तुम जाति की बात क्यों करते हो?

दवा की जाति के बाद

जाति पर बहस हमेशा खेमे में बंट जाती है। भारत की इस सामाजिक उपज को लेकर सब दूसरे खेमे से झगड़ा करना चाहते हैं, अपने खेमे के भीतर इस सवाल को नहीं उठाना चाहते हैं। बल्कि यहां तक कह दिया जाता है कि इंजीनियर की जाति है, डाक्टर की जाति है और पिटाई के वक्त पत्रकारों की भी जाति बन जाती है। यह एक यथार्थ है। लेकिन क्या यह यथार्थ नहीं है कि बहुत से लोगों ने इसे चुनौती भी दी है। चुनौती देने वालों ने धर्म की सत्ता को भी ललकारा है तो धार्मिक दादाओं ने उसे नास्तिक धर्म में डाल दिया। हाल ही में कस्बा पर दवा की जाति को लेकर एक लेख लिखा। लेख दो बातें ज़ाहिर करने के लिए था। पहला, क्या वाकई में कोई दवा कंपनी अपने विस्तार के लिए जाति का सहारा ले सकती है? मुझसे यह सवाल छूट गया कि दूसरे राज्यों में जहां उस जाति के लोग नहीं रहते हैं वहां यह कंपनी कैसे खड़ी होगी? कंपनी ने अपना बड़ा नाम बनाया लेकिन जाति से क्यों चिपकी रही? दूसरा मकसद यह था कि बिहार में जातिगत पूर्वाग्रह बनाने के लिए किस तरह से किसी को भी ब्रांड कर दिया जाता है। इसीलिए मैंने कंपनी का नाम नहीं लिखा, न ही बताने वालों से पूछा कि किसकी कंपनी है। मेरी दिलचस्पी इसी में थी कि ऐसा हो रहा है। अगर ऐसा हो रहा है कि तो कहीं यह तो नहीं हो रहा कि बिहार में आम आदमी इलाज के लिए मर रहा है और डाक्टर किसी और धरातल पर खेल कर रहे हैं।

बहरहाल इंटरनेट पर इस तरह के मुद्दों पर स्वस्थ्य बहस नहीं हो पाती। अजीब अजीब तर्क दिये जाने लगते हैं। यहां तक कि धमकी भी। आखिर जो बात कई लोगों की ज़ुबान पर है उसे लिख देने से बवाल कैसा। लगता है कि लोग अभी भी यह मान कर चलते हैं कि जाति से ही सबकुछ हासिल हो सकता है। बहुत कुछ होता भी है। जाति सवर्णों को ही क्यों स्वाभाविक लगती है? क्योंकि इससे उन्हें अनचाही सत्ता मिल जाती है। सत्ता में बैठे लोगों का एक ग्रुप बन जाता है। जिसका काम बहुत मामूली होता है। ट्रांसफर करवाना, मनचाहे पद लेना और कमीशन का हिसाब। बहुत हुआ तो किसी बेरोजगार को नौकरी का जुगाड़। यह वो काम है जो जाति के नाम पर हर दिन चलता है। सभी जाति में हो रहा है। एक बड़ा मौका आता है चुनाव का, जब जातियों का गठजोड़ खुलकर बनाया जाने लगता है। हमारी राजनीति अब जाति व्यवस्था का विरोध नहीं करती है। बल्कि जाति की व्यवस्था से अपनी सत्ता हासिल करती है। इसीलिए अब जाति एक राजनीतिक यथार्थ भी है। पहले भी था और आगे भी रहेगा। हम जैसे जाति के विरोधी भी यथार्थ हैं। पहले भी थे और आगे भी रहेंगे।

