मुज़फ़्फ़रनगर में दंगा, दलों का दंगल

उत्तर प्रदेश में कुछ तो सुनियोजित है जो नज़र नहीं आ रहा । एक के बाद एक दंगे तात्कालिक नहीं हो सकते । समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद कई दंगे हो चुके हैं । मुज़फ़्फ़रनगर का दंगा शायद चुनाव के करीब है मगर उससे पहले के कई दंगों को आप चुनावी पृष्ठभूमि से जोड़ सकते हैं क्या ? बीजेपी पर आरोप लगा देने से भी प्रमाणिक जवाब नहीं मिलता । जिस बीजेपी का राजनीतिक आधार सांप्रदायिक राजनीति के कारण ही कमज़ोर हो गया उस राज्य में सांप्रदायिक दंगों के लिए बीजेपी को आधार कैसे मिल गया है । वो भी इतनी जल्दी । अमित शाह के यूपी आने से पहले भी दंगे हो चुके थे । ज़ाहिर है यह एक मुकम्मल जवाब नहीं है । अगर समाजवादी पार्टी चुनाव के लिए यह सब करवा रही है तो सरकार बनते ही दर्जन भर जो दंगे हुए उन्हें आप कैसे समझेंगे । 

कुछ ऐसा है जो अतिसरलीकृत विश्लेषणों से बाहर नहीं आ पा रहा है । सारे तर्क पहले से तय और पुराने लगते हैं । ज़मीन पर कुछ तो दरका है । जिस उत्तरप्रदेश ने बानवे के दंगों के बाद सीख लिया था,जिसने तमाम दलों के बहकावों को समझ लिया था,अचानक वो दंगों की चपेट में कैसे आ रहा है । अगर ज़मीन पर कोई राजनीतिक दल या संगठन साम्प्रदायिक रूप से सक्रिय हो रहा है तो क्या उसे सामने लाने का काम अखिलेश का नहीं है । अगर  दंगे नहीं सँभल रहे तो कम से कम कारण का पता तो चलता होगा । क्या यूपी सरकार ने तमाम दंगों की कोई रिपोर्ट पेश की है ? आख़िर अखिलेश उन राजनीतिक शक्तियों से लड़ते हुए नज़र क्यों नहीं आते जिनके ख़िलाफ़ लड़ते हुए मुलायम मौलाना बन गए । विश्व हिन्दू परिषद की चौरासी कोसी यात्रा जिस तरह से फुस्स हुई उससे एक निष्कर्ष निकल ही सकता है कि इस संगठन कोई व्यापक आधार नहीं है वर्ना अखिलेश को अयोध्या के साथ साथ पूरे उत्तर प्रदेश में सेना तैनात करनी पड़ जाती । पुराने रिकार्ड को देखते हुए पुराने दलों पर शक की सुई तुरंत जा सकती है लेकिन स्पष्ट बहुमत वाली सरकार के पहले ही साल में इतने दंगे कैसे हो गए ख़ासकर तब जब वोट देने वाली जनता का भरोसा और समर्थन भी नया नया होता है । चुनाव तो विधान सभा के भी हुए थे तब क्यों नहीं दंगे भड़के । 

जब भी सवर्ण लोगों से बात करता हूँ उनकी दलील होती है कि समाजवादी की सरकार मुसलमानों का पक्ष ले रही है इसलिए लोग नाराज़ हैं । इस तरह के आरोपों का कोई ठोस आधार नही होता । फिर भी यह धारणा तेज़ी से फैल रही है । आज़म खान खलनायक हैं तो मायावती के समय नसीमुद्दीन  सिद्दीक़ी भी थे । लेकिन मायावती के समय ऐसी बातें नहीं कहीं गईं । क्या यह सच नहीं िक अखिलेश ब्राह्मणों को लुभाने के लिए जाति सम्मेलन कर रहे थे जिसे अदालत के आदेश के कारण बंद करना पड़ा । यूपी की जेलों में बंद मुस्लिम युवकों की रिहाई के लिए बने रिहाई मंच का ईमेल रोज़ आता है जिसमें कुछ न करने की मुलायम सरकार की आलोचना होती है । अगर ये सरकार मुस्लिम परस्त ही होती तो रिहाई मंच जस्टिस निमेष कपूर की रिपोर्ट लागू न कर पाने की आलोचना न करता । मुस्लिम नेताओं से मिलता हूँ तो वे यही शिकायत करते हैं कि हमारा वोट ले लिया मगर काम कुछ नहीं कर रहे हैं । इसलिए ज़रूरी है देखना कि कहने वाला कौन है । हाँ विश्व हिन्दू परिषद का ईमेल मुज़फ़्फ़रनगर या सहारनपुर से ज़रूर आता रहा है इन दिनों । लेकिन मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहा । इन सबक़ा हाथ हो सकता है मगर अचानक इन्हीं का हाथ क्यों होने लगा । कम से कम प्रमाण तो पेश करना ही चाहिए ।


मैं इन राजनीतिक दलीलों को शक की निगाह से देख रहा हूं क्योंकि मैं ज़मीन पर नहीं हूँ । ये रेडिमेड राजनीतिक आलोचनाएँ संतुष्ट नहीं कर रही हैं । सही है कि बिना राजनीति के भड़काए या चुप रहे ऐसा हो नहीं सकता लेकिन कोई ठोस उदाहरण तो होना ही चाहिए । इतने दंगे देखने के बाद भी यूपी के लोग इन संगठनों के हाथों के खिलौने कैसे बन रहे हैं । क्या सामाजिक रिश्ता टूटा है । पता नहीं । कुछ तो और हुआ है जो जातीय प्रतिस्पर्धा को धार्मिक उन्माद में बदल रहा है । जिसे हम देख नहीं पा रहे या आसान आलोचनाओं से काम चला ले रहे हैं । 

सपा बीजेपी की इस तरह से मदद क्यों करेगी कि आप हिन्दू रख लो और हम मुसलमान रख लेते हैं । राजनीति का गणित इतना साफ़ नहीं होता है । क्या दंगा कराने से मुसलमान मुलायम के पास चले जायेंगे । क्या हमारे राजनीतिक पंडितों की इतनी ही समझ है मुसलमानों की । मुस्लिम मतदाताओं को इस बहाने बदनाम किया जा रहा है । उनकी आंकाक्षाएं दस सालों में बदली हैं । आप प्रतापगढ़ की घटना को ज़रा याद कीजिये । कथित रूप से एक दलित लड़की के आरोप के बहाने मुसलमानों के पैंतीस घर जला दिये गए थे । इसी की जाँच कर रहे डीएसपी ज़ियाउल हक़ को मार दिया गया । वो रिपोर्ट कहां है आज तक किसी को पता नहीं । मुज़फ़्फ़रनगर में भी ऐसी कहानी है । कथित रूप से एक हिन्दू लड़की को मुस्लिम लड़कों ने छेड़ा था और फिर बात इक्कीस लोगों की जान तक चली आई है । क्या कोई पैटर्न दिख रहा है आपको । क्या ये कारण पर्याप्त हैं या ऐसी परिस्थितियाँ प्रायोजित हैं ? कमाल खान की रिपोर्ट कहती है िक इस छेड़खानी के विरोध में बीजेपी ने बहू बेटी बचाओ सम्मेलन कर दिया तो दूसरी क़ौम को लगा कि सारे मुसलमानों को इस रंग में रंगा जा रहा है वो भी उस पश्चिम उत्तर प्रदेश में जहाँ हिन्दू बेटियाँ गर्भ से लेकर शादी करने तक मार दी जाती हैं । महापंचायत में किसने क्या बोला अगर वो कारण है तो उनके भाषणों को अदालत के सामने पेश किया जाए । पर कुछ करोगे तब न भाई । 

जो भी हो निश्चित रूप से अखिलेश यादव की सरकार फ़ेल हो चुकी है । अखिलेश ने सख़्त और स्पष्ट संकेत देने के हर मौक़े गँवा दिये हैं । बरेली में हफ्तों दंगा चला था । क्या कोई नई दलील है जिससे यूपी के दर्जनों दंगों को समझने में मदद मिले । किस वोट के लिए अखिलेश ये ज़हर या ख़ून पी रहे हैं । यूपी में ध्रुवीकरण होगा यह बात कई पत्रकार कई दिनों से लिख रहे हैं । क्या कोई पहले से लिखी स्क्रिप्ट दोहराई जा रही है ? अगर हां तो अखिलेश के पास इसके क्या प्रमाण है ? 

