ऊँ कंक्रीटाय नम, दिल्ली भयंकराय भव

दिल्ली की जान निकल रही है। सीमेंट कपार के ऊपर सरक रहा है। करनाल से आ रहा था। आजादपुर प्रवेश करते ही नीचे,मध्य और ऊपर सीमेंट के भीमकाय ढांचे भयभीत करने लगे। ऊपर से मेट्रो की लाइन,नीचे खूब गहराई में अंडरपास, और बगल से सड़क। देखकर जी घबराने लगा कि कहां आ गए हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स के बहाने दिल्ली फिर से बड़ी मात्रा में क्रंकीट हो रही है। जिस जगह को आप बरसो से देख रहे थे वो जगह पूरी तरीके से बदल दी गई है। माल रोड पर जाइये, मेट्रो स्टेशन की सजावट राहत देती है लेकिन जैसे ही मुखर्जीनगर की तरफ बढ़िये लगने लगता है कि इस शहर को फिर से देखने का मौका आ गया है। हर रास्ते बदल गए हैं। एक दो साल में दिल्ली कभी इस रफ्तार से नहीं बदली है।

पूरी दिल्ली में फ्लाईओवर किसी दैनिक भजन की तरह बज रहे हैं। उन पर गाड़ियां बजबजा रही हैं। मुनिरका,रोहिणी,आनंद विहार और अगर आप गांधीनगर से आईटीओ आ जाएं तो फ्लाईओवर महाकार रूप धारण करता है। कई रास्ते उड़ते हुए मिलने लगते हैं। दिमाग एक बार के लिए चकराता है,गाड़ी धीमी करता हूं कि दायें जाऊं कि बायें जाऊं। रास्ते के नक्शे को फिर से दिमाग में बिठाना पड़ रहा है। कभी कभी लगता है कि ये सारे विकास लोगों के खिलाफ हैं। ट्रैफिक जाम की समस्या दूर नहीं हुई लेकिन जगहों,चौराहों को लेकर एक खास किस्म की बेचैनी होने लगी है। डर लगता है कि रात में गए तो एक मामूली भूल आजादपुर की बजाय करोलबाग पहुंचा देगी।

अब यह अध्ययन करने का वक्त आ गया है कि मेट्रो के आने से दिल्ली के ट्रैफिक पर क्या असर पड़ा है। मुझे तो खास नहीं दिखता। पर आंकड़े जुटाने चाहिए कि मेट्रो के लिए कितने लोगों ने अपनी पांच लाख वाली फेरारी बेच दी। गाज़ीपुर आ जाइये। यहां भी भीमकाय फ्लाईओवर बन रहे हैं। कई दिशाओं से फ्लाईओवर आ कर मिलेंगे तो दिल्ली में घुसते ही कलेजा मुंह को आ जाएगा। यहां काम चल रहा है। लेकिन एक मामली बदलाव से अब लगता है कि फ्लाईओवर की ज़रूरत नहीं है। आप यूपी बार्डर से गाज़ीपुर आइये, सीधे चलते रहिए,बिना रेडलाइट के क्रास कर जायेंगे। चौराहे पर दायें मुड़ने की व्यवस्था खतम कर दी है। इसकी बजाय चौराहो से थोड़ी दूर आगे जाकर यू टर्न लेना पड़ता है। बस। लेकिन फ्लाईओवर तो बनेगा और इसका विरोध करेंगे तो आप विकास विरोधी हो जाएंगे।

