ग़रीब की जोरू- नैनो भौजाई

ये एक कहावत है। ग़रीब की जोरू सबकी भौजाई। टाटा की नैनो आ गई तो स्वागत कार्यक्रम में एक तबका जली कटी बातें भी कहने लगा है।ये वो लोग हैं जो छोटी कार से बड़ी कार वाले के जमात में आ गए हैं।इन्होंने कहा कि नैनो में कैसे चलेंगे। ठीक लगेगा क्या?अरे आपके लायक नहीं है।यानी अभी यह कार आम आदमी की हुई भी नहीं है।अभी यह कहा ही जा रहा है कि नैनो खऱीद कर आम आदमी खास आदमी की जमात में आ जाएगा। लेकिन अभी से खास आदमी आम आदमी की इस कार की हैसियत तय करने लगा है। उसे लगता है यह छोटे लोगों की छोटी कार है। खैर यह होगा। तभी एक दिन कोई और एक नया सपना बेचेगा। अभी बात इस नए सपने की।


एक कार को देखने की लंबी कतार।प्रगति मैदान में करोड़ों की कारें इस लाख रुपये की कार की किस्मत से जल रही होंगी।
मोबाइल फोन से क्लिक की जा रही नैनौ की तस्वीर। घर ले जाकर पड़ोसी तक को दिखाने और बताने के लिए कि हमने देखी है नैनो। उपभोग की ईच्छा हमारे जीवन की तमाम हसरतों से बड़ी हैं। रोटी के लिए हम सपना नहीं देखते।मगर कपड़ा,मकान के लिए देखते हैं। इसके अलावा हम कई चीज़ों का सपना समय समय पर देखते रहते हैं। मसलन तीन बुनियादी सपने रोटी कपड़ा और मकान के पूरा होने के बाद हम एसी का सपना देखते हैं।एसी का सपना पूरा होने के बाद हम माइक्रोवेव का सपना देखते हैं। फिर एलसीडी टीवी का सपना देखते हैं। समय समय पर अपना सपना मनी मनी।

लेकिन टाटा ने बहुत दिनों के बाद एक सार्वजनिक सपना दिया है। राजनीति में सार्वजनिकता के ह्रास के बाद टाटा ने नैनो के ज़रिये इस शून्य को भर दिया। राजनीति के पास देश के लोगों को सपने बेचने के लिए कुछ नहीं है। सिर्फ मायावती ही एक सपना बेच रही हैं।पहली दलित महिला के प्रधानमंत्री होने का सपना।बाकी तमाम दल पुराने सपने ही बेच रहे हैं। लिहाजा आम लोगों की सियासी भागीदारी चुनाव के वक्त वोट डालने की सक्रियता तक सीमित रह गई है।देश खाने कमाने में व्यस्त है।
लगता नहीं कि किसी का किसी से कोई संबंध है। बीच बीच में क्रिकेट एक सार्वजनिक सपने की पूर्ति का अहसास देता है। वरन सपनों के सार्वजनिक स्पेस में एक क़ॉमन ड्रीम की कमी थी। अब पूरी हो गई है।

अगर ऐसा नहीं होता तो हिसार से चलकर टीचर धर्मवीर प्रगति मैदान नहीं आते। पूरे परिवार के साथ। कहा कि दस
हज़ार कमाता हूं। इतने में कार का सपना नहीं देख सकता। अब कम से कम देख सकता हूं और खरीद सकता हूं। बसंत कुंज के एक स्कूल में पढ़ाने वाले टीचर ने कहा कि जब भी बच्चों के पीटीए में जाता हूं वो कहते हैं पापा सबके के पास कार है तुम्हारे पास नहीं। उनके साथ आए एक सज्जन से पूछा कि कार नहीं है तो क्या हुआ,इतना काम्पेल्क्स क्यों? जवाब-थोड़ा तो लगता है। सबके पास है हमारे पास नहीं है। स्कूटर से चलते चलते आप कारों के बीच दब जाते हैं। तब लगता है कि होना चाहिए। दिल्ली पुलिस के दो सिपाही भी मगन होकर नैनो देख रहे थे। कहा कि तेईस साल की नौकरी हो गई। दस हज़ार वेतन मिलता है। स्कूटर भी नहीं है। लेकिन यह कार खरीद लेंगे तो लगेगा कि कुछ किया। हम भी कुछ हैसियत रखते हैं।

