दिल्ली का धारावी-कापसहेड़ा

मुझे भी अंदाज़ा नहीं था कि एक गांव की आबादी मज़दूरों के आने से दो लाख हो जाएगी। दस बाई दस फुट के सैंकड़ों कमरे बन जायेंगे. उन कमरों के अंधेरे में मज़दूरों की ज़िंदगी अब किसी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा नहीं है। एक सज्जन ने कहा कि यह भी देखिये कि सबको काम मिल रहा है। छह से सात हज़ार की नौकरी। बात चल ही रही है कि रिक्शे में सवार कई मज़दूर चले आ रहे है। कोई पैदल आ रहा है। सबके कंधे पर बैग लदे हैं। एक रिक्शे पर देखा कि एक जोड़ा अभी-अभी शादी करके लौट रहा है। दस बाई दस फुट के कमरे में अपने नए सपनों को आबाद करने।

दिल्ली हरियाणा सीमा पर लगा है,कापसहेड़ा गांव। यहां आते ही मज़दूरों की खूब चहल-पहल दिखती है। लोग चले जा रहे हैं। एक दूसरे से टकराते हुए। किसी के पास साइकिल भी नहीं है। ग़रीबी का एक स्तर है। ऐसा बहुत कम होता है कि एक जगह पर दो लाख लोग रहते हों उनमें से ज़्यादातर का जीवन स्तर कमोबेश एक जैसा होता है। मकानमालिक के बनाए सैंकड़ों कमरों के झुंड से जब नरमुंड के झुंड निकलते हैं तो लगता है कि किसी सिनेमा के बाद फ्रंट स्टॉल की भीड़ बाहर निकल गई हो।

दिल्ली सबकी है। सबको अपना लेती है। लेकिन दिल्ली की वही छवि टीवी पर दिखाई जा रही है जो नई दिल्ली है। वो दिल्ली जिससे भारत के सुपर पावर होने का अहसास जवान होता है। इस दिल्ली के कई अंधेरे कोने हैं जिन्हें ढूंढा जाना बाकी है। आप एक नज़र में देख सकते हैं कि कम से कम लोगों को काम तो मिल रहा है। लेकिन यह क्या काम है कि सिर्फ एक वक्त में रोटी सब्ज़ी से ज़्यादा का जुगाड़ नहीं हो पाता। एक मकान मालिक ने बताया कि वे अपनी तरफ से पानी के टैंक में क्लोरीन की टिकिया डाल देते हैं। कम से कम कीटाणुरहित पानी तो मिलेगा। बाकी लोग तो वो भी नहीं डालते। मैं नहीं कह सकता कि ये लोग साफ पानी पी रहे हैं या नहीं। एक औरत ने कहा कि यहां झोला छाप डाक्टरों को दिखाना पड़ता है। एमबीबीएस डाक्टर नहीं है। क्या करें। कापसहेड़ा में ही मेरी नज़र एक नर्सिंग होम पर प़ड़ी। बाहर भारी संख्या में मजदूर घेरा लगाकर बैठे हैं। मैं सोचता रहा कि तभी यहां के सारे मज़दूरों का स्वास्थ्य एक जैसा क्यों हैं। बीमारी से पतला है या काम से छरहरा है।

कमरों के भीतर झांक रहा था। फर्श पर चटाई। आइना। पुराना रेडियो, डीवीडी और एक टीवी सेट। तीन चार बैग रखे हैं जो हमेशा वापस लौटने की मुद्रा में तैयार दिखते हैं। किसी मज़दूर के पास बैंक अकाउंट नहीं है। ज्यादातर के पास मोबाइल फोन है। जो ज़रूरी खर्चे में गिना जाता है। हर दरो-दीवार पर मज़दूरों को अनुशासित करने के संदेश लिखे हैं। थूकने से लेकर बदतमीज़ी करने पर मनाही है। फाइन है। भाषा भोजपुरी है। सब भोजपुरी में बात कर रहे हैं और गाना सुन रहे हैं। कमरे में बाहर की हवा नहीं जा सकती। मकान मालिक कोशिश करता है कि चार लोग एक कमरे में न रहें। अगर पाया गया तो किराया बढ़ा देता है। तीन का ग्रुप बनाना मुश्किल है। सब एक दूसरे से जुड़ रहे हैं। इलाका के नाम पर और भाषा के नाम पर। छह हज़ार रुपया कमाने के लिए नियमित मेहनत। नौकरी और सोने के बीच में कोई खाली वक्त नहीं है। टीवी अखबार देखने-पढ़ने की आदत नहीं है। बस सब चलते नज़र आते हैं।

