ब्रांड बिहार

मार्च के महीने में बिहार गया था। प्रभात ख़बर पढ़ने का मौका मिला। लगातार। बीच के एक पन्ने में बिहार से बाहर बिहार के कई कामयाब लोगों की कहानी छप रही थी। मुंबई,दिल्ली और दुनिया के तमाम देशों में बिहार के लोगों की कामयाबी के किस्से बटोर कर यह अख़बार राज्य की नई छवि बना रहा था। पंजाब के लोग जब दुनिया के देशों में गए तो उनकी कामयाबी के किस्से खूब छपे। इंडिया टुडे के कवर पर छपा करते थे। पंजाब में जश्न मनाने का कल्चर आया जो बाद में कई समस्याओं का कारण बन गया। लेकिन तब लोगों ने जाना कि पंजाब का मतलब कामयाबी और मस्ती होती है। अब बिहार के भीतर और बाहर ब्रांड बिहार को देखने की ज़रूरत है।

जिस बिहार ने तमाम तरह के फटीचर किस्म के बाहुबलियों को लोकसभा से लेकर विधानसभा तक में सालों तक पाला पोसा, उसने इस बार इस तरह के तमाम आइटम को उखाड़ फेंका हैं। नीतीश के लहर में भी उनकी पार्टी के प्रभुनाथ सिंह हार गए। प्रभुनाथ सिंह पर कई तरह के आरोप थे। साफ है लहर सिर्फ नीतीश की नहीं बल्कि पब्लिक की भी है। लोग चाहते ही नहीं कि किसी भी दल से इस तरह के लोग जीतें। शहाबुद्दीन से लेकर सूरजभान तक की पत्नी हार गई। यह अच्छा हुआ है। जब ये जीतते थे तो लगता था कि बिहार का कुछ नहीं हो सकता। यहां की राजनीति में साधु यादव से लेकर सूरजभान टाइप ही लोग चलेंगे। जात पात से ऊपर उठ कर पब्लिक ने वोट किया है या नहीं इसका अभी कोई प्रमाण नहीं मिला है। लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि सभी जात ने मिलकर नीतीश की कोशिशों का साथ दिया है। लोकसभा के चुनाव में भी विधानसभा की तरह वोटिंग की। यूपी की तरह कांग्रेस को जगह नहीं मिली। कारण साफ है कि लोगों का भरोसा नीतीश में है। (मैंने अपने ब्ल़ॉग पर कई लेखों में नीतीश की आलोचना की है और तारीफ भी,यह इसलिए लिख रहा हूं कि कोई टिप्पणी न कर दे कि अच्छा अब तारीफ कर रहे हैं,पैसा मिल गया क्या)

बिहार बदल चुका है। तीन साल पहले तक जब रेलगाड़ी मुगलसराय से पटना की तरफ बढ़ती थी तो लोग कहते थे कि अब बिहार आने वाला है। बड़ा ही निगेटिव टोन होता था। सही ही होता था। हालात ऐसे थे। अब वही लोग कहते हैं कि पहले से चेंज है। यही मौका है कि बिहार अपनी छवि को ठीक करने के लिए उन कामयाब किस्सों को सामने लाये जिससे एक ब्रांड बने। जैसे सांप्रदायिक दंगों को छोड़ दें तो विकास के मामले में गुजरात ब्रांड है,महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश ब्रांड है। हरियाणा ब्रांड है। बिहार को भी ब्रांड बनाना चाहिए।

यहां की फिज़ा बदल रही है। लालू यादव के राज में हालत खराब हुई तो बड़ी संख्या में छात्र विस्थापित हुए। पहले सवर्ण जाति के लोग दिल्ली भागे,बाद में एजुकेशन का बुरा हाल हुआ तो यह पलायन सभी जाति वर्गों के छात्रों में हुआ। अभी तक जारी है। इसके चलते मां बाप को बहुत कष्ट उठाना प़ड़ा। अचानक पढ़ाई का खर्चा असहनीय हो गया। सकारात्मक किस्सों के ज़रिये देखा जाना चाहिए कि इसमें कोई बदलाव आ रहा है या नहीं। या फिर विकास के पहले चरण में सारी कोशिशें सड़क और कानून व्यवस्था तक ही सीमित हैं। यह भी एक बड़ा काम था। लेकिन शिक्षा और रोज़गार के अवसर पर भी ध्यान जाना चाहिए।

