भागलपुर गया था। अंगिका डेवलपमेंट सोसायटी के बुलावे पर। डॉ राजेंद्र प्रसाद बिहार गौरव पुरस्कार लेने के लिए। उत्तरायणी गंगा के तट पर डी पी एस भागलपुर बना है। अभी बनने की प्रक्रिया में है। भागलपुर के भारतीय जनता पार्टी के सांसद शाहनवाज़ हुसैन मुख्य अतिथि थे। उनके ही हाथों यह पुरस्कार प्राप्त हुआ। स्कूली बच्चों के बीच जाना अच्छा लगता है। संयोग से पिछले कुछ महीनों में कई तरह के स्कूलों में जाना हुआ है। कस्बा में उनके अनुभव दर्ज हैं। डी पी एस भागलपुर लगभग चौबीस एकड़ एरिया में फैला है। राजेश श्रीवास्तव कहते ही रहे कि क्या आज के सिस्टम के अनुसार पेशेवर बनाने से ज़्यादा सामाजिक रूप से ज़िम्मेदार बच्चे बनाये जा सकते हैं? वो खुद एक प्राइवेट कंपनी के बड़े पद पर रहे हैं। बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का मतलब है सामाजिक सरोकारों में बेहतर कौशल भी देना। डॉ राजेंद्र प्रसाद सम्मान सामाजिक क्षेत्र के लिए काम करने वाले लोगों को ही दिया जाएगा। पहले दो साल यह पुरस्कार राजनीतिक हस्तियों को दिए गए थे। लेकिन फिर सोच बदल गई। सोसायटी को लगा कि इससे वो लोग छूट जायेंगे जो बिना किसी राजनीतिक सपोर्ट के काम कर रहे हैं। अब मैं इस लायक हूं या नहीं,ये उनका फैसला था। हां जिस आदर के साथ मुझे भागलपुर रखा गया,उससे थोड़ा भावुक तो हो ही गया था।
स्कूल का एनुअल डे था। पांच साल ही हुए हैं इस स्कूल को। एरिया बड़ा होने के बाद भी ग्लोबल स्कूल जैसी बेकार की भव्यता नहीं थी। एयरकंडीशन का आतंक नहीं था और न ही स्कूल को तरह तरह के रंगों से रंग कर म्यूज़ियम बनाया गया है। ज्यादातर बच्चे पहली पीढ़ी के शिक्षार्थीं हैं। अंग्रेज़ी बोलने के साथ भारतीय भाषाओं में इनके कौशल का विकास किया जाना है। राजेश जी यही भरोसा जताते रहे और मुझसे भी पाने की कोशिश करते रहे कि क्या यह स्कूल एक श्रेष्ठ स्कूल बन सकता है? हमारे बच्चे कैसे दूसरे बच्चों से अलग होंगे? मेरे ख्याल से शुरूआत सोच से होती है और अंत प्रयास से। नतीजे को भूल जाना चाहिए।
मंच पर टैगोर की रचना चंडालिका का जिस कदर बेहतरीन तरीके से मंचन हुआ,गंगा के किनारे आठ-नौ साल के लड़के-लड़कियां इस नाटक को जिस भव्यता और दक्षता के साथ कर रहे हैं,उसके भाव इनकी सामाजिक चेतना का हिस्सा बनेंगे ही। एक अछूत लड़की की कहानी है चंडालिका। दही बेचने वाला उसे देने से मना कर देता है। वह धर्म और जीवन दोनों से बागी हो जाती है। बौद्ध भिक्षुक जब उससे पानी मांगते हैं तो वह मना करती है। कहती है वह तो अछूत है। भिक्षुक कहते हैं कि मैं भी मानव,तू भी मानव। हिन्दी में यह गाना रवींद्र संगीत के टोन में गाया गया था। बहुत अच्छा लगा। जिस लड़की ने चंडालिका का अभिनय किया था,उम्र के हिसाब से काफी प्रभावी था।
भागलपुर से कई सारी तस्वीरें लेकर लौटा हूं। जल्दी पोस्ट करूंगा। भागलपुर के पत्रकारों और छायाकारों ने मेरे साथ तस्वीर भी खिंचाई। थोड़ा भाव मिल गया। ऐसे टाइम में जब पत्रकार बताते ही पांच रुपया रेट घट जाता है। भथुआ के साग से भी सस्ता मान लिया जाता है। पत्रकारिता के इस खेसारीकरण के काल में मुझे चने का साग जैसा भाव मिला। खेसारी का साग कम खाया जाना चाहिए। बचपन में तो यही पढ़ते थे। फिर भी लोग खाते हैं। वैसे ही हिन्दी चैनल कम देखा जाना चाहिए,फिर भी लोग देखते हैं। सभी का आभार।