कापसहेड़ा की गलियों में गंदगी की भरमार है। दीवारों पर नौकरियां बंटने के इश्तहार हैं। मज़दूरों से बात कीजिए तो बताते हैं कि ये नौकरियां ही नौकरियां वाले कितना ठगते हैं। पांच सौ रुपये लेकर ऐसी जगह गार्ड बनाकर भेज देते हैं जहां सिर्फ मच्छर होता है। दूर दूर तक कोई आदमी नही्ं होता। आज कल ऐसे कई वीराने में अपार्टमेंट बन रहे हैं। वहां गार्ड की ज़रूरत है। दस दिन में ही नौकरी छोड़ कर भाग आता है। नई नौकरी के लिए फिर से पांच सौ रुपये देता है। कई मज़दूरों ने बताया कि फैक्ट्री वाले अंदर जाने पर बाहर से ताला बंद कर देते हैं। बाहर आने के लिए गेट पास नहीं देते। ओवर टाइम कराते हैं। उनकी मर्ज़ी होती है कि हम ओवर टाइम करें। बीमार रहने पर भी छुट्टी नहीं मिलती। कई लोगों ने कहा कि कबाड़ी की ज़िंदगी जीते हैं।

कापसहेड़ा के इस रूप को दिल्ली के लोगों ने नहीं देखा होगा। ग्रामीण लोगों ने तो देखा होगा मगर दिल्ली को दुनिया का बेहतरीन शहर बनाने की होड़ में लगे लोग शायद ही देख पाते होंगे। कई बार जहां प्रवासी जाते हैं तो उनकी पूजा संस्कृति भी चली जाती है। साठ फीसदी प्रवासी मज़दूर मुसलमान हैं। एक भी मस्जिद नहीं है। एक दुकान दिखी जिस पर लिखा था कि यहां बड़े का मांस मिलता है। हिन्दुओं के भी मंदिर नहीं हैं। अलबत्ता सबके कमरे में भगवानों और सलमानों की तस्वीरें हैं। लोगों ने बताया कि इबादत और प्रार्थना के लिए वक्त नहीं हैं। चार पैसा कमाने में ही दिन बीत जाता है। पूरे इलाके में सैंकड़ों कमरे बन गए लेकिन मंदिरों का अता पता नहीं। शनि और साईं भी यहां डिमांड में नहीं हैं।

इतनी बड़ी संख्या में आने के बाद भी खास तरह की उपभोक्ता संस्कृति नहीं बन पाई। न्यूनतम उपभोग है। खाने पानी की आदत सीमित है। सुबह शाम रोटी सब्ज़ी या दाल सब्जी। कमरे में सामान कम हैं। डीवीडी है लेकिन लोकल मेक। भोजपुरी के सस्ते डीवीडी जिनकी कीमत बीस रुपये है। मोबाइल फोन में भोजपुरी गाने ही अपलोड हैं। हिन्दी गाने नहीं हैं। लोग सिनेमा हॉल में फिल्में नहीं देख पाते। राशन की दुकानों पर तेल के कई ब्रांड दिखें। सबकी ज़ुबान पर न्यूनतम मज़दूरी है। ४२१४ रुपये। हरियाणा सरकार की तय की हुई। इस महंगाई में मज़दूरों का वेतन एक साल में दो तीन सौ से ज्यादा नहीं बढ़ता। सारी दुकानों में ज़रूरी सामान ही हैं। तड़क भड़क वाले उपभोगी आइटम नहीं। सारी कमाई मूलभूत आवश्यकता पूरी करने में ही खप जाती है। उसमें से भी वो तीन हज़ार बचाकर घर भेज देते हैं। जाहिर है इतना संयमित उपभोग होने पर कापसहेड़ा के बाज़ारों में विविधता नहीं पनप सकी है।

