अब मत कहना कि ख़ान का मतलब...मुसलमान...

माय नेम इज़ ख़ान हिन्दी की पहली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म है। हिन्दुस्तान, इराक, अफग़ानिस्तान, जार्जिया का तूफ़ान और अमरीका के राष्ट्रपति का चुनाव। कई मुल्कों, कई कथाओं के बीच मुस्लिम आत्मविश्वास और यकीन की नई कहानी है। पहचान के सवालों से टकराती यह फिल्म अपने संदर्भ और समाज के भीतर से ही जवाब ढूंढती है। किसी किस्म का विद्रोह नहीं है,उलाहना नहीं है बल्कि एक जगह से रिश्ता टूटता है तो उसी समय और उसी मुल्क के दूसरे हिस्से में एक नया रिश्ता बनता है। विश्वास कभी कमज़ोर नहीं होता। ऐसी कहानी शाहरूख जैसा कद्दावर स्टार ही कह सकता था। पात्र से सहानुभूति बनी रहे इसलिए वो एक किस्म की बीमारी का शिकार बना है। मकसद है खुद बीमार बन कर समाज की बीमारी से लड़ना।

मुझे किसी मुस्लिम पात्र और नायक के इस यकीन और आत्मविश्वास का कई सालों से इंतज़ार था। राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय सांप्रदायिक आंदोलन के बहाने हिन्दुस्तान में मुस्लिम पहचान पर जब प्रहार किया गया और मुस्लिम तुष्टीकरण के बहाने सभी दलों ने उन्हें छोड़ दिया,तब से हिन्दुस्तान का मुसलमान अपने आत्मविश्वास का रास्ता ढूंढने में जुट गया। अपनी रिपोर्टिंग और स्पेशल रिपोर्ट के दौरान मेरठ, देवबंद,अलीगढ़,मुंबई,दिल्ली और गुजरात के मुसलमानों की ऐसी बहुत सी कथा देखी और लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की। जिसमें मुसलमान तुष्टीकरण और मदरसे के आधुनिकीकरण जैसे फालतू के विवादों से अलग होकर समय के हिसाब से ढलने लगा और आने वाले समय का सामना करने की तैयारी में शामिल हो गया। तभी रिज़वान ख़ान पूरी फ‍िल्म में नुक़्ते के साथ ख़ान बोलने पर ज़ोर देता है। बताने के लिए पूर्वाग्रही लोग मुसलमानों के बारे में कितना कम जानते हैं।

मुझे आज भी वो दृश्य नहीं भूलता। अहमदाबाद के पास मेहसाणां में अमेरिका के देत्राएत से आए करोड़पति डॉक्टर नकादर। टक्सिडो सूट में। एक खूबसूरत बुज़ूर्ग मुसलमान। गांव में करोड़ों रुपये का स्कूल बना दिया। मुस्लिम बच्चों के लिए। लेकिन पढ़ाने वाले सभी मज़हब के शिक्षक लिए गए। नकादर ने कहा था कि मैं मुसलमानों की एक ऐसी पीढ़ी बनाना चाहता हूं जो पहचान पर उठने वाले सवालों के दौर में खुद आंख से आंख मिलाकर दूसरे समाजों से बात कर सकें। किसी और को ज़रिया न बनाए। इसके लिए उनके स्कूल के मुस्लिम बच्चे हर सोमवार को हिन्दू इलाके में सफाई का काम करते हैं। ऐसा इसलिए कि शुरू से ही उनका विश्वास बना रहे। कोशिश होती है कि हर मुस्लिम छात्र का एक दोस्त हिन्दू हो। स्कूल में हिन्दू छात्रों को भी पढ़ने की इजाज़त है।

नकादर साहब से कारण पूछा था। जवाब मिला कि कब तक हमारी वकालत दूसरे करेंगे। कब तक हम कांग्रेस या किसी सेकुलर के भरोसे अपनी बेगुनाही का सबूत देंगे। आज गुजरात में कांग्रेस हिन्दू सांप्रदायिक शक्तियों के भय से मुसलमानों को टिकट नहीं देती है। हम किसी को अपनी बेगुनाही का सबूत नहीं देना चाहते। हम चाहते हैं कि मुस्लिम पीढ़ी दूसरे समाज से अपने स्तर पर रिश्ते बनाए और उसे खुद संभाले। बीते कुछ सालों की यह मेरी प्रिय सत्य कथाओं में से एक है। लेकिन ऐसी बहुत सी कहानियों से गुज़रता चला गया जहां मुस्लिम समाज के लोग तालीम को बढ़ावा देने के लिए तमाम कोशिशें करते नज़र आए। उन्होंने मोदी के गुजरात में किसी कांग्रेस का इंतज़ार छोड़ दिया। मुस्लिम बच्चों के लिए स्कूल बनाने लगे।रोना छोड़कर आने वाले कल की हंसी के लिए जुट गए।

माइ नेम इज खान में मुझे नकादर और ऐसे तमाम लोगों की कोशिशें कामयाब होती नज़र आईं, जो आत्मविश्वास से भरा मुस्लिम मध्यमवर्ग ढूंढ रहे थे। फिल्म देखते वक्त समझ में आया कि इस कथा को पर्दे पर आने में इतना वक्त क्यों लगा। खुदा के लिए,आमिर और वेडनेसडे आकर चली गईं। इसके बाद भी ये फिल्म क्यों आई। ये तीनों फिल्में इंतकाम और सफाई की बुनियाद पर बनी हैं। इन फिल्मों के भीतर आतंकवाद के दौर में पहचान के सवालों से जूझ रहे मुसलमानों की झिझक,खीझ और बेचैनी थी। माइ नेम इज ख़ान में ये तीनों नहीं हैं। शाहरूख़ ख़ान आज के मुसलमानों के आत्मविश्वास का प्रतीक है। उसका किरदार रिज़वान ख़ान सफाई नहीं देता। पलटकर सवाल करता है। आंख में आंख डालकर और उंगलियां दिखाकर पूछता है। इसलिए यह फिल्म पिछले बीस सालों में पहचान के सवाल को लेकर बनी हिन्दी फिल्मों में काफी बड़ी है। अंग्रेज़ी में भी शायद ऐसी फिल्म नहीं बनी होगी। इस फिल्म में मुसलमानों के अल्पसंख्यक होने की लाचारी भी नहीं है और न हीं उनकी पहचान को चुनौती देने वाले नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं की मौजूदगी है। यह फिल्म दुनिया के स्तर पर और दुनिया के किरदार-कथाओं से बनती है। हिन्दुस्तान की ज़मीं पर दंगे की घटना को जल्दी में छू कर गुज़र जाती है। यह बताने के लिए कि मुसलमान हिन्दुस्तान में जूझ तो रहा ही है लेकिन वो अब उन जगहों में भेद भाव को लेकर बेचैन है जिनसे वो अपने मध्यमवर्गीय सपनों को साकार करने की उम्मीद पालता है। अमेरिका से भी नफरत नहीं करती है यह फिल्म।

माय नेम इज़ ख़ान की कथा में सिर्फ मुस्लिम हाशिये पर नहीं है। यह कथा सिर्फ मुसलमानों की नहीं है। इसलिए इसमें एक सरदार रिपोर्टंर बॉबी आहूजा है। इसलिए इसमें मोटल का मालिक गुजराती है। इसलिए इसमें जार्जिया के ब्लैक हैं। अमेरिका में आए तूफानों में मदद करने वाले ब्लैक को भूल गए। लेकिन माइ नेम इज़ ख़ान का यह किरदार किसी इत्तफाक से जार्जिया नहीं पहुंचता। जब बहुसंख्यक समाज उसे ठुकराता है,उससे सवाल करता है तो वो बेचैनी में अमेरिका के हाशिये के समाज से जाकर जुड़ता है। तूफान के वक्त रिज़वान उनकी मदद करता है। उसके पीछे बहुत सारे लोग मदद लेकर पहुंचते हैं। फिल्म की कहानी अमेरिका के समाज के अंतर्विरोध और त्रासदी को उभारती है और चुपचाप बताती है कि हाशिये का दर्द हाशिये वाला ही समझता है।