बेग़म समरू का संसार-सरधना
सरधना से लौटा हूं। मेरठ से पंद्रह किमी की दूरी पर है। उन्नीसवीं सदी के चर्च को देखने। बेग़म समरू ने बनवाया था। फरज़ाना नाम की नतर्की जब वॉल्टर रेनार्ड सॉम्बर से शादी की तो ईसाई धर्म को स्वीकार कर लिया। रेनार्ड भाड़े का लड़ाकू कमांडर था। जिसकी अपनी सेना थी। बंगाल के नवाब मीर कासिम की तरफ से लड़ते हुए दिल्ली तक आ गया। कई राजशाहियों के लिए लड़ाई लड़ी। उसकी मौत के बाद मुग़ल बादशाह ने सरधने की जागीर बेग़म समरू को सौंप दी। बेग़म समरू भी लड़ाका बन गई। उसने कई युद्धों में भाग लिया। इन्हीं को मगुल बादशाह ने चांदनी चौक में एक महल बनवाकर दिया। बाद में बेग़म समरू के वंशजों ने बेच दिया। इसी महल में भागीरथ पैलेस है। खरीदने वाले सेठ का नाम सेठ भागीरथ था। कहानी लंबी है इसलिए रहने दे रहा हूं।
इन तस्वीरों में सरधना के चर्च की ख़ूबसूरती,सादगी और भव्यता बयां होती है। बहुत कम इमारतें हैं जो भव्य हैं मगर सादे भी। छोटे कद की समरू एक तस्वीर में हुक्का पी रही है और उसके पीछे दो मर्द खड़े हैं। अठारहीं सदी के आखिरी दौर में एक कैथोलिक महिला का राज काज। उसने किसी ताकत के ज़ोर पर नहीं बल्कि अपने पति के प्यार में कैथोलिक मत अपना लिया था। नाचने-गाने वाली एक अनाथ लड़की रेनार्ड के साथ युद्धों में भाग लेने के कारण राजपाट में भी पारंगत हो गई।
चर्च के भीतर समरू के राजपाट को मूर्तियों से दर्शाया गया है। इसमें उनके दीवान खड़े हैं टोपी में तो एक तरफ ब्रिटिश सिपाही की मुद्रा में गोद लिए गये बेटे हैं। एक महिला घूंघट में हैं,जिसके हाथों में सांप हैं। गाइड ने बताया कि यह मूर्ति कह रही है कि समरू महिला होते हुए भी होशियार थी। फुर्तीली थी। कुछ और मूर्तियां हैं जिनका ज़िक्र आप रवीश की रिपोर्ट में देख सकेंगे जो इस शुक्रवार आएगी।
बेग़म समरू का महल काफी साधारण है। किसी मामूली ज़मींदार का लगता है। आज कल इसमें सेंट जॉन सेमिनरी चल रहा है जहां पादरियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन सेंट चार्ल्स कॉलेज की इमारत काफी भव्य है। ब्रिटिश गेस्ट हाउस की ही तरह है। मुगलियां किले की तरह नहीं। उत्तर भारत के खूबसूरत इंटर कॉलेजों में से एक होगा यह। इसकी साफ-सफाई और बागीचे में गुलाब के सैंकड़ों फूल बता रहे थे कि बारह सौ बच्चों के बाद भी अनुशासन बखूबी कायम होगा। सेंट चार्ल्स कालेज की इमारत में समरू एक साल ही रह पाईं थीं। इसमें उनकी राजशाही की झलक मिलती है। बकायदा दरबार हॉल है। ऊंची सीढ़ियां हैं। दरवाज़े बड़े-बड़े हैं।
सरधना एक साधारण सा कस्बा है। पावरलूम के लिए भी मशहूर रहा है। संकट के कारण लूम लुप्तप्राय हो चुके हैं। मगर यहां की संस्कृति में मज़हबी भेदभाव की जगह नहीं है। इस बात के बावजूद कि यहां की आबोहवा में कई तरह के संकट हैं। बिजली नहीं आती। सड़कें नहीं हैं। कोई साफ-सफाई नहीं है। फिर भी संस्कृतियां घुल मिल रही हैं। पोस्टर में ईद,कृपा माता महोत्सव की बधाई का एक साथ ज़िक्र नज़र आता है। कुछ तस्वीरें आम शहरी जीवन की भी हैं। एक पॉप कार्न वाला भी मिला। आठ हज़ार रुपये की यह मशीन है। जो बैटरी और छोटे सिलिंडर दोनों से चलती है। दो रुपये में वही पॉप कार्न जिसे हम साठ रुपये में पीवीआर में खरीद कर खाते हैं। तो आप इन तस्वीरों से सरधने की खूबसूरती का मज़ा लीजिए। रवीश की रिपोर्ट देखियेगा।
