अच्छी फिलम है। मीडिया के भीतर चल रहे कई संकटों का कोलाज है और एक किस्म का सिनेमाई ब्लॉग। फिलम की कहानी कई सत्य कथाओं का नाटकीय रुपांतरण है। जुलाई २००८ के विश्वासमत के दौरान संसद में रखे गए नोटे के बंडल के ज़रिये एक धृतकुमारी टंकार टाइप के ईमानदार मनमोहन सिंह की छवि बिगाड़ाने की कोशिश और स्टिंग न दिखाये जाने के पीछे की हकीकतों और अफवाहों का मिश्रण।
पहले आधे में फिलम मीडिया के कंटेंट के विवाद को छूती है। टीआरपी गिर रही है। अस्तित्व पर संकट है।चैनल घाटे में हैं। तो क्यों न थोड़ा बदल कर मार्केट के बाकी सामानों की तरह हो जाया जाए। ये कहानी कुछ कुछ एनडीटीवी इंडिया के संकट जैसी लगी। साफ साफ किसी का नाम नहीं है लेकिन लेखकीय क्षमता के ज़रिये आप इन नामों और घटनाओं को समझ सकते हैं। जब विजय मलिक अपने कमरे में गिरती टीआरपी की चर्चा करते हैं तो पीछे दीवार पर लगी टीवी में एनडीटीवी इंडिया का लोगो दिखता है। यही एक क्षण है जहां फिल्म वास्तविकता को छूती है। लेकिन यह संयोग भी हो सकता है। वहां से कहानी आगे बढ़ती है और हिन्दी फटीचर काल के तमाम कार्यक्रमों और अनुप्रासों की एक झलक दिखाई जाती है। यहां फिलम थोड़ी कमज़ोर लगती है। कंटेंट के संकट को हलके से छूती है या फिर कहानी का मकसद कंटेंट के संकट से ज़्यादा मीडिया के आर्थिक पक्ष के बहाने उस पर राजनीतिक नियंत्रण को एक्सपोज़ करने का रहा होगा।
बिल्कुल सही है कि अब पत्रकारों के सवाल में दम नहीं रहे। न वो आग है। मेरा मानना रहा है कि हिन्दी टेलीविजन का फटीचर काल इसलिए आया क्योंकि सभी स्तरों पर खुद को अच्छा कहने वाले पत्रकार फेल हो गए। वो अच्छा कहलाते रहे लेकिन बेहतर कार्यक्रमों या रिपोर्टिंग के लिए उपयुक्त श्रम नहीं किया। प्रयोग नहीं हुआ। उनकी साख इसलिए बची रह गई क्योंकि वो नैतिकता रूपी पैमाने पर अच्छा और महान मान लिये गए। इन अच्छे पत्रकारों के कार्यक्रम,एंकर लिंक, बोलने का लहज़ा इन सबको करीब से देखेंगे तो संकट का यथार्थ नज़र आएगा। सिर्फ यह कह कर गरिया देना कि खतम हो जाएगा संसार जैसे कार्यक्रम पत्रकारिता नहीं हैं,अधूरी आलोचना है। यह भी देखा जाना चाहिए कि इसके विकल्प का दावा करने वालों के कार्यक्रमों में कितना दम है। कौन से ऐसे बेहतर कार्यक्रम हैं जिनके लिए आप इंतज़ार करते है,जिसे देखकर आप धन्य हो जाते हैं। हो तो मुझे भी बताइयेगा। तभी हम सभी को एक रास्ता मिलेगा। एक बार लोग जूझेंगे कि बेहतर और नया करके इस लड़ाई में उतरते हैं न कि लेख लिख कर या फिर किसी सेमिनार में भाषण देकर। रण की तरह टीवी किसी साहित्यिक पत्रिका की तरह नहीं चल सकती,उसे जन-जन तक पहुंचने की कोशिश करनी ही चाहिए।
इसीलिए जब ये बवाल गुज़र जाए तो इस पर भी चर्चा कीजिएगा कि जो जो लोग खुद को अच्छा कहते हैं,लिखने के स्तर पर,रिपोर्टिंग के स्तर या एंकरिंग के स्तर पर,उनके काम में कितनी धार है। ऐसे अच्छे लोगों के कार्यक्रमों की विवेचना कीजिए और देखिये उसमें कितना खरापन है। ये एक किस्म की सार्थक बहस होगी और अच्छा कहलाने वालों पर बेहतर होने का दबाव बनेगा। सिर्फ नैतिकता को बचाकर छत पर खड़े हो जाने से और गलीज़ काम करने वालों को गरिया देने से ये संकट नहीं गुज़रने वाला। गरियाने के बहाने अपनी घटिया कॉपियों,घटिया कैमरा,पीटूसी और बेतरतीब ढंग से लिखी रिपोर्ट और घटिया शो को पब्लिक काहे देखेगी। इसीलिए मुझे लगता है कि मौजूदा संकट खराबी का नहीं,अच्छा समझने वालों की पंगु कल्पनाशीलता का नतीजा है।
और यहीं पर रण सार्थक हस्तक्षेप करती है। यहीं पर फिलम मेरे सवालों का हल्का जवाब देती है। परब शास्त्री के किरदार के रूप में। एक धारदार रिपोर्टर ही मीडिया के संकट को खतम करता है। हिन्दी टीवी के फटीचर काल में सभी रिपोर्टर संपादक बन गए। मैदान में कोई धारदार रिपोर्टर नहीं बचा जो खबरों को खोज रहा हो। हो सकता है कि चैनल प्रोत्साहित नहीं करता हो,हो सकता है कि रिपोर्टर भी नहीं करता हो। लेकिन परब शास्त्री का किरदार व्यक्तिगत पहल करने वाला किरदार है। वो अपना काम करता चलता है। खोज रहा किन पर्दों के पीछे साज़िश रची गई। उसके सवाल पत्रकार वाले लगते हैं। त्रिवेदी के सवाल मज़ाक तो उड़ाते हैं लेकिन आप किसी भी पोलिटिकल इंटरव्यू को देख लीजिए,करण थापर को छोड़कर,उसके ज़्यादातर हिस्से में बकवास होता है। परब के सवाल पर कि आप नया क्या करेंगे,पांडे का बड़बड़ना और लड़खड़ना लाजवाब है। रिपोर्टर की ताकत का अहसास करा कर रण ने बड़ा उपकार किया है।
एक दौर था जब हिन्दी न्यूज़ चैनलों में कई परब शास्त्री थे। अब दौर ऐसा है कि सब के सब त्रिवेदी हो गए हैं। कई रिपोर्टर अब नेताओं से संपर्क की बात ज़्यादा करते हैं। राजनीतिक दलों के साथ साथ महासचिवों के प्रति निष्ठा पैदा हो गई है। हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में राजनीतिक पत्रकारिता फटीचर काल को सुशोभित कर रही है। परब शास्त्री आज भी हैं लेकिन उनकी कदर नहीं। मीडिया संस्थान परब शास्त्री बनाना भी नहीं चाहते। कितने हिन्दी के रिपोर्टरों ने चटवाल के मामले की गहन पड़ताल की है। व्यक्तिगत या सांस्थानिक रूप से। सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस की रितु सरीन ही क्यों कर रही हैं। ये सवाल तो हिन्दी के रिपोर्टरों को व्यक्तिगत स्तर पर खुद से पूछने ही होंगे।
लेकिन ऐसा नहीं है कि आप फिलम से बोर होते हैं। गाने नहीं है। सेक्सी डांस नहीं है। पार्श्व संगीत के ज़रिये चित्कार सुनाई देती है। गाना स्पष्ट नहीं है लेकिन चित्कार से पता चलता है कि बेअसर हो चुका यह माध्यम चीख रहा है। आज कई चैनलों में उद्योगपतियों, राजनीतिक दलों के पैसे लगे हैं। मीडिया ने इसे तब स्वीकार किया जब उस पर संकट नहीं था। कई चैनल राजनेताओं के भी हैं। बिल्डरों और चीनी मिल वालों ने भी चैनल खोलें, उनका अधिकार है, लेकिन पत्रकारिता से उनका क्या लगाव हो सकता है। ये ज़रूर है कि इस फिलम से सीखने के लिए कुछ नहीं है लेकिन ये एक अच्छी डॉक्यूमेंट्री है।
नाटकीयता के बहाने ही सही रण एक मौका देती है,माफी मांग कर अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों की तरफ लौटने का। आखिर में फिलम मीडिया के प्रति उदार हो जाती है। ये नहीं कहती कि बंद करो टीवी को देखना। ये एक फिलम नहीं कह सकती। इस संकट को दूर करने के लिए खुद को याद किया जाए कि पत्रकार क्यों बने हैं? लेकिन यह समाधान बेहद सरल और आदर्श है। इससे कुछ नहीं होगा। इससे पहले भी मीडिया के संकटों पर रोज़ लेख लिखे जा रहे हैं, बहस हो रही है और अब तो मंत्री संपादकों से गाइडलाइन इश्यू करवाता है। लोकप्रियता सभी टीवी चैनलों का ख्वाब होना चाहिए। कोई नाम कमाकर लोकप्रिय हो सकता है तो कोई बदनाम होकर। लेकिन सिर्फ निमन बबुआ(good boy) बन कर आप इस रण को नहीं जीत सकते। निमन बबुआ और काबिल बबुआ की लड़ाई शुरू होनी चाहिए। इसलिए रण जारी है दोस्तों।
मूर्ति पूजा का खंडित पक्ष


आरा से यह तस्वीर सहकर्मी दीपक कुमार के सौजन्य से प्राप्त हुई है। जयप्रकाश नारायण की मूर्ति है। जन्मशति के मौके पर उनके अनुयायी आस्था व्यक्त कर रहे हैं। जयप्रकाश नारायण के जितने भी सत्ताधारी चेले हुए वो सब फटीचर गति को प्राप्त हुए लेकिन तस्वीर में दिख रहे लोग पता नहीं क्यूं जेनुइन मालूम पड़ते हैं। इसी खौफ से बहन कुमारी मायावती ऊपी में मूर्ति रक्षा दल बना रही हैं ताकि इस तरह के दिन न देखने पड़े। लेकिन उन्हें भी समझना चाहिए,जब तक इस तरह के अनुयायी बचे रहेंगे,मूर्ति का बचाखुचा कोई भी हिस्सा आस्था व्यक्त करने के काम आता रहेगा। मुझे यह तस्वीर ग़ज़ब की लगी। इस मूर्ति के नीचे से किसी भी प्रकार के लोकतांत्रिक विचार आ जा सकते हैं। दो खंभों पर खुद को टिकाने का ही तो जेपी ने प्रयोग किया था। दो तरह के विचारों को भी।
जानवरों से एंग्री शनि


भय शनि की अराधना का मुख्य तत्व है। शनि के इस प्रचार-प्रसार काल में मंदिर किसी हादसे के बाद विस्थापितों के शहर में बनने वाले मेकशिफ्ट ढांचे जैसे हैं। शनि पूरी तरह से ब्लैक रंग पसंद करने वाले देव हैं। एकरंगा। दिल्ली के सीमान्त से लगे गाज़ियाबाद के वैशाली में एक पार्क है। इस पार्क में कुछ साल तक बंगाली प्रवासियों ने दुर्गा पूजा का शानदार आयोजन किया। उसमें चंदा मैंने भी दिया। अब इन लोगों ने अपनी धार्मिक ज़रूरतों के लिए काली का मंदिर इसी पार्क में बनवा लिया है। अच्छा भोग मिलता है। जब शनि की यह तस्वीर खींचने गया था तो मंदिर में एक बालक ने मुफ्त और बिन पूजा के ही भोग दे दिया। स्वादिष्ट। इसी काली मंदिर के पीछे बना है शनि मंदिर। जानवर आते जाते होंगे। मूर्ति पर चढ़ाए गए दूध-चीनी,मीठाई और पत्तों पर मुंह साफ कर देते होंगे। जो गाय खुद पूजनीय है उसी के स्पर्श से शनि देवता नाराज हो जाते हैं।
आप भगवान की तरफ से लगाए गए नोटिस बोर्ड को पढ़ सकते हैं।शनि में मेरी दिलचस्पी है इसलिए इनके ठिकानों को खोजता रहता हूं।
अर्जुन, सानिया की सगाई टूट गई है, चल टीवी देखते हैं-कृ
सानिया मिर्ज़ा की निजी ज़िंदगी में एक तूफ़ान खामोशी से गुज़रा है लेकिन वो तूफान अब हिन्दी पत्रकारिता के फटीचर काल की शोभा बढ़ाने के काम आ जाएगा। सानिया का ब्रेक अप ब्रेकिंग न्यूज़ है। सारे गली मोहल्ले के रिश्ते विशेषज्ञ बुलाये जायेंगे। वो समझायेंगे दोस्ती और सगाई के बीच की यात्रा। वो बतायेंगे कि कैसे आज कल कामयाबी के दबाव से रिश्ते दरक जा रहे हैं। बीच बीच में फाइल फुटेज में दांते निपोड़ती सानिया की पुरानी तस्वीर इस मनोचिकित्सक की बात को तसदीक करेगी। कोई सगाई का कार्ड दिखा रहा है तो कोई सोहराब मिर्ज़ी की तस्वीर। अनुप्रास क्षमता से लैस आउटपुट संपादक आज स से शुरू होने वाले तमाम द्विअर्थी शब्दों को निकाल कर वाहवाही प्राप्त करेंगे। टीवी स्क्रिन को ऊर्जा से भर देंगे।
सानिया ने सगाई तोड़ कर फटीचर काल के हम संपादकों की कल्पनाशीलता को नई उड़ान दे दी है। इसी बहाने कोई चैनल कॉल इन शो करेगा तो कोई क्यों नहीं टिकती सेलिब्रिटी की शादियां पर पूरा फीचर बना देगा। एंजोलिनी का भी ब्रेक अप होने वाला है। सानिया का हो गया। करीना का भी किसी से टूटा था। प्रीटी ज़िंटा का भी ब्रेक अप हो गया है। कोई यह बतायेगा कि कहीं सानिया की ज़िंदगी में कोई दूसरा तो नहीं आ गया। एक न एक चैनल ज्योतिष और टैरॉट कार्ड रीडर का भी बुलायेगा। एक बतायेगा कि इस बदमाश राहू के कारण सब हो रहा है वही सोहराब के घर में घुस कर फूट डाल रहा है।
