मंसूर,हनीफ, रौशन सब खुदा के लिए

पंद्रह अप्रैल के इंडियन एक्सप्रेस में एक ख़बर छपी है। रौशन जमाल ख़ान की ख़बर।मुंबई के निवासी जमाल व्यापार की संभावना की तलाश में स्पेन की राजधानी मैड्रिड गए। लेकिन वहां की पुलिस ने बार्सिलोना की मस्जिद से आतंकवादी कार्रवाई की योजना बनाने के शक में गिरफ्तार कर लिया। वैसे ही जैसे हिंदुस्तान के अख़बारों में ख़बर छपी मिलती है कि चोरी की योजना बनाते चार गिरफ्तार। पुलिस के लिए इससे बड़ी कामयाबी क्या हो सकती है कि कोई चोरी की योजना बना रहा हो और मौके पर पकड़ा जाए। ख़ैर। रौशन जमाल ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा है कि वो आतंकवादी नहीं है। दो पीढ़ियों तक जांच करने की चुनौती देते हुए जमाल कहते हैं कि मुझे कुछ नही मालूम कि क्या हो रहा है। एक बार अदालत में पेश करने के बाद कुछ कार्रवाई नहीं हुई है। कहते हैं कि शायद सीबीआई और महाराष्ट्र की एंटी टेररिज़्म स्कावड ने क्लिन चिट दे दी है लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरी सरकार यह बात कहे कि मैं आतंकवादी नहीं हूं।

मुंबई के जोगेश्वरी पश्चिम इलाके में रहने वाले जमाल की पत्नी फरीदा परेशान हैं। घऱ जब फोन की घंटी बजती है तो फरीदा जमाल का हौसला बढ़ाती हुई कहती हैं कि बंगलौर के हनीफ के साथ भी ऐसा ही हुआ है आप हिम्मत मत हारो। आपने ही सीखाया था कि अल्लाह सब ठीक कर देगा। समस्या तो यही है कि जो अल्लाह ठीक करेगा उसी में यकीन के नाम पर जमाल और हनीफ जैसों को मड्रिड,ग्लासगो और ऑस्ट्रेलिया की पुलिस मुस्लिम नौजवानों को शक के आधार पर उठा ले जाती है। रौशन जमाल फोन पर घरवालों से बातें करते हुए रोते हैं। बात करते हुए उनके भाई भी फफक पड़ते हैं। अखबार लिखता है कि रौशन बताते हैं कि यहां शारीरिक यातना तो नहीं है मगर मानसिक यातना बहुत है।मुझे आतंकवादी करार दिया जा रहा है। मुझे उनकी भाषा भी समझ नहीं आती कि मेरे बारे में क्या बातें करते हैं। मगर स्पेन की पुलिस को मुसलमान की पहचान के लिए भाषा की ज़रूरत नहीं। उसके लिए उसकी धारणा आखिरी सबूत है कि कोई भी मुसलमान आतंकवादी ही होता है।

आप इस शख्स की यातना को समझ सकते होंगे। ज़ुबान की ताकत भी कमज़ोर पड़ गई है। हनीफ के बाद जमाल और जमाल के बाद कोई और सही। यह सिलसिला नहीं थमने वाला। जमाल के दुख को समझना है तो पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए देखियेगा। इसी मसले को उठाती है। फिल्म में जमाल की तरह का ही एक किरदार है मंसूर। मंसूर पाकिस्तान में रहते हुए इस्लाम और संगीत के सवालों पर हंसता हुआ संगीत को कैरियर बनाने के लिए अमरीका चला जाता है मगर वहां शक के आधार पर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया जाता है। पूछताछ करने वाला अफसर उसके ताबीज से कागज का टुकड़ा निकालता है जिसमें अरबी के अंक लिखे होते हैं। उनमें वो एक खाने में नौ और एक खाने में ग्यारह की पहचान करता है। उसे लगता है कि वह नाइन इलेवन पर किसी आतंकवाद की योजना का पर्दाफाश कर देता है। मंसूर आतंकवादी करार देकर सलाखों के पीछे यातना झेलने के लिए पहुंचा दिया जाता है। बिल्कुल रोशन जमाल की कहानी।