इराक जंग में मंदिरा के अमेरिकी दोस्त की मौत हो जाती है। उसका बेटा मुसलमानों को कसूरवार मानता है। उसकी व्यक्तिगत त्रासदी उस सामूहिक पूर्वाग्रह में पनाह मांगती है जो एक दिन अपने दोस्त समीर की जान ले बैठती है। इधर व्यक्तिगत त्रासदी के बाद भी रिज़वान कट्टरपंथियों के हाथ नहीं खेलता। मस्जिद में हज़रत इब्राहिम का प्रसंग काफी रोचक है। यह उन कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए है जो यथार्थ के किसी अन्याय के बहाने आतंकवाद के समर्थन में दलीलें पेश करते हैं। रिज़वान उन्हें पकड़वाने की कोशिश करता है। वो कुरआन शरीफ से हराता है फिर एफबीआई की मदद मांगता है। घटना और किरदार अमेरिका के हैं लेकिन असर हिन्दुस्तान के दर्शकों में हो रहा था।

जार्ज बुश और बराक हुसैन ओबामा के बीच के समय की कहानी है। ओबामा मंच पर आते हैं और नई उम्मीद का संदेश देते हैं। यहीं पर फिल्म अमेरिका का प्रोपेगैंडा करती नज़र आती है। मेरी नज़र से इस फिल्म का यही एक कमज़ोर क्षण है। बराक हुसैन ओबामा रिज़वान से मिल लेते हैं। वैसे ही जैसे काहिरा में जाकर अस्सलाम वलैकुम बोलकर दिल जीतने की कोशिश करते हैं लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान पर उनकी कोई साफ नीति नहीं बन पाती। याद कीजिए ओबामा के हाल के भाषण को जिसमें वो युद्ध को न्यायसंगत बताते हैं और कहते हैं कि मैं गांधी का अनुयायी हूं लेकिन गांधी नहीं बन सकता।


इसके बाद भी यह हमारे समय की एक बड़ी फिल्म है। हॉल में दर्शकों को रोते देखा तो उनकी आंखों से संघ परिवार और सांप्रदायिक दलों की सोच को बहते हुए भी देखा। जो सालों तक हिन्दू मुस्लिम का खेल खेलते रहे। मुंबई में इसकी आखिरी लड़ाई लड़ी गई। कम से कम आज तक तो यही लगता है। एक फिल्म से दुनिया नहीं बदल जाती है। लेकिन एक नज़ीर तो बनती ही है। जब भी ऐसे सवाल उठाये जायेंगे कोई कऱण जौहर,कोई शाहरूख के पास मौका होगा एक और माइ नेम इज़ ख़ान बनाने का। फिल्म देखने के बाद समझ में आया कि क्यों शाहरूख़ ख़ान ने शिवसेना के आगे घुटने नहीं टेके। अगर शाहरूख़ माफी मांग लेते तो फिल्म की कहानी हार जाती है। ऐसा करके शाहरूख खुद ही फिल्म की कहानी का गला घोंट देते।
शाहरूख़ ऐसा कर भी नहीं सकते थे। उनकी अपनी निजी ज़िंदगी भी तो इस फिल्म की कहानी का हिस्सा है। हिन्दुस्तान में तैयार हो रही नई मध्यमवर्गीय मुस्लिम पीढ़ी की आवाज़ बनने के लिए शाहरूख़ का शुक्रिया।

71 comments:

Jai Prakash Pathak said...

namskaar,
aap filmon par achhii samiikshaa likhte rahate hain. my name is khaan par likhii samiikshaa pdhane se film ke baare men jaankaarii mil gaii. vaise to is film par siyasat aur miidiaa kii siyaasa donon hii jantantra ke liye kuchh maayane rakhenge.

achhii samiikshaa ke liye badhaaii aur dhanyavaad.
namaskaar.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

एक फिल्म से क्या होगा. बहुत गिद्ध बैठे हैं हर धर्म को भुनाने के लिए. हर समाज को खुद ही अपने पैरों खड़ा होना होगा.

संगीता पुरी said...

यदि इस फिल्‍म से पारस्‍परिक सौहार्द में थोडी भी वृद्धि होती है .. देश के सभी धर्मों के लोग धर्म से ऊपर देश को रख देते हैं .. तो हम भारतवासियों के लिए बहुत बडी उपलब्धि होगी .. पर जिनके स्‍वार्थ को नुकसान होगा .. वे क्‍या ऐसा चाहेंगे ??

Tarkeshwar Giri said...

में सहमत हूँ आपके लेख से जो आपने शाहरुख़ खान के बारे में लिखा , इस समय मुसलिम आतंक से ज्यादा लोग ठाकरे के आतंक से परेशान है, मगर आप का अगला लेख विवादित लगता है, (राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय सांप्रदायिक आंदोलन के बहाने हिन्दुस्तान में मुस्लिम पहचान पर जब प्रहार किया गया और मुस्लिम तुष्टीकरण के बहाने सभी दलों ने उन्हें छोड़ दिया) । आप ने ये कैसे कह दिया की राम मंदिर एक सांप्रदायिक आन्दोलन है। क्या हिन्दू अपने अधिकारों को भूल जाये।
अगर हमारे मुस्लमान बंधू लोग इतने ही उदार हैं तो क्यों नहीं ख़त्म कर देते इस मसले को। कभी आपने -अपने किसी मुस्लिम दोस्त से बात करी इस विषय पर।
अपने अपनी स्पेशल रिपोर्ट के दौरान मेरठ, देवबंद,अलीगढ़,मुंबई,दिल्ली और गुजरात के मुसलमानों की ऐसी बहुत सी कथा देखी, क्या आप कभी कश्मीरी पंडितो से मिले। क्या उनके भी घर जा करके आपने उनका हाल-चाल लिया. कभी पाकिस्तानी और अफगानी हिंदुवो से आप मिले।
हाँ इतना जरुर कहूँगा की आपने फिल्म की समीक्षा अच्छी तरह से करी है । धन्यवाद्.

Apanatva said...

रोना छोड़कर आने वाले कल की हंसी के लिए जुट गए।
Aapkee post se sadaiv hee sahee v acchee jankaree milatee hai .
Aapkee lekhan shailee bahut prabhavit karatee hai.
Dhanyvad .

दीपक राजा said...

aap likhte achchha hai, tv pe dekhta hun bolte bhee achchhe hai.

film achchhi hai...

Manta hun... Kash media ke log Mahangai to tool dekar sarkar ko itna jhuka pate

Suresh Chiplunkar said...

पूरी तरह से NDTV नुमा रिपोर्ट… शाहरुख को ऑस्कर दिलवाने के लिये लॉबिंग की शुरुआत…

१) दुनिया जानती है की पाकिस्तान भारतीय फिल्म और अन्य उत्पादों की पाइरसी का दुनिया में सबसे बड़ा अड्डा है। "अमन की आशा" चलाने वाले मूर्खों को क्या पता कि वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं…
२) पाकिस्तानी वेबसाइट songs.pk भारतीय गानों के पाइरेटेड वर्षन्स ऑनलाइन डाउनलोडिंग के लिए होस्ट करती है इसका एक दिन का रेवेन्यू १२ करोड़ रुपए हैं जिसे बतौर टॅक्स वह पाकिस्तानी सरकार को चुकाती है और भारतीय फिल्म कंपनी, और संगीत कंपनियों को सीधा चूना लगता है… यह पैसा किसी मदरसे में नहीं जाता, कश्मीर आता है।
३) भारतीय गायकों के होते हुए फिल्म के प्रमुख गाने , शफाक़त अमानत अली ख़ान , अदनान समी और राहत फ़तेह अली ख़ान जैसे पाकिस्तानी गायकों से गवाए गये हैं जो आम तौर पर शंकर एहसान लॉय के लिए नही गाते.
४) सच्चाई तो यह है कि मुम्बई में शुक्रवार को शिवरात्रि की छुट्टी और कांग्रेसियों द्वारा टिकटें खरीदे जाने के बावजूद इसका कलेक्शन बमुश्क़िल ४०-४५% है , जो किसी भी ख़ान फिल्म के लिहाज़ से काफ़ी खराब प्रदर्शन है.