बवाली रिपोर्टर आज सानिया-सोहराब के घर से बाहर लाइव चैट दे रहे होंगे। बल्कि देने लगे हैं। रेटिंग की नाजायज़ औलाद आज की हिन्दी टीवी पत्रकारिता अपना प्रतिकार करेगी। जावेद अख्तर की किसी बची खुची स्क्रिप्ट के किसी किरदार की तरह। जो गुंडा बन कर सिस्टम से प्रतिकार करता है। जावेद अख्तर के इस अप्रतिम योगदान और इससे उपजे अमिताभ बच्चन की शोहरत का मर्म किसी ने समझा है तो हम हिन्दी के पत्रकारों ने। टीवी आज चित्कार मार मार कर बतायेगा कि सानिया और सोहराब के बीच क्या हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया की इस ख़बर ने वो आग दे दी है जिसमें हम सब जलेंगे। अभी अभी ईमेल आया है कि एनडीटीवी इंडिया इस खबर को नहीं दिखायेगा। तो भी मैं अपने आपको इस पतित धारणी हिन्दी पत्रकारिता से अलग नहीं करूंगा। बहने दो इस कीचड़ में खुद को। कादो लपेट कर शरीर को ठंडक पहुंचती है। मज़ा आता है। कीचड़ समानार्थी है।
ऐ अर्जुन, रख दे गांडीव। देख हिन्दी टीवी पर क्या आ रिया है। कृष्ण के इस उवाच से घबराया अर्जुन कहता है कि मैंने जब तीर ही नहीं चलाया तो सानिया की सगाई कैसे टूट गई देव। कृष्ण- अर्जुन,कमानों में तीरों को सड़ने के लिए छोड़ दे। सानिया के बाप का एसएमएस आया है। ख़बर कंफर्म है। संपादकों की मंडली एनबीए,पत्रकारिता के इन महान पर्वतीय शिखरों पर आने वाले वक्त में नाज़ करेगी। एक ईमेल भेजेगी। तब तक मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से आलोचक जल कर खाक हो जाएंगे। सच कहूं मुझे यह गंदगी रास आती है। धूल से बेहतर कीचड़ है। अहा..काश भैंसों के इस परमानन्द को गायें समझ पातीं। गया पहुंचने से पहले ही हाजीपुर में गंगा किनारे किचड़ में धंस गया होता,अपना गौतम। आओ,मुझे भी गाली दो। मैं भी इस कीचड़ के आनंद का सहभागी हूं। आओ। कहां हो गौतम। पत्रकारिता के महामण्डलेश्वरों को कलक्टर के दफ्तर में बुलाकर पूछो,किसकी नैतिकता का झंडा सबसे बुलंद है। अखाड़ों में पलता है सनातन धर्म। नंग-धड़ंग डुबकी लगाकर मुक्ति का मार्ग बताता है।
जाओ अर्जुन,तुम भी इसी मार्ग से जाओ। कृष्ण की आवाज़ गूंजती है। करनाल में सोये लोग जाग जाते हैं। उठ कर हिन्दी टीवी लगा देते हैं। कृष्ण कहते हैं- सानिया मिर्ज़ा और सोहराब की चंद रातों से मिलता जुलता कोई हिन्दी फिल्म का गाना है रे। पूछ तो भीम से। बोल ओही बजावेगा। तनी सेंटी होकर कुरूक्षेत्र में रिलैक्स किया जाये रे। हटाओ इ अर्जुनवा के। जब देख तब तीरे तनले रहता है। सब लड़इयां इहे लड़ेगा का रे। सेव दुर्योधन। सेव कर्ण। बचाओ। जब सबका संरक्षण हो रहा है तो इ सभन के काहे मार रहा है रे अर्जुन। देख न। लाइव हिन्दी टीवी का महाभारत। चल रिलैक्स करते हैं। कृष्ण- आज ही टीवी पर बेलमुंड ज्योतिष बोल रहा था- वृश्चिक- आज आपके ख़िलाफ साज़िश होगी लेकिन आज आराम महसूस करेंगे। व्हाट अ टाइम सर जी। साज़िश में भी आराम।
सानिया ने सगाई तोड़ कर फटीचर काल के हम संपादकों की कल्पनाशीलता को नई उड़ान दे दी है। इसी बहाने कोई चैनल कॉल इन शो करेगा तो कोई क्यों नहीं टिकती सेलिब्रिटी की शादियां पर पूरा फीचर बना देगा। एंजोलिनी का भी ब्रेक अप होने वाला है। सानिया का हो गया। करीना का भी किसी से टूटा था। प्रीटी ज़िंटा का भी ब्रेक अप हो गया है। कोई यह बतायेगा कि कहीं सानिया की ज़िंदगी में कोई दूसरा तो नहीं आ गया। एक न एक चैनल ज्योतिष और टैरॉट कार्ड रीडर का भी बुलायेगा। एक बतायेगा कि इस बदमाश राहू के कारण सब हो रहा है वही सोहराब के घर में घुस कर फूट डाल रहा है।
बवाली रिपोर्टर आज सानिया-सोहराब के घर से बाहर लाइव चैट दे रहे होंगे। बल्कि देने लगे हैं। रेटिंग की नाजायज़ औलाद आज की हिन्दी टीवी पत्रकारिता अपना प्रतिकार करेगी। जावेद अख्तर की किसी बची खुची स्क्रिप्ट के किसी किरदार की तरह। जो गुंडा बन कर सिस्टम से प्रतिकार करता है। जावेद अख्तर के इस अप्रतिम योगदान और इससे उपजे अमिताभ बच्चन की शोहरत का मर्म किसी ने समझा है तो हम हिन्दी के पत्रकारों ने। टीवी आज चित्कार मार मार कर बतायेगा कि सानिया और सोहराब के बीच क्या हुआ। टाइम्स ऑफ इंडिया की इस ख़बर ने वो आग दे दी है जिसमें हम सब जलेंगे। अभी अभी ईमेल आया है कि एनडीटीवी इंडिया इस खबर को नहीं दिखायेगा। तो भी मैं अपने आपको इस पतित धारणी हिन्दी पत्रकारिता से अलग नहीं करूंगा। बहने दो इस कीचड़ में खुद को। कादो लपेट कर शरीर को ठंडक पहुंचती है। मज़ा आता है। कीचड़ समानार्थी है।
ऐ अर्जुन, रख दे गांडीव। देख हिन्दी टीवी पर क्या आ रिया है। कृष्ण के इस उवाच से घबराया अर्जुन कहता है कि मैंने जब तीर ही नहीं चलाया तो सानिया की सगाई कैसे टूट गई देव। कृष्ण- अर्जुन,कमानों में तीरों को सड़ने के लिए छोड़ दे। सानिया के बाप का एसएमएस आया है। ख़बर कंफर्म है। संपादकों की मंडली एनबीए,पत्रकारिता के इन महान पर्वतीय शिखरों पर आने वाले वक्त में नाज़ करेगी। एक ईमेल भेजेगी। तब तक मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव से आलोचक जल कर खाक हो जाएंगे। सच कहूं मुझे यह गंदगी रास आती है। धूल से बेहतर कीचड़ है। अहा..काश भैंसों के इस परमानन्द को गायें समझ पातीं। गया पहुंचने से पहले ही हाजीपुर में गंगा किनारे किचड़ में धंस गया होता,अपना गौतम। आओ,मुझे भी गाली दो। मैं भी इस कीचड़ के आनंद का सहभागी हूं। आओ। कहां हो गौतम। पत्रकारिता के महामण्डलेश्वरों को कलक्टर के दफ्तर में बुलाकर पूछो,किसकी नैतिकता का झंडा सबसे बुलंद है। अखाड़ों में पलता है सनातन धर्म। नंग-धड़ंग डुबकी लगाकर मुक्ति का मार्ग बताता है।
जाओ अर्जुन,तुम भी इसी मार्ग से जाओ। कृष्ण की आवाज़ गूंजती है। करनाल में सोये लोग जाग जाते हैं। उठ कर हिन्दी टीवी लगा देते हैं। कृष्ण कहते हैं- सानिया मिर्ज़ा और सोहराब की चंद रातों से मिलता जुलता कोई हिन्दी फिल्म का गाना है रे। पूछ तो भीम से। बोल ओही बजावेगा। तनी सेंटी होकर कुरूक्षेत्र में रिलैक्स किया जाये रे। हटाओ इ अर्जुनवा के। जब देख तब तीरे तनले रहता है। सब लड़इयां इहे लड़ेगा का रे। सेव दुर्योधन। सेव कर्ण। बचाओ। जब सबका संरक्षण हो रहा है तो इ सभन के काहे मार रहा है रे अर्जुन। देख न। लाइव हिन्दी टीवी का महाभारत। चल रिलैक्स करते हैं। कृष्ण- आज ही टीवी पर बेलमुंड ज्योतिष बोल रहा था- वृश्चिक- आज आपके ख़िलाफ साज़िश होगी लेकिन आज आराम महसूस करेंगे। व्हाट अ टाइम सर जी। साज़िश में भी आराम।
अपार्टमेंट आजकल- बिन बाज़ार हिन्दी


मोहल्लों की कब्र पर बने ये अपार्टमेंट अब बाज़ार का विस्तार बनते जा रहे हैं। पहले अख़बारों ने इनके गेट पर प्रायोजित बोर्ड लगाया,अब वो भीतर आने का जुगाड़ निकाल रहे हैं। आजकल अचानक ड्राइंग कंपटीशन की बाढ़ आ गई है। सतमोला चाय का इन बच्चों से क्या लेना देना लेकिन चाय वाले ड्राइंग कंपटीशन करा रहे हैं। बीच में थ्री इडियट का बेहूदा सुर में गाना बजता था और सतमोला चाय की खूबी बखान होती थी। बच्चे रंग रहे थे,नाच रहे थे और कंपटीशन में जगह पा रहे थे। सबको कुछ न कुछ प्राइज़ दिया गया। इस तरह से एक रविवार की दुपहर खराब कर सतमोला चाय का विज्ञापन हो गया। सर्टिफिकेट भी मिला। जिस रफ्तार से ये कंपटीशन हो रहे हैं,उससे तो यही लगता है कि ड्राइंग रूम में सतमोला, आईसीआईसीआई,महेंद्रा और महेंद्रा,मैगी,लक्स,पैराशूट नारियल तेल के सर्टिफिकेट टंग जायेंगे। घर के भीतर भी इनकी लघु-होर्डिंगिका भर जाएगी। देह के ऊपर लगने वाले और भीतर कोशिकाओं में धकेले जाने वाले सभी उत्पादों के ड्राइंग कंपटीशन बाल काल से ही जीत रहा हूं। इसका दंभ भऱता हुआ लिफ्ट के किसी किनारे कोई युवा हिन्दी अखबारों के अनुसार किसी युवती को गुलाब के फूल दे रहा होगा। अभी इसमें टाइम है। लेकिन होगा।
(नोट-हिन्दी के अखबारों में अक्सर ये कैप्शन होता है- बारिश में भींगती युवती, हिन्दी के अखबारों में कभी किसी युवक या वृद्धा को भींगते नहीं देखेंगे। सिर्फ युवतियां भींगती हैं)
मेरी बेटी ने भी महेंद्रा एंड महेंद्रा में प्राइज़ जीत लिया। उसकी खुशी में हम भी झूमे। वोडाफोन और टाटा इंडिकॉम के फोन से पटना कोलकाता फोन कर दिये। घर में पिकासो के बालागमन का एलान कर पितृत्व और मातृत्व की खुशी का ज्वाइंट अकाउट खोल बैठे। लेकिन हर हफ्ते सोसायटी के बोर्ड पर ड्राइंग कंपटीशन की सूचना आने लगी। उसके बाद महेंद्रा एंड महेंद्रा के लोगों ने फोन कर टार्चर कर दिया कि आप आइये और एक घंटा हमारा लेक्चर सुनिये,फिर पत्नी के लिए डायमंड सेट ले जाइये। हमने कहा कि भई जब विजेता हैं तो एक मिनट में प्राइज़ दो। नहीं दिया और हम नहीं गए। हीरे के लिए एक घंटा नहीं दे सकते। रख लीजिए अपना नकली नौलखा। न हम राजा कहीं के न वो महारानी। तीन नंबरी पत्रकार ने पूरे स्वाभिमान से बाज़ार की इस गुज़ारिश को रिजेक्ट कर दिया। नेपथ्य से तालियां बजने लगती हैं।
लेकिन दोस्तों,टीवी सेट के ज़रिये ब्रेकों में विज्ञापनों का असर कम हो रहा है क्या? ये लघु-होर्डिंगिका लेकर अपार्टमेंट में क्यों आ रहे हैं? पता नहीं,वो दिन दूर नहीं जब मेरा सोफा आईसीआईसीआई से प्रायोजित होगा,बदले में सोफे की कीमत पंद्रह फीसदी कम होगी, थाली की ऊपरी सतह पर लिखा होगा,पका है हाकिन्स में। ग्लास पर लिखा होगा,एक्वा की कसम। भीतर से घर बिना एमसीडी और बीएमसी के भय के बाज़ार में बदल जाएगा। एक मेज़ बची रहेगी जिस पर हम लिखा करेंगे,हिन्दी पत्रकारिता के समाजवादी संस्थानों में पहचाने जाने के लिए,बाज़ार का विरोध किया करेंगे।
अशोक वाजपेयी दुखी हैं आजकल कि जयपुर फेस्टिवल में कोई हिन्दी वाला नहीं गया,अपने लेखक से आटोग्राफ लेने। हिन्दी का साहित्य संसार कालजयी रचनाओं के लोड से दबा जा रहा है। योगदान से कम भाव पर कोई साहित्य रचना हो नहीं रही है। पोपुलर होंगे नहीं लेकिन पब्लिक को ढूंढेंगे। महान लेखकों के श्रमदान की पाठकों ने ऐसी कीमत लगाई कि प्रकाशक भी बिना पैसे दिये किताब छापता है।
तभी एक चीख सुनाई पड़ती है... नहीं....महारानी..हम इस कालखंड को खंड खंड कर तीन वॉल्यूम छापेंगे लेकिन अपने हिन्दी के पाठकों के लिए नहीं। बाज़ार के लिए। प्रतिवाद होता है- साहित्य और समाजवादियों बाज़ार से मत डरो। बुलाओ किसी अमर सिंह को। वीर संघवी ने कह दिया कि जब हर पार्टी को अमर सिंह चाहिए तो साहित्य को क्यों नहीं चाहिए। जवाब दो। कालजयी कलमकारो। सतमोला चाय वाले ड्राइंग कंपटीशन करा सकते हैं तो क्या हम लेखक पांच सौ शब्दों की लघु कहानी की प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते। सेल्फ कांफिडेंस लाओ,साहित्य अकादमियों के पूर्व विजेताओं। सेल्फ कांफिडेंस लाओ। वो आता है मार्केट वैल्यू से। मूर्खों।
