अब लोकल स्कूल का मतलब देख लो



ग्लोबल के बाद लोकल स्कूल का जायज़ा लेते हैं। इसकी एक झलक आपको रवीश की रिपोर्ट में मिल गई थी। करनाल के डेरा सिकलीगर के प्राइमरी स्कूल का हाल है। साढ़े सौ छह बच्चे यहां प्राथमिक कक्षा में दर्ज हो गए हैं। इनके लिए सिर्फ तीन कमरे और तीन मास्टर। ऊपर से स्कूल आने के लिए सरकारी वजीफा और दोपहर का रद्दी भोजन। ढाई सौ बच्चे सर्व शिक्षा अभियान के रजिस्टर में नाम दर्ज कराने के बाद अपने घुमंतू मां बाप के साथ फेरी पर चले जाते हैं। जो स्कूल आते हैं उन्हें खुद ही पढ़ाई का इंतज़ाम करना होता है। मास्टर ने बताया कि हमारे यहां मॉनिटर प्रणाली से पढ़ाई होती है। इसके तहत एक बच्चा मॉनिटर बन जाता है। जो ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ा होकर गिनती गिनता है,बाकी क्लास दोहराते हैं। एक बोलते ही तीन सौ बच्चे के एक बोलने से पूरे ब्रह्मांड में एक गुंजायमान हो जाता है।




पांचवी क्लास के बच्चे बेंच पर किताब खोलकर बैठे नज़र आए। उनके लिए भी मास्टर नहीं था। वो किताब से कापी में उतार रहे थे। इसी तरह उनका पढ़ना हो रहा था। कुछ बच्चे पानी की टंकी के किनारे बैठे थे। आप तस्वीरों में देख ही रहे होंगे। ग्लोबल और लोकल स्कूल में इस फासले को देखकर क्या क्रंदन करें। इक्कीसवीं सदी ढिंढोरा पीट कर आई थी। एक दशक गुज़र गया। घंटा कुछ नहीं हुआ। भला हो तेंदुलकर और विजेंदर का। इन्हीं को देखकर लगता है कि कुछ हुआ। मगर कब तक हम अपने कटोरे में 'कुछ' खनखनाते रहेंगे। स्कूल के बरामदे में ज़मीन पर बैठे सैंकड़ों बच्चे। जी में आया कि सर्व शिक्षा अभियान बंद कराने का अभियान शुरू कर दूं। एनजीओ और सरकार की खुशी के लिए ये बच्चे काम छोड़ कर क्यों पढ़ाई करें। गुस्से के लिए माफी चाहूंगा लेकिन सवाल तो है कि स्कूल है या सूअरखाना। जी करता है कि मुख्यमंत्री को इसी बरामदे में मुर्गा बनाकर बैठा दें। और मॉनिटर को बोले कि बोल एक, फिर सारी क्लास बोले एक। बोल बीस, फिर सारी क्लास बोले बीस। ब्रह्मांड में गिनती गूंजने लगे।


23 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

विपरीत ध्रुव दिखाने का आभार। अब दशा देख कर मन द्रवित हो गया।

Rahul Singh said...

काबुल में गदहे मिलते हैं और गुदड़ी में भी लाल निकलते हैं, भरोसा है.

Mahendra Singh said...

Hudda Saheb ko kuch to karna chahiye. Haal to bahut bura hai. Rahul ji kee bat sahi hai. Patna ka super 30 Isi ka udahran hai.

राकेश पाठक said...
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राकेश पाठक said...

इंतज़ार करिए...
इस गणतंत्र दिवस मेरे नाम पर हों जाएं
फिर कुछ नईं घोषणाएं...
इंतज़ार किजिए सिब्बल जी शायद...
पश्चिमी स्कूलों का सपना कोई
फिर सुनाएं
इंतज़ार करिए...
शायद उतरे
श्यामपट से कोई तस्वीर उजाले की
शायद नेताजी ही खींचे...
मेरे छोटे हाथों में एक लकीर निवाले की...
इंतज़ार करिए...

sushant jha said...