असली मुद्दे को पीछे सरकाकर शाहरुख को आगे किया गया है… सचमुच सेकुलरिज़्म के कथित रखवाले या तो मंदबुद्धि हैं, या पाकिस्तान को फ़ायदा पहुँचाने वाले देशद्रोही अथवा झूठे प्रचार में माहिर…

रवि कुमार, रावतभाटा said...

आशाओं का बेहतर पल्लवन...
बेहतर समीक्षा...

बाकी तो शुरू हो ही गया है...

Vivek said...
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sukh sagar said...

ravish ji bada acha likha......

lekin muslims ko khud hi uth khada hona hoga,kab tak apni kismat ka rona royenge.....hai to wo bhi sab insaan hi na.........chahe sarkare kitna hi arakshan aur riyayate de..................

kabhi kabhi aisi filme hi unhe yaad karati hai aur kabool karvati hai ki waha muslim hai aur unka koi nahi is duniya me...........

himmat karo age badho....muslim bhaiyo


sukh sagar singh bhati
discussiondarbar.blogspot.com

Vivek said...

Bahut hi sahi chashma pahan kar sameeksha likhi hai aapne Raveesh ji.Roz pooja-path karne wale hum sabhi kyon roz ki jindagi mein aadmi-aadmi ke beech har tarah ka bhed-bhaav barat-te hain- jaat,dharam aadi.Kaise apni sanskriti par naaj karoon mein?

ramesh said...

हे भगवान, ये इतनी अच्छी पिक्चर थी?....

मुझे तो ये दो कौड़ी की बकबास लगी, सिर्फ मुझे ही नहीं मेरी कतार में बैठे अनेकों लोगों का कहना था कि ये इकदम बकबास है... हो सकता है हमारे अन्दर इस कला फिल्म को समझने लायक समझ न हो

लेकिन हमें खुदा के लिये, आमिर और वेन्सडे बहुत अच्छी लगी.

क्या आपने ये समीक्षा पिक्चर देख कर लिखी है? यदि नहीं तो पिक्चर देख कर लिखिये तब सही समीक्षा होगी...

आज जागरण के ब्लाग में अजय ब्रम्हात्मज ने इसकी समीक्षा लिखी है जिसके अन्त में लिखा है कि यदि आप पिक्चर देखते समय बोर होते हों तो भी पैर मत हिलाईयेगा. आप भी यदि बोर हों (जो कि आप निश्चित रूप से होंगे) तो भी पैर मत हिलाईयेगा...

deepti said...

aapki sameeksha se film ko dekhne ka man ho gaya hai...ab kheejte rahne ka daur guzar gaya hai ...ab haashiyee me khade hue logo ko bhi usi taakat se aage aana hoga jis taakat sr shivsena jaise dalo ke gunde aage aaye hai aur taakat hamesha hathiyaro me nahi balki jazbe me hoti hai...fir zahar failane wale jab besharmi se apni kartooto ko anjaam de rahe hai to fir ab koi khan hi sahi unhe unki asliyat ka aaina dikha to raha hai

विजय प्रकाश सिंह said...

मेरा मानना है कि यह एक साधारण फिल्म है जो आज देश मे एक असाधारण माहौल की वजह से बिना मतलब के तारीफ़ बटोर रही है । यह फिल्म अमेरिका के ईराक़ तथा अफ़गानिस्तान युद्ध के बाद से पश्चिमी देशों मे उठे सवालों को अपनी समझ के हिसाब से डील करती है । फिल्मकार बहुत सारी बातें एक साथ डील करने की कोशिश मे है । हीरो को बिमारी है, वह मुसलमान है, उसे एक हिन्दू लडकी से प्यार करता है जो एक बच्चे की मां है, वह परी कथाओं का सा प्रेमी है जो प्यार को पाने के लिए हर हद को पार करता है । जो क्रिस्चियन बहुल समाज मे शक़ की नज़र से देखे जाने का प्रतिकार करता है ( वैसे शाहरुख़ खान करीब ६ महीना पहले अपनी सुरक्षा जांच पर बता ही चुके हैं कि वे खान थे तभी उन्हे रोका गया ,जबकि इसी देश के जार्ज फर्नाडीस सहित कितने लोगों की जांच हो चुकी है )। काई सारी बातें जो हंगामा कर सकने वाली हैं जो जान बूझ कर डाली गयीं है पर हंगामे का मौका अप्रत्यासित तौर पर दिया शिवसेना ने, जो राज ठाकरे का जवाब देने के लिए मौके के लिए बेकरार है चाहे सही या गलत ।

एक व्यक्ति जो ताकतवर के अन्याय ( सचमुच का या काल्पनिक ) से लड़ने का हौसला रखता है और इतना गुणी है ऊपर से बीमारी ग्रस्त है से हर कोई सहानुभूति रखेगा । साथ मे अगर शिव सेना जैसे नालायक दल हों जो बेकार का विरोध करें और राजीव शुक्ला जैसे दोस्तों ( वैसे पिछले १५ अगस्त को शाहरुख़ की जांच के हंगामे की शुरुआत शुक्ला जी द्वारा ही हुई थी ) से सुसज्जित कांग्रेस पार्टी के युवराज का सीधा समर्थन हो तो क्या कहने। इस देश मे जो भेड़ चाल वाला मीडिया सर्कस होता है उसमे एक साधारण सी फिल्म असाधारण ही बन जायेगी । इतनी पुलिस एक फिल्म दिखाने के लिए मौजूद थी , जब यूपी बिहार के लोग पिट रहे थे तब कहां थी । उसकी गोली चली भी तो एक निहत्थे, बेरोज़गार, गरीब बिहारी युवक को मारने के लिए । कहां थी सरकार कहां था कानून का राज । जो मंत्री फिल्म देखने के लिए आये थे वे क्या कर, कह व बोल रहे थे । इसके पीछे की राजनीति के खुलासे की अपेक्षा प्रबुद्ध पत्रकारों से रहेगी ।

यह एक लम्बी, उबाऊ और पश्चिमी देशों मे उठ रहे सवालों का उत्तर ढ़ूंढ़ती फिल्म है जिसका भारत की वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है । वैसे भी शाहरुख की फिल्में ओवर्सीज मार्केट के लिए बनती हैं और यह उसी तरह की है इसी लिए शाहरुख़ इसके प्रचार के लिए देश के बाहर ज्यादा वयस्त रहे । शिवसेना ने जो प्रचार का मौका दिया उससे जो फ़ायदा मिला वह आइसिंग ओन केक जैसा है । संघ परिवार से नफ़रत करने वालों के लिए तो पता भी हिले वही काफ़ी है संघ पर टिप्पड़ी के लिए । देश के एलीट वर्ग का एक तबका किसी भी कीमत पर इस फिल्म को असाधारण साबित करने के लिए कटिबद्ध है ।

भारतीय मुसलमान समाज की सामयिक समस्यायों और आगे के रास्ते के बारे मे सही समझ वालों को आप लोग सुने और मौका दें तब न । मौलाना वहीउद्दीन की वार्ता के कुछ अंश उद्धरित किया है लिंक दे रहा हूं अगर समय मिले तो देखियेगा और अपना मत भी दीजिएगा । http://mireechika.blogspot.com/2009/12/blog-post_06.html

ramesh said...

