सांप्रदायिकता एक सवर्ण मानसिकता है

सांप्रदायिकता एक मानसिकता है जिसमें रहने वाले लोग दूसरी तरफ़ की कमियों को नाजायज़ मानते हैं और अपनी तरफ़ की कमियों को जायज़ । सांप्रदायिकता हमेशा समूह में होने का अहसास कराती है । सत्ताखोर और रक्तपिपासु लोग राष्ट्रवाद की आड़ में मज़हबी राजनीति करते हैं और दूसरे तरफ़ को तुष्टीकरण कहते हैं । सांप्रदायिकता का घर एक होता है मगर उसके आँगन दो होते हैं । गोतिया युद्ध की तरह एक दूसरे का ख़ून पीते हैं और गिरती बूँदों को गिनते हैं । आपकी मानसिकता साम्प्रदायिक है तो आप उसका बचाव अंत अंत तक करते हैं । इस बचाव का सबसे सशक्त ढाल है दूसरी तरफ़ की ग़लतियाँ, कमियाँ और नाकामियां ।

सांप्रदायिकता एक सवर्ण मानसिकता भी है । सवर्ण समाज और सवर्ण मानसिकता इसकी वाहक होती है । क्योंकि उसका अस्तित्व धर्म से जुड़ा होता है । इसके शिकार होने वाले ज़्यादातर गैर सवर्ण रहे हैं । इसलिए गैर सवर्णों पर ख़ासकर दलितों या पिछड़ों पर वर्चस्व क़ायम करने की यह अचूक रणनीति है । यह धर्म को एक करने की ताक़त के विचार का प्रदर्शन करती है । इसकी बुनियाद सामने वाले के धर्म के नाम पर नहीं बल्कि अपने धर्म के भीतर भी समुदायों को बाँटकर बनाई हुई गोलबंदी पर टिकीहोती है । आप सांप्रदायिक है इसका प्रमाण समाजवादी या कांग्रेस में नहीं है बल्कि यह है कि आपको हिंसा की इन बातें पर कोई अफ़सोस नहीं होता । आप इन कारणों का इस्तमाल कर सांप्रदायिकता का बचाव कर रहे होते हैं । उसने ऐसा किया, उनके लोगों ने किया टाइप । 


जिस राष्ट्रवाद की समझ किसी धर्म पर आधारित हो उसका बेड़ाग़र्क होना तय है । हमने इसका एक प्रमाण देख लिया है इसके बावजूद कुछ लोग राष्ट्रवाद को धर्म से परिभाषित करते हैं । उसमें यानी जो जो हो चुका है और इसमें जो होना चाहता है कोई फ़र्क नहीं है । धर्म के आधार पर राष्ट्रवाद विभाजन की उस प्रक्रिया को अपनी सीमा में जारी रखता है जो १९४७ से शुरू हुआ था । राष्ट्रवाद एक समस्याग्रस्त और कृत्रिम अवधारणा है । इसे दुनिया भर के साहसिक सैनिकों के बलिदान की गाथाओं की चासनी में गढ़ा जाता रहा है । राज्य विस्तार की क्रूर आकांक्षाओं ने इसे रचा और बाद में आर्थिक संसाधनों के लिए होड़ करता हुआ ठोस रूप पाया । अब यही राष्ट्रवाद धंधे के लिए सीमाओं को ख़ारिज कर ग्लोब को गाँव कहता है । हम खुद को ग्लोबल नागरिक ! 

