उम्मीदों का शहर- फ़रीदाबाद

 दिल्ली आकर रहने वाले लोग फ़रीदाबाद से वाक़िफ़ हैं । मगर उस फ़रीदाबाद से नहीं जिसे आज़ाद हिन्दुस्तान के सपने जैसा बनाने का प्रयास किया गया था जो कामयाबी की कई मंज़िलों को पार करता हुआ हार गया । श्रीनिवासन जैन हमारे वरिष्ठ सहयोगी हैं । इन्हीं के पिताजी दिवंगत एल सी जैन विभाजन से विस्थापित हुए लोगों से एक शहर बसाने के श्रम से जुड़े थे । बेटे ने अपने पिता के संस्मरण को कलमबद्ध किया है । इस किताब का नाम है CIVIL DISOBEDIENCE - two freedom struggles one life . यह किताब 2010 में आई थी । तब शायद इसी ब्लाग पर थोड़ा सा लिखा था । आज फिर पढ़ा और लिखने का मन किया । हो सके तो the book review literary trust से छपी इस किताब को पढ़ियेगा ।

एल सी जैन छत्तरपुर में पुनर्वास कालोनी को बसाने में लगे थे तभी नेहरू के कहने पर फ़रीदाबाद आकर रह रहे शरणार्थियों लिए काम करने आ गए । उत्तर पश्चिम प्रांत के खुदाई ख़िदमतगारों के गांधी और आज़ादी की लड़ाई से गहरे रिश्ते के कारण नेहरू ने कहा था कि हम अन्य शरणार्थी शिविरों की तुलना में फ़रीदाबाद पर ज़्यादा ध्यान देंगे । इसके लिए फ़रीदाबाद विकास बोर्ड का गठन किया गया जिसके चेयरमैन देशरत्न डा राजेंद्र प्रसाद थे । तब वे राष्ट्रपति नहीं बने थे । इस तरह से शुरू होती है कोई अठारह हज़ार हिन्दू पठानों को बसाने, उन्हें काम देने और उनके बच्चों को तालीम देने की अमर कहानी ।

नेहरू ने इसे इतना महत्व दिया कि 1949 से जुलाई 1952 के बीच हुई बोर्ड की इक्कीस बैठकों में से बीस में हिस्सा लिया । कई तरह की योजनाओं बनीं । अंत में तय हुआ कि पाँच हज़ार स्थायी और पक्के मकान बनाकर देने हैं और यह सब कुछ रिफ्यूजी ही करेंगे । इसी में काम करेंगे और काम के बदले अनाज और मज़दूरी पायेंगे ! शरणार्थियों पेशेवर लोग थे । दुकानदार और व्यापारी थे । राजमिस्त्री आती नहीं थी । यह एक बड़ी चुनौती थी । उन्हें इस संवेदनशीलता के साथ श्रम में लगाया गया कि वे इमारती मज़दूर, बढ़ई, सफ़ेदी करने वाले मज़दूरों में बदलते गए बिना सम्मान से समझौता किये । 


सबसे पहले एक गवर्निंग काउंसिल बना जिसके सदस्यों का चुनाव भारत में आम चुनाव से पहले ही व्यस्क मताधिकार से किया गया । शरणार्थी पठानों में से ही अठारह साल से ऊपर के लड़के लड़कियों आदमी और औरतों ने वोट किया । मिट्टी तेल के कनस्तर को बैलेट बाक्स बनाया गया । कोई फ़्री राशन कमेटी का प्रधान बना तो कोई गृह निर्माण कमेटी का । दो दिनों के भीतर बिना किसी भ्रष्टाचार के पाँच हज़ार लोगों में प्लाट बाँट दिये गए । रूड़की,खड़गपुर और बंगलौर से पाँच इंजीनियर लाये  गए । इन्हें कहा गया कि शरणार्थियों ने कभी मज़दूरी नहीं की है इसलिए ज़रा ध्यान से । पाँच इंजीनियर पाँच हज़ार घर नहीं बना सकते थे और शरणार्थियों को काम बदले रोज़गार देना था इसलिए माडल के तौर पर कुछ घर बनाए गए । लोग सीखते गए और घर तय समय से पहले बन गया । पहली बार मज़दूर बने इन लोगों ने योजना के अनुसार घर बनाकर दिखा दिया । जल्दी बन तो गया मगर वे फिर से बेरोज़गार हो गए । हर परिवार का एक सदस्य अपने बन रहे घर की निगरानी करता था तो उसी परिवार का दूसरा सदस्य किसी और के मकान में मज़दूरी । 

कहानी इतनी दिलचस्प और उम्मीदों से भर देने वाली है कि जी करता है कि सारा डिटेल लिख दूँ पर यह किताब से नाइंसाफ़ी होगी । फ़रीदाबाद के बसने की कहानी के कई पात्र भी है । एक मंत्री है जो अपने रिश्तेदार को जेनरेटर का ठेका देना चाहते थे, एक 
अफ़सर का तंग आकर अमरीका चले जाना , एक अफ़सर का इस सपने को साकार करने वालों को अपमानित करना, नेहरू को उन्हें बुलाकर तथ्यों को सामने रखना, आधी रात को नेहरू का नोट लिखना, फिर उसी नेहरू का एक दिन थक हार जाना । बहुत कुछ एक सपने के जैसा । 

हम इस देश पर बहुत कोफ़्त करते हैं । फ़रीदाबाद की कहानी को पढ़ियेगा । आप एक अच्छा हिन्दुस्तान बनाने घर से निकल पड़ेंगे । 

9 comments:

sachin said...

