मुखिया से दूधिया तक

राजदूत मोटरसाइकिल तो याद है न । आज की पीढ़ी को क्या पता राजदूत के बारे में । काले रंग की मोटरसाइकिल । ग्रामीण समृद्धि की निशानी । शहरों में एम्बेसडर, फ़िएट और गाँवों में राजदूत । एक अंतर और । जिस वक्त शहर और सिनेमा में कमल हसन येज़्दी बाइक पर हिरोइन घुमाया करते थे, गाँवों में राजदूत अर्ध सामंती प्रतीक हुआ करती थी । ज़्यादातर मुखिया जी के पास राजदूत तो होती ही थी । शाम को कचहरी या तहसील से लौटते मुखिया जी की मोटरसाइकिल गाँव वाले दूर से ही भाँप लेते थे ।  हमारे मुखिया जी ने भी राजदूत को बेटे की तरह रखा । बेटी की तरह नहीं शायद । शान से बताते थे कि पंद्रह बरीस भइल । राजदूत की ख़ूबी यही थी । तिरछा स्टैंड पर बाइक टिका देना और किक मारते समय बैक जंप के कारण धोती वाले पाँव का छिटक जाना । आगे पीछे किसीम किसीम के गार्ड । राजदूत के अनगिनत किस्से होंगे भारत के गाँवों में ।  उन्हें जानने वाले उनकी मोटरसाइकिल की आवाज़ पहचानते थे और नंबर याद रखते थे । 

वक्त बदला । पंचायती राज ने पंचायतों को खूब पैसा और अधिकार दिया । उस नए अधिकार से मैच करने के लिए नई सवारी भी चाहिए थी । इससे पहले कि बोलेरो मुखियई की पहचान बनती गाँव गाँव में दहेज़ में मिले इंड सुज़ुकी और हीरो होंडा बाइक ने तूफ़ान मचा दिया । ये दोनों ही ब्रांड सिर्फ और सिर्फ दहेज़ के कारण ग्रामवासिनी हुए । भोजपुरी के कई गाँवों में दहेज़ में हीरो होंडा का ज़िक्र खूब आया है । इनकी चमक ऐसी थी कि जो ख़रीद न सका इन्हें छिनने के क्रम में नव अपराधी बनने लगा । बल्कि पूरे बिहार में बाइक छिनने वाले गैंग का उदय हुआ जिसमें नौजवान नव अपराधी शामिल थे । कई  रास्तों और पुलों की पहचान भी होने लगी कि वहाँ से गुज़रने पर बाइक छिन लेता है सब । 

" कबले बिकाइल होंडा गाड़ी,हमार पिया मिलले जुआड़ी" इस गाने में पत्नी शिकायत कर रही है कि उसका पति कितना नालायक जुआड़ी निकला होंडा गाड़ी तक दाँव पर लगा दिया । जो दहेज़ में मिला था वो तो कब का बिक गया । होंडा को बाइक नहीं गाड़ी कहा जाता था । आज वही होंडा गाड़ी उपभोक्ता और युवाओं की पहचान से निकलते हुए बहुउपयोगी हो गया है । ग्रामीण भारत के उद्यमीकरण में छोटी सी भूमिका निभा रहा है । बाइक अब मुखिया नहीं दूधिया चलाते हैं । मुखिया बोलेरो,स्कार्पियो में घूमते हैं । इसमें भी योगदान राजदूत का ही है । जब मुखिया लोगों ने अपनी राजदूत बेची तो ख़रीदने वाले गाँव के उद्यमी थे । पुरानी बाइक से अपने पहले के मालिकों की तरह मोहब्बत न कर सके । बोरे की चट्टी सीट पर डालकर दूध का कनस्तर डाल दिया । किसी ने भारत की दुग्ध क्रांति में मोटरसाइकिल की भूमिका का अध्ययन नहीं किया है । 

25 comments:

Aashrav Nema said...

हां सर राजदूत का अपना एक जमाना था

पर ये बात भी उतनी ही सही है कि उस समय के रास्तो पर आज के ज़माने की कोई और गाड़ी टिक नही पाती..।

sachin said...

शहरों में भी, आस-पास के गाँव से दूधवाले, राजदूत पर सवार होकर रोज़ सुबह-शाम, दूध बेचने आते थे .. ऐसे ही भैंस नुमा राजदूत के सींग जैसे काले हैंडल पर झिलमिल बाँध कर, और दोनों तरफ दूध का कनस्तर लटकाए.
दहेज़ के कारन, हीरो होंडा के बढ़े प्रचलन के बारे में तो पता था, पर गाँवों में राजदूत को " अर्ध सामंती प्रतीक " … ऐसा पहली बार देखा/समझा।

Kathakaar said...

Ye Ravish Kumar kabhi comments ka jawab bhi dete hai kya??

sandeep pandey said...

