लुंगियां ही लुंगिया


जब से हमारा बरमुडाकरण हुआ है,देहाती से शहरी बने लोग लूंगी को भूल रहे हैं। दिल्ली आए प्रवासियों ने लूंगी का त्याग किया है। ट्रैक सूट,हाफ पैंट या बरमूडा। पटापटी का पजामा(धारीवाला) या अंडरवियर तो ग़ायब ही हो गया। इसके बाद भी लूंगी बड़ी आबादी का दैनिक पहनावा है। पिताजी बहुत शौक से पहना करते थे। गांव से कोई आता था तो बताते थे कि आपके लिए भी लाया हूं। एकदम फैन्सी और यूनिक। चेक वाला चलल बा त ब्लूका में हरिअरका लाइन वाला। लूंगी पर बहुत आख्यान चलता था। जब से हम महानगरीय हुए हैं,कपड़ों के एक्सक्लूसिव दुकान भूल गए हैं। मॉल में जाते हैं और सेल में लगे ट्रैक सूट को ले आते हैं। घर में हर वक्त स्मार्ट और दौड़ चलने की मुद्रा में खूद को बकलोल बनाए घूमते रहते हैं। भागलपुर में मदीना लुंगी स्टोर पर नज़र पड़ी तो सोचा कि लूंगी का हाल-चाल लेते हैं।





आम लोगों की लूंगी अस्सी से नब्बे रुपये की आती है। दुकानदार ने बताया कि ज्यादातर लुंगियां मद्रास से बन कर आती है। मुसलमान ज्यादा पहनते हैं मगर हिन्दुओं में गरीब या साधारण लोग। उसके पास सबसे महंगी लूंगी ५०० रुपये की थी। तस्वीर में जो हरी वाली ब्लू वाली लूंगी है वो चार सौ नब्बे की है और सफेद वाली दो सौ नब्बे की। कोलकाता से एक लूंगी आती है जिसे बड़ा लोग पहनता है,वो नौ सौ रूपये की है। मगर भागलपुर में हम नहीं रखते हैं। खरीदार नहीं है उसका।

14 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर वर्ग के लिये लुंगी।

ravish kumar said...

bilkul...lehariyaa lungi...

ye bojh mere mann se utar kyu nahi jata... said...

रविश सर..आप कहां-कहां चले जाते हैं?? आपके लिए ये लाईन उल्टी करनी पड़ेगी..वैसे तो है कि जहां ना पहुंचे रवि..वहां पहुंचे कवि लेकिन आपके लिए ही ये कहा जा सकता है कि जहां ना पहुंचे कवि..वहां पहुंचे रवि..लाजवाब..ऐसे ही ख़ुद को आज़माते जाईये और हमे सीखाते जाईये..

सतीश पंचम said...

बढ़िया लगी यह लुंगी पोस्ट।

वैसे मैं भी घर में लुंगी पर ही रहता हूँ। श्रीमतीजी खोपचन देते रहती हैं कि तनिक गत से कपड़ा तो पहन लो....कोई मेहमान ही आ जाय अभी.......लेकिन अपन हैं कि वही लुंगी पहने-पहने प्रधानमंत्री मनमोहन और राष्ट्रपति बराक ओबामा सब से मिल लेते हैं, भले ही टीवी पर ही क्यों न मिल रहा होउं :)

ये अलग बात है कि वह लोग मुझसे नहीं मिलते।

सोचते होंगे जिसके पास लुंगी बदल कर पैंट पहनने तक की फुरसत नहीं उसके पास हमसे मिलने की फुर्सत कैसे होगी :)

Rahul Singh said...

मजेदार लगा लुंगी और कैप का काम्बिनेशन, सलामत रहे सदा.

निखिल आनन्द गिरि said...

तो भाइयों और बहनों, लीजिए पेश है वो फिल्मी नगमा जिसमें शायद पहली (और आखिरी बार) लूंगी आई थी....
''अजी लूंगी बाँध, के करें गुज़ारा भूल गये पतलून ''...तुम्हारी याद सताती है...जिया में आग लगाती है...
हाहाहा...

ravishndtv said...

ख़ूब मज़े ले रहे हैं आप। सही है

निखिल आनन्द गिरि said...

दरअसल, आप जिस स्कूल के हेडमास्टर हैं, हम भी उसी सोच और तहज़ीब के नर्सरी किड हैं....तो मज़ा आता है, आपके सुर में थोड़ा सुर मिलाय के...

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

रवीश जी , हर तरह की लुन्गिया मिल गयी देखने को.........आजकल तो मेहमानों के लिए भी लोग घरों में एक्स्ट्रा बरमूडा रखने लगे है.जैसे लगा कोई विलुप्त प्राय कपडे पे ये पोस्ट है.लुंगी के ऊपर ये पोस्ट बड़ी अच्छी लगी.

sanjay said...

रविश सर...
"लुंगियां ही लुंगिया" पोस्ट पढ़कर सोचा (मुन्नीने) सॉरी लुंगीने कब कब चर्चे जगाये ये देखू तो सही। तब ये आलेख मिला:-

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का व्यंग्य : लुंगी महिमा बनाम लुंगी पर एक शोध प्रबंध
http://www.pressnote.in/joke_98274.html
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वैसे एम.पी. विधानसभा के विशेष सत्र मे कांग्रेस विधायक गोविंदसिंह राजपूत लुंगी को चर्चे में लाये थे। राजपूत लुंगी-बनियान एवं खाली बालटी लेकर मुख्य द्वार पर पहुंचे तब उनके वेशभूषा ने सारे विधायकों एवं मीडियाकर्मियों का ध्यान आकर्षित किया। राजपूत हाथ में बाल्टी एवं मग्गा लिए हुए थे और लुंगी पहने थे।
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मुझे हॉस्टल निवास का लाभ १२ साल मिला है। कभी लुंगी भी मेरे कपड़ो के फेमिली का हिस्सा बनकर रहती थी। अब लुंगी को बनवास मिला है और बरमुडे ने(तानाशाही कर के) कब्ज़ा ले लिया है। सवजी चौधरी, अहमदाबाद-९९९८० ४३२३८.

घनश्याम मौर्य said...

रवीश जी बिलकुल सही कह रहे हैंा कभी मैं भी घर में लुंगी पहना करता था, हालांकि कभी इसे पहनकर घर की चहारदीवारी से बाहर नहीं निकला करता थाा लेकिन अब तो पायजामा या बरमूडा का साम्राजय हो गया हैा शायद इसलिए कि उसे पहन कर आसपास नुक्‍कड् या चौराहे की दुकान तक या चहलकदमी करने जाया जा सकता हैा वैसे आपकी पोस्‍ट को पढ्कर फिल्‍म 'अग्निपथ' के मिथुन चक्रवर्ती याद आ गये, जिन्‍होंने फिल्‍म में क़ष्‍णन अयर नामक दक्षिण भारतीय व्‍यक्ति का किरदार निभाया हैा

pratibha said...

aap bhi kya kya likhte hain....

एस.एम.मासूम said...

लुंगी के बारे मैं बहुत कुछ सीख गया..
.
सामाजिक सरोकार से जुड़ के सार्थक ब्लोगिंग किसे कहते
नहीं निरपेक्ष हम जात से पात से भात से फिर क्यों निरपेक्ष हम धर्मं से..अरुण चन्द्र रॉय

INDIA UNINTERRUPTED/SABKI KAHANI said...

mujhe south Indian loongi pasand hai..kuch dino pehle meine pondychery ki loongi khareedi lekin wife ne uska kurta banwa liya..