इस बीच अफ़वाह फैलाने की मशीनरी सक्रिय हो गई है । जिनसे सावधान रहने की ज़रूरत है । हर हाल में सेकुलर बने रहिए । ऐसे मौक़े पर सांप्रदायिक ठोस दलीलें लेकर हाज़िर हो जाते है अपना विस्तार करने के लिए । उन्हें जगह मत दीजिये । कोई ट्वीट कर रहा है कि दंगे की कवरेज नहीं हो रही । गुजरात की आज तक हो रही है । ये कौन लोग हैं आप इन्हें पहचानियें । हर दल है दलदल में, फिर हम क्यों इनके दलबल में । 

49 comments:

Mayank Chaturvedi said...

sadar charan sparsh ravishji jab bhi aisey article padhta ya sunta hoon to ek ajeeb si hulchul hoti hai ki satyendra dubey ya ziya ul haq ki maut ya aisey dango kay baad hi hamein kyun lagta hai ki sarkar fail ho gayi hai;jab bhi aisi sarkarein banti hain jin mein raja bahiya,mukhtar ansari aur na jane kitney aur baahubali hotay hain toh yeh baat hamare dimag say gayab kyun ho jati hai?jab so called party kay bade netaji kehte hain ki thodi toh chori chalti hai toh hamein ghutan kyun ni hoti ki humnein kisey chunkar sansad mein bheja hai????

truth_i_speak said...

But sir... People who listening on Guj riots are willing to get Media coverage and analysis to uncover truth. If truth comes out. No confusion!

Shoeb Multimedia said...

Ravish Ji Aadab Aap ka har vishleshan aur har programme bara hi rochak hota hai mera maksad yahn is wakt aapki tareef karna nahi hai par aap ki report parhi social media par ho rahi halchal bhi dekh raha hoon Bara hi dukh hota hai ki ek bahumat ki chni huee sarkar dangon ke mammley main itni kamzor kyon hai kya Ips Akhilesh ji ke kabzey main Nahi ya asliyat kuchh aur hai par yeh hamary cm ki bari nakami ki tarah hai

VIKAS MISHRA said...

kya kahe ravish ji aapki reports muh band karne vali hoti hai, aur ab to sare dialogs v ham bhartiyo ko rat chuke hai, congress kahti hai bjp kara rahi hai... bjp kahti hai sp, sp keh rahi hai afwaho pe dhyan na de aur bsp ka vahi patent jawab up me rastrapati shashan lagu ho, hona v chahiye kam se kam pranab da ke liyekuchh naya karne ko to hoga, vo din dur nahi jab hamare gharo ke tv connection v kat diye jayenge taki afwah na faile aur desh andhere me hi rahe..

avijit said...

जो मजहबों के नाम पर दंगे करा रहा है
उसकी दुकां का नाम सियासत है सियासत ...

Mahendra Singh said...

Akhileshji ke saath bahoot see problem hai. Pichle salon main Mulayam ji ke saath wale bahoot se IAS aur IPS retire ho gayen. Naye aaye IAS aur IPS se unkee frequency match nahi kar rahi hai. Naye khoon ne chaploosee karnee kam kar dee hai. Unse Senior bhi darne lage hain.Shayad unko ab yeh ahsas ho gaya hai kee unhe IAS ya IPS se koi bedakhal nahi kar sakta.
Iske liye do incidents par gaur karna hoga. Pichle Vidhansabha election main Basti ke commissioner ne meeting main apne nature ke hisab se Sidharthnagar ke SP ko dant diya.Baad main unhe wahan se hanta pada aur aaajkal Raiseena hill main kahin hai. Doosree ghatna Durga Shakti Nagpal ka prakran hai. .UP main bahoot se PCS aur PPS ko thok main Promotion karke IAS aur IPS banaya gaya phir bhi baat nahi ban pa rahi hai.Is Govt ko samjh nahi aa raha hai available officers se kaise govt
ko chlaya jae. Iseliye unke General Secretary bolte hain ke unhe IAS aur IPS nahi chahiye. Center unhe chahe to wapas bule le hum unke bagair sarkar chala lange.Muzfarnagar ko EK samay thanda kar wale NAVNEET Sikara ji ko wahan abhi tak kyon nahi bheja gaya yeh samajh se pare hai.UP main "Governace collapse" kee situation hai.

Mahendra Singh said...

"Jamin se le phalak tak ek dam ghuti udasi hai.Kesee ka pat khali hai kisee ke rooh pyasee hai,Khuda ke waste kisi ka ghar jala dena, Yeh majhab se wafadari haqiqat main siyasee hai."

Neeraj Kumar said...

आदरणीय रविश जी समानतया मैं आपके विचारों से सहमत नहीं होता , आपके विचार प्रगतिशीलता का आवरण ओढ़े कटु सत्य से दूर होती है परन्तु आपका यह विश्लेषण अच्छा लगा .. आप निष्पक्ष दिखे, अमूमन भारत में नेता और उससे बढ़कर मीडिया सेकुलर बनने के चक्कर में एक पक्षीय दृष्टि ही रखता है . आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ .. आगे आता रहूँगा .. आभार
नीरज 'नीर'
KAVYA SUDHA ( काव्य सुधा )

Enigma said...

Ek brahman ne kaha hai ki ye saal accha hai…

zulm ki raat bahut jaldi dhalegi ab to..
aag chulhe me har ek roz jalegi ab to

bhookh ke maare koi baccha nahi royega..
chain ki neend har ek shaks yahan soyega

aandhi nafrat ki chalegi na kahin ab ke baras..
pyaar ki fasl ugaayegi zameen ab ke baras

hai yakeen ab na koi shor sharaba hoga..
zulm hoga na kahin khoon kharaba hoga

os aur dhoop ke sadme na sahega koi..
ab mere des me beghar na rahega koi

naye vaadon ka jo daala hai, wo jaal accha hai..
rehnumaaon ne kaha hai ki ye saal accha hai..

humko maalum hai jannat ki haqeeqat lekin
dil ke khush rakhne ko Ghalib ye khayal accha hai..

Leader said...