इन विस्थापित मज़दूरों से एक और बात का पता चलता है। इनके इलाके में पांच हज़ार रुपये के रोज़गार का सृजन नहीं हो पा रहा है। ग्लोबल अर्थव्यवस्था चंद शहरों तक ही सीमित है। रोजगार के अलावा बिहार यूपी के इलाके की तमाम व्यवस्था चरमरा गई है। कुछ भी नहीं है इसलिए पूरा परिवार विस्थापित हो रहा है। यह आर्थिक नीतियों की नाकामी है कि दिल्ली में भीड़ बढ़ रही है। हम इसलिए आने के लिए मजबूर हुए कि बिहार के विश्वविद्यालय गटर की तरह सडांध मार रहे थे। शिक्षा मंत्री, वाइस चांसलर और प्रोफेसर को देखकर लगता था कि इनको मार मार कर भूसा बना दें। वो कर नहीं सकते थे इसलिए प्रवासी छात्र बनकर दिल्ली आ गए। कारण सबको मालूम है लेकिन यह देश बहस करने वालों का हो कर रह गया है। काम हो रहे हैं लेकिन आबादी के अनुपात के सामने विकास की व्यवस्था कम है। जिलों में सुविधा का इतना अस्थायी इंतज़ाम है कि किसी को भरोसा नहीं कि कब तक रहेगा।

दिल्ली की सरकार के अपने घोटाले हैं। गांव देहात के पैसे को कामनवेल्थ के इस्तमाल में लगाया जा रहा है। एक किस्म का छद्म राष्ट्रीय गौरव उत्पादित किया जा रहा है कि इस खेल में हम सब शामिल हों। खेलिये न भाई। लेकिन लोगों से तो मत खेलिये। फ्लाइओवर बनाकर झांसा क्यों देते हैं। पता नहीं हम किस तरह का शहर देखना चाहते हैं? इन लाखों लोगों की इस शहर में क्या पहचान है? यह बात कम गर्व करने लायक नहीं कि दिल्ली सबको अपना रही है। मुंबई की तरह भगाओ आंदोलन नहीं है।

कापसहेड़ा गांव के लोगों की सहनशीलता भी गज़ब की रही। किसी तरह का पूर्वाग्रह नहीं दिखा। यह ज़रूर कहा कि अब इन कमरों से हमारा रोज़गार चल रहा है। इन्हीं कमरों की बदौलत घरों में एसी चला रहे हैं। एक सज्जन ने कहा कि अब तो काफी अच्छा है। शुरू में इन मज़दूरों के लिए टिन के कमरे थे। गर्मी में फ्राई हो जाते थे। राशन की दुकान से माल खरीदने के लिए मजबूर करने पर सफाई यह थी कि हमारे पास अब खेती की ज़मीन नहीं है। सरकार ने बहुत पहले ली थी और मुआवजा काफी कम दिया था। इसलिए ये दुकान भी हमारी आय का साधन हैं। अगर हमारी दुकान से राशन नहीं खरींदेंगे तो हमारा क्या होगा। मज़दूरों की शिकायत थी कि लाला मजबूर करता है कि उनकी दुकान से ही राशन खरीदें। वर्ना कमरा खाली करने को कह देता है। लाला कहता है कि हमें यह बाज़ार चाहिए। दुकान से हमें और कमाई होती है। उनके लिए ये मज़दूर सिर्फ किरायेदार ही नहीं ग्राहक भी हैं। इन मज़दूरों का बाज़ार में कोई मोलभाव नहीं है। एकाध सौ रुपये की अधिकता के नाम पर नौकरी बदल लेते हैं। अपनी मर्ज़ी से कमरा तय नहीं कर सकते। कमरे के साथ दुकान का भी चयन करना पड़ता है। कापसहेड़ा को नए सिरे से समझने की ज़रूरत है। देखने की ज़रूरत है।

31 comments:

सतीश पंचम said...