ट्रैफिक जाम से मुक्ति एक ऐसा सपना है जो मैं रोज़ देखता हूं और फंसता हूं। इस ट्रैफिक जाम ने रेडियो एफएम का टाइम स्पेंट बढ़ा दिया है। उनका कारोबार चल निकला है। दिल्ली में ट्रैफिक जाम की वजह से ही एफएम रेडियो में इतनी बड़ी क्रांति आ गई है। इसकी वजह से महानगरों में टीआरपी का फर्जी मीटर प्राइम टाइम का टाइम अब दूसरा बता रहा है। सात या आठ बजे दर्शक कम होने लगे हैं। नौ से दस के बीच ज्यादा होते हैं। तब तक लोग कार में गाने सुन सुन कर पक चुके होते हैं। एफएम रेडियो कौन सी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं,उनके कंटेंट पर मीडिया के आलोचकों की नज़र नहीं है। मुझे तो हिन्दी न्यूज़ चैनल और एफएम रेडियो के कंटेंट में कोई फर्क नज़र नहीं आता। वहां भी जोकर हैं और यहां भी हैं। जाम से मुक्ति का मनोरंजन निर्बाध चल रहा है। एफएम रेडिया ट्रैफिक अपडेट देता है। जाम जैसी समस्या को मनोरंजन में बदलकर शहरी नागरिक चेतना को कुंद करता है। तभी इस दिल्ली में लाखों लोगों के हर घंटे जाम में फंसे होने के बाद भी शहर के निर्माण, ट्रैफिक बदलाव को लेकर कोई व्यापक नागरिक जनमत नहीं बन पाता है। इसके लिए आप एफएम रेडियो को दोष तो नहीं दे सकते लेकिन जब वो भी मीडिया हैं तो उनसे उम्मीद क्यों नहीं।

इस बदलती दिल्ली में आम आदमी कहां हैं। शनिवार को सीएसडीएस की लाइब्रेरी में एक सभा हुई। रवि सुंदरम, नारायणी गुप्ता,गौतम भान आदि जमा हुए। ये सब दिल्ली के इतिहास,वर्तमान और भविष्य को लेकर काम करने वाले लोग हैं। सब आज की दिल्ली को आम लोगों के खिलाफ मानते हैं। आज की दिल्ली में आम लोगों की सक्रिय भागीदारी चाहते हैं। उनके कई सवाल हैं। पार्कों में ताले जड़े जा रहे हैं,कालोनियों के गेट खास तरह के लोगों को बाहर करते हैं,फुटपाथ है नहीं। इन सब दैनिक समस्याओं के अलावा इनकी मूल चिन्ता है कि क्या दिल्ली की कोई योजना है और है तो उसे लागू करने में किस तरह की बातों का ध्यान रखा जा रहा है। दिल्ली को लेकर नागरिक चेतना क्यों नहीं बन पा रही है और कैसे बनेगी।

इन विद्वानों को लगता है कि अब वक्त आ गया है कि दिल्ली को लेकर सोचने वाले लोग एक मंच पर आएं और आवाज़ उठायें। नीति निर्धारक तत्वों को बतायें कि शहर को भयावह नहीं बनने देंगे। विकास का ढोल बजाइये लेकिन इतना ज़ोर से मत बजा दीजिए कि कान ही फट जाए। आप चाहें तो delhiurbanplatform.org पर जाकर इस अभियान से जुड़ सकते हैं।

लेकिन इतना तय है कि फ्लाईओवर इस देश के विकास का नया और सर्वमान्य चेहरा बन गया है। कई साल पहले दिनेश मोहन ने कहा था कि फ्लाईओवर एक नाकामी का प्रतीक है। तब मुझे लगा था कि बकवास कर रहे हैं। आज जब आश्रम पर बने तीन तीन फ्लाईओवरों के बाद भी घंटों जाम में फंसता हूं तो लगता है कि विद्वान ने बात ठीक कही थी। वही हाल बीआरटी का है। लेकिन ये कल्पना तो दिनेश मोहन की ही है। यह उदाहरण इसलिए ताकि पता चले कि हमारे विद्वान भी कोई सम्यक नज़रिया सामने नहीं ला पा रहे हैं। शायद इसलिए दिल्ली अर्बन प्लेटफार्म की पहली बैठक में अलग अलग लोगों को बोलने का मौका मिला। कई तरह के सवाल उठाये गए जो एक शहर को समझने के लिए सहायक साबित हो रहे थे। आप अगर फ्लाईओवर के दुष्प्रभाव को देखना चाहते हैं तो आश्रम और मूलचंद के बीच दोनों तरफ के मकानों को देख लीजिए। कभी वहां किसी ने खुला देखकर घर बनाया होगा। आज उनकी बालकनी के सामने से फ्लाईओवर गुज़र रहा है। नतीजा सारे घर स्टोर,दुकान,बैंक,अस्पताल में बदल गए हैं। रिंग रोड के इस हिस्से के घर दुकान हो गए हैं। कामनवेल्थ गेम्स के बाद बने फ्लाईओवरों का प्रभाव एक बार फिर दिल्ली पर दिखेगा।