हालात बदलेंगे तो हम अपने संसाधनों का इस्तमाल कर सकेंगे। बिहार की ऊर्वर भूमि उसे पूरे देश के लिए सप्लायर राज्य में बदलने का मौका देती है। उद्योग से बिहार का भला होने में टाइम लगेगा। लेकिन उससे पहले बिहार अनाज, सब्ज़ी,दूध और बकरी पालन के क्षेत्र में सप्लायर राज्य बन सकता है। दूध के क्षेत्र में कुछ प्रगति हो भी रही है। कई लोगों को जानता हूं जिनकी ज़मीन बेकार पड़ी थी। अब वे मछली पालन करने लगे हैं। उनकी कमाई होने लगी है। यह एक बदलाव है जो राज्य के कारण मगर राज्य की शक्ति के दायरे के बाहर हो रहा है। राज्य ने मौका दिया है तो लोग भी अवसर का फायदा उठा रहे हैं।

पूरे राज्य के अलग अलग इलाकों में कामयाबी की छोटी छोटी कहानियां मिल जाएंगी। बिहार से बाहर गए लोग अब कुंठा में न जीयें। बता सकते हैं कि वहां की पब्लिक अब उदंड राजनीति का समर्थन नहीं करती। जिसे भी टिकना है उसे विकास की ही बात करनी होगी। इसलिए बिहार के बाहर के कामयाब लोगों को सामने लाकर प्रभात ख़बर ने अच्छा काम किया है। उम्मीद है पाठकों ने काफी सराहा होगा। अब बिहार के भीतर बन रही कामयाब कहानियों पर नज़र दौड़ानी चाहिए।

बदलाव हो चुका है। चुनाव हारने से पहले रेलवे में जाकर लालू यादव को विकास की ही बात करनी पड़ी। लेकिन पंद्रह साल की गलतियों की सज़ा देकर पब्लिक ने कह दिया है कि विकास पर देरी से मत जागिये। करते रहिए। नीतीश जानते हैं कि बिहार की उम्मीद बढ़ गई है। पहले बिहार के लोग राज्य से कोई उम्मीद नहीं करते थे। अब करने लगे हैं। यह अच्छा है। कार्यसंस्कृति भी इन्हीं उम्मीदों से बदलती है। लोगों का आचार व्यवहार भी बदलता है। हम सब बिहार से विस्थापित हुए हैं। खुद को प्रवासी मज़दूर तो नहीं कहते लेकिन हालत प्रवासियों जैसी है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का अपनी ज़मीन से उज़ड़ना किसी समाज के लिए ठीक नहीं होता। लेकिन यह नहीं होता तो बिहार बदलता भी नहीं। जब लोगों ने दिल्ली आकर देखा कि अवसर और व्यवस्था हो तो वही आदमी कितना कुछ कर सकता है। वापस लौट कर बिहार के लोग अपने राज्य को आलोचक की नज़र से देखने लगे। लालू टाइप के नेताओं को पता ही नहीं चला कि कोई देख रहा है। उम्मीद कीजिए कि बिहार भी एक ब्रांड राज्य बन कर उभरेगा।

59 comments:

Shambhu kumar said...