तभी प्रकारांतर से आवाज़ आती है...नहीं...बलेश्वर...ऐसा मत कहो। अपमान मत करो। क्यों गुप्तेश्वर...हिन्दी के लोग अपमानरहित जीवन चाहते हैं क्या? तुम अपार्टमेंट की कुंठा का व्यापक अप्लीकेशनीकरण मत करो। गंभीर दिखो। हिन्दी के लेखक हो..कुंठा से ही कालजयी रचनाएं बहरती हैं। हहराकर बाहर आने दो। करमजरू कहीं के,ग्लैमरसविहीन हिन्दी वाले। आव तनी एन्ने...बतइते हऊ तोरा..हम..। तभी एक धीर- गंभीर आवाज़ आती है..पहली विदेश यात्रा से खरीद कर लाए गए कंबल में लिपटा एक साहित्यकार बाज़ार मीमांसा करता है।
हर प्रभाव के लिए ज़िम्मेदार अगर कोई है तो वो बाज़ार है। जहां कोई प्रभाव नहीं हैं,वहां कोई बाज़ार नहीं है। बाज़ार के खिलाफ लिखीं कविताओं को सैमसंग रविद्रनाथ टैगोर पुरस्कार में चयनित होने के लिए भेज दो, नेशनल अवार्ड के लिए सुधीश पचौरी से सिफारिश लगा दो। ढूंढो मथुरा जाकर, किस किस ने खेले हैं बाल सुधीश के साथ कंचे। वहीं दिलायेंगे अवार्ड। शर्तिया और एलानिया कहता हूं। फ्री के इस जनसंदेश के साथ अपार्टमेंट में विज्ञापन तलाशने की संभावना पर यह लेख यहीं समाप्त होता है। तालियां। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गुमनाम अपितु स्थानीय स्तर पर ख्यातिप्राप्त हिन्दी के इस पत्रकार की यह अल्पकालिक कालजयी रचना यहीं समाप्त होती है।
क्रिकेट का गणतंत्र


अमीरी और ग़रीबी पर जितना लिखा गया है,उसकी रद्दी बेच दी जाए तो लाखों लोगों की ग़रीबी दूर हो जाए। दिल्ली के सीमान्त पर बसे वैशाली मोहल्ले के एक पार्क की यह दोनों तस्वीर है। एक ही समय में ली गई है। क्रिकेट के मोहल्ला प्लेयर अब सुविधाओं से लैस हो रहे हैं। अब से तात्पर्य है पिछले कुछ सालों में। उनके कंधे पर बल्ले को इस तरह से लटका देखा तो एक अनुशासन का बोध हुआ। लगा कि ये क्रिकेट खेलने से पहले क्रिकेट कैसे खेले वाली पांच रुपये की किताब पढ़ कर आ रहे हैं। दूसरी तस्वीर में ये चार बालक हाथों में ईंट लिये हुए हैं जो धरती पर रखे जाते ही अहिल्या की तरह विकेट में बदल जायेंगे। इन्हें देख कर लगा कि ये खेलने आये हैं। बस क्रिकेट को खेलना जानते हैं।
जब दूसरी तस्वीर को ब्लैकबेरी से क्लिक कर रहा था तो मेरे द्वारा पंद्रह बार देखी जा चुकी ग़ुलामी का डायलॉग याद आ गया। देख रहा हूं जगत की मां के सर पर फूल है और मेरी मां के सर पर जूते। ये संवाद मुझे तुम मुझे खून दो,मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा से भी ज्यादा प्रभावशाली लगा था। लड़कपन की उम्र में जोश से भर गया। कोई शक। अच्छा संवाद तो था ही। क्रिकेट बाज़ारू हो गया लेकिन इसकी औलादें अभी बाज़ारू नहीं हुई हैं। वो जोड़-जाड़ कर खेल रही हैं और मज़े ले रही हैं।
रिपोर्टिंग के रिश्ते
सात साल की रिपोर्टिंग से न जाने कितने रिश्ते अरज लाया हूं। ये रिश्ते मुझे अक्सर बुलाते रहते हैं। जिससे भी मिला सबने कहा दुबारा आना। ऐसा कभी नहीं हुआ कि दुबारा उस जगह या शख्स के पास लौटा जा सके। तात्कालिक भावुकता ने दोबारा आने का वादा करवा दिया। मिलने वालों से स्नेह-सत्कार,भोजन और उनका प्रभाव इतना घोर रहा कि बिना दुबारा मिलने का वादा किये आया भी नहीं जाता था। सबको बोल आया कि जल्दी आऊंगा। अब आंसुओं से भर जाता हूं। एक रिपोर्टर सिर्फ दर्शकों का नहीं होता,वो उनका भी होता है जिनसे वो मिलता है,जिनकी सोहबत में वो जानकारियां जमा करता है और जिनके सहारे वो दुनिया में बांट देता है। रिपोर्टिंग में मिले इन सभी रिश्तों में झूठा साबित होता जा रहा हूं। क्या करूं उनका इंतज़ार खतम नहीं होता और मेरा वादा पूरा नहीं होता।
झांसी की मिसेज कैंटम आज तक इंतज़ार कर रही हैं। अक्सर फोन आ जाता है। हाउ आर यू माई डियर सन। गॉड ब्लेस यू। व्हेन आर यू कमिंग टू झांसी। न जाने वो किस जनम की मेरी मां है। अठारह सौ सत्तावन के डेढ़ सौ साल होने के वर्ष झांसी गया था। अस्सी साल की एक वृद्धा। एंग्लो-इंडियन। साधारण सा घर। मिसेज कैंटम आईं और पहले पूछा टेल मी सन,कभी एंग्लो इंडियान खाना खाया है? जवाब- नहीं। लेकिन जब आपने बेटा कह दिया तो पूछती क्यों हैं? खिला दीजिए न। स्पेशल रिपोर्ट की शूटिंग शुरू होने से पहले मेरे इस जवाब पर कैमरा मैन घबरा गया। मिसेज कैंटम ने कहा एंग्लो-इंडियन शैली में मटन बनाया है। तुम खाता है। क्या नाम बताया तुमने अपना? जी रवीश कुमार। यू नो,यू आर लाइक माइ सन। आई एम सो हैप्पी टू सी यू। छोटी सी मेज़ पर ऐसा रिश्ता बना कि क्या कहें। लगा कि ये किसी क्रांतिकारी की मां होगी। इस जनम में अपने क्रांतिकारी बेटे के हाथों मारे गए अंग्रेंजों की मौत का प्रायश्चित कर रही होगी। या फिर भारत की उदारता की निशानी को बचा कर रख रही होंगी। तभी उन्होंने डरते हुए कहा कि दरअसल,मैं जो काम करती हूं उससे कई लोगों को प्राब्लम होता है,सन। इतनी बार बेटा कहा कि मैं भी मिसेज कैंटम को मॉम कहने लगा। एक घंटे में ऐसा रिश्ता।
मिसेज कैंटम झांसी के कैन्टोनमेंट के क्रबिस्तान की देखरेख करने लगी थी। उस दौर में मारे गए और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए अंग्रेज अफसरों की कब्रों को फिर से सजा दिया था। कहा कि इतनी हालत खराब थी कि पूछो मत। यहां कोई आता नहीं था। लेकिन देखों मैंने कितना सुन्दर बना दिया। राष्ट्रवाद के झंझटों में फंसे बिना एक हिन्दुस्तानी महिला उनकी देखरेख कर रही है,जिसके दम पर हमारा राष्ट्रवादी आंदोलन गर्विला होता है। मैंने पूछा भी कि मॉम,ये एक प्राब्लम है। लेकिन भारत एक परिपक्व देश भी है। किसी को प्राब्लम नहीं होगा। भावुक तो हम दुश्मनों के लिए भी होते हैं। उस रिपोर्ट के बाद से आज तक मिसेज कैंटम अचानक फोन कर देती हैं। आवाज़ का ज़ोर बताता है कि एक मां अपने अधिकार से बेटे को बुला रही है। दुबारा कब आओगे। प्लीज कम न। अपनी वाइफ और बेटी को भी लाना। आई विल कूक फॉर यू। नाइस मटन। यू लाइक न। फोन रखने के बाद थोड़ा रो लेता हूं। फिर उस दफ्तर की नियति में खुद को झोंक देता हूं जिसने इन रिश्तों को पाने में मदद तो की लेकिन जोड़ कर रखने में साथ नहीं दिया। जानबूझ कर नहीं लेकिन रिपोर्टर तो घटनाओं का साक्षी होता है। ख़बर बदलते ही उसकी दुनिया बदल जाती है। एक साथ वो कई शहरों और कई संबंधों में रहता है।
इसी तरह से बीकानेर के शौकत भाई आज तक फोन करते हैं। छह साल हो गए बीकानेर गए। धर्मेंद्र चुनाव लड़ रहे थे। ट्रेन में जगह नहीं थी तो शौकत भाई ने कहा कि अरे रवीश भाई, चिन्ता मत करो, मेरी सीट पर बिकानेर चलो। तब से एक रिश्ता बन गया। पहले उनका फोन आता है, फिर उनकी पत्नी बात करती है और फिर उनकी बेटी। शौकत भाई बहुत शान से कहते हैं कि एक बार तो आ जाओ। तुम्हारा ही घर है। बीकानेर में कोई यकीन नहीं करता कि रवीश भाई अपने दोस्त हैं। मैं सबको बोलता हूं न। मेरी पत्नी तो हमेशा याद करती हैं आपको। हां इस साल देखिये, आ जाऊंगा। दिल कहता है कि मत बोल झूठ। फिर बोलने लगता हूं, शौकत भाई, मेरा इंतजार क्यों करते हैं? शौकत भाई का जवाब लाजवाब कर देता है। रवीश भाई, ये आपका घर है। घरवाले तो इंतज़ार करेंगे न।
जमालुद्दीन को आप सब नहीं जानते। लेकिन हो सके तो इनसे मिल आइये। एक मामूली दर्जी। आंखें कमज़ोर पड़ रही हैं। लेकिन ग्यारह किलो की कॉपी पर ताज महल की शक्ल में उसका इतिहास लिख रहे हैं। ग़ज़ब का काम है। आगरा में रहते हैं। जमालुद्दीन कहते हैं कि उन्हें अकबराबाद और ताज को देखते ही कुछ हो जाता है। इसलिए वो ताज के करीब नहीं जाते। जब वो ये बात कह रहे होते हैं तो उनके चेहरे पर ताज को बनाने वाले मज़दूरों की रूहें उतर आती हैं। लाल हो जाता है। हाथ लरज़ने लगते हैं। बहुत ज़िद की,जमाल भाई,चलो न,ताज के सामने। दो बार गया। मना कर दिया। जमालुद्दीन ने कहा कि नहीं,मैं ताज के सामने नहीं जा सकता। कहने लगे कि सामने शाहजहां को देखकर कांप जाता हूं। शाहजहां के किस्से और उस संगमरमर की इमारत का इतना शानदार कथाकार मुझे आज तक नहीं मिला। जमालुद्दीन आज तक फोन करते हैं। कुछ मदद कर आया था तो थोड़ी और आस होगी। लेकिन इसके लिए वो कभी फोन नहीं करते। उनकी चिंता यही है कि ताज पर जो इतिहास लिखा है वो दुनिया के सामने नुमाया हो जाए। जमालुद्दीन ने कितनी बार कहा, बेटा कब आओगे। उनका यह सवाल अपराधी बना देता है। लगता है कि किसी बूढ़े बाप को अकेला छोड़ आया हूं। दो साल पहले जब उनके घर से निकला तो जमालुद्दीन ने मुझे एक नक्श दिया। एक कागज़ का टुकड़ा। किसी भी ओर और छोर से देखिये तो अल्लाह लिखा मिलेगा। जमाल ने कहा कि बुरी नज़र न लगे। आज तक मेरी पर्स में वो नक्श है।
पंजाब के रियाड़का गया था। गुरुदासपुर में। सच बोलने का स्कूल पर स्पेशल रिपोर्ट करने। पूरे परिवार से ऐसी दोस्ती हुई कि हर तीज त्योहार पर वहां से फोन आता है। कब आ रहे हो? आने का वादा मेरा ही था। दो दिन तक उस स्कूल में रहा। परिवार में ऐसे घुल मिल गया कि वादा कर आया कि अबकी परिवार के साथ आऊंगा। मौका ही नहीं लगा। स्पेशल रिपोर्ट के दौरान अमृतसर के एक स्कूल की प्रिंसिपल से मुलाकात हुई थी। वो अब कनाडा में हैं। उनका फोन आया था। कहां इंटरनेट पर आपकी आवाज़ आ रही थी तो हम सब दौड़ गए कि ये तो अपने रवीश कुमार की रिपोर्ट लगती है। वो बहुत भावुक थीं। कह रही थीं कि बेटे कभी कनाडा आना। हम हिन्दुस्तान आ रहे हैं तो ज़रूर मिलेंगे। मैं हंसने लगा। माता जी, कितना झूठ बोलूं मैं। दुबारा कब मिलना हुआ है। अरे क्या बात करते हो जी। आपको टाइम नहीं तो हम आ जायेंगे। रियाड़का स्कूल के प्रिंसिपल के बेटे गगनदीप आज तक एसएमएस करते हैं। कई बार पलट कर फोन करता हूं तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती है। अद्भुत स्कूल है। इतना मोहित हो गया था कि खुद ही वादा कर दिया कि गर्मियों में पत्नी और बेटी के साथ यहां आकर रहूंगा। आज तक नहीं जा सका।
ऐसा ही इंतज़ार गुजरात में हो रहा है। मेरठ में डॉक्टर साहब कर रहे हैं,मैनपुरी में प्रोफेसर साहब कर रहे हैं,भिवानी में प्रीतम भाई कर रहे हैं,अलीगढ़ के दारोगा जी कर रहे हैं,बारामती में सुशील कर रहे हैं,जयपुर के चंद्रपरिहार साहब कर रहे हैं। आगरा के देवकीनंदन सोन कहते हैं कि आप से मिलने के बाद लगा कि कोई रिश्ता है। जब भी आपकी आवाज़ आती है घर में हंगामा मच जाता है। सब कहने लगते हैं कि अरे ये तो अपने रवीश भाई हैं। क्या बात है। इजाज़त हो तो भावुक हो लूं। इतराना अच्छा नहीं लगता। मेरा स्वभाव भी नहीं है। लेकिन क्या करूं इन रिश्तों का? कब तक दुबारा आने के भरोसे पर ये टिके रहेंगे। मालूम नहीं लेकिन जब इनलोगों का फोन आता है तो बहुत अच्छा लगता है। कम मिलने-जुलने वाला आदमी हूं और बिना मेहनत किये ऐसा खजाना मिल जाए तो सहेज कर रखने का लालच भी होता है। कई लोग ऐसे हैं जिनसे सिर्फ फोन पर रिश्तेदारी है। आवाज़ से उनको जानता हूं। कभी मिला नहीं। डर भी लगता है कि पांच साल से जिससे फोन पर बात कर रहा हूं, वो अचानक मिल जाए तो न पहचान पाने का असर कितना खतरनाक होगा। कहीं ये न सोच बैठे कि दंभी है।
