ल लखनऊ या व से वखनऊ


हर शहर की अपनी सीमेंट संस्कृति होती है। लखनऊ की अवध संस्कृति में कोठी कल्चर घुल मिल गया है। गोमती नगर,इंदिरा नगर,विकास नगर में फैला लखनऊ कोठियों से भरा नज़र आता है। कतार में कोठियां खड़ी कर दी गई हैं। अठारह सौ से सत्ताईस सौ वर्ग फुट के दायरे में बनी इन कोठियों का अलग पैटर्न नज़र आता है। शायद ही किसी शहर में इस तादाद में कोठियां नज़र आएंगी। दिल्ली मुंबई से तुलना करें तो बिल्कुल अलग। गगनचुंबी इमारतों वाले महानगरों में एक महानगर ऐसा भी है जहां गगनचुंबी इमारतों का चलन अब शुरू हो रहा है। उत्तर भारत में दिल्ली के बाद लखनऊ को ही महानगर का दर्जा हासिल है।


सबसे पहले इंदिरा नगर बसा था। इसका पुराना नाम राम सागर मिश्र नगर था। कांग्रेस की सरकार ने बदल कर इंदिरा नगर कर दिया। भूतनाथ मार्केट इंदिरा नगर में ही है। इंदिरा नगर में धीरे-धीरे अपार्टमेंट बनने की शुरूआत हो हो गई है। कई सरकारी कर्मचारियों और मध्यमवर्ग का ठिकाना है इंदिरा नगर। इसके बाद बसा गोमती नगर। अपने आप में एक शहर। दो-दो रेलवे स्टेशन है। मेरे मित्र सर्वेश तिवारी ने बताया कि यहां बीस खंड हैं। सभी खंड के नाम व से शुरू होते हैं। विराम, विकल्प,विशेष,विनम्र खंड। दिल्ली मुंबई की तरह गार्डेनिया फार्डेनिया नहीं हैं। जिस किसी अधिकारी का यह फैसला होगा उसे साधुवाद दिया जाना चाहिए। कम से कम उसने अपने अफसरों को व से शुरू होने वाले कई शब्दों और नामों को ढूंढने का काम तो दिया। यह अधिकारी चाहे तो किसी हिन्दी न्यूज चैनल में भी नौकरी कर सकता है। वहां के स्वयंभू अनुप्रास संपादकों की छुट्टी कर देगा। एक बार गोमती नगर घूम कर डेस्क पर जाए तो लखनऊ को वखनऊ लिख देगा। विकास,विवेक और विनय खंड ज्यादा हाई प्रोफाइल माने जाते हैं। यहां ज्यादातर नौकरशाही के राजा लोग रहते हैं। आईएएस,आईपीएस टाइप के। इसके बाद आता है विकास नगर। विकास नगर का अंदाज़ शाही तो नहीं लगता मगर गोमती नगर का अलग से अध्ययन किया जाना चाहिए।



इन तीनों नगरों की कोठियों का रंग रोगन देखना चाहिए। एक पेंटर ने बताया कि व्हाईट इमल्सन की खूब डिमांड है। जितने भी रंग बेचता है उसका पचासी फीसदी हिस्सा व्हाई इमल्सन होता है। नब्बी फीसदी कोठियों की बाहर से रंगाई सफेद रंग में ही हुई है। सात आठ कोठियों के बाद हरे या नीले या पीले रंग की भी कोठिया नज़र आती है। इन सबकी बनावट का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। सभी कोठियां एक दूसरे से सटी हैं। किसी ने अगल बगल ज़मीन नहीं छोड़ी है। अगल-बदल खिड़कियां नहीं हैं। दीवारों से मकान डब्बे की तरह बंद है। कई कोठियों में गुंबद बनाने का चलन है। कारण साफ नहीं हुआ मगर अंदाज़ा लगा कि लखनऊ की नवाबी संस्कृति का बचा खुचा माल इन कोठियों की छतों तक चला आया है। एक तरह का पावर सिम्बल लगता है। कोठी को संसद या विधानसभा की तरह बनाकर रहने में अलग पहचान मिलती होगी। वैसे ज्यादातर कोठियों के नक्शे सभी मकानों से लिये दिये गए लगते हैं।