नीतीश कुमार ने जो नंबर के आधार पर टीचरों की बहाली की है, शायद वो ही बिहार को बदलने के लिए काफी है। जहां आज भी सौ में नब्बे लोग जो बिहार के आलावा कहीं नहीं जाते वी को भी बोलते हैं। मैं भी उसी में शामिल हूं। दिल्ली में दोस्त लोग कहते हैं कि तुम श को स बोलते हो। कैसे एंकरिंग कर पाओगे। तुम्हारा लिंग भी कमजोर है( माफ कीजिएगा, स्त्रीलिंग और पुलिंग की बात कर रहा हूं)हां एक चीज बर जरूर गर्व होता है कि मैथ्स और रिजनिंग और इंग्लिश ग्रामर क्लर्क बनने के चक्कर में बहुत मजबूत हो जाता है। यूपीएसी वहीं लोग कर रहे हैं जिनके बाप दादा काफी कन्सस है। और जो अपने बच्चे को नन रेसिडेंशियल बिहारी बनाने की औकात रखते हैं। भइया अगर बिहार के सरकारी स्कूल में पढ़ाई की है तो बेड़ा गर्क, अगर कॉन्वेंट (जो जिला मुख्यालय में ही उपलब्ध है) में पढ़ाई किए हैं तो फिर क्लर्क का चांस बनता है। अगर पिताजी क्लर्की में हैं और वो भी पटना में तो हो सकता है रवीश सर की तरह शायद कलक्टर न बनकर एनडीटीवी में मेहनत की कमाई खा सकते हैं। वो भी किसी रिश्तेदार के सहारे। क्योंकि अब तो आईआईएमसी के होने का भी कोई मतलब नहीं है। क्योंकि फसल लोग काट रहे हैं। नए लोगों के लिए जगह नहीं है। उपर से कमबख्त मंदी। और अगर जाति से पिछड़े और एस एसटी के हैं तो आपको दिल्ली में नक्सली कहा जाएगा। विषय से थोड़ा भटक गया हूं। अगर बिहार में सफल होना है तो महानगर का तलवा चाटना ही होगा। सांसद विधायक बदलने से कुछ नहीं होता। जरूरी है कि हम बिहारियों का आत्मसम्मान जागे। और राशन तेल से लेकर आंगनबाड़ी तक में लूट खसोट की मंशा रखते हों। रवीश सर एक बार जाकर ठीक से हालात तो जानिए। प्राइमरी स्कूल से लेकर कुकुरमुत्ते की तरह चल रहे कॉलेजों में कैसे लूट मार मची है। कैसे एक एक आदमी सरकारी रोटी के लिए मारामारी कर रहा है। कैसे सरकारी स्कूल से लेकर पब्लिक स्कूल तक में न कुछ कर पाने वाले लोग टीचर बने बैठे हैं। बस कुछ बचा है तो वो है किसानों की बदहाली और उनके मजदूर बनते बच्चे।

Nirmla Kapila said...

बिहार मे जितनी प्रतिभा है शाय्द और किसी्राज्य मे उतनी नहीं है लेकिन नेताओ़ की लू्टखसूट ने बिहार को पीछे कर दिया है आशा की एक किरन जागी है लोग जागरुक हो रहे हैं आशा है हालात बदलेंगे शुभकामनाये़

Suresh Chiplunkar said...

पता नहीं कितना बदला है या बदल रहा है, बहरहाल मेरा व्यक्तिगत अनुभव, बिहार और बिहारियों के बारे में, खासकर बिहार में रेल यात्रा को लेकर बहुत ही खराब रहा है, तथा अन्य कुछ घटनाओं की वजह से मेरे मन में बिहारियों की छवि "अड़ियल", "ठसियल", "न्यूसेंस फ़ैलाने वाले (व्यवस्था बिगाड़ने वाले)", और "गुटबाज" के रूप में है…। "लालू यादव", उनकी शैली और उनका व्यवहार सदैव मुझे बिहार की जीती-जागती प्रतिमा लगते हैं। ज़ाहिर है कि यह व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर है, गलत भी हो सकता है। उप्र-बिहार की 2-4 रेलयात्राओं के बाद तो उधर जाना ही छोड़ दिया है… यदि वाकई बिहार "बदल" रहा है, तो अच्छा ही है।

राजीव जैन Rajeev Jain said...

लोगों ने इस बार सोचसमझकर मतदान किया


असर आपके सामने है


हां बिहार की छवि तेजी से बदल रही है

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

मेरी उम्र के कुछ साल बिहार में भी गुजरे हैं. उनदिनों झारखण्ड नहीं था. याद है मुझे किस तरह रोज रोज की जद्दोजहद होती थी.

...अगर अब बदल रहा है तो ख़ुशी की बात है.