अब लोकल स्कूल का मतलब देख लो
ग्लोबल के बाद लोकल स्कूल का जायज़ा लेते हैं। इसकी एक झलक आपको रवीश की रिपोर्ट में मिल गई थी। करनाल के डेरा सिकलीगर के प्राइमरी स्कूल का हाल है। साढ़े सौ छह बच्चे यहां प्राथमिक कक्षा में दर्ज हो गए हैं। इनके लिए सिर्फ तीन कमरे और तीन मास्टर। ऊपर से स्कूल आने के लिए सरकारी वजीफा और दोपहर का रद्दी भोजन। ढाई सौ बच्चे सर्व शिक्षा अभियान के रजिस्टर में नाम दर्ज कराने के बाद अपने घुमंतू मां बाप के साथ फेरी पर चले जाते हैं। जो स्कूल आते हैं उन्हें खुद ही पढ़ाई का इंतज़ाम करना होता है। मास्टर ने बताया कि हमारे यहां मॉनिटर प्रणाली से पढ़ाई होती है। इसके तहत एक बच्चा मॉनिटर बन जाता है। जो ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ा होकर गिनती गिनता है,बाकी क्लास दोहराते हैं। एक बोलते ही तीन सौ बच्चे के एक बोलने से पूरे ब्रह्मांड में एक गुंजायमान हो जाता है।
पांचवी क्लास के बच्चे बेंच पर किताब खोलकर बैठे नज़र आए। उनके लिए भी मास्टर नहीं था। वो किताब से कापी में उतार रहे थे। इसी तरह उनका पढ़ना हो रहा था। कुछ बच्चे पानी की टंकी के किनारे बैठे थे। आप तस्वीरों में देख ही रहे होंगे। ग्लोबल और लोकल स्कूल में इस फासले को देखकर क्या क्रंदन करें। इक्कीसवीं सदी ढिंढोरा पीट कर आई थी। एक दशक गुज़र गया। घंटा कुछ नहीं हुआ। भला हो तेंदुलकर और विजेंदर का। इन्हीं को देखकर लगता है कि कुछ हुआ। मगर कब तक हम अपने कटोरे में 'कुछ' खनखनाते रहेंगे। स्कूल के बरामदे में ज़मीन पर बैठे सैंकड़ों बच्चे। जी में आया कि सर्व शिक्षा अभियान बंद कराने का अभियान शुरू कर दूं। एनजीओ और सरकार की खुशी के लिए ये बच्चे काम छोड़ कर क्यों पढ़ाई करें। गुस्से के लिए माफी चाहूंगा लेकिन सवाल तो है कि स्कूल है या सूअरखाना। जी करता है कि मुख्यमंत्री को इसी बरामदे में मुर्गा बनाकर बैठा दें। और मॉनिटर को बोले कि बोल एक, फिर सारी क्लास बोले एक। बोल बीस, फिर सारी क्लास बोले बीस। ब्रह्मांड में गिनती गूंजने लगे।
ये ग्लोबल स्कूल क्या होता है?

"इनको क्या वैल्यू सीखायें, इन्हें तो पैसे की ही वैल्यू नहीं है। हमारे मां-बाप ने जो वैल्यू सीखाई वो उन्हीं मूल्यों के आस-पास थी कि सब कुछ पैसा नहीं है मगर पैसे का अपना हिसाब-किताब रखा जाना चाहिए। इसे न बहाओ न इसके पीछे भागो। मगर प्रॉब्लम ये है कि हम टीचर तो हैं मध्यमवर्गीय परिवारों से और हमारे स्टुडेंट ऐसे परिवारों से हैं जिन्हें देख कर लगता ही नहीं कि ये हिन्दुस्तान की फैमिली है।"

"इनके सामने हमें ही छोटा महसूस होता है। कभी-कभी घुटन सी होती है। बहुत प्यारे बच्चे हैं। मगर इतने पैसे के बीच पल-बढ़ रहे हैं कि अभी से इनकी ऊंची हैसियत बनी हुई है कि हम इन्हीं खुलकर डांट भी नहीं सकते। एक क्लास को मैंने प्रोजेक्ट दिया। कहा कि आपमें से ज्यादातर बिजनेस परिवारों के हैं, तो बताइये कि आप जब बिजनेस संभालेंगे तो क्या करेंगे जिससे उसका विस्तार हो। सातवीं आठवीं के बच्चे थे। सबने जो प्रोजेक्ट बनाया वो बीस से लेकर चालीस करोड़ रुपये तक था। दस पांच रुपये का ख्याल तो आता ही नहीं। एक छात्र ने कहा कि ज़रूरी नहीं है कि हम अपने मां-बाप का ही बिजनेस संभालें। हम इंडिया के बाहर भी तो बिजनेस कर सकते हैं।"