अब इन लोगों के बारे में सोचिये। ये आर्थिक विषमता के किस दबाव में जी रहे हैं।खाने भर की कमाई लेकिन रिहाईश उस शहर में जहां लोग बीस लाख की कार ही खऱीदते हैं।ये गरीब नहीं हैं।मगर अमीरों के मोहल्ले में गरीब ही कहे जाएंगे।जैसे गरीबों के मोहल्ले में स्कूटर वाले भी अमीर कहे जाते हैं।लेकिन इन लोगों की कुंठाओं का सामाजिक अध्ययन होना चाहिए।
कार के नहीं होने की हीन भावना का। और देखना एक सपना कि एक दिन अपनी भी कार होगी। चार चक्के पर जाकर दो चक्के वाले बराबर होना चाहते हैं उनके जिनसे बराबर होने का कोई आखिरी पैमाना नहीं। टाटा ने इनके लिए एक सपना दिया।

पर्यावरण की चिंता का सवाल हर कार से जुड़ा है। आटो एक्सपो में पहले दिन सत्रह कारें लांच हुईं। लेकिन हमला हुआ नैनो को लेकर। जैसे बाकी कारें दस बीस की संख्या में ही बेचने के लिए बनी हैं। नैनौ लाखों में बिकेगी तो सड़क पर जगह नहीं बतेगी। किस हिसाब से इनोवा इतनी बड़ी गाड़ी बनी है। तीन कार की जगह लेती है। क्यों नहीं मारूति के बाद किसी अन्य कार के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा। और मारुति क्या कम बिकी। नैनो के आने से पहले ही दिल्ली मे पचपन लाख कारें और स्कूटर हैं। लेकिन हमला हुआ नैनो पर। देश के उन तमाम शहरों में जहां नैनो जाएगी,वहां पहले से ही बिना किसी मापदंड के हज़ारों आटो चल रहे हैं जिससे वहां प्रदूषण का बुरा हाल है।वहां प्रदूषण रोकने के कोई उपाय नहीं किये जाते। गंगा नदी से नाली हो गई। बचाने के लिए आया पैसा खा पी कर बराबर हो गया।यमुना नदी की ज़मीन पर फालतू के गेम्स के लिए कंक्रीट इमारतें बन रही हैं।आप कितनी बार कामनवेल्थ गेम्स के बारे में कुछ ख्याल रखते हैं? क्या यह ओलपिंक है?और है भी तो पर्यावरण की कीमत पर।नदी खाकर गेम्स के लिए पूरी दिल्ली को खुश किया जा रहा है। फ्लाई ओवर बन रहे हैं। गेम्स के नाम पर। लेकिन बदनाम हुई नैनो।क्यों नैनो आएगी तो उसके लिए क्यों नहीं फ्लाई ओवर बनेंगे। जब गेम्स के लिए बन सकते हैं। उस पर कोई हल्ला नहीं करता।

कहीं ऐसा तो नहीं कि अमीरों को अच्छा नहीं लगा कि उनके छोटे लोग अब कार में आएंगे। इसलिए वो अपने बराबर के लोगों को कह रहे हैं कि बेमतलब की कार है। और ब़ड़ी गाड़ी वाले छोटी गाड़ी पर नहीं चलेंगे। आखिर ग़रीब की ज़ोरु सबकी भौजाई, जो चाहे वो ठिठोली कर ले। नैनो भौजाई पर तंग करने वालों ऐसा मत करो। इस धरती को बचाने के लिए अमीरों ने कुछ नहीं किया। उनके ऐशो आराम के लिए बने एसी फ्रीज से जब पर्यावरण गरम हुआ तो लू से गरीब ही मरा है। जब बाढ़ आई तो गरीब मरा। भारत के अमीर कार धारकों ने कब पर्यावरण के लिए कदम बढ़ाये हैं इसका हिसाब करने का वक्त आ गया है। अगर कोई नहीं देता तो नैनो खरीद लाइये। सवारी कीजिए।

20 comments:

अनामदास said...