वैसे क्या यह अध्ययन का विषय नहीं है कि आज के आधुनिक समाज में जाति और जातिवाद किस तरह रूप बदल रहे हैं। किस तरह जाति अपनी नए अस्तित्व को गढ़ रही है। किस तरह जातियां नए समीकरणों के सहारे सत्ता में अपनी जगह बना रही हैं। लेकिन इस बहस तक पहुंचने से पहले ही किसी ने टिप्पणीकर्ता को धमका दिया। मुझे समझ नहीं आता कि इसमें हिंसक होने की क्या बात है? हर जाति को लेकर पूर्वाग्रह है। पूर्वाग्रह की भी अपनी राजनीति है। खेमेबाज़ी है। पूर्वाग्रह के बनने की भी अपनी सामाजिक राजनीतिक प्रक्रिया है। जैसे बिहार में विरोधी दल के लोग चुटकी लेकर कहते हैं...ताज....का और राज...का। तो यह पूर्वाग्रह एक खास राजनीति की देन है। यह तभी बना है जब नीतीश की सरकार बनी है। पहले यह पूर्वाग्रह क्यों नहीं था? किस तरह से हताशा में भी पूर्वाग्रह गढ़े जाते हैं। जाति और पूर्वाग्रह पर भी अच्छे लेख आ सकते हैं। उसे उदार दिल से पढ़ा जा सकता है। खुलकर बहस हो सकती है। लेकिन कुछ लोग अपनी जाति के नाम पर मोर्चा खोल देते हैं।

25 comments:

अनूप शुक्ल said...

सच में जाति बड़ा लफ़ड़ा है।

Sanjay said...

नहीं हो सकता रवीश भाई. यहां जाति का सवाल भी जातिवाद के चलते ही उठता है. विरोध करें तो गालियां सुनें. अच्‍छा है कि शब्‍दों से किसी को भस्‍म नहीं किया जा सकता वरना इंटरनेट पर जातिवाद के खिलाफ बोलने वालों को कर दिया जाता. मुद्दे छोड़कर विरोध करने वालों को मुद्दा बनाने का शगल जब बहस पर हावी हो जाए तो किसी स्‍वस्‍थ बहस की कल्‍पना करना ही बेमानी है. दुर्भाग्‍य से यहां होता यही है इसलिए कोई स्‍वस्‍थ बहस नहीं होती. जहर उगलने का काम किया जाता है और विरोध करने वालों को गरियाने, बेइज्‍जत करने की कवायद शुरू हो जाती है. सो कौन चाहेगा कि बैठे ठाले गालियां सुने. आपने इस मुद्दे को उठाया .... आपका शुक्रिया.

JC said...

‘Her sataya hua shayar hota hai’, aur “Birds of the same feather flock together” adi ‘satya’ ka satva athva nichorda mane gaye hain…
Agni shikha, athva deepak ki lau per parvana kyun jalta hai?
Hari ananta hari katha ananta ke anuroop ek sarvamanya drishtikone shayaron ka bhi hai, jo ise un dono ka anadi kal se chale aa rahe prem ka dyotak mana gaya hai…
Aur, gyani-dhyani Hindu bhi atma ko parmatma mein jordne athva milane ki salah dete rahe hain. Unki yeh bhi manyata hai ki her prani shakti athva energy (jaise ‘Agni’, Ma Kali ki lal jivha ya juban) se arambh ker kisi ek nirdharit chakra ki bhanti 84 lakh yonion se utpanna hone aur bahari avaran ke jalne ke bad hi (parvana unmein se ek hai) wo shakti manav shareer dharan kar pati hai…
Doctor bhi bahar se dekh kuch nahin bata pata – wo apki juban aur nabza dekhker hi kuch kuch jan pata hai, jaise shayar bhi koshish karta hai ‘lifafa dekh majmoon bhanpane ka’!
Moti gahrai per milta hai! Doobne ka bhi khatara rahta hai. Gautam Buddha ko antatogatva ‘satya ka bodh’ na ho jata, wo bhi buddhu hi kahlate!

Sanjay Sharma said...

सिथेंटिक की बजाय गार्डन बरेली की साड़ी का घूंघट !
"जिसके घर शीशे के होते हैं , वो दूसरे के घर पत्थर नही फेंका करते."

MUKHIYA JEE said...

Ravish jee , I am watching all this "tamasha" yesterday onwards - you can read my comment on my blog http://daalaan.blogspot.com

MUKHIYA JEE said...
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Anti said...

