जातिगत पूर्वाग्रह की एक और करतूत

इंडियन एक्सप्रैस में एक पुणे से एक ख़बर छपी है। रिपोर्ट सुनंदा मेहता की है। कहानी माधवी कपूर की है जो बोट क्लब रोड पर स्थित कोज़ी कार्नर सोसायटी में रहती हैं। माधवी यहां के अपने मकान को बेचकर कहीं और खरीदना चाहती थीं। माधवी की सोसायटी में १६ फ्लैट्स हैं जिनमें से १४ में सिर्फ सिंधी परिवार रहते हैं। समस्या तब शुरू हुई जब माधवी ने अपने खरीदार का परिचय सोसायटी के अध्यक्ष से कराया। जब तक अध्यक्ष साहब को लगा कि खरीदार हीरानी है तो सिंधी ही होगा, तब तक कोई दिक्कत पेश नहीं आई। जैसे ही पता चला कि खरीदने वाले साहब वोहरा मुस्लिम हैं तो पूरा मोहल्ला खिलाफ हो गया। उनकी सोसायटी में मुसलमान कैसे आकर रह सकता है। शुक्र है माधवी कपूर विचलित नहीं हुई हैं। सोसायटी के सदस्यों के परेशान करने के बाद भी उन्होंने फ्लैट उसी खरीदार को बेचा है जिसके मुसलमान होने पर प्रगतिशील लोगों को आपत्ति है। इस तरह के लोग पुणे से लेकर पटना तक में फैले हैं जो जाति धर्म का नाम आते ही गोलबंद होकर एक छद्म सामूहिक पहचान के तहत ताकतवर होने की कोशिश करते हैं।

हम सब एक दूसरे के बारे में कितने पूर्वाग्रहों को लेकर जीते हैं और उसे बिना किसी परीक्षण के सत्य मान लेते हैं। हाल ही में समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता ने टाइम्स आफ इंडिया में एक लेख लिखा। उसमें एक बात यह भी थी कि हम गंदगी को लेकर भी पूर्वाग्रह बनाते हैं। इस तरह के पूर्वाग्रह के शिकार कई लोग यह मानकर जी रहे हैं कि मुसलमान गंदा रहता है। जबकि साफ सफाई का जन्मसिद्ध अधिकार सिर्फ हिंदुओं के यहां सुरक्षित है। जबकि कम ही हिंदू मंदिर मिलेंगे जिसके आस पास और मंदिर के भीतर सफाई का विशेष प्रबंध हों। गंदगी हमारे यहां भी है लेकिन हम सब मिलकर मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रह रच देते हैं। यह भूल जाते हैं कि हम(हिंदू) इतने ही सफाई पसंद संस्कृति वाले लोग हैं तो नदियों को नाले में क्यों बदल डाला। जानते हुए भी कि पूजा की सामग्री के विसर्जन से नदियों में प्रदूषण होता है हम दिल्ली के आईटीओ फ्लाईओवर के दोनों तरफ लगी जाली में छेद कर देते हैं। और यमुना में पूजा के अवशेषों को फेंक कर खुद को धन्य समझने लगते हैं।

अब कोई यह कहेगा कि पुणे की उक्त हाउसिंग सोसायटी में रहने वाले लोग कामयाब और प्रसिद्ध हैं। ठीक उसी तरह से जैसे दवा की जाति लेख के संदर्भ में एक आईटी प्रोफेशनल ने दलील दी थी। कहा था कि कंपनी प्रोफेशनल है और अपने दम पर साख बनाती हुई विशेष जाति का भला कर रही है तो इसमें गलत क्या है? आइये पुणे की हाउसिंग सोसायटी के उन १४ परिवारों के लिए सदबुद्धि की कामना करें और मनायें कि वो एक बार किसी मुसलमान के साथ रहकर देख लें। उनके घर आना जाना शुरू कर दें। खाना शुरू कर दें। बेशक घर लौट कर हरिद्वार से गंगा जल मंगाकर खुद को पवित्र करते रहें। ताकि उनका हिंदू धर्म मलिन न हो और नागरिक धर्म का पालन हो जाए कि सब बराबर है और हर जगह सबकी है। बाज़ार खरीदारों की जाति और धर्म पूछ रहा है। भला हो माधवी कपूर का जो ऐसे झांसे में नहीं आईं।

21 comments:

Sarvesh said...