आग़ को बुझाते हुवे साथ में उसे फेलने से भी रोकना चाहिए . आग़ आग़ होती हैं, वह सब कुछ राख़ में बदल देती हैं, दिल तो क्या पत्थर को भी तोड़ देती हैं. आग़ के कारणों पर लपटों के बीच बात करने से भी बचना चाहिए. आग़ बुझने पर उसके लगने के कारणों पर बात करनी चाहिए. लड़ाई, झगड़े, फ़साद और युद्ध के पीछे आग़ ही होती हैं चाहे जमीन से फेलती हो या ज़मीर के जवाब देने से !
छोटी सी चिंगारी चाहे घास-झाड़-फ़ानूस में लगे या दिल में लगे वह आग़ बन सकती हैं इसलिए चाहिए कि बार-बार लगने वाली आग़ पर बाद में बात करनी चाहिये, अभी तो आग़ बुझनी चाहिए. गर आग़ की चाहत ही हैं तो उस दिल में लगनी चाहिए जो चिंगारी नहीं पैदा करके दिल को पिघलाकर प्रेम में बदल दे जिसमे शान्ति हो ! अभी तो शांति को बचाने के लिए आग़ बुझनी ही चाहिए और फेलनी भी नहीं चाहिए!

SHABAHAT KHAN said...
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SHABAHAT KHAN said...

Namashkaar Ravish ji...ye dange public me bhare ja rahe zaher ke nikalne ki baangi bhar lagte hain mujhe, UP ke yuva ki haalat dekhi jaaye to ek cheez saaf hai ki yahan berozgari se joojh rahe yuvaon ki tadaad bahut zyada hai aur SOCIAL MEDIA pe unka bahut waqt spend hota hai...isi social media ka fayada utha k kuch sangathan lambe samay se Farzi, aur mangaranth baatein faila k dono communities ko ik dusre k khilaaf bhadka rahe hain aur har choti badi baat ko hindu muslim ke chashme se dekha aur dikhaaya ja raha hai....aur to aur mainstreem media ko paid media bata k apni hi fake news photos aur videos ko sach bataya jaa raha hai..aur yuva bina soche samjhe in groups ki baatein sach maan raha hai aur share kar raha hai...agar dekha jaaye to ye groups apne maksad me kaamyab ho bhi gaye hain kyonki padhe likhe log bhi ab aisi baaton ko bine soche samjhe share kar rahe hain(Twitter pe aise logon ko aapne bhi dekha hoga)...alag alag jagah se farzi pictures,videos aadi share kar k desh ko grah yuddh ki taraf dhakela jaa raha hai aur politicians apne apne nafe nuksaan dekhte hue faayda utha rahe hain ya chup hain...ye sab aur badhega agar social media pe ho rahi is saajish ko nahi roka jaayega aujr aisa karne waalon ko saza nahi milegi

Vidya visharad mishra said...

aise muddo pe to mere dimag me koi bat hi nahi aati....kewal itna hi sochta reh jata hu..k aaj b foot dalo ar raaj Karo vali yukti chalti aa rahi h...hamare shikshit samaj ka ye ghridit chehra h..Hindu Hindu Muslim Muslim...ye mera vote vo Tera vote...main Tera vote tu mera vote...

tim said...

Pahli bar comment karne ko majbur ho rha hu. Aaj news channels dekh kr gussa aa rha tha.Jis channel ka reporter zindagi se haath dho baitha wo zinadgi live dikha rahi thi! Aap bhi dikhe hum log per.sab per koi na koi dikha, bas nahi dikha to dange ki reporting. Aap secular bane rahne ko kahte hain, main hu secular lekin mujhe sach janna hai. Aap k news channel call karo to kahte hain humari marzi kya dikhaenge. Main kyon na dekhna chahu dange ki reporting. Jab das saal pahle danga shabd ka live meaning aap logo ne hi sikhaya to ab kyon kuch aur sikhne ko kah rahe hain? mujhe bhi janna hai ki kya kal agar MP ya gujarat me riot hue to bhi aap chup rahenge? Main to media ko hi zimmdar manta hu ki aaj tak UP me itne dange hue new govt me. MEdia gandhi ji ka bandar bana raha isliye sarkar befikr hai. Masjid ki deewar girte hi use pata chal jata hai ki communal tension hoga aur 144 k naak k niche mahapanchayat?? Wah kaise desh me rahta hu main. Media ne apni zimmedari nahi dibhayi hai aur agar yahi karna hai to aage bhi aise hi karte rahe, aisa na ho ki kal aap logo ko dange me bah rahe khoon ka rang badla nazar aane lage aur wo lagata breaking news me jaan dalne k kaam aaye.

amittiwari said...

रवीश जी नमस्कार, वास्तविक कारण जमीन के लोगों को बहुत अच्छे से पता है किन्तु नेशनल मीडिया पे ना कोई कहेगा और ना कोई स्वीकारेगा। जन सामान्य स्तर पर क़ानून व्यवस्था का अता पता नहीं है। मैं ऐसा हवाबाजी में नहीं कह रहा हूँ बल्कि मेरे पिता स्वयं पुलिस में हैं और उनके रोज रोज के अनुभवों से कह रहा हूँ। जो अधिकारी कुछ कर सकते हैं उन्हें बसपा का आदमी बता के यहाँ वहाँ पोस्ट कर रखा है। जमाना दोष दे सकता है कि उत्तर प्रदेश के लोगों ने ही तो बहुमत से ये सरकार चुनी थी इस प्राचीन प्रदेश के लोकतंत्र का अलिखित सत्य यही है कि यहाँ बहुमत वाली सरकार को लोगों ने नहीं चुन होता। लिखने को बहुत है किन्तु क्या फायदा।।।

Sushil Kumar Tomar said...

Sir, mera khud ka anubhav aur samjah aisa kheti hai..have a look at my blog post..

http://khaalibheja.blogspot.com/2013/09/blog-post.html

shyam said...

boya per babool ka aam khan se hoey. AY govt. belives in shoe licking officers. M nagar incident perfect example of incompetence of govt. officials. donot blame politicians. do you sleep with open door to stop theft?. the proper action after the incident of lynching two youth would have nipped the bud.

GAURAV PORIA said...
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Mahendra Singh said...

TIM kee baton main dam hai. Ek laakh log kahin ekatha ho rahe hain to who wahan "Ragupati raghav rajaram" to gane ja nahi rahe honge samay rahte unhe kyon nahi roka gaya.IS Dange kee reprting kyon nahi ho rahi hai . Iske peeche kya settlement hua hai.BJP shashit states main aisee hee reporting hoti. Congress bahoot dheemee awaz main bol rahi kee sunaee hee na pade"Ashwathama maro naro ya kunjro"

Rajhans raju said...

फसाद करना भी,
लोगों का काम हो जाता है,
कुर्सी पाने का,
एक जरिया हो जाता है,
तब किसी का,
अफ़सोस करना भी,
उन्हें,
साज़िस का हिस्सा नज़र आता है।
जिन्होंने,
न मालूम कितने,
बेगुनाहों का खून बहाया,
वही रहनुमा बन जाता है
किसे अच्छा कहूं, किसे बुरा कहूं,
जब हर किसी ने
अपने पहलू में तेज़ धार वाला,
खंजर रक्खा है,
अभी वह चुप है,
शायद,
घात लगाकर बैठा है,
ऐसे ही अपने,
मौके का,
इंतजार करता है...

chetak said...

agar yehi gujrat me hota toh ussi din se khabar aane lag jaati

sanjaya said...

when Narendra Modi is responsible for 2002, them why Mulayam is not responsible for more then 35 Dange.

sanjaya said...

KAMAL KHAN AGAR KAMAL KHANNA HOTE AUR RAVISH KUMAR AGAR RAVISH KAMAL HOTE TO REPORTING KUCH AUR HO RAHI HOTI.

Khabro ko dabakar aap kaun sa dharm nibha rahe hai. Jamini haqikat sirf itni hai SP govt. me hindu kamjor nahi hua hai, par muslim apne ko takatwar samajhne lage hai, aur yahi 30 se jyada dange ki vajah hai


ashutosh mitra said...