ग़रीब बियर पीने लगे तो साहबों ने फ्रेंच वाइन का रुख़ किया, होंडा एकॉर्ड और नैनो का फर्क़ बना रहेगा, नैनो वाले ख़ुद चलाएँगे, साहबों के ड्राइवर होंगे. साहब लोग बेवजह घबरा रहे हैं, एक्सक्लूसिविटी इतनी आसानी से नहीं जाती, इंग्लिश मीडियम स्कूलों का उदाहरण सामने है, गली-गली में खुल गए इंगलिस मिडियम इस्कूल लेकिन एक्सक्लूसिविटी कहाँ ख़त्म हुई. भारत में डर है कि नैनो सुविधा के बदले अपमान का कारण न बन जाए. अपने देश के अमीर लोग औक़ात का बेंचमार्क तेज़ी से अपग्रेड करते रहे हैं और एक्सक्लूसिविटी बनाए रखना उन्हें अच्छा तरह आता है, उन्हें कोई ख़तरा नहीं है. अलबत्ता नैनो ख़रीदकर शायद धूप,बारिश और दुर्घटना से राहत मिल जाए लेकिन इज़्ज़त तो कतई नहीं मिलने वाली. दलितों की कार ही रहेगी नैनो, जो गौरव अब तक मारुति 800 को हासिल है.

Ashish Mishra said...

vah vah Ravish Bhai.. nano ke bahane Bilkul sahi raag pakada hai aapane.. aur udaharan bhi sahi diyaa hai.. bahut bahut badhai.. bhagwaan kare aap khoob amir ho jaayein.. magar apani lekhani ko gareeb hi rahane dijiyega.

eSwami said...

आपको रिवर्स साईकॉलॉजी के बारे में तो पता ही होगा! रह रह कर समाज में गरीब दिखना भी फ़ैशन में आता है - ये एक साईकल है.

देखिये जब रईस आदमी अपनी जीन पेंट फ़ाड कर पहनता है, दाढी बढाता है या ऐसा और कुछ ऊट पटांग करता है तो वो कूल हो जाता है, प्रचलन में आ जाता है और ब्रांडेड जींस का कपडा महंगा हो जाता है. जबकी अमीर आदमी तो गरीब दिखने की ट्राई मार रहा था! वो ये बताने की कोशिश कर रहा था की उफ़्फ़ इतने सारे एक्सक्लूसिव हो गए अब फ़िर से कामन होना कूल नया फ़ैशन होगा. हिंदी में बोलें तो एक्सक्लूसिविटी भेडचाल की प्रक्रिया में स्नॉबिश या ’वन्ना बी’ करार दे दी जाती है! फ़िर इस नए स्टीरियोटाईप को तोडने की कवायद शुरु होती है.

गरीबी के कुछ प्रतीक जनप्रिय होते हैं और वो समाज को नई दिशा देते हैं दोनो तबकों में स्वीकारणीय हो जाते हैं. ये रिवर्स स्टेटस सिंबल जनमासन की विचारधारा में आए एक बडे परिवर्तन का द्योतक हो सकते हैं या ये भी बता सकते हैं की एक तबके की आर्थिक संपन्नता की पहली साईकल पूरी हो गई है.

JC said...

"Pasand apni apni/ khyal apna apna". "Hari anant/ Hari katha ananta".

Kintu ek Hindu ke liye,"Satyam Shivam Sunderam"! Aur, arambha mein Vishnu ke karan Visha hi utpanna hota hai. Tab Kewal Gangadhar Shiva hi Amrit dayini Parvati ki sahayata se usey dharan kar sakte hain!