भाई साब, बुरा मत मानिये, हमें तो पाथेर पांचाली भी पसंद नहीं आयी थी, बीच में ही उठ कर चले आये थे, हो सकता है कि अच्छी पिक्चर हो,

वैसे साले ठाकरे को खूब नीचा देखना पड़ा, बहुत यूपी बिहार के लोगों को धमकाता था, अब मुंह छिपा कर बैठा होगा कहीं...

deepti said...

waise ravish ji khan ka matlab musalmaan kyu na ho kyuki asli khan ya pathan to wahi hai na jo apne imaan par hamesha data rahe to khan matlab to musalmaan hi hua...musalmaan alfaaz me to hume koi bhi buraai nazar nahi aati

ramesh said...

जो भी इस पिक्चर को देखने जाये पहले अपनी जान पहचान वाले से पूछ कर जाय के अच्छी है या नही,

दिखावे पर न जाओ, अपनी अक्ल लडाओ

वरना मेरी तरह पछतायेगा...

L.R.Gandhi said...

ओबामा गाँधी बन ही नहीं सकता क्योंकि वह अमरीका से प्यार करता है। आत्मरक्षा के लिए युद्ध अनिवार्य है।
आप लिखते बहुत अच्छा हैं किन्तु गाँधी वादी सैकुरिज्म कि ऐनक से हर चीज़ को देखने कि आदत पाल बैठे हैं।

रंजन said...

बहुत अच्छा रिव्यू... जरुर देखेंगे ये फ़िल्म...

रंगनाथ सिंह said...

कुछ साल पहले तक भारतीयों का दावा रहता था कि दुनिया के हिस्से में धर्म/विचारधारा को लेकर सबसे कम हिंसा/रक्तपात हुआ है। अब कुछ भारतीयों की करनी की चलते ऐसा दावा करना कठिन हो गया। हिन्दुधर्म एक उदार और सर्वसमावेशी धर्म है ऐसा कहने के पहले हमें कटु तथ्यों के पहाड़ से टकराना होगा।

हिन्दुस्तान में भारतीय सेना के अलावा जितनी भी सेनाएं है उनकी कृपा है कि भारत के भीतर ही उत्तर-भारतीय भयभीत और असुरक्षित हंै।

शाहरुख खान को सलाम की उन्होंने पेशेवरों के गुण्डों से न उलझने के रवायत को तोड़ते हुए अपने स्टैण्ड पर डटे रहे। उन्होंने जो गट्स दिखाया वो अनुकरणीय है।

रंगनाथ सिंह said...

शब्दों के सफर ब्लाग पर कल ही स्पष्ट किया गया कि खान का मतलब आवश्यक रूप से मुसलमान नहीं होता। उदाहरण के तौर पर चंगेज खान का उल्लेख किया गया है। शाहरुख खान उस मुस्लिम वर्ग के प्रतिनिधी हैं जिसे मुस्लिम कट्टरपंथी मुसलमान नहीं मानते और जिसे हिन्दु कट्टरपंथी सिर्फ और सिर्फ मुसलमान मानते हैं भारतीय नहीं। जबकि मुस्लिम,सिक्ख,जैन,बौद्ध,हिन्दु या नास्तिक होने और राष्ट्रवादी होने में कोई अंतरविरोध नहीं है।

Deepak said...

apke veecharo ka samman karti hai hum...bhai par agr hum bina jhijhak ke kah sakte hai ki hum hundu hai to fir khan ka matlab musalmaan kyu nahi ho sakta...jaise bal thakre hindu kabhi nahi ho sakte kyuki hindutva to udarta sikhta hai fir islaam me changez khan jaise shaksiyat bhi musalmaan hone ka apna arth kho deti hai

Romesh said...

rabish jee aap ek achhe fiture writer to hai lekin kanhi kanhi aap purbagrah se grasit najar aate hai,
ye ek sadharan film hai aur aapke pratisthit NDTV jaise new chainlo ke bajah se itni charcha me aai hai. aaj tak aaisa lag raha hai jaisa sahrukh khan india hai aur shivsena rupi pakistan ne us par aakrman kar diya hai. sir jee film kebal mumbai me hi release nahi hoti hai pure desh me hoti hai lekin shivsena jaisi party ko to dusre rajyo ke log jante bhi nahi hai, bhir itni maramari kyon karte hai aap media bale.
sahrukh khan ke ek film hai koi film ki hi tarah rahne digiye usko hamare samuday ke sath kyon jor rahe hai aap. aaisa lag raha hai ki aap film ki samiksha rajnitik dhang se kar rahe hai. aare dange me musalman hi nahi mare jate hindu bhi mare jate hai,sikh bhi mare jate hai, isai bhi mare jate hai , un logo ke dard par to aapke film star ne koi film nahi banai aur n aapne hi ko samiksha likhi hai. pata nahi kyon aap media balo ko musalman hi sabse dukhi samuday najar aata hai aur hamesh uska fayda lena chahte hai to phir aap me aur rajnitik party me kya antar hai?

prabhatdixit said...

sharukh ko pranam to bhej hi diya hoga.

hadd kar di aapne,itani tustikaran ki niti to politic parties bhi nahi apnati.

hinduo ko to pitate hi rehna hai aur koi shikayat bhi nahi karni,kunki aap jaise udaar logo ke mutabik hindu bahusnkhyak hai to kaise pit sakta hai wo to hamesha peetega hi.

amitabh apko mahanalayak nazar ate hai aur IGO tatha GHAMAND se bhara hua badbola sharukh khan apko kaddawar abhineta nazar ata hai.

apke andar se apke channel ki boo aati ai.waise bhi NDTV aaj kal congress ka hi channel lag raha hai.

अर्कजेश said...

यहॉं पर बात हिंदू मुस्‍लमान की नहीं थी बल्कि लडाई गुंडगर्दी और लोकतंत्र के बीच थी । मुंबईवासयों और भारत की जनता ने दिखा दिया है कि भारत का तालिबानीकरण करने वालों के मंसूबे कभी सफल नहीं होने दिए जायेंगे ।

समुद्र को गडही बनाने पर तुले हुए हैं लोग

जीत भार्गव said...

इतनी पुलिस एक फिल्म दिखाने के लिए मौजूद थी , जब यूपी बिहार के लोग पिट रहे थे तब कहां थी । उसकी गोली चली भी तो एक निहत्थे, बेरोज़गार, गरीब बिहारी युवक को मारने के लिए । कहां थी सरकार कहां था कानून का राज । जो मंत्री फिल्म देखने के लिए आये थे वे क्या कर, कह व बोल रहे थे । इसके पीछे की राजनीति के खुलासे की अपेक्षा प्रबुद्ध पत्रकारों से रहेगी ।

Sheeba Aslam Fehmi said...

Bharat ki mansik vividhta ke darshan huey yahan. Kuchh log to andherey kamre me 'haathi' ke alag-alag ang bhi tatol-te dikhey.

Tarkeshwar Giri ji Babri Masjid ko bachane ke liye ek bhi Musalmann ek qadam bhi nahi chala tha. Aaj bhi 'yeh Noora-Kushti', MusalmanoN ki pratibhagita se nahi chal rahi. Mamle ki gehrai ko samajhiye.
Babri masjid jaisey mamle hamare NetaoN ki 'job guarantee' haiN. We inhe suljha kar apne pet par laat kaisey maar saktey hain? Yeh sabhi rangoN ke netaoN par Lagu hota hai.

Is Film ke 'merit' ko to Shivsena ne hi badhaya hai. Film banne ke baad releaze-poorv ke ghatnakram se 'sarthak-tam' ho gayi. Khan ne wahi kiya jo koi bhi samajhdar businessman karta. Sena'waley apne ghar ka masla 'Musalman punching bag' ko peet kar kyun suljhana chahtey hain? Baherhal, is baar lagatar we janta ke mood aur apne bhondey-pan ko samajh nahi paey.