रवीश जी,
जब जनता जातीय और धार्मिक आधार पर नुमांइदे और सरकारें चुनती है तो यही होता है। हमारे नेतृत्व के पास कटोरे में वोट मांगने का एक ही आधार है 'तुम' खतरे में हो, तुम्हारा वजूद खतरे में है। ऐसा चाहे खुल के कहा जाये दबे छिपे में। गर ऐसा न होता तो मंडल न होता बाकी के सैकड़ों सरकारी कमीशन न होते। तो इन दंगों के लिये, वे चाहे जब हों या किसी भी शासन में हो, आधार तो पहले से तैयार होता है। सोडा की बोतल की तरह बस उसे इतना हिलाने की जरूरत होती है कि वह फट पड़े। दंगा कराने से अगर लोग खेमें में न बटते या उल्टा करके देखें कि अगर लोग खेमें में न बंटे हो तो दंगा न होता। दोनो ही स्थिति में हमारा अशिक्षित समाज नफा नुक्सान समझ ही नहीं पाता है और अगर पोलराइज़ेशन का प्रभाव न होता तो चुनाव विश्लेषण के समय जातीय और धार्मिक समीकरणों को इतना महत्व क्यों दिया जाता। मेरा तो यही मानना है कि अगर शिक्षा और रोज़गार नहीं होगा तो कोई भी समाज बंधा नहीं रह सकता, उसके टूटने या फट पड़ने के कारणों का कमी नहीं होती।

Amit Jha said...

sir ek kahawat hai as you saw as you reap!! hum sab jante the ki s.p. ek gundo ki aur majhabi party hai but fir bhi usko jitiya to do evil and look for like. waha ki janta ne khud hi apne pair pe kulhari mari thi, jab bhi janta jaati dharm aur majhab ke naam pe vote degi, deti rahegi tab tak ye sab chalta hi rahega,,,,,,,,,,, hum aao chah ke bhi en sab ko na to samjha sakte hai na hi rok sakte hai kyuki ye sab prayojit aur paise khoon aur nafrat ke log hai jinko samajhdaro ki baa samajh nhi aati aur rahi aawam ki baat to wo abhi tak educate nhi hai usme patient ki bahut hi abhav hoti hai........

Amit Jha said...

sir ek kahawat hai as you saw as you reap!! hum sab jante the ki s.p. ek gundo ki aur majhabi party hai but fir bhi usko jitiya to do evil and look for like. waha ki janta ne khud hi apne pair pe kulhari mari thi, jab bhi janta jaati dharm aur majhab ke naam pe vote degi, deti rahegi tab tak ye sab chalta hi rahega,,,,,,,,,,, hum aao chah ke bhi en sab ko na to samjha sakte hai na hi rok sakte hai kyuki ye sab prayojit aur paise khoon aur nafrat ke log hai jinko samajhdaro ki baa samajh nhi aati aur rahi aawam ki baat to wo abhi tak educate nhi hai usme patient ki bahut hi abhav hoti hai........

anuj sharma said...

जिस जगह को आप छू रहे हैं नेताओ के लिये अनजाना सा मसला हो गया है खेल रहे थे हिन्दू मुस्लिम बन गया जान का जंजाल।अपने ही नेताओं को गलियां पड़ीं महापंचायत में यह कोई नहीं कह रहा। दंगा महा पंचायत के कारण हुआ तो पहले से जो हो रहा था वो क्या था। यह रिटालिएशन क्यों हुआ ? कुछ अलग हो गया है बहुत प्यार और सतर्कता की जरूरत है।

sure376 said...

Bhai sahab yeh jo election --2 ka khel shuru ho jata hai tab rape dange bhi shuru ho jate hai. . Yaad hoga jab behanji ki sarkar apne akhri dino mein thi toh up mein roj rape ki khabar aati thi.. Main to kahta huu ki yeh election ka khel hona hi nahi chahiye.. Jise man kare 6 -6 mahine ke liye gaddi de do. . Sabka kam se kam pet bhara rahega

Dilip Dixit said...

छुरा भोंककर चिल्लाये ..
हर हर शंकर
छुरा भोंककर चिल्लाये ..
अल्लाहो अकबर
शोर खत्म होने पर
जो कुछ बच रहा वह था
छुरा और बहता लहू…
इस बार दंगा बहुत बड़ा था
खूब हुई थी ख़ून की बारिश
अगले साल अच्छी होगी
फसल मतदान की – गोरख पाण्डेय

पूरण खण्डेलवाल said...

रवीश जी , शायद हमारे मीडिया और उनसे जुड़े लोगों को सवालों से बचने की आदत पड़ गयी है और यही कारण है कि आपनें यह कहकर अपना विश्लेषण समाप्त किया है कि पहचानिये ये कौन लोग है ! सवाल उठेंगे और सवाल वाजिब भी है ३० से ज्यादा दंगे होनें के बावजूद मीडिया खामोश क्यों रहा !

Saurabh Mishra said...

Aap apne khud ki stuti ko dhyan mein rakh ke lekh likhte hain....ye sangarsh jaroori tha.

Saurabh Mishra said...

koi bhi lekh iss baat ko dhyan me rakh kar liken ki ussme kitna tathya hai na ki iss baat ko dhyan mein rakh kar ki usse aap kitni wahwahi bator lenge..ek naitik jimmedari nagrikon ki bhi hoti hai..jab itne bade mass mein logon mein gussa ho to aap usse sarkar ki viphalta nahi kahenge...anna movement aur nirbhaya kand mein aap logon ne gusse ke karan ko dikhaya tha..na ki ye kaha ki sarkar logon ko control nahi kar payi..same issme bhi dange ke karan ko dikhayiye

RAHUL VAISH said...