Aj, kal ke prabhava se Hindu Apsmara Purush deekhta hai - Natraj Shiva ke pere ke neeche tau usmein ascharya nahin:-)

Jai Mata ki!

AJAY JAISWAL said...

Vaise ye bat thik hai par naino amiro ke liye threat nahi hai...ye prachalan kafi purana hai..har naya faishon or ya kahe bimari amiro se hi suru hoti..garib to unke jaisa banne ki hod mai mara jata hai..jaise ki pan khana pehle amiro ka shok tha ..par dhire dhire jab ye shok garibo ne apna liya to amiro ne is shok se kinara karake ke chweing gum ka sahara le liya ...or phir chewing gum bhi alag alag flavour wali..

dipti said...

नैनो को गरीबों की कार मानने में मुझे कुछ उलझन है। एक लाख मुझे तो कम बिल्कुल नहीं लगते है। मैं मध्यमवर्गीय परिवार से हूं और मैंने अपनी स्कूटी के लिए दो साल तक पैसे जमा किए थे। मेरे मुताबिक नैनो सस्ती है और कइयों की पहुंच के दायरे में घुस गई है। लेकिन इसने दायरे बढ़ाए नहीं है।

दीप्ति।

Cyril Gupta said...

The haves want to remain in an exclusive club, they do not want the have-nots to have the same things.

लेकिन समय तेजी के साथ बदल रहा है. जिसे हम उच्च वर्ग कहते हैं, उसका फैलाव बढ़ रहा है. नैनो एक ट्रेन्ड कि एक्सटेन्शन है. बाज़ार जानता है कि सफल बनने के लिये प्रोडक्ट ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचना ज़रूरी है.

JC said...

Tata ke nam ke sath 'steel' jurda hai, jis dhatu ko Shani graha ke sath bhi sadiyon se jorda gaya hai - Bharat mein. Birla ki Company se sambandhit adhikari is baat se dukhi thhe ki vartman Bharat ka bachha-bachha vidai ke samaya 'Tata' ka hi nam leta hai!

Hindu yeh bhi mante hein ki har yuga ka kabhi na kabhi anta hona nischit hai. Aur, Ganga-Jamuna ke pani k shighra hi shesh hone ki khabar bhi garam hai ajkal. Kahin Tata ki Nano (Na-no athva nahin!) Kaliyuga ki bidai ka sanket tau nahin?

ashutosh jha said...

ravishji, aapki is charcha se ek kahani yaad aayi, main us samay dilli mein rahta that aur ek stock audit k liye kaithal, haryana ek rice mill mein jana tha. rice mill k malik nein kaha k sahab main gari bhijwa doonga aapke ghar aur saath mein chalenge. Yahi hua ek bari si cielo gadi par sawar hokar humlog dilli se hotehue chal pade. expressway par cielo k saamne ek zen thi jo overtake nahi karne dey rahi thi.. tuurant hi gadi k malik ney kaha yeh zen waley koi aadmi hotein hain kya? saal pure sahar mein in chhotigadiyon ney bhid macha rakha hai.
hamare desh ka jo haal hai usmey log tarakki k saath hi apni purani jindagi bhool jaate hain, naa unhein apme garib maa baap yaad rehte hain na purana jhopda, raaste k har muskil par kisi aur ka naam dey kar gaali detey hue nikalna hee inki phitarat hai...

harsh said...

Kafi buniyadi baat karte hain aap. Suna hai ki Amerika me naukar bhi car se aate hai. Kot-pant utara, sadharan kapda pahna. Kam kiya, fir kot pahankar chal diye. India me to abhi aise din dur hi jaan padte hain. Naino bhi es star tak pahuncha degi aam hindustaniyo ko, esme sanshay hi dikhta hai. Waise, Naino se achchhe-khase log apni hasraten jaroor mita lenge. Naino ka bharpur swagat kiya jana chahiye. Amir jalengen, gareeb ethalayengen. Car walon ko car ab becar lagne lagegi.

ravish said...

