जन्मदिन की माया

अब यह घर घर में मनाया जाने वाला कुटीर दिवस है। कुटीर उद्योग की तर्ज पर कुटीर दिवस। फिल्म मुकद्दर का सिकंदर का वो नज़ारा। अमीर की बेटी केक काट रही है। गरीब का बेटा अमिताभ एक दुकान के बाहर खड़ा शीशे में बंद गुड़िया को निहार रहा है। क्या सीन था। अमीरी के सामने ग़रीबी की चाहत और हौसले का। उस दौर की फिल्मों में जन्मदिन एक अति कुलीन वर्ग का कार्यक्रम हुआ करता था। तब शायद सब जन्मदिन नहीं मनाते होंगे। जबकि पैदा सब होते थे और किसी न किसी तारीख को ही पैदा होते थे।

अब जन्मदिन सब मनाते हैं। गांवों में भी हैप्पी बर्थडे गाया जाने लगा है। ज़िला मुख्यालय से केक आता है।कहीं खीर बनती है तो कहीं समोसा चलता है। शहरों में हर मोहल्ले में जन्मदिन के लिए एक खास स्टोर है। एक स्टोर है जहां केक, कुकीज़ और बलून मिलते हैं।एक स्टोर है जो रिटर्न गिफ्ट का मुखिया है।एक स्टोर है जो गिफ्ट का सरगना है। अनाप शनाप किस्म के खिलौने।घंटा बीत जाता है पसंद करने में। लिहाज़ा आप कुछ भी खरीद लेते हैं। इन सबके बीच संवेदनशील लोगों के लिए एजुकेशनल ट्वायज़ के नाम पर बेकार खिलौनों का बाज़ार बनाया गया है। कुछ खिलौने पज़ल्स के नाम पर बेचे जा रहे हैं। जो एक दो बार खेलने के बाद बेकार हो जाते हैं। कुछ खिलौने लड़कियों के लिए हैं। जिनमें बदसूरत गुड़िया प्रमुख है। जो कृत्रिम गर्भाधान से निकली बार्बी की अवैध संताने लगती हैं। किचन सेट का भी भयंकर आतंक है। लड़कों के लिए प्लास्टिक के बैट, कार आदि।

कई लोगों से बात की जो गिफ्ट के लिए जद्दोज़हद करते हैं। सबने कहा चयन करना बहुत मुश्किल होता है। दुकान भरी होती है मगर पसंद नहीं होती। विकल्प हैं मगर बेकार। गिफ्ट आइटम के सेगमेंट में भयंकर कंगाली है। घंटो लगने के बाद थक हार कर कुछ भी खरीद लेते हैं।

ख़ैर मामला जन्मदिन के सामाजिक प्रसार का था। अब ग़रीब भी जन्मदिन मनाता है। अमीर तो मनाता ही था। मायावती भी मनाती हैं। अटल भी मनाते हैं। सोनिया गांधी मनाती हैँ। लालू भी मनाते हैं। दक्षिण में तो दंगल मचा ही हुआ है। जन्मदिन कई दिवंगतों के भी मनाये जाते हैं। इन्ही दिवंगतों के कारण हमारे मास्टर जी पुण्यतिथि और जयंती में फर्क समझाते रहते थे। कई लोग मिल जाएंगे तो पुण्यतिथि की जगह जयंती लिखकर हंसी का पात्र बन चुके होंगे।

अब बात मायावती के जन्मदिन की। पिछले कई वर्षों की रिपोर्टिंग का अर्काईव निकालिये। जब से मायावती जन्मदिन मनाने लगी हैं। हर अखबार और टीवी में एक ही तरह की रिपोर्ट मिलेगी। फिर आप अन्य नेताओं के जन्मदिन की रिपोर्टिंग से मिलान कीजिए। कहीं कहीं तो समानता मिलेगी लेकिन एक बड़ा फर्क दिखता है। जैसे सोनिया, मुलायम या अटल के जन्मदिन की आलोचना मिलेगी मगर उस स्तर की नहीं होगी जैसी मायावती की होती है। एक किस्म का पूर्वाग्रह दिख ही जाएगा।