Akhir kyon? Kisi ne oon society waalo se puchha kee tum log aisa kyon kar rahe ho? What makes them to behave like that? Readers query starts from where journalists pen stops. I don't know why?
Last week I saw yuvaraj (Rahul Gandhi) enteracting with tribal folks. He was enjoying their dance in half naked attire. Why? Why we keep those under developed tribes in that condition? Why can't we provide a dress which can cover them fully? How long their half naked bodies will be made a exhibition centre for such leaders? While doing coaching in Patna I was desparately searching a good house. Mandal era nobody was giving me house. If I was getting also there was warning attached kee you can stay at your own risk as this is dominated by Yadav's, Kurmis bla bla.
Finally I got a room in Upadhyay Nivas ( It was a lodge) at Saidpur Road. Owner told me that he is giving house because both of ours sirname is same.
I told "Bada ehsaan aapka". Gaon ka ek bhola bhaala chhatra jeese jaativadi ka ABCD nahin malum tha wo shahar me bhatak raha tha Jativad ke bhawar me. Sochata tha Gaon me to sab ek hee area me rahate the. Ek hee jagah holi jalaate the, ek hee goal me baith kar holi gaate the, Paida hone par Sohar ke goal me sab saath baithate the aur marani ke baad shavyatra me bhee sab saath hee jaate the. Phir saharo me ye alag alag kyon?

Plain Politics said...

Dear Ravish ,

Three different mental obstacle to good decision making were identified - "Faulty Heuristics" , Escalation of Commitment and Information Overload . What steps do u think can be taken to reduce the danger of each of these ?
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Ravish , It would have been better - if you have alarmed against all MEDICINE SUPPLIERs but the ANGLE you add - i.e CASTE gave a very bad taste . We all know that all STAR PERFORMERs "Journalists" are on PAY ROLL of either Businessman / Rich fatty Politicians or other Celebreties .
Does MONEY is so importnat that One can bend his principle ?

Mukund Kumar said...

ye lijiye ab jaat se dharam per aa gaye..wah !!!! ravish babu

JC said...

Is bimari ka nam 'inferiority complex' hai...jis-se koi bacha nahin hai...kabhi bhi...

Ise 'prabhu ki lila' bhi kahte hain - kyunki wo atma-samarpan mangta hai!

वनमानुष said...

रवीश जी,जब डाक्टरों की जात हो सकती है तो दवा की क्यों नही. अर्जुन सिंह और आरक्षण के विरुद्ध जब सवर्णों ने मोर्चा खोला और किस तरह से आरक्षित जातियों को नीचा दिखाने कि कोशिश की थी, ये सब ने देखा है.
"प्रतिभा के साथ खिलवाड़" का राग अलाप कर किस तरह मीडिया को अपने झांसे में लिया गया था.जब मीडिया मंचों का उपयोग करके यह पूछा जाता था कि क्या आप एक दलित से इलाज कराना पसंद करेंगे या सवर्ण से? मुझे तो ऐसी मानसिकता पर कोई दुःख नही होता.
जब जाति या प्रतिभा पर कटाक्ष किया जाता है तो ये सोचकर खुश रहें कि मानव अंगों को बेचने वाला एक भी डॉक्टर दलित या आदिवासी नहीं था, भ्रूण हत्या में लिप्त एक भी नर्सिंग होम किसी आरक्षित जाति के डॉक्टर का नही था. जब इन "कर्मकांडों" से परदे उठते हैं तो सवर्णों की तथाकथित प्रतिभा की कलाई खुलती है.
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में पिछले दिनों जब कुम्भ और संत सम्मेलन के आयोजन के वक़्त कबीरपंथियों, घान्सीदास और रविदास को मानने वालों की सरेआम बेइज्जती की गयी, आसाम में जब आदिवासी लड़की को निर्वस्त्र करके पीटा जाए और उत्तरप्रदेश में एक दलित परिवार के पांच लोगों को जिंदा जलाया जाता है, ऐसे कृत्यों से इनका शक्ति प्रदर्शन नही होता बल्कि इनकी हीनभावना दृष्टिगोचर होती है.आप कितने ही प्रतिभावान क्यों ना हों सरनेम पूछकर लोग आपके प्रति अपना नजरिया बदल लेते हैं पर मैं तो ये जानता हूँ, एकलव्य का अंगूठा मांगने से कभी द्रोण और अर्जुन का मान नही बढेगा और ना ही एकलव्य की प्रतिभा कम होगी.
आप दवा की जात से आश्चर्यचकित हैं पर शायद आपको मालूम नहीं कि मीडिया की भी एक जात है, और आप दलितों के हित में बात करने वाले शायद एक जातनिकाला व्यक्ति हैं.