अगले साल दिल्ली औपनिवेशिक,आधुनिक और आजा़द भारत की राजधानी के रूप में सौ साल की हो जाएगी। १२ दिसंबर १९११ को राजधानी कोलकाता से दिल्ली आ गई थी। फिर से एक मौका आ रहा है,दिल्ली को नए नज़र से देखने का। रिपोर्ट करने का और दिल्ली के इतिहास और वर्तमान को समझने का। अखबार से लेकर मैगज़िन तक दिल्ली के कार्यक्रमों से भर जायेंगे। टीवी वाले भी बौरायेंगे। मैं भी कुछ हाथ आज़मा लूंगा। आइडिया लीक कर दे रहा हूं ताकि लोग आज से ही पढ़ना शुरू कर दें। गोबर हमारे समय का बड़ा आइडिया है। मेरी ही कविता है। इसी ब्लॉग पर। जल्दी ही टीवी वाले दिल्ली के इतिहास को कच्चे पक्के ढंग से टीवी पर दिल्ली को गोबर की तरह पाथ देंगे। साथ ही ब्लॉग पर दिल्ली से संबंधित कई किताबों का ज़िक्र करूंगा। उन लोगों से बात करूंगा जो दिल्ली को ठीक से जानते हैं। लेकिन आप भी ज़रा बताइये, क्या आप भी भयभीत होते हैं आज की इस दिल्ली को देखकर। शीर्षक में मेरे द्वारा उत्पादित इस मंत्र का जाप करें। ये मंत्र प्राचीन है सिर्फ रचनाकार वर्तमान का है।

21 comments:

डॉ टी एस दराल said...

रवीश जी , ये शांति से पहले का तूफ़ान है। एशिया ८२ गेम्स में भी ऐसा ही हुआ था और दिल्ली --ग्रीन दिल्ली बन गई थी। हमें तो विश्वास है , इस बार भी दिल्ली की कायापलट हो जाएगी।
आश्रम की प्रोब्लम रिंग रोड पर चलने वाले ट्रक हैं। बाई पास बन जाये तो निजात पा जायेंगे।
शाहदरा फ्लाई ओवर बनने से अब शाहदरा पार करने में केवल ३ मिनट लगते हैं।

mrityunjay kumar rai said...

रवीश जी दिल्ली का इतिहास है यहाँ कभी भी कुछ स्थायी नहीं रहा . निरंतर बदलाव आया है इस शहर में

Apanatva said...

har parivartan thodee adchane lata hai .......

PD said...

पांच लाख में फरारी!! कहाँ से मिलता है जी, हमें भी बताईये.. हम आज ही लोन के लिए अप्लाई कर देते हैं.. :)

नीरज मुसाफिर जाट said...

उम्मीद तो हमारी भी यही है कि दराल जी की बात सही हो....

लवली कुमारी said...

पांच लाख में फरारी! :-)

deepak said...

कोंक्रिट जंगल को सायद बिकाश कहेते है २१ औ सदि मे ! उचे महल चाहिए ताज़ी हवा के लिए तो ए सी है !हम लोग जिस प्रकार की बिकाश के दौड़ में भाग रहे है ..अनंत में क्या कुछी सालों में वोही हमारे बिनास का कारन होगा !!

ANIS KHAN SHAHAN said...

