स से लेकर ट्वीटर अकाउंट को बंद करने के आदेश टाइप किये जाने लगे।
अब सवाल यह उठता है कि माध्यम दोषी है या मानसिकता। सोशल मीडिया के आगमन और प्रचलन के बहुत पहले शर्मनाक हिंसक दंगे हो चुके हैं जिसकी ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हमारी आज की राजनीति और राजनीतिक दल हैं। जिन पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता। सवाल यह भी है कि क्या सरकार सोशल मीडिया को नया खलनायक बनाकर अपनी संस्थाओं की नाकामी पर पर्दा नहीं डाल रही है। क्या आपके देश में लंदन दंगों जैसी रिपोर्ट मुमकिन है जो प्रधानमंत्री के कहने पर तैयार हो और जिसका मकसद कारण और समाधान दोनों का पता लगाना हो। एक ऐसे समय में जब प्रधानमंत्री का दफ्तर खुद ट्वीटर पर आकर संकेत दे रहा था कि उसने सोशल मीडिया के महत्व का सार समझ लिया है ठीक उसी दौर में सरकार ट्वीटर की दुनिया में अपना विरोधी खोजने लगती है। ट्वीटर की नीतियों के अनुसार किसी की पहचान का कोई नकली अकाउंट खोलता है तो वो गलत है लेकिन जो पैरोडी करता है उसे छेड़ने की क्या ज़रूरत थी। क्या समाज में हम अपने नेताओं की पैरोडी नहीं करते, अपने ख्याति प्राप्त लोगों की पैरोडी नहीं करते। ब्रेकिंग न्यूज़ की तर्ज पर फेकिंग न्यूज़ एक अकाउंट है। जिसपर हर दिन ख़बरों का मज़ाक उड़ाया जाता है क्या इससे मुख्य धारा की मीडिया को परेशान होना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी सरकारी संस्थाएं आज भी सोशल मीडिया के महत्व को ठीक से समझ नहीं रही हैं। वे तभी परेशान होती हैं जब कोई उनकी नीतियों,सत्ता और साख को चुनौती देता है। आप ट्वीटर या फेसबुक को बंद कर देंगे लेकिन क्या इसे आम सामाजिक जीवन में गली चौराहों पर घटित होने से रोक सकते हैं?