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

रवीश भाई विकास हो रहा है,काम हो रहा है, नीतीशजी आएं हैं, नई रोशनी लाएं...क्योंकि नंगे तन को ढकनें के लिए मिले रुमाल को लोग काफी समझ रहे हैं, बिहार के बेहाल होनें की कहानी को दिल्ली के मुखर्जी नगर,बेर सराय,जेएनयू और क्रिश्चन कॉलोनी में मेरे बिहारी मित्रों से मैं खूब सुन चुका हूं। मेरे बिहारी मित्र भी आए दिन बिहार की बढ़ाई और दिल्ली वालों की बहुत बुराई करते रहे,आईआईएमसी से निकलनें के बाद स्टार न्यूज़ में नौकरी मिली,अब ये बतानें की जरूरत नहीं की वहां बिहारी मित्र नहीं थे,बात सभी के मुंह से वो ही निकलती हैं जो कि मरे घर के करीब बिहार के रहनें वाले रिक्शे वाले की सोच है,जाति,धर्म,जमींनदारी,दबंगई,सामंतवादी सोच,और जिस बेचारे की थोड़ी भी सोच आधुनिक हुई वो उनकी नजरों में साला वामपंथी कहलाया, आज भी मीडिया में काम करनें वाले तथाकथित पत्रकारों जो कि बिहार से होंगें उनकी सोच में सबसे पहला सवाल तुम्हारी जाति से संबधित होता है। अगर आपके नाम के आगे सिंह,शुक्ला,पांडे,तिवारी,मित्रा,झा,त्रिपाठी,द्विवेदी,न लगा हो तो फौरन सवाला आता है,श्रीवास्तव हो। पता नहीं कौन सी दुनिया में जी रहें हैं आज के पढ़े-लिखे बिहारी नौजवान। बात करवा लों कि देश में किसका राज होगा खुद वोट डालनें के समय वही अपनी जातीय सोच को लगा कर गलत उम्मीदवार को जिता कर आ जाएंगें सीविल की तैयारी को, बस फिर बिहार अखबारों और टेलीविजन की खबरों में विकास के माएनों को बता ही देता हैं।

AlbelaKhatri.com said...

itna utpat,
itna shoshan,
itna dohan
va
itna atyachaar sah k bhi
bihar ki pavitra bhoomi ka
samman va swabhiman zinda hai
yah dekh kar
bhrasht neta bahut shaminda hai
AAPKI UMDA POST K LIYE BADHAI
-albela khatri

JC said...

मेरे दृष्टिकोण से बिहार, या संभवतः प्राचीन (बौद्ध) विहार, बैजनाथ शिव का बांया हाथ है, जो उत्तर पूर्व में असंम तक फैला है, और जिनका दांया हाथ दक्षिण-पश्चिम सागर तट तक (मुंबई के समीप जहाँ Elephanta Caves हैं), जहाँ से पंचभूतों के प्रभाव से वर्षा-चक्र आरंभ होता है. जबकि उनका सर उत्तर-पश्चिम में विष्णु के सर के साथ जुडा माना जाता है, जो हिमालय श्रंखला के साथ (उनके मेरुदंड सामान) पश्चिम से पूर्व की ओर लेटे माने जाते हैं...और उनका मूलाधार कामाख्या मंदिर में सती की जननेद्रिय दर्शाया जाता रहा है - ज्ञानी योगियों द्वारा - सांकेतिक भाषा में, 'जब नारायण ने सुदर्शन चक्र से उनके मृत शरीर के ५१ टुकड़े कर दिए थे'...

बिहार का भला तभी होगा जब भारत यानि दुर्गा माता के शेर का भला होगा - जिसके लिए माँ की कृपा आवश्यक होगी :)

उपाध्यायजी(Upadhyayjee) said...

बिहार सचमुच बदल गया. नहीं तो लगता था की लालू और उनके परिवार वाले ही नेता बचे हैं. साधू साहब जिनके सामने बड़े बड़े बाहुबली छोटे नज़र आते थे वो भी नहीं पहुच पाए. इसका असर बिहार से सटे इलाकों में भी पड़ी. बनारस से भी एक बाहुबली थे. वैसे मेरे गाँव आज बगल वाले जेल में बहुत ही दुर्दांत व्यक्ति आज कल है, और वो भी संसद में पहुच गया है. नाम है कामेश्वर बैठा. कैमूर आज पहाडो पर इसका दहसत इतना की किसी का भी नाक कान कटवा लेता था. पलामू से संसद बन गया है. आप शायद बाहुबली का मतलब शायद केवल भूमिहार समझते हैं. मुझे बहुत अच्छा लगता है आपका ब्लॉग पढ़ कर.

Nirala said...

Ravish je aap se sachi tasvir to Shambhu Kumar ne rakhi hai, Mai srif itna kahana chahata hu ki ye to hum pahale se jante they ki Nitish accha kam kar rahi hi...par yadi Nitish kumar us samay CM banate to aap logo ki kya pratikiraya rahati. Jaha tak mujhe yaad hai Jab lalu ne apna pahala sapath grahan as a CM kiya tha to aap logo ne kaha tha "Ye log kya raj-pat chalayenge" us samay lalu ne kaya kiya tha? Aap Midea Wale to jaganath Mishra ke samay intni jagrukta nahi dikhye thi.
Lalu ko virahat me kya mila tha.. Rajya Priwahan Nigam me Jha jee Log, Bihar State CO-Oprative Bank me Aap Log. Teacher me Aap Log, Police me Aap Log, Court me Aap Log. Lalu ko to fhokat me badnam hona hi tha. Is bar dekhat hai Nitish jee ko kendra se kitna paisa milta hai or Kitana Vikash hout hai.