कुँए का मेढ़क बना देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया
देश के महाभ्रष्ट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (महाभ्रष्ट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसलिए क्यों की उसका उल्लेख मैं अपने पूर्व के ब्लॉग में विस्तारपूर्वक कर चूका हूँ अत: मेरे पूर्व के ब्लॉग का अध्यन जागरणजंक्शन.कॉम पर करे ) के उन न्यूज़ चैनलों को अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए जो न्यूज़ चैनल के नाम के आगे ”इंडिया” या देश का नॉ.१ इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते है. क्यों की इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कुँए के मेढकों का न्यूज़ चैनलों का राडार या तो एन.सी.आर. या फिर बीमारू राज्य तक सीमित रहता है. कुए के मेढ़क बने इन न्यूज़ चेंनलो को दिल्ली का “दामिनी” केस तो दिख जाता है लेकिन जब नागालैंड में कोई लड़की दिल्ली के “दामनी” जैसी शिकार बनती है तो वह घटना इन न्यूज़ चैनलों को तो दूर, इनके आकाओं को भी नहीं मालूम पड़ पाती. आई.ए.एस. दुर्गा नागपाल की के निलंबन की खबर इनके राडार पड़ इसलिए चढ़ जाती हैं क्यों की वो घटना नोएडा में घटित हो रही है जबकि दुर्गा जैसी किसी महिला अफसर के साथ यदि मणिपुर में नाइंसाफी होती है तो वह बात इनको दूर-दूर तक मालूम नहीं पड़ पाती है कारण साफ़ है की खुद को देश का चैनल बताने वाले इन कुँए का मेढ़क इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का कोई संबाददाता आज देश उत्तर पूर्व इलाकों में तैनात नहीं है. देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह से न्यूज़ की रिपोर्टिंग करता है उससे तो मालूम पड़ता है की देश के उत्तर पूर्व राज्यों में कोई घटना ही नहीं होती है. बड़े शर्म की बात है की जब देश के सिक्किम राज्य में कुछ बर्ष पहले भूकंप आया था तो देश का न्यूज़ चैनल बताने वाले इन कुँए का मेढ़क न्यूज़ चैनलों के संबाददाताओं को सिक्किम पहुचने में २ दिन लग गए. यहाँ तक की गुवहाटी में जब कुछ बर्ष पहले एक लड़की से सरेआम घटना हुई थी तो इन कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों को उस घटना की वाइट के लिए एक लोकल न्यूज़ चैनल के ऊपर निर्भर रहना पड़ा था. इन न्यूज़ चैनलों की दिन भर की ख़बरों में ना तो देश दक्षिण राज्य केरल, तमिलनाडु, लक्ष्यद्वीप और अंडमान की ख़बरें होती है और ना ही उत्तर पूर्व के राज्यों की. हाँ अगर एन.सी.आर. या बीमारू राज्यों में कोई घटना घटित हो जाती है तो इनका न्यूज़ राडार अवश्य घूमता है. जब देश के उत्तर पूर्व या दक्षिण राज्यों के लोग इनके न्यूज़ चैनलों को देखते होंगे तो इन न्यूज़ चैनलों के द्वारा देश या इंडिया नाम के इस्तेमाल किये जा रहे शब्द पर जरुर दुःख प्रकट करते होंगे. क्यों की देश में कुँए का मेढ़क बने इन न्यूज़ चैनलों को हमारे देश की भौगोलिक सीमायें ही ज्ञात नहीं है तो फिर ये न्यूज़ चैनल क्यों देश या इंडिया जैसे शब्दों का प्रयोग करते है आखिर क्यों नहीं खुद को कुँए का मेढक न्यूज़ चैनल घोषित कर लेते जब ये आलसी बन कर देश बिभिन्न भागों में घटित हो रही घटनाओं को दिखने की जहमत नहीं उठाना चाहते है. धन्यवाद. राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता), एम. ए. जनसंचार एवम भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत फेसबुक पर मुझे शामिल करे- vaishr_rahul@yahoo.कॉम और Rahul Vaish Moradabad

raushan kumar said...

बहुत ही होसियारी के साथ बीजेपी को दंगा का जीमेदार ढहराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!!

Mukund Kumar said...

kya likhte hai sir ji.i am your fan

Atiq said...

Sir..main bas in tamam so called secular logon se puchna chahunga ki, kya yeh baat unhe nahi pata thi, jo aap ke blog ko padhne ke baad inko pata chali...riot hamesha insaniyat pe ek badnuma daag hai...Main ek baat aur janna chahunga...kya is desh main waike 'secular;, jaisi koi baat rahi hai, kya desh prem sirf Pakistan se cricket match ke time pe hi aata hai..kyun un netaon ko itna samman diya jata hai jo ki khud besharmi ka aina hai..mera ishara sabhi partyon se hai..chahe woh left ho ya right....aur rahi baat media ki to media main ab koi baat bachi nahi hai...ethics naam ki koi chiz hi nahi hai...news ke naam pe sirf TRP...Aap ka channel bhi isse achuta nahi raha..chahe woh Kargil war ho ya 26/11, jisme aap ki ek mahan reporter ne apne laparwah reporting ke wajah se kitnon ko maut ke hawale karwa diya....Media sab pe tippani karta phirta hai...par media pe kaun kare...media is kadar apna reporting ka level gira chuka hai ki news ka matlab hi badal gaya...So Ravish ji bahar kyun dhundh rahe haain answer..aap apne media industry man hi dekh lijiye jahan kitne visphotak aur bharkau news samaj ke liye manufacture ho rahe hain...aap sirf sahi aur nishpakch news dikhaye...baaki janta ko faisla lene dijiye.

ParveenAmity2013 said...

धर्म तुम दिखने में कैसे हो
देखा नहीं है तुम्हें कभी...
तुम शरीर हो क्या कोई या
नाममात्र हो कुछ
पंछी तो तुम नहीं हो सकते
और तुम्हें पशु
मैं नहीं कहना चाहता।
तो भला कौन सा वर्ण
है तुम्हारा,कौन से
कुल के हो तुम?
धर्म तुम पढ़े-लिखे भी हो क्या
कभी रोटी देखी है तुमने
और कभी भूखे पेट सोये हो क्या
धर्म
तुम बेघर भी हो क्या
क्या हो तुम लहुलुहान बच्चे का चेहरा
क्या तुम बिलखती हुई माँ हो
हो क्या तुम एक टुटा हुआ पिता
क्या तुम असहाय बेटी हो
या भड़का हुआ बेटा?
......

RAHUL VAISH said...

कुँए का मेढ़क बना देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

देश के महाभ्रष्ट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (महाभ्रष्ट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इसलिए क्यों की उसका उल्लेख मैं अपने पूर्व के ब्लॉग में विस्तारपूर्वक कर चूका हूँ अत: मेरे पूर्व के ब्लॉग का अध्यन जागरणजंक्शन.कॉम पर करे ) के उन न्यूज़ चैनलों को अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए जो न्यूज़ चैनल के नाम के आगे ”इंडिया” या देश का नॉ.१ इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते है. क्यों की इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों का राडार या तो एन.सी.आर. या फिर बीमारू राज्य तक सीमित रहता है. कुए के मेढ़क बने इन न्यूज़ चैनलों को दिल्ली का “दामिनी” केस तो दिख जाता है लेकिन जब नागालैंड में कोई लड़की दिल्ली के “दामनी” जैसी शिकार बनती है तो वह घटना इन न्यूज़ चैनलों को तो दूर, इनके आकाओं को भी नहीं मालूम पड़ पाती. आई.ए.एस. दुर्गा नागपाल की के निलंबन की खबर इनके राडार पड़ इसलिए चढ़ जाती हैं क्यों की वो घटना नोएडा में घटित हो रही है जहाँ इन कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों के दफ्तर है जबकि दुर्गा जैसी किसी महिला अफसर के साथ यदि मणिपुर में नाइंसाफी होती है तो वह बात इनको दूर-दूर तक मालूम नहीं पड़ पाती है कारण साफ़ है की खुद को देश का चैनल बताने वाले इन कुँए का मेढ़क न्यूज़ चैनलों का कोई संबाददाता आज देश उत्तर-पूर्व इलाकों में मौजूद नहीं है. देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिस तरह से न्यूज़ की रिपोर्टिंग करता है उससे तो मालूम पड़ता है की देश के उत्तर-पूर्व राज्यों में कोई घटना ही नहीं होती है. बड़े शर्म की बात है कि जब देश के सिक्किम राज्य में कुछ बर्ष पहले भूकंप आया था तो देश का न्यूज़ चैनल बताने वाले इन कुँए का मेढ़क न्यूज़ चैनलों के संबाददाताओं को सिक्किम पहुचने में २ दिन लग गए. यहाँ तक की गुवहाटी में जब कुछ बर्ष पहले एक लड़की से सरेआम घटना हुई थी तो इन कुँए के मेढक न्यूज़ चैनलों को उस घटना की वाइट के लिए एक लोकल न्यूज़ चैनल के ऊपर निर्भर रहना पड़ा था. इन न्यूज़ चैनलों की दिन भर की ख़बरों में ना तो देश दक्षिण राज्य केरल, तमिलनाडु, लक्ष्यद्वीप और अंडमान की ख़बरें होती है और ना ही उत्तर-पूर्व के राज्यों की. हाँ अगर एन.सी.आर. या बीमारू राज्यों में कोई घटना घटित हो जाती है तो इनका न्यूज़ राडार अवश्य उधर घूमता है. जब देश के उत्तर-पूर्व या दक्षिण राज्यों के भारतीय लोग इनके न्यूज़ चैनलों को देखते होंगे तो इन न्यूज़ चैनलों के द्वारा देश या इंडिया नाम के इस्तेमाल किये जा रहे शब्द पर जरुर दुःख प्रकट करते होंगे. क्यों की देश में कुँए का मेढ़क बने इन न्यूज़ चैनलों को हमारे देश की भौगोलिक सीमायें ही ज्ञात नहीं है तो फिर ये न्यूज़ चैनल क्यों देश या इंडिया जैसे शब्दों का प्रयोग करते है क्यों नहीं खुद को कुँए का मेढक न्यूज़ चैनल घोषित कर लेते आखिर जब ये आलसी बन कर देश बिभिन्न भागों में घटित हो रही घटनाओं को दिखने की जहमत ही नहीं उठाना चाहते. धन्यवाद. राहुल वैश्य ( रैंक अवार्ड विजेता), एम. ए. जनसंचार एवम भारतीय सिविल सेवा के लिए प्रयासरत फेसबुक पर मुझे शामिल करे- vaishr_rahul@yahoo.कॉम और Rahul Vaish Moradabad