Pathan ya Khan 'geo(graphic)cultural term' hai, na naslwadi, na dharmik. Afghanistan aur aas-paas ke mardon ko aadar se 'Khan' aur aurton ko 'Khanam' kehtey hain. Kuchh kuchh Sriman/Shrimati ya Senor/Senorita jaisa mamla hai.

And for History's and Geography's sake- Changez Khan Musalman nahi tha !!!

Mishra, RC: रा च मिश्र said...

यही Paid Review तो नही है :)

ravishndtv said...

मैं वेतन के अलावा और किसी तरीके से पैसे नहीं लेता। समीक्षा आप में से किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं लिखी गई है। फिल्म देखकर मुझे व्यापक संदर्भ में जो लगा वो लिखा। मैं किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप के फ्रेम में नहीं देखता। यह भी समझने की कोशिश करता हूं कि कहानी क्या कहना चाहती है। वो किन सवालों से टकराती है। कैसे कई कथाओं को बुनने का प्रयास करती है। मैंने फिल्म की प्रांसगिकता को समझने की कोशिश की है। किसी को यह साधारण फिल्म लग सकती है। लेकिन मैं इसे अपने जीवन की घटनाओं के बीच रखकर देखता हूं तो बड़ी लगती है। किसी शाहरूख के बहाने ही सही जब बड़ी संख्या में लोग हॉल के भीतर जाते हैं और तीन घंटे तक हमारे समय के एक महत्वपूर्ण सवाल से टकराते हैं तो फिल्म सफल हो जाती है।

और हां..कृपया मेरी निष्ठा पर संदेह न करें। मैं अच्छा और खराब पत्रकार हो सकता हूं लेकिन बिका हुआ नहीं हूं।

Shambhu kumar said...

रवीश सर आप तो आहत हो गए... रामायण जैसी महाकाव्य में भी सीता पर सवाल उठा था... इस देश में तो महात्मा गांधी पर भी लोग सवाल उठाते मिल जाएंगे... आहत न हों... समाज में अपना त्याग कर समाजहित की बात करने वाले को कभी पागल तो कभी सलफेट समझा जाना कोई नई बात नहीं है... हां अगर इन सब सलफेट से मुक्ति चाहते हैं... तो सैलरी के आलावा एन केन प्रकारेण आप भी पैसा बना लीजिए... या फिर किसी--- के पुत्र होते तो शायद लोग कभी आलोचना की हिमाकत नहीं करेंगे... कभी देखा है 74 के बाद लोग कभी किसी धन विशेष के खिलाफ गए हों... इसलिए बस पैसे बनाइये... और सलफेट से दूर रहिए...

RC Mishra said...

मुझे संदेह हुआ था, अच्छा लगा आपने अपनी बात रखी।

JC said...

टीवी के पर्दे पर चर्चा का विषय बदल गया...जब हम अपने आतंरिक कलह में व्यस्त थे, अपनी अपनी चालें चल रहे थे, तो फिर से एक और 'आतंकवादी हमला' हो गया पुणे, 'महाराष्ट्र', महाभारत पर...मुंशी प्रेमचंद की 'शतरंज के खिलाडी' की याद आगई...

क्या 'सत्य' दोहराता है? तो फिर ग्यानी हिन्दू यह सदियों पहले कैसे कह गए? और 'विदेशी' भी पूछते हैं कि क्या भगवान् शतरंज खेलता है - आदमी क्या केवल एक मोहरा मात्र है?

चाँद की ओर जाते और पृथ्वी को दूर से एक अति सुंदर नील-हरित रत्न समान पा वो प्रश्न कर बैठा कि जहां हम रहते हैं और आदमी आदमी से हमेशा लड़ता दीखता है वो इतना सुंदर कैसे? उसको शायद नहीं मालूम था कि जोगी क्यूँ कह गए कि इससे जुड़े रहते भी इससे इतनी जोर से चिपको मत - 'दृष्टा भाव' अपनाओ और आनंद लो, यदि परमानन्द न भी पा सको :)

Vibha Rani said...

कल एक नाटक देखा- S*x, Morality & Censorship. विजय तेन्दुलकर के नाटक 'सखाराम बाइंडर पर लगे सेंसरशिप के बहाने इन्ही तमाम अ-सरकारी पहरुओं पर बात की गई थी. शाहरुख समर्थवान हैं, नहीं झुके, बडे बडे सामर्त्यवान भी यहां घुटने टेकते हैं, लेकिन एक आम आदमी क्या करे? उसकी आवाज़ कौन सुने? अपनी हिम्मत के बल पर लडता रहे? कबतक? कितना?

मधुकर राजपूत said...

समीक्षा पढ़ने के बाद कमेंट पढ़े। फिल्म के अनुभव से नहीं गुजरा तो आपसे सहमत या असहमत होने का सवाल ही नहीं उठता। रही बात कमेंटबाज़ों की तो आपके 'अपने' हैं। अपने सुख और पीड़ा दोनों देते हैं। जिसकी अभिव्यक्ति जैसे होती है होने दीजिए। कहने दीजिए आपको बिकाऊ। हक़ीक़त को आप समझते हैं या हम। आपके लगभग दो दशक के बेदाग़ सफ़र पर एक केवल चंद कमेंट दाग़ नहीं लगा सकते। आप विचारशील हैं और विचारशील लोग तमाम कोण ज़हन में रखकर हर चीज़ को देखते समझते हैं। हमें आप पर यक़ीन है और ये आपके निजी विचार हैं। किसी के सहमत या असहमत होने से फ़र्क नहीं पड़ता।

Harsh said...

raveesh ji film ko dekhne ke baad logo ka najariya badlega aisi asha hai.... film achchi lagi.
yah btaaye aapne kab dekhi ?
boltikalam.blogspot.com

Harsh said...

raveesh ji film ko dekhne ke baad logo ka najariya badlega aisi asha hai.... film achchi lagi.
yah btaaye aapne kab dekhi ?
boltikalam.blogspot.com

बिक्रम प्रताप सिंह said...

मुझे यह फिल्म बेहद साधारण और हल्की लगी। आखिरी दस मिनट और जॉर्जिया में नायक की समाजसेवा इस फिल्म की सारी गंभीरता को हवा कर छिछला बना देती है। अंतरराष्ट्रीय ताने-बाने में विशुद्ध भारतीय फिल्म है। किसी तरीके से यह मुझे भारत की अंतरराष्ट्रीय फिल्म नहीं लगी। तमाम कोशिशों के बावजूद जौहर जौहर ही रहे और शाहरुख शाहरुख ही। यानी दोनों अपनी सीमाओं से ऊपर नहीं जा सके। मुस्लिम संवेदनाओं और मुस्लिम आतम्वविश्वास पर इससे अच्छी कई और फिल्में हैं।

amit said...

