बोल के लब आज़ाद हैं तेरे (मनमोहन की चुप्पी पर विशेष)

वो नहीं बोलते हैं तो ख़बर है। बोलते हैं तो ख़बर है। लोकतंत्र में कोई प्रधानमंत्री बोलने जा रहा है, यह भी ख़बर है। ख़बर कम है। लोकतंत्र का अपमान ज़्यादा। क्या आप मान सकते हैं कि प्रधानमंत्री को बोलने नहीं आता है। फिर वो क्लास में अपने छात्रों को कैसे पढ़ाते होंगे। अधिकारियों के साथ मीटिंग करते वक्त तो बोलते ही होंगे। अपनी राय तो रखते ही होंगे। यह कैसे हो सकता है कि दुनिया भर के अनुभवों वाला एक शख्स रबर स्टाम्प ही बना रहे। विश्वास करना मुश्किल होता है। कोई ज़बरदस्ती चुप रह कर यहां तक नहीं पहुंच सकता। कुछ तो उनकी अपनी राय होगी,जिससे उनके धीमे सुर में ही सही बोलते वक्त लगता होगा कि आदमी योग्य है। वर्ना मुंह न खोलने की शर्त पर उनकी योग्य छवि कैसे बनी। मालूम नहीं कि ज़िद में आकर मनमोहन सिंह नहीं बोलते या उन्हें बोलने की इजाज़त नहीं है। दोनों ही स्थिति में मामला ख़तरनाक लगता है।

जिस मनमोहन सिंह की मुख्यधारा की मीडिया ने लगातार तारीफ़ की हो अब उन्हीं की आलोचना हो रही है। यूपीए वन में उनकी चुप्पी को लोग खूबी बताया करते थे। कहा करते थे कि ये प्रधानमंत्री भाषण कम देता है। दिन भर काम करता है। देर रात तक काम करता है। यूपीए वन के वक्त लोकसभा में विश्वासमत जीतने के बाद बाहर आकर विक्ट्री साइन भी बनाता है। जीत के उन लम्हों को याद कीजिए,फिर आपको नहीं लगेगा कि मनमोहन सिंह चुप रहने वाले शख्स होंगे। संपादकों की बेचैनी का कोई मतलब नहीं है। उन्हें बेवजह लगता है कि प्रधानमंत्री उनसे बात नहीं करते। इसलिए कई संपादकों ने लिखा कि वे बात क्यों नहीं कर रहे हैं। सवाल यही महत्वपूर्ण है कि कई मौकों पर प्रधानमंत्री देश से संवाद क्यों नहीं करते? अपना लिखित बयान भी जारी नहीं करते। अगर सवाल-जवाब से दिक्कत है तो लिखित बयान भी नियमित रूप से जारी किये जा सकते थे। जनता स्वीकार कर लेती। कहती कि अच्छा है प्रधानमंत्री कम बोलते हैं मगर बोलते हैं तो काम का बोलते हैं। लिखित बोलते हैं। यह भी नहीं हुआ। जबकि प्रधानमंत्री के पास मीडिया सलाहकार के रूप में एक अलग से दफ्तर है। क्या ये लोग यह सलाह देते हैं कि सर आप मत बोलिये। अगर सर नहीं बोल रहे हैं तो मीडिया सलाहकार तो बोल ही सकते हैं। कोई चुप रहने की सलाह दे रहा है या कोई न बोलने का आदेश,दावे के साथ कहना मुश्किल है मगर समझना मुश्किल नहीं।

लेकिन यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हमारी आपकी तरह किसी कंपनी की नौकरी नहीं कर रहे। देश के सबसे बड़े पद पर आसीन हैं। उसे छोड़ भी देंगे तो करदाताओं के पैसे से सरकार उन्हें ससम्मान रखेगी। वो एक बार पूरे टर्म प्रधानमंत्री रह चुके हैं। उनकी मजबूरियां समझ नहीं आतीं। कोई वजह नहीं है। तो क्या मान लिया जाए कि उन्हें किसी चीज़ से मतलब नहीं हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन नहीं है। जो मन करेगा, करेंगे। जो मन करेगा, नहीं बोलेंगे। हठयोग पर हैं मौनी बाबा। इनके गुरु रहे हैं पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव। वो भी नहीं बोलते थे। कल उनका जन्मदिन था। मनमोहन सिंह आंध्र भवन गए थे जहां नरसिम्हा राव की याद में कुछ कार्यक्रम हुआ था। जिस राव को कांग्रेस में कोई पसंद नहीं करता, उससे रिश्ता निभाने का सार्वजनिक प्रदर्शन करने वाले मनमोहन सिंह के बारे में क्या आप कह सकते हैं कि वे दब्बू हैं। लगता नहीं है। उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम है। शायद इसीलिए वे पिछले साल सितंबर के बाद आज के दिन देश के पांच संपादकों से मिलेंगे। टीवी वालों से नहीं मिला। पिछली बार फरवरी में न्यूज़ चैनलों के संपादकों,संवाददाताओं से मुलाकात की थी। इस बार लंबी चुप्पी के बाद टीवी को पहले चांस नहीं मिला। वो इस डर से भी कि अगर ऐसा हुआ तो टीवी वाले दिन भर बवाल काटेंगे। हर भाव, हर मुद्रा पर चर्चा कर डालेंगे। कुल मिलाकर मनमोहन सिंह की एक कमज़ोर छवि ही निकलेगी। अब अखबार के संपादकों से सवाल तो यही सब पूछे जायेंगे। यही कि क्या मनमोहन सिंह आहत हैं? क्या कहा उन्होंने न बोलने के फैसले पर? क्या वो देश के काम में लगे हैं? अगर दिन रात काम में ही लगे हैं तो देश की हालत ऐसी क्यों हैं? जनता फटीचर हालत में क्यों हैं?

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि कांग्रेस की कार्यसमिति में प्रधानमंत्री के सामने उनके सहयोगी राजनेता यह सुझाव दें कि आप बोला कीजिए। आप कम बोलते हैं। या तो आप राष्ट्र के नाम संदेश दे दें या फिर मीडिया से बात कर लें। अभी तक विपक्ष ही बोलता था कि प्रधानमंत्री नहीं बोलते हैं। अब उनकी पार्टी के लोग ही बोलने लगे हैं। हद है ये तो बोलते ही नहीं हैं। तो क्या यह दलील पूरी तरह सही है कि वे पार्टी के दबाव में नहीं बोलते हैं। फिर पार्टी के लोग यह मांग क्यों करते हैं? फिर उनके सहयोगी गृहमंत्री पी चिदंबरम एनडीटीवी की सोनिया वर्मा सिंह के इंटरव्यू में खुलेआम बोलकर जाते हैं कि चुप रहना उनका स्टाइल है मगर मुझे भी लगता है कि प्रधानमंत्री को कुछ ज्यादा संवाद करना चाहिए। थक हार कर जब वे नहीं बोले तो सरकार ने मीडिया से बोलने के लिए पांच मंत्रियों का समूह बना दिया। पिछले रविवार अर्णब गोस्वामी के वर्सेस कार्यक्रम में आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने सलमान खुर्शीद की क्लास ले ली। कह दिया कि इन पांच मंत्रियों ने अन्ना के मामले में जिस तरह से मीडिया को हैंडल किया है वो पब्लिक रिलेशन के कोर्स में डिज़ास्टर के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए। ज़ाहिर है प्रधानमंत्री पर दबाव कम है। दबाव की बातों में अतिशयोक्ति है। नहीं बोलने का उनका फैसला अपना है। ज़िद है। वर्ना बोलने को लेकर विवाद इसी महीने से तो नहीं शुरू हुआ न। वो तो कॉमनवेल्थ के समय से ही चल रहा है।

मनमोहन सिंह को लगता ही नहीं कि लोकतंत्र में संवाद ज़रूरी है। इसलिए वो नहीं बोलते हैं। पिछले कुछ महीनों से कई बड़े संपादकों ने शनिचर-एतवार के अपने कॉलमों में इसकी आलोचना की और सुझाव दिये कि कैसी सरकार है। न काम कर पा रही है न बोल पा रही है। सिर्फ चली जा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी तो चलते-चलते बात कर लेते थे। अटलजी-अटलजी की आवाज़ आती थी,वो प्रेस की तरफ मुड़ जाते थे। कुछ तंज,कुछ रंज और कुछ व्यंग्य कर के चले जाते थे। वो छोटे-मोटे समारोहों में भी जाते रहते थे। वहां कुछ न कुछ बोल आते थे। हर साल शायद पहली तारीख को उनके विचार आ जाते थे। अटल म्यूज़िंग। कितना बोलें और कब बोलें,यह प्रधानमंत्री का अपना फैसला होना चाहिए। मगर कभी बोलेंगे ही नहीं तो इस पर जनता को फैसला कर लेना चाहिए। पिछले पंद्रह साल के मीडिया कवरेज का इतिहास निकालिये। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ तारीफ ही आई है। पिछले पंद्रह महीनों के मीडिया कवरेज का इतिहास निकाल कर देखिये,मनमोहन सिंह के हिस्से में सिर्फ आलोचना ही आई है। हमारा समाज चुप रहने वालों को धीर गंभीर कहता है मगर यहां तो मनमोहन सिंह इतने चुप हो गए कि अब लोग इस चुप्पी को अड़ना समझने लगे हैं।

मैं तो सोच रहा हूं कि आज रात प्राइम टाइम में इस पर बहस ही कर डालूं।

क्यों कॉमर्स का कट ऑफ ज़्यादा होता है?

क्या यह सही है कि कॉमर्स एक विधा नहीं है? एकेडमिक डिसिप्लिन। सांख्यिकी,अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों को मिला कर वाणिज्य विषय को गढ़ा गया है। इस पर आपके पास जानकारी हो तो ज़रूर शेयर करें लेकिन कुछ लोगों से बात करने पर यही पता चला कि बाहर के मुल्कों में भी ऑनर्स कोर्स में कॉमर्स नाम का विषय नहीं होता है। अगर यह जानकारी ग़लत पाई गई तो मैं अपने लेख में संशोधन कर लूंगा। बहरहाल इस बात पर विचार करना चाहिए कि कॉमर्स के लिए इतनी मारा मारी क्यों हैं?

दिल्ली विश्वविद्लाय में कॉमर्स में दाखिला लेने के लिए कामर्स विषय वालों को प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें सीट मिले इसलिए दूसरे विषय यानी साइंस से जब कोई बच्चा कॉमर्स में आता है तो उसे हतोत्साहित करने के लिए अधिक नंबर मांगे जाते हैं ताकि कॉमर्स वालों को पहले एडमिशन मिल जाए। इसी तरह से जब कॉमर्स के बच्चे दूसरे विषयों में दाखिला लेने जाते हैं तो उनके नंबर में दो से तीन परसेंट की कमी कर दी जाती है ताकि उन्हें इतिहास,गणित या अन्य विषयों में आने से रोक सकें। इसके पीछे सोच यही है कि कॉमर्स पढ़ने वालों की ट्रेनिंग अकादमिक नहीं होती। वे इतिहास या राजनीति शास्त्र में आकर अच्छा नहीं कर पाते हैं क्योंकि उन्हें लंबे-लंबे लेख पढ़ने का अभ्यास नहीं होता। दिलचस्पी बनने में काफी वक्त लग जाता है। अपवाद के तौर पर कुछ ही बच्चे कॉमर्स से इतिहास या समाजशास्त्र में आकर बेहतर कर पाते हैं। इसीलिए कॉमर्स कॉलेजों की ज़िम्मेदारी हो जाती है कि वे पहले अपने विषय के बच्चों का दाखिला करें। इसीलिए एसआरसीसी और एलएसआर में कटऑफ ज़्यादा होता है। कॉमर्स के अच्छे कॉलेज कम है और रोज़गारपरक बाज़ारू शिक्षा के नाम पर कम पढ़ने लिखने वाले छात्रों की तादाद ज्यादा। ऐसा विषय हो जो नौकरी भी दे और थोड़ा-थोड़ा सारे विषयों को पढ़ने का अवसर भी दे दे। कॉमर्स से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन, मैनेजमेंट और बैंकों की नौकरियों में कामर्स काफी उपयोगी विषय हो गया है।

अब रही बात कि इस साल सौ परसेंट वाला कट ऑफ क्यों गया? वो इसलिए कि सिब्बल साहब और वाइस चांसलर साहब दिल्ली विश्वविद्यालय को कबाड़ करने के अभियान में लगे हुए हैं। सेमेस्टर सिस्टम के अलावा इस बार दाखिले की प्रक्रिया में बदलाव हुआ। पहले क्या होता था? पहले बच्चे फार्म भरते थे। हालांकि इसे लेकर कॉलेज दुकानदारी करने लगे थे। खैर फार्म भरने के बाद अमुक विभाग को अंदाज़ा हो जाता था कि पहले लिस्ट में कितने बच्चों को आने दिया जाए। इस बार यह व्यवस्था खत्म कर दी गई। यह कहा गया कि जो भी कट ऑफ निकलेगा उसमें आने वाले सभी बच्चों को दाखिला देना पड़ेगा। अगर चालीस सीट है और कट ऑफ के बाद सौ बच्चे आ गए तो सौ के सौ को दाखिला देना होगा। अब यहां सुविधाओं और टीचर-छात्र के अनुपात का सवाल गया चूल्हे में। तो किसी भी कॉलेज को इस बार पहले से मालूम नहीं था कि अमुक विषय में कितने कट ऑफ वाले बच्चों ने अप्लाई किया है। इसलिए उन्होंने कट ऑफ को इतना ज्यादा कर दिया कि पहले लिस्ट में उन्हें अंदाज़ा हो सके। सिर्फ इसकी वजह से बच्चों को परेशानियां झेलनी पड़ गईं।

