बारिश एक भयंकर इमेज संकट से गुज़र रही है

दिल्ली और मुंबई की बारिश का राष्ट्रीय चरित्र हो गया है। चार बूंदें गिरती हैं और चालीस ख़बरें बनती हैं। राष्ट्रीय मीडिया ने अब तय कर लिया है जो इन दो महानगरों में रहता है वही राष्ट्रीय है। मुझे अच्छी तरह याद है,बिहार की कोसी नदी में बाढ़़ आई। राष्ट्रीय मीडिया ने संज्ञान लेने में दस दिन लगा दिए, तब तक लाखों लोग बेघर हो चुके थे। सैंकड़ों लोग मर चुके थे। राहत का काम तक शुरू नहीं हुआ था। वो दिन गए कि मल्हार और कजरी यूपी के बागों में रची और सुनी जाती थी। अब तो कजरी और मल्हार को भी झूमने के लिए दिल्ली आना होगा। वर्ना कोई उसे कवर भी नहीं करेगा।

बारह जुलाई को जब दिल्ली में बारिश आई तो लोग घंटों जाम में फंसे रहे। पांच-पांच घंटे तक लोग सड़कों पर अटके रहे। वैसे आम दिनों में दिल्ली में कई जगहों पर दो से ढाई घंटे का जाम होता ही है। लेकिन यह जब दुगना हुआ तो धीरज जवाब दे गया। ज़रूरी भी था कि इस दैनिक त्रासदी को कवर किया जाए लेकिन जब यही बारिश जयपुर में आती, भोपाल में आती तो कवर होता। क्या जयपुर और भोपाल की बारिश के लिए कोई न्यूज़ चैनल अपना तय कार्यक्रम गिराता। मुझे नहीं लगता है।

उसी तरह दिल्ली की गर्मी और मुंबई की उमस एक महत्वपूर्ण ख़बर है। मुंबई की लोकल में ज़रा सा लोचा आ जाए, न्यूज़ चैनलों की सांसें रुक जाती हैं। पटना में कोई मालगाड़ी पलट जाए और घंटों जाम लग जाए तो कोई अपना ओबी वैन नहीं भेजेगा। दिल्ली में डीटीसी बस का किराया एक रुपया बढ़ जाए तो न्यूज़ चैनल बावले हो जाते हैं। किसी को पता नहीं कि जयपुर में किस तरह की आधुनिक बसें चल रही हैं। अहमदाबाद में बीआरटी कॉरिडोर ने किस तरह दिल्ली की तुलना में कामयाबी पाई है। दरअसल ज़रूरी है कि पाठक और दर्शक को उनके अधिकार के बारे में बताया जाए।

राष्ट्रीय मीडिया का चरित्र बन पा रहा है न बदल पा रहा है। सारे अंग्रेज़ी चैनलों ने बारिश की त्रासदी को सीमित मात्रा में दिखाया। हिन्दी चैनलों ने जितनी देर जाम उतनी देर ख़बर के पैटर्न का अनुकरण किया। दिल्ली के लोगों की ज़रूरतों को भी अनदेखा नहीं कर सकते। लेकिन हर बार हंगामा दिल्ली को लेकर ही क्यों। दिल्ली में स्थानीय न्यूज़ चैनल तो हैं ही। फिर भोपाल और जयपुर के लोग किसी राष्ट्रीय चैनल को देखने में अपना वक्त क्यों बर्बाद करें। वैसे भी कौन सी राष्ट्र की ख़बरें होती हैं।

एक नुकसान और हुआ है। महानगरों में बारिश एक समस्या का रूपक बन गई है। जिसके आने से जाम लगता है। सड़कें टूट जाती हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को राउंड पर निकलना पड़ता है। इसी बारिश में दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के जवान भींगते हुए रास्ते साफ कर रहे थे। कई जगहों पर सरकारी कर्मचारी काफी कोशिश कर रहे थे। लेकिन मीडिया ने इस प्रयास को दिखाया तक नहीं। किसी ने नहीं पूछा कि और कितनी लाख कारें सड़कों पर उतरेंगी। सिर्फ एकांगी तस्वीर पेश की कि ये जो बारिश आई है वो तबाही है तबाही। दिल्ली और मुंबई में बारिश का मतलब अब आनंद नहीं रहा। ट्रैफिक जाम के आगमन का सूचक हो गया है।