Ravish Babu ,

I came to know that under construction ONE MALL roof in your residence area was collasped and that DEVELOPER / BUILDER distributed many crores to News Channel Journalists to stop this news which could have damaged his business prospectives !

Sir , Being a leading we all expect a detail report on JOURNALIST BLACK MONEY :)

By the way , If you want money from Drug manufacturers - We will certainly put your words - but , simple don't tag castiest remarks on anyone !

Anti

कुमार आलोक said...

जिस तरह से एक साथर्क बहस को जाति का चोला पहनाया गया उससे यह जाहिर होता है कि जातिवाद के प्रनेता इलीट क्लास के लोग है ना कि समाज में हाशिये पर रहने वाले लोग. क्या गुनाह किया रवीश जी ने , उन्होने बहुत ही छोटे मुद्दे को छुआ है , हमारे समझ से किसि भी जाति विशेश को चोट पहुंचाने का इरादा नही रहा होगा लेखक का .
नार्थ बिहार का पूरा इलाका आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसो दूर है , छपरा के बस स्टैन्ड पर चले जाइये . कोइ भी गरीब चहे वो किसी जाति विशेश का हो , पटना के आलिशान नर्सिन्ग होम के दलाल सक्रिय होते है . उस मरीज को प्रलोभन देकर उनकी जिम्मेद्दारि होती है कि उसे फ़लां नर्सिन्ग होम तक सिर्फ़ पहुंचा भर देना है . दलाल का कमीशन फ़िक्स होता है . अब भला मरीज जिये या मरे इसकी चिन्ता किसे है . ये दलाल सिर्फ़ छपरा तक सिमित नही है बल्कि इनका तन्त्र पूरे बिहार में फ़ैला है . जाति की आड लेकर ये लोग गरीबों का खून चूस रहे है . स्वास्थ्य ही नही शिक्शा का महकमा भी इसि रोग से ग्रस्त है, बहस को और आगे ले जाइये , समाज को बदलने के रास्ते में ऐसी बाधायें आती है ,
आपका
बेनाम

Jitendra said...

Sahi bol rahe ho alok. Dalalo kee kami nahin hai. Kuchh jaati ke bhee dalaal hote hain. Aap bachche hain aapko pata nahin hoga kyon kee aab samaj jagrit ho gaya hai. apane baap dada se puchhiyega. Pahale ek vishesh jaati ke log communist ke naam par garibo ke dalaal baan jaate the. Jahanabad me jaiyega to dekhane ko milega. Ab aisa nahin hota hai. maar ke bhaga deta hai sab.

कुमार आलोक said...

जितेन्द्र भाइ आप नाहक परेशान है , मैं आप से कमुनिस्ट आंदोलन और उसकी सफ़लताओ और विसंगतीयों की ओर अपनी बहस को नही ले जाना चाहता. जिन्होने गरीबों के नाम पर दलाली की इतिहास ने उन्हें कुडेदान में दाल दिया. प्रगतीशील लोगों ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड लिया. अगर बिहार की बात करें समुदायों को ही ले ले , किसि वर्ग का नेता लालु जी है तो किसी के रामविलास जी तो कही नीतीश जी , ये लोग कम से कम राजनीति की मुख्य धारा के नेता जरूर है. बिहार राजनिती की चाभी भी इन्ही तीन नेताओं के पास है , सारे अगडे पिछडे इन्ही तीनों के पिछे लामबंद है ....गलती किसकी है विचारियेगा तो बेहतर होगा.

Jitendra said...

Alok
Agar Bihar kee janta een teen gine hue netaon ko apna representative maanti hai to eesme galti dhundhane kee gunjais kahan hai? Galti hum tab dhundhate hain jab een teen netaon kee jagah apane jaati ke neta khojate hain.

कुमार आलोक said...

जितेन्द्र भाइ आप तो बिल्कुल समज्वादी विचारधारा के है , अपनी सोंच का इस्तेमाल धरातल पे किजिये , जातिय बंधन को तोडिये और नये भारत का निर्मान करने में रविश भाइ की मदद किजिये.