सतीश पंचम said...

बिहार बदल रहा है ये जानकर अच्छा लग रहा है। हो सकता है जमीनी स्तर वास्तविकता कुछ छिछली भी हो लेकिन कुछ न कुछ बदलाव का सकारात्मक दिशा में होना ही अपने आप में बहुत है।

बिहार के लिये शुभकामनाएं।

AK said...

Bihar me NDA ka sasan hai lekin ravisji jab bhi bat karte hai to sirf nitish ka. hamlog khas kar media nitish ko kuch jyada hi value de rahi hai jab ki ek akada ye bhi hai ki bihar me jyadater unhi vibhago me kam hua hai jo bjp ke pas hai. nahi to jal sansadhan aur urja to jdu ke pas hai hi. sampradayikta ke nam par to gali dete hi hai. kam se kam vikas aur gathbandhan nibhane ke nam par to bjp ki tarif ki hi ja sakti hai.
jaha tak yuva ka mudda hai to nda ke samay bhi mantralya me kam yuva log nahi the.

Nilotpal said...

Bihar mein parivartan dikh raha hai aur main aapki baat se sahmat bhi hoon. Kintu desh ki mukhya dhara se judne aur baaki rajyon ke samkaksh aane ke liye Bihar ko agle 12 varshon tak lagatar prativarsh 15% ki gati se pragati karni hogi (woh bhi tab jab desh ke baaki hisse 8-9% prativarsh ki gati se pragati karen). Yeh sirf ek shuruaat matra hai. Yeh ek lamba samay hoga aur jaroori hai ki yeh prayas lagatar jaari rahe. Ummeed ki jaani chahiye ki ye sakaratmak prayas lagatar jaari rahenge.

Aur rahi baat train ke anubhawon aur rikshe walon ki baaten sun kar Bihar ke baare mein rai banane ki to mere khyal se aise logon ki soch per sirf taras khaya jaa sakta hai.

Sachi said...

I want to share a persoanl thing. In Pamplona, Spain, there is a big manufacturing unit of Volswagen and all of sudden in a supermarket, I met some Indians,as I have the similar identity, so we started to talk on many of the issues which has been in this post.

Those technicians were surprised to know that a bihari is teaching here Spanish literature, and at the same time, reserach project is also going on.

This was the time, when separtist politician Raj Thackey was talking of Mi Mumbaikar issue. Almost all were from Maharashtra, and thus they all accepted the fact that our country needs to be developed and these politicians who may develop any state are not at all doing anything as in Vidarbh, the situation is almost similar

स्वप्न मंजूषा शैल said...

बिहार को अच्छा नेतृत्व मिल रहा ये कहना ज्यादा युक्तिसंगत है |बिहार के नसीब में जितने भी नेता आये या तो वो भ्रष्ट थे या जोकर | लालू जी को लें, बिहार में उन्होंने कुछ नहीं किया, लेकिन केंद्र में जाकर साबित कर दिया कि वो कुछ काम के लायक हैं |जितनी प्रतिभा आपको बिहार में मिलेगी उतनी शायद ही किसी अन्य प्रदेश में हों | बिहार का मध्यम वर्ग, उतना refined नहीं 'था', कारण, अपना घर छोड़ कर जाने का प्रचलन नहीं था | और जब तक आप दुनिया नहीं देखते तब तक आपकी सोच, आपका रहन सहन नहीं बदलता | किसी के भी जीवन में बदलाव, किसी और को देख कर ही आता है |अब बिहारी बाहर निकलने लगे हैं, और अपनी प्रतिभा चमकाने लगे हैं | उन्हें मौका दें, इस बदलाव में ढलने का,आप निराश नहीं होंगे |
आभार
स्वप्न मंजूषा

श्यामल सुमन said...

परिवर्तन सार्थक रहा बदली जब सरकार।
सबका गर सहयोग हो सुन्दर बने बिहार।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

संगीता पुरी said...

