शीला या मुन्नी

चंद महीने के अंतराल पर भारतीय सिनेमा के पर्दे पर दो नायिकाएं एक अपने अपने सामाजिक दास्तानों से निकल कर आइटम के रूप में पेश-ए-नज़र हुई हैं। इनकी नृत्य शैली और सुर लहरियों पर फिसलती लचकती कमरों का अध्ययन किया जाना चाहिए। क्या कैट और मलाइका का डांस अखिल भारतीय कुंठा तत्व को सामूहिकता देता है या फिर दोनों अलग-अलग वर्ग विशेष की नुमाइंदगी कर रही हैं? क्या यह सही सवाल है?

पहली नज़र में मुन्नी की ठसक लौंडिया वाली है। शीला बेब लगती है। मुन्नी सामंतवाद के हिन्दी मीडियम स्कूल से पास आउट लगती है तो शीला इंग्लिश मीडियम स्कूल से। मुन्नी की जवानी की आग झंडू बाम और एटम बम से निकल रही है तो शीला इतनी सेक्सी है कि अपने नायक से कहती है कि मैं तेरे हाथ न आऊं। अकड़ देखिये इस बेब की। कहती है वो खुद को ही प्यार करते रहना चाहती है। जबकि मुन्नी अपने डार्लिंग के लिए बदनाम हो जाना चाहती है। मुन्नी चाहे तो शीला का एक जवाब में काम तमाम कर सकती है। कह देगी कि इंग्लिश बोलकर ये मत समझना की तुम शकीरा हो। तुम्हारा नाम भी तो हमारे मोहल्ले वाला ही है न। मुन्नी की बहन शीला। शीला की जवानी। गिटपिट इंग्लिश बोलकर साबित क्या है करती। चल हट। हिन्दी की कापी मार कर इंग्लिश में महारानी बनने निकली है। नाशपिटी।

इन दोनों आइटम गीतों में डांस के लय वही हैं। कमर प्रदेश के अंग झटके खा रहे हैं। मुन्नी एक ही कपड़े में असल ज़िंदगी के जेठ के साथ डांस कर रही है। मुन्नी के साथ मर्द लफंगों की सक्रियता दिखती है। मर्द किरदार गाने में इन्वाल्व हैं। सलमान तो बालकनी पर चढ़ गया है और उसका विरोधी खलनायक खटिया पर अपनी बांहों को समेट कर कसमसा रहा है। कुर्ता और गमछा में। सलमान तो लगता है कि वर्दी फाड़ कर निकल आएगा। शीला के गाने में मर्द बिना काम के लार टपका रहे हैं। वो आगे पीछे बंदर की तरह कूद रहे हैं। अक्षय कुमार हैट पहनकर आते तो हैं मगर इंग्लिश मीडियम वाली शीला के सामने उनकी कोई औकात नहीं दिखती। शीला रिजेक्ट करती है। हर सीन में कपड़े बदल कर आ जाती है। वो एक ही गाने में कई वर्गों को लुभा रही है। मुन्नी तो एक ही कपड़े में सारे वर्गों को अपने घुटने तक ले आती है।

मर्दवादी कुंठा जगत में ऐसे गाने न जाने किस अहसास को रंगीन बनाते होंगे। मगर नाक और गला दबाकर गाये गए ऐस गाने कहीं न कहीं तेज धुनों के साथ आज़ाद ज़रूर करते होंगे। तभी मुन्नी और शीला सभी वर्गीय दीवारों को लांघ जाती हैं। कजरारे की ऐश को लोग भुलने लगे हैं। मुन्नी किसी गांव में फंस गई लगती है तो शीला बाइलिंगुअल हो गई है। बाई सेक्सुअल भी। दोनों की सेटिंग बताती है कि सामंतवादी तत्व हर तरह के समाजों में ज़िंदा है। मुन्नी और शीला आज के तथाकथित शालीन स्त्री पुरुषों के भीतर छुपे लंठई के प्रशस्त मार्ग हैं।

26 comments:

Arvind Mishra said...

क्या मीमांसा है भाई -चौचक !

बी एस पाबला said...

सामंतवादी तत्व हर तरह के समाजों में ज़िंदा है। मुन्नी और शीला आज के तथाकथित शालीन स्त्री पुरुषों के भीतर छुपे लंठई के प्रशस्त मार्ग हैं।

सटीक निष्कर्ष

केवल राम said...

सब कुछ सामने रख दिया भाई ...अब क्या कहें ...शुक्रिया

सतीश पंचम said...

इसे कहते हैं पलंगतोड़ समीक्षा :)

और हां पलंगतोड़ मिठाई भी होती है....विश्वास न हो तो हाईवे ऑन माय प्लेट वाले रॉकी और मयूर से पूछ सकते हैं :)

दीपक बाबा said...