Mukund Kumar said...

ravish jee hindi news channel ki tarah apne blog per bhi TRP daba
badhane main koi kasar nahi chhorte.Ravish jee jab bhi bihar jate hain hain to koi masala le kar hi aate hain wahan se.Bhai sahab patrakar hain ..DURAGRAH ki bat to ya to peshe ne sikhaya ya phir metro ki naukri ne .Bari rajdhani se chhoti rajdhani ki tasweer.Chhoti rajdhani main kisi vyakti vishesh ki tasweer,aur ab JATI vishes ki rangin photo.Dusre rajyon ki tarah bhi bihar main bhi ek hi vastu ke liye alag-2 sambodhan hain,ravish ji kabhi janna na chaye ya phir jan kar bhi likhne se parhej karte hain(inke hi ek lekh se pata chala).Ho sakta hai is tasweer ke bad ravish ji KA DURAGRAH kisi ek JILE ke liye bhi ho.Khair ye wo to kar nahi sakte ,inki kalam main utni shakti to chhan bhar ke liye bhi nahi aayegi.Waise DURAGRAH bhi bajar ki hi den hai,AUR BIHAR,BIHARI ke liye to puchhiye mat.Ravish ji ki bhi naukri hai,aur unka bhi apna ek samaj hai,sab log to bas usi samaj ke liye jeete marte hain to ravish jee kyon achhute rahe.

Nilotpal said...

Ravish ji ne ek achhi bahas ki shuruat kee hai. Kintu mere khyal se is bahas ko aur bhi vyapak banaya jaa sakta tha. Durbhagyawash bahas ghoom fir kar jaati ke jhagade tak pahunch gayee hai aur iski disha bigad gayee hai.

Behtar hota agar Ravishji medicine ke marketing channels aur unke taur tarikon ka samuchit adhyayan karte. Jo log bhi chikistakiya peshe se jude hain woh jaante hain ki medicine companies kis tarah se apne dawaon ki marketing karti hain. Chunki dawayen doosre consumer products se bhinn hain, inki marketing ka tareeka bhi alag hai. Main Ravishji ke anubhavon se shat pratishat sahmat hoon lekin mere khyal se unhone nishkarsh mein jaldbaaji dikhayi hai. Medicines ki marketing saare desh mein kamobesh ek tareeke se hi hoti hai (aisa main apne mitron aur is industry ko janane walon se suni baat ke adhar per kah raha hoon, maine bhi koi primary research nahin kiya hai). Haan..kuchh logon ne marketing mein ek naya dimension jod diya hai.

Ek baat to hai ki jaati ka angle daal dene se mamla sansanikhej ho jaata hai, aur aap patrakar to hain hi. Fir acharaj ki kya baat hai!!!

राम एन कुमार said...

हम जब बच्चे थे और स्कूल मे थे तब जातिवाद के पक्के विरोधी थे. अपने जाट से बाहर वालो की हमेश हेल्प करने की कोशिश करते थे ताकि कोई यह न कहे की सवर्ण है इसी लिए दुसरे जाती वालो से दूर रहता है. फिर भी हाय रे किस्मत लोग कह ही देते थे. लाख कोशिश किए की जाती की दुनिया से बाहर आ जाए..दुनिया ने आने न दिया..तब तो बालमन था..अब तो परिपक्वा हो चुका है और जाती-धर्म सब अच्छी तरह से समझ मे आता है. कही जाओ तो लोग आपकी जाती जरुर पूछते है. मैंने सरनेम कुमार रखा है तो लोग फैमिली का सरनेम पूछते है..वाह रे दुनिया. अभी मैं बम्बई मे था एक लड़की से मिला जिसका सरनेम भंडारे था. उसने पूछा बिहार के हो. यू बिलोंग टू लालू'स लैंड. वह बिहारी जात से ज्यादा लालू से नफ़रत हो गई. आख़िर क्या किया लालू ने. वहा बम्बई मे भी जातिवाद है लेकिन बिहार की तरह जहर घुला हुआ नही है.
चार जात भूमिहार ब्रह्मण, मैथिल ब्रह्मण, राजपूत और कायास्थो ने बिहार मी जमींदारी कायम रखी. बाद मी यादव, कुर्मी और पासवान शामिल हो गए. बाकि गए तेल लेने. किसी को मतलब है क्या..

deepak said...

ravish bhai,apse jankar accha laga ki vyavsik bulandiya hasil karne ke liye ek pharma company jati ka sahara kis tarah le sakti hai,lekin ye keval bihar ki hi kahani nahi hai,kya aap khud isse vakif nahi hai ki aiims jaise pratishtishthith sansthan ko bhi jati ki sarandh ne barbad kar rakh diya

मंजीत ठाकुर said...