RAVISHJI!
Issue Concrete nahi balkey hamara dil aur hai jo concrete se bhi sakht hota jarahi hai, road bantey bigartey rahtein hain magar khoda hi janey dilon ka keya hoga….

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रवीश जी, आप ने बिलकुल सही कहा। वास्तव में विकास की दिशा ही सही नहीं है। विकास अस्वाभाविक हो गया है।

हिमाचली said...

भौगोलिक विकास = विनाश

shreesh said...

रवीश भाई वक़्त मिले तो कभी लखनऊ घूम जाईये और देखिये नज़ारा यहाँ का वैसे मैं आपको मोबाइल की कुछ तस्वीरें भेजूंगा यहाँ का नज़ारा देख के कुछ ऐसा महसूस होता है जैसे आप गुप्त काल में पहुँच गए हों और चारों ओर पत्थरों की कटाई जुडाई चल रही दिखेगी जैसे लगता सरकार के पैसे का भंडार भरा पड़ा हो और खर्च करने के तरीके ढूंढे जा रहे हों

विनीत कुमार said...

आपकी पोस्ट पढ़कर,खासकर एफएम चैनलों के संदर्भ में जो लिखा है,याद आया- मैंने नया ज्ञानोदय में एक लंबा रिसर्च आर्टिकल लिखा था- फटाफट जेनरेशन का रेडियो और यूथ कल्चर। उसमें टाइमिंग और शहरी कल्चर इन सब बातों की विस्तार से चर्चा की थी।
मैं अपने को कोई वैलिड मीडिया आलोचक तो नहीं मानता क्योंकि उसकी परिभाषा ही अलग है। लेकिन आपने लिखा कि मीडिया आलोचकों का ध्यान नहीं जाता इसलिए कमेंट करना जरुरी समझा।..

मुनीश ( munish ) said...

Delhi is getting better albeit not for common man ! The Bye-pass from Karnal used to have fearsome jams earlier. One night in 2004 i crossed 11 k.m. on this stretch in 8 hours. It was the most horrible jam i've been into and no channel covered it !

Rajesh Roshan said...

Ravish maine shuraati 3 para padha... uske baad padhne ki ichha nahi hui....Road par aapki sabse badi pareshani jaha tak main samjh paya hu, Traffic hai...aur uske baad andar jo pareshani hai ki aap kisi cheej se shantust nahi ho pate hain....

Traffic ke liye flyover bane to dikkat nahi bane to bhi dikkat... bahut sukhashm lekin andar bahut badi dikkat aapko ghere hue hai...jara vichariye....Nidaan ke liye abhi nahi jujhenge to samsaya badh jayegi

Rajesh Roshan

gs said...

सार्वजानिक परिवहन में वृद्धि से लोग कार को बेचते तो नहीं है पर उसका प्रयोग कम हो जाता है और जो लोग कार खरीदने की सोच रहे है उनकी संख्या कम हो जाती है. फ्लाईओवर में होने वाली वृद्धि की वजह सार्वजानिक परिवहन में कमी और असुविधा है.

BS said...

आप शायद दिल्ली को बिहार की तरह पिछड़ा हुआ देखना चाहते हैं।

arvind said...

aapane bahut accha likha hai .main 100% sahamat hun. delhi se naturality gaayeb hai.

braj bhushan said...

raveesh ji, dilli ke traffic ki problem fly over aur metro banane se hal nahin hogi, jab tak logon ke attitude main badlav nahin aayega ye samasya jas ki tas rahegi, ek choti si baat ki taraf aapka dhyan dilana chahta hun,