"मेरी इच्छा थी कि आप इस दुनिया को भी देखें। अच्छा है कि आप हिन्दुस्तान की हकीकत दिखाते हैं रवीश की रिपोर्ट में। लेकिन ये भी एक हकीकत है। जहां मां-बाप अपने बच्चे की पढ़ाई के लिए बीस हज़ार रुपये फीस देते हैं। बाकी खर्चा अलग से। स्कूल की सफाई,व्यवस्था सब फाइव स्टार के बराबर है। लेकिन हम इस सवाल से रोज़ टकराते हैं कि इनके लिए शिक्षा का मतलब क्या है? हम जिस तरह के माहौल में पढ़ें वहां तो शिक्षा के लिए एक मतलब था। इस स्कूल की हर सुविधा हमें रोज़ हैरान करती है। हमारे भीतर एक संघर्ष चलता रहता है। इन्हें तो मालूम ही नहीं कि इंडिया क्या है। वो पढ़ कर निकलेंगे तो इसी सोच के साथ कि पूरा इंडिया फाइव स्टार होटल है। ग्लोबल है।"

दोस्तों, पिछले कई महीनों से दिल्ली और आस-पास के कई इंटरनेशनल स्कूलों में जाने का मौका मिला। वहां विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले मध्यमवर्गी कर्मचारियों की आवाज़ें बहुत दिनों से कानों में गूंज रही थीं। कई बार ऐसे स्कूलों की इमारतों में घुसते ही मेरे भीतर की हैरत ग्रंथी में हड़कंप मच जाया करती थी। दिमाग़ के भीतर बने तमाम जंजालों में संदेश चला जाता था कि देखो गांव गली में घूमने वाला हिन्दी वाला एक फाइव स्टार स्कूल में आ गया है। सूक्ष्म धमनियों में जो हलचल मच रही थी, वो चेहरे पर भी झलक रही थी। बाथरूम से लेकर अत्याधुनिक क्लास रूम, अजीबो-ग़रीब कुर्सियां। सुविधाएं ऐसी कि वाकई में सरकारी स्कूल तरस जायें। फर्श पर बिछी कालीन पर भी एबीसीडी की डिज़ाइन, खेलते वक्त पांव के संपर्क में आते ही अक्षर अपलोड होकर दिमाग़ के अक्षरकोष में पहुंच जायें।

मैं एलियन की भांति घूम रहा था। पूरा एयरकंडीशन। स्कूल के कर्मचारी ने कहा कि अब एसी को लेकर क्यों हैरान होते हैं। एसी तो पुरानी बात हो चुकी है। ये हॉल देखिये। यहीं पर कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान नेट बॉल्स हुए थे। फर्श पूरा वुडेन है। पूरी दिल्ली में इतना बड़ा और भव्य हॉल नहीं होगा। हॉल की भव्यता बता रही थी कि स्कूल में कई हज़ार बच्चे पढ़ते होंगे। स्कूल अभी नया ही खुला है। ढाई सौ बच्चे हैं। मालूम नहीं कि भावी संख्या क्या होगी लेकिन लगा कि जितनी भी होगी उसके लिए यह हॉल काफी बड़ा है। एक आवाज़ ने कहा कि सुविधाओं में कोई कंजूसी नहीं की गई है। पूरी कोशिश होती है कि सब कुछ इतना हो कि कोई रोना न रोए। बस ऊंचे लक्ष्य की सोचे। आत्मविश्वास की पहली सीढ़ी भव्यता से चढ़े।



इस हैरत भ्रमण से अंदाज़ा हो रहा था कि स्कूली शिक्षा एक प्रोडक्ट है जिसे लोग अलग-अलग दामों में खरीद रहे हैं। ब्लैक बोर्ड तो कब का सफेद हो चुका है। क्लास रूम में प्रोजेक्टर लगे हैं। हॉस्टल के कमरे भी देख लीजिए। गंदगी का नामोनिशान नहीं। होटल जैसे माहौल में बच्चे उस शिक्षा को हासिल कर रहे हैं जिसके लिए सरकार मौलिक अधिकार टाइप कानून बना चुकी है। ये शिक्षा तो पूरी तरह से वर्ग विशेष के विशेषाधिकार का मामला लगता है। सरकार जितना सार्वभौम बनाने की कोशिश करती है,शिक्षा उतनी ही वर्गीय हो जाती है। क्लासी। एक तस्वीर कॉमनरूम की भी है। स्कूल में जो स्विमिंग पूल है वो भी काफी बड़ा है। पूरी दिल्ली में शायद एकाध ही होंगे। तीस एकड़ के एरिया में फैला है यह ग्लोबल स्कूल। उम्मीद की जानी चाहिए कि यहां के बच्चे जब पढ़ कर निकलेंगे तो भारत की जीडीपी को बत्तीस कर देंगे। मनमोहन सिंह के श्रीमुख से आठ या नौ फीसदी सुनकर मुझे भी खराब लगता है। वैसे ही जैसे टीआरपी की दुनिया में आठ और नौ खराब अंक हैं। इन बच्चों के मां-बाप ने वाकई कुछ तो सोचा होगा जिसे हिन्दी टाइप के क्रंदनीय लोग कभी समझ ही नहीं सकते।