देश के ज़िलों में जाइये,बारिश होते ही लोगों के चेहरे में चमक आ जाती है। अब तो बारिश में झूमते किसानों की भी तस्वीर नहीं छपती। धान की रोपनी करने वाली महिलाओं की तस्वीरें गायब हो गई हैं। सड़कों पर पानी भरने के बाद उसमें नहाते बच्चों की तस्वीरें भी नहीं छपती हैं। याद कीजिए पहले इसी तरह की मौज मस्ती की तस्वीरें छपती थीं। दिखाईं जाती थीं। अब तो न्यूज टीवी ने बारिश को आतंकवादी बना दिया। धड़ाम से ब्रेकिंग न्यूज़ का फ्लैश आता है- दिल्ली में भयंकर आंधी। मुंबई में पांच घंटे से लगातार बारिश। लोकल ट्रेन ठप्प। दहशत होने लगती है कि हाय रब्बा जाने कौन सी आफत आने वाली है। यही हाल रहा तो कुछ दिनों के बाद दिल्ली और मुंबई की नई पीढ़ियां यकीन ही नहीं कर पायेंगी कि बारिश के मौसम में हम कजरी भी गाते थे। सावन के आने के इंतज़ार में झूला भी झूलते थे। वो सवाल करेंगे कि जब हम पांच घंटे जाम में हुआ करते थे तो कजरी कौन सुना करता था।

बारिश का मतलब अब शहरी परेशानी बन कर रह गया है। नगर निगमों की नाकामी और घूसखोर इंजीनियरों की पोल खोलने का एक लाइव इवेंट। लेकिन क्या मीडिया उन इंजीनियरों का पीछा करता है? बताता है कि फलां सड़क का ठेकेदार कौन था, इंजीनियर कौन था। वो बस शोर करता है। बारिश आई और तबाही आई। दिल्ली की सड़कों में बने गड्ढे से चैनल वाले हैरान क्यों हैं। क्या बारिश ही ज़िम्मेदार है? एक इंजीनियर ने कहा कि बारिश से हम दुखी नहीं होते। रिपेयरिंग का नया बजट मिल जाता है। कमीशन खाने के लिए। इस देश की म्यूनिसिपाल्टी को कोई सुधान नहीं सकता। जब भी आप बारिश की ख़बर देंखें. टीवी बंद कीजिए और छत पर जाइये। ये मार्केंटिंग का दौर है। बारिश एक भयंकर इमेज संकट से गुज़र रही है। करतूत घूसखोरों और नकारा प्रशासन की और बदनाम बारिश हो रही है। प्लीज़ बारिश की इन मासूम फुहारों को बचाइये।
(this article was published in rajasthan patrika)

30 comments:

Parul said...

sir..sahi mayne mein बारिश का मतलब नगर निगमों की नाकामी और घूसखोर इंजीनियरों की पोल खोलने का एक लाइव इवेंट।बारिश एक भयंकर इमेज संकट से गुज़र रही है। करतूत घूसखोरों और नकारा प्रशासन की और बदनाम बारिश हो रही है। प्लीज़ बारिश की इन मासूम फुहारों को बचाइये।
टीवी बंद कीजिए और छत पर जाइये।
ye article dil mein ghar kar gaya hai..

googleUncle said...

क्या कहे, त्रासदी है, दिल्ली में झमाझम बारिश, खबर आती थी और हम खिड़की से फुहारों को देखकर कनफुजिया जाते थे की न्यूज़ का विश्वास करे की अपनी ऐनक वाली आँखों का :),
आप लिखते बहुत अच्छा है, बोलते उससे भी अच्छा है, मेरी बधाई स्वीकार करे!
कॉन्वेंट स्कूलों में extrimist विचारधारा के लोग जो बच्चो को बिंदी,चूड़ी अदि पहनने पर रोक लगाते है, उनपर भी एक रिपोर्ट कीजिये कभी,पोले तो उनकी भी खोलना बनती है,है न ?(फ्रांस के बुरका बंद कानून से सम्बद्ध)

Aadarsh Rathore said...