किताब की भूमिका/विवरण दिलचस्प लगा। यहाँ इस के बारे में विचार शेयर करने के लिए शुक्रिया। यकीं है कि किताब भी उतनी ही रोचक होगी … पर हमेशा लगता है, हमने अपने सिनेमा में, देश की इन छोटी बड़ी ऐतिहासिक मानवीय/सामाजिक घटनाओं के साथ कभी इन्साफ नहीं किया। हर बात पर, दूसरे देशों से तुलना करना मुझे ठीक नहीं लगता, पर इस मामले में यूरोपीय देश ने खूब उत्साह दिखाया है, बहुत काम किया है। आशा है, सिनेमा के बदलते दौर में, हम इतिहास के पन्नों में छुपी इन कहानियों को एक दिन बड़े परदे पर भी देख सकेंगे। तब तक के लिए किताब तो है ही !

ravi kumar said...

रविश भाई
नमस्कार
मैं चाहता हूँ आप प्राइम टाइम में एक दिन बिहार के ज्वलंत मुद्दे (बेरोजगारी और शिक्षा) पर बहस करे।मैं2007 से बिहार से बाहर हूँ उसके बाद से सायद ही कोई पद हो जिसके लिए बिहार में स्थाई नियुक्ति हुई हो पुलिस को छोड़कर ।आस्थाई नियुक्ति और कम वेतन के कारन न जाने कितने युवा आज भी बिहार से पलायन कररहे हैं। मैं आँध्रप्रदेश में रह रहा हूँ पिछले 6 साल से। मैं रेल में रिजर्वेशन क्लर्क हूँ। डेली शाम के समय में जब हावड़ा जाने की गाडी के समय न जाने कितने बिहारी भाई आते हैं ।जो की असंगठित छेत्र में काम करते हैं डेली उनकी संख्या कम से कम हजारों में होती हैं। ये मैं सिर्फ एक दो स्टेशन की बात बता रहा हूँ।पुरे राज्य से न जाने कितने आते जाते हैं। और रेलवे की तो पूछिए मत। पुरे आंध्रा में कम से कम हमलोग 5000 से ज्यादा होंगे। हम लोग हर महीने औसतन 250 रुपये राज्य सरकार को टैक्स देते हैं। अगर हमारी राज्य सरकार हमें रोजगार के अच्छे अवसर देती तो हमलोग यहाँ क्यों आते। अगर आप जानना चाहें और इस विषय पर intrested हैं तो और भी आंकरे उपलब्ध हो जायेगा। आपके जवाब के इंतजार में::::::
पहली बार लिख रहा हूँ ।अगर गलती हो तो सुझाव दे
आपका
रवि शंकर

nptHeer said...

कोई रोचक इतिहास पढ़ा हो ऐसा लगा आपका ब्लॉग पढ़ के तो!:)शुक्रिया अच्छी किताब suggest की-कई जानकारियाँ और कहानियाँ होंगी जीसे वक़्त निगल गया-कुछ को वक़्त भूल गया(sorry but यह सिर्फ दो सियासी गधों की वजह से-एक जिन्नाह एक नेहरु)
माफ़ कीजियेगा-लेकिन जब भी यह 'कम्युनिटी ट्रान्सफर' का इतिहास सामने आ जाता है तो मुझे 'महाकाल का अती रौद्र स्वरुप' धारण कर बेवकूफ राज्यकर्ताओं की जो उस वक़्त थे-सिवाय गांधीजी और सरदार पटेल-सब का कचुम्बर बना देने का मनन करता है। गांधीजी बंगला सरहद पर थे तो आज भी अत्लेस्ट वह जल नहीं रही-क्या पता गांधीजी बनगलिओन को ज्यादा समझदार भी मानते हो?:)i will ask narayan dada:)

gussa to itna aata hai-क्या पता लोग सच मैं खुद मरने और बेकसूरों को मारने को उतारू हो जाते है सिर्फ काल्पनिक सत्ता के लिए?"

मेरे mom के एक फ्रेंड है वह आंटी मुशर्रफ की स्कूल मैं पढ़ते थे वे करांची से भागे थे--इए कई लोग कछ्छ मैं मिल जायेंगे-भगवन की दया है-गुजरात ने उन्हें शेठ ही बना के रखा उल्टा मजदूर भी करोडपति बन गए गुजरात की धरती को छू कर :) thank god! और क्या लिखूं? :)

Rajat Jaggi said...