स्कूल की लॉबी से लेकर गलियारे तक सब उस भारत के आत्मविश्वास की कहानी कह रहे हैं जिसकी प्रैक्टिस शहरी भारत हर दिन अपने भाषणों और लेखों में करता है। बताता है कि भारत महाशक्ति बन रहा है। ऐसी इमारतों और विशाल भकोसू उपभोक्ता समूह के दम पर तमाम तरह के फटीचर लेखों में अपना भारत महाशक्ति टाइप बताया जाता है। यह स्कूल खुद को ग्लोबल कहलाता है ताकि इसके बच्चे बाहरी दुनिया में जायें तो इन्हें न लगे कि ऐसा इंडिया में नहीं है। न्यू यार्क और नोएडा में रहने का अनुभव एक हो।

मैं नकारात्मक सोच से स्कूल को नहीं देख रहा था। मुझे नहीं मिला तो क्या किसी को न मिले। बिल्कुल मिलना चाहिए। आखिर शिक्षक के वेतन भी अच्छे होने चाहिएं। उनकी सुविधा का भी ख्याल रखा जाना चाहिए। ये क्या संविधान में लिखा है कि हमारा टीचर हमेशा पोलियो की दवा खिलाएगा और वोट डलवाएगा। इंटरनेशनल स्कूल के शिक्षकों को भी भरपूर सुविधाएं दी गई हैं। फिर भी मुझे इस स्कूल का मतलब समझ नहीं आ रहा था। किसी प्रचार के मकसद से यह लेख नहीं लिख रहा हूं। मुझे यकीन है कि मेरे पाठक अपने बच्चों के लिए ऐसे स्कूल का ख्वाब नहीं देखते होंगे। देखते भी होंगे तो बीस हज़ार रुपये की हैसियत कुछ ही रखते होंगे। या नहीं ही रखते होंगे। मुझे मालूम नहीं। इस अरबपति स्कूल का प्रचार यह अदना ब्लॉगर क्या करेगा। लेकिन सचमुच भीतर से देखना दुर्लभ अनुभव था।
उम्मीद है यहां के बच्चे कलमाडी टाइप उद्योगपति नहीं बनेंगे। पता नहीं कलमाडी ने भी ऐसे स्कूलों की शक्ल देखी होगी या नहीं। भ्रष्ट तो म्यूनिसपल स्कूलों से भी निकलते हैं। खैर जो भी हो,इसका लोड मैं ही क्यों ढो रहा हूं। उनके मां-बाप को तो ऐसा ही स्कूल चाहिए था। वैसे स्कूल की इमारत से लेकर क्लास रूम तक,सभी विश्वस्तरीय। अगर अच्छी इमारत का होना विश्वस्तरीय होना है तब। ग्लोबल स्कूल एक हकीकत तो है ही। क्या पता आने वाले दिनों में यहां कोरिया,जापान,इंग्लैंड के बच्चे पढ़ने आ जाएं। किसी को नहीं मालूम। स्टेडियम,तलवारबाज़ी,स्क्वॉश गेम की उत्तम व्यवस्था है। स्कूल की छत पर शानदार टेनिस कोर्ट बनाया गया है। जिम के नाम पर किसी कोने का जुगाड़ नहीं किया गया है बल्कि विशालकाय हाल हैं। स्केटिंग के लिए कोई संकरा रास्ता नहीं बल्कि लंबा और चौड़ा गलियारा है।
बनाने वाले ने अपना सपना पूरा कर लिया है। इमारत इस लिहाज़ से बनाई गई है कि स्कूल न चला तो होटल या मॉल खुल ही जाएगा। लेकिन इस तरह की सोच कोई हिन्दीवाला ही रख सकता है। जिन्होंने बनाया होगा उनका ख्वाब तो होगा कि दुनिया में ऐसा स्कूल न हो। ये स्कूल उसी ख्वाब का ऐशगाह लगता है। पढ़ाई के स्तर पर भी काफी ध्यान रखा गया है। क्लासरूम में सर्वशिक्षा अभियान टाइप भगदड़ नहीं मची है। टीचर के पास पूरा समय है,हर बच्चे पर ध्यान देने के लिए।

