70 की शोखियां,मदहोशियां और बेवकूफियां-फिल्म समीक्षा

वरदराजन, मैं उसकी स्मलिंग करता हूं जिसका इजाज़त सरकार नहीं देती। मैं उसकी स्मलिंग नहीं करता जिसकी इजाज़त ज़मीर नहीं देता। सुलतान मिर्ज़ा के रुप में अजय देवगन की संवाद अदायगी सत्तर के अमिताभ जैसी कशिश लिये तो नहीं थी मगर कम भी नहीं थी। मैंने जीने का तरीका बदला है तेवर नहीं। फिल्म के आखिरी सीन में अजय देवगन के नेताओं पर बोले हुए संवाद ने खूब तालियां बटोरी। ऐसे कई संवाद हैं जो वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई को देखने लायक बनाते हैं। महान फिल्म कहीं से नहीं हैं लेकिन मज़ेदार है। सत्तर का बेहतर कोलाज है। फिल्म नोस्ताल्जिया उभारने में कामयाब हो जाती है। मुमताज की तरह साड़ी लपेटे सुल्तान की हिरोईन प्रेमिका दिलकश अदायें बिखेरती हैं। इमरान हाशमी की गर्लफ्रैंड जब बॉबी वाली डिम्पल के कपड़े पहनती है और कहानी की डिमांड के अनुसार शुएब की आगोश में आती है तो वैशाली, गाज़ियाबाद के स्टार सिनेमा में पहली बार सिटी की आवाज़ सुनाई देती है। ठीक वैसे ही जैसे पटना के वीणा सिनेमा में बेताब में सनी देओल ने जब अमृता सिंह को अपनी तरफ खींच कर चूम लिया था। आजकल के सिनेमा में नायक कब नायिका को चूम लेता है, कब बिस्तर पर बिछी चादरों की तरह रिश्ते को बदल लेता है,वो भी कंपनी का मामूली मैनेजर बनने के लिए,रोमांस का रोमांच ही पैदा नहीं होता। टिकट का पैसा बर्बाद हो जाता है।

हिन्दी फिल्में बदल गईं हैं। बदलनी भी चाहिए। लेकिन कभी कभी पुरानी कमीज़ आलमारी से निकल कर जवान होने का अहसास पैदा कर देती है। फिल्म की एक और खास बात लगी। कहानी कहने का पुराना तरीका। फ्लैश बैक के सहारे। फिल्म की शुरूआत में पुलिस अफसर अपनी और सुल्तान मिर्ज़ा की कहानी बताता है। संवाद आराम से बोले जा रहे हैं।वो कहता चलता है कि सुल्तान मिर्ज़ा चेन्नई से आया था। सड़कों पर भीख मांगता था। वो बड़ा होता है। दुआ की चाह में और मुंबई शहर के प्यार में। स्मगलरों के किस्सों में अमीरी एक अजीब से बिन बुलाई गर्लफ्रैंड की तरह लगती है। पैसे की औकात नहीं होती। सुल्तान मिर्ज़ा रेहाना को कहता है कि कोयले की खान में काम करते करते उसे काले से बैर हो गया है इसलिए कमरे में हर चीज़ सफेद है। सड़क से गुज़रता है तो चौराहे पर बुढ़िया को सौ का नोट ऐसे थमा देता है जैसे लगता ही नहीं कि इस देश को मनमोहन सिंह की ज़रूरत भी है। सुल्तान एक आदर्श बनने लगता है लेकिन नैतिक चुनौती देने के लिए खूबसूरत और बांका जवाब वो पुलिस अफसर मौजूद होता है। थियेटर स्टाइल में उसकी एक्टिंग अच्छी लगती है। आम तौर पर फिल्मों में पुलिस अफसर का परिवार होता है। घर में इतज़ार कर रही और बालकनी में अपनी जुल्फों को सुखाती कोई नायिका ज़रूर होती है। लेकिन इस फिल्म में एक बांका जवान पुलिस अफसर बिना किसी जोड़े के घूमता है। उसका कोई लव सिक्वेंस नहीं है। कोई किस सीन नहीं है।