रवीश जी, माई नेम इज़ ख़ान मैंने भी देखी और फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखा...इस फिल्म से काफी उम्मीदें पहले से ही थीं, अपने साथ अपने एक ख़ान जी हां..ख़ान ना कि कान, मित्र को ले गया.. शाहरुख़ ख़ान स्क्रीन पर आये तो हूटिंग शुरू हुई... लेकिन यकीन मानिये फिल्म में कभी भी ऐसा कोई मोड़ नहीं आया जब लगा हो कि दिल को छू गई है... ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ अमेरिका में रहने वाले मुसलमानों की पीड़ा को बयां करती है... इस तरह की दो फिल्में पहले भी आ चुकी हैं... न्यूयॉर्क और क़ुर्बान... हां लेकिन दोनों में ख़ान टॉर्चर होने के बाद टैररिस्ट बन जाता है... और इसमें प्रेसिडेंट को ये बताने कि माई नेम इज़ ख़ान एण्ड आई एम नॉट ए टेररिस्ट...ख़ान निकलता है..
मेरा सर एक छोटा सा सवाल है कि क्या करण जौहर और शाहरुख़ ख़ान इस फिल्म को भारतीय परिप्रेक्ष्य में नहीं बना सकते थे... क्या भारत के करोड़ों मुसलमानों को आज ये सफाई नहीं देनी पड़ रही है कि माई नेम इज़ ख़ान एण्ड आई एम नॉट ए टेररिस्ट... और इस आरोप को तो शाहरुख अब खुद भी झेल चुके हैं... शिवसेना के हाथों... छोटा मुंह बड़ी बात है लेकिन करण जौहर साहब को ही कहना चाहूंगा कि अब आप स्वदेश लौटिये और कुछ फिल्में यहां के इन संवेदनशील मुद्दों पर बनाइये...
करण जौहर पहली बार फैंटेसी, लव लाइफ, डिवोर्स, बाप-बेटे के झगड़े से बाहर निकले हैं... इसके लिये उन्हें बधाई.. लेकिन वो अमेरिका से बाहर कब निकलेंगे...

पंकज बेंगाणी said...

रविशबाबु रंग के अंधें ना बनें. भगवा चश्में बहुत हैं तो हरे चश्मे तो कहीं अधिक है.

समीक्षा अच्छी है. फिल्म चाहे कैसी भी हो क्या फर्क पड़ता है. ना कभी पड़ा था ना पड्ना है. जय हो! गाते रहिए.

pawan lalchand said...

ravishji, apne achchhi samksha likhi hai,
shayad film apko utni gahrai se samajh aa gayi hao..akhir SRK toh pichhle bees barson se aisa gambhir cinema rachte hi rahe hai..
lekin sala es desh mein publik ko chutya bnana ab sabse aasan kam ho gya hai. tabhi toh pichhli kai filmo or ha IPL mein loot-peete khan ne es bar baji mar hi lee. aisa publicity stunt apnaya ki tijory bhar jayegi aur public deewani ban mari mari theateron ke chakkar kategi..tabhi toh khan kabhi barlin toh kabhi kahin aur..film promot krva rahe hai.or yahan publicity ka jimma shuop gaye mumbai ke masiha bal thakre ko..king khan or thakre ke charvyuh mein fansi publik cinema bhag rahi hai or film dekhte hi chakrvyuh tut rha hai lekin tab tak der ho jati hai or king fir king sabit hote hai...

मिहिरभोज said...

आपने अच्छा गाया है.....

MOHD JALISH said...

Ravish ji maine bhi aaj ye movie dekhi,sb kuch shaandar tha,aur is film me wahi dikhane ki koshis ki gayi hai jo lagbhag sacchai hai.aap ki soch b is film pr kafi sarahneey hai.
aap ki nishta pr hame bilkul bhi shak nahi mai aap ko bht kareeb c to nahi janta pr itna zarur keh skta hun ki aap ek eemandar journalist hai.
ek baat aur islam ek aesa mazhab hai jo aman aur mohabbat ka paegam deta hai pr afsos kuch log samajh nahi pa rhe.
at last ek bat aur pta nhi kehna chahiye ya nahi pr mera man keh rha hai keh dun,
I AM MOHAMMAD JALISH SHEIKH, I AM MUSLIM, NOT TERRORIST.
khan is liye nahi keh skta qki mai shahrukh ki tarah khan to nhi pr muslim zaroor hun.

Parul said...

ab to film dekhne ki deri hai :)

therajniti said...

musalman kahate hai ki unhone bharat par raj kiya. wah kahate hai ki taj mahal unhone banwaya. to phir yeh kyo nahi kahate ki train me visphot unhone kiya. sabhi khan atankvadi nahi hote lekin sabhi atankvadi khan hote hai. aap kewal kisi ki shandar upalabdhi ko apane se jod kar mat dekhiye

विजय प्रकाश सिंह said...

रवीश जी, आप पर पेड रिव्यु का संदेह प्रकट किया गया और आप आहत हुए । आप ने डिनायल भी लिखा । मैने भी अपनी टिप्पड़ियों मे कई बार आप के लेखन की खुल कर आलोचना की है , इस लेख के बारे मे भी अपने द्रूष्टिकोण से फिल्म की समीक्षा की है । आप ने उसे स्थान दिया, मतलब हटाया नहीं , इसके लिए शुक्रिया ( At the outset ) । किसी भी तरह से पैसा लेकर लिखने की बात सोची ही नही जा सकती, इतना विश्वास है इसलिए आप के ब्लॉग को पढ़ते और टिप्पड़ी देते हैं ।

लेकिन, वैचारिक सोच में आप के झुकाव से इन्कार भी नहीं किया जा सकता । इस लिए कई बार अपने द्रूष्टिकोण को साबित करने के लिए एक पक्ष के वकील या प्रवक्ता की तरह विरोध की दलीलें को उपेक्षित कर आप बात को आगे बढ़ाते है, परन्तु इसके साथ पत्रकार की neutrality का ध्यान भी रखिये ।

आधुनिक मीडिया मे पेड न्यूज के कॉन्सेप्ट का पता चलने के बाद विश्वसनीयता का वही संकट है जो मैच फ़िक्सिंग के बाद क्रिकेट पर था ।

आप पर विश्वास है , आप का लिखा अच्छा लगता है उसे पढ़ते रहेंगे और जहां वैचारिक मतभेद होगा अपना नज़रिया लिखते भी रहेंगे ।

devsinghji said...

सर समीझा आप बहुत अच्छी करते हैं... लेकिन फिल्म पसंद नहीं आई... ये एक साधारण फिल्म है.. करण जौहर टाइप... जिसमें ज्यादा तड़का और दिखावा होता है.... लेकिन ये फिल्म देश को प्रभावित करेगी... लगता नहीं है...। आप कुछ ज्यादा ही प्रभावित लग रहे हैं... क्या बात है...

निखिल आनन्द गिरि said...

एक एसएमएस से फिल्म का सस्पेंस तोड़ने की मुहिम चल रही थी..आपने फिल्म देखने की इच्छा फिर से जगा दी.....

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अपनी लोकप्रियता का दुरुपयोग तो नहीं कर रहे आप...? यह आलेख पढ़कर मुझे पूरा शक हुआ जा रहा है।

डॉ.कुमार गणेश 369 said...

भगवान,आप ने 'माय नेम इस खान' को 'हिंदी की पहली अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म' कहा है | या तो आप का फ़िल्म-ज्ञान कमजोर है या फिर आप को 'हिंदी की पहली अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म' का अर्थ ही मालूम नहीं है | क्या बात है,एक साधारण-सी फ़िल्म से आप कुछ ज़्यादा ही प्रभावित हैं ? शाहरुख़ और इस फ़िल्म के 'बिरद-गान' में आप ने कुछ ज़्यादा ही अतिरंजना से काम लिया है | पैसा फैंक कर दिखाया जा रहा है कि जैसे शाहरुख़ खान ने दुनिया जीत ली है | ऐसा लगता है मानो मीडिया एक 'भांड' के हाथों बिक गया है | अरे,शादियों में पैसे ले कर नाचने वाले 'भांड' क्या जानें कि भारतीयता क्या है ? क्या 9/11 के कारण अमरीका में सिर्फ़ मुसलमान ही पीड़ित हुए ? और फिर 'इस्लामी आतंकवाद' के लिए ज़िम्मेदार कौन है? क्या यह एक बहुत बड़ा सच नहीं है ? अपने कट्टरवाद की केंचुल से बाहर आ जाओ,कहीं अछूत नहीं रहोगे | यूँ बताया जा रहा है मानो बाल ठाकरे ने कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया है | ये क्यों भूल जाते हो कि मुंबई को 'मुस्लिम माफिया' और राष्ट्रद्रोही तत्त्वों से शिवसेना ने ही वर्षों तक बचाया है | फ़िल्म का विरोध ग़लत हो सकता है,मगर ठाकरे ने ग़लत क्या कहा ? हाँ,ठाकरे द्वारा मियाँदाद का स्वागत ग़लत था,तो दिलीप कुमार का ' निशाने-पाकिस्तान ' स्वीकार किया जाना भी ग़लत था | एक बात भली प्रकार समझ लीजिए कि 'राम मंदिर आन्दोलन' साम्प्रदायिक नहीं है | आप जैसे कुछ भटके हुए लोग ही राष्ट्रीय अस्मिता के इस प्रवाह को 'सांप्रदायिक आन्दोलन' कहने का पाप कर रहे हैं | प्रभु श्री राम आप को सद्बुद्धि दे | शाहरुख़ खान को पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए इतना ही प्रेम उमड़ रहा था तो नीलामी के वक़्त वह क्या सो रहा था ? बाद में रोने का क्या मतलब ? इस लिए एक साधारण-सी फ़िल्म को बेकार में ही 'महान फ़िल्म' सिद्ध करने के झूठ का हिस्सा मत बनिए | अगर पाकिस्तान के इतने विश्वासघात के बाद भी वहाँ के खिलाड़ियों और कलाकारों के प्रति इतना ही प्रेम फूट रहा है तो ये लोग 'देशद्रोही' ही तो हुए | पुणे बम-विस्फोट के बाद भी नहीं चेतोगे क्या ? सांपों को दूध कब तक पिलाएँगे ?