आप भी देखिये। ये कार मर्सेडिज़ की है। मॉडल नहीं मालूम। पचास लाख से सत्तर लाख तक की कीमत वाली कार है।
ऐसे स्कूलों में किसी ने मुझे नहीं पहचाना। पंद्रह साल टीवी पर काम करने का एक फायदा तो है कि एकाध लोग हल्के में पहचान लेते हैं। आप वही हैं न जो जी टीवी पर आते हैं, स्टार न्यूज़ में आते हैं..नहीं नहीं..आज तक पर देखा है। यहां इस तरह का कोई अनुभव नहीं हुआ। मगर करोड़ रुपये की कार के ड्राइवर ने नमस्कार कर दिया। निकलते वक्त जता दिया कि मैं कहां से कनेक्टेड हूं। बस गला गला सूखने लगा था। हर बच्चे को अच्छा भविष्य मिले। कौन नहीं चाहता कि सुविधाओं की कमी न रह जाए। आखिर अब्राहन लिंकन की बायोग्राफी कब तक ढोते रहेंगे। बस कभी-कभी सोचता हूं कि ये बच्चे कभी मोतिहारी जैसी जगह में नौकरी करने जायें तो क्या करेंगे। फिर कर दी न मैंने भी। मिडिल क्लास वाली बात। कोई इंग्लिश एलित गया होता तो कहता..वाउ..कूल डूड..इट्स रौकिंग। वी हैव अराइव्ड।
हैलो..राहुल गांधी, नूरी ख़ान कुछ कहना चाहती है......

सवा सौ साल की बूढ़ी कांग्रेस के महाधिवेशन में आए करीब साढ़े बारह हज़ार से ज्यादा पार्टी प्रतिनिधियों में से नूरी ख़ान के बारे में लिखने का कोई ठोस औचित्य तो नहीं है मगर जवान होने की चाह में चमचमाने की कोशिश कर रही कांग्रेस के युवा नेताओं पर नज़र पड़ गई। इंदौर से लौट रहा था। फ्लाईट में एक तीस साल की लड़की अपने मोबाइल फोन उलट-पलट रही थी। बेचैन थी। उसी ने कहा कि आप पत्रकार हैं। जवाब हां में मिलते ही बातें शुरू हो गईं। तभी मैंने तय कर लिया कि मैं नूरी ख़ान के बारे में लिखूंगा। क्योंकि पूरी बातचीत में राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व की कंगाली के प्रति के एक किस्म का विद्रोह नज़र आ रहा था। सियासत में बिना बाप-दादे के यह लड़की अकेले अल्पसंख्यकों की आवाज़ बनने का ख्वाब पाले हुई थी।
नूरी ख़ान दिल्ली आईं हुईं हैं। राजनीति में आने की ख्वाहिश किसी विरासत में नहीं मिली। पूरे ख़ानदान में कोई नेता नहीं है। नूरी ने कहा कि बस उन्हें राजनीति में कुछ करना है। अगर नहीं हुआ तो,मेरी इस आशंका पर उनका जवाब सोचने लायक था। नूरी ने कहा कि राजनीति तपस्या है। कोई खंभा तो है नहीं,गए और छू कर आ गए। मुझे इस लड़की का बकबक करना अच्छा लग रहा था। एक युवा मुस्लिम महिला नेता। पूरे अधिकार से बोले जा रही थी। ऑफ रिकार्ड और ऑन रिकार्ड के भय से मुक्त।

बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला कि नूरी ख़ान अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में मध्यप्रदेश से सबसे छोटी सदस्य हैं। पूरे राज्य से अकेली अल्पसंख्य महिला। मध्यप्रदेश के तिरेसठ डेलिगेट्स हैं,जिसमें राज्य के सांसद,विधायक सभी हैं। नूरी ने ज़ोर देकर कहा कि वे मनोनित सदस्य नहीं हैं। चुन कर आईं हैं। और एक बात और...मैं सबसे कम उम्र की पार्टी की प्रवक्ता भी रह चुकी हूं। राज्य स्तर पर। मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी थी। कहा कि अठारह साल की उम्र में एनएसयूआई में आ गई। नागड़ा के गवर्मेंट कॉलेज से बीए किया है। वहीं चुनाव लड़ा। मां ने कांग्रेस पार्टी के झंडे सिल कर दिये थे। दसवीं में थीं तो नौवीं के बच्चों को पढ़ाया करती थी। बीस साल की उम्र में उज्जैन एनएसयूआई यूनिट की ज़िला अध्यक्ष बन गई। पिता एक फैक्ट्री में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी थे। नूरी फटाफट उर्दू,अंग्रेजी,हिन्दी और अखोमिया बोलती हैं। असम की भाषा..वो कैसे? मेरे इस सवाल के जवाब में एक भावी राजनेता की कहानी रोमांटिक मोड़ की तरफ मुड़ गई।