रिपोर्टर दुबारा क्यों नहीं जा पाता और नहीं जा पाता है तो पहली बार में ऐसे रिश्ते क्यों बनाता है? रिश्तों के बिना हर रिपोर्टर अधूरा है। काश इन सब को संभाल पाता। दुबारा जा पाता। इन सबका अपराधी तो हूं लेकिन इन्हीं लोगों से पूरा भी होता हूं। हम रिपोर्टरों को कितना कुछ मिलता है। इनती सारी मायें, इतने संगे संबंधी सब इसी पेशे में मिले हैं। ग़ज़ब का काम है ये पत्रकारिता। दुनिया के सबसे आसान कामों में से एक लेकिन रिश्ते इतने मुश्किल कि भावुक कर तोड़ देते हैं। सारे रिपोर्टर को भावुकता के इन लम्हों से गुज़रना होता होगा। सबको मरना पड़ता होगा।
झांसी की मिसेज कैंटम आज तक इंतज़ार कर रही हैं। अक्सर फोन आ जाता है। हाउ आर यू माई डियर सन। गॉड ब्लेस यू। व्हेन आर यू कमिंग टू झांसी। न जाने वो किस जनम की मेरी मां है। अठारह सौ सत्तावन के डेढ़ सौ साल होने के वर्ष झांसी गया था। अस्सी साल की एक वृद्धा। एंग्लो-इंडियन। साधारण सा घर। मिसेज कैंटम आईं और पहले पूछा टेल मी सन,कभी एंग्लो इंडियान खाना खाया है? जवाब- नहीं। लेकिन जब आपने बेटा कह दिया तो पूछती क्यों हैं? खिला दीजिए न। स्पेशल रिपोर्ट की शूटिंग शुरू होने से पहले मेरे इस जवाब पर कैमरा मैन घबरा गया। मिसेज कैंटम ने कहा एंग्लो-इंडियन शैली में मटन बनाया है। तुम खाता है। क्या नाम बताया तुमने अपना? जी रवीश कुमार। यू नो,यू आर लाइक माइ सन। आई एम सो हैप्पी टू सी यू। छोटी सी मेज़ पर ऐसा रिश्ता बना कि क्या कहें। लगा कि ये किसी क्रांतिकारी की मां होगी। इस जनम में अपने क्रांतिकारी बेटे के हाथों मारे गए अंग्रेंजों की मौत का प्रायश्चित कर रही होगी। या फिर भारत की उदारता की निशानी को बचा कर रख रही होंगी। तभी उन्होंने डरते हुए कहा कि दरअसल,मैं जो काम करती हूं उससे कई लोगों को प्राब्लम होता है,सन। इतनी बार बेटा कहा कि मैं भी मिसेज कैंटम को मॉम कहने लगा। एक घंटे में ऐसा रिश्ता।
मिसेज कैंटम झांसी के कैन्टोनमेंट के क्रबिस्तान की देखरेख करने लगी थी। उस दौर में मारे गए और अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए अंग्रेज अफसरों की कब्रों को फिर से सजा दिया था। कहा कि इतनी हालत खराब थी कि पूछो मत। यहां कोई आता नहीं था। लेकिन देखों मैंने कितना सुन्दर बना दिया। राष्ट्रवाद के झंझटों में फंसे बिना एक हिन्दुस्तानी महिला उनकी देखरेख कर रही है,जिसके दम पर हमारा राष्ट्रवादी आंदोलन गर्विला होता है। मैंने पूछा भी कि मॉम,ये एक प्राब्लम है। लेकिन भारत एक परिपक्व देश भी है। किसी को प्राब्लम नहीं होगा। भावुक तो हम दुश्मनों के लिए भी होते हैं। उस रिपोर्ट के बाद से आज तक मिसेज कैंटम अचानक फोन कर देती हैं। आवाज़ का ज़ोर बताता है कि एक मां अपने अधिकार से बेटे को बुला रही है। दुबारा कब आओगे। प्लीज कम न। अपनी वाइफ और बेटी को भी लाना। आई विल कूक फॉर यू। नाइस मटन। यू लाइक न। फोन रखने के बाद थोड़ा रो लेता हूं। फिर उस दफ्तर की नियति में खुद को झोंक देता हूं जिसने इन रिश्तों को पाने में मदद तो की लेकिन जोड़ कर रखने में साथ नहीं दिया। जानबूझ कर नहीं लेकिन रिपोर्टर तो घटनाओं का साक्षी होता है। ख़बर बदलते ही उसकी दुनिया बदल जाती है। एक साथ वो कई शहरों और कई संबंधों में रहता है।
इसी तरह से बीकानेर के शौकत भाई आज तक फोन करते हैं। छह साल हो गए बीकानेर गए। धर्मेंद्र चुनाव लड़ रहे थे। ट्रेन में जगह नहीं थी तो शौकत भाई ने कहा कि अरे रवीश भाई, चिन्ता मत करो, मेरी सीट पर बिकानेर चलो। तब से एक रिश्ता बन गया। पहले उनका फोन आता है, फिर उनकी पत्नी बात करती है और फिर उनकी बेटी। शौकत भाई बहुत शान से कहते हैं कि एक बार तो आ जाओ। तुम्हारा ही घर है। बीकानेर में कोई यकीन नहीं करता कि रवीश भाई अपने दोस्त हैं। मैं सबको बोलता हूं न। मेरी पत्नी तो हमेशा याद करती हैं आपको। हां इस साल देखिये, आ जाऊंगा। दिल कहता है कि मत बोल झूठ। फिर बोलने लगता हूं, शौकत भाई, मेरा इंतजार क्यों करते हैं? शौकत भाई का जवाब लाजवाब कर देता है। रवीश भाई, ये आपका घर है। घरवाले तो इंतज़ार करेंगे न।
जमालुद्दीन को आप सब नहीं जानते। लेकिन हो सके तो इनसे मिल आइये। एक मामूली दर्जी। आंखें कमज़ोर पड़ रही हैं। लेकिन ग्यारह किलो की कॉपी पर ताज महल की शक्ल में उसका इतिहास लिख रहे हैं। ग़ज़ब का काम है। आगरा में रहते हैं। जमालुद्दीन कहते हैं कि उन्हें अकबराबाद और ताज को देखते ही कुछ हो जाता है। इसलिए वो ताज के करीब नहीं जाते। जब वो ये बात कह रहे होते हैं तो उनके चेहरे पर ताज को बनाने वाले मज़दूरों की रूहें उतर आती हैं। लाल हो जाता है। हाथ लरज़ने लगते हैं। बहुत ज़िद की,जमाल भाई,चलो न,ताज के सामने। दो बार गया। मना कर दिया। जमालुद्दीन ने कहा कि नहीं,मैं ताज के सामने नहीं जा सकता। कहने लगे कि सामने शाहजहां को देखकर कांप जाता हूं। शाहजहां के किस्से और उस संगमरमर की इमारत का इतना शानदार कथाकार मुझे आज तक नहीं मिला। जमालुद्दीन आज तक फोन करते हैं। कुछ मदद कर आया था तो थोड़ी और आस होगी। लेकिन इसके लिए वो कभी फोन नहीं करते। उनकी चिंता यही है कि ताज पर जो इतिहास लिखा है वो दुनिया के सामने नुमाया हो जाए। जमालुद्दीन ने कितनी बार कहा, बेटा कब आओगे। उनका यह सवाल अपराधी बना देता है। लगता है कि किसी बूढ़े बाप को अकेला छोड़ आया हूं। दो साल पहले जब उनके घर से निकला तो जमालुद्दीन ने मुझे एक नक्श दिया। एक कागज़ का टुकड़ा। किसी भी ओर और छोर से देखिये तो अल्लाह लिखा मिलेगा। जमाल ने कहा कि बुरी नज़र न लगे। आज तक मेरी पर्स में वो नक्श है।
पंजाब के रियाड़का गया था। गुरुदासपुर में। सच बोलने का स्कूल पर स्पेशल रिपोर्ट करने। पूरे परिवार से ऐसी दोस्ती हुई कि हर तीज त्योहार पर वहां से फोन आता है। कब आ रहे हो? आने का वादा मेरा ही था। दो दिन तक उस स्कूल में रहा। परिवार में ऐसे घुल मिल गया कि वादा कर आया कि अबकी परिवार के साथ आऊंगा। मौका ही नहीं लगा। स्पेशल रिपोर्ट के दौरान अमृतसर के एक स्कूल की प्रिंसिपल से मुलाकात हुई थी। वो अब कनाडा में हैं। उनका फोन आया था। कहां इंटरनेट पर आपकी आवाज़ आ रही थी तो हम सब दौड़ गए कि ये तो अपने रवीश कुमार की रिपोर्ट लगती है। वो बहुत भावुक थीं। कह रही थीं कि बेटे कभी कनाडा आना। हम हिन्दुस्तान आ रहे हैं तो ज़रूर मिलेंगे। मैं हंसने लगा। माता जी, कितना झूठ बोलूं मैं। दुबारा कब मिलना हुआ है। अरे क्या बात करते हो जी। आपको टाइम नहीं तो हम आ जायेंगे। रियाड़का स्कूल के प्रिंसिपल के बेटे गगनदीप आज तक एसएमएस करते हैं। कई बार पलट कर फोन करता हूं तो पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ जाती है। अद्भुत स्कूल है। इतना मोहित हो गया था कि खुद ही वादा कर दिया कि गर्मियों में पत्नी और बेटी के साथ यहां आकर रहूंगा। आज तक नहीं जा सका।
ऐसा ही इंतज़ार गुजरात में हो रहा है। मेरठ में डॉक्टर साहब कर रहे हैं,मैनपुरी में प्रोफेसर साहब कर रहे हैं,भिवानी में प्रीतम भाई कर रहे हैं,अलीगढ़ के दारोगा जी कर रहे हैं,बारामती में सुशील कर रहे हैं,जयपुर के चंद्रपरिहार साहब कर रहे हैं। आगरा के देवकीनंदन सोन कहते हैं कि आप से मिलने के बाद लगा कि कोई रिश्ता है। जब भी आपकी आवाज़ आती है घर में हंगामा मच जाता है। सब कहने लगते हैं कि अरे ये तो अपने रवीश भाई हैं। क्या बात है। इजाज़त हो तो भावुक हो लूं। इतराना अच्छा नहीं लगता। मेरा स्वभाव भी नहीं है। लेकिन क्या करूं इन रिश्तों का? कब तक दुबारा आने के भरोसे पर ये टिके रहेंगे। मालूम नहीं लेकिन जब इनलोगों का फोन आता है तो बहुत अच्छा लगता है। कम मिलने-जुलने वाला आदमी हूं और बिना मेहनत किये ऐसा खजाना मिल जाए तो सहेज कर रखने का लालच भी होता है। कई लोग ऐसे हैं जिनसे सिर्फ फोन पर रिश्तेदारी है। आवाज़ से उनको जानता हूं। कभी मिला नहीं। डर भी लगता है कि पांच साल से जिससे फोन पर बात कर रहा हूं, वो अचानक मिल जाए तो न पहचान पाने का असर कितना खतरनाक होगा। कहीं ये न सोच बैठे कि दंभी है।
रिपोर्टर दुबारा क्यों नहीं जा पाता और नहीं जा पाता है तो पहली बार में ऐसे रिश्ते क्यों बनाता है? रिश्तों के बिना हर रिपोर्टर अधूरा है। काश इन सब को संभाल पाता। दुबारा जा पाता। इन सबका अपराधी तो हूं लेकिन इन्हीं लोगों से पूरा भी होता हूं। हम रिपोर्टरों को कितना कुछ मिलता है। इनती सारी मायें, इतने संगे संबंधी सब इसी पेशे में मिले हैं। ग़ज़ब का काम है ये पत्रकारिता। दुनिया के सबसे आसान कामों में से एक लेकिन रिश्ते इतने मुश्किल कि भावुक कर तोड़ देते हैं। सारे रिपोर्टर को भावुकता के इन लम्हों से गुज़रना होता होगा। सबको मरना पड़ता होगा।
विकास के आंकड़ों में बिहार की राजनीति
बिहार इनदिनों आर्थिक संवृद्धि (इकॉनामिक ग्रोथ) को लेकर खासे चर्चा में है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा जारी आंकड़े में बिहार का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) काफी बढ़ गया है। आंकड़े के अनुसार 2004 से 2009 के बीच राज्य के जीडीपी में औसतन 11.03 प्रतिशत का सालाना इजाफा हुआ है। यह 8.49 के राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। पूरे देश में सिर्फ गुजरात के जीडीपी के ग्रोथ रेट का औसत बिहार से थोड़ा अधिक 11.06 प्रतिशत है।
इस खबर के आने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चुनावी वर्ष में एक बड़ा हथियार मिल गया है। साथ ही उनकी मुरीद मीडिया को सुशासन का भोंपू और तेजी से बजाने का मौका हाथ लग गया है। दोनों इस अवसर को लेकर इतने मदांध हैं कि उन्हें सही-गलत और असलियत को जानने-समझने या समझाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। इसी का नतीजा है कि इकॉनामिक ग्रोथ को आर्थिक विकास (इकॉनामिक डेवलपमेंट) बताने की मुहिम छेड़ दी गई है। दोनों शब्दों(इकॉनामिक ग्रोथ और इकॉनामिक डेवलपमेंट)को पर्यायवाची बना कर परोसा जा रहा है।
