राजनीतिक साज़िश के नाम एक ख़त

मेरी प्यारी राजनीतिक साज़िश,

तुम कब हो जाती हो, किसके ख़िलाफ़ हो जाती हो, किसकी तरफ़ से की जाती हो पता नहीं चलता है । तुम हर घटना के बाद ज़रूर होती हो । तुम्हें कौन अंजाम देता है किसी को मालूम नहीं  । हर कोई तुम्हें अंधेरे में टटोल रहा होता है । देश के तमाम दल राजनीतिक साज़िश का नाम लेते हैं । तुम हो गई तो इतने लोग मारे गए, तुम्हारे तहत यानी राजनीतिक साज़िश के तहत कोई जेल चला जाता है, अरबों ख़रबों का घोटाला हो जाता है । तुम बहुत पोलिटिकल हो गई हो । 

तुम मुज़फ़्फ़रनगर में होती हो तुम गोधरा से गुजरात तक में होती हो तुम सिख दंगों में होती हो । तुम्हारे नाम पर क्या क्या नहीं हुआ जा रहा है ।  राजनीतिक साज़िश, तुम बाहर आओ । दिखा दो दुनिया को कि तुम कैसे होती हो । तुम बीजेपी में होती हो, तुम कांग्रेस में होती हो, तुम सपा में बसपा के ख़िलाफ़ होती हो तो बसपा में सपा के ख़िलाफ़ । तुम मिड डे मील में बच्चों की जान लेती हो तो तुम ढाई लाख करोड़ के घोटाले में मौज करती हो । आख़िर तुम हो कैसे जाती हो । मूल कोच्चन ये है । 

तुम किस लोहे के पर्दे के पीछे हो कि आज तक सब कोई राजनीतिक साज़िश का पर्दाफ़ाश नहीं कर पाया । आयोगों और जजों को जब कुछ पता नहीं चलता उन्हें राजनीतिक साज़िश का पता कैसे चल जाता है । वैसे पता सबको होता है कि तुम अमुक मामले में हो गई हो यानी राजनीतिक साज़िश का नतीजा है फ़लाँ मामला मगर यही पता नहीं चलता कि होने से पहले कहाँ थी और होने के बाद कहाँ चली गई । 

अतएव मेरी प्यारी राजनीतिक साज़िश तुम अब होना बंद कर दो । सब तुम्हारे नाम पर कुर्कम धो रहे हैं । भगवान हो तुम पोलिटिक्स की । ऐसे नाम लेते हैं िक यह पता चलते ही कि तीस लोग राजनीतिक साज़िश से मरे हैं अब कोई तुम्हें पकड़ नहीं पाएगा । लिहाज़ा मुआवज़ा लेकर ही घर जाना पड़ेगा । नेताओं ने तुम्हारे नाम पर बहुत वोट काटा है । इसलिए तुम यानी राजनीतिक साज़िश अब होना बंद कर दो ।

तुम्हारा 
राजनीतिक नवाज़िश,
रवीश कुमार 'एंकर' 

15 comments:

Mulayam d Kolaveri said...

लाजवाब रवीश जी इतना लाजवाब के आपके सभी लेखों में राजनीतिक शाजिश के नाम एक ख़त अव्वल आया.ये भी एक एंगल हो सकता है आपने ने साबित कर दिया.

nptHeer said...

very very very creative :) !!!!
atleast मुझे तो काआआआआफी मज़ा आया आप के 'dear' लोगों पर लिखा ख़त पढ़ने मैं :)
वाह!वाह! क्या आला दर्जे के नवाज़िश करनेवाले पाए है हमारे देश ने नै? :) :-p
kya?:)i mean by The Media :) ok?:)
मैंने तो घर मैं जो जाग रहे है उनको आप का ख़त पढ़ के भी सुना दिया है। :) ravishji its simply creative!
PLEASE TRANSLET IT AND GIVE IT TO ANY ENGLISH PRINT MEDIA :) बेचारों को पता तो चलें की बिना सनसनी के भी news हो सकते है। :)
CONGRETULATION :)

nptHeer said...