Neeraj नीरज نیرج said...

:) जिन्हें हमेशा ही रवीश की सोच से परहेज़ होता है वो यहां क्यों आते हैं.. और रवीश से भी कि वो हमेशा उन्हें ही क्यों जवाब देते हैं जो उनसे असहमत होते हैं।
विचारधाराओं के संघर्ष में ये खुजली और ज़ालिम लोशन का रिश्ता?

शशांक शुक्ला said...

विचारों से सहमत हूं। ये बात तो बिलकुल ठीक है कि मुसलमानों के हित की बात करने के लिये खुद उन लोगों को आगे आना होगा न कि रिजर्वेशन लेकर, दूसरी बात ये कि भीड़ में खुद को तनहा समझने वाले की कभी किसी भी प्रकार की मदद सार्थक नहीं होती है

sahespuriya said...

अभी अभी फिल्म देखी है, इस फिल्म से उनको ही इनकार हो सकता है जो अच्छाई मैं बुराई तलाश करते है. यहाँ लोग आपकी लेखनी पर सवाल उठा रहे है. लगता है आप भी हताश हो गये ? इन लोगो को तो कीड़े निकालने की पुरानी आदत है. आप लगे रहिए, दो चार के असहमत होने से क्या फ़र्क़ पड़ता है वो भी उनके जिनका पेशा ही असहमत होना हो.

प्रशांत पाण्डेय said...

मकसद है खुद बीमार बन कर समाज की बीमारी से लड़ना।

लाजवाब।

Archana said...

RAVISH JI NAMASKAAR........
ACHHI SAMIKSHAA LIKHI AAPNE...POST TO PAHLE HI PADH LIYA PER SOCHA ..JABTAK FILM NA DEKHU TAB TAK COMMENT NA KARU...
FILM DEKHI ACHHI LAGI....KHAAN SURNAME KE BAARE MEIN TO "SHABDO KA SAFAR" MEIN KAAFI VISTRIT CHARCHA HUI...ACHHA LAGA TO KHAANO KA SAFAR...
AB AAPKI SAMIKSHAA...KHAAN KA MATLAB TO MUSALMAAN HI HOTA HAI...PER HA HAR MUSALMAAN AATANKVAADI NAHI HAI....JIS TARAH HAR HINDU..BHI AATANKI NAHI HAI...KYUNKI AB TO HINDU AATANKVAAD BHI SAR UTHA RAHA HAI...KUCHH LOGO KO FILM BEKAR LAGI ...KYUNKI USME UNHE MANORANJAN KE KUCHH TATVA NAHI DIKHE...KUCHH BOR BHI HYE...PER AYE FILM JIS MAQSAD SE BANAI GAYI...KHUSI HUI KI US DISHA SE BHATKI NAHI...

Archana said...

एक फिल्म से दुनिया नहीं बदल जाती है। लेकिन एक नज़ीर तो बनती ही है। जब भी ऐसे सवाल उठाये जायेंगे कोई कऱण जौहर,कोई शाहरूख के पास मौका होगा एक और माइ नेम इज़ ख़ान बनाने का।
BAHUT SAHI KAHA AAKHIR KAB TAK HUM SABHI KO APNI BAAT KAHNE KE LIYE KISI SAHARE KI JARURAT PADEGI....KYUNKI SAHRE DENEWALE TO KHUD SABSE BADE BESAHARE HAIN

इरशाद अली said...

Guru, Bariya chal nikli.सशक्त प्रयास

उम्दा सोच said...

रवीश जी आप की इस बेशर्म पोस्ट का जवाब इस लिंक का पोस्ट है ,और हां महफूज़ भाई की टिप्पणी को साथ देखना मत भूलना!पढ़ कर चिंता ज़रा भी मत करना दोस्त और शर्मिंदा तो बिलकुल भी मत होना, क्या है जैचंदो की जमात भर भर के है इस देश में सब आप के स्तुति वंदना तो तत्पर खड़े रहेंगे और आप को पद्मश्री भी ज़रूर दिलाएंगे ,आप के चेहरे पर आज तक जेहाद के नाम पर मारे गए भारतीयों का लहू थोड़ेही न पोंता जाएगा, वैसे भी किसमे बूता है जो देशभक्ति का जज्बा दिखाए और सच बोलने को खडा हो ! टाइम और सरकार दोनों भाटो का चल रहा है दोस्त !

http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=1583

Amitraghat said...

"मैने पूरे 2, हाँ-हाँ पूरे 2 लोगों को रोका पिक्चर देखने से, बाद मे उन्होने मुझे दुआएँ दीं..."
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

Dr S Shankar Singh said...

आजकल फ़िल्में और फिल्मवाले चर्चा के केंद्र में हैं. एक भी फिल्म ऐसी नहीं बन रही जो लीक से हटकर हो और समाज का मार्गदर्शन कर सके. आक्रोश, अर्धसत्य, शतरंज के खिलाड़ी, सदगति, सारांश जैसी फ़िल्में अब कहाँ बनती हैं. शाहरुख खान तो ऐसी किसी लैंडमार्क फिल्म के लिए नहीं जाने जाते हैं. मीडिया द्वारा फिल्मों और फिल्मकारों को रोल माडल के रूप में प्रस्तुत करना हमें किस ओर ले जाएगा. फिल्म मनोरंजन की वस्तु है, लेकिन अनुकरणीय नहीं. हमें बहुत से काम करने हैं. हमारी समास्याएं गरीबी, भुखमरी की हैं. फ़िल्में इसमें नहीं आती

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

समीक्षा बहुत अच्छी लगी, बावज़ूद इस बात के कि फिल्म मैंने अभी तक देखी नहीं है. जो प्रतिक्रियाएं आई हैं उनमें से अनेक तो नितांत प्रत्याशित ही हैं. जो मित्र संघ के नज़रिये से अभिभूत हैं उन्हें भला यह फिल्म और आपकी समीक्षा क्यों पचने लगी? फिल्म कैसी भी हो, इन मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रिया यही होनी थी. काश! ये लोग नागपुर से अपने दिमाग के तालों की चाबी प्राप्त कर उसे कुछ देर तो खुली हवा दे सकें.

bhuwan chandra said...

ravish g: hatasa or nirasa ke ise daur me aapki samiksha samajh me aati hai. moradabad mai kam karte hue mujhe v aap jaise anubhav hote hai. logo ka aage aana sukhad hai. lekin badlav ki ise bahar ko abhi bhi intajar hai..rijwan khan ka kirdar hossla deta hai lekin use hossle ko jinda rakhne ke liye logo ka sahara ghum fir kar khadi kapde pahnne wale neta ko hi banna padta hai.....ummeed hi kar sakte hai ki cinema ke 3 ghante nafrat ke hajaro ghanto per bhari padege...... bhuwan chandra bchandra35blogspot

lamho ki guzarish said...