अपनी ही कमियां हैं, दोष बारिश के मत्थे मढ़ दिया जाता है.

Meenakshi Kandwal said...

वाह क्या बात है.. बहुत सारे लोगों की तरह मुझे भी बारिश बहुत अच्छी लगती है.. लेकिन पिछले कुछ वक्त से मीडिया बारिश को लेकर जो भी बवाल कर रहा है उससे कई बार दुख होता था.. बारिश के तमाम साइड इफेक्ट होने के बावजूद मैं हमेशा यही दुआ करती हूं कि दिल्ली में जब भी बारिश हो बस भीगने का मौक़ा मिल जाए :)

kuldeepjain said...

२००४ मै उदयपुर में था परिवार के साथ. बारिश नहीं हो रही थी और सब गर्मी से परेशान थे. सबके दिल में एक बात की बारिश हो जाये. उदयपुर से निकलकर माउन्ट अबू घुमने का प्लान था .. निकलने के पहले उदयपुर के एक मंदिर में प्रार्थ्रना की की भगवन अच्छी बारिश करा दे. और साहबान क्या बारिश हुई थी. बस में सवार तमाम ५० लोगो ने धुआधार बारिश में माउन्ट अबू घुमा था और किसी के चेहरे पर नाराज़गी नहीं बल्कि उत्साह का वो मंजर था जो आज भी भुलाये नहीं भूलता.
आज बारिश होने की खबर उत्साह से लबरेज नहीं बल्कि व्यस्था में खामियों को उजागर करने वाली घटना हो गयी है.

ajit gupta said...

अब हम क्‍या लिखें, आप लोग ही सितम ढा रहे हैं और आप ही जनता के आँसू भी पोछ रहे हैं। बरसात को तो विलेन बनाकर रख दिया है मीडिया ने। ऐसा लग रहा है कि इस देश की जितनी दुर्दशा की जा सकती है उसका एक-एक पहलू ढूंढकर उस पर काम किया जा रहा है। लेकिन यह मीडिया भूल जाता है कि यह देश उनका भी है। चलो कोई तो सच बात लिख रहा है चाहे ब्‍लाग पर ही सही।

सतीश पंचम said...

रवीश जी,

कोसी की रपट को मैने भी बड़े ध्यान से देखा था। और हद तो तब हो रही थी जब बाढ़ राहत केन्द्र का उद्धाटन होने के पहले तक राहत कार्य शुरू न करने जैसी बकलोलई थी।

इस बकलोलई पर एक पोस्ट चेंपी थी - उसका अंश है कि -

बाढ राहत केंद्र में मधेपुरा के बोदर ने अपनी टांग खुजाते हुए कहा - ससुर पेट चुरूर मुरूर कर रहा है, कुछ बांट ओंट नही रहे हैं। सहरसा से आये रामलवट यादव ने कहा - जी तो हमारा भी ठीक नहीं है......आज चार दिन हो गया पेट में एक दाना नहीं गया है, जाने का कर रहे हैं ई राहत उहत वाले कि अभी तक किसी को अंदर केंद्र में जाने ही नहीं दे रहे। इतने में शोर हुआ कि नेताजी आय गये हैं - अब सब कोई अपना पत्तल - कुल्हड, गिलास- उलास संभाल लिजियेगा, कोई किसी को धक्का उक्का न दे, और हाँ जैसे ही नेताजी फीता काटें तो सब लोग ताली जरूर बजाइयेगा।

रामलवट समझ गये कि क्या होने वाला है.......मन ही मन बोले.......अरे तोरी बहिन क भकभेलरू ले जाय........ससुर अबहीं घाटन करेंगे तब जाकर दाल ओल बंटेगा।