भारत जैसे धर्म बहुल एक देश में राष्ट्रवाद को सिर्फ एक धर्म से चिन्हित करना सवर्णों के वर्चस्व प्राप्ति की लालसा से ज़्यादा कुछ नहीं । यह धार्मिक प्रतिस्पर्धा का चयन करता है और उसके भय के नाम पर बाक़ी धर्मों को अपनी पहचान में शामिल करने के लिए प्रचार तंत्रों का सहारा लेता है । जिन सैनिकों ने बलिदान दिया उन्होंने किसी धार्मिक राष्ट्रवाद के लिए नहीं दिया । उस भारत के लिए दिया जो भारत है न कि जिसका राष्ट्रवाद धार्मिक है । एक चतुर रणनीति के तहत सांप्रदायिक मानसिकता धार्मिक राष्ट्रवाद का सहारा लेती है । यह बहस की हर संभावना को समाप्त कर हिंसक तरीके से अपनी सोच थोपेगी । आप सांप्रदायिक हैं तो आपको ये बातें अच्छी लगेंगी । कोई सांप्रदायिक और धार्मिक राष्ट्रवादी जुनून की बात करे तो उसकी जात पर ध्यान दीजियेगा । ज़्यादातर सवर्ण मिलेंगे । वे सवर्ण जो धार्मिक बहुलता को समाप्त कर अपना खोया हुआ ऐतिहासिक वर्चस्व पाना चाहते हैं जो आज की राजनीति उन्हें नहीं दे पाती है । इस सोच के दायरे में बाक़ी जातियाँ भी मिलेंगी लेकिन नेतृत्व सवर्ण का होगा । ये बाकी जातियाँ  सांप्रदायिकता से पैदा किये जाने वाले राजनीतिक अवसरों में छोटी हिस्सेदारी की ताक में होती हैं । यही प्रवृत्ति आप प्रतिस्पर्धी धार्मिक सांप्रदायिकता में भी देखेंगे । वहाँ भी मरने वाले निचले तबके के लोग होते हैं । ऊपरी तबक़ा उनका रक्षक बनकर नेतृत्व हासिल करने का प्रयास करता है । सेकुलर सत्ता से लाभ प्राप्त करता है और व्यापक समाज को पिछड़ने के लिए छोड़ देता है ।

फिर कहता हूं सांप्रदायिकता एक मानसिकता होती है । उसके पास दूसरे पक्ष की ग़लतियों की जानकारी का अंबार होता है । अपनी कमी नहीं बतायेगा मगर दूसरे की कमी गिनेगा । राजनीति इस मानसिकता का लाभ उठाने के लिए इन ग़लतियों की पृष्ठभूमि तैयार करती है क्योंकि उसे लाभ मिलता है । कई राजनीतिक दलों ने इसका खूब फ़ायदा उठाया । सरकार को ऐसे भेदभाव करने की छूट दी जिससे सांप्रदायिक विमर्श की खुराक कम न हो । विरोधी पक्ष ने भी यही किया । जब तक सरकार और राजनीति धर्म निरपेक्ष नहीं होंगे सांप्रदायिकता ज़िंदा रहेगी । राजनीति चाहती है कि ज़िंदा रहे ताकि इन अंतरों को उभार कर वोट ले सके ।

यह सब हम जानते हैं । मूल बात है कि सांप्रदायिक लोग सामने वाले की मज़हब को बर्दाश्त नहीं करते । ख़ून के प्यासे होते हैं । अपनी कृत्रिम कुंठा को वीरगाथा के रूप में प्रदर्शित करने के लिए एक अभाववादी और पीड़ित मानसिकता का सहारा लेते हैं जिसकी बुनियाद झूठ पर टिकी होती है । कुछ बातें सही भी होती हैं । सवर्ण मानसिकता दूसरे के नागरिक अधिकारों को हमेशा तुष्टीकरण के रूप में देखती है । अपने धर्म के भीतर और दूसरे धर्म के भीतर भी । आप सांप्रदायिक हैं इसीलिए आपको ये बातें जँचती हैं न कि कोई छद्म सेकुलर है इससे । अपने भीतर की सांप्रदायिकता से लड़िये । पहले इस बीमारी को दूर कीजिए फिर सेकुलर नाम की राजनीति के बंदरबाँट के घावों को दूर कर लिया जाएगा । बल्कि ये सेकुलर घाव अपने आप सूख जायेंगे । हर धर्म में सांप्रदायिक तत्व होते हैं । हर धर्म में लोग इनसे लड़ते हैं । जैसे कभी दलितों और पिछड़ों ने मिलकर सांप्रदायिकता या धर्म आधारित राजनीतिक अवसरों को कुंद कर दिया था । अब धार्मिक राष्ट्रवाद की सांप्रदायिक सोच दलित पिछड़ों में से किसी को आगे कर अपनी व्यापकता प्राप्त करने का प्रयास कर रही है । पिछड़ी जाति के नेता इसके ध्वजवाहक हैं और नेतृत्व अभी भी सवर्णों के पास है ।

राष्ट्रवाद किसी धर्म की चादर में लिपट कर महान होता है या उसका अवसान । अगर राष्ट्रवाद अपने दम पर टिकने लायक नहीं है तो धर्म की आड़ में जल्दी ही निर्मल बाबा की दुकान बनने वाला है । बन चुका है । सोचियेगा । आसपास देखते रहियेगा । कौन दबा रहा है राजनीतिक असहमतियों को । सेकुलर होने में सौ समस्याएँ हैं क्योंकि यह एक तकलीफ़ देह और जटिल प्रक्रिया है । क्योंकि आप सेकुलर दलो को देखकर होना चाहते हैं , खुद को देखकर नहीं । सेकुलर दलों की सांप्रदायिकता भी कम खतरनाक नहीं है । तब भी क्या आप यह कहेंगे कि सांप्रदायिक होना गर्व की बात है क्योंकि सेकुलरों ने छला है । तभी कह रहा हूँ ऐसा आप इसलिए नहीं कहते कि सेकुलरों ने ठगा है बल्कि आप सांप्रदायिक हैं । अगर हैं तो !