Purvanchal me aise kai gaon ko mai janta hu jaha bike chhinaiti ke liye famous hai. Aur kabhi mathura ke barsana me radhika ji kr ghar jaiye aap dekhenge ki log super splender ko pichhe se aadha nikal ke uski jagah trali jod ke sawari gadi bana diye hai.

Rajat Jaggi said...

मुझे आज भी याद है राजदूत की ऐड में गोविन्दा आया करता था | मुझे तोह आज भी बहोत क्रेज है राजदूत का पर उसका सेकंड हैण्ड कीमत ही सातवें आसमान पे है |

ओल्ड इस गोल्ड

Aanchal said...

जब मैं छोटी थी, पापा के एक दोस्त के पास राजदूत हुआ करती थी। उन्हें सबलोग 'राजदूत' के नाम से ही पुकारते थे। जब भी घर आते.हमलोग यही बोलते राजदूत अंकल आये है। और वाकई में आजतक उन अंकल का नाम याद नहीं, राजदूत ही याद है।

Aanchal said...
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Brij ka baashinda said...

अपने पास भी थी। 3 गियर की।

Brij ka baashinda said...

अपने पास भी थी। 3 गियर की।

प्रवीण पाण्डेय said...

सच में, दूध को समय से पहुँचाने के लिये और सेवा का विस्तार ५० किमी तक कर सकने में मोटरसाइकिल का बड़ा योगदान है।

Rajendra Gautam said...

Your opinion on Naveen Kumar Bhojpuria on FACE BOOK :
नबीन कुमार 'भोजपुरिया'
पता ना कतना सांच बा बाकि भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता ना मिलो एह खाति जे जे कोशिश कईले रहे ओह मे कुछ नाम बा रामचंद्र शुक्ल , महावीर प्रसाद दिवेदी , हजारी प्रसाद दिवेदी , अज्ञेय , राम विलाश शर्मा आदि ।

एह लो के अलावा विरोध करे वाला अधिकतर लोग भोजपुरी क्षेत्र के रहे आ एह लो के विरोध कईला के वजह से आजुओ भोजपुरी के पुचकारी के फुसलाई के फोंफी लेमनचुस आ रुईया मिठाई धरा दिहल जाला ।

हजारी प्रसाद दिवेदी जी के एह बात के अफसोस बहुत बाद मे जा के भईल बाकि तब ले ढेर देर हो गईल रहे ।

नोट- ई कतना सांच बा देखे जोहे के परी बाकी फोंफी आ रुईया मिठाई आ लेमनचुस वाली बात त एक दम निठाह अ सोगहग बात बा ।

ध्यान दिहल जाउ स्वामी विवेकानंद जी " शुन्य " प भारत के ताकत देखवले रहले आ आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी जी " सोगहग " शब्द प भोजपुरी आ भोजपुरी साहित्य के ताकत से दुनिया के परिचय करवले रहले बाकि ई कुल्हि इतिहास ह ।

abhishekapppi said...

are sir best feature hai Rajdoot ka aap 1 kil se bhi start kar sakte hai agar chabhi gum ho jaye to.....


papa ki 88 model wali abhi bhi chalane ka apna mja h....

sabse achchi baat to ye hai hamare Rajdoot ki ki hamare aadhe GAAON ki logo ne usi se sikha h bike chalana....

Khachar Janak said...

Rajdoot ki bat hi nirali hai, gadi k tor par aur naukri k tor parbhi.

Rajendra Gautam said...


एकर नमवा राजदूध या दूधराज या दूधदूत होए के चहत रहा।

vinay kumar said...

राजदूत कस्बाई एवं ग्रामीण माध्यम वर्ग का प्रतिक था. यह एक अर्ध-सामंती स्थायित्व का भी प्रतिक था. हीरो हौंडा उस दौर की, भौंडे अर्थ में ही सही, बदलती आर्थिक और सामाजिक परिवेश का प्रतिक बना.

Priyesh Priyam said...

bilkul sahi kahi apne...wo din bahut shandaar hua karte the...

Manish Kumar Shukla said...

Jab Hero ka jamana v aya to log bolte pehle "rajdoot chalawe k pahile sikh lll fir hero hond chalai" hmne v motorcycle chalana RAJDOOT se si sikha

sanjeev kumar said...

थोड़ा और फ्लैश बैक मेँ जाइएगा तो सीको घड़ी, सेनरेले साईकिल और मर्फी का रेडियो ग्रामीण सम्पन्नता के प्रमाण पत्र हुआ करते थे। इन दहेजुआ आइटमोँ के बिना शादी ब्याह लगभग नामुमकिन ही थे।

Rajendra Gautam said...


your opinion Sir,

झारखंडी भाषा संस्कृति अखड़ा
झारखंड को सांप्रदायिक आग में झोंकने का यह खेल बंद होना चाहिए।