जबकि इकॉनामिक ग्रोथ और इकॉनामिक डेवलपमेंट दो अलग-अलग चीजें हैं। सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि को इंगित करने के लिए इकॉनामिक ग्रोथ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इस इकॉनामिक ग्रोथ को सकल घरेलू उत्पाद में होने वाले बदलाव की दर के आधार पर मापा जाता है। इकॉनामिक ग्रोथ अपने आप में इकॉनामिक डेवलपमेंट नहीं है। इकॉनामिक ग्रोथ या सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर विकास को नहीं आंका जा सकता। दरअसल, इकॉनामिक ग्रोथ सिर्फ उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के परिमाण को बताता है। इनका उत्पादन किस तरह हुआ , इसके बारे में यह कुछ नहीं बताता। इसके विपरीत आर्थिक विकास (इकॉनामिक डेवलपमेंट) वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन के तरीके में होने वाले बदलावों को बताता है। सकारात्मक आर्थिक विकास के लिए ज्यादा कुशल या उत्पादक तकनीक या सामाजिक संगठन की जरूरत पड़ती है।
इसी तरह प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद देश या राज्य के औसत आय को बताता है। इससे इस बात का पता नहीं चलता कि आय को किस तरह बांटा गया है या आय को किस तरह खर्च किया गया है। इस कारण प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद अधिक होने के बावजूद आम जनता के विकास का सूचकांक नीचे रह सकता है। उदाहरण के लिए ओमान में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद बहुत अधिक है, लेकिन वहां शिक्षा का स्तर काफी नीचे है । इसके कारण उरग्वे की तुलना में ओमान का ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (एचडीआइ) नीचे है जबकि उरग्वे का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद ओमान की तुलना में आधा है।
हकीकत तो यह है कि पिछले कुछ सालों में भारत का तीव्र इकॉनामिक ग्रोथ हुआ है। इसके बावजूद देश के समक्ष गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं। हालिया ग्रोथ ने आर्थिक विषमता को और ज्यादा चैड़ा किया है। इकाॅनामिक ग्रोथ का दर ऊंचा रहने के बावजूद देश की करीब 80 प्रतिशत आबादी बदहाली की जिंदगी जीने को विवश है। बिहार के तीन साल से कम उम्र के 56 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। बिहार की आधी से अधिक आबादी गरीबी की सीमा रेखा के नीचे जीवन वसर करने को मजबूर है।
यह सही है कि गरीबी उन्मूलन के साथ सकारात्मक विकास के लिए एक सीमा का इकॉनामिक ग्रोथ जरूरी है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि इकॉनामिक ग्रोथ होने से विकास हो ही जाएगा। इकॉनामिक ग्रोथ इस बात की कोई गारंटी नहीं देता कि सभी लोगों को समान रूप से लाभ मिलेगा। यह ग्रोथ गरीब और हाशिए पर रहने वालों की अनदेखी कर सकता है। इसके कारण विषमता बढ़ सकती है। आर्थिक विषमता बढ़ने पर गरीबी उन्मूलन का दर घटेगा और अंततः इकॉनामिक ग्रोथ भी घटेगा। राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक सौहार्द पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसलिए विषमता को पाटना विकास नीति की प्रमुख चुनौती बनी हुई है और यही कारण है कि हाल के वर्षों में सम्मिलित संवर्धन (इनक्लूसिव ग्रोथ) पर जोर दिया जा रहा है। जिस ग्रोथ के तहत सामाजिक अवसर बढ़ेगे उसे इनक्लूसिव ग्रोथ कहा जाएगा। यह सामाजिक अवसर दो बातों, आबादी को उपलब्ध औसत अवसर और इस अवसर को आबादी के बीच किस तरह बांटा गया, पर निर्भर करता है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ग्रोथ को लेकर स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर के जिस लेख की चर्चा बार-बार कर रहें हैं उसमें बिहार,केरल,ओड़िसा,झारखंड और छत्तीसगढ़ के ऊंचे ग्रोथ रेट का उल्लेख तो किया गया है,लेकिन इसका श्रेय केंद्र सरकार को नहीं दिया गया है। लेख में कहा गया है कि 1980 के दशक और फिर 1991 से उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद केंद्र की नीतियों का लाभ तो इन राज्यों को मिला, लेकिन हाल के वर्षों में इनका जो ग्रोथ बढ़ा है वह पूरी तरह राज्य सरकार की करामात है। लेकिन इस करामात को साबित करने के लिए स्वामीनाथन उसी लेख में बताते हैं कि इसके कारण ग्रामीण इलाकों में मोटर साइकिलों और ब्रांडेड उत्पादों की बिक्री बढ़ी है। उनके अनुसार ग्रोथ रेट बढ़ने का इससे भी बड़ा सबूत सेलफोन की क्रांति है। प्रति माह लगभग सवा करोड़ (12-15 मिलियन) सेलफोन की बिक्री हो रही है। बिहार और झारखंड में सेलफोन की बिक्री में 99.41 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन स्वामीनाथन साहब पहले टाइम्स आफ इंडिया (3जनवरी,2010) और फिर इकॉनामिक टाइम्स (6 जनवरी, 2010) के अपने पूरे लेख में इससे अधिक और कोई सबूत नहीं दे पाए हैं,जो साबित करे कि सचमुच में विकास हो रहा है।
स्वामीनाथन ने ग्रोथ के जो प्रमाण दिए हैं उससे हाल में एशियाई विकास बैंक के द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को ही बल मिलता है। एशियाई विकास बैंक के एक अध्ययन दल ने रिपोर्ट दी थी कि ग्रोथ की मौजूदा प्रक्रिया ऐसे नए आर्थिक अवसरों को सृजित करती है जिनका बंटवारा असमान तरीके से होता है। आम तौर पर इन अवसरों से गरीब वंचित रह जाते हैं। साथ ही बाजार का प्रभाव उन्हें इन अवसरों का लाभ नहीं लेने देता। नतीजा होता है कि गैर गरीबों की तुलना में गरीबों को ग्रोथ का लाभ कम मिल पाता है। ऐसे में अगर ग्रोथ को पूरी तरह बाजार के हाथों में छोड़ दिया जाएगा तो इसका लाभ गरीबों को नहीं मिल पाएगा। ऐसी स्थिति नहीं बने इसके लिए सरकार को सजग रहना होगा और ऐसी नीतियां बनानी होगी जिसमें गरीबों की हिस्सेदारी बढ़े। ऐसा होने पर ही इनक्लूसिव ग्रोथ हो पाएगा। लेकिन बिहार सरकार की नीतिगत कार्रवाइयां इन पैमानों पर सकारात्मक नहीं दिखतीं।
बिहार की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके बावजूद राज्य में भूमि सुधार के लिए गठित भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से सरकार ने साफ तौर पर इंकार कर दिया है। तमाम दावों के बावजूद मात्र एक हजार करोड़ से कुछ ज्यादा का कुल निवेश पिछले चार साल में हुआ है। शिक्षण संस्थानों में तीस से चालीस प्रतिशत पद रिक्त हैं। राज्य में बिजली की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। अगले पांच साल तक कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।
अभी बिहार में जो ग्रोथ हुआ है, उसमें क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ता नजर आ रहा है। विश्व बैंक अगर कहता है कि व्यापार करने के लिए दिल्ली के बाद पटना देश का सबसे उपयुक्त जगह है तो हमें इससे गौरवान्वित होने की जरूरत नहीं। हम ग्रोथ के उस पैटर्न पर चल रहे हैं जिसमें ऐसी ही स्थिति उभरेगी। पैसा पटना में संकेद्रित हो रहा है। पटना में फ्लैटों के दाम एनसीआर के बराबर हो गए हैं। पटना में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों का औसत दिल्ली के बराबर है। हवाई यात्रा करने वालों की संख्या पटना में दिल्ली के बराबर हो रही है। राज्य के अंदर ही विषमता बढ़ रही है। लेकिन उत्तर बिहार, पूर्वी बिहार बदहाल है। आधी आबादी गरीबी की सीमा रेखा के नीचे है।
इस तरह स्वामीनाथन हों या विश्व बैंक, उदारीकरण के हथियार से पूंजीवाद का साम्राज्य फैलाने की जुगत में लगे हर व्यक्ति और संस्था के लिए विकास का मानक यही, यानी उपभोक्तावाद और विषमता, है। बिहार सरकार अपने कामकाज के पक्ष में बार-बार विश्व बैंक के प्रमाण पत्र का हवाला दे रही है, लेकिन वह भूल जाती है और लोगों से यह कहने की हिम्मत नहीं करती कि देश की गुलाम बनाने में ईस्ट इंडिया कंपनी की जो भूमिका थी वही भूमिका आज अमेरिकी साम्राज्यवाद को दुनिया पर लादने में विश्व बैंक अदा कर रहा है। इसलिए विश्व बैंक के प्रमाणपत्र पर आज बिहार या नीतीश जी को इठलाने की जरूरत नहीं , बल्कि चैकस होने की जरूरत है। लेकिन मुख्यमंत्री शायद चैकस नहीं हो पाएंगे। अभी तो वे कारपोरेट सेक्टर के हीरो बने हुए हैं। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए, एक समय में इसी कारपोरेट सेक्टर, विश्व बैंक और मीडिया के हीरो अटल बिहारी वाजपेई से लेकर चंद्राबाबू नायडू, दिग्गविजय सिंह और राम कृष्ण हेगड़े तक थे। लेकिन उनका हश्र क्या हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं है। यह हर कोई बखूबी जानता है।
जीडीपी के ग्रोथ को लेकर इतना हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं। इसे लेकर सुशासन की ढाल बजाने जैसी कोई स्थिति नहीं बनती। ध्यान देने की बात है कि जिन आंकड़ों का हवाला दिया जा रहा है, उसी के अनुसार सभी पिछड़े राज्यों में जीडीपी का ग्रोथ रेट बढ़ा है। यहां तक कि झारखंड जैसे राजनीतिक रूप से अस्थिर और कुशासित राज्य में भी यह ग्रोथ रेट बढ़ा है। सवाल उठता है कि अगर बिहार में सुशासन और मुख्यमंत्री के कुशल नेतृत्व के कारण ग्रोथ रेट बढ़ गया तो आखिर झारखंड का ग्रोथ रेट कैसे बढ़ा।
हकीकत तो यह है कि हाल के वर्षों में प्रायः सभी राज्यों में केंद्र प्रायोजित योजनाएं बड़े पैमाने पर शुरू की गई हैं। पिछड़े राज्यों का ग्रोथ रेट बढ़ने में उसका बड़ा योगदान है। फिर इसमें लो बेस इफेक्ट का भी योगदान है। राज्य सरकार का कामकाज पहले की अपेक्षा ठीक हुआ है, उसका भी निश्चित तौर पर योगदान है, लेकिन यह सिर्फ उसी का नतीजा नहीं है। क्योंकि सरकारी कामकाज में सुधार का जितना प्रचार मीडिया में तथाकथित विशेषज्ञों के द्वारा किया जा रहा है वह हकीकत नहीं है। हकीकत का पता लगाना है तो कोई दूरदराज की बात छोड़िए, पटना मुफ्फसिल अंचल कार्यालय में जाकर कोई व्यक्ति निधार्रित समय के अंदर मामूली आय प्रमाण पत्र या निवास या जाति प्रमाण बनवा लें और फिर यह बात कहे तो मैं सुशासन की बात स्वीकार करने को तैयार हूं।
और अंत में एक सवाल और है। बिहार के ग्रोथ से अति उत्साहित मुख्यमंत्री और उनकी हमदर्द मीडिया गलतबयानी क्यों कर रहे हैं। इनके द्वारा बार-बार कहा जा रहा है कि जीडीपी का जो ग्रोथ रेट सामने आया है वह पूरी तरह प्रामाणिक है, क्योंकि इसे केंद्रीय संगठन सीएसओ ने तैयार किया है। क्या मुख्यमंत्री और मीडिया वालों को यह पता नहीं कि सीएसओ राज्यों के जीडीपी का आकंड़ा नहीं तैयार करता। राज्यों के जीडीपी का आंकड़ा संबंधित राज्य सरकार खुद तैयार करती हैं और उसे जारी करने के लिए सीएसओ को सौंप देती है। सीएसओ सभी राज्यों के इस आंकड़े को जारी भर करता है, वह इसे सत्यापित नहीं करता।