39 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मानव मानसिकता में बँटने और बाँटने के सूत्र छिपे हैं। शक्ति सामूहिक मिलती है, पहचान व्यक्तिगत। खिंचाव यहीं से प्रारम्भ होता है।

rajeshmeena said...

आपने बहुत अच्छा लिखा हैँ, रवीश कुमार जी। साम्प्रदायिक धार्मिक राष्ट्र कभी तरक्की नही कर सकता। अगर खुद को धार्मिक राष्ट्र घोषित कर देने से विकास होता तो दुनिया के कई देश खुद को धार्मिक राष्ट्र घोषित कर चुके होते।

HOSHIARPUR said...

सांप्रदायिकता kya सवर्ण jatti ke log he phailate hai.raveesh ji aap bhi polotician ke basha bolne lage hain.
सांप्रदायिकता ke koi jatti , dharam , samaj nahi hoto. apni kurse , power panne ki khatir logo kaa khoon bahaya jata hai.
RAVISH JI APKO HAT JATI KE DHARAM KE LOG PASAND KARTE HAIN. UNME सवर्ण BHI HAIN.
APNI MANSIKTA BADALIYE.

Sudhanshu said...

रवीश दा
आप को अरविन्द केजरीवाल के साथ एक मंच पे देख कर बहुत अच्छा लगा।
सच में ये एक सपने के सच होने जैसा था।
अरविन्द के इमानदार प्रयास में उनकी सफलता है न की सीटों के नंबर में और iit against dowry वाली बात बहुत सही लगी।
आप अपने चैनल पे तो उनका साथ नहीं दे सकते, देना भी नहीं चाहिए।
लेकिन एक पत्र तो लिख ही दिजिए।

Sudhanshu said...

रवीश दा
आप को अरविन्द केजरीवाल के साथ एक मंच पे देख कर बहुत अच्छा लगा।
सच में ये एक सपने के सच होने जैसा था।
अरविन्द के इमानदार प्रयास में उनकी सफलता है न की सीटों के नंबर में और iit against dowry वाली बात बहुत सही लगी।
आप अपने चैनल पे तो उनका साथ नहीं दे सकते, देना भी नहीं चाहिए।
लेकिन एक पत्र तो लिख ही दिजिए।

sure376 said...

Sir ji uma bharti kalyan singh narender modi govindacharya asharam bapu baba ramdev sardar patel etc kuch nam hai jo yeh batane ke liye kafi hai ki sampradayikta kisi ek jati ki bapoti nahi hai. Sir dimag ki window kholiye ek hi chashme se har chij na dekhe. aapko malum hona chahiye ki atal ji manmohan singh vp singh nehru sirf swarn jati ka hone ke karan pm nahi bane the. Inme kuch to quality zarur rahi hogo.. Apka ek prashanshak

nptHeer said...

"धर्मो रक्षति रक्षितः । "
यह वेद वाक्य है-जिसका अर्थ है--रक्षा हुआ धर्म ही रक्षण कर सकता है।

"धारयति इति धर्म।"--जो धारण कर सकता है वही धर्म है। यह वेद की धर्म-अधर्म के अंतर को पहचानने की चाबी है(जो वेद को मानते है यह दोनों उनके लिए है)

वेदों के अनुसार 'भोंकना कुत्ते का' और 'दहाड़ना सींह का' *धर्मं* है

वेदों के अनुसार गाय सवर्ण है क्यूंकि शाकाहारी और सदैव अहिंसक है तो बब्बर शेर भी सवर्ण है जो साल मैं सिर्फ एक बार ब्रह्मचर्य तोड़ता है और सिर्फ भूख लगने पर ही शिकार करता है अन्यथा जंगल की रक्षा करता है।

वेद अनुसार 'अनुलोमज' और 'प्रतिलोमाज' व्यवस्था है जो समाज के मूल्यों की रक्षा करता है।(pls refer it bcz these two are long definations)

ravishji अगर आपको एक stage से ही simply संबोधन करना है-तो आप सब को प्रेम सामान रूप से दे सकते हो,संबोधन और व्यवस्था सामान रूप से चाहते हुए भी नहीं दे पाओगे