mayank sachan said...

raveesh ji saari baat sirf rajneetik chashmen se hi kyon dekhi jaa rahi hai ?? jab ki dange aur jaatiwaadi jhagde uttar pradesh ka itihaas rahe hai .. aap apne shahron ka samaajik taana baana dekhiye .. muslim bastiyan alag hoti to walmikiyon aur so called shoodron ki alag bade log jismen jyadatar upper cast hote hain wo alag basti bana kar rahte hai .. musalmaanon ke school alag hote hai madarse ke bheetar kya chalta hai isko hamensha shak ki nigah se hi dekha jaata hai ... jab se india bana ham roj secular hone ke gaane to gaate hai lekin bastiyan alag hi basaate hai ... hamara samaaj andar se vibhaajit hai lekin ham us sachchayi ko dekhna nahin chahte aur uske oopar sarwadharm sambhav aur secularism ka labaada chada kar ye bhoolne ki koshish karte hai ki hamara samaaj kuch galat baaten apne charitra men laa chuka hai... aise dange us samaaj ki wo chadar hata dete hai .. musalmaan aaj bhi india men bahari hi maana jaata hai aur hindu ko wo aaj bhi kaafir ki shreni men hi rakhta hai .. ye baat main us tabke ke liye kar raha hoon jo dangon men maarne ya marne jaate hai.. is liye mujhe bilkul bhi ashcharya nahin hota ki mulayam ya modi usi maansikta ko besharmi se bhunaate hai aur laashon ki sankhya par pradhan mantri aur mukhyamantri chune jaane ka sapna dekhte hai ... aap ek baar is samaaj ka sting operation kijiye logon se camera hata kar baat kariye .. pata chal jayega ki dangon ke doshi sirf mulayam ya modi nahin hote ... hamare dimaagon men shaitan aaj bhi baitha hua hai wo kabhi kabhi zara si shah milte hi bahar aa jata hai ...

Jitesh Kumar said...

sir ye apka twitter accont hai"@ravishndtv" sir plz

USB said...

प्रवीण की कविता बहुत कुछ गयी. बहुत अच्च्छा सवाल है . मेरा तो जान पहचान नही है धर्म से, जो जानते है उनसे ही ये स्वाल पुच्हूंगा.

nptHeer said...

आप अपने घर सिर्फ चार लोगों को सिर्फ चाय पे invite करते हो तो भी आप को plan करना पड़ेगा :) i mean हथियार बंध दंगों का विश्लेष्ण सिर्फ 2या3 दल-दल से आप नहीं कर सकते(1)
दो जाती या धर्मं विशेष की असुविधाओं की अवगणना हुई है-उसके मूल मानवाधिकारों की भी? (2)
घटना मैं कोई दल विशेष का या धर्मं/जाती विशेष का प्रदान पाया नहीं गया है और घटना सम्पूर्णतः localites ने अंजाम दी है--मगर विशेष नोन्ध्निय बन गई है मृत्यु के बाद वह भी सिर्फ वहां के concerned people के लिए (3)
अब media कूदता है खबरें बटोरने के लिए-तो दल-दल भी कूदेंगे ही ख़बरों का हमसाया बन ने के लिए?(4)
फिर यह चारों मुद्दों को जोड़ जोड़ कर एक चर्चा नाम के दाल-चावल उगाये जातें हैं मुद्दों की जमीन पे (5)
उसमें कायदा/law n order/प्रशाशनिक कार्यवाही etc etc नमक/मसालें डलते हैं
लो चलो "चुनावी खिचड़ी" तैयार :) :) वह भी 5 लोगों के लिए
(1)दल (2) नेता (3)मीडिया (4)क्षेत्र(area) (5)बुद्धिजीवी

अगर मत'दाता' मैं "गैरत" है तो यह बेहूदी खिचड़ी खा ले और चुप रहे तो उनको यह 5 लोग 'democretic' की degree से नवाजेंगे :) और अगर नहीं है तो खुद *खिचड़ी पका ले*

****NOTE****
I AM A VOTER ONLY - so. ...
न हम अपने लिए खाते है न ही देश के लिए-हां 'खाने' के जुगाड़ करते जरुर नज़र भी आते है(नौकरी) या पकडे भी जाते है(दल हीन) :)

sanjaya said...

Dange par raajneeti jari hai aur apka chanel bhi kal se hi covering kar raha aur wo bhi aise jaishe ki dange ki suruat hinduo ne ki aur muslim bhai mare ya bhagaye gaye hain...

Rajeev Ranjan said...


Dharatee kee sulagatee chhatee ke bechain sharare puchhate hain

Yeh kiska lahu hai kaun mara - (2)
Ai rahabar mulko kaum bata
Yeh kiska lahu hai kaun mara

Yeh jalate huye ghar kiske hai, yeh katate huye tan kiske hain
Taksim ke andhe tufan me, lutate huye gulshan kiske hain
Bad bakt kijaye kiski hain, barabad nasheman kiske hain
Kuchh ham bhee sune hamako bhee suna

Ai rahbar mulko kaum bata, yeh kiska lahu hai kaun mara

Kis kam ke hain yeh din dharam, jo sharm kaa daman chak kare
Kis tarah ke hain yeh desh bhagat, jo baste gharo ko kak kare
Yeh ruhe kaisee ruhe hain, jo dharatee ko napak kare
Aankhe toh utha najre toh mila

Ai rahbar mulko kaum bata, yeh kiska lahu hai kaun mara

Jis ram ke nam peh kun bahe, us ram kee ijjat kya hogee
Jis din ke hatho laj lute, us din kee kimat kya hogee
Insan kee iss jillat se pare, shaitan kee jillat kya hogee
Yeh ved hata kuran utha

Ai rahbar mulko kaum bata, yeh kiska lahu hai kaun mara

Shailendra Chauhan said...