नूरी ने कहा कि दस साल पहले हैदराबाद गई थी। कांग्रेस का दृ्ष्टिकोण सम्मेलन था। वहां भाषण दिया तो खूब ताली बजी और सर्वोत्तम वक्ता का पुरस्कार भी मिला। वो भी सोनिया गांधी से। पार्टी के कई सदस्यों ने मुझसे नंबर ले लिये। मुझे मालूम नहीं कि किस किस को मैंने अपना नंबर दिया। उन्हीं में से एक थे,रक़ीबुद्दीन अहमद साहब। बाद में उनका फोन आया और फिर निकाह का प्रस्ताव। हम दोनों ने तय किया कि साथ जीयेंगे और राजनीति भी मिलकर करेंगे। लेकिन राजनीति की ज़मीन अलग अलग होगी। पति असम के गुवाहाटी विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय हो गए। रक़ीबुद्दीन युवा कांग्रेस के नेशनल कार्डिनेटर हैं। असम युवा कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष। पांच साल तक नूरी अपने पति के साथ असम में रही। वहां की राजनीति में सक्रिय हुईं तो भाषा भी सीख ली। नूरी के दो बच्चे हैं। सात साल की सोफिया और छह साल का रेहान। अब दोनों बच्चे अपनी नानी के पास उज्जैन में रहते हैं। नूरी और रक़ीबुद्दीन अलग-अलग। नूरी ने कहा कि त्याग औरत को ही करना पड़ता है। मगर मैं राजनीति का यह सफर बीच में नहीं छोड़ने वाली। २००६ में नूरी असम से उज्जैन आ गईं। सियासत में अच्छा मुकाम और अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज़ बनने के सपने को लेकर। दोनों की मुलाक़ातें महीने में तीन या चार दिनों के लिए ही हो पाती हैं। नूरी कहती हैं कि हम दोनों एक जुआ खेल रहे हैं। मालूम नहीं कैरियर किस मोड़ पर जाकर खत्म हो जाए। लेकिन मुझसे देखा नहीं जाता कि अल्पसंख्यकों का कोई सर्वमान्य नेता नहीं है।
यहां से बातचीत रोमांटिक टोन को छोड़ राजनीतिक होने लगी। नूरी कहने लगीं कि अगर एआईसीसी के बैठक में मुझे बोलने का मौका मिल गया तो वही बोलूंगी जो हकीकत है। आखिर मुसलमानों का सर्वमान्य नेता क्यों नहीं है। क्यों मुसलमानों से कहा जाता है कि वो ऐसी सीट देखे जहां तीस से चालीफ फीसदी मुसलमान हों? मैं ऐसा नहीं चाहती। सर्वमान्य नेता तभी पैदा होगा जब वो जनरल सीट से लड़ेगा जिसे बाकी समुदाय के लोग भी वोट देंगे। आज मुसलमानों को ऐसा नेता चाहिए जो माइनॉरिटी के भीतर लड़े लेकिन नेतृत्व सबका करे। मैं मुस्लिम बहुल सीट से अपनी राजनीति नहीं शुरू करना चाहती। मैं चाहती हूं कि जोखिम लूं। लोग मुझे भी स्वीकार करेंगे। मुझे जनता पर भरोसा है कि वो इस पूर्वाग्रह को तोड़ देगी।

बिहार के नतीजे से सबक लेने की ज़रूरत है। मुसलमानों ने बीजेपी को वोट दिया है।मध्यप्रदेश में जिस सीट पर चालीस फीसदी मुसलमान हैं वहां से बीजेपी कैसे जीत जाती है? हम कब सीखेंगे। पार्टी के भीतर मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व अल्पसंख्य समुदाय की उतनी ख़बर नहीं ले रहा,जितनी लेनी चाहिए। मध्य प्रदेश में ही अल्पसंख्यक समुदाय की सारी केंद्रीय योजनाएं अधूरी पड़ी हैं। आवाज़ उठाने वाला नहीं है। मैं अभी उस काबिल नहीं हुई हैं कि लोग मुझे सुनें। फिर भी मैं बोलती रहती हूं।