झारखंड के विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक, सामाजिक और सामुदायिक संगठनों ने आज मानव संसाधन मंत्राी गीताश्री उरांव के वक्तव्य का स्वागत करते हुए इस पर हो रही राजनीतिक बयानबाजी और पुतला दहन को सांप्रदायिक बताया है। अखड़ा की केंद्रीय समिति ने कहा है कि जब भी स्थानीय भाषा-संस्कृति की बात आती है तो लोगों को समरसता के टूटने, जहर घुलने, भाषा के नाम पर लड़ाने का प्रयास ‘नजर आने’ लगता है। जेपीएससी में जब झारखंडी भाषाओं को निष्प्रभावी बनाया गया था तो राज्य के राजनीतिक और भोजपुरी के लोग क्यों चुप थे? धर्म और भाषा के नाम पर झारखंड को सांप्रदायिक आग में झोंकने का यह खेल बंद होना चाहिए।

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की केंद्रीय समिति में आज झारखंड के विभिन्न संगठनों की हुई बैठक में इस मुद्दे पर हो रहे बवाल पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। इस बवाल को सांप्रदायिक बताते और इसकी तीखी भर्त्सना करते हुए संगठनों ने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा का सवाल सबसे अहम है। अतः झारखंड की स्थानीय आदिवासी-क्षेत्राीय भाषाओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह सिर्फ रोजगार का सवाल नहीं बल्कि विकास का सवाल है। स्थानीय भाषाओं के विकास से ही राज्य के विकास की गति बढ़ सकती है। इससे ड्रॉप आउट रूकेगा, पलायन, ट्रॅफिकिंग रूकेगा क्योंकि आज राज्य इन समस्याओं से व्यथा त्रस्त है। झारखंडी होने का दावा करने वालों को यदि झारखंड की चिंता है तो मंत्राी के वक्तव्य का स्वागत करें न कि विरोध। जेपीएससी में झारखंडी भाषाओं को निष्प्रभावी करके और टेट में बाहरी भाषाओं को प्रभावी बनाने का प्रयास स्थानीय भाषाओं को खत्म करने की साजिश को कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।

‘अखड़ा’ और सभी झारखंडी संगठनों की मांग है कि न केवल भोजपुरी बल्कि वो तमाम भाषाएं जो द्वितीय राजभाषा में शामिल नहीं हैं और जो झारखण्डी नहीं हैं, उन्हें तत्काल प्रभाव से टेट एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं से बाहर किया जाए।

बैठक में पंचपरगनिया भाषा विकास केन्द्रीय समिति, मुंडा सभा, कुड़ुख विकास समिति, कुड़ुख भाषा परिषद, झारखंडी भाषा साहित्य परिषद, खोरठा भाषा साहित्य परिषद, भारतीय आदिवासी मुंडा भाषा परिषद, मुंडा उबार समिति, अखिल भारतीय सरना समाज, आदिवासी-मूलवासी छात्र संघ, कुड़ुख लिटरेरी सोसायटी ऑफ इंडिया, खड़िया साहित्य समिति, खड़िया महासभा, शहीद तेलंगा खड़िया स्मारक समिति, नागपुरी भाषा परिषद, नागपुरी संस्थान, आदिवासी कुड़मी समाज, संताली साहित्य परिषद के अगुआ और प्रतिनिधि शामिल थे. इसके अलावा झारखंडी पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों-प्रकाशकों ने भी शिक्षा मंत्राी के बयान का समर्थन करते हुए भाषायी अलगाववाद के षड्यंत्र की तीव्र भर्त्सना की है।

केएम मुंडा
केंद्रीय प्रवक्ता
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा

Sunil Kumar Patel said...

आज का प्राइम टाइम
संजय जी व उनकी पार्टी संजय को बचाने(सजा कम कराने)की कोशिश कर सकती है,कानून भी बदल सकती है,पर इनकी आलोचना करना, मतलब-नकसल वादी विचारधारा।
(कहीं तो लिखने की जगह मिले ,ट्विटर बंद हो गया। यही सही।)नमस्ते।

kishore H Patel said...

आज के प्राइम टाइम पर, संजयजी अगर माफ़ी माँग लेते, तो उनका कद कोई छोटा नही हो जाता !
माफ़ी माँगना सजंता का प्रतीक है ! कभी कबार ग़लती ना होने पर भी माफ़ी माँगनी पड़ती है, उससे कई मामले सुलज जाते है !और यहा पर तो उनकी ग़लती भी थी !

Jitesh Kumar said...
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Jitesh Kumar said...

aaj prime time aap manmohan singh the

dileep Yadav said...

Sir ye kahani aapne UP ke lia to nahi likhi but laga ki yahi same kahani etah aur shayad pure UP aur pure desh ki b hai

abhinav goel said...

हमारे पास है राजदूत, संभाल कर रखे हुए है किसी की याद मे ,, बहुत लाजवाब बाइक है, कितने समये से चलाई नहीं है, आपका पोस्ट पढ़ने के बाद अपने गाँव जाकर राजदूत को अपने स्टोर से निकाल कर चलाये गे ,
----किसी ने भारत की दुग्ध क्रांति में मोटरसाइकिल की भूमिका का अध्ययन नहीं किया है । --- बहुत खूब