ग्लोबल स्कूल वाले पोस्ट पर कमेंट करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया!

नीरज जाट जी said...

इधर हम भी ऐसे ही स्कूल से निकले हैं।

Nirmal kumar Singh said...

jab ek reporter ka man kheejh gaya to kisse asha karen badlaw ki . . .
global school par comment karne ki aukat nahin hai meri, par kahin local school par ek faqr jaroor hota hai ki kahenge ki humne duniya badli hai . . .

Shuchita Vatsal said...

Shameful..Majority of programmes are facing such set back... not because there is scarcity of funds but because the one who are promoting these i.e. NGO's & Govt. are busy filling up their pockets.Most "Abhiyaans" do very well on paper.
A country like India needs to enhance the hidden craftsmanship & real art in such area..I'm not against Primary education but Skills are needed to be taught to make our coming generations to be self dependent... Sirf kitaabi padayi iss badati berozgari wale desh mein kaafi nahi..Intni si shiksha toh humari generation ko "Ad jal gagri hi bana rahi hai". Kaam isliye nahi karte kyonki padte hain aur padte hai toh aise padene ko milta hai..Na abb woh ghar ke rahe na ghaat ke..This will create unemployment & frustation nothing more..
Sir,Likhte rahiye..Jaagrok karte rahiye par kuchh karne ki chaah ko privartan lane ki raah khoj ne mein bhi help kar dijiye.. Nahin toh humare jaise log apraad bodh ke tale dab jayenge..Sometimes higher education seems to be tension creator.Iss se toh achha hota ki kisi baat ka gyan na hota, hum unpad ya pagal hote.. Kum se kum apni laachari par akrosh toh nahin aata..mann mein sukoon hota aur chehare par apni chhoti-chhoti uplabhdiyon ki khushi..

abhi said...

ग्लोबल स्कूल वाले बच्चों को एक दिन दिखाया जाए की स्कूल ऐसा भी होता है..

आपका गुस्सा एकदम जायज है..

सही में पढकर मन द्रवित हो गया :(

radha said...

Ravishji ,maaf kijieaga

Ye to jab hum middle class main paida hue the tabhi humain sikha diya jaata hai ki beta Bharat do hain ek jo tum dekh rahe ho aur ek jo tum sun rahe ho,iska matlab ye nahi hai ki jo hum sun rahe hain use dekh nahi shaktehain.
Mera sirf yahin kahan hai ki main aaj tak ye nahi jaan paya hoon ki Bharat kya hai, sayad bhar walon ke samne ye aacha lagta hai ki Bharat VIVIDTAOON ka desh hai sayad yahin VIVIDTA hain yahan par.Pehle ye maante ki Raaja ke pass bahut paisa hota hai islea uske bete ko raja bana do sayad wo kuch kaam local aadmi ka karega kyonki uske pass sab kuch hai , par aaj kuch aur ho gaya hai...Local kuch kar nahi shakta hai aur Raja ko abhi bhi aur paise ki jaroorat hai ...Hum ise main rah gaye hain ki kon sahi hai kon galat...
Dukh to hota hai par sach aapko bhi sayad pata hai ...ya to hum karna nahi chahte ya karne jaate hain to karne nahi diya jaata hai aab to ye haal hai ki ek besahare ki tarah sirf intzaar kar rahe hain ki kab raja ji ka man bhar jaaye aur kuch hamara bhi kaam ho.
ya 21centeury main kuch aap jaise bhi hain jisse thori umeed bhi badh gaya hai ki sayad rajaji kabhi ise padhe to unhe bhi hamare jaise kast ho aur kuch hamre liea bhi karain ki India dono jagah hain Globus schoo, amin bhi aur sarkaari main bhi......

radha said...

waise Ravish ji aapka bahut dhanywaad hamian ye dikhane aur batane ko .....

सुशील कुमार छौक्कर said...