ऐसा नहीं कि सब मीडिया का ही किया कराया है। मायावती भी खुद मौका देती हैं। कहतीं हैं जन्मदिन कार्यकर्ता मनाते हैं लेकिन केक डीजीपी खिलाते हैं। जब विपक्ष में होती हैं तो मंच पर नेता केक खिलाते हैं। जब सत्ता में होती है तो नेताओं को क्षेत्र में भेज देती हैं और अफसर घेर लेते हैं। मुलायम सिंह यादव भी किसी तरह से सियासत में सादगी के प्रतीक नहीं हैं। सैफई चले जाइये और उनके शपथ ग्रहण का नज़ारा याद कीजिए। लेकिन नेता जी मायावती के जन्मदिन पर होने वाली फिज़ूलखर्ची के खिलाफ धरने पर बैठ गए।

हंसी आती है। आमतौर पर मीडिया को सामूहिक राय देने के मौजूदा प्रचलन से बचना चाहिए। लेकिन मीडिया को हाथ क्या लगता है। मायावती उसे पार्टी का चंदा और खर्चा बता देती हैं। केक का साइज़ बता कर क्या हासिल होता है। वो तो भला हो उन अफसरों का जिनकी पीठ झुक जाती है। वर्ना कहने के लिए वही पुरानी बात। ऐसा लगता है कि मीडिया के हंगामें और मायावती के जन्मदिन में कोई समझौता है। एक दिन पहले मीडिया जम कर सवाल उठाता है दूसरे दिन केक की एक तस्वीर के लिए मारामारी करने लगता है। मायावती भी मीडिया की आलोचना के बाद उसी के कैमरे के सामने केक खाते हुए पोज़ देने लगती हैं। इस बहस विवाद से कुछ हासिल नहीं होता। मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी निभा देता है और मायावती अपना जन्मदिन मना लेती हैं।


रही बात राजनीति में सादगी के गायब होने की तो राजनीति सिर्फ नेता से नहीं बनती। उसमें शामिल जनता से भी बनती है। और जनता तो अपना ही जन्मदिन मनाने में व्यस्त है। मुकद्दर का सिकंदर का नायक बड़ा होकर अपना जन्मदिन मनाने लगा है। अब कोई दुकान के बाहर ख़ड़ा नहीं मिलेगा। हीरे की नहीं तो प्लास्टिक की गुड़िया मिल ही जाएगी। क्योंकि जन्मदिन नहीं मनेगा तो खिलौने और तोहफे देने के लिए उत्पादित कूड़ा कचरे की खपत कहां होगी।

17 comments:

जेपी नारायण said...

जब सारे लोग भीग रहे हों, जिस आदमी के हाथ में छाता होता है, उसे बड़ा मजा आता है। जब नब्बे फीसदी दलित-गरीब-गुरबे सियासत और पूंजी की कटीली चक्की में पिस-कुट कर बेमौत जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे रहों तो जन्म दिन मनाने का मजा ही कुछ और है। इसे कहते हैं तिरिया चरित्र।

JC said...

Jab Indra devta kupit hue tab chhate wale dekhte rah gaye - unko tab leeladhar Krishna ki sharan mein ana hi parda tha. Bhool gaye? Krishna Janmasthami manate ho ki nahin?

dipti said...

राजनेताओं के लिए हर बात हर चीज़ हर घटना के एक ही मायने है - उनका उपयोग राजनीति के लिए। लेकिन, क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि आम जनता के लिए आप जन्मदिन की खुशियों को कुछ भयानक बना रहे हैं। हम वैसे ही बहुत परेशान और रोज़मर्रा की उदासियों से त्रस्त लोग हैं। अगर ऐसे में खुश होने का कोई बहाना मिल जाए तो बुरा क्या है।

दीप्ति।

Pramod Kumar Kush ' tanha ' said...

Dalit-Garibo.n ke liye
laakh machaao shor ,
Sattaa ke iss khel mein
harega kamzor.
- pramod kumar kush ' tanha'

संजय तिवारी said...

यह विकास का सांस्कृतिक प्रभाव है.

मनीषा पांडेय said...