लिंक यह रहा ।

http://safedghar.blogspot.com/2008/09/blog-post_06.html

वैसे बारिश का आनंद तो यहां मुंबई में लिया ही जा रहा है लेकिन शायद आपको पता हो कि यहां समुचित बारिश होने के बावजूद भी यहां मुंबई के नगरसेवकों ने कृत्रिम बारिश करवाने की डिमांड की है ....( हिडन फैक्ट - जब बरसात के मौसम में बारिश होगी तो किसे पता असली बारिश हो रही है या कृत्रिम.....पैसा गया LKD :)

समझौ कि नाहीं :)

सतीश पंचम said...
This comment has been removed by the author.
सतीश पंचम said...
This comment has been removed by the author.
सतीश पंचम said...
This comment has been removed by the author.
सतीश पंचम said...
This comment has been removed by the author.
सतीश पंचम said...

रवीश जी,

कमेंट करने में आपके यहां दिक्कत हो रही थी और इसी चक्कर में एक ही कमेंट चार पांच बार पब्लिश हो गया.....लगता है गुगल के ब्लॉगर सेवा को भी मीडिया रोग लग गया है....एक ही कमेंट को मीडिया वालों की तरह चार पाच बार दिखा रहा है :)

DEEPAK BABA said...

bhai hume to bahut anand aata hai, jab bhi barish aati hai, koshish apne talaab par chale jaate hain, 2 peg laga kar barish mein ghumne ka mazza hi kuch or hai - jo 5-sitara hotel mein beth kar peene wale kya jane.............

DEEPAK BABA said...

bhai hume to bahut anand aata hai, jab bhi barish aati hai, koshish apne talaab par chale jaate hain, 2 peg laga kar barish mein ghumne ka mazza hi kuch or hai - jo 5-sitara hotel mein beth kar peene wale kya jane.............

Tushar Mangl said...

baat to market ki hi hai na sir.

Jaisi demand, waisa hi dikhayenge.

Media ko waise, itna market oriented nai hona chahiye.

PrakashSinghRathod said...

RAVISHJI,

BADHIYA ADAMI BADHIYA HI LIKHATA HAI,AAPKO DHANYABAD KYU DU?

MERI EK SHIKAYAT HAI AAPSE AUR YAHA KE BLOGER SE KI SARE KE BLOG PE MAINE JA KE DEKHA HAI 90 PERCENT PATRAKARITA SE HAI.


AAPKE LEKH HAMARE LIYE HAI NA KI PATRAKARO KE LIYE.


KUCH KIJIYE KI AAM ADAMI BHI LEKH KO PADHE AUR VICHARE...........


APAKA
OPSINGH

sk said...

jab har chhed me polythene ghusi ho ,to kya kare bechara nagar nigam.

विनीत कुमार said...

वो सवाल करेंगे कि जब हम पांच घंटे जाम में हुआ करते थे तो कजरी कौन सुना करता था।..ऐसे समय में कजरी गानेवाला जरुर या तो बेउडा रहा होगा या फिर जमाने से उलट सबसे बड़ा अय्याश.

Girdhari khankriyal said...

Daelhi aur mumbai ki barish ko to media nakarkhane ke liye tmaga deta rehta hai. media chilakar itishree karne mein laga hai. yeh to vehi baat hai chor chor mausere bhai. nagr nigam, sarkari karmchari ke saath saath media bhi bhrast hai. isliye barsh ko badnaam karte hai.

I think said...

sahi kaha aaj se 5-6 saal pahle school se bhag jaate the baaris me nahane ke liye .. or jaha paani mila .. chahe wo underpaas ke neeche hi bhara ho.. school dress utaar kood jate the.. or aaj bhi news na dekh kar.. baaris me nahana jyada pasand karte hain... koi baaris nhi chhodte.. chahe poore bheege ya nahi,,..mai to manta hu baris se jaam lagega sabko pta hai.. toh masti kuo kharab kare.. pahle masti kar le fir jaam ka ilaaj dhoondhenge par baaris ki tabahi ki news nhi dekhenge..