પ્રબીનઅવલંબ બારોટ said...

नमस्कार सर,
बहुत आच्हा कम बेक हुवा, वैसे भी जातिवाद पर आप की सोच बहुत उम्दा है...और १ बात हम ने भी आप से प्रेरित हो कर ब्लोग सुरु किया है, बहुत कुछ आप के ब्लोग से चुराया है उस के लिए माफ़ी चाहते है. आप वहा १ बार आयेगे तो ख़ुशी होगी, कोई idea भी देते जाना और बिना आप की इजाजत हम ने हमारे ब्लोग पर कस्बा की लिंक रखी है, उसे स्वीकार करे...हमारे ब्लोग की लिंक है parisamvad.blogspot.com

thanx
Prabin Barot

अंशुमाली रस्तोगी said...

जाति पर यह बहस गर्म हो चली है। इसको होना भी चाहिए। पर कुछ चीजें मैं आपसे और अपने संवाद-पसंद मित्रों से जानना चाहूंगा।
बंधु, जाति का जहर सिर्फ दवा या अपने आस-पास ही मौजूद नहीं है यह मीडिया में भी है और साहित्य में भी। रवीश जी, मुझको अच्छा लगता अगर आप दवा की जाति के साथ साथ मीडिया की जाति और साहित्य की जाति पर भी कलम चलाते कुछ खोजने का प्रयास करते। आखिर आप तो पत्रकार हैं।
आपको याद हो गए साल हंस ने अपना एक अंक मीडिया पर केंद्रित किया था वहां तमाम तरह के मुद्दे उठाए व उठवाए गए थे मगर किसी ने भी मीडिया में जाति के प्रश्न पर कुछ कहा लिखा नहीं था। शायद भीतर कोई डर रहा हो। आखिर ऐसा क्यों है कि मीडिया में सुंदर चेहरों की ही भरमार है काला चेहरा वहां क्यों कोई नजर नहीं आता। आप मानें या न मानें जाति चेहरों की भी होती है। रवीश जी, मीडिया के अंदर भी बहुत गंदगी बहुत जातिवाद है इस पर भी तो बोलें।
जहां तक साहित्य के भीतर जाति का सवाल है तो हमारा हिंदी साहित्य शुरू से ही शुक्लाओं, शर्माओं, मिश्राओं, तिवारियों की बपौती रहा है। आज भी यहां पुरातनपंथी दलित-लेखन को दोयम दरजे का मानते हैं। वो तो दलित भी अब ताल-ठोंककर प्रतिकार करने लगे हैं इसलिए वे जरा चुप रहते हैं। मगर ये लोग मौका हाथ से जाने नहीं देते।
रवीश जी जाति का जख्म बहुत गहरा है। कभी भर भी पाएगा कुछ नहीं कह सकते।
यहां जो बहस चल रही है वो थोड़े दिन चलकर खत्म हो जाएगी मगर जाति के प्रश्न और समस्याएं हमेशा यूंही बनी रहेंगी क्योंकि हम स्वयं और हमारे नेता यहां कोई बदलाव लाने देना भी नहीं चाहते। कारण आप जानते ही हैं।

Anti said...

हथौड़ा! हथौड़ा ! हथौड़ा ! हथौड़ा ! हथौड़ा !
मीडिया मे "जात-पात" की चर्चा की इजाजत नही है ! मख्खन लगा के रवीश जी की बातों मे हाँ मे हां मिलाएं !

Jitendra said...

बहुत बड़ी बात कही आपने अंशुमाली जी. अगर हम कहें की हमको बस यही एक जगह जाती का गोलमाल दिखाई दिया तो ये बेमानी होगी. आप ध्यान से अपने आस पास देखेंगे तो हर जगह जाती के नाम पर उत्पात दिखाई देगा. लोग समाज के लोगो को जाती के आधार पर बात कार अलग अलग चश्मे से देखना पसंद करते हैं. आप ने बहुत हे बड़ी हकीकत कह दी.
पिछला सप्ताह राहुल जी कर्णाटक गए हुए थे. आदिवासियों को आधे आधे कपडे पहना कर राहुल जी के सामने नचाया गया. क्यों? क्यों नहीं हम उन्हें पैंट शर्ट पहनने दे रहे हैं?

Sanjay Sharma said...