मेरे बचपन की एक घटना है। ये कहानी पापा ने सुनाई थी, जब मैं चौथी क्‍लास में पढ़ती थी और एक सहेली के घर पर जन्‍मदिन की धूमधाम देखकर मैं भी अपना जन्‍मदिन मनाए जाने के लिए जिद कर रही थी।

अक्‍तूबर, 1917 के बाद, जब रूस में बोल्‍शेविक क्रांति सफल हो गई, अमरीका के किसी अखबार (शायद वॉशिंगटन पोस्‍ट) मैं लेनिन का एक कार्टून छपा। एक टेबल के नीचे रूस की दबी-कुचली, बदहाल जनता ठुंसी हुई है और टेबल के ऊपर लेनिन दारू की बोतल हाथ में लिए नाचने की मुद्रा में खड़े हैं।
पापा इतना कहकर चुप हो गए। फिर आगे कहा, उसी समय बोल्‍शेविक पार्टी के साथियों ने लेनिन का जन्‍मदिन मनने के लिए एक शानदार दावत दी और लेनिन को भी उसमें आमंत्रित किया। लेनिन इसके सख्‍त खिलाफ थे। लेकिन अंतत: वो पार्टी में गए और उनके हाथ में वही अमरीकी अखबार था, जिसमें लेनिन का कार्टून छपा था और वहां मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि इस समय, जब लाल क्रांति पर अकाल और युद्ध का खतरा मंडरा रहा है, अभी जबकि क्रांति को संजोना बाकी है, अगर इस तरह मेरा जन्‍मदिन मनाया जाता है और मैं उसमें शामिल होता हूं, तब तो इस अखबार में छपा मेरा यह कार्टून ठीक ही है।

उस समय बात मेरी कितनी समझ में आई थी, पता नहीं। लेकिन आज तक ये कहानी मेरे जेहन में ताजा है और उसके बाद से कभी जन्‍मदिन भी नहीं मनाया।

जीवन में प्‍यार है, भरोसा है, चार अपने यार हैं, तो हर दिन जन्‍मदिन है, हर दिन सेलिब्रेशन है। जन्‍मदिन के बहाने की क्‍या जरूरत। ये सब तो बाजार के चोंचले हैं।

JC said...

Manishaji, sambhavatah apne nahin suna hoga ki Yogiyon ne is sansar ko mithya athva ek jhoota bazaar samjha - jahan kewal jhoot hi bikta hai.

Isi liye gyani logon ne kaha tha ki is sansar mein nirlipta bhav se rahiye aur Krishnaleela, athva Ramleela adi ka anand lijiye - jis prakar aap Bolywood films athva Raveeshji ke channel per darshayi jane wali kahaniyon ka anand lete hain :-)
Apki kahani bhi bardhiya thi…

JC said...

Kuch naya nahin ho raha hai, Mirabai ne bhi Leeladhar Krishna ko sambodhit kar yahi kaha tha, "Moorakh ko tum raj diyat ho/ Pundit firat bhikari..."

आशीष महर्षि said...

रविश भाई गरीबों को भी मना लेने दो जन्‍मदिन। वो भी खुशी का कोई न कोई बहाना खोजते हैं। बाजारवाद के नाम पर ही सही। और ज‍हां तक मायावती के जन्‍मदिन की बात है तो मायावती उस तबके की नेता हैं जो कि समाज में सबसे नीचे हैं। ऐसे में मीडिया को यह अच्‍छा नहीं लगता है कि दलितों की नेता जन्‍मदिन मनाएं और वह भी सवर्णों की तर्ज पर। बस फिर क्‍या है। हम पड़ जाते हैं उनके पीछे। और एक बात और अब हमें बाजारवाद की पुन समीक्षा करनी चाहिए। 1991 के बाद स्थिति बदल चुकी है। हम में से अधिकांश अब बाजारवाद की चपेट में आ चुके हैं

JC said...

Raveeshji, yadi koi gana na sun-na chahe tau kya karna hai bata dijyega.

Pahla rasgulla meetha lagta hai, parantu lagatar khana hi parde, aur paise bhi dene pardein tau akharta hai!

Dhanyawad!

SHISHIR WOIKE said...

मेरे पहले blog का पहला post भी जन्मदिन पर आधारित है,वहाँ इतना कुछ लिख चूका हूँ कि यहाँ के लिए कुछ बचता नहीं, रवीश कुमार जी के blog से प्रभावित होकर मैंने भी मातृभाषा में blog लिखना चालू किया है.http://shishirwoike.blogspot.com/
रवीश जी ने पत्थर उछाल दिया है, आसमान में सुराख भी शायद जल्दी ही हो जायेगा.