कापसहेड़ा की आपकी रपट देखी...अच्छी लगी।

मजदूरों की यह स्थिति अमूमन हर शहर में है। कभी कभी मन करता है कि मुंबई एअर पोर्ट के एक ओर बसे तार बाजार में आपको घुमाउं....कुर्ला.... साकीनाका जैसे इलाके में घुमाउं...ये ऐसे इलाके हैं जहां का मजदूर देश का विकास तो करता है पर मजदूर होने के कारण विकास से दूर रहता है।

तार बाजार में टिटनेस का इंजेक्शन लोग शायद ही लगवाते हों जबकि उनका रोज का काम है जंग लगे तारों को लपेटना, खोलना बांधना....। लगता है टिटनेस भी हार मान चुका है ऐसे मजदूरों से।

सतीश पंचम said...

और हां...जमीनी मसले उठाने के लिए मेरी ओर से धन्यवाद स्वीकारें।

Parul said...

maine bhi aapki report dekhi thi sir..aur dusri report mein patna se ru-b-ru hone ka bhi mauka mila ..jindagi live hai!! :)

संदीप द्विवेदी said...

Dil ko Choo gayee aapki Report. Aapne Aaj ka Patna par bhi koi Report ki hai kya?

daddudarshan said...

दिल्ली में अकेला कोपसहेड़ा ही क्यों,हर मोहल्ले में कोपसहेड़ा मिल जाएँगे | जिन मोहल्लों के लिए, युवराज- राहुल गाँधी को देश के विभिन्न राज्यों (खाशकर जहाँ कांग्रेस-शासित सरकारें नहीं हैं) में भटकना पड़ता है ,वो सब अकेली दिल्ली में मिल जाएँगे | इन कालोनियों ? में खाना ,शौच तथा दूसरे प्रसाधन एक साथ निपटाए जाते हैं | जहाँ खाना खाया जाता है वहीँ पास ही नाली में सड़ांध के साथ कीड़े बजबजाते रहते हैं | विचारणीय प्रश्न ये है कि जहाँ से वे आए हैं वहां हालत इससे भी ज्यादा बदतर हैं ,नहीं तो कौन ऐसे नरक में रहना पसंद करता | ऊपर से शीला-सरकार ने 'गेम्स' दिल्ली के निम्नतम और निम्न-वर्ग की जान को इतने बितंडे खड़े कर दिए हैं कि न मरने में है न जीने में | यदि सरकार चाहती तो जितने पैसे इस वर्ग को भागने में खर्च किए हैं, उतने से भी कम पैसों में इनकी दशा सुधर सकती थी |

Mitul said...

Hi,

On Sunday eve when we were tired of watching movies at friends place. I ended up browsing news channles to check out debates on subjects ranging from poor performance of Indians in Sri Lanka to curdled controversy of Kashmir. But i was lucky. And found you on screen exploring lanes of workers' colony. As a business journalist, I have been hearing and even seeing how cheap labour is benefiting the industry. But it was striking to see workers' life on your show. I have seen more or less similar quality of workers' life in parts of Gujarat but never noticed things so closely. Looking forward for more of your shows to understand the country, economy and society better...... Rgds, Mitul

Mitul said...
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संजय बेंगाणी said...

यह उन आर्थिक नीतियों की नाकामी है जिसे समाजवादी और साम्यवादी कहा जाता है, जिससे अब दिल्ली में भीड़ बढ़ रही है. बंगाल बिहार उप्र सब बरबाद हो गए. हाँ आबादी जरूर बढ़ी.

उपभोक्तावाद नहीं दिखा. भैये किस पर दिखना? जेब जितना ही उपभोक्तावाद पसरेगा न.