रवीश जी, यह ज़रूर अध्ययन का विषय है कि आज के आधुनिक समाज में जाति और जातिवाद किस तरह रूप बदल रहे हैं। किस तरह जाति अपनी नए अस्तित्व को गढ़ रही है। ग्लोबलाईजेशन के दौर में अपनी अस्तित्व बचाए रखने के लिए ऐसा करना ज़रूरी है। हिंदी फिल्मों के शौकीन होंगे तो ज़रूर देखते होंगे कि आखिरी रील तक खलनायक मार-कुटाई करता है? जातियां नए समीकरणों के सहारे सत्ता में अपनी जगह बना रही हैं, क्योंकि वह ऐसा न करें तो कहां जाएं, सत्ता की आदत भांग की पिनक से भी ज्यादा मजेदार होती है, ऐसा तो आप वरिष्ठ होने के नाते जरूर जानते होंगे। रही हिंसक होने की बात यह अंदर से कमजोर वर्ग हमेशा हिंसा का सहारा लेता है। कमजोर लोग पहले मुक्का उठाते हैं।

Neeraj Sharma said...

Ravish Saheb Namaskar!
"DAVA KI JATI" ko maine V padha aur swabhav ke anusar kuchh kahne ko mai vivash ho gaya hun.
Kabir ne kaha tha " JATI NA PUCHHO SADHU KI PUCHH LIJO GYAN,MOL KARO TALWR KI PADA RAHNE DO MYAN".
Islie Dava kaun banata hai,kaun bechta hai, mahatvapurn nahi hai. Us dava se phayda ho raha hai ya nahi? mahatvapurn jyada hai.
Aur vaise V jis desh me rajniti jatigat aadar par hoti hai, Mudde jatiye samikarno par tay hote hain vahan is tarah ki apechh karna hi vyarth hai.
Aur kahte hain ki BAAT NIKLEGI TO BAHUT DUR TAK JAYEGI..........
NEERAJ KUMAR
Zee News

Anti said...

नीरज जी -
दरअसल रवीश बाबु का इशारा बहुत सारी जगहों पर है - इन्होने ने लगभग मान लिया था की एक ख़ास जाति का खात्मा बिहार से हो चुका है - जब उक्त खास जाति अपने प्रतिभा की बदौलत आगे बढे टू वह रवीश बाबु की नज़र मे जात पात नज़र आता है और अगर रवीश बाबु फलाना "झा" की मदद से अपनी नौकरी मजबूत करें तो वह "प्रतिभा "

वाह - भाई वाह !

Neeraj Sharma said...

anti Jee! Namaskar i dont know who r u?
magar ek baat to tay hai ki ravish Jee ke bare me aap kafi-kuchh jante hain.
Aapki baat kitni sahi hai yeh to mai nahi keh sakta par agar kuchh aisa hai to durbhagya hi hai... is samaj aur patrakarita karne wale sabhi ke lie jinki soch hoti hai ki samaj se burai hate, roshni faile ..
khair Dava ki jaati agar hai V to kharabi nahi hai kam se kam vah logon ko bergalati to nahi agar patrakar ki jati hogi to vah samaj ko bergala kar muddon me uljhae rakhegi....

TV said...
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TV said...
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lalit said...