जन्मदिन पर मनीषा पांडे जी ने जो कुछ भी कहा मैं उससे पूरी तरह असहमत तो नहीं पर उन्होने सहमत होने के लिए भी ज्यादा स्थान नहीं छोडा है. बाजारवाद कोई दूसरे ग्रह की बात नहीं रह गयी है, ये हमारे बीच मौजूद है और हमने इसे दोनों हाथ बढाकर अपनाया है.तो फिर इससे डर कैसा??
हर बात में बाज़ार को दोष देना अनुचित होगा, वो भी तब, जबकि बाज़ार हमें वर्गों की नयी परिभाषा प्रदान कर रहा है.

संदीप पाण्डेय said...

जन्म दिन तो केवल एक प्रतीक है. अगर जन्मदिन न होगा तो भी उस कचरे को निपटाने के लिए ढेर सारी जगहें मौजूद हैं जैसे की वैलेंटाइन डे,फ्रैन्द्शिप डे, मदर्स डे, फादर्स डे और जाने क्या क्या ?? क्या हमें याद है की बसंत पंचमी कब पड़ती है?? हम ब्लोग्स पर बौद्धिक जुगाली करते हैं पर हममें से हर एक के घर जन्मदिन मनाया जाता है, कथनी करनी का यही फर्क तो इन्हे पाल-पोष रहा है.

गुस्ताख़ said...

हर बात में बाज़ारवाद, साम्राज्यवाद, मध्यवर्गीय मानसिकता, सामंतवाद की चर्चा करना बात को बौद्धिकता का पुट प्रदान करता है। इतना वितंडा तो जरूरी होता है, बात में वज़न लाने के लिए शिशिर भाई।

manna said...

life will be very monotonous if we do not have special occasions to look for and celebrate...they are a welcome change from otherwise ordinary routine life..but yeah the extravaganza these public celebrities exhibit is uncalled for!!

was watching Barkha dutt's pgm on NDTv..came to know about ur blog then only..loved this post though I am yet to read the one you mentioned about refrigerators on that show..:))

will be regular here for sure!

ओमप्रकाश तिवारी said...

यह भी सॊशल इंजीनियरिंग है।

ashutosh jha said...

French revolution k samay mein sabne suna hoga ki garib junta roti maangne gayi toh rani ney kaha roti nahi mil rahi hai toh cake khao'. hamarey desh ki abhi joh halat hai kuch is tarah ki hi hai.humko consumerist toh banaya jaa raha hai lekin infrastructure k naam par bahut bara sunya hi dikhta hai. logon koh kharchey badhaney k sabhi raastey dikhaye jaa rahe hain, roj nayi vidhi, saman, naye mall aarahe hain, humko ye nahi pata ki hum kahan jaa rahein hain. rajnetaon sey koi ummid nahin bachi ye sab ek hi thali k chatte batte hain. arbon rupaye ka ghotala lok sabha k samarthan sey dhak diya jata hai.
tamsha aur tamashaion ka kunba itna bara hai ki do jun roti k liye tarashne wale logon k liye kuch nahi bachta. amir aur beimaan aur ameer ho rahey hain, par garib janta bhuke so rahe hain, woh din dur nahin k 1889 ka french revolution hamare yahan bhi dohray jaye....

maheshwar said...

ravish vai apne yeha ek kahawat hia
'hamuh chari tuho char chare ke azadi ba' darasal apne apne haisiyat ke mutabik sabhi apna apna janamdin to mana hi rahe hai
yedi koi nahi mana raha hai to o hai o garib jo do jun ki roti ki jugad me rat din ek kar deta hai. aur do tabaka aur hai jo janmdin nahi mana raha hai o hai jise yea to apna janamtithi hi nahi malum ya parampra aur dharm ke dar se nahi manate. antim karan ko jankar apko harani nahi hona chaihay kaoki ye karan hamare jase kai logo ke sath ho sakata hai . jab mere ghar me mere bhatija ka janmdin manane ki bat hui to meri dadima ne mana kar diya ki ye hamare me nahi chalata barbas hame nahi manana para. mayawati ke janmdin ho yea sonia gandhi ka janamdin yea aur logo ka manane me koi harz ( apti )nahi hona chahiye sabse jaruri hii un janamdin manane walo ki mansikta aur soch me badlaw aur prayash karne ki ki bharat ka har nagric apna jaamtithi yead rakhe aur janamdin manane ka use mauka mile
MAHESHWAR A N I (Rashtriyjanmukti Patrika)