सांप्रदायिकता एक गंभीर समस्या है। इसका मुकाबला राजनीतिक ही हो सकता है। प्रकाशनों और वेबसाइटों के बंद होने से नहीं हो सकता। सरकार कह सकती है कि वो क्या करे। हम पूछ सकते हैं कि वे इससे पहले क्या कर रही थी। क्या पंद्रह बीस वेबसाइट बंद करने से ऐसी मानसिकताओं के खिलाफ लड़ाई बंद हो गई। और अगर यह उसके लिहाज़ से ज़रूरी कदम है तो इसे लेकर खुलेआम बहस करनी चाहिए। जिन साइट्स को बंद किया जा रहा है उन्हें नोटिस दिया जाना चाहिए। सरकार पहले ही सोशल मीडिया पर सेंसर लागू करने का रास्ता खोज रही है। अन्ना आंदोलन के समय मार खा चुकी सरकार को लगता है कि सोशल मीडिया के कारण ही मामला हाथ से निकल गया। यही घबराहट आज भी है जब रविवार को दिल्ली में प्रधानंत्री के घर प्रदर्शन होने जा रहा था तो कुछ घंटों के लिए मेट्रो सेवा बंद कर दी गई। जबकि सरकार को संवाद करना चाहिए था कि प्रधानमंत्री का घर सुरक्षा के लिहाज़ से ठीक नहीं है। क्या आप यह दलील मान लेंगे कि एक साल तक चलने वाला आंदोलन किसी सोशल मीडिया का आयोजन था या आप यह नहीं देखेंगे कि घोटालों ने साख इतनी गिरा दी है कि हर कोई इस सरकार को किसी न किसी मंच से कुछ बोलना चाहता है। क्या राजनीति में ऐसा पहली बार हो रहा है कि किसी सरकार की साख कमज़ोर हो रही हो। क्या सोशल मीडिया से पहले सरकारों की साख नहीं गिरी है और वो बदली नहीं गईं हैं।
इसलिए सोशल मीडिया को खलनायक बनाना ठीक नहीं है। लेकिन इतना ही कहने से जैसे सरकार नहीं बच सकती वैसे ही सोशल मीडिया भी नहीं बच सकता। ट्वीटर और फेसबुक में आपके पास ऐसे हथियार हैं जिनके सहारे समाज के लिए ख़तरनाक तस्वीरों और वीडियों को ब्लाक कर सकते हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब व्यक्ति कर सकता है तो सरकार क्यो नहीं? लेकिन इसकी एक पारदर्शी प्रक्रिया तो होनी चाहिए। क्या सरकार उसे भी बंद करेगी जो उसके खिलाफ अभियान चलाते हों। यह दलील दी जा रही है कि डेढ़ करोड़ से ज्यादा ट्वीटर अकाउंट में से सिर्फ सोलह सत्रह को बंद करने की बात कही गई है। सवाल संख्या का नहीं है। सवाल है कैसी परंपरा कायम हो रही है। क्या हमारे प्रधानमंत्री उन्हें लेकर लतीफों चुटकुलों और मुहावरों से इतने परेशान हैं कि उन्हें बंद करा देने की सोचने लगे। ऐसी बातें तो राजनीतिक दल खुलेआम संसद से लेकर सड़क पर करते हैं। सरकार क्यों नहीं उनके खिलाफ मामले दर्ज करती है।
हमें इंटरनेट की मूल अवधारणा को समझना होगा। आज़ादी इसकी बुनियाद है। मुख्य धारा की मीडिया भी आज़ाद है लेकिन उस पर बाज़ार से लेकर सरकार तक किसी न किसी रूप में प्रभाव रहता है। सोशल मीडिया इन सबसे अलग है। जब लिखित रूप में अपने खिलाफ हज़ारों लोगों की बातें पढ़ने को मिल जाएं तो सुनी सुनाई बातों से ज्यादा घबराहट और गुस्सा मचता होगा। भारत सरकार के इस कदम पर अमेरिकी सरकार की प्रवक्ता विक्टोरिया नूलंद ने कहा कि हम इंटरनेट के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ है। यह एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है। सोशल मीडिया की आज़ादी सार्वभौमिक है। देश और काल से परे हैं। इनकी ताकत दिनों दिन बढ़ती जा रही है। तभी मुख्य धारा की मीडिया भी सोशल मीडिया पर आ रही है। सोशल मीडिया उनका ही स्वरूप बदल रहा है। आखिर बड़े समाचार कंपनियों को क्यों अपना ट्वीटर अकाउंट खोलना पड़ रहा है। शायद इसलिए कि ये उनके बीच जाकर सही खबरों की प्रासंगिकता को भी बनाए रखना चाहती हैं। न्यूज़ देना और न्यूज़ पर बात करना ये दो अलग अलग सामाजिक मंचों पर होने वाली क्रिया है। मुख्यधारा की मीडिया बखूबी समझ रहा है। सरकार को भी अपना अकाउंट खोलकर अपने खिलाफ हो रहे मिथ्या प्रचार का मुकाबला करना चाहिए। बस यह जान लेना होगा कि इस मंच पर प्रोपेगैंडा थोड़ा मुश्किल है। लोग सीधे और तीखे सवाल करते हैं। आपकी मंशा से लेकर आशंका तक को घेरते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कोई राजनीतिक दल।
इसीलिए सरकार को अपने भीतर झांकना चाहिए। बंगलुरू से लोग सिर्फ एस एम एस और फेसबुक पर गलत तस्वीरें के कारण नहीं भागे बल्कि इसलिए भी भागे कि उन्हें सरकारी संस्थाओं पर भरोसा नहीं है। उन्हें पता है कि सचमुच दंगा हो गया तो पुलिस पेशवर की तरह कम पार्टी की तरह ज्यादा बर्ताव करेगी। जैसा कि अभी अभी मुंबई में हुआ। फिर क्या इन अफवाहों को जगह इसलिए नहीं मिली कि मुख्यधारा की मीडिया ने अपना काम ठीक से नहीं किया। क्या उसकी चुप्पी से ऐसी बातों ने ज़ोर नहीं पकड़ा। अगर मुख्यधारा की मीडिया ने साहस से काम लिया होता और लोगों को बताया होता कि मुंबई के आज़ाद मैदान की कुछ तस्वीरें हम नहीं दिखायेंगे क्योंकि इनसे बातें भड़क सकती हैं लेकिन इसमें शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। चुप्पी दवा नहीं है। बोलना पड़ता है। ग़लत है तो ग़लत के ख़िलाफ़ और सही है तो सही के लिए। अभिव्यक्ति की आज़ादी निर्बाध नहीं है मगर अभिव्यक्ति के मंचों पर कोई शर्त या दवाब नहीं होना चाहिए। पुस्तकों से लेकर फिल्मों और कलाकृतियों पर पाबंदी से कुछ हासिल नहीं होता है। सवाल से टकराना पड़ता है।
(यह लेख नेशनल दुनिया में प्रकाशित हुआ था)