आप लोगों से एक आपबीती शेयर करना चाहता हू ,

कुछ दिन पहले की बात है में Chandigarh में एक बस स्टॉप पे खड़ा था जो काफी purana लग रहा था और काफी अची condition में भी था तभी वहां एक बूढ़े अंकल से बात शुरू होती है, उनके मुताबिक वह बस-स्टॉप 1957 के आस पास बना था और अभी उसमे jayada फरक नहीं आया, जबकि कई चोर-उछ्क्के उस में लगे लोहे पे हाथ साफ़ करने की सोच चुके है लेकिन वोह इतनी मजबूती से जुए है की उनको बिना किसी मशीन के बिना निकलना नामुमकिन है.

मैंने उनसे पुचा की: " आप कैसे इस बस-स्टॉप के बारे में इतना जानते है"
उनका कहना था की : " बताया की यह बस-स्टॉप को बनाने में मैंने भी हाथ बंटाया था" .
इसपर मैंने कहा की "आप तोह अची फॅमिली से लगते है , बस स्टॉप तोह मजदूर बनाते हैं "
उन्होंने ने हस्ते हुए कहा की " बेटा तब ऐसा बिलकुल नहीं था , तब सब लोग काम में हाथ बंटाते थे , यहाँ तक की इंजिनियर साहब ने खुद हमारे साथ इसको बनाने में मदद की थी. लेकिन आज कल के लोग अपने घर को रंगने में भी मजदूर को न्योता देते है, और मजदूर के नाम पे उन्हें किसी बिहारी का ही चेहरा याद आता है.लेकिन तब हम खुद इसको बनाने के लिए एक एक पत्थ्र्र कई कई किलोमीटर से लेके आये थे "

वैसे रविश जी ,
अगर हम अपने किये हर काम को इतनी शिद्दत से करना शुरू करेदिएन तोह कहीं भी करप्शन या धूल से भरी हुई फाइलो का ढेर नहीं दिखेगा.

Mahendra Singh said...

Ravikumar ji ke dard ko samjha ja sakta hai lekin aap bade bhgyashali hain ke Rail ministry Bihar ke paas 15 saal tak rahi isse karan Bihar ke logon ko tab se lekar aaj tak Railway main jyada service milee. Ghar main nahi milee voh alag baat hai. Bihar main Electricity kee kamee Industrilization ke rah kee mukhya badha asha hai agle 5 salon main yeh problem solve ho jaye.

Faridabad ke basne se sambandhit Jain sahib kee kitab ko jaroor padhoonga.Ravishbhai is ke liye apko sadhuwad.

Kavita Saxena said...

political parties ke badle aisi jankari de to man khush ho jata hai.aage bhi aap se ahi ummid karti hoo.ab to aapka prime time bhi dekhne ki ikchha nahi karti.us din arvindji ke sath IIT me aapko dekh ker achha laga.

ravi kumar said...

महेन्द्र भाई साहब 15 साल तक रेल मंत्री बिहार के रहे इसे कारन बताकर आप उन लाखो छात्रो के मेहनत और लगन को कम नहीं आंकिये। बिहार के छात्र मंत्रालय के वजह से नहीं बल्की अपनी मेहनत और लगन से वहां पहुंचे हैं।

Neetesh said...

रवीश कुमार, NDTV वाला, . बिना किसी जानकारी के झूठ बोलना और वह भी बेशर्मी से, आज पढ़ा की भारत मैं स्वर्ण युग कभी भी नहीं था और कभी होगा भी नहीं....
यदि स्वर्ण युग नहीं था तो मुस्लिम आक्रांता, अंग्रेज, पुर्तगाली, फ़्रांसिसी यहाँ पर kya करने आये थे क्या ? इस दलाल को ये नहीं पता की रोबर्ट क्लाएव सैकडो जहाजों मैं यहाँ से क्या सुअर का मल ले कर गया था या सोना , रत्नदी...जिसका विवरण ब्रिटिश संसद के रिकॉर्ड मैं आज भी है...."

Neetesh said...

रवीश कुमार, NDTV वाला, . बिना किसी जानकारी के झूठ बोलना और वह भी बेशर्मी से, आज पढ़ा की भारत मैं स्वर्ण युग कभी भी नहीं था और कभी होगा भी नहीं....
यदि स्वर्ण युग नहीं था तो मुस्लिम आक्रांता, अंग्रेज, पुर्तगाली, फ़्रांसिसी यहाँ पर kya करने आये थे क्या ? इस दलाल को ये नहीं पता की रोबर्ट क्लाएव सैकडो जहाजों मैं यहाँ से क्या सुअर का मल ले कर गया था या सोना , रत्नदी...जिसका विवरण ब्रिटिश संसद के रिकॉर्ड मैं आज भी है...."