मोनालीसा हंस रही थी

अशोक भौमिक का यह उपन्यास पढ़ कर डर गया। बहुत दिनों बाद तमाम महत्वकांक्षाओं की उड़ान के बीच रिश्तों के खत्म और खतरनाक होने की ऐसी कहानी पढ़ी है। लखनऊ, लंदन, आज़मगढ़, फ्रांस, लियोनार्दो, किशन और प्रो नियोगी और मुंबई।अलग अलग समय और अलग अलग शहर। लेकिन किरदारों से कहानी ऐसी बुनी गई जैसे सब एक दूसरे के समकालीन हों। बड़ा कलाकार कितने बड़ों का प्यादा होता है और उसकी कला बाज़ार में बिक कर क्या हो जाती है। इन सब यथार्थ पर मोनालीसा का हंसना। रोना आया। हम सब किसी बाहरी एजेंट की तय की हुई शर्तों के अनुसार कुछ पाने की होड़ में जानवर होते हुए लोगों के लिए यह कहानी आईना का काम कर सकती है। वो तमाम लोग जो अपने अपने संस्थानों में महान और मैनेजिंग डाइरेक्टर होना चाहते हैं,उन्हें मोनालीसा की हंसी को समझना चाहिए। इस कहानी को पढ़ना चाहिए। मैं बहुत कम पढ़ता हूं। इसलिए इसे बेहतर बताने के लिए किसी अन्य बेहतर से तुलना करने में समर्थ नहीं हूं। लेकिन मोनालीसा हंस रही थी पढ़ना ज़रूरी है। पेरिस तक उड़ान भरने की चाह में अपने भीतर का आज़मगढ़ गंवा देने वाला किशन और उसके जैसे तमाम हम लोग। आइये इस कहानी का पाठक बन कर ख़ुद को ढूंढते हैं वहां जाकर जहां पहले से पहुंच कर मोनालीसा हंस रही है।

2 comments:

saharsh said...

Ashok Bhomik ki 'Monalisa hans rahi thi' Gaurinath ji se prapt hua. Magar lakar rakh diya hai. Ab, ise itminan se padhunga. Unhone Bayan me bhi ise prakashit kiya hai. Gaurinath ki likhi 'Nach ke Bahar' bhi laya hun. Agle mahine Vishwa Putak Mele me 'Antika Prakashan' ka intezar rahega.

संदीप पाण्डेय said...

मोनालिसा हंस रही थी, ये एक रचना काफी है हमारे समय के कलाकारों की नियति के बारे में जानने के लिए.हम जीवन भर जिन चीजों के लिए लड़ते हैं जिन पर गर्व करते हैं वो दरअसल कहीं और से निर्धारित होती है. ये सच कितना डरावना है.truth is somrtimes more stranger than fiction..... गौरीनाथजी को बया में इसे प्रकाशित कराने के लिए साधुवाद.