सोशल मीडिया से कौन डरता है

सोशल मीडिया से कौन डरता है? सरकार या मुख्यधारा की मीडिया? जिस इंटरनेट का टेक्नॉलजी के लोकतांत्रिकरण के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में हुआ था उसके मैदान पर घास की तरह पसरते सोशल मीडिया पर लगाम लगाने के कानून दुनिया भर के कई देशों में तेज़ी से क्यों बन रहे हैं? क्या सोशल मीडिया ने हमारी सामूहिक सोच और अभिव्यक्ति को पूरी तरह बदल दिया है? क्या सोशल मीडिया ने मुख्य धारा की मीडिया से निर्भरता कम कर दी है? क्या सोशल मीडिया किसी भी तरह की जवाबदेही से मुक्त एक ऐसा सार्वजनिक मंच है जिसे हमेशा ही किसी प्रकार के सरकारी नियंत्रण से मुक्त लेकिन इसे पैदा करने वाली माता कंपनियों की छाती से चिपके रहने को ही स्वतंत्रता समझता रहेगा? क्या सोशल मीडिया तभी तक ठीक है जब तक लोग इस पर नानी से कहानी की यादें और बारिश में जामुन के किस्से ही बांटते रहे? सोशल मीडिया अपनी हदे लांघ रहा है या सरकार और मुख्य धारा की मीडिया की हदों को तोड़ कर एक ऐसा स्पेस यानी स्थल का निर्माण कर रही है जहां ट्रैफिक के नियम लागू ही नहीं हो सकते।
इन सब सवालों का जवाब हम अनुमानों और पूर्वागर्हों के आधार पर देने लगते हैं। हमारे देश में सोशल मीडिया को लेकर प्रमाणिक शोध की घोर कमी है। इसीलिए जो हो रहा है उसी की रनिंग कमेंटी सब किये जा रहे हैं। सोशल मीडिया ने सार्वजनिक होने की तमाम पुरानी मान्यताओं को ध्वस्त करना शुरू कर दिया है। पहले मीडिया और सरकार के बीच कोई नहीं था। सरकार की मीडिया थी और उसके बरक्स उसके आदेशों पर चलने वाली बाज़ार नियंत्रित मीडिया थी। इन दोनों के बीच आपसी टकराव, समझौते और आज़ादी का खेल और भ्रम चलता रहा। दोनों एक दूसरे से धूप छांव का खेल खेलते रहे। आपातकाल में मीडिया पर लगाम लगाने की राजनीतिक कोशिश हुई तो बाज़ारकाल में मीडिया को दूसरे रास्ते से ख़रीदने या प्रभावित करने की। अब इन दोनों के बीच एक नया खिलाड़ी आ गया है। जिसके मैदान में करोड़ों लोग एक साथ खेल रहे हैं। एक सूचना साझा होते होते पल भर में लाखों लोगों की सूचना हो जाती है। इसकी रफ्तार निजी टेलीविज़न की रफ्तार को बेमानी कर दिया है। रफ्तार का खेल भी पहले टीवी और अखबार के बीच चला लेकिन अब टीवी और अखबार मिलकर इस सोशल मीडिया से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। ज़ाहिर है तीनों के बीच टकराव के पर्याप्त कारण मौजूद हैं। तीनों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई चल रही है। क्योंकि सोशल मीडिया ने मीडिया के जमे जमाए प्रभुत्व और साख की धज्जियां उड़ा दी है। विज्ञापन के मामले में भी मुख्य धारा की मीडिया को होड़ दे रहा है। जिसकी फिराक़ में चालाक सरकार और मुख्य धारा की मीडिया अपने आप भी सोशल मीडिया बन रही हैं। बात साफ है अगर आप सोशल मीडिया नहीं हैं तो आप मीडिया नहीं हैं।
लेकिन प्रभुत्व और प्रसार के खेल के बीच एक परिवर्तन और हो चुका है। हमारे बीच कई लोगों को लग रहा है कि परिवर्तन हो रहा है बल्कि यह कई साल पहले ही हो चुका था उसका अहसास अब हो रहा है। न्यूज़ यानी ख़बर प्रसार माध्यमों की तुलना में सोशल मीडिया के विभिन्न रूपों से पहुंच जा रहा है। संवाददाता ख़बरें टीवी चैनल पर ब्रेक करने से पहले ट्वीट कर देता है और पल भर बिना टीवी सेट ऑन किये वो ख़बर सैंकड़ों से लेकर करोड़ों लोगों के बीच पहुंच जाती है। यह किसी रोमांच से कम नहीं है। सोशल मीडिया ने मुख्य धारा की बनाई भाषा को भी खारिज कर दिया है। उसकी अपनी भाषा और शैली है। पहले लोग संपादक के नाम चिट्ठी के ज़रिये अख़बार से बात करते थे फिर टीवी में वाक्स पाप के ज़रिये छटांक भर जनता की आवाज़ लाखों लोगों के बीच पहुंचती थी,फिर एस एम एस के ज़रिये टीवी ने जनता को हिस्सेदार बनाना शुरू किया, फिर टीवी स्क्रीन और अखबारों में फेसबुक और ट्वीटर के कमेंट जगह पाने लगे। इस प्रक्रिया को कोई रोक नहीं सकता था। जो न्यूज़ चैनल और अख़बार स्वतंत्र मीडिया बन कर उभरे थे वो अब एक नए माध्यम के सहारे हो गए। हर अखबार और टीवी चैनल की वेबसाइट है और ट्वीटर अकाउंट है। हर पत्रकार का अपना माध्यम है जो उसके संपादक से स्वतंत्र है। हर आदमी खुद को पत्रकार की भूमिका में ले आ रहा है। सूचना और सार्वजनिक मंच के माध्यम जब इस तरह से उलट पुलट हो जाते हैं तो स्वाभाविक है कि सब इस पर कब्ज़ा चाहेंगे और सब एक दूसरे से लड़ेंगे। आज अमिताभ बच्चन को ट्वीटर पर किसी भी एक न्यूज़ चैनल के ट्वीटर अकाउंट या दैनिक हिट्स से ज्यादा लोग अनुसरण करते हैं। वो अब प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते। वो सीधे बात कर रहे हैं लोगों से। मीडिया अब माध्यम नहीं रहा। फिर अंग्रेज़ी के कुछ नामचीन पत्रकार राजदीप सरदेसाई और बरखा दत्त को लाखों लोग क्यों फालो करते हैं। जबकि वही लोग उनके चैनल को भी फॉलो करते हैं।