अभी कोमनवेल्थ के दौरान जब दिल्ली बन्द हो जाएगी इनकी हालत देखना....

honesty project democracy said...

रविश जी आपने दिल्ली की असल तस्वीर पेश की है ,कास इस तस्वीर को हमारे देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति देखते और कुछ सोचते तथा कुछ इंसानियत के नाते भी करने का प्रयास करते तो तस्वीर बदल सकती थी | रवीश जी इस देश ने पिछले पांच सालो में जितना भ्रष्ट और बेशर्म मंत्रियों खासकर कृषि मंत्री शरद पवार को झेला है उतना कभी नहीं झेला था ,इसलिए इंसानियत की अवस्था और भी दर्दनाक होने के पूरे आसार हैं | अभी मैं सीतामढ़ी के सामाजिक जाँच से लौटा हूँ जिसमे मैंने पाया की संभावनाएं रोजगार की दिल्ली से ज्यादा है ग्रामीण इलाकों में बशर्ते सरकार ईमानदारी से सहायता करे |मैंने देखा की सुरसंड ब्लोक के भिट्ठा बाजार ग्राम में एक पोस्ट ग्रेजुएट इन्सान डेरी का कारोबार कर 17 जर्सी गाय को पालकर 30 से 40 हजार रुपया महिना कमा रहा है और इस गंद भरे दिल्ली के जिन्दगी से कहीं ज्यादा सकून में है | उस व्यक्ति का नाम नरेश ठाकुर है ,उसने बताया की हम जब ऋण के लिए गये तो हमसे 40 % रिश्वत की मांग की गयी और कई चक्कर लगाने के बाद ऋण नहीं मिला ,तब जाकर हमने अपने बूते जमीन इत्यादि के सहारे रुपयों का जुगाड़ किया और अब ऐसे मुकाम पर हूँ ,नरेश ठाकुर ने बताया की बिना रिश्वत के ऋण मिले तो हम इस पूरे जिले में कम से कम एक हजार लोगों को अपने जैसा बनाकर आर्थिक रूप से मजबूत बना सकते हैं जिससे हमारे देश और समाज का विकाश होगा | मैं इस सिलसिले में सितम्बर में फिर सीतामढ़ी जाऊँगा और इसबार मेरा फोकस सिर्फ और सिर्फ नरेश ठाकुर जैसे लोगों को सहायता पहुँचाना होगा चाहे इसके लिए हमें पूरी व्यवस्था की खाल क्यों न उतारना परे | दरअसल जिलों में विकाश योजनाओं को ईमानदारी से लागू नहीं किया जाना ही महानगरों की भीर व दयनीय अवस्था का कारण है | जरूरत है मिडिया के सम्बेदंशील लोगों को देश के दूर दराज जिलों के विकाश कार्यों की जाँच करने और जनता को भी जाँच के लिए प्रेरित करने की ,आशा है आप इस दिशा में काम जरूर करेंगे और अपने इमानदार साथियों से भी ऐसा करने को कहेंगे | गांवों की स्थिति सुधारी जा सकती है अगर जिला प्रशासन से उसकी जिम्मेवारियों के लिए कोई लड़ने वाला हो ....!

honesty project democracy said...
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honesty project democracy said...
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Girdhari khankriyal said...

Manyawar aapne jo kapshed ke darshan karye usse to ji machal aya , aise kai kapashed hain delhi mein.
1.Aap mediakarmi bhi hain, isliye main aapko ek aur kapasheda ke darshan ke liye prarthana karonga uska naam hai khoda kolony noida aur ghaziabad ke bichon beech. koi waris nahin hai. yeha bhi jayeaga aur report banaye .
2 .aapne apne is lekh mein ek prashn sammilit nahi kiya. wah hai in majdooron ki pehchan ! inke yeha koi bhi janganna karmchari nahi aya hoga. voter pechaan patra bhi kisi ke paas nahi hoga. yaani doosre shabdon mein kahe to ye log khana badhosho ki tarah bharat ke registerd nagrik nahi hai. is baat ki padtaal aapne chhod di.