" jab hum log diving seekhte hain to uske liye koi proper channel nahin hai, ghar main gaadi hai to apne aap seekh jaayenge, aur agar driving schools hain bhi to sikhane wale jo driver hain unhe khud hi driving nahin aati, lane main chalna hum logon ko aata hi nahin hai, kisi bhi red signal pe dekhiye, line se motor cycles khadi hui dikhayi dengi, sabko aage nikalne ki jaldi, apni lane main koi nahin chalna chahta, isi vajah se problem hoti hai, 80% se jyada licences dalaalon ke through banwaye jaate hain,

rescue opertaion system naam ki koi cheez nahin hai, sadak pe koi vehicle kharaab ho jaaye, to within 5 minutes 3-4 km lamba jaam lag jaata hai, anyways

ye is tarah ki problem hai jise jab tak solve nahin kiya jaayega, yun hi jaam lagte rahenge, kitne bhi fly over bana lijiye, neta log usme apna commission khate rahenge aur bus....

harish said...

bahut dwand hai ravish ji , mujhe ghaziabad se igi airport jana padta hai, har bar bhatak jata hoon , kisi naye pathik ki tarah, par ye nishchit nahi kar pata hoon ki kaun si cheej kis keemat par hai, hamen sadken chahiye par bina banane ki rukawat ke , optical fiber chahiyer par bina khudai ke, nirbadh roop se chalta yatayat chahiye par bina kancrete ke, kaise kaise ravish sahab.

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR
BAHUT DINO KE BAAD AAYA HOON...HAMARI FAMILY KI PRIYANKA NAHI RAHI...VARANSI SE LUCKNOW JAA RAHI THI...ACCIDENT ME DEATH HO GAYA...ISSE PEHLE UNKE BHAI KI SAADI THI...MAI BHI RECPTION ME VARANSI GAYA THA...4PM KI BULLETIN BANA RAHA THA TABHI YE KHABAR MILI.....KAI DINO TAK PARESAN RAHA...JINDGI ITNI NIRDAY BHI HO SAKTI HAI...AB JAN SAKA HOON.........

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

दिल्ली…
बदलाव की बयार है, जो यहां आया उसनें इसे अपनें रंग में रंग दिया। किसी नें पान की पीक मार के फेंक दी, किसी ने झुग्गी डाल ली, ये चुप रही…
किसी नें रेलवे स्टेशन के पास ही जिंदगीं बिता दी तो कोई प्लेटफार्म पर ही रहा हमेंशा… ये चुप रही।
कोई कहीं से आया तो खिचड़ीपुर बस गया, किसी के मुहल्ले का नाम बिहारी कॉलोनी हो गया, ये चुप रही…
सभी को मां बनकर पाला इसनें, चुपचाप सहती रही सारे दुख, सभी बेटों को एक समझा इसनें, किसी बेटे संवारा, तो किसी ने उजाड़ा, फिर भी हसंती रही मेरी दिल्ली, फैलाएं बांहें करती रही स्वागत सबका, पाला इसनें मुझे मेरी हस्ती बना दी...झुग्गी हटी, जे.जे कॉलोनी बनीं, संख्या बड़ी जे.जे.कॉलोनियां 45 हो गई, फिर झुग्गी बस गई, ये चुप रही…
यहां आया, यहां कमाया, यहीं का खाया फिर भी इसी को गरियाया... ये चुप रही। नदीं को नाला बना दिया, सड़क-पुलों की माला बना दिया… ये चुप रही।
इसी के कांधे पर चढ़कर देखे सबनें मेले हज़ार, इसे के कांधे से दी दुनिया को पुकार, फिर चले गए मूत के सब इस पर, इसके बेटों ने दिखा दी इसी की फोटों तो बुरा मान गए मूतनें वाले...ये चुप रही। किसी नें बिगाड़ा तो किसी ने उजाड़ा...फिर भी ये चुप रही।
पूछा किसी नें कि क्या हुआ बहन क्यों सहती हो इतना, क्यों ना कुछ कहती हो, बोली बेचारी...सारे बच्चों पर हक़ है मुझ पर, किसे बताएंगे मुझे ना बताएंगे तो, जब दुनिया में कोई भी आसरा ना दे तो मां का आंचल ही सहाऐगा, बेटा लौट फिर घर आएगा...बेटा लौट फिर घर आएगा।