यही नहीं दुनिया भर में सोशल मीडिया न्यूज़ चैनल को बदल रहा है। अब न्यूज़ चैनल ख़बरें देने के माध्यम के रूप में सिमटते जा रहे हैं। ख़बरों ने अपना अलग मदारी ढूंढ लिया है। तो क्या मुख्य धारा की मीडिया खत्म हो जाएगी? ऐसा नहीं होगा। हर तरह का माध्यम किसी न किसी रूप में कायम रहेगा। अब न्यूज़ चैनलों का काम यह होगा कि तमाम तरह की सूचनाओं में से प्रमाणिक सूचनाओं को देना। पिछले साल अगस्त में लंदन में दंगा हुआ। जब वहां दंगों के कारण और सोशल मीडिया की भूमिका की जांच के लिए कमेटी बनी तो उसने एक रिपोर्ट दी है। आफ्टर द रायट्स नाम से इस रिपोर्ट को आप गूगल में ढूंढ सकते हैं। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि दंगों या तनाव की स्थिति में लोग सोशल मीडिया पर कम निर्भर थे। वे स्थानीय रेडियो और टीवी पर ज़्यादा भरोसा कर रहे थे लेकिन रेडियो टीवी यह कर रहे थे कि वे सोशल मीडिया की अफवाहों को भी ख़बर बनाने लगे थे। उन्हें बदलना होगा। इस रिपोर्ट ने बताया कि कैसे दंगों के वक्त म्यूनिसिपल पुलिस के ट्वीटर अकाउंट पर लोगों की संख्या दस गुनी बढ गई।  यानी सूचनाओं के मामले में मीडिया की भूमिका अब भी है। लेकिन हो यह रहा है कि ट्वीटर और फेसबुक के लोग अब न्यूज़ रूम के संपादकों को सरकार या बाज़ार से ज़्यादा प्रभावित कर रहे हैं। उनकी दलीलें चैनल की लाइन बन जाती है। यह एक गंभीर चुनौती है। जिसे आप सोशल मीडिया की आलोचना से नहीं बल्कि अपने पेशेवर नियमों की सख्ती से ही सामना कर सकते हैं।
 हां सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति की आज़ादी का ग़लत इस्तमाल भी हो रहा है। राजनीतिक और सांप्रदायिक संगठन अफवाहों को फैला रहे हैं। ऐसे दल तो सोशल मीडिया से पहले भी कर रहे थे। असम में पांच लाख विस्थापित हुए। सरकार की वजह से या सोशल मीडिया की वजह से। बंगलुरू में एस एम एस से घबराहट फैली उसके पीछे दंगों या तनाव के वक्त सरकार या प्रशासन की खराब भूमिका का इतिहास कारण नहीं रहा होगा। दिल्ली से लेकर गुजरात के दंगों तक कब प्रशासन ने लोगों को हिफाज़त की है। इसलिए माध्यम को टारगेट करने का खेल ट्वेंटी ट्वेंटी का गेम है। मानसिकता से लड़ाई लंबी है और लंबे समय तक लड़नी पड़ेगी। हम अभी भी सोशल मीडिया को समझ नहीं पा रहे हैं। इसे एक भूत बना लिया है।
 इस लेख को लिखने से पहले अभी अभी प्रकाशित एक किताब पढ़ रहा था। जिसका नाम है- म्यूज़िक ऑफ द स्पिनिंग व्हील, महात्मा गांधी मेनिफेस्टो फॉर द इंटरनेट एज। किताब अंग्रेज़ी में है और लिखा है खुद को बीजेपी का कार्यकर्ता कहने वाले सुधींद्र कुलकर्णी ने । अभी पूरी नहीं पढ़ी है लेकिन इसलिए इसके वैचारिक पक्ष पर टिप्पणी नहीं कर रहा हूं लेकिन यह किताब इंटरनेट के युग में गांधी के चरखों को ढूंढती हुई दलील दे रही है कि इंटरनेट ही गांधी का चरखा है। एक ऐसी तकनीक जो पूरी तरह से लोकतांत्रिक और अहिंसक। हालांकि अहिंसक बात से सहमत नहीं हूं मगर इंटरनेट वो चरखा तो है ही जिसे सब आसानी से चला सकते हैं। इसलिए सोशल मीडिया एक ऐसा समाज बना रहा है जो मीडिया से पहले का मीडिया भी हो सकता है। जब अख़बार और टीवी नहीं थे तब सूचनाएं कैसे पहुंचती थीं। बस रफ्तार पहले जैसी नहीं है। यही वो खूबी है जो सोशल मीडिया को उपयोगी और खतरनाक बनाती है। यहां पर हर दिन एक नया मीडिया अमीबा की तरह पैदा होता है जो अगले चंद दिनों में बिखकर नया अमीबा यानी नया मीडिया बन जाता है। आप इसे कब तक और किस किस कानून से रोकेंगे। इसका जवाब नहीं है मेरे पास। जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कई तरह के अगर मगर के साथ मिली है तो अभिव्यक्ति का कोई ऐसा मंच हो सकता है जो किसी अगर मगर के बग़ैर हो। यह बहस का विषय है। बौखलाहट में कदम उठाने का विषय नहीं है।
(यह लेख राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में प्रकाशित हो चुका है)