पढ़ाई माइग्रेशन का दूसरा बड़ा कारण है। देश भर के कॉलेज कबाड़ हो गए हैं। अगर नहीं भी हैं तो उन्हें अच्छे विद्यार्थी कबाड़ ही समझने लगे हैं। दिल्ली में पढ़ने के साथ प्रतिष्ठा का भी भाव जुड़ा होता है। राज्यों ज़िलों के कॉलेजों में कुछ अच्छे और प्रयत्नशील शिक्षकों को छोड़ दें तो बाकी सब राम भरोसे आते हैं और राम भरोसे चले जाते हैं। हम इस विषय को लेकर परेशान इसलिए नहीं होते कि फायदा नहीं। उससे पहले ट्रेन का टिकट कटा लेते हैं। मैं भी इसी सिस्टम के तहत रातों रात अपने कमरे से उजाड़ कर दिल्ली भेज दिया गया। राज्यों के अच्छे कालेजों के कट ऑफ पता कर रहा था। कहीं भी सत्तर अस्सी फीसदी से ज्यादा नंबर नहीं जाता। उनके ख़राब कालेजों में औसत विद्यार्थियों की भरमार है। ९८ परसेंट वाले इन कॉलेजों को किसी लायक नहीं समझते। यह चिन्ताजनक हालात है। कपिल सिब्बल दिल्ली के दो कालेज के कट ऑफ पर बयान तो दे देते हैं मगर बाकी कालेजों के लिए वक्त नहीं। पता कीजिए देश का मानव संसाधन मंत्री पिछले कुछ सालों में कितने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के दौरे पर गया है। उनके कामकाज की समीक्षा की है। वकील हो जाने से हर मुकदमे के जीत लेने की गारंटी नहीं मिल जाती। दलील बर्तन बजाने से नहीं बजती, उसके आधार भी होने चाहिएं।

क्या कबीर बग़ावत के सबसे बड़े ब्रांड हैं?

प्रतिरोध की स्थिति में हम सब कबीर को क्यों याद करते हैं? क्या कबीर आज भी हमारे दैनिक जीवन में सामाजिक आर्थिक राजनीतिक प्रतिरोध के सबसे देसी प्रतीक हैं? जब भी संघर्ष पर उतरता है कबीर की तरह लगने या कहलाने लगता है। ऐसी क्या बात रही है कबीर में कि वे आज के पल-पल बदलते प्रेरणास्त्रोंतों आदर्शों के दौर में भी स्थायी भाव से टिके हुए हैं। युवाओं को भी कबीर वैसे ही आकर्षित करते हैं जैसे उन पर शोध करने वालों को। कई बार लगता है कि कबीर को जितना उन्हें जाननेवाले विद्वान नहीं जीते उससे कहीं ज्यादा कबीर को आमजन जीता है। किसी भी घुटन भरे मकान से निकलने के लिए कबीर खिड़की का काम करते हैं। इसीलिए उनकी पहचान जातिधर्म की नहीं है। आंखें बंद कर कबीर की कल्पना कीजिए तो किसी तस्वीर का अहसास नहीं होता बल्कि उनकी बानी सुनाई देती है।

प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक किताब आई है। अकथ कहानी प्रेम की। इस किताब को पढ़ते समय आज का समय ज्यादा दिखाई देने लगता है। पुरुषोत्तम के कबीर भले ही देशज आधुनिकता के प्रतीक हैं मगर आमजन के कबीर उदारीकरण से गढ़े गए आज के समय के आधुनिक हैं। कबीर की मौजूदगी उपभोगी समाज की आधुनिकता पर सवाल हैं। जो समझौतावादी समाज की संरचना कर रहा है उसमें कबीर बगावत के प्रतीक बन जाते हैं। कबीर जैसा होना अपनी आधुनिकता का भारतीयकरण करना है। जब भी आप जन्मजात गैरबराबरी को चुनौती देने लगते हैं कबीर की तरह बनने लगते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने अपनी किताब में एक सवाल किया है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं थीं जो ब्राह्मणों के तथाकथित शाश्वत वर्चस्व को तोड़ते हुए कबीर को हीरो बनाती थीं। मेरा सवाल है कि वो कौन सी सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाएं हैं जो कबीर को शाश्वत बनाती हैं।

जात जुलाहा मति का धीर। वो अपनी सामाजिक हैसियत पर व्यंग्य करते हैं मगर हैसियत पाने की चाहत भी नहीं रखते। एक सामान्य की रचना करते हैं। आज के समय में जब गैरबराबरी के नए-नए ढांचे बन गए हैं कबीर अपने व्यंग्यों के पुराने हथियारों से ही लड़ने में सक्षम बनाते हैं। विद्वान कबीर को जितना ही अजूबा बना लें मगर आम लोगों के बीच कबीर आज भी सहज हैं। इसीलिए हर बागी हर सादा आदमी कबीर-फकीर से तुलना पाता है। कबीर के लिए सब दोस्त हैं। कहत कबीर सुनो भाई साधो। वे सभी जातियों के पाखंड से टकराते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि कबीर ने पंद्रहवी सदी में मानवाधिकार की बात की। इस धारणा को ग़लत साबित किया कि मानवाधिकार का विकास यूरोप से बाहर हुआ ही नहीं।



कबीर कौन है? कबीर एक मानस है। आज के उदारीकरण के दौर में कई बाज़ारू लोग जीवन,आत्मसम्मान और मुक्ति का मार्ग बताने के विशेषज्ञ बने घूमते हैं। उनके पास हर परिस्थितियों के फार्मूले तैयार हैं। वो स्लोगन बेचते हैं। इन्हें मोटिवेशनल स्पीकर कहते हैं। जिन्हें आप हिन्दी में प्रेरक-वाचक कह सकते हैं। जैसे ही आप कबीर को पढ़ना शुरू करते हैं आपको जीवन जीने के मुफ्त में कई फार्मूले मिल जाते हैं। समाज को समझने का नज़रिया तो मिलता ही है,उससे लड़ने का हथियार भी। आज पेशेवर दफ्तरों में एक किस्म का सामंती ढांचा खड़ा किया जा रहा है। जहां आदमी का सबसे ज़्यादा वक्त गुज़रता है। यहां हैसियत के इतने पायदान हैं कि नीचे खड़ा हर व्यक्ति जब तक कबीरबोध का पालन नहीं करता वो अपने आप को संभाल नहीं पाता है। मगर इसे कारोबार में बदलने के लिए प्रेरक-वाचक आपको सकारात्मक सोच के बहाने समझौतावादी बनाने की चतुराई सीखाते हैं। कबीर चतुर नहीं बनाते। बागी बनाते हैं। एक ऐसा बागी जो अपने समय और समाज की बारीक समझ रखता है और विकल्प पेश करता है।

पुरुषोत्तम अग्रवाल कबीर को पश्चिमी आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में देखते हैं। कहते हैं कि कबीर अपने विचारों में कॉस्मोपोलिटन थे। इस बेहतरीन किताब को पढ़ने से पहले अपने आस पास के समाज को ठीक से देखिये और फिर उनके बीच बनते-बिगड़ते कबीर को खोजने की कोशिश कीजिए। आज हमारे ज्यादातर रिश्ते व्यापारिक आर्थिक गतिविधियों से तय हो रहे हैं। जाति संबंधों में जड़ता है तो दूसरी तरफ बदलाव भी है। व्यापार पर जाति का वर्चस्व टूट रहा है। हम कपड़ों की तरह शहर बदल रहे हैं। हर दिन आधुनिकता बदल रही है। आधुनिकता पहले से कहीं अस्थायी हो गई है। मार्डन होना अब फैशन नहीं रहा। जीवन को समृद्ध करने वाले मुहावरे,तंज और किंवदंतियां खत्म हो रहे हैं। हमारी मानसिकता शहरी या कस्बाई नहीं बल्कि अपार्टमेंटी और दफ्तरी होने लगी है। फ्लैट और दफ्तर के बीच पड़ने वाले शहर को भी ठीक से नहीं जानते। नई पहचान बन रही है तो ऐसे में आधुनिकता को नए सिरे से पहचानने के लिए सबसे बड़ा सहारा कौन हो सकता है? कबीर?

सवाल यह है कि क्या हमें कबीर चाहिए? एक ऐसा कबीर जो शाश्वत कबीर की तरह हिन्दू मुसलमान के खांचे में फिट न किया जा सके। जो माया और जात के खिलाफ खड़ा हो। जो खापों पर तंज करता हो और संसद की सर्वोच्चता के जड़वत सिद्धांत पर सवाल खड़े करता हो। संसद की सर्वोच्चता अगर शिथिलता का रूप ले ले और सिर्फ बहिष्कार और बहिर्गमन का मंच बन कर रह जाए तो समाज के कबीर क्या करें? क्या उस सिविल सोसायटी की तरफ मुड़े जिसका निर्माण कबीर ने अपने समय में किया था। पुरुषोत्तम अग्रवाल जिसे लोकवृत्त कहते हैं। लोकवृत्त और सिविल सोसायटी की तुलना नहीं की जा सकती मगर कबीर के होने और उनकी ज़रूरत पर किसे संदेह हो सकता है। आज की आधुनिकता अब कई मायनों में भ्रामक लगने लगी है। इसकी सही पहचान और छानबीन के लिए कबीर को फिर से खोजना होगा। क्या यह कम बड़ी बात नहीं कि कबीर को लोग उनकी रचनावलियों को याद रखने से नहीं जानते, संकट के समय बग़ावत के मिज़ाज से ज्यादा जानते हैं। कबीर ने देशज आधुनिकता को गढ़ा तो क्या आज की सेंसेक्स आधुनिकता में कबीर के लिए कोई गुज़ाइश बची है? ज़रूर बची है तभी कबीर हर तरफ दिखाई पड़ जाते हैं। शायद इसीलिए भी कि बाज़ारू ज़ुबान में भी निष्पक्ष बगावत का कबीर से बड़ा कोई ब्रांड नहीं है। जिस बाज़ार को कबीर माया महाठगिनी कहते हैं।
(कबीर पर लिखने की हिम्मत कर बैठा। कुछ मूर्खतापूर्ण बातें कह गया तो माफ कीजिएगा। सचमुच कम जानता हूं कबीर के बारे में। यह लेख आज राजस्थान पत्रिका में छपा है)

सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी

कांग्रेस ने चालाकी से भ्रष्टाचार के मुद्दे को धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक में बदल दिया है। रामदेव को मिठाई खिलाने से लेकर पिटाई तक के सफर में कांग्रेस अपनी कमज़ोरी को मर्दाना ताकत की दवाओं से दूर कर देने के लिए बेबस नज़र आई। दिल्ली आने से पहले रामदेव ने कहा था कि मुझे आरएसएस का समर्थन प्राप्त है। कभी नहीं कहा कि मैं आरएसएस से दूर हूं। रामदेव सरकार के दबाव में कहने लगे कि यह मंच राजनीतिक नहीं है। राजनीतिक काम करने वाले संघ को सामाजिक बता कर कब एनजीओ में बदल दिया जाता है ये सब भगवा दल की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। साधु सियासत में रंग लगाने आते और भांग घोल कर चले जाते हैं। मंदिर मुद्दे पर लुट-पिट जाने के बाद सत्ता संघर्ष में वापसी के लिए बेचैन सन्यासी दल रामदेव को सहारा बना रहे थे। शनिवार को रामलीला मैदान में मंच से धार्मिक बयान दिये जा रहे थे। भारत महान की भगवा व्याख्या होने लगी। हरिद्वार के भारत माता मंदिर ट्रस्ट के किसी भगवा प्रमुख ने कहा कि वे महाभारत के किस्से तो पढ़ते हैं मगर आज सचमुच के महाभारत में शामिल होने आए हैं। कहीं से इन सबके दिमाग में है कि प्राचीन भारत की जड़ों में सन्यासियों का पसीना है। उनके आशीर्वाद और प्रताप से प्राचीन भारत विश्वविजेता था और अगर ये मिलकर एक मंच पर आ जायें तो भारत फिर से विश्वविजेता हो जाएगा। विश्वविजेता वाली अवधारणा ही कुंठित मनों की बुनियाद पर टिकी है।


रामदेव अगर सिर्फ योग के दम पर सर्वमान्य नेता बनने चले थे तो उन्हें संघ परिवार को लेकर अपनी नीति साफ करनी चाहिए थी। मंच से एक दो मुसलमानों को बुलवा देने से कोई सेकुलर नहीं हो जाता। बोलने के लिए तो एक जैन साधु भी बोल गए। मनोज तिवारी भी गाना गा गए। लेकिन इन सबसे से पहले रामदेव आरएसएस के समर्थन का बयान दे चुके थे। पूरे पंडाल में किसी हिन्दू महासभा का पोस्टर लगा था। आर्य वीर दल का पोस्टर लगा था। केसरिया पगड़ी धारण किये हुए लोग एक धर्म एक रंग का माहौल बना रहे थे। इससे पहले भी भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस के पोस्टर बैनर और नारों से सांप्रदायिक मन को राष्ट्रीय भावना वाला कवच पहनाने की कोशिशें होती रही हैं। यह सही है कि रामदेव ने कभी सांप्रदायिक बयान नहीं दिया। कम से कम मुझे अभी याद नहीं आ रहा है। मगर रामदेव ने स्टैंड क्यों नहीं लिया। वे अब क्यों कह रहे हैं कि उनका बीजेपी से कोई लेना देना नहीं। फिर वे क्यों कहते हैं कि उनका आरएसएस से लेना देना है।