तो राज्य व्यवस्था एक सु-नियोजित व्यवस्था है जो सामान नहीं रह सकती-हा-जाती भेद कुछ स्वार्थी-वेद भ्रष्ट-सत्ता वांछु मनुष्यों का प्रपंच जरूर कह सकते हो-सभी सवर्णों को आप नहीं घसीट सकते हो तो सभी हरिजन धर्मं विहीन है कहना भी fools haven

रही बात राष्ट्रवाद की-तो राजा धर्म का आश्रय करे या धर्मं को राज्याश्रय मिले यह दोनों राज्यकर्ता पर नित्भर करता है--राजा अशोक बुद्ध धर्मं के आश्रित हुए थे और कश्मीर नरेश ने इस्लाम को राज्याश्रय दिया था,संजाण नरेश ने पारसी धर्मं को राज्याश्रय दिया था गुजरात मैं। यह राजनीती:) पर निर्भर करता है

शायद ravishji आप यह कहना चाहते हो की "साम्प्रदाइक झूनून ही सर्व नाश का मूल है,चाहे वह राष्ट्रवादी मोहरा पहन कर आया हो चाहे वित्तीय या सामाजिक-यह झनून ही छलावा create करता है और अपने विरोधी की गलतियों की आड़ मैं घर बनाता है" i hope मैंने सही समझा है।
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ravishji अगर आप को simply एक स्टेज से

Pictures said...

सांप्रदायिकता एक संकीर्ण
मानसिकता है। नक्सलवाद
की तरह।

pawan kumar yadav said...

आपके के साहसी लेखन को प्रणाम सर सलामी.

pawan kumar yadav said...
This comment has been removed by the author.
pawan kumar yadav said...
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Amit Jha said...

sir, mai aapse agree karta hu ki ye rajniti wale secular v/s communial karte hai, har dharm majhab me kucch galat aur kund soch ke log hote hai lekin un ghatiya logo ke liye har kisi ko galat kehna kaha tak jayaj hai, mai bhi swarn hu, brahman parivar me janm liya esiliye khud ko brahman samajhta hu varna brahmano wale karm to humare purbaj kiya karte the, es aadhunik daur me har koi barabar hai, mai kisi ko bura ya chhota nhi manta, mai manta hu ki swarno ne shosan kiya hia but ab aisa nhi hai, khaskar mai to nhi hu.....sorry mujhe thoda dukh hua to likh diya waise aapki baate sach hai..

ravish kumar said...

जैसे पुरुषवादी मानसिकता सिर्फ पुरुषों में नहीं होती है, औरतों में भी होती है उसी तरह सवर्ण मानसिकता भी एक छतरी लिये हुए हैं । पता नहीं क्यूँ यह समझा गया कि मैं सारे सवर्णों को सांप्रदायिक कह रहा हूँ । ऐसा क्यूँ कहूँगा । सारे लोग होते तो आज सांप्रदायिकता राज कर रही होती । मगर एक प्रवृत्ति के रूप में यह सवर्ण हिन्दूवादी सोच से निकली है जो सब पर अपने विचार थोपने के लिए धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देती है । ठीक यही प्रवृत्ति आप अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता में देखेंगे ।

Vidya visharad mishra said...

asahmat hu aapke vichar se...isme kahi na kahi sanatan kaal se chali aa rahi sawarno k varchasva ka purvagrah dikhta h...aap chooki pichhadi jati se h isliye aapki lekhni b purvagrah se grasit hone se na bach Saki...jis tarah aatankvad ki koi jaati nahi hoti vaise hi saampradayikta ka b koi jaati dharm nahi hota..

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 20/09/2013 को
अमर शहीद मदनलाल ढींगरा जी की १३० वीं जयंती - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः20 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





akhilesh said...

mai yaha kuch samajh nahi pa raha hu kahna kya chahte hai akhir sampradayikta ki paribhasha kya honi chahiye sampradayikta kya hai kya ek pakch dwara rastrawad ki baat karna sampradayikta hai.
mera apse anurodh hai ki kabhi sampradayikta ko paribhashit karte huye kuch likhen kyoki prime time mein koi kuch kahta hai koi kuch kahta hai samajhiye nahi pate ki kiski paribhasha sahi hai

aur ha mai bhi sawarn hu aur hamesa dalito ke soshan ki khilafat karta hu lekin apke is sampradayik soshan wali baat mujhe kuch ajib si lagi

akhilesh said...