हाल फिलहाल की बिहार यात्रा में मुझे भी इसके माहौल के बदलने के संकेत दिखे.. इस बार बहुबलियों का चुनाव न जीत पाना जनता की जागरूकता को दिखलाती है।

दर्पण साह "दर्शन" said...

ravish ji niyamit blogger na hone ke karan apka blog sadev nahi pata hoon...

..apke "PAPPU" wale karkryam ke liye apko sadhuvaad...

aur brand bihar....
...ab zayad der tak brandi bihar bana nahi reh sakta...

रंजन said...

कुछ भी इधर उधर की बात कर लो.. जनता को ज्यादा समय मुर्ख नहीं बना पाओगे.. आज नहीं तो कल वो हिसाब मांगेगी.. बहुत सकारात्मक बदलाव दिख रहे है चुनाव में...

"व्क्त बदलने वाला है!!!!"

sushant jha said...

एक बार दिग्विजय सिंह ने कहा था कि जब इंटरनेट का आगमन हुआ तब उन्हे पता चला कि मध्यप्रदेश के कितने लोग बिदेशों में रहते हैं। हलांकि सिर्फ एनआरआई पैदा करना ब्रांड बनने का सबूत नहीं है-लेकिन वो एक बड़ा इंडिकेटर तो है ही। प्रभात खबर कुछ-कुछ उसी तरह का काम कर रहा है।
बिहार ने अभी ब्रांड बनने की पहली सीढ़ी पर ही कदम रखा है। उसकी ऊर्जा, संघर्ष और टेलेंट की धमक तो सुनाई पड़ रही है लेकिन वो दूसरे क्षेत्रों मे द्वेष और ईर्ष्या ज्यादा पैदा कर रही है-सम्मान और विश्वास कम। बिहार का समाज थोक भाव में मजदूर से लेकर इंजिनीयर तक की सप्लाई में लगा हुआ है-उनकी मेधा और श्रम का उपयोग अपने सूबे में होने के हालात नहीं बन पाए हैं। एक बार इंडिया टुडे ने यूपीएससी में बिहारियों की बड़ी तादाद पर लेख छापा था लाट साहब बनने का चस्का। मैं ये नही मानता की बिहारी दिमाग हिंदुस्तान में सबसे तेज दिमाग है-कुछ हालात और समाजिक-आर्थिक स्थितियां हैं जो उन्हे कुछ खास पेशों में धकेल रही है।

दूसरी बात ये कि बिहार जिन ऐतिहासिक समाजिक राजनीतिक परिस्थितियों से गुजरा है उसके प्रभाव को नकारना मुमकिन नहीं। जिन समाजिक -राजनीतिक मुद्दों को दक्षिण भारत में 50 के दशक में सुलझा लिया गया था, बिहार उसे 90 में सुलझा रहा था।
अब मामला थोड़ा सीधा भी हुआ तो हम पिछले साठ सालों में अपनी करनी की वजह से बुनियादी ढ़ांचे में इतना पिछड़ गए कि सिवाय श्रम बेचने के हमारे पास कोई चारा नहीं।

तब हम कैसे इतनी जल्दी ये उम्मीद करें कि हमारे पास आईटी पार्क हो जाएगा या मशरुम की खेती होने लगेगी। हम न तो पर्यटकों को लुभा पा रहे और न ही सारे बच्चों को अपने ही सूबे के यूनिवर्सिटियों में दाखिला दे रहे।

तो ब्रांड बनने के लिए पहले तो हमारे बुनियादी ढांचे-खासकर शिक्षा,स्वास्थ्य, सड़क और बिजली पर इतने निवेश की जरुरत है जो शायद बिहार सरकार के बस की बात नहीं।
केंद्र अगर मदद करे तो कुछ बात बने।

दूसरी बात ये कि मुझे लगता है बिहार एक ऐसा राज्य है जहां बिहारी उप-राष्ट्रीयता की भावना बहुत देर से जगी है-वो दूसरे जगहों पर मिले तिरस्कार, अपमान और जिल्लत से ज्यादा जगी है न कि ये मौलिक है। जहर का ये कड़वा घूंट पटना में बैठे नेताओं को दग्ध करने लगा है-लालू इसके ताजा शिकार हुए हैं, कल को नीतीश भी हो सकते हैं अगर वो राह से भटकते हैं।

तो ब्रांड बिहार के फिर मौजूदा सिंबोल कौन से हैं ? शायद...हमारी जिजीविषा, संघर्ष का माद्दा... धार्मिक सदभाव, संकीर्ण क्षेत्रीय भावना का अभाव... दलितों- महिलाओं का अपेक्षाकृत कम उत्पीड़न...कन्या भ्रूण हत्या में कमी...चुनाव में गुडों का हारना...या फिर परिवारवाद की पराजय...? चलिए अभी तो इतना ही है...आगे शायद आईटी पार्क, मशरुम की खेती और फोर लेन हाईवे भी हो जाए।

JC said...