डॉ टी एस दराल said...

कापसहेड़ा का नज़ारा हमने भी देखा है । रोज शाम को ५ से ७ के बीच लाखों मजदूर उद्योग विहार की फैक्टरियों से निकलकर अपने घर की ओर जाते दिखाई देते हैं । यू पी बिहार के ये लोग मजदूरी न करें तो और क्या करें । वहां तो कोई उद्योग धंधा , कृषि या आमदनी का साधन है नहीं । दिल्ली में उनको रोजगार मिलता है । रोटी मिलती है । शरण मिलती है ।
ये इसी में खुश नज़र आते हैं । हों भी क्यों नहीं । वहां से तो अच्छे हैं ।

baramasa98 said...

Adarniya Ravish Jee,
Namaskar. Delhi ke Kapasheda kasbe ki report aapne apne chir-parichit andaz me di.Dhanyavad.Lekin yah to sabhi jante hain ki Kapasheda, ya Dharavi ya Khoda jaisi sakdon kaloniyan basne-basane ke peechhe mool karan hai Ashiksha aur Jansankhya vridhi. Jab tak iska samadhan nanhi hota,tab tak kuch bhee nanhi hone wala. Aur yah bhee kadwa satya hai ki koi bhee Rajneetik Party iske liye Imandari se prayas nanhi kar rahi hai.Siway jhoote narebazi ke.

हमारीवाणी.कॉम said...

हिंदी ब्लॉग लेखकों के लिए खुशखबरी -


"हमारीवाणी.कॉम" का घूँघट उठ चूका है और इसके साथ ही अस्थाई feed cluster संकलक को बंद कर दिया गया है. हमारीवाणी.कॉम पर कुछ तकनीकी कार्य अभी भी चल रहे हैं, इसलिए अभी इसके पूरे फीचर्स उपलब्ध नहीं है, आशा है यह भी जल्द पूरे कर लिए जाएँगे.

पिछले 10-12 दिनों से जिन लोगो की ID बनाई गई थी वह अपनी प्रोफाइल में लोगिन कर के संशोधन कर सकते हैं. कुछ प्रोफाइल के फोटो हमारीवाणी टीम ने अपलोड.......

अधिक पढने के लिए चटका (click) लगाएं




हमारीवाणी.कॉम

googleUncle said...

पता नहीं कहा कहा घूमते रहते हो भाई रविश कुमारजी....शाइनिंग इंडिया का राग अलापना चालू ही करते है हम की आप झोपड़े दिखा देते हो...दिल तोड़ दिया आपने तो.

googleUncle said...

वैसे आपने बचपन में कविता तो पढ़ी ही होगी की "मै मजदूर, मुझे देवो की बस्ती से क्या :)"

kapila choyal said...

namaskar ravish ji,
I am a regular viewer of 'ravish ki report'.simplicity of programme is appreciable. you give mouth to the feelings of a common man.doing great job.thanks.
kapila choyal

निखिल आनन्द गिरि said...

कापसहेड़ा एक नाम भर है...शहर के हर कोने में एक धारावी है.....नोएडा में खोड़ा कॉलोनी है, दिल्ली में आली गांव हैं, मदनपुर खादर है, हरिकेश नगर हैं, लोनी हैं जहां मैं गया हूं....हर जगह एक ही तस्वीर है.....हरिकेश नगर में किन्नरों पर एक स्टोरी की थी तो पता चला वहां किन्नरों को भी सीनियर किन्नर के पास हफ्ता जमा करना पड़ता है, कॉलोनी में रहने के लिए और इलाके में भीख मांगकर गुज़ारा करने के लिए.....