इस संबंध में भारत सरकार के मुख्य सांख्यिकीविद् और केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव प्रणब सेन का बयान भी आया है कि ‘‘ सीएसओ राज्यों के जीडीपी का डाटा नहीं उपलब्ध कराता है। सीएसओ और राज्यों के बीच एक व्यवस्था बनी हुई है जिसके तहत राज्य सरकारें खुद अपने जीडीपी का अनुमानित डाटा सीएसओ को देती हैं और सीएसओ उसे जारी करता है। इन डाटा को सीएसओ सत्यापित नहीं करता है। इसलिए इसे सीएसओ का डाटा कहना उचित नहीं है। ’’ इस संबंध में सही जानकारी के लिए भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम मंत्रालय की साइट (http:// mospi.gov.in/state-wise_SDP_1999-2000_20nov.pdf ) को देखा जा सकता है, जहां से इस डाटा को जारी किया गया है। राज्यवार डाटा के नीचे स्पष्ट तौर पर स्रोत अंकित है। इसमें लिखा हुआ है कि राज्यों के आंकड़े संबंधित राज्य के वित्त एवं सांख्यिकी निदेशालय के हैं, जबकि राष्ट्रीय आंकड़े सीएसओ के हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री के द्वारा किया जा रहा दावा क्या चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत को चरितार्थ नहीं करती।
(विपेंद्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं। १३ साल की उम्र से अखबारों में छप रहे हैं। १६ साल की उम्र में ही मासिक पत्रिका युवा चिंतन निकाली। 2004 से प्रभात खबर(रांची),पाटलिपुत्र टाइम्स (पटना),हिंदुस्तान (पटना) और फिर प्रभात खबर (पटना) में अप्रैल, 2009 तक उप संपादक से लेकर समाचार समन्वयक तक का काम किया। इसी बीच 2004 में पटना से दोपहर का दैनिक महानगर टूडे भी निकाला।)
इस खबर के आने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चुनावी वर्ष में एक बड़ा हथियार मिल गया है। साथ ही उनकी मुरीद मीडिया को सुशासन का भोंपू और तेजी से बजाने का मौका हाथ लग गया है। दोनों इस अवसर को लेकर इतने मदांध हैं कि उन्हें सही-गलत और असलियत को जानने-समझने या समझाने की कोई जरूरत नहीं रह गई है। इसी का नतीजा है कि इकॉनामिक ग्रोथ को आर्थिक विकास (इकॉनामिक डेवलपमेंट) बताने की मुहिम छेड़ दी गई है। दोनों शब्दों(इकॉनामिक ग्रोथ और इकॉनामिक डेवलपमेंट)को पर्यायवाची बना कर परोसा जा रहा है।
जबकि इकॉनामिक ग्रोथ और इकॉनामिक डेवलपमेंट दो अलग-अलग चीजें हैं। सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि को इंगित करने के लिए इकॉनामिक ग्रोथ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इस इकॉनामिक ग्रोथ को सकल घरेलू उत्पाद में होने वाले बदलाव की दर के आधार पर मापा जाता है। इकॉनामिक ग्रोथ अपने आप में इकॉनामिक डेवलपमेंट नहीं है। इकॉनामिक ग्रोथ या सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर विकास को नहीं आंका जा सकता। दरअसल, इकॉनामिक ग्रोथ सिर्फ उत्पादित वस्तुओं एवं सेवाओं के परिमाण को बताता है। इनका उत्पादन किस तरह हुआ , इसके बारे में यह कुछ नहीं बताता। इसके विपरीत आर्थिक विकास (इकॉनामिक डेवलपमेंट) वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन के तरीके में होने वाले बदलावों को बताता है। सकारात्मक आर्थिक विकास के लिए ज्यादा कुशल या उत्पादक तकनीक या सामाजिक संगठन की जरूरत पड़ती है।
इसी तरह प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद देश या राज्य के औसत आय को बताता है। इससे इस बात का पता नहीं चलता कि आय को किस तरह बांटा गया है या आय को किस तरह खर्च किया गया है। इस कारण प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद अधिक होने के बावजूद आम जनता के विकास का सूचकांक नीचे रह सकता है। उदाहरण के लिए ओमान में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद बहुत अधिक है, लेकिन वहां शिक्षा का स्तर काफी नीचे है । इसके कारण उरग्वे की तुलना में ओमान का ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स (एचडीआइ) नीचे है जबकि उरग्वे का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद ओमान की तुलना में आधा है।
हकीकत तो यह है कि पिछले कुछ सालों में भारत का तीव्र इकॉनामिक ग्रोथ हुआ है। इसके बावजूद देश के समक्ष गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं। हालिया ग्रोथ ने आर्थिक विषमता को और ज्यादा चैड़ा किया है। इकाॅनामिक ग्रोथ का दर ऊंचा रहने के बावजूद देश की करीब 80 प्रतिशत आबादी बदहाली की जिंदगी जीने को विवश है। बिहार के तीन साल से कम उम्र के 56 प्रतिशत बच्चे अंडरवेट हैं। बिहार की आधी से अधिक आबादी गरीबी की सीमा रेखा के नीचे जीवन वसर करने को मजबूर है।
यह सही है कि गरीबी उन्मूलन के साथ सकारात्मक विकास के लिए एक सीमा का इकॉनामिक ग्रोथ जरूरी है। लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं कि इकॉनामिक ग्रोथ होने से विकास हो ही जाएगा। इकॉनामिक ग्रोथ इस बात की कोई गारंटी नहीं देता कि सभी लोगों को समान रूप से लाभ मिलेगा। यह ग्रोथ गरीब और हाशिए पर रहने वालों की अनदेखी कर सकता है। इसके कारण विषमता बढ़ सकती है। आर्थिक विषमता बढ़ने पर गरीबी उन्मूलन का दर घटेगा और अंततः इकॉनामिक ग्रोथ भी घटेगा। राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक सौहार्द पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसलिए विषमता को पाटना विकास नीति की प्रमुख चुनौती बनी हुई है और यही कारण है कि हाल के वर्षों में सम्मिलित संवर्धन (इनक्लूसिव ग्रोथ) पर जोर दिया जा रहा है। जिस ग्रोथ के तहत सामाजिक अवसर बढ़ेगे उसे इनक्लूसिव ग्रोथ कहा जाएगा। यह सामाजिक अवसर दो बातों, आबादी को उपलब्ध औसत अवसर और इस अवसर को आबादी के बीच किस तरह बांटा गया, पर निर्भर करता है।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ग्रोथ को लेकर स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर के जिस लेख की चर्चा बार-बार कर रहें हैं उसमें बिहार,केरल,ओड़िसा,झारखंड और छत्तीसगढ़ के ऊंचे ग्रोथ रेट का उल्लेख तो किया गया है,लेकिन इसका श्रेय केंद्र सरकार को नहीं दिया गया है। लेख में कहा गया है कि 1980 के दशक और फिर 1991 से उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद केंद्र की नीतियों का लाभ तो इन राज्यों को मिला, लेकिन हाल के वर्षों में इनका जो ग्रोथ बढ़ा है वह पूरी तरह राज्य सरकार की करामात है। लेकिन इस करामात को साबित करने के लिए स्वामीनाथन उसी लेख में बताते हैं कि इसके कारण ग्रामीण इलाकों में मोटर साइकिलों और ब्रांडेड उत्पादों की बिक्री बढ़ी है। उनके अनुसार ग्रोथ रेट बढ़ने का इससे भी बड़ा सबूत सेलफोन की क्रांति है। प्रति माह लगभग सवा करोड़ (12-15 मिलियन) सेलफोन की बिक्री हो रही है। बिहार और झारखंड में सेलफोन की बिक्री में 99.41 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लेकिन स्वामीनाथन साहब पहले टाइम्स आफ इंडिया (3जनवरी,2010) और फिर इकॉनामिक टाइम्स (6 जनवरी, 2010) के अपने पूरे लेख में इससे अधिक और कोई सबूत नहीं दे पाए हैं,जो साबित करे कि सचमुच में विकास हो रहा है।
स्वामीनाथन ने ग्रोथ के जो प्रमाण दिए हैं उससे हाल में एशियाई विकास बैंक के द्वारा व्यक्त की गई आशंकाओं को ही बल मिलता है। एशियाई विकास बैंक के एक अध्ययन दल ने रिपोर्ट दी थी कि ग्रोथ की मौजूदा प्रक्रिया ऐसे नए आर्थिक अवसरों को सृजित करती है जिनका बंटवारा असमान तरीके से होता है। आम तौर पर इन अवसरों से गरीब वंचित रह जाते हैं। साथ ही बाजार का प्रभाव उन्हें इन अवसरों का लाभ नहीं लेने देता। नतीजा होता है कि गैर गरीबों की तुलना में गरीबों को ग्रोथ का लाभ कम मिल पाता है। ऐसे में अगर ग्रोथ को पूरी तरह बाजार के हाथों में छोड़ दिया जाएगा तो इसका लाभ गरीबों को नहीं मिल पाएगा। ऐसी स्थिति नहीं बने इसके लिए सरकार को सजग रहना होगा और ऐसी नीतियां बनानी होगी जिसमें गरीबों की हिस्सेदारी बढ़े। ऐसा होने पर ही इनक्लूसिव ग्रोथ हो पाएगा। लेकिन बिहार सरकार की नीतिगत कार्रवाइयां इन पैमानों पर सकारात्मक नहीं दिखतीं।
बिहार की 80 प्रतिशत से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। इसके बावजूद राज्य में भूमि सुधार के लिए गठित भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने से सरकार ने साफ तौर पर इंकार कर दिया है। तमाम दावों के बावजूद मात्र एक हजार करोड़ से कुछ ज्यादा का कुल निवेश पिछले चार साल में हुआ है। शिक्षण संस्थानों में तीस से चालीस प्रतिशत पद रिक्त हैं। राज्य में बिजली की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। अगले पांच साल तक कोई राहत मिलने की उम्मीद नहीं है।
अभी बिहार में जो ग्रोथ हुआ है, उसमें क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ता नजर आ रहा है। विश्व बैंक अगर कहता है कि व्यापार करने के लिए दिल्ली के बाद पटना देश का सबसे उपयुक्त जगह है तो हमें इससे गौरवान्वित होने की जरूरत नहीं। हम ग्रोथ के उस पैटर्न पर चल रहे हैं जिसमें ऐसी ही स्थिति उभरेगी। पैसा पटना में संकेद्रित हो रहा है। पटना में फ्लैटों के दाम एनसीआर के बराबर हो गए हैं। पटना में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों का औसत दिल्ली के बराबर है। हवाई यात्रा करने वालों की संख्या पटना में दिल्ली के बराबर हो रही है। राज्य के अंदर ही विषमता बढ़ रही है। लेकिन उत्तर बिहार, पूर्वी बिहार बदहाल है। आधी आबादी गरीबी की सीमा रेखा के नीचे है।
इस तरह स्वामीनाथन हों या विश्व बैंक, उदारीकरण के हथियार से पूंजीवाद का साम्राज्य फैलाने की जुगत में लगे हर व्यक्ति और संस्था के लिए विकास का मानक यही, यानी उपभोक्तावाद और विषमता, है। बिहार सरकार अपने कामकाज के पक्ष में बार-बार विश्व बैंक के प्रमाण पत्र का हवाला दे रही है, लेकिन वह भूल जाती है और लोगों से यह कहने की हिम्मत नहीं करती कि देश की गुलाम बनाने में ईस्ट इंडिया कंपनी की जो भूमिका थी वही भूमिका आज अमेरिकी साम्राज्यवाद को दुनिया पर लादने में विश्व बैंक अदा कर रहा है। इसलिए विश्व बैंक के प्रमाणपत्र पर आज बिहार या नीतीश जी को इठलाने की जरूरत नहीं , बल्कि चैकस होने की जरूरत है। लेकिन मुख्यमंत्री शायद चैकस नहीं हो पाएंगे। अभी तो वे कारपोरेट सेक्टर के हीरो बने हुए हैं। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए, एक समय में इसी कारपोरेट सेक्टर, विश्व बैंक और मीडिया के हीरो अटल बिहारी वाजपेई से लेकर चंद्राबाबू नायडू, दिग्गविजय सिंह और राम कृष्ण हेगड़े तक थे। लेकिन उनका हश्र क्या हुआ, यह बताने की जरूरत नहीं है। यह हर कोई बखूबी जानता है।