आशुतोष जी
सही कहानी पेश की आपने। इसी तरह की नैनो के साथ भी प्रतिक्रिया होने जा रही है। दीप्ति की टिप्पणी के लिए कहना चाहूंगा कि नैनो गरीब की कार नहीं है। लेकिन अमीर अपनी तुलना में इसे गरीबों की मानते हैं। वैसे आटो एक्सपो में एक कार देख कर आया था। बीएमडब्ल्यू। आज शाम आफिस के बाहर टहल रहा था तो वही कार दिखी। पूजा किया गया था। पूछा तो बोला आज ही लाया हूं। दाम पूछा तो बोला एक करोड़ पांच लाख। पांच लाख वाला हिस्सा ठीक से नहीं सुन पाया। मगर एक करोड़ साफ साफ दिखाई दिया। पैसे का तमाशा देखते

मनीषा पांडेय said...

मैं अनामदास जी की बात से बिल्‍कुल सहमत हूं। अमीर-गरीब का सवाल या वर्गीय विभाजन हमेशा सापेक्ष होता है। उन्‍नति का पैमाना ये नहीं है कि आज हमारे पास टीवी, फ्रिज, एसी और अब कार भी है, बल्कि यह है कि कुछ लोगों के पास उससे कहीं ज्‍यादा है और समाज के अलग-अलग तबकों के बीच यह खाई पहले से कहीं ज्‍यादा चौड़ी हुई है। अगर भौतिक संसाधन पैमाना हैं तो हम तो बाबर से भी अमीर हुए, क्‍योंकि उसके समय में तो बल्‍ब की रौशनी भी नहीं थी। आज से 25 साल पहले गांव के सबसे धनी जमींदार के पास भी वो सुविधाएं नहीं थीं, जो आज हमारे पास हैं। इसका मतलब ये नहीं कि हम जमींदार से ज्‍यादा हैसियत वाले हुए। हमारी हैसियत वही है, जो पहले थी या थोड़ी ही बेहतर, बल्कि इसके उलट हुआ यह है कि जमींदार और हमारे बीच की खाई पहले अगर 2 फुट थी तो अब 20 फुट हो गई है। वर्ग-बोध और कमतरी या श्रेष्‍ठता का मनोविज्ञान भी समाज सापेक्ष होता है। नैनो कुछ लोगों को थोड़ी-सी सहूलियत दे सकती है, लेकिन इससे नौकर और मालिक का वर्गीय भेद मिट जाएगा, यह सोच नाकाफी है। यह खाई वक्‍त के साथ और गहरी होनी है, कम नहीं। किसी भी देश-काल में कुछ मनुष्‍यों की भौतिक समृद्धि का स्‍तर उस देश के विकास का पैमाना नहीं होता, पैमाना होती है तो वह खाई, जो विभिन्‍न वर्गों के बीच और ज्‍यादा बड़ी और गहरी होती जा रही है।

और रवीश एक बात और, मैं करोड़ों वाली कारों के पक्ष में ये प्रस्‍थापना नहीं दे रही, लेकिन सड़कों पर तेजी के साथ बढ़ रही गाडि़यों की भीड़, ट्रैफिक, प्रदूषण क्‍या हमारी चिंता के सवाल नहीं होने चाहिए। आने वाले दस सालों में ही यह गाडि़याँ हमारे लिए कितना बड़ा सिरदर्द बनने जा रही है, इसकी कोई भनक दूर-दूर तक भी है। 15 साल बाद इस देश में इतनी गाडि़यां होंगी कि उन्‍हें चलाने के लिए सड़कें नहीं होंगी। इसका मतलब ये नहीं कि गाडियां नहीं होनी चाहिए, इसका मतलब ये कि सड़कें भी होनी चाहिए। विकास में संतुलन होना चाहिए। मुंबई की सड़कों और ट्रैफिक का हाल देखा है, वही सड़कें हैं, जहां से वडा पाव वाले की साइकिल भी और शाहरुख खान की फोर्ड भी गुजरती है। मुंबई को शंघाई बनाएंगे, जरा चार घंटा ज्‍यादा बारिश हो जाए शंघाई निवासी अपनी औकात पर आ जाते हैं। इस देश में विकास के नाम पर जो भी कीर्तन हो रहा है, कान में रूई ठूंसे बस सिर हिलाते रहो। लड़कियां नाभि छिदवाकर मगन हों और लड़के स्‍टइलिश बेल्‍ट लगाकर। जिनको इस विकास से आपत्ति है, वो भैंस की मांद में मुंह गोड़कर बैठ जाएं, जाएं तेल लेने......