रामलीला मैदान में जब मैं बोल रहा था कि मंच पर धार्मिक प्रतीकों, मुहावरों और प्रसंगों के ज़रिये भारत की व्याख्या की जा रही है। मैंने लाइव प्रसारण में कहना शुरू कर दिया कि भ्रष्टाचार से हर मंच से लड़ा जाना चाहिए लेकिन क्या हमने आमसहमति बना ली है कि हम इस लड़ाई के साथ-साथ भारत की धार्मिक व्याख्या भी करेंगे। अगर ऐसा है तो क्या धर्म के भीतर फैले भ्रष्टाचार से लड़ने की भी कोई पहल होगी? पास में खड़े एक सज्जन भड़क गए और कहने लगे कि धर्म को राष्ट्र से अलग नहीं किया जा सकता। ऐसी फालतू की दलीलें पहले भी सुन चुके हैं जब लोग राम मंदिर के नाम पर सत्ता सुख प्राप्त करने के लिए जुगाड़ कर रहे थे और जनता को गुमराह कर रहे थे। अगर यह दलील इतनी ही शाश्वत है तो फिर नितिन गडकरी क्यों कहते हैं कि राममंदिर बीजेपी का मुद्दा नहीं है। तो किसका था और किसका है। रथ लेकर किसके नेता निकले थे? इसीलिए धर्म से राष्ट्र की व्याख्या नहीं कर सकते। कब कौन किस पुराण की दलील देकर किधर से निकल ले पता नहीं चलता। प्रवेश करने और निकलने का मार्ग खुला रहता है। सरस्वती शिशु मंदिर और गुरुकुल की लड़कियों से हिन्दू राष्ट्र गान गवा कर किसी आंदोलन को आप गैर राजनीतिक नहीं बता सकते। पंडाल में मौजूद कई लोग जो संघ से जुड़े या समर्थन रखते हैं, दूसरे संगठन में काम करते हैं, दिल्ली आई भीड़ के ज़रिये किसी धर्म राष्ट्र का सपना तो देख ही रहे थे।

रही बात सरकार की तो वो अपने अहंकार में इतनी मदमस्त रही कि पहले दिन से लेकर आखिर दिन तक टेटिया ज़बान में बात करती रही। अण्णा हज़ारे के आंदोलन को फर्जी सीडी के ज़रिये ध्वस्त करने की कोशिश की गई। जब एक्सपोज़ हो गई तो लगी कमेटी से गंभीर बात करने। लेकिन इस बार सतर्क थी। रामदेव नहीं थे। सरकार ने रामदेव को फंसा लिया। चिट्ठी लिखवा ली। जिस तरह से चिट्ठी दिखाई जा रही थी उससे बाबा तो एक्सपोज हो ही रहे थे सरकार भी हो रही थी। रामदेव को अपनी ताकत दिखाने के बजाए अण्णा हज़ारे के साथ चलना चाहिए था। संघ और हिन्दू महासभा के लोगों को मंच पर बुलाकर मंच को राजनीतिक नहीं बनाना चाहिए था। बीजेपी भी गैर ज़िम्मेदाराना बर्ताव कर रही थी. अपने प्रोग्राम में जब मैंने राजीव प्रताप रूडी से पूछा कि क्या आप रामदेव के सभी मांगों का समर्थन देते हैं तो सीधा जवाब नहीं दिया। मैंने पूछा कि क्या पांच सौ के नोट खत्म करने और हिन्दी मीडियम शुरू करने की मांग पार्टी की है तो जवाब नहीं दिया। कहा कि पहले भ्रष्टाचार पर तय हो जाए उसके बाद देखेंगे।अब बीजेपी सत्याग्रह कर रही है कि रामदेव पर अत्याचार क्यों हुआ? फिर से जलियांवालां बाग और आपातकाल की यादें आने लगीं। किसी भी सूरत में इसकी तुलना जलियांवालां बाग से नहीं की जा सकती। इसके बावजूद कि कांग्रेस ने लाठी चलवा कर बड़ी ग़लती की है। इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। वो सिर्फ अपनी सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन करना चाह रही थी। पांच हज़ार पुलिस लेकर कूदने की कोई ज़रूरत नहीं थी। तब फिर राहुल गांधी कहां जाकर आंदोलन करेंगे और भट्टा परसौल की तरह मायावती की आलोचना करेंगे कि गांव के लोगों को पुलिस ने पीटा।

रामदेव का अपना मार्केट है। वे मार्केट में खेलने वाले सन्यासी रहे हैं। कई लोग मंच पर ही ग्यारह और बारह लाख का चंदा देने लगे। रांची के राम अग्रवाल ने तो ग्यारह लाख का चेक थमा दिया। दिल्ली के अशोक विहार की सभा में पचास लाख रुपये जमा होने की ख़बर थी। संसाधनों की कोई कमी नहीं रामदेव के पास। भ्रष्टाचार से लड़ने की नीयत पर भी सवाल नहीं खड़े किये जा सकते। मगर समर्थन,साधन और तरीके को लेकर बहस तो हो सकती है। शायद इसी वजह से रामदेव का आंदोलन सर्वमान्य सर्वधर्म नहीं बन सका। रामदेव के सलाहकार ग़लत थे। अब वे अपनी लड़ाई छोड़ आरएसएस और बीजेपी पर सफाई देते फिरेंगे। उन्हें तय करना होगा कि भारत को वैकल्पिक रूप से समृद्ध और खुशहाल करने का रास्ता बचे-खुचे हिन्दू संगठनों से ही जाएगा या कोई दूसरा तरीका भी है। कई बार लगता है कि वे रामलीला मैदान के पंडाल के मोह में फंस गए। जब डील हो ही गई थी तो वापस चले जाना चाहिए था। किसी व्यापारी का ही तो पैसा लगा था,उसे पुण्य तो तभी मिल गया था जब उसने बैंक से पैसे निकाल कर बाबा को दे दिये थे। उसके दुख की क्या चिन्ता।

ज़ाहिर है रामदेव और सरकार दोनों एक दूसरे से खेल रहे थे। लड़ नहीं रहे थे। इस खेल-खेल में कुछ भयंकर किस्म की ग़लतियां हो गईं। यह सरकार अब पब्लिक पर ही ताकत दिखाएगी। लाखों करोड़ों लूट कर चले गए लोगों में से दो चार को जेल भेज कर सत्याग्रही बन रही है। सवाल दो बड़े हैं। क्या किसी सही मुद्दे से लड़ने के लिए सांप्रदायिक शक्तियों का सहारा लिया सकता है और दूसरा क्या सेकुलर बने रहने के लिए किसी सरकार को अहंकारी और घोटालेबाज़ बने रहने दिया जा सकता है? बहरहाल फिर से सेकुलर बनाम सांप्रदायिकता का ट्वेंटी ट्वेंटी शुरू हो गया है।

नोट- वैसे सलवार कमीज़ और दुपट्टे में रामदेव सुसंस्कृत,सुशील,सौम्य और घरेलु लग रहे हैं। यह तस्वीर दुर्लभ है। प्राण देने वाले बाबा ने प्राण बचाने के लिए स्त्री धर्म का जो सम्मान किया है उसका मैं कायल हो गया हूं। हज़ारों की भीड़ ने बाबा को बचाने की कोशिश नहीं की, लड़कियों के छोटे से समूह ने यह जोखिम उठाया। उनका सम्मान किया जाना चाहिए।

पत्रकारिता का विचार-वाचन काल

नानाप्रकारनिगमागमसम्मत। दसवीं की हिन्दी की किताब में किसी मशहूर लेख का हिस्सा था। तुलसी के बारे में किसी महान लेखक ने लिखा था शायद। खैर यह संदर्भ ग़लत भी हो तो कोई बात नहीं। मैं पहली पंक्ति यानी प्रमेय का इतना सा मतलब समझता हूं कि एक व्यक्ति में जीवन के तमाम पहलुओं को विचारने और बोलने की क्षमता आ जाए तो वो ऐसे प्रमेयों पर खरा उतरता है। टीवी ने एक ऐसा चैट ब्रिगेड पैदा कर दिया है जो दस मिनट में किसी भी बहुमुखी समस्या पर एकमुखी जवाब देने में माहिर हैं। हबर-हबर सवालों को ठेल-ठेल कर अपने जवाबों के लिए स्पेस बना लेते हैं। वो आते हैं। आते-जाते रहते हैं। कई बार समस्याओं की ऐसी परत खोल जाते हैं जो वायुमंडल में अनियंत्रित विचरित करने लगते हैं। टीवी तो ब्रेक लेकर लौट चुका होता है मगर सुनने वालों के कानों से मस्तिष्क तक की यात्रा में उनके विचार कैसे-कैसे रूप धरते होंगे मालूम नहीं।

टीवी पर चैट ब्रिगेड अब एक हकीकत है। टीवी के उदय के साथ ही आया। अख़बारों में तो इस चैट ब्रिगेड के हवाले पांच एकड़ का संपादकीय पन्ना कर दिया जाता रहा है। जिनमें हम सभी अपना कूड़ा और सोना एक साथ उगलते रहते हैं। जनमत निर्माण की प्रक्रिया में। सरकार,सेना,विश्वविद्यालय से रिटायर हुए इन चैट गुरुओं के दम पर टीवी का काम चलेगा। पत्रकारों को अब ऐसा मौका नहीं मिलेगा कि वो मौके पर जाने के अपने अनुभवों का सार दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर सकेंगे। इसलिए अब इन चैट गुरुओं के विशाल अनुभवों का लाभ उठाया जाने लगा है। टाइम्स नाउ ने इसे औपचारिक और सांस्थानिक रूप दे दिया है। दो घंटे तक दर्शकों का कौन वर्ग एक या दो मुद्दे पर लगातार अलग-अलग विचार वाचन सुन रहा है मालूम नहीं। सुन ही रहा होगा तभी हर तरफ उसकी अनुकृति दिखाई देती है। टाइम्स नाउ से पहले जब एनडीटीवी ने न्यूज़ आवर, बिग फाइट,मुकाबला और वी द पिपुल की शुरूआत की थी तब ऐसे शो सप्ताहांत में ठेले जाते थे। सीधी-बीत,कशमकश,मुद्दा, ज़िंदगी लाइव,सलाम ज़िंदगी,वर्सेस,अस्मिता जैसे कई शो अस्तित्व में आए। आप की अदालत ने तो पायनियर का काम किया है।

माना जाता था कि छुट्टी के दिन दर्शक विचार-वाचन सुनना पसंद करेगा। इन शो के लिए विचार वाचक खोजे गए। कई लोग इस आधार पर रिजेक्ट किए गए,जो जानकारी तो बहुत रखते थे मगर बोलने की शुरूआत पृष्ठभूमि और संदर्भ से करने लगते थे। हर सवाल का जवाब उस मुद्दे पर लिखी गई सारी किताबों का सार प्रस्तुत कर देने लगते थे। इसी ट्रायल एंड एरर में कई लोगों ने बाज़ी मार ली। उन्होंने खुद को ज़रूरतों के हिसाब से ढाल लिया। वो सवाल कोई सा हो मगर अपना जवाब तीस सेकेंड में वायुमंडल में ठेल देते हैं तो तरंगों पर सवार होकर आपके कानों तक पहुंचने लगा। बहुत से विचार-वाचक एंकर के मुकाबिल स्टार हो गए। उनकी पूछ इतनी बढ़ गई कि एक आदमी के पीछे पांच-पांच चैनल के गेस्ट रिलेशन के लोग पैदा हो गए। हर चैनल में गेस्ट रिलेशन संपादकीय टीम का हिस्सा हो गया। नेता,विचार-वाचक अब इस गेस्ट रिलेशन के लोगों के संपर्क में आ गए। पत्रकारों की जगह इन लोगों ने ले ली। जो जानकारी एक पत्रकार को होनी चाहिए कि किस विषय पर कौन कैसा बोलता है वो अब गेस्ट रिलेशन के लोग जानते हैं। इसीलिए इन्हें अब पत्रकार और संपादकीय टीम का हिस्सा मानना ही होगा। ख़बरों की भनक भी कई मामलों में इन्हें पत्रकारों से पहले लग जाती है। पर अभी इन्हें वो संपादकीय सम्मान नहीं मिला है।

ख़ैर,टाइम्स नाउ ने न्यूज़ आवर की परंपरा को आगे बढ़ाया। अब हर चैनल में विचार वाचन तुरंत होने लगा है। उसी दिन और उसी शाम। विचार-वाचन पत्रकारिता अब वीकेंड नहीं रही। डेली हो गई। जिस दर्शक के बारे में कहा जाता है कि समय नहीं है उसके पास ठहर कर ख़बर देखने-सुनने की इसलिए स्पीड न्यूज़ दो वही दर्शक ठहर-ठहर कर विचार सुन रहा है। वो भी रोज़। अब कोई तो बताये कि दर्शकों के पास कहां से घंटों विचार सुनने का वक्त पैदा हो गया है। हिन्दी-अंग्रेजी कोई सा भी चैनल हो किसी न किसी पर कोई न कोई गेस्ट होता ही है। विचार-वाचकों का न्यूज़ रूप में औपचारिक नाम गेस्ट होता है। जिसे एंकर लाइव होते ही जानकार बताता है। मुझे विचार-वाचक तुलसी की तरह लगते हैं। इन्हें जीवन का हर दर्शन मालूम होता है। ये हर सवाल का मुकम्मल जवाब दे सकते हैं। अखबारों में भी नए-नए विचार वाचक ढूंढे जा रहे हैं। वहां भी टीवी की प्रक्रिया का असर हो रहा है। वहां भी जानने वाले की जगह पहचाने जाने वाले को ढूंढा जा रहा है। जो फेस है वही रेस में है। जो फेस नहीं है वो आउट। विचार का संबंध जानकारी से कम पहचान से ज्यादा हो रहा है।