@अरविन्दजी : मीमांसा
@पाबला जी : तथाकथित शालीन स्त्री पुरुषों के भीतर छुपे लंठई के प्रशस्त मार्ग
@सतीशजी, पलंगतोड़ समीक्षा

ये सब आपके पाठकों की टीप है. आप क्या कहना चाहते हैं.
एक ही दिन में आपने लखनऊ का बदला चेहरा भी दिखा दिया, और मात्र ६ घंटे बाद आपको शीला या फिर मुन्नी की याद आ गयी.
एक जमीन से उठे, सामाजिक मुद्दों को लपकने वाले, कसबे में बैठ कर अपनी रिश्तेदारी निभाने वाले माननिये पत्रकार महोदय मात्र शीला और मुन्नी के कमर प्रदेश के लिए की-बोर्ड तोड़ रहे हैं. कुछ भी समझ नहीं आता.
मीडिया जो दिखता है वो समाज को मंज़ूर है या फिर समाज जो चाहता है वो मीडिया की मजबूरी है....... चिंतन आप कीजिए.......
कसबे में कई लोग रहते है..... कईयों का ध्यान रखना पड़ेगा.

पहला धक्का तो खुशदीप सर के देशनामा पर लग चूका है.

चिट्ठाजगत की बदोलत, अभी और महानुभव आते होंगे...... उनके विचार भी देखिये.

सतीश पंचम said...

@ दीपक जी,

एक ही दिन में आपने लखनऊ का बदला चेहरा भी दिखा दिया, और मात्र ६ घंटे बाद आपको शीला या फिर मुन्नी की याद आ गयी.
एक जमीन से उठे, सामाजिक मुद्दों को लपकने वाले, कसबे में बैठ कर अपनी रिश्तेदारी निभाने वाले माननिये पत्रकार महोदय मात्र शीला और मुन्नी के कमर प्रदेश के लिए की-बोर्ड तोड़ रहे हैं. कुछ भी समझ नहीं आता.

-------------

क्या हम पत्रकारों पर वो भी रविश जैसे शख्स पर इस तरह के प्रश्न दाग कर ज्यादती नहीं कर रहे ?

जरूरी नहीं कि रवीश हमेशा सीरियस किस्म का ही ओढ़ना ओढ़े रहें, ओढ़ना भी नहीं चाहिये। हरदम मरघटीया मूड वाली पत्रकारिता ठीक नहीं लगती। हल्के फुल्के अट्ठहास वाली बातें, हल्का सा व्यंग्य जायका बदलने के लिये जरूरी है।

वैसे भी हम ब्लॉगर खुद कितने कंसिस्टेंट हैं। एक ब्लॉग पर दुख व्यक्त करते हैं औऱ अगले ही पल किसी ब्लॉग पर ठहाका लगाते पाये जाते है :)

Kunal Verma said...

रवीश जी,आज कल आने वाले ये आइटम डांस भले ही युवा वर्गोँ को आकर्षित कर पैसा जुटा लेती है पर दो माह से ज्यादा ये टिकती भी नहीँ है।पता चलता है कि फिर कोई नया आइटम नंबर आया और लोग उसके चाल पर थिरकने लगे हैँ और मुन्नी अब अपनी बदनामी छुपाती फिर रही है।बेचारी!!!

नीरज बसलियाल said...

रविश जी ने मूड जरूर गैर-सीरियस रखा है लेकिन बात बहुत सीरियस की है |

सम्वेदना के स्वर said...

भाई रवीश !

पूरे मोहल्ले के साथ एक और मुन्नी बदनाम हुई है,आपके आसपास? उसकी सुध भी लीजिये हूज़ूर?

'उदय' said...

... ab yah silsilaa chal padaa hai ... munni aur sheelaa ke baad ..... !!!

amitesh said...

मुन्नी और शीला आज के तथाकथित शालीन स्त्री पुरुषों के भीतर छुपे लंठई के प्रशस्त मार्ग हैं।
badhiy ukti

प्रवीण पाण्डेय said...

न शीला, न मुन्नी। समय में दोनों घुल जायेंगी, पौरुषेय लंठई की तरह।

Poorviya said...

मुन्नी चाहे तो शीला का एक जवाब में काम तमाम कर सकती है। कह देगी कि इंग्लिश बोलकर ये मत समझना की तुम शकीरा हो। तुम्हारा नाम भी तो हमारे मोहल्ले वाला ही है न। मुन्नी की बहन शीला। शीला की जवानी। गिटपिट इंग्लिश बोलकर साबित क्या है करती। चल हट। हिन्दी की कापी मार कर इंग्लिश में महारानी बनने निकली है। नाशपिटी।

दीपक बाबा said...