हिन्दी पत्रकारिता का बानर काव्य भोलुम थ्री- मौलिक कवि रवीश एंकर टीभी वाले

बनरी लगती बोर है ,
बनरवा भाविभोर है,
ईद मुबारक केतना बोले,
ख़बर नहीं फिर भी बकते,
एंकरिया बोली ब्रेकिंग ब्रेकिंग,
एंकरवा बोला आयं आयं ,
केन्ने चल गया धायं धा़यं,
नूझ रूम में मची भगदड़,
एंकरिया बोली ऐज एन वेन कमिंग इन,
वी आर अपडेटिंग एवरीथिंग,
एंकरवा घुड़का चल बसंती ब्रेकिंग ब्रेकिंग,
बानर बनरी झूमे रे,
बकलोलवन दर्शक देखे रे,
का हो गया गान्ही के नेशन में ,
भगदड़ मच गई स्टेशन में,
टीभी पर चढ़ गया एंकर ,
लइका खानी बोला भयंकर,
आवे दे रेस्पोसिंबिल को,
गाड़ेंगे हम सबमर्सिबिल को,
सूखी गंगा हम नहीं सूखे,
सेव द नेशन टीभी स्टेशन,
बनरी बोली बुआ को,
ऐ काकी देखो हमको,
एंकरिया बन बन नाचूं मैं,
कान खुजाऊं लात लगाऊं,
ख़बरों की तो भात बनाऊ,
एंकरवा बन गिया एडिटर,
एंकरिया का बिगड़ा जूपिटर,
नो जस्टिस है नूझ रूम में ,
बाबू जस्टिस है कोर्ट रूम में,
एंकरवा गाया पार्टी राग,
दाँत चियारा मुँह बिगाड़ा,
तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा,
करते हैं ये चेंज प्रोफेशन,
भाड़ में जाए अपना नेशन,
यू आर वाचिंग टीभी नूझ,
वी आर टोकिंग नथिंग नूझ।
आ गए देखो मदारी मामा,
बजा के डमरू लजा के लबरू,
वही बाढ़ है वही खाज है,
मानवता पर बड़ी लाज है,
प्रजेंट इनडिफनिट में एंकरिया बोली,
पास्ट परफेक्ट में एंकरवा,
कहत कबीर सुनो भाई दर्शकू,
साधु मरिहन जोगी मरिहन,
मरिहन संत कबीर,
बेलमुंड ज्योतिष कहलन,
कबीरा मर गिया बाज़ार में,
बनके टीभी मरीज़।
मरिहन संत कबीर, ( हिन्दी पत्रकारिता का बानर काव्य भोलुम थ्री- मौलिक कवि रवीश एंकर टीभी वाले )