पाकिस्तान को लेकर ही सारी थ्योरी अपनी जगह पर स्थिर है। मगर विचार-वाचक आकर उसे प्लावित कर देते हैं। किसी भी बहस में पाकिस्तान को लेकर उम्मीद पैदा नहीं की जाती। उसके आवाम की कोई तस्वीर नहीं बनती। सिर्फ धांय-धांय बात-बम फेंका जाता रहा है। कितने साल से कहा जाता रहा है कि पाकिस्तान नाकाम और नापाक हो चुका है। मगर पाकिस्तान तो अपनी जगह पर कायम है। चुनौतियां किस मुल्क के इतिहास में नहीं आतीं। बात और है कि पाकिस्तान की यह रात थोड़ी लंबी हो गई है। पाकिस्तान को लेकर होने वाली हर बहस में भारत को जीतना ही क्यों ज़रूरी होता है। सियासी प्रवक्ता तो हर सवाल पर एक ही बात करते हैं। इनका-उनका चलता रहता है। उनकी बातों को ध्यान से सुनें तो कोई नतीजा नहीं निकलता। ऐसा लगता है कि बिना साइलेंसर वाली बाइक भड़भड़ाते हुए मोहल्ले से गुज़र गई। जब तक आपने खिड़की खोली कि हुआ क्या है तब तक न धुआं बचता है न शोर। सियासी प्रवक्ता शाम को टीवी पर आने में माहिर हो गए हैं। इनमें शरद यादव जैसे माहिर नेता भी हैं। साफ मना कर देते हैं। कहते हैं सियासी बातें ऐसे नहीं होती हैं। लेकिन बाकी लोगों को तो पार्टी की तरफ से काम दिया गया है कि टीवी में बोलना है। उनकी बात को काटने का प्रमाण तो होता नहीं। सिर्फ एंकर के भयंकर और नवीनतम सवाल होते हैं। लगता है कि बम ही छोड़ दिया लेकिन छुरछुराने के बाद कोई धमाका नहीं होता। क्योंकि कई जगहों पर अब रिपोर्टर ख़बर नहीं,गेस्ट लाने लगा है।

आप देखते रहिए माफ कीजिएगा सुनते रहिए टीवी।पर एक बात है अच्छा बोलने वाला मिले, धज और धमक से तो बहस में वाकई मज़ा आ जाता है। नई दलील आ जाए,नई बात आ जाए तब। कई बार यही गेस्ट रिपोर्ट की अधूरी ख़बर को अपनी जानकारियों से पूरी भी कर देते हैं। यह शुक्ल पक्ष है। बहरहाल,विचार-वाचन पत्रकारिता का औपचारिक स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि ये मौजूद तो टीवी के आने के समय से ही है। टीवी दिखाने की जगह बोलने की चीज़ हो गया है। लोकसभा टीवी से लेकर तमाम टीवी में लंबी-लंबी चर्चाएं हो रही हैं। अमर्त्य सेन ने ठीक ही कहा है कि हम बातुनी इंडियन हैं। हर जगह वही लोग बोल रहे हैं। वही लोग सुन रहे हैं। कुछ लोग बहुत अच्छा बोल रहे हैं। कुछ लोग वही बात बार-बार अच्छा बोल रहे हैं। जो बोलता है वो दिखता है। नया फार्मूला। वैसे है पुराना। नया कहने से थोड़ा कापीराइट का क्लेम आ जाता है।

लूटों इन किसानों को, विकास बचा लेगा तुम्हें

खेती के विकास के लिए कभी आपने नेताओं की इतन सक्रियता देखी है? ग्रेटर नोएडा से लेकर देश के सैंकड़ों स्थानों पर किसानों की ज़मीन विकास के लिए ली जा रही है। खुद खेती संकट के दौर से गुज़र रही है। अनाजों को रखने के लिए अभी तक गोदाम नहीं बन सके हैं। फल-सब्ज़ियों के उत्पाद को बचाने के लिए वातानुकूलित स्टोरेज की व्यवस्था तक नहीं कर पाये। किसान का कर्ज़ा माफ करके और उस पर कर्ज़ लाद कर उसे वहीं का वहीं रख छोड़ा जा रहा है। किसानों के साथ विकास के नाम पर मज़ाक हो रहा है। गांवों में आप स्कूल,सड़कों और बिजली की हालत देख लीजिए। किसानों के बच्चे किस स्तर की शिक्षा पा रहे हैं। बीबी-बच्चों का अस्पताल जिन सरकारी अस्पतालों में होता है उनकी हालत देख लीजिए। इन सब हालात में सुधार के लिए तो कोई राजनीतिक दल आगे नहीं आता। उनके लिए अब तक कि सबसे बड़ी परियोजना यही सोची जा सकी कि उनकी दिहाड़ी मज़दूरी तय कर देते हैं। एक तरफ उन्हें पिछड़ा बनाए रखो और दूसरी तरफ उन्हें ख़ैरात बांट दो और इस खैरात का भार न पड़े इसलिए रोज़ाना पंद्रह रुपये से अधिक कमाने वाले को ग़रीब से अमीर घोषित कर दो। गांवों और किसानों के विकास के नाम पर बनी तमाम योजनाओं संपादकों के कॉलम में ही ज्यादा बेहतर और नियोजित नज़र आती हैं। ज़मीन की तस्वीर वही है जो बीस साल पहले थी। कुछ सरकार से भावनात्मक आशीर्वाद प्राप्त पत्रकार तो अब यह दलील देने लगे हैं कि देखिये गांवों में लोग टीवी खरीद रहे हैं, डिश टीवी आ रहा है, बाइक की सेल्स बढ़ गईं हैं, वहां कोई गरीबी नहीं हैं। गांवों में पैसा है।

हमारे किसानों और गांवों को बाज़ार में भी बराबरी से उतरने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सरकार ने तो उन्हें गैर बराबरी के नीचे दबाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक की दूरी सिर्फ पचास किमी कम हो जाए इसके लिए हज़ारों हेक्टेयर उपजाऊ ज़मीन ले ली गई। किसानों को भूमिहीन बना दिया गया। इसी के साथ खेती पर निर्भर तमाम तरह के खेतिहर मज़दूर भी बेकार हो गए। टप्पल से लेकर ग्रेटर नोएडा तक ऐसे कई किसानों से मिला जो पहले ज़मींदार थे। छोटी जोत के। ये सब अब भूमिहीन हो गए हैं। बैंकों में इनके साठ लाख की फिक्स्ड डिपोज़िट ज़रूर होगी मगर ये बेकार हो चुके हैं। दूसरे गांवों में ज़मीन लेना और बसना इतना आसान नहीं होता। पारंपरिक पेशे से उजड़ने और ज़मीन से जुड़ी सामाजिक मर्यादा के नुकसान की भरपाई मुआवज़े की राशि में नहीं होती है। इस बात का तो अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है कि ज़मीन से बेदखल होने का गांव के पारंपरिक सामाजिक संबंधों पर क्या असर पड़ता है। राजनीतिक नारेबाज़ियों के बीच टप्पल में ही कई दलित किसानों से मिला। कानूनी अड़चनों के कारण उनकी ज़मीन का बाज़ार भाव कम होता है। दलितों ने बताया कि हमें तो अधिक दाम मिला लेकिन वो पैसा जल्दी ही घर बनाने और शादी ब्याह में खत्म हो गया. हम भी जाटों की तरह ही बेकार और विस्थापित हो गए।

इसी के साथ यह सवाल भी उभरा कि फिर इन किसान आंदोलनों के नेतृत्व या समर्थक के पैमाने पर दलितों की भागीदारी कम या नहीं के बराबर क्यों हैं? टप्पल का विरोध बड़ा नहीं होता अगर चौधरी कहे जाने वाले किसानों की ज़मीन नहीं गई होती। मेरी समझ से यह मौजूदा किसान आंदोलनों का अंतर्विरोध है। फिर भी आप देखेंगे कि किसान आंदोलन अब किसी राजनीतिक दल के मंच से नहीं होते। ग्रेटर नोएडा से लेकर टप्पल तक अलग-अलग किसान संघर्ष समितियां हैं। वक्त पड़ने पर इनके बीच साझा ज़रूर हो जाता है मगर इनका चरित्र स्थानीय है। आगरा के भूमि बचाव संघर्ष समिति के नेता ने कहा कि मुआवज़े की लड़ाई ही नहीं हैं। हम तो ज़मीन ही नहीं देना चाहते हैं। सरकार हमें पांच सौ रुपये प्रति वर्ग मीटर( अनुमानित राशि) देती है जबकि बिल्डर को देती है दो से तीन हज़ार वर्ग मीटर के दर से। यानी पहला मुनाफा तो सरकार ने ही बनाया। फिर बिल्डर उस ज़मीन को पंद्रह से बीस हज़ार प्रति वर्ग मीटर के रेट से बेच रहा है। अगर आप इस इलाके की ज़मीन का औसत मूल्य के आधार पर भी हिसाब लगाए तो यह घोटाला तीस लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का है। सवाल है कि सरकार क्यों नहीं किसानों को सीधे बाज़ार में उतरने दे रही है। वो उनसे ज़मीन लेकर बिल्डरों को क्यों बेच रही है। जो सरकार को मुनाफा हो रहा है वो किसानों को क्यों नहीं मिल रहा है।

दूसरी बात क्या कोई साबित कर सकता है कि बीस साल के उदारीकरण में जो विकास हुआ उसमें किसानों की भी हिस्सेदारी रही। भागीदारी तो नहीं रही उनकी। फिर किस हक से उनकी ज़मीन हड़प ली जा रही है। बुनियादी ढांचे के विकास की इतनी बेताबी है तो खेती में बुनियादी ढांचे के विकास की बात क्यों नहीं हो रही है। कितनी सिंचाई परियोजनाएं आपने इस दौरान बनती देखी है। कितनी ऐसी योजनाएं आपने देखी हैं, मधुमक्खी पालन के अलावा, जिनसे खेती का उद्योगिकरण हो रहा है।

मीडिया तो राहुल गांधी को कवरेज देगी ही। लेकिन जो सवाल है तीस लाख करोड़ रुपये के घोटाले का,उसकी कोई तहकीकात नहीं करेगा। क्योंकि ये सवाल उसे मायावती तक ले जाने से पहले प्रायोजकों के दरवाजे पर ले जायेंगे। इसलिए आप किसानों के इस आंदोलन की कवरेज में पीपली लाइव का तमाशा देखिये। ऐसा फालतू दर्शक समाज मैंने कहीं नहीं देखा और पालतू मीडिया। किसान मुआवज़े की राशि लेकर देसी शराब के ठेके पर नहीं जायेगा तो क्या करेगा। उसे क्या हमने ऐसी तालीम दी है कि वह अपना उद्योग धंधा कायम कर सके। आखिर मुआवज़े से विकास होता तो आप ग्रेटर नोएडा और गुड़गांव के किसानों का अध्य्यन तो कीजिए और पता तो लगाइये कि इतनी बड़ी राशि आने के बाद कितने किसानों ने उद्यमिता का मार्ग अपनाया। हां कुछ किसानों की शानो शौकत की खबरें आप अखबारों में ज़रूर पढ़ते रहे होंगे। ये वो कुछ किसान हैं जिनके पास बेहिसाब ज़मीन थी और राजनीतिक सत्ता से संबंध जिनके बूते इन्होंने अपने पैसा का तानाबाना बुन लिया। बाकी किसान पव्वा और अध्धा में ही व्यस्त रह गए। टेंपो ड्राइवर बन गए।

भाई साहब,किसी नेता से पूछिये तो वो किसी बिल्डर के बारे में क्यों नहीं बोल रहे। कमीशन तो उन्हें भी मिलता रहा है बिल्डरों से। माफ कीजिएगा। ये आज कल डेवलपर कहलाने लगे हैं। विकास आज के समय का सबसे बड़ा डाकू है।

बंगाल में अदल-बदल

ठीक है कि हम दंगों की आग में नहीं जले। लेकिन पेट की आग भी बड़ी चीज़ होती है। बंगाल के मुसलमानों की हालत ख़राब है। अपनी बात कहते हुए अलीमुद्दीन मस्जिद के नीचे बैठे गुलाम हुसैन टेलिग्राफ में छपे आंकड़ों को दिखाने लगे। ये देखिये केंद्र का मंत्री गलत बोलेगा। क्या हुआ मुसलमानों के साथ आप खुद देखिये न। पास में बैठे रसूल मियां मुस्कुराते हुए हज़ामत बना रहे थे. मैंने पूछा कि क्यों हंस रहे हैं? बोले १९६३ से यहीं बैठा हूं। मोतिहारी से कलकत्ता आया था। कमाने। ज्योति बसु का ज़माना ठीक था। कुछ उम्मीद थी। वाम दल ने हमको सड़कों से हटाया नहीं लेकिन कुछ बदला नहीं। हम तो यहां तब से है जब अलीमुद्दीन स्ट्रीट में सीपीएम का दफ्तर नहीं था। मेरे इस पेड़ के नीचे बैठने के बाद ही तो पार्टी बनी। पहले इस गली में सीपीआई का दफ्तर होता था। देखिये चार कमरे से कितना बड़ा दफ्तर हो गया।