लेकिन मंसूर का छोटा भाई सरमत एक मुल्ला के बहकावे में आ जाता है। और मानने लगता है कि इस्लाम में संगीत हराम है। मुल्ला की तकरीर सुन कर वह संगीत का पेशा छोड़ देता है और अपनी सुरीली आवाज़ से मस्जिद में अजान देने लगता है। सब उसके अजान पर फिदा हो जाते हैं। बहुत चतुराई से अजान को संगीत के रुप में पेश कर कट्टरवाद को एक्सपोज कर दिया जाता है। लेकिन सरमत का मासूम मन बहकावे में आते रहता है। धीरे धीरे वो समझ पाता है कि मुल्ला इस्लाम के नाम पर उससे गलत काम ही करवा रहा है। उसे पछतावा होता है। वह कट्टरवाद के रास्ते होता हुआ तालिबान की दुनिया में पहुंचता है। मगर वापस आ जाता है। फिल्म जितना ज़्यादा पाकिस्तान,इस्लाम और उसकी छवि को परत दर परत खोलती है उससे कहीं ज़्यादा गाज़ियाबाद के सिनेमा घर में मुस्लिम किरदारों का मज़ाक उड़ा रहे दर्शकों को आखिर तक चुप कराने में सफल हो जाती है। आतंकवादी जितना आतंकवाद पैदा नहीं कर पाता उससे कहीं ज़्यादा हम अपनी धारणाओं से आतंकवादी पैदा कर रहे

पंद्रह अप्रैल को हिंदुस्तान टाइम्स में एक और कहानी छपती है। मध्यप्रदेश में सिमी के नेता सफदर नागोरी के पिता का इंटरव्यू। पिता ज़हीर-उल-हसन ट्रांसपोर्ट बिजनेस में हैं। मध्यप्रदेश पुलिस में सहायक इंस्पेक्टर के पद से रिटायर ज़हीर-उल-हसन की चुप्पी टूटती है। ज़हीर कहते हैं उन्हें सफदर नागोरी के बाप होने पर अफसोस है।जब तक मौत नहीं आएगी तब तक यह दाग नहीं धुलने वाली। लेकिन मेरे पास क्या विकल्प है। मैं देश के मुसलमानों से अपील करता हूं कि वो अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में तालीम दें।आतंकवादी बहकावों से दूर रखें। सफदर ने अपने मां बाप की भी परवाह नहीं की, जबकि इस्लाम कहता है अपने मां बाप की बात मानो। सम्मान करो। वो कौन सा जेहाद फैला रहा है। जेहाद का मतलब होता है भीतर की बुराई की सफाई। उसके बाद समाज की बुराई दूर करना। लेकिन कुछ लोगों ने मायने बदल दिये।

हालात आतंकवाद पैदा करता है। इस्लाम नहीं। खुदा के लिए फिल्म इसी बात को सामने रखती है। यह फिल्म कफील, सबील, हनीफ, रोशन जमाल जैसों की मुश्किलों को समझने का मौका है। ज़रूर देखियेगा।

8 comments:

अतुल said...

हालात आतंकवाद पैदा करता है। इस्लाम नहीं।
ठीक बात.

राजीव जैन Rajeev Jain said...

अच्‍छी खबर पढवाई, एक्‍सप्रेस पढने से चूक गए थे शुक्र है आपका ब्‍लॉग पढ लिया।

वैसे बॉस चोरी की योजना बनाते चार गिरफ्तार।
थोडा अटपटा लगता, जहां तक मैं समझता हूं बुरे काम की योजना नहीं होती।
अगर चोरी की साजिश रचते चार गिरफतार टाइप का होता तो बेहतर होता।

ravish said...

राजीव

टाइप की गलती नहीं थी। अखबारों में ऐसा ही छपता

Ghost Buster said...

हालात आतंकवाद पैदा करता है। इस्लाम नहीं।

सबसे गए गुजरे हालत बिहार और उडीसा के हैं. वहां आतंकवाद क्यों नहीं पनपा?

Rajesh Roshan said...

स्टीरियोटाइप लाईन है. मुसलमान आतंकी होते हैं. मुसलमान नही इंसान आतंकी होते हैं

maithily said...

खुदा के लिये वाकई बेहद जबर्दस्त फिल्म है.

JC said...

Assi ke dashak mein mujhe saubhagya ya durbhagya se Assam ka ‘videshi hatao’ andolan ‘doodh mein makkhi’ ke saman dekhne ko mila – ‘videkhi’ ki tarah. Sthanik logon ka mat tha ki Bangla Desh se aye Muslims ki soch hai ki sab Muslims char shadi karein aur apni jansankhya itni bardha lein ki bahusnakhyak ho jayein - sare sansar mein chha jayein aur ‘Democracy’ ka sampoorna labh uthate hue poore sansar per ek din kewal way hi rajya karenge!
Prashna hai: Uperokta soch alag alag sthan per vibhinna jati ke mun mein kyoon ati hain? Aur, yeh kisi adrishya shakti ke hath hone ka soochak to nahin?

अगिया बेताल said...

Ghost Buster कहते हैं सबसे गए गुजरे हालत बिहार और उडीसा के हैं. वहां आतंकवाद क्यों नहीं पनपा?

जनाब वहां जात-बिरादरी के नाम पर जो कुछ हुआ उसका नतीजा नक्सलवाद देख ही रहे हैं। ये किसी आतंकवाद से कम है क्या ?