एआईसीसी महाधिवेशन में सभी को बोलने का मौका नहीं मिलता। चिट सिस्टम होता है। उम्मीद करता हूं कि नूरी की लॉटरी लग जाए और खूब बोलने वाली यह नेता अपने दिल की बात कह सके। राजनीति में किसी की तरफदारी करना जोखिम का काम है। वो भी एक मुलाकात के बाद। फिर भी कुछ तो अच्छा लगा ही कि लिख रहा हूं। एक ऐसे समय में जब कांग्रेस का अहंकार चरम पर है। तमाम आरोपों के प्रति उसका रवैया अलोकतांत्रिक है। फिर भी उसके युवा कार्यकर्ताओं में पार्टी के लिए उम्मीदें हैं।
ज़हर खाए मरीज़ों का अस्पताल
यह साइन बोर्ड दो साल पहले देखा था। विजेंद्र के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने पर मीडिया ने भिवानी पर धावा बोल दिया था। तब से यह साइन बोर्ड मुझे परेशान कर रहा था। इस कहानी को आप तक लाने के लिए कई कोशिशें की। कई बार आत्महत्या की कोशिश करने के बाद बच गए मरीज़ों ने कैमरे पर बात करने से मना कर दिया तो कई बार डॉक्टरों ने हिम्मत नहीं दिखाई क्योंकि यह मेडिकल नैतिकता का मामला था। इस बीच सल्फास और कीटनाशक स्प्रे खा या पीकर आत्महत्या की कोशिश करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी। आप भी किसी अस्पताल के बाहर इस तरह के साइन बोर्ड देखकर सोच रहे होंगे कि कोई न कोई कहानी तो होगी इसके पीछे। अंततोगत्वा जब हिसार और भिवानी पहुंचा तो एक बार फिर से यह कहानी बीच में ही दम तोड़ने लगी। फिर डॉ जे बी गुप्ता ने ही मदद कर दी। कुछ मरीज़ों को तैयार किया बोलने के लिए। उनका चेहरा और पहचान न दिखे इसकी पूरी कोशिश की गई।
कहानी यह है कि हरित क्रांति के बाद कीटनाशक दवाएं घर-घर में उपलब्ध हैं। डॉक्टरों ने बताया कि आत्महत्या की कोशिशें करने वाले मरीज़ों या कहें तो लोगों की संख्या काफी बढ़ी है। एक डॉक्टर ने बताया कि दो साल पहले उनके अस्पताल में एक ही वेंटिलेटर था। अब तीन तीन है। एक डॉक्टर ने दावा किया कि अट्ठाईस साल के कैरियर में इस तरह के दस हज़ार मरीज़ों को ठीक किया है। इनमें वो संख्या शामिल नहीं है जो मरीज़ कीटनाशक दवा लेने के बाद गांव में ही मर गए या अस्तपाल पहुंचने से पहले। आत्महत्या की इन कोशिशों में कर्ज़ बड़ा कारण नहीं है। वो भी कई कारणों में से एक है मगर ज्यादातर मामलों में औरतें पति के बात न मानने पर या पराई स्त्री से संबंध होने के मामले में कीटनाशक दवायें पी लेती हैं। हालत यह है कि अब अस्पतालों ने ज़हर खाए मरीज़ों के लिए बकायदा पैकेज बना दिया है। सरकार के पास इसके आंकड़ें नहीं हैं क्योंकि सरकार प्राइवेट अस्पतालों से आंकड़े नहीं लेती। ज्यादातर मरीज़ झूठ बोलते हैं कि गलती से सल्फास या कीटनाशक दवा ले ली। अब यह बात समझने लायक है कि हर महीने एक अस्पताल में इस तरह के बीस मामले आ जाते हैं। क्या इतने लोग गलती से सल्फास या स्प्रे ले रहे हैं। कुछ किसान अनजाने में अपनी लापरवाही के कारण स्प्रे के ज़हर से मर जाते हैं। मगर यह मामला अलग है।
आप इस शुक्रवार रात 9:28 बजे रवीश की रिपोर्ट देखेंगे तो अच्छा लगेगा। कार्यक्रम अच्छा लगे तो किसी को देखने के लिए ज़रूर बताइये। शनिवार की सुबह 10:28 बजे और रात 10:28 बजे रवीश की रिपोर्ट दुबारा दिखाई जाती है। नीचे की बाकी तस्वीरें भिवानी और हिसार की हैं। एक तस्वीर परमिट कक्ष वाली करनाल की है।
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