पूर्वी भारत सदैव अपने कला प्रेमियों के लिए जाना गया है... कौन कहता है बिहार का ब्रांड नहीं है? पूरे मिले-जुले बिहार, उप्र, उडीसा, असम, बंगाल आदि में किसी उपरी मंजिल की सीढ़ी चढ़ते कोने कोने में लाल रंग में बनी कलाकृतियाँ दिखाई देंगी, और खैनी खाने से पहले ताली बजाते लोग :)

कोलकाता में सत्तर के दशक में तो किसी कलाकार ने सड़क पर जाती मेरी पत्नी की साडी का एक हिस्सा मुफ्त में ही रंग दिया था बस में बैठे-बैठे...किन्तु पता बाद में ही चला...:)

और जैसा किसी ने इसका उल्लेख किया, कहते हैं कि 'श' को 'स' कहने का कारण भी यही पान है, जिसका रस मुंह में रहने के कारण खतरा है उसके छलक पड़ने का दूसरे के चेहरे पर यदि 'श' (जैसे 'बुश' में) पान को मुंह में दबाये कोई उसका उच्चारण करे :) हम बचपन में जब सूखी गुड पापडी, जो प्रसाद के तौर पर बनायीं जाती थी, किसी बच्चे के मुंह में होती थी तो उसे 'फूफाजी' बोलने को कहते थे :)

गुस्ताख़ said...

बिहार का बदलना... बहस का मुद्दा हो गया है। सुशांत भाई आपको कई बार कह चुका हूं कि बिहार एक राज्य नहीं बिहार एक फिनोमिना है। घर से सड़क तक बदलाव इसीलिए देखा जा रहा है क्यों कि बिहार शून्य के कगार पर खड़ा था। उससे आगे महज वही अतिरेकी सीन बचा था जिसे आप बिहार के नाम पर फिल्मों में देखा करते हैं। और जैसी बिहार के बारे में-सही या गलत- धारणा सुरेश चिपलूनकर जी ने बना ली थी। उनकी धारणा ेक हद तक सही थी क्योंकि आरा बक्सर से जमुई स्टेशन तक आपको बिहार की ट्रेनों में जो झेलना पड़ता था उसे एरोंगेंस के अलावा कुछ और कहा जा सकता था क्यो?

दरअसल, एक बेहद सामंती अवधारणा है। लेकिन है सच कि जैसा राजा वैसी प्रजा। तो पंद्रह-सतरह साल से जैसे नेता परिदृश्य में काले बादलों की तरह पैबस्त थे, तो वैसा ही व्यवहार लोगों ने करना शुरु कर दिया था। बदतमीजी से पेश आना, ट्रेन में टिकट न कटाने को शान समझना , छेड़ना..। सच है या नहीं।

सारे लोग ऐसे नही थे, लेकिन अगर किसी सूबे में आप जाएं और ऐसा वाकया पेश आए तो ैसा ही समझेंगें और ऐसी ही धारणा बनेगी ना।

बहरहाल, बिहार के ब्रांड बनने के चरम आशावाद से पहले यहां के लोगों की मानसिकता को सिरे से बदलना होगा। जिस गणित और रिजनिंग के दम पर यहां के छात्र कूद रहे है, वह भी अब आउटडेटेड हो गया है। ताजा दौर में गुजरात इस तरफ ज्यादा ध्यान दे रहा है। पढाई की क्वॉलिटी के मामले में बिहार अब भी पुरातन है। यह मानिए।

चुनाव के नतीजे अभी तो बानगी भर हैं। और ऐसा भी नही कि प्रभुनाथ सिंह के हारते ही जद-यू अपराधियों से मुक्त हो गई हो। यह ट्रेंड आगे भी जारी रहा..तब सकारात्मक मानेंगे। अभी तो जाति-पाति के बंधन ढीले पड़ गए, या बिहार सुधर गया यह कहना बेहद जल्दबाजी होगी। क्या सचिवालय तीन बजे आने वाले और सीधे पान खाने जाने वाले सरकारी बाबुओं की आदत बदल गई हैं?

sushant jha said...