गुस्ताख़ said...

एक बात मेरी समझ के परे है, नैनो को इतना क्यों उछाल रहे हो। नैनो तो खादी की तरह होने जा रहा है। हम पहने तो गुरबत वो पहने तो फैशन। नैनो भी मोबाईल फोन के आम मॉडलों सरीखा होने जा रहा है। ब्लैक एंड ह्वाइट मॉडल की तरह, जिसके पास है वह सबकी नज़र बचाकर गप्प करे। नैनो वाले स-कार क्लब में बे-कार के माने जाएंगे। कार वर्ग में दलितों की तरह।

JC said...

Manishaji,

Allahabad, dyotak hai ‘Triveni’ ka, teen kunwari kanyaon ki chotiyon, athva teen pavitra nadiyon ke sanketik milan ka – udgam sthan Mansarovar mein bhi jaise unhi teenon, Ganga, Yamuna, Brahmaputra (Saraswati) ka bhi!

Manav shareer/ Kanya evam ‘choti-dhari-Punditji’ ke shareer ke uperi bhag ko Himalaya Parvat shrankhala ki choti ‘Kailash Parvat’ ka pratibimb mana gaya aur ‘man’ athva 'mind' ko Mansarovar ka…

”Jahan na pahunche Ravi/ Wahan pahunche Kavi”! Kamal ka phool bhi kichard mein hi utpanna hota hai…adhunik manav ki jarda bhi ‘Dark Continent’, Africa, mein hi hain!

Krishna natkhat yunhi nahin kahlaye gaye!

vinod said...

Ravish Bhai,
Maza aa gaya Neno Bhaujai ko padh kar. Pahli bar aapko padha. Gadya bola hua-sa lagta hai. Seedha, Saral, Vicharottajak aur chhune wala.
Sanjay - Vinod
Jodhpur

Nishant Ketu said...
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Nishant Ketu said...

हमारे यहाँ कहावत है की...
राजा को रानी मिले, मिले सोम को सोम...
दाता को दानी मिले, मिले सोम को सोम...

टाटा की नैनो शायद इस कहावत पर बिल्कुल खरी उतरती है. जब से नैनो लोगो के सामने आई है तब से एक विशेष तबके को पर्यावरण का कुछ ज़्यादा ही ख्याल आने लगा है. ये वही तबका है जो सालो से कार की सवारी कर रहा है. या फिर ये वही तबका है जिसके पास पापा-मम्मी, चुन्नू-मुन्नू के लिए अलग अलग कार है. दरअसल इस तबके को पर्यावरण के दूषित होने से ज़्यादा अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल है. नैनो के लॉन्च से इस तबके को ये डर सताने लगा है की कहीं कल तक उनके जूतों की तलियों के नीचे अपनी रोटी का जुगाड़ करने वाले, आनेवाले कल में कहीं किसी लालबत्ती पर उनके बगल वाली कार में न बैठे हों. इन देशभक्तओं को मोटर बाइक बाबुओ या बस में चलने वाले अवाम का अपनी बराबरी में खड़ा होना तनिक भी गंवारा नही. इन्हे तो इस बात का भी ख्याल नही कि जब बस में चलनेवाली गर्लफ्रेंड कभी कार कि फरमाईश करती है तो इस देश के गरीब अवाम पर क्या गुज़रती है. ऐसे में अपने रतन भईया ने जनता को अगर कोई सपना दिखाया है तो इसमे हर्ज़ ही क्या है ?