हिन्दी पत्रकारिता का लांग बानर काव्य- मौलिक कवि रवीश एंकर

एंकर बोला को-एंकरिया से,
ख़बरे नाच रहीं बिन सावन के,
कहीं डूबी है मुंबई,
ख़ूब सुखी है दुबई,
भागलपुर में मर गए चार,
औरंगाबाद में सब बर्बाद,
दे जवाब दे जवाब,
सोई साली उठ सरकार,
एंकरिया झूमी चारो ओर,
कैसा माहौल है यारा बोल,
ठीक ठाक है मुल्क बेहाल,
खंडन निंदा सब बेकार,
चल करते हैं भाएं भाएं,
भौंक भौंक के ख़बर सुनाए,
मोटका फोंटवा छरपत है,
पतरकी खबरवा सरकत है,
एंकरिया रूठी आन स्क्रीन,
वाय आम लुकिंग डल एंड थिन
मान मेरी एंकरिया जान,
बोला लंपट एंकरवा महान,
चल खेंले अब सवाल सवाल,
मिलके करें हम बवाल-बवाल,
बंट गया बक्से में इंसान,
एक बक्से से झांककर बोला,
ये पोलटिसन बड़ा बड़बोला,
एंकरी टपकी तड़ से बोली,
आय मीन आय मीन लिसन टू मी,
उस बक्से से झांकी मुंडी,
बोली दैड्स व्हाट आय वांट टू से,
एंकर कूदा भड़ भड़ से,
बट लेगें एक छोटा सा ब्रेक,
एंकरिया मुस्काई धीमे से,
नीचे ताकी हल्के से,
एंकरवा बोला झटके से,
बोल रे नेशन क्या है जवाब,
एंकरिया बोली नो जवाब नो जवाब,
ज़ोर का झटका धीरे से,
स्क्रीन पर टपका बिग कोच्चन,
क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों क्यों,
धर दीन्ही चदरिया ज्यों का त्यों
बंदर मामा फटा पजामा,
टीभी देखने आए थे,
लैनल चैनल लैनल चैनल,
टपकट टपकत पहुंचे थे,
हर चैनल पर कोच्चन है,
हर लैनल पर टोच्चन है
इस मुंडी को खींचे वो,
उस मुंडी को पहले दो,
भारी भरकम एंकर भयंकर,
हल्की फुल्की स्लिम एंकरिया
देख के बोली प्यारी बंदरिया
ए उस्ताद मुझको देख,
टीभी पर भी जमती हूं,
बनरा बोला मैं भी हूं,
दोनों लड़ गए आपस में,
बनरवा पकड़ा बनरिया को,
बनरिया नोची बनरवा को,
बक्से से निकली मुंडी,
बोली नो वन टौंकिंग टू मी,
चल बेटा ले ले ब्रेक,
एंकरवा बोला बट द कोच्चन इझ ग्रेट,
एंकरवा बोला मेरा आइडिया,
टीभी को हो गया डायरिया,
डायरिया से फिर मलेरिया,
एक ही मच्छर सबको काटा,
सब एंकरवा झाड़ा फिरता,
बहस बहस बहस बहस,
तहस नहस तहस नहस
आय अम आस्किंग ऐसा कोच्चन,
पूछ न सके जो जावेद बच्चन,
मैं हूं एंकर सबसे महान,
मुंडी मुंडी भर दी दुकान,
आओ मदारी तुम भी देखो,
तुमरे बानर तुमरे गान,
लल्ला लल्ला लल्ला लल्ला,
एंकरिया बोली,
हह्हा हह्हा हह्हा हह्हा,
( हिन्दी पत्रकारिता का लांग बानर काव्य- मौलिक कवि रवीश एंकर, कौमा का प्रयोग इसलिए किया गया है ताकि पंक्तियां आपस में मिल न जाएं. कोच्चन का मतलब क्वेश्चन है. मैंने न्यूज़ चैनल कभी नहीं लिखता। मुझे ये नूझ लैनल ही दिखाई सुनाई देते हैं। )

पुरानी जीन्स और हथियार...

क्या आपको नीले रंग वाली जीन्स पतलून से डर लगता है? क्या जीन्स को लेकर आप भी आधुनिकता को गंदा या भद्दा समझते हैं? क्या जीन्स को लेकर आपने भी कभी न कभी सोचा है कि यह लड़कियों के लिए नहीं है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो ज़रूरी नहीं कि आप बिल्कुल खाप मानसिकता के ही है लेकिन यह ज़रूर है कि आप एक ऐसे कपड़े का विरोध कर रहे हैं जिसे पहनने के बाद लड़कियों की आज़ादी खास रूप से नज़र आने लगती है जो आपको खाप में बदल देती है। पहनावा एक ऐसा आखिरी मुकाम है जिसपर आप प्रतिबंध के नाम पर आधुनिकता को यानी लड़कियों को काबू में रखना चाहते हैं। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो कुछ भी ग़लत नहीं क्योंकि आपको किसी ने बताया ही नहीं कि आपकी सोच में बुनियादी गड़बड़ी है। हमारे देश में कपड़ों का रिश्ता जाति,त्योहार से लेकर इलाका और मौसम सबसे रहा है। ऐसे में जीन्स एक ऐसा कपड़ा है जो इन सब सीमाओं या खांचे को पार करता हुआ हर तबके के पहनावे के रूप में कायम हो जाता है। जीन्स सिर्फ एक आधुनिक कपड़ा नहीं बल्कि असामनता को विशेष रूप से उभारने वाले इस आधुनिक दौर में बराबरी का एक ऐसा रूपक है जो अमीर से लेकर ग़रीब सबके बदन पर है। यही नहीं यह एक ऐसा कपड़ा है जिसका कोई जेंडर यानी लिंग नहीं है।