आप जिन आवाज़ों को सुन रहे हैं वो उसी अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर सुनाई दे रही थीं जहां सीपीएम का मुख्यालय है। मुस्लिम बहुल इलाका लगता है। कोई हलचल नहीं है। चौरंगी विधानसभा इलाके में पड़ता है सीपीएम मुख्यालय। तृणमूल का गढ़ माना जाता है। इसलिए यहां से सीपीएम नहीं लड़ रही है। लालू का लालटेन छाप है। यहां रहने वाले मुसलमानों में वाम सरकार को लेकर जाश नहीं दिखा। ब्रेड बिस्कुट बेचने वाले एक मुस्लिम दुकानदार का कहना था कि यहां तो लोगों ने बारात घर तक नहीं बनवाया। नाली-पानी तक का इंतज़ाम नहीं किया। तृणमूल के इकबाल साहब(नाम ठीक से याद नहीं) ने कितना काम किया। सीपीएम का पार्टी आफिस ही देख लीजिए। सफेदी भी नहीं कराते। कम से कम रंगाई-पुताई में ही दस लोगों को काम मिल जाता। अच्छा कपड़ा पहनने से लगता है कि आदमी काम का है।

बंगाल के मुस्लिम इस बार अलग तरीके से सोच रहे हैं। वो अपने हालात पर सवाल खड़े कर रहे हैं। बंगाल के घर-घर में चल रहे मुस्लिम कारीगरों की हालत रोटी-पानी के जुगाड़ तक ही सीमित है। काम तो मिल रहा है मगर यह काम उन्हें किसी काम का बनाने में मदद नहीं कर रहा। सेकुलर दलों को सोच लेना चाहिए कि इस देश का मुसलमान सिर्फ बीजेपी के भय से उसके साथ चिपका नहीं रहेगा। सांप्रदायिकता मुद्दा है मगर इसके अलावा भी कई ज़रूरी सवाल हैं। सीपीएम ने समझने में देर कर दी। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को खारिज कर देना और बताना कि हाल के दो साल में काफी सुधार हुआ है काफी नहीं है। दो साल के काम से किसी समुदाय की आर्थिक हैसियत में बहुत बदलाव नहीं किया जा सकता है। यही काम पांच साल पहले हुआ होता तो राजनीतिक वोट में भी बदल सकता था। मदरसा शिक्षकों को वेतन देने से मुस्लिम समाज का काम नहीं हो जाता है।

जहां भी गया आम मुसलमानों में ममता के प्रति खास लगाव देखा। ममता इसे समझ गईं हैं। इसलिए भाषण में ऊर्दू को दूसरी भाषा बनाने का लोकलुभावन नारा देती हैं। ममता ने बंगाल की राजनीति को ऊपर से हिन्दी,ऊर्दू और बांग्ला तीन खांचों में बांट दिया है। प्रवासी लोगों के लिए अलग से बातें करती हैं। सीपीएम बचाव की मुद्रा में अपनी बात रख रही है। ये और बात है कि ऊर्दू को सेकेंड लैंग्वेज बना देने से भी मुसलमानों को कोई भला नहीं होने वाला। मगर ममता के तालीबजावन नारों से ही एक नई उम्मीद पैदा हो रही है। तृणमूल के कार्यकर्ताओं के समूह को ठीक से देखिये। मुस्लिम कार्यकार्ताओं की सक्रियता खूब दिखेगी।

होज़ियरी के मामले में बंगाल ने पिछले पंद्रह सालों में काफी तरक्की की है। दिल्ली के गांधीनगर में ही व्यापारियों ने बताया था कि लड़कियों के फ्राक बनाने के मामले में कोलकाता का जवाब नहीं। कोलकाता गया तो शाहरूख, ह्रतिक,सनी,सैफ,अक्षय,नितिन मुकेश सब के सब गंजी अंडरवियर के प्रचार में होर्डिंग पर खड़े नज़र आ रहे थे। पता किया तो लोगों ने बताया कि पंद्रह हज़ार करोड़ रूपये का कारोबार है होज़ियरी का। मटियाबुर्ज़ का इलाका इसका गढ़ है। घर-घर में मशीनें चल रही थीं। सब मामूली कारीगर। किसी घर में दो सिलाई मशीन तो किसी में चार। कुछ की हैसियत बड़े व्यापारियों जैसी ज़रूर दिखी लेकिन हर दूसरी मशीन पर दस से बारह साल के बच्चों को कपड़े सिलते देखा तो लगा कि वाम राजनीति विचारधारा के ईंधन से ज्यादा समय तक नहीं चल सकती। पंद्रह घंटे काम करते हैं ये बच्चे। बच्चों के कपड़े बच्चे ही सिलते मिले। लोगों ने बताया कि क्या करें इन्हें पढ़ाई के लिए भेजें या काम करायें। ये बच्चे बटम टांकने का काम नहीं कर रहे थे बल्कि पूरी तरह के कुशल दर्जी की तरह कपड़ों को सिल रहे थे।

एक व्यक्ति ने कहा कि पूरा परिवार मिल कर काम करता है तो भी महीने की कमाई पूरी नहीं पड़ती। इलाके में एक स्कूल था। अब जाकर बन रहा है। हम लोग अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं। क्या करें इस धंधे से पेट ही भरता है बस। बदलाव नहीं होता है। होज़ियरी पर दस फीसदी का कोई टैक्स लगा है,उसे लेकर घर-घर में बातें हो रही हैं। ममता कहती हैं कि प्रणब दा से बोल कर हटवा देंगी। सीपीएम कहती हैं कि जब बजट पास हो रहा था तब क्यों नहीं सवाल उठाया।

बाहर निकला तो मुस्लिम बच्चे क्रिकेट खेलने में व्यस्त थे। मैदान न होने का दोष सीपीएम पर मढ़ रहे थे। सलमान ने कहा कि मल्लिका विक्टोरिया ने तो कोलकाता को कितना बड़ा मैदान दिया। हम लोगों को कुछ नहीं दिया। हम दूसरे मोहल्लों में जाते हैं तो विकास देखेते हैं। वहां सब कुछ होता है। मुस्लिम मोहल्ले में क्यों नहीं होता है। हमारा एरिया बैकवर्ड क्यों लगता है। अगर किसी को यह आवाज़ नहीं सुनाई देती है तो इसका मतलब है कि उसकी हार तय है। राजनीति को ज़िंदा रहने के लिए विचारधारा ही नहीं चाहिए। उसे अब क्रिकेट का मैदान और स्कूल की परवाह करनी होगी।

बंगाल की ग़रीबी ने प्रवास की एक नई पीड़ा को जन्म दिया है। यहां की औरतें पलायन कर रही हैं। अकेले। बिहार यूपी से मर्दों का पलायन ज्यादा हुआ। मगर बंगाल से औरतें के पलायन पर किसी का ध्यान नहीं गया है। अपने छह से दो साल के बच्चों को छोड़ कर ये औरतें घरों में काम करने निकल रही हैं। गांव-गांव में बच्चे सास,नानी,ननद के भरोसे हैं। मेरे घर में अब तक दस बारह लड़कियां काम कर गईं। इसलिए ज्यादा समय तक टिक न सकीं क्योंकि बच्चों की याद सताती थी। मैं खुद सोचता रहता था कि ये दिन भर अपने बच्चे को याद करती होगी, मेरी बेटी को कैसे प्यार से खिलाती होगी। जाने वाली हर बाई से पूछता था कि ज्यादा पैसे जमा हो जाए तब जाया करो। जवाब मिलता था कि हमारा पांच छह हज़ार में ही कई महीने तक काम चल जाता है। अब यह बंगाल के जीवन का सस्ता होने का प्रमाण तो है मगर यह भी सोचिये कि यही पांच हज़ार कमाने का साधन नहीं। यह संकट सिर्फ बंगाल का नहीं है। बिहार का भी है। पलायन पीड़ा दे रहा है। बागी बना रहा है। बंगाल की औरतों ने बंगाल के बाहर की हकीकत को देखा है। एक दूसरे किस्म का नरक भोगा है। शायद उनकी यही तकलीफ ममता से जुड़ जाती है। यही कारण है कि दिल्ली से बड़ी संख्या में कामवालियां अपने घरों को लौटी हैं, ममता को वोट देने।

बंगाल में ममता को संजीवनी इन्हीं नाराज़ आवाज़ों से मिल रही है जिसे सीपीएम के काडर सुन नहीं पा रहे। वो इसी धुन में हैं कि पिछले छह महीने में काफी सुधार कर लिया है। अब हालत उतनी बुरी नहीं है। ममता सरकार नहीं बना सकेगी। सवाल सरकार बनाने का ही नहीं उन सवालों का भी है जो बंगाल में उठ रहे हैं। देखतें हैं कि क्या होता है। सीपीएम सत्ता में आती है या जनता की ममता। लेकिन जब लेफ्ट के नेता पूछने लगे कि आपको क्या लग रहा है और जब आप यही सवाल उनसे कर दें और वे कहने लगे कि नहीं हमने काफी सुधार कर लिया है, तो यह समझ लेना चाहिए कि हवा खामोश है। कई आम लोगों से राय जानना चाहा। एक भी बाइट लेफ्ट के समर्थन में नहीं मिला। अब मैंने दस हज़ार से तो नहीं पूछा लेकिन जिन दस बीस लोगों से पूछा सब वाम सरकार के कामकाज पर खामोश हो गए। मगर तृणमूल और ममता को लेकर खूब बोलते दिखे। वो वाम दल का समर्थन करने का साहस नहीं दिखा पा रहे थे। माइक नीचे करते ही एक ही बात कहते मिले। चेंज चाहिए।

अनशन पर अंटशंट

क्या किसी को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए अब कांग्रेस,बीजेपी या समाजवादी पार्टी में शामिल होना होगा? क्या संविधान से अपने लिए जीने का हक मांगने के लिए चुन कर आना अनिवार्य होगा? क्या सभी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं चुने हुए लोगों के बीच ही पूरी होती हैं? क्या चुनाव के बाद मतदाता-जनता का वजूद ख़त्म हो जाता है? तब क्या चुनाव जीतने के बाद कोई राजनीतिक दल सिर्फ मेनिफेस्टो में दर्ज वादों पर ही काम करता है? क्योंकि जनता ने तो उसे मेनिफेस्टो के हिसाब से वोट दिया है तो सरकार इतर कार्य कैसे कर सकती है? क्या अब किसी लड़ाई में होने के लिए मध्यमवर्ग से नहीं होना पहली शर्त होगी? क्या धरना-प्रदर्शन करना अब से ब्लैक मेलिंग हो जाएगा? क्या अब लोगों को अपनी मांगों की अर्ज़ी राजनीतिक दलों के दफ्तर में देनी होगी?क्या लाखों लोगों का अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करना हिस्टीरिया है? क्या अब हर आंदोलन अराजक और दक्षिणपंथी ही कहा जाएगा? जंतर-मंतर पर चार दिन बिताने के बाद आंदोलन के विरोध में उठने वाले सवालों से कई सवाल मेरे मन में बन रहे थे। कुछ लोग आंदोलन को शक की नज़र से देख रहे थे तो कुछ असहमति की नज़र से। रविवार के अंग्रेजी के अखबारों में आंदोलन के विश्लेषण को पढ़ कर लगा कि जंतर मंतर के ज़रिये कुछ खाए-पीए मवाली लोगों का मजमा सरकार को हुले लेले कर रहा था। उनके उपहास के केंद्र में चंद बातें थीं। जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ वह भ्रष्टाचार का सरलीकरण था। गांधी के आदर्शों का सरलीकरण किया गया और फिर उसका नकलीकरण। इस तरह से अनशन पर अंटशंट कहा जा रहा है।

चालीस साल से कई दलों की सरकारें लोकपाल बिल को लेकर जनता को ब्लैक मेल कर रही थीं,ठीक वैसे जैसे महिला आरक्षण विधेयक को लेकर करती रही हैं। कोई यह बताएगा कि महिला आरक्षण बिल राजनीतिक संवैधानिक प्रक्रिया के चलते दबा हुआ है या पास न करने की मंशा के चलते। लोकतंत्र में संविधान के तहत सरकार द्वारा बनाई गईं संस्थाएं क्या अमर हैं? क्या हम कभी सीबीआई का विकल्प नहीं सोच सकते हैं? मुंबई हमले के बाद एनआईए क्या है? सीबीआई के रहते सीवीसी का गठन क्यों किया गया?क्या सीवीसी के रहते भ्रष्टाचार हमेशा के लिए ख़त्म हो गया? अगर नहीं हुआ है तो सीवीसी क्यों हैं? भ्रष्टाचार खत्म नहीं हुआ तो क्या अब इसके खिलाफ होने वाली हर लड़ाई को मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा? तो क्या अब से भ्रष्टाचार पर नहीं लिखा जाएगा? क्या भ्रष्टाचार के नहीं खत्म होने से उसे एक संस्था के रूप में स्वीकार किया जा रहा है? ख़त्म नहीं हो सकता तो लड़ना क्यों हैं। भ्रष्टाचार का सरलीकरण क्या है? भ्रष्टाचार को जटिल बताने का मकसद क्या है? जटिल है तभी तो एक जटिल संस्था की मांग हो रही है जिसके पास अधिकार हो। जिन्होंने अण्णा के अनशन को भ्रष्टाचार का सरलीकरण कहा है,वो कहना क्या चाहते हैं? जंतर-मंतर में आई जनता भ्रष्टाचार से त्रस्त रही है। उसे नाच गाने,बैनर-पोस्टर के बहाने भ्रष्ट तंत्र को मुंह चिढ़ाने का भी मौका मिला जिसे देखकर कई लोग सरलीकरण बता रहे हैं। काश आम लोगों की परेशानी को कोई समझ पाता।