mai yaha kuch samajh nahi pa raha hu kahna kya chahte hai akhir sampradayikta ki paribhasha kya honi chahiye sampradayikta kya hai kya ek pakch dwara rastrawad ki baat karna sampradayikta hai.
mera apse anurodh hai ki kabhi sampradayikta ko paribhashit karte huye kuch likhen kyoki prime time mein koi kuch kahta hai koi kuch kahta hai samajhiye nahi pate ki kiski paribhasha sahi hai

aur ha mai bhi sawarn hu aur hamesa dalito ke soshan ki khilafat karta hu lekin apke is sampradayik soshan wali baat mujhe kuch ajib si lagi

gaurav srivastaw said...

vote ka mausam aate hi sampradaiyo ko jaati, kisan ab to state bhi batne pad rahe hai

vinod kulasri said...

सदियों से सांप्रदायिकता का ठीकरा हमेशा स्वर्ण समाज के सिर पर ही फूटता आया हैं। फिर भी हम एक धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र ही है। क्या यह सिद्ध नहीं करता कि सभी स्वर्ण सांप्रदायिक नहीं थे, नहीं हैं, और न ही कभी होंगे ! कुछ मुट्ठी भर कट्टरवादी लोग सभी सम्प्रदायों के भीतर मौजूद होते हैं जो हमेशा आसमान को हिलाने की कोशिश करते रहते है।
आप यकीन कीजिये, आसमान न कभी हिला है और न ही कभी हिलेगा...

vinod kulasri said...

सदियों से सांप्रदायिकता का ठीकरा हमेशा स्वर्ण समाज के सिर पर ही फूटता आया हैं। फिर भी हम एक धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र ही है। क्या यह सिद्ध नहीं करता कि सभी स्वर्ण सांप्रदायिक नहीं थे, नहीं हैं, और न ही कभी होंगे ! कुछ मुट्ठी भर कट्टरवादी लोग सभी सम्प्रदायों के भीतर मौजूद होते हैं जो हमेशा आसमान को हिलाने की कोशिश करते रहते है।
आप यकीन कीजिये, आसमान न कभी हिला है और न ही कभी हिलेगा...

Kaushal Lal said...

आखिर ये स्वर्ण मानसिकता है क्या ? क्या ये मानसिकता एक सार्वभौमिक सत्य है या कोई और शब्द भी इसके पर्याय के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है ?

Kulbhushan Mishra said...

साम्प्रदायिकता धर्म से ही संजीवनी पाती है। धर्म पर एकाधिकार सवर्णों का ही रहा है। तर्कसम्मत है की साम्प्रदायिकता पर भी वही काबिज़ हैं। सही विश्लेषण है।

SARVENDRA VIKRAM SINGH said...

Thank to your parents, teachers, own brain and fingers.. AISA LEKH SHAYAD AAP DUBARA IS VISHAY PAR NA LIKH PAYEN...
SALUTE TO UR THOUGHT PROCESS

EXCELLENT! DEKHTE RAHIYE PRIME TIME, NAMASKAAR!

Rajneesh Dhakray said...

ब्राह्मण अगर सवर्ण-स+वर्ण अर्थात वर्ण सहित- हैं तो दलित क्या अवर्ण- बिना वर्ण के- हैं ???
ये कहीं छिपा नहीं है कि धर्म - तथाकथित व्यवस्था - की ड्राइविंग सीट पर सवर्ण (यार पहले तो मुझे यह शब्द ही समझ नहीं आता, कारण पहली line में ही दिया है) ही विराजमान हैं और धर्म के मुख्य कर्ता धर्ता वही हैं या यूं कहिए कि जहां कहीं धर्म या धार्मिक समारोह होता है वहाँ सवर्णों का जन्मसिद्ध अधिकार समझा जाता है।

भला हो आधुनिकता या पश्चिमी संस्कृति (जिसका ये तथाकथित सवर्ण हमेशा रंडी-रोना रोते रहते हैं और खुद को नैतिकता का स्वयंभू माने बैठे हैं) का कि सवर्ण अब "जाति" के स्वरूप में उतनी मजबूत नहीं रही लेकिन मानसिकता अभी भी वही बनी हुयी है, खतरनाक बात ये है कि यह विष अब अन्य वर्गों में भी फैल रहा है, कहने का मतलब है कि सवर्ण मानसिकता अब एक रूपक बन चुका है ।