जीन्स का उदय अमरीका में हुआ। उन्नीसवीं सदी के मध्य में यह पहनावे के रूप में प्रचलित होने लगी। १८५० के आस पास कैलिफोर्निया में सोने की खदाने मिलने से वहां एक किस्म की भगदड़ सी मची । जिसे गोल्ड रश के नाम से जाना जाता है। यहां के खान मज़दूरों को विशेष कपड़े की ज़रूरत थी। इसी दौरान एक जर्मन नौजवान वहां पहुंचता है और कैनवस के कपड़ों से पतलून बनाने लगता है। १८७३ में लेवी स्त्रास ने अपनी डेनिम जीन्स का पेटेंट करा लिया और कंपनी कायम कर दी। १३९ साल के सफर में डेनिम जीन्स ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। १९५० के दशक में अमरीका के स्कूलों में भी जीन्स पहनने पर रोक लगी थी। वहां भी जीन्स का विरोध हो रहा था। लेकिन १९६० तक आते आते यह विरोध धीमा पड़ने लगा। उसी दौरान एक फिल्म रिबेल विदाउट काज़ आती है और जीन्स फैशन में आ जाता है। मज़दूरों का कपड़ा पर्दे के नायक का कपड़ा बन जाता है। हमारे हिन्दुस्तान में जीन्स का आगमन यहां के उन कुलीनों के ज़रिये होता है जो महानगरों के खास इलाकों तक ही सिमटे रहे। अमेरिका में जीन्स मज़दूरों से मालिकों और युवाओं तक पहुंची। हिन्दुस्तान में जीन्स मालिकों से मज़दूरों तक पहुंची। इसमें दिल्ली के मोहनसिंह प्लेस और करोलबाग का बड़ा योगदान रहा है। कनाट प्लेस स्थित मोहनसिंह प्लेस सस्ती जीन्स का खदान बन गया। वहीं से उन लोगों ने जीन्स पहनने का तज़ुर्बा किया जो ब्रांड वाली महंगी जीन्स नहीं खरीद सकते थे। बदलते शहर,काम की प्रकृति के कारण हिन्दुस्तान भर से आए प्रवासी छात्रों और मज़दूरों को जीन्स की शरण लेनी पड़ी। जीन्स उनके आधुनिक होने की पहचान बन गई।

लेकिन क्या हमारे समाज में जीन्स का विरोध हुआ ही नहीं। ऐसा नहीं है। जीन्स को लेकर हमेशा से तकरार होती रही है। हमारे ही मित्र जीन्स अपने मां बाप से छिप कर पहनते थे। नब्बे के दशक में जब हम बिहार से दिल्ली आ रहे थे तब कई छात्रों के माता पिता ने कहा था कि जीन्स मत पहनना। लोफर पहनते हैं। शायद जिप्सियों पर बनी हरे रामा हरे रामा जैसी फिल्मों ने जीन्स की छवि ऐसे लोगों में बिगाड़ दी होगी। ऐसी चेतावनी मुझे भी मिली थी। लड़कियों को भी जीन्स पहनने पर ऐसी टिका टिप्पणी सुननी पड़ी है। आप चाहें तो जीन्स पहनने के अपने निजी प्रसंगों को इस लेख के साथ याद कर सकते हैं। यह एक छिटपुट विरोध भर था। हमारे देश एक तबके में जीन्स बागी प्रवृत्ति वाले नौजवाने से कम, बिगड़ैल प्रवृत्ति के युवाओं से जोड़ कर देखा गया है। बाद में यह आसानी से स्वीकृत भी होता गया। आज के सभी हीरो जीन्स ही पहनते हैं। अमिताभ,जीतेंद्र,मिथुन के दौर में पतलून का चलन था। इसलिए हर दर्जी उनकी पतलून की कापी करता था। पतलून की जेब से लेकर मोहरी तक फैशन बन जाया करती थी। बेल बाटम्स से लेकर पतली मोहरी का चलन हो जाता था। जीन्स में कापी करने के लिए कुछ नहीं है। आप सलाम नमस्ते या काकटेल देखने के बाद चाहें तो जीन्स का कोई भी ब्रांड खरीद ले। इतनी भयंकर समानता किसी और प्रकार के कपड़े में नहीं है। इसीलिए जीन्स का ब्रांड महत्वपूर्ण होता है। जीन्स ब्रांड के नाम से ही अलग दिखती है।