जीडीपी के ग्रोथ को लेकर इतना हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं। इसे लेकर सुशासन की ढाल बजाने जैसी कोई स्थिति नहीं बनती। ध्यान देने की बात है कि जिन आंकड़ों का हवाला दिया जा रहा है, उसी के अनुसार सभी पिछड़े राज्यों में जीडीपी का ग्रोथ रेट बढ़ा है। यहां तक कि झारखंड जैसे राजनीतिक रूप से अस्थिर और कुशासित राज्य में भी यह ग्रोथ रेट बढ़ा है। सवाल उठता है कि अगर बिहार में सुशासन और मुख्यमंत्री के कुशल नेतृत्व के कारण ग्रोथ रेट बढ़ गया तो आखिर झारखंड का ग्रोथ रेट कैसे बढ़ा।
हकीकत तो यह है कि हाल के वर्षों में प्रायः सभी राज्यों में केंद्र प्रायोजित योजनाएं बड़े पैमाने पर शुरू की गई हैं। पिछड़े राज्यों का ग्रोथ रेट बढ़ने में उसका बड़ा योगदान है। फिर इसमें लो बेस इफेक्ट का भी योगदान है। राज्य सरकार का कामकाज पहले की अपेक्षा ठीक हुआ है, उसका भी निश्चित तौर पर योगदान है, लेकिन यह सिर्फ उसी का नतीजा नहीं है। क्योंकि सरकारी कामकाज में सुधार का जितना प्रचार मीडिया में तथाकथित विशेषज्ञों के द्वारा किया जा रहा है वह हकीकत नहीं है। हकीकत का पता लगाना है तो कोई दूरदराज की बात छोड़िए, पटना मुफ्फसिल अंचल कार्यालय में जाकर कोई व्यक्ति निधार्रित समय के अंदर मामूली आय प्रमाण पत्र या निवास या जाति प्रमाण बनवा लें और फिर यह बात कहे तो मैं सुशासन की बात स्वीकार करने को तैयार हूं।
और अंत में एक सवाल और है। बिहार के ग्रोथ से अति उत्साहित मुख्यमंत्री और उनकी हमदर्द मीडिया गलतबयानी क्यों कर रहे हैं। इनके द्वारा बार-बार कहा जा रहा है कि जीडीपी का जो ग्रोथ रेट सामने आया है वह पूरी तरह प्रामाणिक है, क्योंकि इसे केंद्रीय संगठन सीएसओ ने तैयार किया है। क्या मुख्यमंत्री और मीडिया वालों को यह पता नहीं कि सीएसओ राज्यों के जीडीपी का आकंड़ा नहीं तैयार करता। राज्यों के जीडीपी का आंकड़ा संबंधित राज्य सरकार खुद तैयार करती हैं और उसे जारी करने के लिए सीएसओ को सौंप देती है। सीएसओ सभी राज्यों के इस आंकड़े को जारी भर करता है, वह इसे सत्यापित नहीं करता।
इस संबंध में भारत सरकार के मुख्य सांख्यिकीविद् और केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव प्रणब सेन का बयान भी आया है कि ‘‘ सीएसओ राज्यों के जीडीपी का डाटा नहीं उपलब्ध कराता है। सीएसओ और राज्यों के बीच एक व्यवस्था बनी हुई है जिसके तहत राज्य सरकारें खुद अपने जीडीपी का अनुमानित डाटा सीएसओ को देती हैं और सीएसओ उसे जारी करता है। इन डाटा को सीएसओ सत्यापित नहीं करता है। इसलिए इसे सीएसओ का डाटा कहना उचित नहीं है। ’’ इस संबंध में सही जानकारी के लिए भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम मंत्रालय की साइट (http:// mospi.gov.in/state-wise_SDP_1999-2000_20nov.pdf ) को देखा जा सकता है, जहां से इस डाटा को जारी किया गया है। राज्यवार डाटा के नीचे स्पष्ट तौर पर स्रोत अंकित है। इसमें लिखा हुआ है कि राज्यों के आंकड़े संबंधित राज्य के वित्त एवं सांख्यिकी निदेशालय के हैं, जबकि राष्ट्रीय आंकड़े सीएसओ के हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री के द्वारा किया जा रहा दावा क्या चोर की दाढ़ी में तिनका वाली कहावत को चरितार्थ नहीं करती।
(विपेंद्र बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं। १३ साल की उम्र से अखबारों में छप रहे हैं। १६ साल की उम्र में ही मासिक पत्रिका युवा चिंतन निकाली। 2004 से प्रभात खबर(रांची),पाटलिपुत्र टाइम्स (पटना),हिंदुस्तान (पटना) और फिर प्रभात खबर (पटना) में अप्रैल, 2009 तक उप संपादक से लेकर समाचार समन्वयक तक का काम किया। इसी बीच 2004 में पटना से दोपहर का दैनिक महानगर टूडे भी निकाला।)
अब वो अमर हो जायेंगे- प्रभात शुंगलू
अमर सिंह कहते हैं मैं समाजवादी बनूंगा मुलायमवादी नहीं। मुलायम के नाम से इतनी बेरूखी। वो तो आपके नेताजी हैं। आप उनके राइट हैंड,लेफ्ट हैंड,उनकी नाक,नाक के बाल,कान,उनकी लाज,उनकी साख,उनके धन,उनकी सम्पदा दिल, दिमाग,मन,मस्तिष्क,उनके सैफेई सब कुछ थे। मुलायम तो केवल नाम के मुलायम सिंह यादव रह गये थे असली समाजवादी तो आप थे। पार्टी की साइकिल तो आप ही थे। जिसके आगे अमिताभ और जया बच्चन थे,पीछे कैरियर पर संजय दत्त थे,हैंडल पर जया प्रदा भाभी थीं,अनिल अंबानी की घंटी थी। पीछे मेडगार्ड में गोदरेज की लाइट। आप खुद साइकिल की चेन,उसका पहिया और उसके पहिये में डलने वाले मोबिल ऑयल। वो अलग बात है कि साइकिल मुलायमवादी अमर सिंह की समाजवादी पार्टी का बस चुनाव निशान थी। बाकी तो आप तो कभी एसयूवी से नीचे चले नहीं। नेताजी को भी उसकी खूब सवारी करवायी।
सॉरी वो एसयूवी तो पार्टी के नाम कर दी थी आपने। आप हैं ही इतने दानवीर। आप कलियुग के कर्ण हैं। गलत लोगों के चक्कर में पड़ गये। मुलायम और उनके परिवार के फेर में पड़ गये। देश में समाजवाद लाने का बयाना जो ले लिया था। आपने नेताजी को भी माइनस पावर वाला दूर का चश्मा पहना दिया था ताकि वो सैफेई में बैठ कर मुंबई के बच्चन परिवार, अंबानी परिवार, जया प्रदा, संजय दत्त सरीखे 24 कैरेट के समाजवादियों को पहचान सकें। आप उनके संजय बन गये। इसलिये नेताजी की पास की रोशनी मंद हो गयी। वो अपने पुराने समाजवादी मित्र बेनी प्रसाद वर्मा और आज़म खान को नहीं पहचान पाये। वो राज बब्बर को नहीं पहचान पाये।
पार्टी में आपके पदार्पण के बाद मुलायम सिंह ने आपकी नज़रों से ही समाजवाद देखा, समझा, जाना, पर्खा। आपने कहा कि बीजेपी को हराने के लिये देश के सारे समाजवादियों को साथ लेना चाहिये। इसलिये एक दिन आप कल्याण सिंह के चरणों में गिर पड़े कि हे प्रभु राम के सच्चे भक्त बस हमारी डूबती नैय्या पार लगा दो। बन जाओ हमारे केवट। और पार करा दो वैतरणी। वैतरणी पार तो नहीं हुयी उल्टे आप के नेताजी ने जो मुल्ला-कट दाढ़ी उगा ली थी वो धीरे धीरे सुफैद पड़ने लगी। और 2009 पार करते तो शक होने लगा कि उनकी कभी ऐसी दाढ़ी थी भी या नहीं। इसलिये जब जब ये इल्ज़ाम लगते कि यूपी में मुलायम सिंह बीजेपी से सीक्रेट डील करके सत्ता में लौटे हैं तो ये इल्ज़ाम आप अपने सर ले लेते थे।
समाजवाद को शिखर पर पहुंचाने के लिये आपने ऐसे कितने इल्ज़ाम अपने सर लिये। लेकिन आपको कोई नहीं समझ पाया। अखिलेश, धर्मेन्द्र, राम गोपल आपको कोई नहीं समझ पाया। अब ये लोग आपको उसी भाषा में समझाने में लगे हैं जिस तरह से आपने बेनी प्रसाद, राज बब्बर और आज़म खान का समझाया सॉरी निपटाया। देखिये न मुलायम सिंह अपने नज़दीकी परिवार वालों की ही साइड ले रहे। उनका उनसे खून का रिश्ता है। आप तो पैराट्रूपर थे। सॉरी हैं। इसलिये आपका इस्तीफा मंज़ूर कर लिया। और आपको बीते कल की कमज़ोरी बताकर कैसे मुंह फेर लिया। अब आपका उनसे दर्द का रिश्ता भर बचा है। इसलिये समाजवाद में फैले परिवारवाद की खातिर, समाजवाद में फैले पूंजीवाद की खातिर, मुलायम सिंह से अमर प्रेम की खातिर ये विष का प्याला तो आपको पीना ही पड़ेगा। आपको नीलकंठ बनना पड़ेगा। और अमृत्व को प्राप्त होना पड़ेगा।
(लेखक पत्रकार हैं। सीएनएन आईबीएन)
सॉरी वो एसयूवी तो पार्टी के नाम कर दी थी आपने। आप हैं ही इतने दानवीर। आप कलियुग के कर्ण हैं। गलत लोगों के चक्कर में पड़ गये। मुलायम और उनके परिवार के फेर में पड़ गये। देश में समाजवाद लाने का बयाना जो ले लिया था। आपने नेताजी को भी माइनस पावर वाला दूर का चश्मा पहना दिया था ताकि वो सैफेई में बैठ कर मुंबई के बच्चन परिवार, अंबानी परिवार, जया प्रदा, संजय दत्त सरीखे 24 कैरेट के समाजवादियों को पहचान सकें। आप उनके संजय बन गये। इसलिये नेताजी की पास की रोशनी मंद हो गयी। वो अपने पुराने समाजवादी मित्र बेनी प्रसाद वर्मा और आज़म खान को नहीं पहचान पाये। वो राज बब्बर को नहीं पहचान पाये।
पार्टी में आपके पदार्पण के बाद मुलायम सिंह ने आपकी नज़रों से ही समाजवाद देखा, समझा, जाना, पर्खा। आपने कहा कि बीजेपी को हराने के लिये देश के सारे समाजवादियों को साथ लेना चाहिये। इसलिये एक दिन आप कल्याण सिंह के चरणों में गिर पड़े कि हे प्रभु राम के सच्चे भक्त बस हमारी डूबती नैय्या पार लगा दो। बन जाओ हमारे केवट। और पार करा दो वैतरणी। वैतरणी पार तो नहीं हुयी उल्टे आप के नेताजी ने जो मुल्ला-कट दाढ़ी उगा ली थी वो धीरे धीरे सुफैद पड़ने लगी। और 2009 पार करते तो शक होने लगा कि उनकी कभी ऐसी दाढ़ी थी भी या नहीं। इसलिये जब जब ये इल्ज़ाम लगते कि यूपी में मुलायम सिंह बीजेपी से सीक्रेट डील करके सत्ता में लौटे हैं तो ये इल्ज़ाम आप अपने सर ले लेते थे।
समाजवाद को शिखर पर पहुंचाने के लिये आपने ऐसे कितने इल्ज़ाम अपने सर लिये। लेकिन आपको कोई नहीं समझ पाया। अखिलेश, धर्मेन्द्र, राम गोपल आपको कोई नहीं समझ पाया। अब ये लोग आपको उसी भाषा में समझाने में लगे हैं जिस तरह से आपने बेनी प्रसाद, राज बब्बर और आज़म खान का समझाया सॉरी निपटाया। देखिये न मुलायम सिंह अपने नज़दीकी परिवार वालों की ही साइड ले रहे। उनका उनसे खून का रिश्ता है। आप तो पैराट्रूपर थे। सॉरी हैं। इसलिये आपका इस्तीफा मंज़ूर कर लिया। और आपको बीते कल की कमज़ोरी बताकर कैसे मुंह फेर लिया। अब आपका उनसे दर्द का रिश्ता भर बचा है। इसलिये समाजवाद में फैले परिवारवाद की खातिर, समाजवाद में फैले पूंजीवाद की खातिर, मुलायम सिंह से अमर प्रेम की खातिर ये विष का प्याला तो आपको पीना ही पड़ेगा। आपको नीलकंठ बनना पड़ेगा। और अमृत्व को प्राप्त होना पड़ेगा।
(लेखक पत्रकार हैं। सीएनएन आईबीएन)
सनातन समागम का बेईमान गुणा-भागम
कुंभ में जाते तो हैं लेकिन क्या लेकर लौटते हैं? अपने पापों को तज कर और गंगा को अंजुरी में भर कर सूरज की तरफ उड़ेलने के बाद हम अपनी उस सामूहिकता का क्या करते हैं जिसके लिए कुंभ में जाना अनिवार्य माना जाता है। मंथन और मनन की प्रक्रिया के बिना कुंभ का कोई मतलब नहीं। देश भर के गांवों से लोग हरिद्वार के गंगा तट पर इसलिए जमा हो जायेंगे कि उन्हें डुबकी लगा कर लौटना है। अपनी तमाम सीमाओं को छोड़ समूह में घुल मिल जाने के लिए कुंभ होता है या समूह में जाकर अपनी सीमा रेखा को और गहरा करने के लिए कुंभ होता है? खंड-खंड और कई उपधाराओं में बंटी सनातन धारा को फिर से एक अमृत कलश चाहिए जिसे पीने से बराबरी का संदेश सनातन बन जाए।