खुद को, खुद से की गयी मान्यता को सर्वोपरि और अनंतिम मानना ही सवर्ण मानसिकता है ।

अब सांप्रदायिकता की बात करें तो ideal रूप से सांप्रदायिकता क्या है, मेरे हिसाब से इसका शाब्दिक अर्थ "समप्रदाय से संबन्धित" होना चाहिए अर्थात एक धर्म से संबन्धित, अब अगर देखा जाये तो जो धर्म की व्यापक और किताबी परिभाषा है- मेरे हिसाब से कर्म कांड धर्म की व्यापक परिभाषा में नहीं आते, particular भगवान की पूजा particular तरीके और दिन को करना मैं धर्म नहीं मानता- के अनुसार धर्म या संप्रदाय को मामा जाय तो सांप्रदायिक होना कोई गुनाह नहीं है, अब बात करते हैं धर्म या संप्रदाय के मौजूदा और व्यावहारिक स्वरूप की तब इस स्थिति में सांप्रदायिक और सवर्ण मानसिकता एक दूसरे के पर्याय ही हैं ।
===इतनी बात तो आपके शीर्षक के ऊपर ही काही गयी थी=======

धर्म को समझने के लिए वेदों की तरफ देखने और वहाँ कि सूक्तियों से परिभाषा निकालने के स्थान पर आधुनिक समाज की जरूरतों की ओर देखा जाये तो शायद सबका भला हो,
और बात बात पर वेद वाक्य का सर्टिफिकेट देने वाले उसी सवर्ण मानसिकता के पोषक होते हैं जो गाय को सवर्ण और बकरी को दलित मानते हैं ।


हाँ एक और बात एक ही मंच से सबको एक ही सम्बोधन और एक ही व्यवस्था भी दी जा सकती है अगर लेने वालों में सवर्ण मानसिकता के लोग न बैठे हों।

राष्ट्रवाद या राज़्य व्यवस्था धर्म आधारित नहीं हो सकता, कम से कम आज के भारत के परिप्रेक्ष्य में, तो यह बात कि या तो राज्य धर्म आधारित हो या धर्म राज्य आधारित कहीं से फिट नहीं बैठती।

हाँ ये बात सच है कि सांप्रदायिकता या secularism की परिभाषा के लिए कांग्रेस, सपा, भाजपा या अन्य किसी राजनैतिक दल की तरफ न देखिएगा, इन सब दलों का राष्ट्रवाद वोटों के लिए है और इनकी धार्मिकता भी।





USB said...

एक दम सही है, धर्म एक parallel राजनीति है. जो लोगो को उसके अस्तित्व ख़त्म होने का डर पैदा कर, पुरानी व्यवस्था और ताकत को बनाए रखना चाहती है. धर्म एक राजनीतिक पहचान या group identity है ( जाति या रेस जैसा) उसे ज़्यादा कुछ नही, इसमे लोक कल्यान
और मानवता की बाते एक थर्ड ग्रेड उपन्यास की किताब के उपर एक अच्छा कवर भर ही है. आप अपनी सारी पूर्वाग्रहो को छोड़ कर धर्म का विस्लेश्न करे तो ये आपको मानव सोच का निरोधक लगेगा और विसमता का पोशक. धर्म आज तक जिंदा है तो सिर्फ़ बुरा होने के डर से, या तो अच्छा मिलेने के लालच से. जितनी भी बड़े धर्म है उसमे ईश्वर् कभी भी supreme नही हो पाया नही popular. हा,धर्म का सिस्टम और सिस्टम के वाहक दोनो ने बाजी मार ली और लोग उसे ही भगवान मान बैठे है...Matrix मूवी देखी होगी आपने ये वैसा ही मायाजाल है धर्म का.. आज भी लोग पुराने लिखे algorithm से उसे कायम रखने मे कामयाब है.

pawan kumar yadav said...

सार्थक लेखन के लिए अपने आप को जारी रखें. आप hain के लिए हम कामना करते हैं.

Rajneesh Dhakray said...

@USB:
सही और सटीक!

Amit Jha said...

thanks sir
aapne reply diya, mai samjhta hu aapki bato ko es baat ko accept bhi karta hu.

पूरण खण्डेलवाल said...

रवीश जी ,आपनें शब्दों का अच्छा मायाजाल गूँथ कर साम्प्रदायिकता को स्वर्ण मानसिकता पर थोपनें की कोशिश की लेकिन आपनें स्वर्ण मानसिकता को व्याख्यंकित नहीं किया ! और अगर स्वर्ण मानसिकता से आपका आशय स्वर्ण जातियों से है तो में यही कहूँगा कि जरुर आप पूर्वाग्रहों से ग्रसित है क्योंकि साम्र्दायिकता का किसी जाति से कोई संबध नहीं होता है !