किसी जाति या धर्म के पीछे हाथ धोकर पड़ने से जातिवाद के खात्मे की कल्पना करना बेईमानी है. ऐसे मे विपरीत असर होता है . हां कुछ लोग ऐसा मान बैठेगे कि आप जात निरपेक्ष ,धर्मनिरपेक्ष हैं . ख़बर का असर होना ही चाहिए ऐसा प्रयास हो . पर बात आपने काफ़ी घुमाई है . लिखते रहिये हम पढ़ते रहेंगे .

शिशिर उइके (वनमानुष) said...

अब ये तथाकथित सभ्य लोग आदिवासियों के ड्रेस कोड निर्धारित करने में रूचि दिखा रहे हैं .सभ्यता और असभ्यता का पैमाना निश्चित करने का अधिकार इन स्वयंभू भद्रजनों को कौन दे देता है, पता नही?
ये समाज के ठेकेदार बनने का जो रवैया है उसे छोड़ कर रचनात्मक कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाएं तो ज्यादा बेहतर होगा.

अंशुमाली रस्तोगी said...

बनमानुष जी, यानि तमाम सामाजिक मुद्दों पर हमें अपनी आंखें बंद कर लेनी चाहिए। इस दुनिया में रचनात्मक कामों के अतिरिक्त भी बहुत कुछ करने को है।

Chiranjiv said...

Samaj sudharak log khud decide karenge ki kaun sa mudda uthana chahiye?
Waise kya Sindhiyon ne wo jakhm ko bhula nahin paaya jo onhe batwara ke time par mili thi? Athwa kya wo ye soch rahe the ki hum ek shat 99% same community hain to same festival, bhasha, bhojan karte hain. ye ek odd man out aayenge to enhi ko problem hogi.

कुमार आलोक said...

जाति ब्यवस्था समाज का बुना हुआ ऐसा जाल है जिस पर लोग बोलते तो है लेकिन धरातल पर कुछ खास नही कर पाते. परंपराये बनायी जाती है , और आने वाली पीढिया उसका पालन करती है , क्योंकि उन्हे तोड पाने में एक डर होता है .पिताजी एक कहानी कहते थे...एक घर में एक नयी बहु ने प्रवेश किया ..ज्योंहि बहु चौखट से पार हो रही थी सास ने देखा कि एक बिल्ली चली आ रही है , उसने सोंचा कि अगर बिल्ली ने बहु का रास्ता काटा तो कही अशुभ ना हो जाये ..सास दौडी और एक टोकरी से बिल्ली को ढक दिया और उसपर एक इंट रख दी ..बहु ने घूंघट से अपनी सास की कारवाइ को देखा ..जब वो बहु एक दिन सास बनी ..और उसकी बहु ने जब घर में प्रवेश किया ..तो सास ने एक बिल्ली मंगवायी उसको समारोह्पूर्वक एक टोकरी से ढका गया ...तब से उस घर में बहु के आगमन पर इस क्रिया ने परंपरा का रूप ले लिया ...जरूरत है ऐसि परंपराओ और मानसिकताओ को तोडने और बदलने की ...

शिशिर उइके (वनमानुष) said...

अंशुमाली जी, सामाजिक मुद्दों पर आँख बंद करने के लिए मैंने नही कहा, पर यहाँ जो मुद्दा उठाया गया है वो सामाजिक से ज्यादा सांस्कृतिक है. दूसरों को उनके कपडों, बोलचाल और खानपान के बारे में नसीहत देना एक तरह का सांस्कृतिक आक्रमण है.
आपकी और अन्य बंधुओं की रचनात्मकता तब जाहिर होती जब आप आदिवासियों की नग्नता को मुद्दा न बना कर उनकी शिक्षा, रोजगार तथा उनके साथ होने वाले भेदभाव पर कुछ विचार प्रकट करते.
उच्च शिक्षा प्राप्त आदिवासी भी ताउम्र "आदिवासी" ही कहलाता है. कपडे पहना आदिवासी भी लोगों को नग्न ही दिखाई पड़ता है. हिम्मत है तो इस जातिगत, नस्लवादी मानसिकता को तोडिये.आदिवासियों को सिर्फ कपडे पहना देने से क्या होगा, क्या आप लोग उनके प्रति अपनी मानसिकता को बदलने के लिए तैयार हैं?
हर किसी की संस्कृति भिन्न है, और यदि वे आदिवासी उस संस्कृति से जुडा रहना चाहते हैं तो ये और आप कौन हैं उनकी संस्कृति को अर्धनग्न कह उंगली उठाने वाले?
वैसे ये मानसिकता सिर्फ यहाँ है ऐसा भी नही है. जब महात्मा गाँधी बर्मिंघम पैलेस में लंगोटी में ही चले गए थे, तब उन्हें भी असभ्य समझा गया था. अपने कबीले के कपडे पहनने पर बराक ओबामा, so called civilised Americans की आँखों की किरकिरी बन गए.जब पूरी दुनिया ही ऐसी है तो यहाँ इस देश की तो बात ही छोडिये. हजारों साल से पनपायी गयी सोच को साठ- सत्तर सालों में कौन बदल सकता है.
ऊपर से सब हरा हरा है नीचे धरातल कठोर है.