राहुल रॉय एक डॉक्यूमेंट्री मेकर हैं...उनकी एक फिल्म थी कई साल पुरानी WHEN FOUR FRIENDS MET...ऐसे ही किसी कमरे की कहानी थी....जो आपने बयां की....इन बस्तियों में

मीडिया के मजदूरों की हालत इससे अच्छी है क्या....उन पर कब दिखाएंगे रिपोर्ट...विस्थापन इस सदी की सबसे बड़ी समस्या है....दुनिया भर की सरकारों ने जानबूझकर इसे बढ़ावा दिया है ताकि उनकी दुकानदारी चलती रहे...

dharmendra said...

कापसहेड़ा पर आपकी रिपोर्ट देखी और पढ़ी भी... टीवी पर देखने के बाद जो पहला विचार आया वही कहना चाहता हूं जिन लोगों को हमने और आपने चुनकर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया है काश उन्हें थोड़ी शर्म आती। लोग चीख रहे हैं कि देश बदल रहा है मानता हूं लेकिन ये कैसा बदलाव है?राष्ट्रीय राजधानी के पास लोग ऐसी हालत में रहते हैं। क्या यही विकास है?

नितिन | Nitin Vyas said...

कापसहेड़ा की आपकी रपट देखी...अच्छी लगी।
परधानमंतरी को अंग्रेजी में बोलने से भी सुनाई नहीं देगा (शायद ईतालवी समझ आती हो?)।

Shishir singh said...

Nice!!

JC said...

रील उल्टी चल रही है (सतयुग से घोर कलियुग की ओर, यूं एक शिव के अनेक असंख्य प्रतिबिम्ब dikhai pad rahe hain)!

Abhishek Nilmani said...

सबसे पहले आपको ढेरो बधाइयाँ , सच कहू तो कभी कभी जी चाहता है की आपकी लेखनी चुरा लू, कापसहेड़ा का कबूतरखाना, जहाँ इसने दिल्ली की धारावी दिखाई दी वही आपकी लेखनी ने तो दिल चू लिया, जब आप उन् मजदूरों के साथ एक ही थाली में खाने के लिए बैठे और कहा की का हाल बा तो मैं निशब्द हो गया की एक मोटी कमाई वाला पत्रकार क्या वाकई में आज के इस TRP की दौड़ में ज़मीनी पत्रकारिता कर सकता है...लेकिन सच कहू तो उस वक़्त आपके चरण याद कर बैठा.

Pankaj Kapahi said...

ravish bhai ko salaam
aapki report ne delhi me bse prwasi mjduro ki schaai byaan ki hai aaj ahr delhi ko dunia me jane jana lga hai to khi na khi in prwasi mjdurio ki wjh se jinone aasmaan chuti imarto ko bnaya hai pr inhe koi nhi janta inki trf bharat k logo ki njr dalne k liye dhnaywaad
sch me asi report ravish hi soch skta hai jo prvasi hai

Jitendra Chaudhary said...

बहुत अच्छी रिपोर्ट, मैने टीवी पर भी देखी, बहुत अच्छा कवरेज था।
सच पूछो तो रवीश, इस रिपोर्ट ने तुम्हे दुनिया के दूसरे बड़े पत्रकारों के समकक्ष खड़ा किया है। मै ये तो नही कहता कि भारत की गरीबी दिखाने से ही दुनिया मे नाम होता है, लेकिन हाँ कुछ हद तक ये बात सही है। एनडीटीवी को बोलना कि इसको अंग्रेजी मे भी दिखाएं। अगर हो सके तो एक्सचेंज प्रोग्राम में बीबीसी पर भी दिखाएं।

कापसहेड़ा एक यथार्थ है, एक कड़वी सच्चाई, कापसहेड़ा ही क्यों, भारत के हर छोटे बड़े शहर मे इस तरह के धारावी मिल जाएंगे। इस बस्ती के लोग रोज जीते है रोज मरते है, इनको अब ना नेताओं के वादे पर भरोसा है और ना सरकारी विज्ञापन मे गरीबी घटने के आँकड़ों पर विश्वास। ऐसा नही है यहाँ सब कुछ नकारात्मक है। यहाँ (या इस तरह की बस्ती के) लोगों मे जीने का ज़ज्बा है, एक दूसरे का सहायता, सुख दु:ख साझा की जीवनशैली काबिले तारीफ़ है। इतनी तकलीफों के साथ भी लोग हँस कर जीते है, रोने के लिए टाइम ही कहाँ है। लोगो के इस हौंसले को सलाम है। सच है यही है असली भारत। एक बार फिर से बधाई। उम्मीद है ऐसी ढेर सारी रिपोर्ट देखने को मिलेंगी। इन्ही शुभकामनाओं के साथ।

Dinbandhu Vats said...