Vineet Kumar Singh said...

एक बहुत ही घटिया प्रस्तुति, क्यूंकी यहाँ लेखक को धर्मनिरपेक्षता एवं सांप्रदायिकता का मूल संदर्भ ही नहीं पता है। सिर्फ और सिर्फ खुद को लेखक प्रदर्शित करने के चक्कर मे अपने गोलमोल बातों की लड़ियों को माले मे पिरोता गया है।

दंगा सभी को दर्द देता है, कहाँ गया था ये लेखक जब प्रतापगढ़ मे दलित मुखर हुए थे एवं दोषी मुस्लिमों का घर जलाया था।

लेखक के पास तथ्य भी नहीं है अपनी बातों को सही साबित करने का। क्यूंकी अगर पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार देखें तो ये मनगढ़ंत कहानी कहीं नहीं टिकती है।

पुलिस की रिपोर्ट एवं दंगों की रिपोर्ट कहती है कि 95% दंगे मुस्लिमों के तरफ से शुरू हुए जिसमे हिन्दू की अधिकांश जातियाँ एक साथ मिल कर खड़े हुए उसके खिलाफ और उत्तर दिया।

लेखक महोदय...आप बातों की लड़ियों को अच्छा पिरो लेते हैं लेकिन कुछ तथ्य भी रखा करिए साथ मे।

Vineet Kumar Singh said...

रविश कुमार जी, आपने ये नहीं बताया की 95% दंगे शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद ही क्यूँ होते हैं, आपने ये भी नहीं बताया की जिस हालिया दंगे पर आपने ये लेख लिखा है उसमे एक मुस्लिम नेता आजम खान का ना सिर्फ नाम आया बल्कि ये दंगा भी मुस्लिमों द्वारा ही शुरू किया हुआ है।

तो ऐसे आप क्या कहना चाहते हैं की और क्या दिखाना चाहते हैं की दंगा जब हो तब मुस्लिम मारते रहे और हिंदुओं को मरते रहना चाहिए। कोई हिन्दू प्रतीकार करे तो आप जैसे बिके हुए पत्रकार आ कर कहेंगे की जी ये तो सवर्ण था और जी ये तो दलित था लेकिन दंगा करने वाले मूल इंसान या धर्म का नाम लेने की कुबत आप जैसे बुके हुए पत्रकारिता के दलालों को नहीं है।

आपकी एनडीटीवी ने कितनी बार दंगे की असलियत को दिखाया है। आपके लिए तो दंगा सिर्फ एक ही हुआ है गुजरात का 2002 का दंगा बाकी के बारे मे कुछ भी सच्चाई कहने की आप जैसों की औकात नहीं है और ना ही आप खुद से कहोगे भी क्यूंकी 10 जनपथ से आप लोगों के लिए आ रहा प्रसाद जो रुक जाएगा।

वैसे 10 जनपथ से याद आया...सोनिया की बीमारी का राज आज तक पता चला की नहीं....क्यूंकी स्वर्ग के द्वार तो आप लोग खोज लेते हो लेकिन क्या सर्वाइकल कैंसर का द्वार नहीं ढूंढ पा रहे हो आप लोग।

Arunesh c dave said...

आप समस्या के केंद्र बिंदु पर चर्चा करते हुये भी कारको को पिनपाइंट नही कर रहे हैं। समय आ चुका है कि संप्रदायिक, धर्मनिरपेक्ष, बहुसंख्यक, अल्पसंखयक इन सभी वर्गो के स्वार्थी एवं हिंसा के प्रेरक तत्वो पर बात की जाये। आप के पास बहुत बड़ा प्लेट्फ़ार्म है आप की बात करोड़ो लोगो तक पहुंचती है। खुल कर बात कीजिये इन तत्वो को नंगा कर दीजिये।

Afzal Sharif said...

Ravish Ji....Yahi Swarn jati mansikta wale log apne vichar kam rakhte hai aur baki nonsence batain jyada karte hai. Swarn jati mansikta wale log sirf apni matlab ki batain sunna pasand karte hai. Yadi aap apne vichar batate ho to wao apko kisi jati, dharam yah political parti se jor dete hai. Is mansikta wale log yeh zaroor kahte ke sampradayikta, aatankwad ka koyee mazhab nahi hota lekin inki kathni aur karni main bahut phark hota hai. Enhi patah hai ke yadi yeh discuss karainge to sabse pahle yahi pakre jayenge.Yeh bahut selfish community hai...Aise log chahte hain aap sirf unhi ki zaban bolain. Yahan blog comment likhne wale bhi kuch log aise hi. Woh apni vichar kam rakhte hain aur personal comment jyada karte hai, kyounki aap unki bhasa nahi bolte hain.

