मफ़लर

सर्दी के तमाम कपड़ों में मफ़लर देहाती और शहरी पहचान की मध्यबिंदु की तरह गले में लटकता रहता है। एक सज्जन ने कहा आप भी मफ़लर पहनते हैं। देहाती की तरह। एक पूर्व देहाती को यह बात पसंद नहीं आई। आखिर मुझे और मेरे मफ़लर में कोई फ़र्क नहीं है। मफ़लर एक पुल की तरह वो पट्टी है जो फैशन भी है और पुरातन भी।

कैसे? बस आप मफ़लर को सर के पीछे से घुमाते हुए दोनों कान के ऊपर से ले आईये और फिर ठुड्डी के नीचे बांध कर कालर में खोंस दीजिए। आप देहाती की तरह लगते हैं। मफ़लर तब फ़ैशन नहीं रह जाता। नेसेसिटी की तरह सर्दी से बचने का अनिवार्य ढाल बन जाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश के ठीक ठाक लोगों से लेकर रिक्शेवाले, चायवाले तक इसी अंदाज़ में मफ़लर की इस शैली को ज़माने से अपनाते रहे हैं। मफ़लर पर किसी ने शोध नहीं किया है। शायद ब्रितानी चीज़ होगी। लेकिन हम मफ़लर से पहले शाल को भी इसी अंदाज़ में कॉलर के ऊपर गांठ बांध कर ओढ़ते रहे हैं। हिमालय से नीचे उतर कर आने वाली सर्द हवाओं से बचने के लिए। लालू जैसे नेता तो कपार के ऊपर घूमा घूमा कर बांध देते हैं। मफ़लर का एक रूप यह भी है।

लेकिन मफ़लर का एक अंदाज़ खांटी देहाती होने के बाद भी शहरी रूप में बचा रहा है। जिसे आप अपने कोट के दोनों साइड के बीच लटका देते हैं। यहां मफ़लर का कुछ हिस्सा कोट के पीछे रहता है और कुछ कोट के बाहर। यह मफ़लर का शहरी रूप है। इस रूप में आप स्मार्ट कहे जाते हैं।मफ़लर नेसेसिटी से फ़ैशन हो जाता है। देहात और शहर के बीच का एक मध्यबिंदु मफ़लर में ही वो ताकत है जो पल में देहाती और पल में शहरी हो सकता है। वो मेरे जैसा है। पूर्व देहाती और मौजूदा शहरी। कृपया मफ़लर को गया गुज़रा न समझें। इससे मेरी आत्मा आहत होती है।

13 comments:

पुनीता said...

मफलर यो मोफलर के नाम से प्रसिद्ध यह चीज बहुत बहुत ही उपयोगी है इसे वही समझ सकते हैं जो उसके ओढ़ने के आदी हैं. गरीब हो या अमीर पहनता तो सब है पर स्टाइल सबकी इतनी निराली होती है कि कई बार तो ऐसा लगता है कि मफलर दिखावे की चीज होती जा रही है. मफलर की कीमत 15 रूपए से लेकर 1500 रूपए तक मध्यम वर्ग के लिए उपलब्ध है।
मफलर तो बस मफलर है दिल्ली वाले इसे नहीं पहनते क्योंकि इसे पहनना उन्हें देहातीपन लगता है. और जो पूरे कान ढ़ककर पहनते हैं उन्हें वह पक्का बिहारी ही समझते हैं. पर कोई बात नहीं बिहारी को बिहारी ही समझने दीजिए और मफलर तान कर चलिए क्योंकि सचमुच ठंड़ ज्यादा है.

मृत्युंजय कुमार said...

जब कडाके की ठंड में उपर से हवा घुसती है और नीचे पिछवाड़े तक सरसराती चली जाती है तो फैशन का कोई प्रतिनिधि वस्त्र उससे बचाव नहीं कर सकता जितना बचाव मफलर करता है। अगर आप बाइक भी चलातेहैं तो मफलर आपके मगज को सुरक्षा देगा। श्रमजीवियों के लिए जाड़े में ये रामबाण है। इसी मफलर को लपेट कितने लोग संपादक बन गए। यह बात और है कि बाद में उन्हें यह हीन लगने लगा।

saharsh said...

Pahli baar jab ghar se Dilli ke liye chala to Maa ne yaad se Maflar bhi diya. Yahan aakar maflar sirf kamre me hi kabhi-2prayukt hua. Magar use kabhi wapas na le gaya. Shayad ghar walon ke dar se ki kahenge Dilli jake badal gaya sala. Wahi 5 saal purana apne sardi ka garam saathi mera maflar, jise mai kabhi hamesha apne se lapete rahta tha, yahan kyon itnaa awnchit ho gaya hai ? Aaj mujhe jawab mil gaya hai.

dipti said...

सर पर बंधा मफ़लर मुझे ठंड में पहनने वाली पगड़ी लगता था। और गले में पड़ा मफ़लर देव आनंद और शाहरूख खान की कॉपी।

दीप्ति।

ravish said...

दोस्तों
मफलर के ये तमाम प्रसंग रोचक लग रहे हैं। प्लीज़ कहते रहिए। कपड़े का एक टुकड़ा कितनी तरह की स्मृतियों को बनाता है और बताता है। मुझे अच्छा लग रहा है। मफलर को शान से ओढ़ कर चलें। कितनी कहानी है मफलर की।आपकी प्रतिक्रियाओं में झलक रही

मनीषा पांडेय said...