मुजफ्फर नगर की ताजा सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए और लापता लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों में बहुत अंतर दिखाई देता है। आधिकारिक तौर पर 43+ लोग मरे हैं और सैकड़ों लापता हैं। पता नहीं कि लापता लोग कौन हैं और कहाँ हैं। भारत एक सार्वभौमिक राष्ट्र है। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं तथा राजनीतिक मान्यताओं वाले लोग रहते हैं। इन की मौजूदगी की वजह से भारत में परस्पर विरोध एवं आंतरिक कलह की संभावना बनी रहती है। इन परिस्थितियों में पुलिस को बिना भेदभाव के सुरक्षा करने के अपेक्षा की जाती है लेकिन भारत में पुलिस बल हमारे समाज का एक बेहद संशय से देखा जाने वाला संगठन है।
हमारे देश में पुलिस और विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं है, और सामान्य रूप से भारतीय समाज की नजर में पुलिस की सकारात्मक छवि नहीं है, अल्पसंख्यक तो विशेष रूप से पुलिस पर अपना विश्वास पूरी तरह खो चुके हैं। दलित भी पुलिस के हाथों प्रताड़ित होते रहे हैं। यह भी एक सच्चाई है कि सामान्य परिस्थितियों में पुलिस के दुर्वव्यहार और इस विभाग के संस्थागत भ्रष्टाचार की वजह से बहुसंख्यकों एंव अल्पसंख्यकों को समान रूप से परेशान होना पड़ता है। साम्प्रदायिक दंगों या फिर दंगे जैसी परिस्थितियों में पुलिस योजनाबद्ध तरीके से जान-बूझकर अल्पसंख्यकों को परेशान करती है। वर्ष 1969 में अहमदाबाद के साम्प्रदायिक दंगों, 1980 के मुरादाबाद दंगों, 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1987 के मेरठ दंगों, 1989 के भागलपुर दंगों, 1992-93 के मुंबई दंगों से लेकर 2002 में गुजरात में हुए जनसंहार से संबंधित कागजातों के सर्वेक्षण से यह स्पष्ट होता है। वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ था। यहां फिर से पुलिस पर सांप्रदायिक दुर्भावना और भेदभाव रवैये का आरोप लगा था।
पुलिस राज्य के पीड़क तंत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। पुलिस का चरित्र सत्ता का ही चरित्र होता है। यह संस्था राज्य द्वारा संचालित राजनीतिक तंत्र से प्रभावित होती है। जब तक पुलिस बल की संरचना में बदलाव कर उनमें विभिन्न समुदायों, विशेष रूप से दलितों एवं अल्संख्यकों को समाहित नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस महकमे को तटस्थ नहीं बनाया जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस बल को सक्षम, प्रभावशाली और भेदभाव रहित कानून का पालक बनाया जा सके।
भारतीय संविधान और तत्कालीन राजनीति का काम नागरिकों को अपने कर्त्तव्य की शिक्षा देना, लोगों से मन से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन अब इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, अपराधी तत्वों को संरक्षण देना, साम्प्रदायिक वैमनष्य बढाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा अराजकता की हो गई है, कानून का राज ख़त्म हो गया है। सभी धर्मों और जातियों के गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि उनका असली शत्रु यह शोषक और आततायी राज है। उसके ये राजनीतिक नुमाइन्दे ही हैं जो वोट और अपने बाहुबल को कायम रखने के लिए लाखों लोगों को बेहिचक कुर्बान कर सकते हैं। इसलिए इनके हथकंडों से बचकर रहने की आवश्यकता है।
कबीर के शब्दों में "हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना । आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना।"

Shailendra Chauhan said...

मुजफ्फर नगर की ताजा सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए और लापता लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों में बहुत अंतर दिखाई देता है। आधिकारिक तौर पर 43+ लोग मरे हैं और सैकड़ों लापता हैं। पता नहीं कि लापता लोग कौन हैं और कहाँ हैं। भारत एक सार्वभौमिक राष्ट्र है। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं तथा राजनीतिक मान्यताओं वाले लोग रहते हैं। इन की मौजूदगी की वजह से भारत में परस्पर विरोध एवं आंतरिक कलह की संभावना बनी रहती है। इन परिस्थितियों में पुलिस को बिना भेदभाव के सुरक्षा करने के अपेक्षा की जाती है लेकिन भारत में पुलिस बल हमारे समाज का एक बेहद संशय से देखा जाने वाला संगठन है।
हमारे देश में पुलिस और विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं है, और सामान्य रूप से भारतीय समाज की नजर में पुलिस की सकारात्मक छवि नहीं है, अल्पसंख्यक तो विशेष रूप से पुलिस पर अपना विश्वास पूरी तरह खो चुके हैं। दलित भी पुलिस के हाथों प्रताड़ित होते रहे हैं। यह भी एक सच्चाई है कि सामान्य परिस्थितियों में पुलिस के दुर्वव्यहार और इस विभाग के संस्थागत भ्रष्टाचार की वजह से बहुसंख्यकों एंव अल्पसंख्यकों को समान रूप से परेशान होना पड़ता है। साम्प्रदायिक दंगों या फिर दंगे जैसी परिस्थितियों में पुलिस योजनाबद्ध तरीके से जान-बूझकर अल्पसंख्यकों को परेशान करती है। वर्ष 1969 में अहमदाबाद के साम्प्रदायिक दंगों, 1980 के मुरादाबाद दंगों, 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1987 के मेरठ दंगों, 1989 के भागलपुर दंगों, 1992-93 के मुंबई दंगों से लेकर 2002 में गुजरात में हुए जनसंहार से संबंधित कागजातों के सर्वेक्षण से यह स्पष्ट होता है। वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ था। यहां फिर से पुलिस पर सांप्रदायिक दुर्भावना और भेदभाव रवैये का आरोप लगा था।
पुलिस राज्य के पीड़क तंत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। पुलिस का चरित्र सत्ता का ही चरित्र होता है। यह संस्था राज्य द्वारा संचालित राजनीतिक तंत्र से प्रभावित होती है। जब तक पुलिस बल की संरचना में बदलाव कर उनमें विभिन्न समुदायों, विशेष रूप से दलितों एवं अल्संख्यकों को समाहित नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस महकमे को तटस्थ नहीं बनाया जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस बल को सक्षम, प्रभावशाली और भेदभाव रहित कानून का पालक बनाया जा सके।
भारतीय संविधान और तत्कालीन राजनीति का काम नागरिकों को अपने कर्त्तव्य की शिक्षा देना, लोगों से मन से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन अब इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, अपराधी तत्वों को संरक्षण देना, साम्प्रदायिक वैमनष्य बढाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा अराजकता की हो गई है, कानून का राज ख़त्म हो गया है। सभी धर्मों और जातियों के गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि उनका असली शत्रु यह शोषक और आततायी राज है। उसके ये राजनीतिक नुमाइन्दे ही हैं जो वोट और अपने बाहुबल को कायम रखने के लिए लाखों लोगों को बेहिचक कुर्बान कर सकते हैं। इसलिए इनके हथकंडों से बचकर रहने की आवश्यकता है।
कबीर के शब्दों में "हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना । आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना।"

Shailendra Chauhan said...