पूरी फिल्म क्लोज़ अप में शूट है। भावनाएं साफ साफ दिखती हैं। कैमरा किरदारों से हटता नहीं है। अजय देवगन को स्टाइलिश बनाता है। इमरान हाशमी ने भी अच्छा काम किया है। जिद्दी चोर से मुंबई का बादशाह बनने का सपना लिये जब वो घड़ी की दुकान खोलता है तो लगता है कि वो घड़ी बेचने के लिए पैदा नहीं हुआ है। शराब की बोतल लेकर अपनी प्रेमिका के पास चला जाता है। कहता है कि वही तो लाया हूं जिससे देखकर मेरे दोस्त सबसे ज्यादा खुश होते हैं। आज का काम कल करूंगा तो आज नाराज़ हो जाएगा। सत्तर की फिल्मों की यही खूबी थी। सबके डॉयलॉग होते थे। कुछ बेवकूफियां भी हैं। सुल्तान मिर्ज़ा को दयालु बनाने के लिए रेट की पटरियों को जोड़ने का सिक्वेंस। गृहमंत्री के बेडरूम में अमिताभ स्टाइल में सुल्तान मिर्ज़ा का पहुंच जाना। वो भी तब जब गृहमंत्री अपने घर में लेटा हुआ है। यहां निर्देशक को दिमाग लगाना चाहिए था। कम से कम किसी गेस्ट हाउस में किसी वैम्प की आगोश में गृहमंत्री को होना चाहिए था। फिल्म का अंत थोड़ा कमज़ोर है। सत्तर के लिहाज़ से अंत ऐसा होना चाहिए था जिसमें आप खुश हों। चलते चलते फिर से ताली बजा दें या ऐसा भावुक क्षण हो कि आप रो ही पड़ें। शुएब सुल्तान को मार तो देता है कि लेकिन कोई सिम्पथी नहीं बटोर पाता। लेकिन एक दर्शक के तौर पर हम खुश कर घर लौट आते हैं। गाने अच्छे हैं।

10 comments:

Prashant said...

बढ़िया टिप्पड़ी, मै अब सोच में डूब गया हूँ कि पिक्चर देखूं कि नहीं ? सारा कुछ तो खोल दिया आपने यहाँ.... आपने मेरा १५० रूपया बचाया या निर्माताओं का कटवाया...?

Ashok kumar said...

few days back i saw one reporting which was related to poor labors from bihar and up there way of living in delhi near kaperseda i like the way you presented . the best part of that was simplicity gud work pls. keep it up

Ashok kumar

prabhat gopal said...

acha vishleshan, sir..

गुड्डा गुडिया said...

नजरिये को सलाम, शानदार विश्लेषण | लेकिन प्रशांत जी ने बहुत छोटी बात कि "आपने मेरा १५० रूपया बचाया या निर्माताओं का कटवाया...?" प्रशांत जी ये १५० बचाने का मामला कतई नहीं है आप भी जायें देखें और अपना विश्लेषण सामने रखें |

Parul said...

ab to film dekhni hai bas :)

Tushar Mangl said...

mann kar aaya movie dekhne ka

googleUncle said...

पिक्चर की छोड़िये, बनती रहती है , लेकिन आपने रिक्शे पर बड़ा बेहतरीन कार्यक्रम बनाया ...हमारी बधाई स्वीकार करे...

क्या लिखू, क्या कहूं? said...

सर फिल्म तो कल मैंने भी देखी, फ्रेन्डशिप-डे के मौके पर अपने भांजे के साथ... फिल्म में गीत-संगीत-संवाद-सिनेमैटोग्राफी ही है जो आपको बांधे रखती है... पटरियों को हाथों से जोड़ने वाला सीन भले ही मजाकिया हो... लेकिन सुल्तान मिर्जा की हिरोइक इमेज यहीं से बनती है... गलत काम करने वाला अच्छा आदमी... गृहमंत्री के घर में घुसना ये बताता है कि अगर कोई सुल्तान था तो वाकई वो इतना मामूली भी नहीं हुआ था कि मुंबई के बाहर दिल्ली में किसी नेता के घर ना पहुंच सके... फिर सोचिए... जब अपने नेता घूंस खा सकते हैं तो उनके रखवालों को सुल्तान जैसा तो डरा भी सकता है और खिला भी सकता है... कुल मिलाकर सास-बहू वाली एकता से ऐसी फिल्म मिलना, कम से कम मेरे लिए तो चमत्कार है...

saurav said...

badhiya postmortem report diya hai sir aapne
film dekhne ke baad aage tippani karoonga
bihar ke gaaon se hoon to aur logon ke tarah saubhagyashali nahi ki first day first show dekh loon
aur to aur hamare to 10 rupees hi bachne ya barbbad hone hain

film jaisi bhi ho vishleshan padh kar maza aaya

MANISH said...

Aap aisi film bhi dekhte hain ab pata chala.mai to trailer dekh ke quality samajh gaya tha.waise samiksha apne must ki hai BIHARI BABU