लखनऊ में पली बढ़ीं पत्रकार प्रतिभा कटियार कहती हैं कि जिसे भी कोठी बनानी होती है वो एक बार गोमती नगर का चक्कर लगा ही आता है। नक्शा मिल जाता है। इतने आर्किटेक्ट तो हैं नहीं और कोठियों की कितनी डिज़ाइन बन सकती है। लखनऊ में गोमती नगर की कोठियों की इतनी हैसियत तो बन ही गई है। मुझे भी लगा कि अगर इन मकानों के छज्जे, गुंबदों और मीनारों का सर्वे करायें तो सबकी एक-एक कैटगरी बन जाएगी। सब मकान एक दूसरे से कुछ लिये हुए हैं।

सारी सजावट सामने से की गई है। क्योंकि मकान तीन तरफ से बंद है। घिरा हुआ है। इसलिए सारा ज़ोर सामने लगा दिया गया है। सामने के ही हिस्से में डिजाईन निकाली गई है। स्पेस का आभास होता है। बालकनी बड़ी है। सीढ़ियां चौड़ी हैं। खंभे लगे हैं। लगता है कि किसी सेठ का मकान है। भले हो न हो लेकिन कोठी संस्कृति को धक्का इतना गहरा है कि सारी कोठियां अगर एक नज़र से देखी जाएं तो एक ही लगती हैं। इनती कोठियां दिल्ली वाले को परेशान करती हैं। दिल्ली में पंजाबी बाग या ग्रेटर कैलाश या फिर फ्रैंड्स कालोनी ही हैं। लेकिन इन कालोनियों से सौ गुना ज्यादा कोठिया लखनऊ की इन कालोनियों में हैं।


मगर समय के दबाव में कोठियां बदल रही हैं। रहने वाले कम हो गए हैं। कुछ ने कोठियों में एटीएम खुलवा दिये हैं तो कुछ ने क्रेश और सलून। हर शहर के लोग अपने शहर को कम समझते हैं। उन्हें लगता है कि यहां कुछ नहीं है। इसलिए बच्चे भी पढ़ाई के समय से ही घर से बाहर रहने लगे हैं। नौकरियां कम है इसलिए भी नौजवान नहीं रहते। नतीजा कोठियां खाली हो रही हैं। इसलिए अब लोग अपार्टमेंट की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। कुछ तस्वीरें भी लगा रहा हूं आपके लिए ताकी पैटर्न समझ में आ सके।

20 comments:

दीपक बाबा said...

हर शहर अपनी पहचान बदल रहे हैं...... और लखनऊ इसका अपवाद नहीं है.......


मेरे ख्याल से.

प्रवीण पाण्डेय said...

नगरों का बदलाव जिस गति से हो रहा है, पुराने लोग कहानियों में बताया करेंगे।

sushant jha said...

बढ़िया लेख। किसी सभ्यता को भोजन,वस्त्र और आवास के अध्ययन के जरिये ही सबसे बढ़िया तरीके से आंका जा सकता है। लखनऊ को देखकर लगता है नवाबों का युग अभी खत्म नहीं हुआ....!

अजित वडनेरकर said...

पसंद आया।

Gaurav said...

ये सब तो ठीक है रविश जी,
पर हम तो आपसे निरा राडिया पे आका विचार देखना चाहते है. बिना उसके सब बेकार है.

gaurav

प्रबल प्रताप सिंह् said...

parivartan sansar ka niyam hai...!!

aniruddh dwivedi said...

गोमतीनगर मेरे सपनों का शहर है.जीना यहाँ मरना यहाँ,इसके सिवाय जाना कहाँ.

aniruddh dwivedi said...
This comment has been removed by the author.
amitesh said...

hindi ki patrkarita me is tarah ki reporting ka abhaaw hai...ek shailibaddh shahar ki badal rahi shaili ka aapka yah adhyyan laazawaab hai. lekin main ise sirf shuruaat man rahaa hun.

Rahul Singh said...

इस मामले में लखनउ, महानगरों की राह पर है और बाकी के शहर लखनउ की राह पर. गुंबद और सफेद रंग खास लगा.

Arvind Mishra said...