जीन्स के कपड़े की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी भी प्रकार के अंतर को समाप्त कर देती है। हुआ यह है कि गांव गांव से महानगरों में पहुंचे मज़दूरों ने बड़ी संख्या में दर्ज़ी की बनाई पतलून या फैक्ट्री की सिली हुई पतलून को त्याग दिया है। अब आप ईद या होली के मौके पर दर्ज़ियों के पास जाकर देखें। पतलून की सिलाई कितनी कम हो गई है। ज्यादातर टेलर लेडीज टेलर होकर रह गए हैं। इन मज़दूरों के साथ गांव गांव में जीन्स पहुंचा है। सस्ती और टिकाऊ होने के कारण मर्द ही इन्हें अपने इलाके में लेकर गए हैं। गांवों में लड़कियों तक जीन्स मर्दों के ज़रिये पहुंचा है। इसी चस्के ने जीन्स का देसी बाज़ार तैयार किया और नकली ब्रांड वाले जीन्स मेले से लेकर ठेले तक पर बिकने लगी। इस कपड़े ने गांवों की सीमा के भीतर लड़के और लड़कियों के बीच पहनावे के अंतर को समाप्त कर दिया है। यह कैसे हो सकता है कि वो हर चीज़ों में लड़के लड़कियों के बीच अंतर करें और पहनावे का भेद इतनी आसानी से मिट जाए।

जिस तरह से जीन्स शहरों में वक्त,परिवहन के संसाधन, पानी की उपलब्धता आदि कारणों से सुलभ हुई,गांवों में भी इन्हीं कारणों से प्रचलित हो रही है। हमारे समाज में लड़कियों को मारा जा रहा है तो दूसरी तरफ लड़कियां लड़कों से कई मामलों में तेज़ी से बदल भी रही है। उनकी गतिशीलता से गांव के बुजुर्ग या लड़के परेशान होने लगे हैं। वो अब बहाने ढूंढ रहे हैं। मोबाइल और जीन्स नए बहाने हैं जिनके ज़रिये लड़कियों पर नियंत्रण की कोशिश हो रही है। जीन्स उन्हें चुनोती दे रही है। जीन्स का विरोध और बुर्के पहनने पर ज़ोर एक ही मानसिकता की देन है। जिस्म का कोई हिस्सा न दिखें। इस बात पर कोई ज़ोर नहीं कि देखने का वैसा नज़रिया कपड़े की सिलाई से आता है या दिमाग़ की किसी बुनावट से। तभी तो सिर्फ लड़कियों के जीन्स पहनने पर रोक लगी। लड़कों पर नहीं।

इसलिए आसान है कि जीन्स को जला दें। मुज़फ्फरनगर के दूधाहेड़ी गांव में जीन्स की होली जलाई गई। गांव की सरपंच की पोतियां ही कहती मिलीं कि हम तय करेंगी कि क्या पहने। लेकिन वहां पुरुषों का दबाव इतना कि सारी लड़कियों को जीन्स देनी पड़ी होलिका दहन के लिए। लेकिन उन्होंने अपनी आज़ादी नहीं सौंपी है। वो कह रही हैं कि नौकरी की ज़रूरत के मुताबिक हम कपड़े पहनेंगे। बंगलौर या दिल्ली जायेंगे तो ये हमें बतायेंगे कि क्या पहनें। ज़रूरी है कि हम कपड़े की मानसिकता को भी पहने। जीन्स जल गई लेकिन आज़ादी और बराबरी की चाहत बाकी है जो जगह बदलने या वक्त गुज़रने के साथ पूरी कर ली जाएगी। यानी जीन्स की संभावना अब भी गांवों के लिए बची है।

लेकिन हैरानी हुई कि हमारा आधुनिक समाज जो पश्चिम की आधुनिकता को बेशर्मी से जीता है उसके विरोध के नाम पर अभी भी ढोंग करता है। स्वदेशी आंदोलन के वक्त विदेशी कपड़े जलाए गए थे। वो सिर्फ कपड़े का विरोध नहीं था बल्कि उस मानसिकता का विरोध था जो हमें उस सत्ता का उपनिवेश बनाती थी जिसकी गुलामी हम पहनकर चल रहे थे। गांधी ने हमें उस मानसिकता से आज़ाद कर दिया था। लेकिन क्या अब जीन्स को उस नज़र से देखा जा सकता है। क्या यह विदेशी कपड़ा है? नहीं है। यह देसी कपड़ा भी है। इसके पहनने से कोई अच्छा बुरा नहीं होता। खादी का क्या करेंगे। खादी पहनने वाले कई लोग लाखों करोड़ों का घोटाला कर जाते हैं। क्या अब खादी की भी होली जलेगी इस देश में? जीन्स एक शानदार और बराबरी का पहनावा है। आपके पास कोई पुरानी जीन्स हो तो निकालें और पहनें।
(शुक्रवार को यह लेख राजस्थान पत्रिका में छपा था)