मफलर अब नए जमाने की आधुनिक, शहरी लड़कियों के बीच स्‍टोल हो गया है। गले में स्‍टोल लटकाकर चलती है। हजारों रु. हर ड्रेस की मैचिंग के स्‍टोल खरीदने में फूंके जाते हैं। कहने को गर्म है, पर चिंदी टाइप कपड़े से ठंड कहां रुकती है भला।

ravish said...

स्टोल के बारे में आज पता चला है। क्या इसे सिर्फ लड़कियां वरण करती

pushpam said...

koi kuch bhi kahe ravish ji,mufler hai bade kaam ki cheez,ab jaan hai to jahan hai isiliye MODERN ban ne ke chak kar mei kahi upar ka hi ticket na kat jaaye so mufler ka prayog karte rahe....

saharsh said...

Sala apne bhaje me to kabhi aisa idea hi nahi aaya ki maflar par bhi kuchh likha ja sakta hai. Maan gaye Ravish. Kya khurafati creative dimag hai apka? Sachmuch aap maflar ki tarah hai, sahri aur dehati ka adbhut mel. Bihar ki shan maflar ki yaad dilane ke liye shukriya.

निखिल आनन्द गिरि said...

आश्चर्य होता है कि रवीश जी क्या-क्या सोचते रहते हैं.....आपके कंटेंट का शीर्षक पढ़कर ही एक साँस में पूरा पढ़ जाता हूँ.....मफलर पर क्या बोलूं....दिल्ली में दो साल होने को हैं मगर अब तक फैशन वाली टोपी नहीं खरीद सका....तब तक मफलर साथ दे रहा है....अब आपके लेख के बाद मन करता है कि कुछ दिन और देहाती बना रहूँ..सुकून मिलता है....

dharmendra said...

रवीश चाहे फैशन हो न हो जब कड़ाके की सर्दी पडती है .......... तो मफलर से उचित कुछ नही लगता ...... कभी कभी तो एक साल ओढ़ते हैं और एक का मफलर बनालेते हैं...................

मनीषा पांडेय said...

हां, रवीश। मैंने तो लड़कियों को ही स्‍टोल का वरण करते हुए देखा है। मुंबई में हॉस्‍टल में पहली बार इस वस्‍त्र से मेरा साबका पड़ा। वरना मैं तो सिर्फ दुपट्टा ही जानती थी। शलवार-कुर्ता के उलट जींस मुझे इसलिए भी प्रिय था क्‍योंकि उस पर दुपट्टा ओढ़ने का झंझट नहीं होता। लेकिन अब तो लड़कियां खुद-ब-खुद जींस पर भी स्‍टोल टांगे मिल जाएंगी। ये तरह-तरह की डिजाइनों वाला, कभी जालीदार तो कभी दुपट्टे से भी पतला कपड़े का टुकड़ होता है, जिसे लड़कियां गले में टांगे रहती हैं। खासकर जींस और स्‍कर्ट के साथ स्‍टोल लटकाने का फैशन है। स्‍टोल काफी फैशनेबल और मंहगे होते हैं। फिलहाल वो मुझे पोंछा लगाने लायक भी नहीं लगते, और जींस मैं इसीलिए पहनती हूं कि दुपट्टे से निजात मिले। कुत्‍ता काटा है जो जींस पर भी कपड़ा टांगूं।

अनामदास said...

रवीश भाई
मफलर की कहानी देर से देखी, दिलचस्प ऑब्ज़र्वेशन है. ऑक्सफ़र्ड डिक्शनरी बताती है कि अँगरेज़ी शब्द मफ़लर (muffler) से तात्पर्य ऐसे कपड़े के टुकड़े से है जिसे गर्मी पाने के लिए गले के चारों तरफ़ लपेटा जाता हो. वैसे muffle का अर्थ ही है लिपटा हुआ या दबा-ढँका हुआ. बिहार और उत्तर प्रदेश में इसे सिर के ऊपर से कान को ढंकते हुए गले में बाँधा जाता है जिसे गांती भी कहते हैं. अब यूरोपीय फ़ैशन से मफ़लर शब्द लुप्त हो चुका है इसे स्कार्फ़ कहा जाता है, दुकानदार भी मफ़लर शब्द से अपरिचित हैं लेकिन भारत में यथावत चल रहा है. एक और बात कि यूरोप में स्कार्फ़ गले में लपेटा जाता है टाई की तरह, सिर और कान को ठंड से बचाने के लिए लोग गर्म टोपियाँ पहनते हैं. डिक्शनरी भी कहती है कि मफ़लर गले को गर्म रखने वाला कपड़ा है, भारत में लोग फ़ैशन की परवाह किए बिना चीज़ों का बेहतर इस्तेमाल करना जानते हैं. सिर, कान, गला अगर एक ही लपेटे में बच जाए तो कहने.
वैसे दबी हुई आवाज़ के लिए muffled शब्द का इस्तेमाल होता है, जिसे भारत में गाड़ियों का silencer कहा जाता है उसे ज्यादातर अँगरेज़ीभाषी देशों में muffler कहते हैं. वैसे भी आपने गले में कसके मफ़लर लपेटा हो तो आवाज़ शायद उतनी तेज़ नहीं निकलेगी.