ऐसी ही रचनात्मकता (बनाये रखिये तो कैसे कह दूँ ?:)फिर creativity koi office work लगेगा) का आस्वाद करवाते रहिये :) ऐसी शुभ कामना...

****NOTE****
खुदखुशी (suicide) गलत ग़लत और ग़लत ही होता/होती है ok?!:-\ i mean how can you write twitter suicide ?
very wrong :-( take your words back and rejoin there with a fresh mood :)

Sushil Kumar Tomar said...

achha to roj hi likhte hai..ye steek bhi tha !

Aapka
@Khaalibheja

Mayank Chaturvedi said...

sadar charan sparsh ravish ji aaj prime time dhekha har roz ki tarah aap say kafi chota hoon umr mein bh,kad mein bhi ur tazurbein mein bhi lek do din ka prime time dekhne kay baad laga ki muzzafar nagar,nirbhya kaand aur jind ke jind ki samanta ko samhajne ka prashn aapko kahin pareshan kar rha hai,kya mein theek hoon?agar nahi toh tahe dil se chama mangta hoon,laghbhag pichlay 4 say paanch mahinon say aapko follow kar raha hoon aur har din ke dhalte hi aapke liye deewangi aur izzat bhadti hi jati hai;aapki shikhar par hone ke bawajood sadgi aur hamari maatr bhasha kay liye prem...ek naya hausla deta hai;aur aaj ka blog padhkar phir say aapke nashe se prabhavit hokar sone ja rha hoon,waka lajawab aur rochak tha hamesha ki tarah shubh ratri

Saurabh Mishra said...

Sahi kaha aapne ye ek rajnitik saajish naam ka accha burka mil gaya hai sabhi rajnitik partiyon ko....Abhi to ye iska istemaal kewal baade baade kando mein kar rahin hain..kuch samay baad har murder ,rape ,loot adi ke liye bhi karengi... Note- burka shabd ka prayog kewal muhawre ke roop mein kiya gaya hai..isliye kripya mujhe communal na samjha jaye..

प्रवीण पाण्डेय said...

सब के सब हैं कि आपके कंधे पर रख कर बंदूक चला लेते हैं और आप हैं कि आपको पता ही नहीं चलता है।

sanjaya said...

JAB TAK HIND, MUSLIM AUR MEDIA KI NAZAR SE DEHENGE, ISKA PATA NAHI CHLEGA. ISHKE LIYE INSAN KI NAZAR CHAHIYE AUR DURBHAGYA SE INDIA ME INKI SANKHYA NAGANYA HAI.

Amit Jha said...

wah sir ji,
aapko jitna padhta hu utna hi aapka pankha(fan) hota jaa raha hu. daily aake pc on karte hi sabse pehle qasba dekhta hu pure din ke liye dimag ko taro taja kar leta hu aapke vyang se( shayad apne dil ka gubbar aapke blog me padhne ko mil jata hia)...aap jab bhi likhte ho kucch alag aur sanjedgi se socha gya lagta hai..........mera god se kamna hai ki aap humesha yu hi likhte rahe aur hume nye dhang se sochne ka mauka dete rahe...

Thanks
Best regards

Rajneesh Dhakray said...