Chiranjiv said...

Tab tak naach dekhiye. Aaj ke adivasi aapke sanskritik samaroho me samil hokar aapke manoranjan ke item nahin banana chahte. Kitni asaani se oonki garibi ko sanskritik roop de diye, aur Varmingham palace me oonko pahucha diye. Aaj agar christian missionaries nahin hot to aapani sanskritik garima ko banane me khub successful rahte. Gandhi jee eetane rich the kee London padhane aur South Africa ghumane aur Varmingham me meeting arrange karane jaa sakte the. Adivasi nahin. Grow up dear Shesh. Don't write the things which you like.

Maowadi (so called Naxals) are abusing adivasi's female members in Bihar/Jharkhand's hill areas. Specially non-tribal Naxals. Kabhi kisi ne ees topic ko chhune kee koshish kee nahin?
Kaimur's tribal women are repeately being abused and sexually harassed by non-tribal naxal criminals. Why? Can we dare to write or investigate such things with our khoji patrakarita?

शिशिर उइके (वनमानुष) said...

आपने "आज के आदिवासी" की बात कही. क्या आप आदिवासी हैं? यदि नही तो आप कैसे बता सकते हैं कि आदिवासी क्या चाहता है और क्या नही?
आदिवासियों पर चर्चा करनी है? मेरे ब्लौग पर पधारिये. मैं नही चाहता कि रवीश जी ने जो लिखा है उस विषय से लोग भटके.

Chiranjiv said...

To Vanmanush,
I have well read your messages and I don't write on any aira gaira blogs. Make your blog worth commenting then a person like me will come there.
Agar log Dalito se ghinana nahin chahte aur Adivasiyon ko nanga nahin dekhna chahte to aapko kya problme hai?
Its Ravishjee's blog where I feel few intellectuals read or write. Thanks but sorry for your request.

शिशिर उइके (वनमानुष) said...

oh yes, I am not at all an intellactual sir,because neither i can become politically correct nor i say things using anonymous Ids . Thats the quality which makes me a vanmanush [:)]

I dont need ur comments sir.My articles have "pinched" peoples like u and when u say something like that, it shows and pays too. [:D]

Sameer said...

Mr. Sarvesh,

Akhir Kyon series?

(1) Why do some Bihari people from believe in publically taking bath in half naked state; during a certain festival;why can't we keep them inside their bathroom.

akhir kyon?
you might say its a cultural or religious thing for Biharis.

Similarly one should understand most of tribal folks are simply following their culture when they don their attire and you should respect that thin line. You are not suppose to transgress this thin cultural line.

Unlike so called pseudo-modern who throw everything out of the window in order to ape western culture including their cloths. Adivasis are simply being true to their culture.

Akhir kyon? Aap apne ko culturally superior samajhte hain. Comment karte hain.

(2)This kind of comment coming from a so-called "pandit"; really amuses me. There are two types of people one who are born into "pandit" and other who become "pundit" by their karma. Sadly you belong to born into pundit category.

Because of prejudiced people like you; people like you believe in superiority of one caste over another; people who believe in "race superiority"; people like you continue to look down upon other people; such people continue to divide this country.

Akhir Kyon ? Aap aadmi-aadmi mein farak karna sikh gaye hain.

Akhir Kyon Nahi? Why don't you honestly introspect your own belief system? You might find the truth. Truth does not lie in denigrating tribals like us. Truth lies in respecting our country's diversity, admiring it, and accepting it. Hope better sense prevail.

Akhir aap jaise log kab samajhenge?

Sarvesh said...

@Sameer,
Thank you very much for reading my comments and interpreting it in your own way. If you don't understand then its not worth explaining it again to you. If you understand and still defend Mr. Gandhi or any such dignitaries then be happy.
Regarding Pandit's bla bla, I don't have much information, may be other Padnits can reply.