अण्णा हज़ारे के अनशन पर राजनीतिक दल खुद को संविधान से ऊपर समझ कर प्रतिक्रिया दे रहे थे। हर आंदोलन में अतिरेक के कुछ नारे लग जाते हैं। जंतर-मंतर पर भी लग गए। मगर नेता लोग इतने डर गए जैसे सभी उन्हें खत्म करने ही आ रहे हैं। सब नेता चोर हैं। यह जुमला पहली बार जंतर-मंतर पर तो नहीं कहा गया। पहले भी कई बार कहा जा चुका है। क्या रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे ज्ञानी नेता जब किसी राजनीतिक दल पर आरोप लगाते हैं तो यह कहते हैं कि पूरी बीजेपी सांप्रदायिक नहीं है। सिर्फ नरेंद्र मोदी हैं। कांग्रेस में कई लोग ईमानदार हैं मगर हम सिर्फ टू जी को लेकर सुरेश कलमाडी का विरोध कर रहे हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह नहीं कहते हैं। वो भी सरलीकरण और सामान्यीकरण करते हैं। सिम्पलीफिकेशन और जनरलाइज़ेशन। सब नेता चोर नहीं हैं मगर नेता लोग चोर तो हो ही गए हैं। रघुवंश प्रसाद सिंह ने कभी आरजेडी में रहते हुए लालू प्रसाद यादव पर लगे आरोपों की सार्वजनिक आलोचना नहीं की। क्या वो अब यह कह रहे हैं कि आरजेडी मे वही ईमानदार हैं लालू नहीं। अगर सब नेता चोर नहीं हैं तो कौन-कौन हैं,इतना ही बता दें। वे तो उसी आरजेडी का हिस्सा बने रहे जिसे जनता ने भ्रष्टाचार के चलते दो-दो बार रिजेक्ट किया। मेरे एक मित्र जब फोन पर यह बात कह रहे थे तो मैं सोच रहा था कि रघुवंश बाबू को किस बात का डर पैदा हो गया है। जब वो ईमानदार हैं तो जंतर-मंतर पर क्यों नहीं आए। यह क्यो नहीं कहा कि ऐसे प्रयासों का समर्थन करता हूं। मैं जंतर-मंतर नहीं जाऊंगा पर भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी तरह का स्थायी-अस्थायी मानस बने उसे सराहता हूं। इतना कहने से रघुवंश बाबू को किसने रोका था। मुझे हैरानी हुई कि इस जन सैलाब से वही नेता क्यों डर गया जो खुद को ईमानदार समझता है। वो जिन ईमानदार अफसरों और नेताओं की वकालत कर रहे थे उनको किसने रोका था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने से या फिर उनको किसने कहा कि जंतर-मंतर से भीड़ ईमानदार अफसरों और नेताओं को मारने आ रही है। दरअसल इस आंदोलन से सरकार से ज्यादा राजनीतिक दलों को डरा दिया है। कुछ दिनों बाद यही लोग कहेंगे कि प्रतिनिधि होने का मतलब सिर्फ कांग्रेस बीजेपी का सांसद होना है। निर्दलीय सांसदों को मान्यता हासिल है तो निर्दलीय जनता को मान्यता क्यों नहीं मिल सकती?

अंग्रेजी के अखबारों और कुछ तथाकथित वरिष्ठ पत्रकारों के लेख और बहसों से गुज़र कर यही लगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मानस भी नहीं बनाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी या उनकी पसंद की सरकार को असहजता होती है। लिखने वाले किस नज़रिये से जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ को एक ही तराजू में तौल रहे हैं कि वो मिडिल क्लास है। उसका नक्सल और किसान आंदोलन से कोई सरोकार नहीं है। क्या कोई आंदोलन और उसमें शामिल लोग तभी सरोकार युक्त कहे जायेंगे जब वो सभी आंदोलनों और मुद्दों से जुड़े हों? क्या इसकी आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि अण्णा ने दिल्ली विश्वविद्यालय में ज़बरिया लागू हो रहे सेमेस्टर सिस्टम पर क्यों नहीं अनशन किया? क्या यह दलील फटीचर नहीं है कि आप तब कहां थे जब वो हो रहा था,ये हो रहा था,कहां था ये मिडिल क्लास? क्या लोगों के भीतर बन रही नागरिक सक्रियता से वाकई कुछ भी लाभ नहीं होने वाला था? तो फिर लिखने वाले तमाम मुद्दों पर क्यों लिखते हैं? उनके लिखने से समस्या समाप्त तो नहीं हो जाती। अगर मैं यह कह दूं कि भारत की हर समस्या आर्टिकल लिखने वालों को नगद भुगतान कराती है तो क्या यह सरलीकरण नहीं होगा। क्या वे फ्री में समाज सेवा के तहत अपनी राय बांटते हैं। वो कौन हैं जो अपनी राय देते हैं। क्या किसी विश्वविद्यालय ने उन्हें अखबारों में लिखने का सर्टिफिकेट दिया है? ऐसी बतकूचन से दलीलें पैदा करनी हैं तो करते रहिए।

जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ उसे एकतरफा नज़रिये से देखने की कोशिश हो रही है। कोई एकसूत्री फार्मूले के तहत खारिज या समर्थन करने की कोशिश की जा रही है। अण्णा के अनशन से पैदा हुई विविधताओं पर पर्दा डाला जा रहा है। कुछ तो था इस आंदोलन में कि सरकार की तरफ से मीडिया को बांधने की तमाम कोशिशें नाकाम हो गईं। अगर यह लोगों का गुबार न होता तो मीडिया एक मिनट में इस मुद्दे को सनकी कह कर खारिज कर देता। रिपोर्टर दबाव मुक्त हो गए। स्वत स्फूर्त होकर जनवादी राष्ट्रवादी और ललित निबंधवादी जुमलों में घटना को बयान करने लगे। उनके विश्लेषणों में सिर्फ उन्माद नहीं था। उनकी लाइव रिपोर्टिंग को भी कई स्तरों पर देखने की ज़रूरत है। वो हिस्टीरिया पैदा नहीं कर रहे थे। बल्कि लोगों के उत्साह के साथ रिएक्ट कर रहे थे। अगर न्यूज़ चैनल उन्माद पैदा कर रहे थे तो अखबार क्यों बैनर छाप रहे थे? आंदोलन किसी संप्रदाय के खिलाफ नहीं था। आंदोलन किसी भाषा-लिंग के खिलाफ नहीं था। आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था जिसके निशाने पर प्रत्यक्ष रूप से सरकार और अप्रत्यक्ष रूप से बेईमान नेता थे। मीडिया भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाता रहा है। जब लोग उठायेंगे तो वो कैसे किनारा कर लेता। उसके भी नैतिक सामाजिक अस्तित्व का सवाल था। इसलिए किसी चैनल या अखबार को हिम्मत नहीं हुई कि जंतर-मंतर के कवरेज को दूसरे तीसरे दिन ग्यारह नंबर के पेज पर गायब कर दे।

अतिरेक के एकाध-अपवादों को छोड़ दें तो जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ उन्मादी नहीं थी। वो आ रही थी कतारों में और घुल मिल रही थी नारों में। तमाम व्यवस्थाएं अपने आप बन गईं थीं। पुलिस ने नहीं बनाई थी। अनुशासन अपने आप बन गया। कोई एक दूसरे को हांक नहीं रहा था। लोगों ने अपने नारे खुद लिखे। फिर भी इस भीड़ को एकवर्गीय रूप दे दिया गया। मिडिल क्लास है ये तो। हद है। जब मिडिल क्लास जागता नहीं है तो आप गरियाते हैं। जब जाग जाता है तब लतियाते हैं। आंदोलन करने वाले अब यह तय कर लें कि उन्हें मिडिल क्लास का साथ नहीं चाहिए। वो इस क्लास को किसी भी जनआंदोलन में शामिल होने से रोक देंगे। जिन लोगों ने जंतर-मंतर पर आने वाली जनता को करीब से देखा है वो यह नहीं कह सकते कि इसमें एक क्लास के लोग थे।

इसमें न तो युवाओं की संख्या ज्यादा थी न बुज़ुर्गों की कम। सब थे। पुणे में पढ़ रही अपनी बेटी को एक पिता ने इसलिए
दिल्ली बुला लिया कि वो देखे और समझे कि देश के लिए क्या करना है। मालवीय नगर से एक महिला गोगल्स लगाए चली आईं। उनके हाथ में तख्ती थी। सरकारी विचारकों में भीड़ के कपड़े तक देखने शुरू कर दिये। जो उपभोक्ता है क्या वो नागरिक नहीं है? किशनगंज के नवोदय स्कूल का एक मास्टर आया जिसने नवोदय स्कूल के प्रिंसिपल के खिलाफ घोटाले उजागर किये मगर कुछ नहीं हुआ। संगम विहार के शिव विहार का एक व्यक्ति आया था। बताने लगा कि उसके यहां करप्शन बहुत है। सब लूट लिया जाता है। कोई सुविधा नहीं है। रैली में अस्थायी तीन हज़ार कंप्यूटर शिक्षकों का जत्था भी अपना बैनर लेकर आ गया। दिल्ली नगर निगर का कर्मचारी संघ भी आ गया। डिफेंस कालोनी रेजिडेंट वेलफेयर संघ भी अपना बैनर बनवा लाया था। कई लोग जो अपने-अपने शहर दफ्तर में भ्रष्टाचार को भुगत रहे थे वो भी आए थे। सब सिर्फ जनलोकपाल बिल के समर्थन में नहीं आए। सब इसलिए भी आए कि शायद उनकी अकेले की लड़ाई समूह में बदल कर ताकतवर हो जाए। कुछ असर कर जाए। एक व्यक्ति ने बताया कि उसकी कंपनी न्यूनतम वेतन नहीं दे रही थी। छह महीने से धरना कर रखा था। अनशन टूटने के एक रात पहले एलान कर दिया कि हम सब जंतर-मंतर जा रहे हैं, कंपनी ने सबकी सैलरी बढ़ा दी। ये लोग अस्थायी मज़दूर थे। अलग-अलग समस्याओं को लेकर महीनों से आंदोलन करने वाले लोग भी धरने में शामिल हो गए। इस वजह से भी अण्णा का अनशन बड़ा होता चला गया।

जिन लोगों जंतर-मंतर पर आने वाली भीड़ को सनकी और एकवर्गीय बताया है उन्हें वहां मौजूद लोगों से मिलना चाहिए था। कई आरटीआई कार्यकर्ता घोटालों की फाइलें लिये पत्रकारों को खोजने लगे। आप तो मिलते नहीं यह फाइल रख लीजिए। आपके दफ्तर चक्कर लगा आया हूं। कोई कवरेज नहीं है। देखिये तीस करोड़ का घोटाला है। एक ऑटो वाला भावुक हो गया। कहने लगा कि सरकार हमको मुर्दा समझती है। चोर बनाने के लिए मजबूर करती है। तंग आकर उसने आटो चलाना छोड़ दिया। गुड़गांव से सेना के ब्रिगेडियर स्तर के रिटायर अफसर चले आए। कहने लगे कि एक सिपाही के नाते आ गया हूं। रोक नहीं सका। भीड़ में मुझसे एक अफसर माइक छिनने लगे। पूछा कि आप कौन है। जवाब मिला कि मैं कस्टम विभाग में चीफ कमिश्नर रहा हूं। रिटायर हो गया हूं। मेरे ख्याल में करप्शन को लेकर इस तरह का पब्लिक ओपिनियन बहुत ज़रूरी है। जिन लोगों ने टीवी पर इसकी कवरेज देखकर लेख लिखकर खारिज किया है उनसे चूक हुई है। जंतर मंतर पर भोजन के स्टॉल वाले ने बताया कि पचीस साल में ऐसी भीड़ नहीं देखी। स्कूल के बच्चे आ रहे हैं। उनके टीचर आ रहे हैं। वो भी चाहते हैं कि उनके बच्चे ऐसे सरोकारों से जुड़ने का अभ्यास करें। एक तरह से यह प्रदर्शन कई लोगों के लिए अभ्यास मैच भी था। अहिंसक चरित्र होने के कारण बड़ी संख्या में गृहणियां आ गईं। कुछ महिलाओं ने आंचल से मुंह ढांक लिया। मेरे एक मित्र ने बताया कि वे अण्णा के पास गईं। समर्थन दे आईं। मीडिया जब फोटू खींचने लगी तो कहने लगी कि हम लोग मिनिस्ट्री में काम करते हैं। फोटू मत लीजिए। नौकरी चली जाएगी।

किस आधार पर इसे मिडिल क्लासवाली आंदोलन कहा जा रहा है। जंतर-मंतर को पेज थ्री कहने वाले लोग इस बात से हिल गए हैं कि उनके मुद्दे पर हर कोई बोलने लिखने लगेगा तो उनकी दुकान न बंद हो जाए। कचरा बिनने वालों का संगठन भी समर्थन करने आ गया। आने वालों की प्रोफाइल का कोई एक रंग तो था नहीं। मगर देखने वालों को सब एक ही रंग में दिख रहे हैं क्योंकि यह दलील सरकार के मैनजरों को सही लगती हैं। वे खुश होते हैं। क्योंकि अण्णा के अनशन ने जंतर-मंतर पर होने वाले धरनों में जान डाल दी है। अब उन्हें डर सता रहा होगा कि सब इस तरह से अनशन करने लगे तो क्या होगा? सब क्यों न करें। अगर सिस्टम सालों तक आदमी और संगठन को टहलाता रहे। क्या सिस्टम का कोई आदमी जंतर-मंतर पर महीनों से धरने पर बैठे लोगों से बात करने भी जाता है? उनके साथ न्याय न हो रहा हो तो क्या करें। जो लोग यह सवाल पूछ रहे कि क्या लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा दरअसल ये वो लोग हैं जो किसी भी रैली या दलीलों में शामिल एलिमेंट की तरह यह पूछने लगता कि इससे क्या होगा? दुनिया में अन्याय खत्म हो जाएगा। चले हैं दुनिया को बदलने। हें..हूं थू। बोलेगा रे। बस हो गई मारपीट।