वो दिन याद आ गए जब हम भी एक हाथ में बैग़ के साथ टाट भी ले जाते थे उस पर बैठने के लिए क्योंकि स्कूल में बेंच नही होते थे। और दूसरे हाथ में तख्ती होती थी मुलतानी मिट्टी से पुती हुई। और वो भी दिल्ली नगर में। जरा ये स्टोरी उन्हें देखने चाहिए जो विकास दर ८प्रतिशत का राग गाते है।
खैर आपकी स्टोरी हमेशा पसंद आती है। वैसे ये चीजें तो सब देखते है पर उनपर स्टोरी कोई नहीं करता है। एक आप ही है जो स्टोरी बनाते है वो भी बेहतरीन तरीके से।
बस लगे रहे डटे रहे।
अच्छी स्टोरी करते रहे॥

गिरधारी खंकरियाल said...

यही तो भारतवर्ष है गर्व करो

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

रवीश जी, आपका गुस्सा वाज़िब है। आपने तो हरियाणा के स्कूलों की तस्वीर पेश की है, दिल्ली के सैंकड़ों स्कूलों में ये नज़ारा आम है, किसी भी जेजे कॉलोनी या दिल्ली देहात के सरकारी स्कूल में चले जाएं तो यही हाल मिलेगा। छात्रों की संख्या जो आप बता रहे है वो भी भला हो उस घटिया खानें का जिसके लालच में मां-बाप अपनें बच्चों को स्कूल तो भेज दे रहे है। वरना तो सरकार भरोसे उससे भी घटिया खानें के लिए भटकनें वाले इन बच्चों को स्कूल देखनें का मौका भी शायद ना मिलता।
ये भारत है यहां काम स्टेप वाइस स्टेप होता है, पहले सरकारी स्कूलों की कमी थी,स्कूल बनें, तो टीचरों की कमी हो गई, फिर टीचर आए तो बच्चे कम, अब बच्चे ज्यादा आ रहे है(खानें के लालच में)तो टीचर औऱ प्रशासन हराम हो गया। कौन सोचता है इतना जितनें बकैती करने वाले है ना उनके बच्चे भी किसी ग्लोबल स्कूल में ही पढ़ते है!ये बातें आधे घंटे का रनडाऊन भरनें और "दुनिया मरे आगे" कहनें के लिए काफी है।

JUGAD said...

रवीश जी नमस्‍कार
आपके बच्‍चे कौन से स्‍कूल में पढ़ते हैं लोकल में या फिर ग्‍लोबल में।
दोनों पोस्‍ट अच्‍छी हैं।

Jai Prakash Pathak said...

नमस्कार!
लोकल स्कूल तो बहुत देखा है. ग्लोबल आप ने दिखा दिया. ग्लोबल वाले स्कूल की फीस कुछ कम लग रही है. कई साल पहले एक संसद महोदय ने दिल्ली के एक स्कूल की चर्चा करते हुए वहां की फीस साठ हजार रूपये महीना बताया था.

आपने जिस लोकल स्कूल की तस्वीर दिखाई है वह इमारत भी बहुत अच्छी लग रही है. जब आपने दो तरह के स्कूलों को दिखा दिया तो थोड़ी और कृपा कीजिए. आठ नहीं तो कम से कम चार तरह के स्कूलों को और दिखा दीजिये. जितने आर्थिक वर्ग हैं उतने तरह के स्कूल हैं.

पूर्व प्राथमिक जिसे पांचवे दशक में अ ब कहा जाता था और एक से लेकर पांच कक्षाएं, कुल छः कक्षाओं को एक अध्यापक पढ़ा लेते है. कहीं दो , तो कहीं तीन, उत्तर प्रदेश में पढ़ाने के लिए शिक्षामित्र भी नियुक्त कर लिए गए. सरकार ने नए बंधुआ मजदूर की कोटि बनाकर दैनिक वेतन भोगी, ठेकावाले कई विकल्प बनाए हैं.