महात्मा ज्योतिबा फुले का जमाना नहीं, मायावती का दौर है यह। बहुत लड़कर हासिल किये अनेक अधिकार, अब मलाई खाने का वक्त है। आगे की लड़ाई जिनको लड़नी हो लड़ें, अभी तो मलाई खाने का वक्त है। मलाई में हिस्सेदारी सही हो, यह देखना उत्तरआधुनिक बुद्धिजीवी का कर्तव्य है। जो प्रश्न अब बहुत असुविधाजनक न रहे, जानलेवा न रहे, उनको संबोधित करना बुद्धिजीवी का कर्तव्य है। टाटा-बिड़ला से लेकर ऑक्सफेम तक भौंहों पर बल न पड़ें, यह देखना बुद्धिजीवी का कर्तव्य है। हालाँकि सवाल की प्रगतिशील वैल्यू और भावी रिटर्न को ध्यान में रखते हुए बहस को आगे बढ़ाना, यह भी बुद्धिजीवी का कर्तव्य है।(थोड़ा-बहुत रिस्क लिया जा सकता है, हर व्यवसाय में रिस्क होता ही है।)
इतने कर्तव्यों के बोझ के दबे तले ओ बुद्धिजीवियो मुझे भी अपनी जमात में शामिल कर लो ना।

TV said...

एक कहावत बिहार में प्रचलित है -

अगर समुद्र मथोगे तो अमृत मिलेगा पर अगर गूह मथोगे टू खाली बदबुये पाओगे।

ये जातिवाद के ऊपर का विवाद भी किसी गूह मथने से कम नहीं है। आज़ादी के साठ साल हो गए और हम इस जातिवाद की बहस से ऊपर उठने को तैयार नहीं हैं। जब भी बिहार के सन्दर्भ में कोई बहस हो रही हो जातिवाद का मुद्दा अनायास ही उठ जाता है।

ऐसी बहस किस काम की जो कोई बदलाव ही नहीं ला सके। क्यों नहीं आर्थिक मुद्दों पर बहस हो? यथा फृत एकुँलिज़एशन (freight equalization) जिसने बिहार की आर्थिक कमर तोड़ दी? या फिर क्रेडिट डिपॉजिट रेशियो जिसके कारण देश के सबसे गरीब राज्य बिहार से पूंजी का पलायन हो रहा है। अगंरेजों के शाषण काल में भी ऐसा नहीं हुआ !
अगर बंगाल की तरफ़ देखें तो े वहां का एक भी मुख्य मंत्री वहां की तीन अगडी जाति ब्रह्मण बैद्य और बंगाली कायस्थ के बाहर का नहीं हुआ है। पर उसे क्यों नहीं जातिवादी कहते हैं?
सोचने और समझने की बातें हैं।

Deepak Sharma said...

जाति - पाति का ये तूफान
हमको चारों ओर से घेर रहा है
जो चमन समूचा हँसता था
एक - एक फूल रो रहा है ।

कह रहा गुलाब मुझे तो
एक अलग बगीचा दे दो
कन्नैर कहे मुझको तो
बस एक बगिया का पीछा दे दो ।
पंकज छोड़ सरोवर अब
सूखी नदिया ले रहा है
एक नए चमन के सपने
हर सिंगार ले रहा है ॥

ओ सुनो ! सभी सुमनों तुम
भला वो क्या चमन खिलायेगा
जिसका हर फूल अलग एक
नया उपवन रोज़ बनाएगा ।
हर फूल से हर से कलियाँ निकलेंगी
हर फूल से कांटे निकलेंगे
वो भी नया घर माँगे तो
कांटे ही कांटे बिखरेंगे
खुशबु की जगह तब जीवन में
पीड़ा का अम्बार लग जाएगा
ये मज़हबी उन्माद विराना
गुलशन पूरा कर जाएगा ॥

सबका एक लक्ष्य है जीवन का
खुशबु ही खुशबु फैलाना
जो चुभना ही जानते हैं
उनको भी प्रेम सिखलाना ।
एक होकर महकेंगे जब
सब आती हुई हर आंधी तब
बहार में बदल जायेगी


तुम परिवर्तन चाहते हो तो
परिवर्तन ही करना होगा
गेंदा और गुलाब को मिल
एक - साथ खिलना होगा ।
तब उपवन के हर पौधे से
एक कांटा कम हो जाएगा
तब इसकी छांव तले आकर
सागर शबनम बन जाएगा
Kavi Deepak Sharma
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