I think said...

sahi kaha aaj se 5-6 saal pahle school se bhag jaate the baaris me nahane ke liye .. or jaha paani mila .. chahe wo underpaas ke neeche hi bhara ho.. school dress utaar kood jate the.. or aaj bhi news na dekh kar.. baaris me nahana jyada pasand karte hain... koi baaris nhi chhodte.. chahe poore bheege ya nahi,,..mai to manta hu baris se jaam lagega sabko pta hai.. toh masti kuo kharab kare.. pahle masti kar le fir jaam ka ilaaj dhoondhenge par baaris ki tabahi ki news nhi dekhenge..

शोभना चौरे said...

अजीतजी की बात से सहमत |और हाँ हम तो बारिश में चाट पर गये और खूब भीगे भी और पकोड़े बनाये और खाए भी बस सावन लगने दीजिये झुला भी झूलेंगे कजरी भी गायेगे और पुए भी खायेगे और दूरदर्शन पर रिमझिम फुहारे भी देखेगे |

sushant jha said...

Rain is playing the role of true opposition...and exposing the govt every year...!

saurav said...

ravish sir
kamaal likha hai aapne........
bahut kuch sikhne ko mil raha hai aapke articles to padh kar

neha said...

sahi kaha apne sir...itne salo se jis barish k mausam ko hum chhote shahro mein enjoy kiya karte the bade shahro mein ajane par achanak vo mausam khatarnak lagne laga...agar bahar jane ki soche bhi to ye news channel vale pehle hi dara dete hai or bahar nikalne hi nahi dete...delhi-mumbai k jaam se hatkar kabhi to gaaon mein padne vale jhulo ko...savan k geet gati aurto ko aur lehlahate kheto ko bhi dikhaya kariye...asliyat kya h kabhi to bataya kariye...
-neha raghav

Ashish Saxena said...

apke qasbe me ghoomne ki adat si ho gai hai .barish par apne jo likha wo bilkul sach hai.sahi hai barish na jane kitno ki poll khol deti hai or ham isse anjan bane rahte hai.....
sawan k jhule .kagaj ki kashti or sadabahar filmi nagme is barish k chalte hi to hai.aaj jane kaha khote ja rahe hai ham inhe....ab waisi tip tip bunde jo sangit rachti hai.unhe shor kaha ja raha hai.media walo ko inhe b coverage karna chahiye jo chehre par khushi jyada mushkil kam lati hai wo barish hi to hai ..... aapke aalekh k liye badhaiya meri or se sir.

tushar said...

SAHI HAI SIR,
HAMARA KAM AAJKAL HAR GHATNA MAI KAMI DUNDHNA. AANAND TO LIFE SE GAYAB HI HOTA JA RAHA HAI.

SATH HI AAPKA YE LEKH BATATA HAI KI AAJKAL MEDIA KI NAZRO ME HINDUSTAN KEWAL MUMBAI AUR DELHI HI HAI.

NA UNHE U P DIKHAI DETA HAI NA CHATTISGARH,

CHATTISGARH ME JITNE JAWAN SAHID HUE HAI TAKRIBAN UTNE HI KARGIL ME.

MUMBAI BUM BLAST KA TO ITNA TUFAN MACHA PAR KYA USKA 10 % BHI HAMNE CHATTISGAR AUR JHARKHAND KE BARE ME SOCHA ???

Raman said...

sahi kaha aap ne. Pahle hum log barish ka dil khol keintjar karte the par ab aise imaje ban gaye hai ki 2 ghante bhi barish ho to man kaap jata hai.Par kya ye galti barish ki hai sochna padega.news channels ne aise image har cheez ko leke bana di hai sach kaha aap ne ki T.V. band kare aur chat per jaye.

anis said...

ravishji delhi me bhee ek delhi dehaat(rural) hai jiska na media sangyan leta hai or na prasashan. kiya karen?

anis said...

ravishji delhi me bhee ek delhi dehaat(rural) hai jiska na media sangyan leta hai or na prasashan. kiya karen?