जब आपने कुछ देखा तो आपको गुस्सा आया. जब सब देखेंगे और दिखाएँगे तो केंद्र से लेकर प्रान्त तक की तस्वीर सामने आयेगी. तब सभी राजनैतिक दलों की शिक्षा की गुनवत्ता के भाषण की कलई खुल जायेगी.

सर्व शिक्षा अभियान न बंद कराएं. शिक्षा में भ्रष्टाचार और कदाचार को बंद कराएं. प्राथमिक पाठशालाओं के लिए मानक भवन बनें. वहां भी सफाई रहे. मानक छात्र शिक्षक अनुपात रहे. जो निजी विद्यालय ( लोकल वाले ) चल रहें हैं उनमें भी मानक देखा जाए. बंद कराने के अभियान से ज्यादा जरूरी है ठीक से चलाने का अभियान चलायें.
नमस्कार.

डॉ .अनुराग said...

दाल रोटी की फ़िक्र में गुम गए
मुफलिसी ने कितने हुनर जाया किये

Mired Mirage said...

हाल भयंकर तो है.भीड़ भी अधिक है.अन्यथा ऐसे ही स्कूल में पढने वालों को पहाड़े कभी नहीं भूलते.सोला सोलियो दो सौ छप्पन,बीयो बीयो चार सौ रटकर गुंजायमान करने वालों को केल्क्युलेटर या लाउडस्पीकर नहीं उपयोग करने पड़ते.
हरियाणा में बीता बचपन याद आ गया.शायद तब जनसंख्या भी कम थी और स्कूल में भोजन भी नहीं मिलता था.
लज्जा या क्रोध किस किस बात पर करें? यदि इन स्कूलों की स्थिति के सुधार के लिए भी किन्हीं लौबिस्ट का सहारा लिया जा सकता तो काम बन जाता.
घुघूती बासूती

I think said...

maza aa gaya sir apna bharat dekh kar.. aise hi khud padhe the or sach me is padhne me jo maza hai wo kahi nahi.. or hame to sikhaya hai ki padho kam or guno jyada.. to sir ji hume to america jana nahi hai na apne bachhon ko salaah denge..

JC said...

ग्लोबल और लोकल स्कूल से झलक मिली भूत, (कलियुग की जब बहुसंख्यक राक्षश और देवता के मिले-जुले प्रयास से तथाकथित उत्पत्ति आरंभ हुई अमृत की खोज में), और भविष्य, (द्वापरयुग की जब अमृत-शिव के हलाहल पान के पश्चात मंथन फिर संभव हो पाया शेष राक्षाशों और देवताओं द्वारा जब मणि -माणिक्य आदि प्रगट हुए) दोनों की, जैसे कहें कौरवों के पुराने हस्तिनापुर और पांडवों के तत्कालीन आधुनिक इन्द्रप्रस्थ की...

sanjay said...

'ये ग्लोबल स्कूल क्या होता है?'
R.K.@ "स्कूल की मिट चुकी तमाम स्मृतियों में से एक यही लाइन बची रह गई। बाकी आज तक नहीं समझ पाया कि दस बारह सालों तक स्कूल क्यों गया?"

"ब्लैक बोर्ड तो कब का सफेद हो चुका है।"
- ये पढ़कर कुछ पुरानी स्मृतियाँ ब्लेक & व्हाईट मे ताजा हो गई. १२ साल हॉस्टल मे गुजारे. सपने मे भी कभी ग्लोबल आइडिया नहीं आया!
'The world is a global village' theory जेहन मे नहीं उतरती है.
- गाँव के लोग बेचारे ग्लोबल होने की दौड़ मे शहर की तरफ भाग रहें हैं। वो अकेला रह गया है. बाकि बचे लोगों की भी यही हालत है।
सवजी चौधरी, ९९९८० ४३२३८, अहमदाबाद.

dipu said...

An educational system isn't worth a great deal if it teaches young people how to
make a living but doesn't teach them how to make a life.
-
padha tha kahi.

n i am fan of yrs, we will meet soon.