मुजफ्फर नगर की ताजा सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए और लापता लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों में बहुत अंतर दिखाई देता है। आधिकारिक तौर पर 43+ लोग मरे हैं और सैकड़ों लापता हैं। पता नहीं कि लापता लोग कौन हैं और कहाँ हैं। भारत एक सार्वभौमिक राष्ट्र है। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं तथा राजनीतिक मान्यताओं वाले लोग रहते हैं। इन की मौजूदगी की वजह से भारत में परस्पर विरोध एवं आंतरिक कलह की संभावना बनी रहती है। इन परिस्थितियों में पुलिस को बिना भेदभाव के सुरक्षा करने के अपेक्षा की जाती है लेकिन भारत में पुलिस बल हमारे समाज का एक बेहद संशय से देखा जाने वाला संगठन है।
हमारे देश में पुलिस और विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं है, और सामान्य रूप से भारतीय समाज की नजर में पुलिस की सकारात्मक छवि नहीं है, अल्पसंख्यक तो विशेष रूप से पुलिस पर अपना विश्वास पूरी तरह खो चुके हैं। दलित भी पुलिस के हाथों प्रताड़ित होते रहे हैं। यह भी एक सच्चाई है कि सामान्य परिस्थितियों में पुलिस के दुर्वव्यहार और इस विभाग के संस्थागत भ्रष्टाचार की वजह से बहुसंख्यकों एंव अल्पसंख्यकों को समान रूप से परेशान होना पड़ता है। साम्प्रदायिक दंगों या फिर दंगे जैसी परिस्थितियों में पुलिस योजनाबद्ध तरीके से जान-बूझकर अल्पसंख्यकों को परेशान करती है। वर्ष 1969 में अहमदाबाद के साम्प्रदायिक दंगों, 1980 के मुरादाबाद दंगों, 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1987 के मेरठ दंगों, 1989 के भागलपुर दंगों, 1992-93 के मुंबई दंगों से लेकर 2002 में गुजरात में हुए जनसंहार से संबंधित कागजातों के सर्वेक्षण से यह स्पष्ट होता है। वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ था। यहां फिर से पुलिस पर सांप्रदायिक दुर्भावना और भेदभाव रवैये का आरोप लगा था।
पुलिस राज्य के पीड़क तंत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। पुलिस का चरित्र सत्ता का ही चरित्र होता है। यह संस्था राज्य द्वारा संचालित राजनीतिक तंत्र से प्रभावित होती है। जब तक पुलिस बल की संरचना में बदलाव कर उनमें विभिन्न समुदायों, विशेष रूप से दलितों एवं अल्संख्यकों को समाहित नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस महकमे को तटस्थ नहीं बनाया जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस बल को सक्षम, प्रभावशाली और भेदभाव रहित कानून का पालक बनाया जा सके।
भारतीय संविधान और तत्कालीन राजनीति का काम नागरिकों को अपने कर्त्तव्य की शिक्षा देना, लोगों से मन से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन अब इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, अपराधी तत्वों को संरक्षण देना, साम्प्रदायिक वैमनष्य बढाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा अराजकता की हो गई है, कानून का राज ख़त्म हो गया है। सभी धर्मों और जातियों के गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि उनका असली शत्रु यह शोषक और आततायी राज है। उसके ये राजनीतिक नुमाइन्दे ही हैं जो वोट और अपने बाहुबल को कायम रखने के लिए लाखों लोगों को बेहिचक कुर्बान कर सकते हैं। इसलिए इनके हथकंडों से बचकर रहने की आवश्यकता है।
कबीर के शब्दों में "हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना । आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना।"

Shailendra Chauhan said...

मुजफ्फर नगर की ताजा सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए और लापता लोगों के आंकड़ों की तुलना करें तो दोनों में बहुत अंतर दिखाई देता है। आधिकारिक तौर पर 43+ लोग मरे हैं और सैकड़ों लापता हैं। पता नहीं कि लापता लोग कौन हैं और कहाँ हैं। भारत एक सार्वभौमिक राष्ट्र है। दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं तथा राजनीतिक मान्यताओं वाले लोग रहते हैं। इन की मौजूदगी की वजह से भारत में परस्पर विरोध एवं आंतरिक कलह की संभावना बनी रहती है। इन परिस्थितियों में पुलिस को बिना भेदभाव के सुरक्षा करने के अपेक्षा की जाती है लेकिन भारत में पुलिस बल हमारे समाज का एक बेहद संशय से देखा जाने वाला संगठन है।
हमारे देश में पुलिस और विभिन्न समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण रिश्ता नहीं है, और सामान्य रूप से भारतीय समाज की नजर में पुलिस की सकारात्मक छवि नहीं है, अल्पसंख्यक तो विशेष रूप से पुलिस पर अपना विश्वास पूरी तरह खो चुके हैं। दलित भी पुलिस के हाथों प्रताड़ित होते रहे हैं। यह भी एक सच्चाई है कि सामान्य परिस्थितियों में पुलिस के दुर्वव्यहार और इस विभाग के संस्थागत भ्रष्टाचार की वजह से बहुसंख्यकों एंव अल्पसंख्यकों को समान रूप से परेशान होना पड़ता है। साम्प्रदायिक दंगों या फिर दंगे जैसी परिस्थितियों में पुलिस योजनाबद्ध तरीके से जान-बूझकर अल्पसंख्यकों को परेशान करती है। वर्ष 1969 में अहमदाबाद के साम्प्रदायिक दंगों, 1980 के मुरादाबाद दंगों, 1984 के सिख विरोधी दंगों, 1987 के मेरठ दंगों, 1989 के भागलपुर दंगों, 1992-93 के मुंबई दंगों से लेकर 2002 में गुजरात में हुए जनसंहार से संबंधित कागजातों के सर्वेक्षण से यह स्पष्ट होता है। वर्ष 1977 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी में एक भीषण सांप्रदायिक दंगा हुआ था। यहां फिर से पुलिस पर सांप्रदायिक दुर्भावना और भेदभाव रवैये का आरोप लगा था।
पुलिस राज्य के पीड़क तंत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। पुलिस का चरित्र सत्ता का ही चरित्र होता है। यह संस्था राज्य द्वारा संचालित राजनीतिक तंत्र से प्रभावित होती है। जब तक पुलिस बल की संरचना में बदलाव कर उनमें विभिन्न समुदायों, विशेष रूप से दलितों एवं अल्संख्यकों को समाहित नहीं किया जाता है, तब तक पुलिस महकमे को तटस्थ नहीं बनाया जा सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि पुलिस बल को सक्षम, प्रभावशाली और भेदभाव रहित कानून का पालक बनाया जा सके।
भारतीय संविधान और तत्कालीन राजनीति का काम नागरिकों को अपने कर्त्तव्य की शिक्षा देना, लोगों से मन से संकीर्णता निकालना, साम्प्रदायिक भावनाएँ हटाना, परस्पर मेल-मिलाप बढ़ाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता बनाना था लेकिन अब इन्होंने अपना मुख्य कर्त्तव्य अज्ञान फैलाना, संकीर्णता का प्रचार करना, अपराधी तत्वों को संरक्षण देना, साम्प्रदायिक वैमनष्य बढाना, लड़ाई-झगड़े करवाना और भारत की साझी राष्ट्रीयता को नष्ट करना बना लिया है। यही कारण है कि भारतवर्ष की वर्तमान दशा अराजकता की हो गई है, कानून का राज ख़त्म हो गया है। सभी धर्मों और जातियों के गरीब, मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि उनका असली शत्रु यह शोषक और आततायी राज है। उसके ये राजनीतिक नुमाइन्दे ही हैं जो वोट और अपने बाहुबल को कायम रखने के लिए लाखों लोगों को बेहिचक कुर्बान कर सकते हैं। इसलिए इनके हथकंडों से बचकर रहने की आवश्यकता है।
कबीर के शब्दों में "हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना । आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना।"

Paresh Singh said...

अब तक, तो मोदी जी मजबूरी थे, अब जरूरी हो गए हैं