कोठेवाले ही हैं कोठेवालियां नहीं ! बढियां अन्तरंग वखनऊ कथा !

MANISH said...

vakhnaw- ek achcha qasba........nice post...

Varsha said...

Good Afternoon sir. Kya aap in dino Vucknow ki sher ker rhe hai. Bahut hi Achchi report hai sir.aise meine lucknow visit kiya hua hai.

Mahendra Singh said...

Ravish ji, Mera parivar bhi Vinaykhand main hi rahta hai. Blog main photo dhekkar lucknow ka vichran ho gaya

सुशीला पुरी said...

Indira nagar ke bhutnaath market ke paas hi ham bhi hain ! ... mere shahar me QSBA kab aakar chla gaya ?
sirf KOTHIYON ki baat ki aapne ...
unme rahne waalon ke baare me kab likhenge Rvish ji ?... 'wkhnau' ka prayog sundar hai !!!

ravishndtv said...

sushila ji

shaadi mein gaya tha. time nahi mila. varna kitna mazaa aata mulaaqaat ho jaatee. milenge zarur.

mujhe sheharon ko ghoorne kee beemaari hai. kya karen...

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

तस्वीरें अच्छी है, पर ये सत्य नहीं है कि दिल्ली के मुकाबले लखनऊ के गोमती नगर में ज्यादा कोठियां है। दिल्ली को पता नहीं लोग केवल साऊथ दिल्ली तक ही क्यों मान लेते है और कोठियों को देखना हो तो मॉडल टाऊन,गुंजरावालन टाऊन,अशोक विहार,शालीमार बाग,राजौरी गार्डन,जनकपुरी,रोहिणी,गोल्फ्स लिंक,करोल बाग,पटेल नगर,पश्चिम विहार,सरस्वती विहार,पीतम पुरा...अभी लिस्ट बहुत बड़ी है। दिल्ली-दिल्ली है...

Meenakshi said...

Mein Lacknow ke Gomti Nagar mein uss samay se basi hun jab wahan sirf do makan hotey theyy. Yeh 1986-87 ki baat hai aur mein visheshtah Vivek Khand ki baat kar rahi hun , jo sabse pehle basa thaa. Kaash Apne wahan ki bhi kuch photos daali hoti to mera makaan jo ki pehla safed makan thaa appko dikhta. Khair Lucknow ko maine pichle 27 saal mein kuch bigadte aur kuch bante dekha hai. Usme sabse vishesh baat yeh hai ki Gomti Nagar ek alag shahr ke roop mein ubhara hai - jaise ki aapka Gurgaon ya Noida. Wahan fun republic aur wave jaisi malls hai to Big Bazaar aur Spencers bhi hai. Farak itna hai ki ussme abhi bhi Awadhi tehzeeb hai. Yahan ke attendents apko personal attention dete hai aur frequent shoppers honey ke natey ek gharelu rishta banate hai jo pehle apke nukkad ke kirana store se hua karta thaa. Woh bhi his mall culture mein survive kar raha hai kyunki chotey shehar ki mansikta he anusaar abhi bhi log kirana stores se ration khareedna pasand karte hain. Puraney Lucknow jaisey Chowk, Moti Nagar, Rajendra Nagar or Aminabad ke muqable Gomti Nagar bhaley hee modern dikhta ho, par uski atma abhi bhi Avadhi hai. Kyunki wahan abhi bhi purani sanskriti zor pakde hai aur neo modernism se grast nahi hai. Agli baar aap Lucknow aaye to Vivek Khand 2 mein, pani ki tanki ke paas corner wala safed makan zaroor visit karen.

hunkar said...

lucknow ke bunglo ke bare mai ap ka blog kafi acha laga,please ab lucknow ke sadharan basti ke bare me ya pure India ke bare mai apniu rai pesh kare.

Dr.Vimala said...

"हर शहर के लोग अपने शहर को कम समझते हैं "-बात लग गयी रवीशजी ! और बातों में तो हम अपने लखनऊ को ' वख्ननऊ ' नहीं बुज़ुर्गों की दुआ समझते हैं लेकिन आज आपने वो नज़र अता कर दी जो अपने शहर पर गुमान करने का एक और जरिया दे गयी -शुक्रिया |