अण्णा का अनशन एक उत्सव में भी बदल गया। कई लोग एक दूसरे का फोटू खींचने लगे। टीवी पत्रकारों के आटोग्राफ लेने लगे। उनके साथ फोटो खिंचाने लगे। पानी की कुछ कंपनियों ने हजार-हज़ार बोतल फ्री में बांटनी शुरू कर दी। हवन होने लगे। एक एनजीओ आदिवासियों को ले आया उनका नृत्य होने लगा। प्रभात फेरी निकलने लगी। कई लोग तुरंत कविता और शेर लिखकर रिपोर्टर को देने लगे कि मेरा वाला पढ़ दीजिए। बहुत सारे गुमनाम अखबार अपना एडिशन बांटने लगे। कई संगठन अपना पैम्फलेट बांटने लगे। आरएसएस वाले भी बांट रहे थे। यह सब भी हो रहा था मगर यह सब आंदोलन के मूल चरित्र के केंद्र में नहीं हो रहा था। हाशिये पर ऐसी बहुत सी हास्यास्पद और नाटकीय चीज़े हो रही थीं। इंडिया गेट के आइसक्रीम वाले जंतर-मंतर आ गए। यह तो होता ही है। राजनीतिक दलों की रैलियों में भी इस तरह की दुकानें सज जाती हैं। तो इसके आधार पर अण्णा के अनशन को खारिज कर देंगे।

ऐसी बात नहीं है कि जंतर-मंतर के धरने को लेकर अहसमतियों की गुज़ाइश नहीं है। इसमें शामिल कई लोगों पर विचारधारा के स्तर से सवाल उठाये जा सकते हैं। अण्णा हज़ारे ने भी कहा कि मंच से वहीं बोले जिनका चरित्र अच्छा हो। इस आंदोलन में वही आएं जिनका कैरेक्टर हो। उन्होंने कहा कि आरएसएस और बीजेपी से संबंध नहीं है फिर भी उमा भारती को फोन कर बुला लिया। राम माधव आ गए। मेरी राय में वैचारिक आधार नहीं तो स्पष्टता होनी चाहिए। तब यह सवाल उठ सकता है कि क्या हर आंदोलन का वैचारिक आधार होना ज़रूरी है। क्या हर लड़ाई इस खेमे और उस खेमे में ही बंट कर होगी। मंच पर मौजूद संघ और कुछ संत समुदाय से जुड़े लोगों को लेकर मेरी असहमति रही है। लेकिन यह आंदोलन भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक कानूनी हथियार हासिल करने के लिए था। अच्छा हुआ अनुपम खेर और बाबा रामदेव आंदोलन को हाईजैक नहीं कर सके। हमारा देश समाज और सिस्टम दोनों स्तर पर व्यापक रूप से भ्रष्ट है। उन घरों में लोग टीवी से ज़रूर उकता गए होंगे जहां रिश्वत का पैसा आता होगा। दलाली करने वाले पत्रकारों को भी कष्ट हो रहा होगा। हालांकि इस आंदोलन से अहसमति रखने वाले सभी दलाल नहीं कहे जा सकते लेकिन यह बात मेरे मन में उठ रही थी कि घूसखोर कैसे अपने परिवार के साथ जंतर-मंतर से सीधा प्रसारण देख रहा होगा।

राजनीतिक दलों के विरोध पर सवाल करने का मन करता है कि आज आप बड़े हो गए हैं। कई सांसद और विधायक हैं। आपने अलग ही दल क्यों बनाया? कांग्रेस में ही शामिल हो जाते। जिस सिविल सोसायटी को आप खारिज कर रहे हैं, चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं क्या आपकी हालत वैसी नहीं थी जब आपने राजनीतिक दल की स्थापनी की थी। क्या लोकतंत्र में सिर्फ राजनीतिक दलों को ही मान्यता हासिल है? किस आधार पर यह कह रहे हैं कि अण्णा की लड़ाई राजनीतिक नहीं है। राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई राजनीतिक ही होगी। आगे जा कर यह लड़ाई कहां जाएगी कौन जानता है। किस नतीजे पर पहुंचेगी किसने देखा है। नतीजा तय कर लड़ाई की शुरूआत नहीं होती। वैसे सरकार के मान लेने के बाद जीत तो हो ही गई। सरकार में हिम्मत होती तो कह देती कि हम अण्णा के ब्लैकमेल से मजबूर होकर उनका प्रस्ताव मान रहे हैं। उसने क्यों कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है। सरकार और सिविल सोसायटी को मिलकर काम करना होगा। क्या सरकार ने सिविल सोसायटी को मान्यता नहीं दे दी। बल्कि देनी पड़ी है। अनशन को ब्लैकमेल लिखकर अंग्रेजी के लेखक भाग लिये। वो अब इतिहास भी बदल दें और गांधी को ब्लैकमेलर कह दें। किसी आंदोलन में कमियां नहीं होतीं मगर क्या अण्णा के आंदोलन के मूल उद्देश्य में भी कमी है? क्या हमें भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं लड़ना चाहिए? बस इतना ही कह सकता हूं। दो लोग हैं इस वक्त। एक जिसने जंतर-मंतर देखा है और दूसरा जिसने नहीं देखा है। जंतर-मंतर अब अण्णा के अनशन का पर्याय बन चुका है। जिनको अंट-शंट बकना है बकें। मगर असहमतियों को ध्यान से सुना जाना चाहिए। ताकि आगे से ऐसे नागरिक आंदोलनों को चलाने से पहले कुछ सावधानियां बरत ली जाएं।

राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन-क्रिकेट

(दोस्तों, यह लेख भारत-पाक मैच के तत्वाधान में लिखा गया था। जो कि अमर उजाला के ज़िंदगी लाइव पेज पर प्रकाशित हुआ। दिन रविवार का था। साभार अमर उजाला का है,लेखक कस्बा वाला ही है। यूनिकोड में विग्यापन को सही कैसे लिखें, इसकी जानकारी है आपको तो बतायें)

क्रिकेट राष्ट्रवाद का पल्प फिक्शन है। जिसे हम लुगदी साहित्य भी कहते हैं। एक ऐसा साहित्य जिसमें कोई शिल्प नहीं है। कोई कला नहीं है। कल्पना की असीमित उड़ान है। लुगदी साहित्य का सस्ता बाज़ार कहीं से भी किसी को भी किरदार बनाकर राष्ट्रवाद की जर्सी में मैदान में भेज देता है। मैं उससे इत्तफाक नहीं रखता जो भारत पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच में रास्ट्रवाद को क्लासिकल रूप में देखता है। यहां राष्ट्रवाद प्रहसन है। हास्य है। होली की तरह दोनों पक्ष एक दूसरे का मज़ाक उड़ा रहे हैं,छेड़ रहे हैं और आंखों से लेकर तन के कण-कण में गुलाल मल रहे हैं। जहां मुल्कों के आपसी संबंध मैच के मोहताज़ हो जाएं वहां समझ लेना चाहिए अब के दौर में तनाव के ऐसे क्षण महज़ दिखावे ही हैं। इस दिखावे का अपना जुनून और बाज़ार है।

असली युद्ध में हार-जीत की बड़ी कीमत होती है। दुनिया की नज़र होती है। हथियार होते हुए भी इस्तमाल नहीं हो सकते। लिहाज़ा भारत और पाकिस्तान के बीच के संबंधों के तनाव के मंचन के लिए क्रिकेट का मैदान लोकमंच बन जाता है। जहां युद्ध के तमाम भावों के कृत्रिम प्रसंग बनाए जाने लगते हैं। मोहाली में भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी हुआ वह पहले भी हो चुका था। मीडिया में युद्ध का अपभ्रंश ऑस्ट्रेलिया के साथ हुए मुकाबले में भी बनाया गया। फर्क यही है कि पाकिस्तान के साथ हुए मैच का मंचन पहले के मुकाबलों की तुलना में कहीं ज़्यादा भव्य और शर्मनाक दोनों रहा लेकिन यह कोई पहली बार तो नहीं हुआ। फर्क यही रहा कि इस बार तनाव का दिखावा ज्यादा रहा।

मी़डिया ने युद्ध की तमाम उपमाओं को बंदूक और बम की तरह खर्च कर दिया। इस तरह से जैसे दुश्मन की सेना के सामने होने के अंदाज़े भर से तमाम कारतूस खाली कर दिए गए। इसके आस-पास का एक मुहावरा भी है। अंधेरे में तीर चलाना। क्रिकेट को ऐसे गायब कर दिया गया जैसे मुल्क में सिपाही की ज़रूरत नहीं खिलाड़ी की है। महायुद्ध, महाविनाश, आतंकवाद का बदला, सचिन है एक सौ एटम बम के बराबर। कोई शोधकर्ता मीडिया की युद्ध संबंधी उपमाओं का विश्लेषण करेगा तो पाएगा कि युद्ध के हथियारों के बारे में उसकी जानकारी कितनी कम है। कम से कम विविधता नहीं है। किसी खिलाड़ी की तुलना सी हैरियर या युद्ध पोत से नहीं की गई है। मिसाईल,बम और परमाणु बम बस। इन विशेषणों में वायु सेना और नौ सेना के हथियारों को जगह नहीं मिली है।

सेमिफाइनल को लेकर कृत्रिम उन्माद इसलिए भी दिखा क्योंकि भारत और पाकिस्तान की जनता मूल रूप से क्रिकेट में दिलचस्पी रखती ही है। क्रिकेट उसके जीवन का हिस्सा है। उन्माद एक किस्म का तड़का है। इसलिए इसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं। मुंबई हमले के बाद उन्माद फैलाने की मीडिया की कोशिशों पर लगाम लगाने के लिए कई तरह के गाइडलाइन्स भी बनी। हैरानी इस बात की है कि क्रिकेट मैच के दौरान के ऐसे उन्मादों पर लगाम लगाने की कोई कोशिश क्यों नहीं हुई। शायद इस वजह से कि मुंबई हमले के वक्त का गुस्सा और मोहाली के मैच के समय का जुनून दोनों में फर्क है। एक में नफरत थी तो दूसरे में नफरत का स्वांग। फिर भी उन्माद पर लगाम लगाने की कोशिश हो सकती थी। जिस तरह से चैनलों और एफएम रेडियो पर लतीफे और ताने सुनाए जा रहे थे वो सार्वजनिक सूचना के मंचों का काम नहीं होना चाहिए था। इससे पता चलता है कि एक मुल्क के रूप में हमारी परिपक्वता भारत महान की ब्रांडिंग से आगे नहीं जा सकी है। बल्कि मेरा भारत महान की ब्रांडिग को नुकसान भी पहुंचाती है।

क्रिकेट का मैच भारत पाकिस्तान के तनाव भरे रिश्तों के बीच मध्यांतर की तरह है। जिस मैच में दोनों मुल्क एक दूसरे को कुचल देने की सस्ती ख्वाहिशें पालती हैं उसी मैच के ज़रिये रिश्ते को सुधारने की भी संभावनाएं खोजी जाने लगती हैं। यह विरोधाभास नहीं है तो क्या है। इतना ज़रूर है कि क्रिकेट के ज़रिये दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते खुल जाते हैं। जब बंद होते हैं तब भी भारत के करोड़ों क्रिकेट प्रेमी देसी न्यूज़ चैनलों के दफ्तर में बैठे पाकिस्तान के महान खिलाड़ी ज़हीर अब्बास, इमरान ख़ान,वसीम अकरम की टिप्पणियों का आनंद लेते रहते हैं। ये क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों की पेशवराना परिपक्वता है। तब तो कोई उन्माद नहीं फैलाता कि जिस इमारन और अकरम की जोड़ी ने कई बार भारतीयों को कुचला है उसे स्टुडियो से भगाओ। बल्कि लाखों क्रिकेट प्रेमी उनकी बातों को क्रिकेट के लिहाज़ से सुनते हैं। उन्हें अपना समझते हैं। इसलिए आम क्रिकेट प्रेमी इस तरह के उन्माद का हिस्सा तभी बनता है जब कृत्रिम रूप से बनाने की कोशिश की जाती है ताकि उस उन्माद के सहारे बाज़ार और विग्यापन का खेल खेला जा सके।

क्रिकेट को लेकर राजनय और राजनीति में फर्क करना चाहिए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सेमिफाइनल के लिए पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को आमंत्रित कर एक राजनीतिक पासा फेंका। एक ऐसे वक्त में जब मनमोहन सिंह पर आरोप लग रहे थे कि विदेश नीति के मामलों में कमज़ोर साबित हो रहे हैं, उन्होंने विपक्ष को जवाब भी दिया और मैच देखने के बहाने एक संदेश भी दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। मगर जब राजनयिक आपस में बात करेंगे तो ज़ाहिर है वहां क्रिकेट के स्कोर की चर्चा नहीं होगी। बातचीत की मेज़ पर इस बात का भी फर्क नहीं पड़ेगा कि मोहाली में किसने किसको हराया। मुंबई हमले के बाद अंतर्राष्ट्रीय दबावों के बाद भी पाकिस्तान में हमले के आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। आतंकवाद पर आज भी उसका नज़रिया बहुत साफ और भरोसा का नहीं है। क्या यह सब क्रिकेट के मैदान के ज़रिये बदल सकता है? क्या कभी ऐसा हो सकेगा कि मैच के नतीजे का असर कश्मीर की समस्या पर पड़ेगा? किसी राजनयिक से पूछेंगे तो मुस्करा देगा।