नवनीत नीरव said...

Beating around the bush..

raushan kumar said...

दंगो के लिए आपने सवर्ण लोगो को जीमेदार कहा पर जरा और खुल कर ब्राह्मणो को ही इसका जीमेदार बता देते,इससे आपकी आत्मा को भी शांति मिलती!
आप इससे ज्यादा बकवास नही लिख सकते थे!!

Asif Master said...

भारत का सबसे ज्‍यादा दंमी सेकुलर हिन्‍दी सिनेमा हे, जहाँ एक मुस्‍लिम नट के साथ काम करने के लिये सब नटीयाँ एवररेडी हे मगर जब बात दलित की हो तो?? आजतक एकभी दलित हिरो नहीँ देखा!!!! साहब.. और अजीब बात ये हे की सबसे ज्‍यादा सेकुलर इन्‍हे माना जाता हे... जो एक हिन्‍दु को जगह नहीँ देते

आलोक said...

इ अजीब संयोग है आज दिन में मै सोच रहा था कि आपसे पूछूँगा कि माननीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे का ये कहना कितना उचित है कि किसी मुस्लिम निर्दोष को सजा न हो क्या मुस्लिम लगाना जरुरी था ? कोई ये न समझे की मै हिन्दू हु इसलिए बुरा लग रहा । मुझे बुरा लग रहा इस बात पे की इन नेताओं का intension संदेहपूर्ण है। इससे किसी का भला हुआ हो या नही पे धार्मिक वैमनस्यता जरुर बढ़ जाती है । मैंने ये महसूस किया है की एक दुसरे के प्रति आक्रोश जितना पिछले 10 सालों में( गोधरा दंगो के बाद) बढ़ा शायद ही उससे पहले बढ़ा हो । खुद को मुस्लिम हितैशी बताने की होड़ सी लग गई है इससे सिर्फ यही समझ में आता है की ये मुस्लिम को अलग समझते हैं और उनको इन नेताओं की कृपा की जरुरत है और भी बहुत कुछ है कहने को पर इसपर बाद में बात होगी । आपका ब्लॉग पढ़ा और मैंने सारे कमेंट भी पढ़े और हर कोई कही न कही पूर्वाग्रह से ग्रसित है और धर्म के प्रति possessed भी । कोई इस बात से खुश है कि आपने सवर्णों को बोला और कोई इस बात से दुखी कि आपने सवर्णों को क्यूँ बोला यहाँ बात सवर्ण मानसिकता की थी और मै इस बात से सहमत हू कि ये सांप्रदायिक मानसिकता सवर्णों की देन है म एक कट्टर हिन्दू ब्राह्मण परिवार का सदस्य हूँ मेरी उम्र 26 है और इसमे से 17 साल मै रेलवे कालोनी में रहा हु और वहाँ हिन्दू मुस्लिम सिख जैन कई परिवार के साथ वक़्त गुजरा है और हर त्यौहार हमने साथ साथ celebrate किया है और आज जब बढ़ती दूरियों को देखता हूँ तो दुःख होता है धर्म हमारी जिंदगी का आतंरिक और व्यक्तिगत पक्ष्र होना चाहिए था पर विभिन्न धर्मो के तथाकथित 'ठेकेदारों' (धर्मगुरु कहने लायक नहीऔर मुझे पसंद भी नही) ने और इन नेताओ ने जमकर धर्म का पब्लिकली इस्तेमाल किया । दिल में बहुत आक्रोश है जो लोगो के धर्म के प्रति आस्था को दुसरे धर्म के खिलाफ उन्माद का रूप दे देते है आस्था को हिंसा का रूप दे देते हैं..........और कहने का मन करता हैं

sunil said...



Es post pe bina comment kiye nhi rah saka.
Ye jaante huye bhi ki aapke sawarn prasansako ko thora bura lagega ,aapne ye post likha jo ki bahut hi kabiletarref hai.

Ek comment likhne wale sawarn bhai sahab(Ajit Jha) ne esse accept wo esse bhi achhi baat hain.Kyuki aise mamlo me bahut kam log khud ko ya khud jaati ko dosi samajhte hain.

Bharat Bhushan Bhagat said...

सही, सटीक और साहसिक.