@nptHeer: Blog के नीचे लिखे सारे comments के साथ साथ आपके लिखे comments भी पढ़ लेता हूँ, blog के साथ यही एक फायदा होता है कि आप लगे हाथ पाठकों की प्रतिक्रिया भी जान लेते हैं।
प्रतिक्रिया भी हर व्यक्ति की अपनी ही होती है depend करता है कि कही गयी बात किस तरह से पढ़ने वाले के मस्तिष्क में संप्रेषित हुयी है और उसने उस बात का क्या अर्थ लगाया है,अर्थ भी व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से ही लगा पता है;
जैसे बाज़ार से आलू लाकर उसका भुरता भी बनाया जा सकता है और दम-आलू भी, निर्भर करता है बनाने वाले की योग्यता पर ।
लेकिन आप अगर आलू वाले को ही ज्ञान देने लगें तो क्या यह ठीक रहेगा, बताइएगा जरूर।
मेरे हिसाब एक लेखक की बात पढ़ी जाए, समझी जाए, सहमति और असहमति दर्ज़ कराई जाये अगर पाठक कुछ अलग अर्थ निकाल पा रही / रहा है तो उसे दर्ज़ कराया जाये ; लेकिन लेखक की विद्द्वता पर या उसके लिखे पर प्रश्नचिन्ह लगाना या उसे "ज्ञान देने" की चेष्टा करना कहाँ तक उचित है?
अगर आप विषय-विशेष की लेखक से जादा समझ रखते हैं तो उसे सामने लाइये ।

nptHeer said...

श्री श्री रजनीशजी (अती मान वाचक :-) इस लिए क्यूँ की सुना है ऐसे एक भगवान भी है स्वयामोत्पन्ना)
मेरे आलू सब्जी etc etc वाले nearly scientists है :-)
They r organic vegitable farmars + stores/NGOs
i mean वे ज्ञान ही देते है in real sense और आलू कम बेचते है -simply टमाटर मांग लिए तो list og questions देते है-red/green?small/big?baby/charry? :-)
कहनेका मतलब 'आलू देनेवाला' ज्ञान देनेवाला भी हो सकता है और लेनेवाला भी तो हो सकता है?
ज्ञान,कथा,प्रसाद,प्रेम.... हमें तो सिखाया गया है भगवन,गुरु,ब्राह्मण,क्षुद्र,वृद्ध या बालक कोई भी दे वह 'तत्त्व' है-स्वयं शुद्ध-ले सकते है
आप मुझे,आलूवाले,लेखक + सभी पाठक सभी को एक तराज़ू से तोल रहे है :-)
ravishji मेरे फेवरिट जरुर है लेकिन मुझे उनके spoon set मैं entry नहीं चाहिए(and i am not reading anyone who sounds good)
batter you read his blog twice... thrice... or more...you will get more vision and even more questions also!i mean it ! and i think that will be a real honour of any thought of any writer anywhere in any language :-) isn't it?
thanks u've read my comments - tension not :-p
oh in ravishji's language--load मत लीजिए pls

सोनम said...

हाहाहा ,,,,, बहुत ही गंभीर चुटकी, हल्के-से।

805 Brothers @ Bangalore said...

Bahut sahi Ravish.. I like your neutral and unbiased anchoring..

Alok

vinod kulasri said...

रवीश जी,
आप का लेख पढकर तो यही महसूस होता है कि राजनितिक साजिश की पैदाइश सभी दलों की राजनैतिक कुंठा का अवसाद मात्र है. जो राजनीति के तराजू के एक पलड़े में धर्म को और दूसरे पलड़े में इन्सान को वोट समझकर अपनी सत्ता के स्वार्थ की खातिर इंसाफ करने का दुस्साहस करता आया है। इनके लिए इन्सान के लहू की कद्र शायद, नाली में बहते गंदे पानी के तुल्य भी नहीं है...

vinod kulasri said...

रवीश जी,
आप का लेख पढकर तो यही महसूस होता है कि राजनितिक साजिश की पैदाइश सभी दलों की राजनैतिक कुंठा का अवसाद मात्र है. जो राजनीति के तराजू के एक पलड़े में धर्म को और दूसरे पलड़े में इन्सान को वोट समझकर अपनी सत्ता के स्वार्थ की खातिर इंसाफ करने का दुस्साहस करता आया है। इनके लिए इन्सान के लहू की कद्र शायद, नाली में बहते गंदे पानी के तुल्य भी नहीं है...