सर, अगर दिल्ली की भीड़ को कम करना है ,तो बिहार, यू पी सहित अन्य गरीब राज्यों को अपना हाल सुधारना होगा .लोग दिल्ली आते ही क्यों ,अगर अपने राज्य में वह सुविधा मिलती जिसके कारण यहाँ आना पड़ता है.वैसे गरीबों के बारे में अब कौन सोचता है. उन्हें तो बस चुनाव के समय लालीपॉप थमा दियाजाता है. हम तो दिल्ली को international सिटी बनाने जा रहे है.कापसहेड़ा तो बहुत दूर है सर .पहले ७ रेस कोर्स के स्लम्स को मानवोचित सुविधा है क्या .ख़ैर...हमें क्या हम तो नई दिल्ली में रहते है .
international सिटी के नागरिक है हम .

singh said...

ravis ji aapko namskar

mai aapki delhi ka manchester gandhinagar par aapki bises report dekhi,sachmuch ghandhi nagar ko hum delhi ka manchester kah sakte hai.ghandhi nagar aaj jitne loga ko rojgar de raha wo kabile tariph hai, lakin mai aapka dhayan us teller master ki bato ki taraph dilana chata hu jo kah raha tha ki aapko mahangai par report banani chahiye, muche puri ummed hai jald hi mahangai par ek report banyenge.
dhanyabad


sanjeev singh
vill+po- sinha
dis-bhojpur bihar

singh said...

ravis ji aapko namskar

mai aapki delhi ka manchester gandhinagar par aapki bises report dekhi,sachmuch ghandhi nagar ko hum delhi ka manchester kah sakte hai.ghandhi nagar aaj jitne loga ko rojgar de raha wo kabile tariph hai, lakin mai aapka dhayan us teller master ki bato ki taraph dilana chata hu jo kah raha tha ki aapko mahangai par report banani chahiye, muche puri ummed hai jald hi mahangai par ek report banyenge.
dhanyabad


sanjeev singh
vill+po- sinha
dis-bhojpur bihar

आशीष कुमार said...

रवीश जी आपकी रिपोर्ट देखी थी। उसी दिन सोचा आपको लिखूंगा लेकिन वक्त आज मिला...कहना ये चाहता था कि आपने दिल्ली का धारावी कापसहेड़ा पर जो रिपोर्ट दिखाई शानदर थी लेकिन कभी दिल्ली विश्वविद्यालय और तमाम छात्रों के आशियाने जो क्रिश्चिनयन कॉलोनी और कटवरिया सराय में हैं या फिर इलाहाबाद के कई ठिकाने जहां छात्र देश और अपना भविष्य बनाने के लिए आते हैं उनका हाल धारावी से भी कहीं बदतर है। उस पर एक रिपोर्ट बने तो मेरे लिहाज से बेहतर होगा।

दीपिका said...

रवीश जी मैं कई बार आपके लेख पढ़ चुकी हूं.. लेकिन पहली बार आपको लिख रही हूं... मैने आपका लेख धारावी कापसहेड़ा पढ़ा... आपकी ये रिपोर्ट मैने टीवी चैनल पर भी देखी... सच मानिए मैं जैसे जैसे आपका लेख पढ़ रही थी.. आपके प्रोग्राम का एक-एक चित्र और पैकेज मेरे आंखों के सामने था... ऐसा लग रहा था मानों मैं एक बार फिर आपका प्रोग्राम देख रही हूं...