वैसे भी भारत और पाकिस्तान की टीमों के कप्तान ने एक बार भी नहीं कहा कि हां यह मैच जीतना ज़रूरी है ताकि दोनों देशों की बातचीत की प्रक्रिया आगे बढ़ सके। हम जीतेंगे तो बातचीत की मेज़ पर हमारे प्रधानमंत्री का पलड़ा भारी रहेगा। दोनों के बयान क्रिकेट तक ही सीमित हैं। वो क्रिकेट के दायरे में ही एक दूसरे को चुनौती देते रहे। मीडिया है कि उसे उठाकर कश्मीर से लेकर मुंबई तक के मामले में लपेटे जा रहा था। तनाव का ऐसा रोचक और विहंगम उत्सव देखने को नहीं मिला होगा। मोहाली का महायुद्ध आईसीसी के नियमों के तहत ही खेला गया न कि भारत पाकिस्तान के रिश्तों की ज़रूरतों के मुताबिक। नागपुर में कप्तान धोनी के बयान को याद रखना चाहिए। खिलाड़ी देश के लिए खेंले न कि गैलरी के लिए। ताली बजाने वाले और हो हल्ला करने वालों से पैदा होने वाले जुनून से मैच की किस्मत तय नहीं होती। सेमिफाइनल के बाद लतीफे, युद्ध की उपमाएं वैसे ही सड़कों पर बिखरे मिलेंगे जैसे मतदान के बाद चुनाव के पोस्टर और झंडियां।

एक कमज़ोर क्रिकेटप्रेमी की आत्मकथा।

मैं एक कमज़ोर प्रधान इंसान हूं। घबराहट से ओत-प्रोत। अपनी इसी ख़ूबी और मैच फिक्सिंग से आहत होने के कारण क्रिकेट देखना छोड़ दिया। बचपना में टीम इंडिया का कप्तान बनने की ख़्वाहिश रखने वाला मैं कभी तीन गेंद लगातार नहीं फेंक सका। तीनों गेंद पिच की बजाय तीनों स्लिप से बाहर जाती और मेरे मुंह से झाग निकलने के बाद कपार झन्नाने लगता। बहुत रो-धो के एकाध मैच में खेलने का मौका मिला भी तो इस वजह से कैच नहीं लिया कि ड्यूज़ बॉल से हाथ फट जाएगा। इस गुस्से में एक फिल्डर ने एक थाप लगा भी दिया। थाप चांटा का लघुक्रोधित वर्ज़न है। लेकिन टीवी पर टीम इंडिया को खेलते देख किसी कामयाब खिलाड़ी का प्रतिरूप बन हमेशा मैच का आनंद उठाता रहा। सिर्फ जीत के क्षणों में। हारती टीम से इतनी घबराहट होती थी कि मैच देखना बंद कर देते था। कमरे से निकल कर गली में घूमने लगता था। तमाम तरह के देवी देवताओं की झलकियां भी आंखों के सामने से गुज़र जाती थीं। उनके निष्क्रिय होने से भक्ति में कमी आने लगी। क्रिकेट से दूर होता चला गया। इसीलिए क्रिकेट के बारे में मैं उतना ही जानता हूं जितना फिज़िक्स और बॉटनी के बारे में।

मुझे अपनी इस कमज़ोरी पर नाज़ है। मगर तनाव के क्षणों में धीर-गंभीर होने या होने का अभिनय करने वाले तमाम वीरों और वीरांगनाओं से ईर्ष्या ज़रूर होती है। ऐसा लगता है कि जीवन की उपलब्धियां उन्हीं की धरोहर हैं। उनका कितना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। मैं धारा में बहता हूं और वो धारा को बनाते या मोड़ते हैं। मानता हूं कि जीवन मे कुछ करने के लिए इस टाइप की बाज़ारू ख़ूबियां होनी ही चाहिएं लेकिन क्या मेरे जैसे कमज़ोर आदमी के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी स्कीम नहीं होनी चाहिए। इसीलिए हैरानी होती है कि यहां तक जीवन कैसे जी गया। जो कर रहा हूं वो कैसे हो रहा है। बिना घबराहट के ख़ुद को समझना मुश्किल है।

ऐसे कमज़ोर और पूर्वकालिक क्रिकेट प्रेमी को जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने घर बुला लिया मैच देखने। सप्तनीक
अविनाश,सुर,सप्तनीक समरेंद्र,बेपत्नीक मिहिर और विनीत कुमार के बीच मैं अपनी पत्नी के न आने पर अकेला मौजूद रहा। विशालकाय होम थियेटर पर फाइनल। शानदार माहौल में मैच देखते हुए एक बार हिन्दी ग्रंथी कुलमुला उठी और महसूस करने लगी कि कुलीनता हिन्दी का स्वाभाविक लक्षण है। हम हमेशा संघर्ष मोड में नहीं रहते। मनोरंजन और शौक को भी महत्व देते हैं। हम सिर्फ रचनावलियों के संग्रह नहीं ख़रीदते,क्रिकेट भी देखते हैं। तभी इतने इंतज़ाम और ठाठ से मैच देखने जमा हुए। इसके बाद भी मैच के दौरान कई बार ऐसा लगा कि आज इंडिया और मेरा दोनों का फाइनल हो जाएगा। श्रीलंका की टीम बल्लेबाज़ी कर रही थी। भारत के गेंदबाज़ विकेट ले रहे थे मगर रन नहीं रोक पा रहे थे। क्षेत्ररक्षण में हम अच्छा कर रहे थे। मगर श्रीलंका के स्कोर ने मुझे विकट परिस्थिति में डाल दिया। घबराहट का एन्जाइम निकल पड़ा। मुझे क्रिकेट और अपनी कमज़ोरी दोनों में से एक को चुनना था। साफ था कि मैं बार-बार अपनी कोमज़ोरी के पक्ष में झुकने लगा। सेमिफाइनल की तरह मैच बीच में छोड़ कर भागने की घोषणा करने लगा।

सहवाग का विकेट मेरे सामने नहीं गिरा। सचिन का गिर गया। धड़कनें ऐसी उखड़ीं कि जान निकलने लगी। थाणवी जी के घर जमा सभी साथी धीर-गंभीर वीर लग रहे थे। अब वक्त आ गया था कि अपनी कमज़ोरी का एलान कर दूं। ताकि कुछ हो गया तो इन्हें सनद रहे कि ज़िला अस्पताल जाना है या एस्कार्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट। जब भी मैं भागने का एलान करता और सब चुप करा देते। बैठिये बैठिये,कहां जाइयेगा। अच्छा नहीं लग रहा था। टीम इंडिया दबाव में आ रही थी और मैं तनाव में। लगा कि इस महफिल में अकेला कमज़ोर मैं ही हूं।

तभी कैमरा घूमा और मूर्छितावस्था में पड़ी नीता अंबानी और होश उड़ाये आमिर ख़ान की तरफ गया। इन्हें देखकर हौसला बढ़ा। हम तीनों में एक उभयनिष्ठ लक्षण का पता चल चुका था। मेरी तरह तीनों दबाव और तनाव के क्षणों में एक साधारण और कमज़ोर दर्शक इंसान की तरह बर्ताव कर रहे थे। लगा कि पांच लाख करोड़ वाली नीता अंबानी को किसी चीज़ की कमी नहीं है। वो भी मेरी तरह मूर्छित हैं। साधारण टेलरिंग वाली कमीज़ पहने मुकेश अंबानी को देख कर लगा कि लाख करोड़ कमाने के बाद भी मोहम्मद जेन्ट्स टेलर की सिली हुई कमीज़ में मुकेश गांव के चाचा की तरह लग रहे थे। कॉलर बटन वाली नीली कमीज़ में मुकेश अंबानी ने स्टार वाले चश्मे नहीं पहने थे। वे मेरे बाकी मित्रों जैसे थे। गंभीर और जीत के लिए प्रतिक्षारत। मैं कमज़ोर और तनाव से त्रस्त भागरत। मुकेश अंबानी साधारण कमीज़ में असाधारण लग रहे थे। मगर उनकी पत्नी नीता असाधारण कपड़ों में साधारण लग रही थीं। वो भी तनाव नहीं झेल पा रही थीं और मैं भी नहीं झेल पा रहा था। जब नीता अंबानी,आमिर और उनकी पत्नी किरण राव खुश होते,मैं भी खुश हो जाता। वे दुखी तो मैं दुखी। क्लास डिफरेंस होने के बाद भी इमोशन समानता।

मुझे लगा कि महान भारत में कमज़ोर लोगों की भी कमी नहीं है। मैं बॉल दर बॉल मैच देखने के लिए विवश था। जैसे वे लोग अपने लाखों रुपये के स्टैंड छोड़ कर नहीं जा सकते थे वैसे ही मैं मित्रों के दबाव में उठकर नहीं जा सका। रिज़ल्ट निकलता है तो एक फेलियर अपने जैसा फेलियर को देख शक्ति प्राप्त करता है। उसे टॉपर से प्रेरणा नहीं मिलती। फेल करने वाले से मिलती है। मुझे नीता अंबानी से प्रेरणा मिली। जो वो जी सकती हैं तो मैं क्यों नहीं। वैसे एक बार कमरे से निकल टहलने ज़रूर चला गया। कोहली का विकेट गिरा तो लगा कि बेहोश हो जाऊंगा। उस कमेंटेटर पर गुस्सा आ गया जिसने थोड़ी देर पहले कहा था कि गंभीर और कोहली ने पारी संभाल ली है।

मैं हिंसक हो उठा। दसों उंगलियों के पोर पर पनपे नाखूनों को कतरने लगा। हर गेंद,हर विकेट के बाद कोई न कोई नाखून बिना आवाज़ किये दातों तले छिल जाता था। बेचैनियां बढ़तीं जा रही थीं। दोस्तों को एसएमएस करने लगा ताकि महफिल में बैठे खेलप्रेमी वीरपुरुषों और वीरांगनाओं से दूर जा सकूं। कपार के दोनों साइड बटन यानी टेम्पल पर कुछ महसूस हो रहा था। बेचैनी और नोचनी में फर्क मिट गया। धक-धक-धक। गो की बजाय स्टॉप हो जाता तो ग़ज़ब हो जाता। यही कहने लगा कि अब जो इस मैच को देख रहा है वह सही में खेल प्रेमी है। उसमें धीरज है कि वो हार या चुनौतीपूर्ण क्षणों में भी मैच देखे। मैं सिर्फ विजयी होने पर ताली बजाने वाला दर्शक हूं। ख़ैर मैच देखता गया। गंभीर और धोनी ने कमाल करना शुरू कर दिया। हर चौके पर तनाव काफूर होने लगा। रूह आफज़ा सी तरावट महसूस होने लगी।

जीत का क्षण नज़दीक आ गया। इतिहास बनने वाला था और मैं बिना विश्वविद्यालय के मान्यताप्राप्त इतिहासकार बनने जा रहा था। इस मैच को मैंने भी देखा है। बॉल दर बॉल। तनाव के बाद भी टिका रहा जैसी टिकी रही टीम इंडिया। पहली बार ख़ुद को असाधारण होने का अहसास हो रहा था। लगा कि तनाव झेल सकता हूं। बस एक बार टीम इंडिया की कप्तानी मिल जाए। कमज़ोर लोग ऐसे ही जीते हैं। एक-एक सीढ़ी चढ़ते हैं। घुलटते हैं फिर चढ़ जाते हैं। भारत के विश्वविजयी होते ही मैं धन्य हो गया। अपने डर,घबराहट और आशंकाओं में इतना डूब गया था कि जीतने के वक्त आंसू निकले ही नहीं। काश मैं सचिन की तरह रो पाता।

शाम की समाप्ति बेहद स्वादिष्ठ राजस्थानी व्यंजनों से हुई। सांगरी सब्ज़ी की ख़ूबियों पर थानवी जी के अल्प-प्रवचन के साथ। हम सब अपने-अपने घर लौट आए। रास्ते में लोगों ने घेर लिया। एक ने कहा कार का शीशा नीचे कीजिए। बोला कि भाभी का ख्याल रखना और भर पेट खाना। टीम इंडिया जीती है। मीडिया वालों तुमको भी बधाई। तभी भीड़ में एक मीडिया वाला भाई आया। सर मैं फलाने टीवी में काम करता हूं। आपसे मिलूंगा। प्लीज़ सर। याद रखियेगा। मेरा नाम...। कोई बात नहीं हम भी यही करते थे। सोचा काश इंडिया के जीतते ही सबको पसंद की नौकरी मिल जाती,सैलरी मिल जाती। मुझे रवीश की रिपोर्ट का कोई नया आइडिया मिल जाता।

शनिवार की पूरी शाम मैंने समर्पित कर दी है। थानवी जी की पत्नी के नाम। जिनकी मेहमाननवाज़ी की वजह से मेरे जैसा कमज़ोर इंसान मैच देख सका। वो तमाम क्षणों में सामान्य रहीं। थानवी जी की चाय याद रहेगी। लिकर टी की वजह से रक्त पतला होता रहा और थक्के न जमने के कारण ह्रदयाघात की आशंका मिट गई। काश मैं भी मज़बूत और महान होता। ख़ैर। टीम इंडिया की जीत पर सबको बधाई। कस्बा की तरफ से।