हर की पौड़ी पर राजस्थान के लोगों की भीड़ देखकर रूक गया। दीवार पर पीले रंग की पुताई की गई थी। काले मोटे अक्षरों से लिखा था- पंडित गंगाराम। अनुसूचित जाति का एकमात्र पंडा। जिज्ञासा ने बेचैन कर दिया। यहां राजस्थान के कौन लोग आते हैं? पंडाजी ने जवाब दिया, ये सभी दलित हैं और हम सिर्फ दलितों का संस्कार करते हैं। हमारे अलावा कोई और हरिजनों को संस्कार नहीं करता। कई सौ साल पहले पंडित गंगाराम जी ने संत रविदास से दान लिया था तब से हमीं हरिजनों का दान लेते हैं।
अब कई सवालों के जवाब ज़रूरी थे। पंडाजी ने कहा कि यूपी और बिहार के हरिजन कम आते हैं। राजस्थान से ज्यादा आते हैं। वहां दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है। उनमें जज, आईएएस और मंत्री सब हो गए हैं। यही लोग आकर हमें भारी चढ़ावा दे जाते हैं। सोचने लगा कि राजस्थान के दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है तो सामाजिक हैसियत क्यों नहीं बदली है? क्यों उन्हें हरिद्वार के घाट पर अनुसूचित जाति के एकमात्र पंडा के यहां आना पड़ता है? अंतिम संस्कार के वक्त ऐसी गैरबराबरी किसी भी धार्मिक सामूहिकता के लिए बड़ी चुनौती होनी चाहिए लेकिन हम गज़ब के संस्कारवान लोग हैं। सामने खड़ी चुनौती को नज़रअंदाज़ कर पतली गली बना कर निकल लेते हैं।
राजस्थान से आए एक सज्जन ने कहा कि हमारे पास सब कुछ है लेकिन जब ऐसा व्यावहार होता है तो दिल टूट जाता है। अगर हम ग़लती से भी दूसरे पंडे के पास चले गए तो जाति का पता लगते हैं वो दान पुण्य कराने से इंकार कर देता है। हरिद्वार के घाटों की सुंदरता इस हकीकत से बदसूरत लगने लगी। हैरान भी हुआ कि इतनी गैरबराबरी झेलने के बाद कर्मकांडों में विश्वास कैसे बचा हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि राजस्थान के दलितों का वैकल्पिक राजनीतिक धारा में विश्वास कम रहा। उत्तर प्रदेश की घनघोर दलित राजनीति में तपने के कारण यूपी के दलितों को ऐसे घाटों पर जाना शायद अखरता होगा। इसीलिए उनकी संख्या कम है और राजस्थान के दलितों की संख्या ज़्यादा है।
कोई धर्म सनातन कैसे बनता है? क्या सिर्फ हज़ारों सालों से चले आने से या चलते रहने की इस अनंत यात्रा में अपने गुण-दोषों के परिष्कार करने से? कुंभ में जाने वाले सभी लोग क्या उस घाट पर जाकर अनुसूचित जाति के पंडे से अपना संस्कार करायेंगे। मुज़फ्फरनगर के अमित वर्मा ने साफ इंकार कर दिया। पंडित गोपाल रूआंसे हो गए। कहने लगे कि हम भी ब्राह्मण हैं लेकिन दूसरे ब्राह्मण हमारे हाथ का पानी तक नहीं पीते। घाटों और नदी की देखरेख करने वाली संस्था गंगा सभा हमें सदस्य नहीं बनाती।
जाति के अलावा हैसियत के आधार पर भी हरिद्वार के घाटों का वर्गीकरण हो चुका है।आश्रमों और धर्मशालाओं के अपने-अपने घाट हैं। वीवीआईपी के लिए अलग घाट बनाये गए हैं। आश्रमों के भीतर भी सनातन सामूहिकता दरकती नज़र आती है। सांसारिक मोहमाया का भ्रम तोड़ने वाले ज़बरदस्त संदेश और बाबाओं की अपनी भंगिमाएं। आश्रमों की सज्जा ऐसे की गई है जैसे वो कोई शहरी मॉल हों।
तय करना मुश्किल हो जाता है कि फलां बाबा अच्छे है या फलां बाबा कारोबारी। समन्वय की जगह प्रतिस्पर्धा दिखती है। हरिद्वार प्रवेश करते ही चौक पर बाबाओं के बड़े-बड़े होर्डिंग। साबुन-तेल वाले विज्ञापनों के मॉडल की मानिंद बाबा लोग भी मॉडल लगते हैं। वो अपना प्रचार क्यों करवा रहे हैं? क्या हर बाबा अपने आप में ब्रांड हैं? अगर आध्यात्म का रास्ता एक ही है तो सामूहिक प्रयास क्यों नहीं हैं ताकि दलित और सर्वण सबका सामूहिक धार्मिक अनुभव एक जैसा हो। बराबरी का हो।
सारे बाबाओं के होर्डिंग हैं लेकिन वहीं गंगा प्रदूषित हो रही है। जिन धार्मिक मंचों से गंगा के लिए आवाज उठती है वो इतने राजनीतिक हो गए हैं कि सबकी माता होने के बाद भी गंगा को लेकर सामूहिकता नहीं बन पाती। गंगा को लेकर कोई चिंतन नहीं है। गंगासागर की तरफ जाने वाले मार्ग में गंगा की हालत देखी नहीं जाती। हरिद्वार के ठीक ऊपर पहाड़ों को देखिये। वृक्ष कट गए हैं। वृक्ष की जगह होर्डिंग उग आए हैं। मुख्यमंत्री के चेहरे से लेकर मोहन पूरी वाले का बोर्ड दूर से दिख जाएगा। कहीं से नहीं लगता है कि हरिद्वार आध्यात्मिक जगह है।
दरअसल तीर्थों की सात्विकता को बचाने के कोई प्रयास ही नहीं हुए। कुंभ के लिए हरिद्वार पहले से ज्यादा कंक्रीट में बदल चुका है। अकेले हरिद्वार में इकतालीस पुल बन गए हैं.। गंगा के किनारे के हर घाट को कंक्रीट में बदल दिया गया है। मल्टी लेवल पार्किंग, तरह-तरह के होटल और रंग बिरंगे आश्रम पहले से ज्यादा बन चुके होंगे। इसकी चिंता किसी को नहीं होगी। सांकेतिक रूप से पर्यावरण और गंगा को लेकर नारे ज़रूर लगाये जा रहे हैं लेकिन तीर्थों को होटल में बदलने को लेकर कोई चिंतित नहीं है। अब तीर्थ जाना वीकेंड मनाना होता है। चिंतन और मनन की प्रक्रिया खतम होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि आने वाले लोगों की श्रद्धा कम हो गई हो। वो आज भी उतनी ही श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, अपने पीतरों को याद करते हैं और पूजा करते हैं। कुंभ का असली मतलब तो यही है कि हम समाज को बेहतर बनाने के लिए सामूहिक चिंतन करें। बराबरी लाने के लिए संघर्ष करें। तीर्थों का उत्साह तब औऱ दुगना हो जाएगा।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)
हर की पौड़ी पर राजस्थान के लोगों की भीड़ देखकर रूक गया। दीवार पर पीले रंग की पुताई की गई थी। काले मोटे अक्षरों से लिखा था- पंडित गंगाराम। अनुसूचित जाति का एकमात्र पंडा। जिज्ञासा ने बेचैन कर दिया। यहां राजस्थान के कौन लोग आते हैं? पंडाजी ने जवाब दिया, ये सभी दलित हैं और हम सिर्फ दलितों का संस्कार करते हैं। हमारे अलावा कोई और हरिजनों को संस्कार नहीं करता। कई सौ साल पहले पंडित गंगाराम जी ने संत रविदास से दान लिया था तब से हमीं हरिजनों का दान लेते हैं।
अब कई सवालों के जवाब ज़रूरी थे। पंडाजी ने कहा कि यूपी और बिहार के हरिजन कम आते हैं। राजस्थान से ज्यादा आते हैं। वहां दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है। उनमें जज, आईएएस और मंत्री सब हो गए हैं। यही लोग आकर हमें भारी चढ़ावा दे जाते हैं। सोचने लगा कि राजस्थान के दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है तो सामाजिक हैसियत क्यों नहीं बदली है? क्यों उन्हें हरिद्वार के घाट पर अनुसूचित जाति के एकमात्र पंडा के यहां आना पड़ता है? अंतिम संस्कार के वक्त ऐसी गैरबराबरी किसी भी धार्मिक सामूहिकता के लिए बड़ी चुनौती होनी चाहिए लेकिन हम गज़ब के संस्कारवान लोग हैं। सामने खड़ी चुनौती को नज़रअंदाज़ कर पतली गली बना कर निकल लेते हैं।
राजस्थान से आए एक सज्जन ने कहा कि हमारे पास सब कुछ है लेकिन जब ऐसा व्यावहार होता है तो दिल टूट जाता है। अगर हम ग़लती से भी दूसरे पंडे के पास चले गए तो जाति का पता लगते हैं वो दान पुण्य कराने से इंकार कर देता है। हरिद्वार के घाटों की सुंदरता इस हकीकत से बदसूरत लगने लगी। हैरान भी हुआ कि इतनी गैरबराबरी झेलने के बाद कर्मकांडों में विश्वास कैसे बचा हुआ है। कहीं ऐसा तो नहीं कि राजस्थान के दलितों का वैकल्पिक राजनीतिक धारा में विश्वास कम रहा। उत्तर प्रदेश की घनघोर दलित राजनीति में तपने के कारण यूपी के दलितों को ऐसे घाटों पर जाना शायद अखरता होगा। इसीलिए उनकी संख्या कम है और राजस्थान के दलितों की संख्या ज़्यादा है।
कोई धर्म सनातन कैसे बनता है? क्या सिर्फ हज़ारों सालों से चले आने से या चलते रहने की इस अनंत यात्रा में अपने गुण-दोषों के परिष्कार करने से? कुंभ में जाने वाले सभी लोग क्या उस घाट पर जाकर अनुसूचित जाति के पंडे से अपना संस्कार करायेंगे। मुज़फ्फरनगर के अमित वर्मा ने साफ इंकार कर दिया। पंडित गोपाल रूआंसे हो गए। कहने लगे कि हम भी ब्राह्मण हैं लेकिन दूसरे ब्राह्मण हमारे हाथ का पानी तक नहीं पीते। घाटों और नदी की देखरेख करने वाली संस्था गंगा सभा हमें सदस्य नहीं बनाती।
जाति के अलावा हैसियत के आधार पर भी हरिद्वार के घाटों का वर्गीकरण हो चुका है।आश्रमों और धर्मशालाओं के अपने-अपने घाट हैं। वीवीआईपी के लिए अलग घाट बनाये गए हैं। आश्रमों के भीतर भी सनातन सामूहिकता दरकती नज़र आती है। सांसारिक मोहमाया का भ्रम तोड़ने वाले ज़बरदस्त संदेश और बाबाओं की अपनी भंगिमाएं। आश्रमों की सज्जा ऐसे की गई है जैसे वो कोई शहरी मॉल हों।
तय करना मुश्किल हो जाता है कि फलां बाबा अच्छे है या फलां बाबा कारोबारी। समन्वय की जगह प्रतिस्पर्धा दिखती है। हरिद्वार प्रवेश करते ही चौक पर बाबाओं के बड़े-बड़े होर्डिंग। साबुन-तेल वाले विज्ञापनों के मॉडल की मानिंद बाबा लोग भी मॉडल लगते हैं। वो अपना प्रचार क्यों करवा रहे हैं? क्या हर बाबा अपने आप में ब्रांड हैं? अगर आध्यात्म का रास्ता एक ही है तो सामूहिक प्रयास क्यों नहीं हैं ताकि दलित और सर्वण सबका सामूहिक धार्मिक अनुभव एक जैसा हो। बराबरी का हो।
सारे बाबाओं के होर्डिंग हैं लेकिन वहीं गंगा प्रदूषित हो रही है। जिन धार्मिक मंचों से गंगा के लिए आवाज उठती है वो इतने राजनीतिक हो गए हैं कि सबकी माता होने के बाद भी गंगा को लेकर सामूहिकता नहीं बन पाती। गंगा को लेकर कोई चिंतन नहीं है। गंगासागर की तरफ जाने वाले मार्ग में गंगा की हालत देखी नहीं जाती। हरिद्वार के ठीक ऊपर पहाड़ों को देखिये। वृक्ष कट गए हैं। वृक्ष की जगह होर्डिंग उग आए हैं। मुख्यमंत्री के चेहरे से लेकर मोहन पूरी वाले का बोर्ड दूर से दिख जाएगा। कहीं से नहीं लगता है कि हरिद्वार आध्यात्मिक जगह है।
दरअसल तीर्थों की सात्विकता को बचाने के कोई प्रयास ही नहीं हुए। कुंभ के लिए हरिद्वार पहले से ज्यादा कंक्रीट में बदल चुका है। अकेले हरिद्वार में इकतालीस पुल बन गए हैं.। गंगा के किनारे के हर घाट को कंक्रीट में बदल दिया गया है। मल्टी लेवल पार्किंग, तरह-तरह के होटल और रंग बिरंगे आश्रम पहले से ज्यादा बन चुके होंगे। इसकी चिंता किसी को नहीं होगी। सांकेतिक रूप से पर्यावरण और गंगा को लेकर नारे ज़रूर लगाये जा रहे हैं लेकिन तीर्थों को होटल में बदलने को लेकर कोई चिंतित नहीं है। अब तीर्थ जाना वीकेंड मनाना होता है। चिंतन और मनन की प्रक्रिया खतम होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि आने वाले लोगों की श्रद्धा कम हो गई हो। वो आज भी उतनी ही श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, अपने पीतरों को याद करते हैं और पूजा करते हैं। कुंभ का असली मतलब तो यही है कि हम समाज को बेहतर बनाने के लिए सामूहिक चिंतन करें। बराबरी लाने के लिए संघर्ष करें। तीर्थों का उत्साह तब औऱ दुगना हो जाएगा।
(यह लेख राजस्थान पत्रिका में छप चुका है)
Subscribe to:
Posts (Atom)