तन्जीर अंसार said...

sawal yahan ameer ghareeb ki gadi ka nahi hai, balki haq ki baat ka hai.ek nano ke aa jane se ameer ki izzat par kitna bada kutharaghat hone ja raha hai ye sab bakwas ki bahas bazi hai aur na hi nano ke aajane se chalne ke liye jagha ki kami hone ja rahi hai.pahle jab itni gadiyan nahi thi to sadko ki bhi kami thi gadiyan badi to sadken bhi bani.suvidha ke upbhog ka adikar ameer kahan se likha kar lae hain.samasya ke badne ki jin logon ko itni fikr hai wo kyu nahi apni gadiyon ko tyaag kar nano ke liye jagha khali kar dete.wo aisa nahi kar sakte kyunki tyaag ka updesh doosron ko diya jata hai aur unhi se iski aasha bhi ki jati hai

P K Sundaram said...

हम नैनो के तीर से बाहर हैं ये मुझे नहीं दिखता. 850 करोड़ की सीधी सब्सिडी, नैनो को घर में बाँधने का महीनावार खर्च और फ़िर नैनो के लिये ज़रुरी सड़क वगैरह के इन्फ़्रास्ट्रक्चर का बोझ हमारे हिस्से ज़रा भी न आयेगा? नैनो से घायल इस बार का ये आम आदमी कहीं शाइनिंग इंडिया के किसी कस्बे में ही तो नहीं रहता?

नैनो-विरोध को अमीरों की जलन कहकर झिड़क देने की कस्बाई गुत्थी भी मुझसे नहीं सुलझती. आर्थिक असुरक्षा और लोन के बल टिका हमारा हाई पिच उपभोग हमारे लगातार मध्यवर्ग बने रहने की कार्पोरेटी साजिश की गारन्टी है. दूसरी तरफ़ पर्यावरण के प्रति हमारी कम्पिटीटीव गैर-जिम्मेवारी अमीरों के मुकाबले हमारे मजबूत होने का रास्ता नहीं. पर्यावरण भी इतना नेचुरल नहीं है. उसके नुकसान की चिन्ता हमें ही ज़्यादा करनी होगी क्योंकि ठन्ड-गर्म-बरसात भी हम पर ही ज़्यादा गुजरेगी. कर्पोरेट हित हमेशा शॉर्ट-टर्म होते है.

वर्ग-संघर्ष को एक तबके द्वारा दूसरे को धकिया कर उसी कार, एटम बम और चाँद पर कॉलोनी के रेस को जीतने के सरलीकृत बोल्शेविक फ़ार्मूले की बजाय एक समूचे वैकल्पिक जीवन की लड़ाई के रूप में ही समझने की ज़रूरत है. और दुनिया एक तबके द्वारा दूसरे के शोषण की सच्चाई से कभी की आगे निकल गयी. शुरु में ( और अब भी ) शोषण पर पलती-बढती पूँजी का जिन्न अब इतना बड़ा हो गया है कि military industrial complex और climate change कोई दूर के खतरे नहीं. और इससे बढ़्कर एक सभ्यता के रूप में हमारी विविधता - कई किस्म के खान-पान, पहनावों, तौर-तरीकों का सफ़ाया हो गया बाज़ार के मानकीकृत शोकेस को सजाने में. हम अब कहीं और बैठे प्रोलेतेरियत के लिये नहीं, अपने लिये और सबके लिये लड़ रहे हैं - उन अमीरों के लिये भी जिनको कोई भी दो-चार आसन-व्यायाम-वास्तु-फ़ेंग्शुई जैसे शिगूफ़े से चूतिया बना जाता है और जिनके बच्चे ज़रा सी बात पर अपनी क्लास के साथियों पर गोली दाग देते हैं.

vikas said...

excellent ravish, the so so called environmentalist have to think twice before commenting on the issues, without understanding the social scenario simply giving their judgments.