@सतीश पंचम जी,

रवीश जी से कम आप भी नहीं, हम जैसों (अनपढ़ भावुक) के लिए ही बराबर हो ... सभी कुछ जायज है...... पर क्या करें जहाँ उम्मीदें कुछ ज्यादा हों तो वहाँ ऐसा कुछ ह्रदय पर चोट पहुंचाता है......

बहुत थोडा बचा है ...... समेटने के लिए. उतना ही सहेजने की कोशिश होनी चाहिए.

दीपक बाबा said...

और आप लोगों की संगत में आकार ही मेरे जैसे लोग कुछ ज्यादा 'सोचने' लगे है.....

कहिये तो संगत बदल लें.

सतीश पंचम said...

अरे दीपक जी,

जास्ती सेंटी बिंटी काहे को हो रेले हो.....ज्यादा सेंटी नईं होने का, क्योंकि सुना है जास्ती सेंटी होने से प्रधानमंत्री कार्यालय में लगी जनसंख्या वाली डिजिटल घड़ी तेज चलने लगती है :)

अमां यार, ....अपन तो वही हैं कि बस्....धरिया वेश फकीरां दा....कोई कैसा भी रहे अपन को क्या...जहां कहीं लगा कि इसकी मौज लेनी चाहिये....थोड़ी चुहल होनी चाहिये वहां दन्न से चिमटा कान के पास खनखना दिया :)

रवीश जी को मैं पत्रकारिता की चिलगोजई वाली जमात का ही मानता हूं किंतु मैं उन्हें थोड़ा सा प्लसनेस इसलिए देता हूं क्योंकि यही वो शख्स है जो कि थोड़ा सा मेरे मन माफिक रिपोर्टिंग करते है, कुत्ते और बिल्लियों की रिपोर्टिंग नहीं :)

दीपक बाबा said...

अब क्या बताएं ....... आप सब लोग ही तो कभी रिक्शावाला और कभी प्रवासी मजदूरों का रिपोर्ट दिखा हमका सेंटी बना देते हो......

और जब सेंटी बन जाए तो बोले जाओ फिल्म में शीला की जवानी देखो....

अब ये कैसे चलेगा.

अजित वडनेरकर said...

दीपक बाबा या बाबू सेंटी हो गए हालाँकि सतीश भाई ने खूब संभाला है....

बाकी पोस्ट धाँसू है और अरविंदजी की ज़बानी मीमांसा चौचक है...

Rajeev Bishnoi said...

lot of verity in munni and sheela, sir i think you saw both of them very keenly,nice sir

Rahul Singh said...

अदाएं तो दोनों की ही दीवाना कर रही हैं,लंठई कराने में सक्षम.

ravish kumar said...

आप सभी की प्रतिक्रियाएं उत्साह बढ़ाती हैं। आलोचनाओं से दम मिलता है। पढ़ता रहता हूं। मैं एक सामान्य पत्रकार हूं। गंभीर बिल्कुल नहीं हूं। गंभीरता मेरी प्रकृति नहीं है। इसलिए मज़ाक करने या हल्की फुल्के लिखने के मेरे स्वभाव को पत्रकारिता का पतन नहीं माना जाना चाहिए। पाठकों में स्वस्थ्य बहस चलती रहनी चाहिए बस किसी वजह से दुराव न हो इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। और हां..मैं कभी गंभीर नहीं था और न रहूंगा। वैसे भी दो मिनट चुप रहता हूं तो लोग पूछने लगते हैं कि तुमको क्या हुआ है। टेंशन में क्यों हो।

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

INDRADHANUSH said...

Bahut badhiya!

Shuchita Vatsal said...

"Pahele gaano par dil jhooma karte the ab sir jhoomte hain.."
Whether it's munni or sheela.. both represent the vulgar id of human life..Art means nudity & recreation means nuisance that's it.Pata nahi par media aur filmon,dono ne hi"stri" ka swaroop badal diya..Ab woh consumer item se ziada kuchh nahi lagti..Araadhya ki moorti toh door ki baat hogi.. aaj toh respect jaise shabdon se toh uske swaroop ka parichaye hi nahi hone diya jata..WOMEN LIBERALIZATION ke naam par SOCIAL DEGRADATION ho raha hai..
Hum samajik moolyon ke patan ki parakaashtha par pahunch chuke hai.. Human was a social animal now the word SOCIAL has been deleted..He is just portrayed as an animal nothing more..

rakesh said...

na to munni ke jawani ka jhandu baam aur na hi shila ki sexy jawani karamat kar rahi hai. yah asar hai us maanshikata ki jaha sabhi apni kaam vashna ki purti karna chahate hai lekin madhyam dusharo ko banaya jata hai. yaha wahi kahawat charitarth hota hai ki 'bhagat singh janme lekin padosi ke ghar me.

Sujeet Sinha said...

Ravish babu, What an observation and what a subtle comparison.