रवीश जी आपकी समीक्षा पढ कर फिल्म देखने गई लेकिम टिकट नहीं माल पाया । उिल्म देखने के बाद ही कह सकूंगी कि कैसी फिल्म है बहरहाल इतना तो पता है कि हिन्दी की पहली अन्तरराष्ट्रीय फिल्म तो नहीं है ।

umar said...

film MNIK mein shahrukh ne ek jagah QURAAN ka hawala de kar bataya hai ki agar ek begunah marta hai to samjho sari insaniyat ka khoon ho gaya . iska saaf matlab ye hai ki islaam ka AATANKWAAD se kuch lena dena nahi hai. kuch logo ke dil mein islaam ke liye galat dharna ban gayi hai jo itni aasani se dur nahi hogi .ek bhai ne likha hai ki har khan aatankwadi nahi hai par har aatankwadi hi khan kyun hai .main un se puchta hu ki wo khud soch kar aur tahya purvak bataye ki aisa kyun hai???????????????????????????????????

MOHD JALISH said...

mujhe ek baat nhi samajh aati log muslim ya khan k naam c itne bhdak kyun jate hain.musalmanon ne bhi is desh ke liye bht si kurbaniya di hain.shayd musalmano ki hi den hai ki aaj bharat har mahine carono rs ki kamai karta hai tourist ke jariye.hai kuch muslim galat rasre pr chale gaye hai ye baat sach hai lekin phir bhi jaada tar log sahi raste pr hi hain.shivsena wale jo kara rhe wo kaun sa bht acha kam kr rhe,aur jo log ye kehte hain ki bharat sirf hiduon ka hai to wo ek baat samajh le ki bharat sare mazhab ke desh hai.

Naseem Ahmad said...

ravish ji pranaam...is report ko padne ke baad aisa laga jaise aapke sabhd tasvir bankar aankho ke saamne aa gaye ho...aap ek behtrin reporter hain isme koi do raay nahinhain .. journlisam main aane wali peedi ke liye aap ek pranashrot hain ap se bahut kuch sikhne aur samajhne ka mauka aapke in articalo se milta rehta hain ...u r a gret jouranalist...

रज़िया "राज़" said...

हमारे हिन्दी के टिचर कहते थे कि अगर आदमी को किसी पर भरोसा नहिं होता तो वो आदमी अपना "सर" भी तूम्हें काट कर दे देगा तो मांगने वाला तो यही कहेगा कि उसने अपने सर का वजन कम करने को अपना सर काट दिया।

रवीश जी आप किसी ओर कि बातों पर माता जाईये। उनकी फ़ितरत में ही होता है नूक़्ते निकालना। ये तो आपको समज़ ही नहिं पायेंगे। या जानबूज कर अंधे हो जाते हैं।
किसी की सफलता देख नहिं पाते या तो सच्चाई को हज़म नहिं कर पाते।
GRE8....artical...welldone....

watchdog said...

राहुल से कबीर ख़ान होते हुए रिज़वान ख़ान तक की शाहरुख की नामकरण यात्रा दिलचस्प है. वो रिज़्वान अन्सारी या रिज़वान सिद्दीक़ी क्यूं नहीं हो पाया? राहुल के साथ तो कोई सरनेम नहीं जुड़ा था. पर ज़ाहिर तौर पर वो ऊंची जाति का ही प्रतीत होता था. वैसे भी फ़िल्म इंडस्ट्री में ’अ’ख़ानों का अकाल ही है. यानी अब इन्तज़ार है कुछ मुस्लिम सोशल इन्जीनियरिंग का.

vidrohi said...

Ravishjee,

Aapko safai dene ki jara bhi jarurat nahi hai. Aap thoda pani pijiye aur aur aaraam se achha kaam karte rahiye. Aap haathi hain, bhaunkne wale kutton ko aap kuchal sakne ki kshamata rakhte hain. isiliye aapka clarification dena jaruri nahi hai. Agar main paise lekar bhi aapke jaisa review likh pata, aapne jis imandaari se society ko dekha hai, main dekh pata. tab bhi mujhe kisi ke kahne sunne ka jara bhi farq nahi padta.
Aapki is soch se bahut ittefaq rakhta hun main. Aap jaise sachhe logon ki jarurat hai hamein, media ko, samaj ko aur desh ko. Aap chahe ise hansi mein ya mazak mein uda dein, lekin aapki taraf bahut log ummid bhari nazar se taakte hain. jaise hain waise hi rahiyega.Aur NDTV se hi paise lete hain, ye ek private baat hai. aap apni wife se bhi kabhi kabhi paise maangte honge, kya iski charcha karte hain aap blog pe. purane akhbaar ko bechkar jo paisa milta hai aapko, uske baare mein bhi to koi jikr nahi karte aap, fir iska kyun. kisi murkh ke liye itni safai dena achha nahi hai.
Wish you all the best. We all love you, your thought, your way of doing thigs.
Aapka
Ranjeet

manas mishra said...

रवीश जी, मैं हमेशा सबसे पूछा करता हूं कि हिन्दुस्तान में हमेशा हिन्दुओं की भावनाओं का मर्दन करके बुद्धजीवी बनने की परम्परा क्यों बनती जा रही है। राम के इस देश में उन्ही के जन्मस्थान पर अगर एक मंदिर बन जाय तो क्या गलत हो जायेगा। ये तो बचपन से ही इतिहास में पढ़या गया कि मुस्लिम आक्रमणकारी आये लूटा और तलवार के दम पर धर्म का प्रसार किया। गजनी बाबर औरंगजेब के अत्याचारों को इस देश ने सदियों से सहा। फिर अंग्रेज आये। उनके दमन को सहा और जब देश आजाद है तो अपने अधिकारों के लिये अपनों से ही लड़ायी। धर्मनिरपेक्षता का ढिढोरा पीटने वाले कभी काश्मीर की घाटियों में भी जाकर कश्मीरी पंडितों का दर्द समझे। हिन्दू- मुस्लिम दंगो पर बनी फिल्मों में हिन्दुओं को ही दोषी दिखाया जाता। लेकिन बंगाल के नोआखली के उपर भी किसी ने नजर डाली। हिन्द् अगर अपनी सभ्यता और संस्कृति की बात करता है तो राम और कृष्ण के अस्तित्व की बात करे उऩके लिये मंदिर की बात करे तो सांम्प्रदायिक हो जाता है। सदियों से चले आ रहे अत्याचार को सहते कोई प्रग्या भारती रानी दुर्गवती बन जाय तो आतंकी। और सिमी के पूरे नेटवर्क का केन्द्र बना रहा अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के छात्रावासों के अन्दर जाकर किसी ने वहां की रहस्यमयी गतिविधियों के बारे में जानने की किसी ने कोशिश नही की। हमें ये तो पढ़या गया कि अकबर बहुत महान था लेकिन वीर हकीकत राय के बलिदान कोई जानता भी नही। वाह री धर्मनिरपेक्षता।

Priya said...

aapka about me kaafi pasand aaya

एहसास.........अभी जिन्दा है. said...

but RAvish ji

Main apse ek personal Question karna chahta tu?

Kya Shahrukhkhan,ki airport controvarcy self created nahi thi?sayad airport ki futeg aur unke PR ka iska pramotion ek sawaal khada karta hai.


I think SRK is only a businessman not a socail worker.


fir bhi concept accha tha.agar controvercy creat na karte ko flm super floop jati.