मंजीत, आपकी कई बातों से सहमति है। लेकिन मुझे नहीं लगता कि मैंने कहीं भी बिहार के बारे में चरम आशावाद दिखाया है और न हीं ये रवीशजी पोस्ट में है। हां अगर ट्रेन में किसी के साथ बुरा अनुभव होता है तो ये घटना सिर्फ बिहार का सच नहीं...हां...मात्रा में अंतर हो सकता है। लेकिन सिर्फ इसी घटना को आधार बनाकर चिपलूनकरजी को एक औसत बिहीर अडियल और ठसियल लगता है तो फिर हमें राज ठाकरे की व्याख्या करनी पड़ेगी। लेकिन हम ऐसा नहीं करेंगे-क्योंकि हम जानते हैं कि राज जैसे आदमी सड़ी हुई व्यवस्था के बाईप्रोडक्ट हैं-जिस व्यवस्था ने देश में बड़ी असामनता पैदा की है, भ्रष्टाचार बढ़ाया है और जाति-धर्म-क्षेत्र की सियासत को बढ़ावा दिया है।
रही बात पान खाकर सचिवालय आने की तो...ये एक प्रशासनिक सुचारुपन का सवाल है और इसके लिए कड़े मानदंडों की जरुरत है।

Sundip Kumar Singh said...

बिहार की राजीनीति में बाहुबलियों के लम्बे समय तक काबिज रहने के पीछे एक कारण नक्सलियों का भय भी था. यह भय आज भी इसी तरह काबिज है. ये बाहुबली नेता अपने इलाके में अपना बर्चाश्व बनाये रखने के लिए नक्सलवाद जैसी शक्तियों को पनपने नहीं देते थे और इस कारण कई इलाकों में लोग जाति-धर्म से ऊपर उठकर इन बाहुबलियों को जीताते थे. देश के कई इलाकों में नक्सली इतने ज्यादा पनप गए हैं कि उनकी अपनी समानांतर सरकारें चल रही हैं. अगर बिहार में सरकार ने इसपर ध्यान नहीं दिया और नक्सली नए इलाकों में बढ़ने लगें तो लोग फिर इस काम के लिए बाहुबलियों की ओर देखने लगेंगे...ध्यान रखना होगा सरकार को इस ओर...वरना फिर पुराना समय लौट सकता है..

sharad said...

रवीश जी, बिहार की राजनीतिक ज़मीन बड़ी भोथरी है...बाहुबली इन चुनावों में बिहार और यू पी दोनों जगह हारे..हालाँकि इन दोनों राज्यों की वर्तमान स्तिथियों में ज़मीन आसमान का अंतर है...नीतिश के सुशासन पर कुछ नहीं कह सकता लेकिन होम स्टेट है इसलिए यू पी को लुटता पिटता लगातार देख रहा हूँ..सवाल यही है कि मत दाता अगर इतना समझदार है तो वो पिछले दो तीन दशकों से ऐसे लोगों को क्यों लोकसभाओं में भेजता रहा है..क्या मान लिया जाये कि जातीय समीकरणों का असर अब ई वी एम मशीनों में रजिस्टर नहीं होगा? रॉबिनहुड कहे जाने वाले ये सब छंटे हुए बदमाश अब जेलों में नज़र आएंगे, संसद के बाहर बाईट देते नहीं...राहुल गाँधी और नितीश कुमार के बीच प्रेम की पेंगे क्या एक फिर आगे बढेंगी? इन्ही सवालों में इन दोनों राज्यों की तकदीर क़ैद है...

JC said...

ज्ञानी कह गए, "परिवर्तन प्रकृति का नियम है." उन्होंने यह नहीं बताया कि परिवर्तन पत्रकारों को अच्छा लगेगा, या मूर्तिकारों, इत्यादि-इत्यादि को. या वो परिवर्तन कौन लायेगा मायावती कि नीतिश...किन्तु काल के साथ परिवर्तन होगा ही...शिशु समय के साथ बड़ा हो आदमी/ औरत में परिवर्तित होगा ही...

अंग्रेज़ कह गए, (जिसका हिंदी में अनुवाद लगभग होगा), "एक आदमी का भोजन दूसरे का विष होता है." और भारत में योगी कह गए कि 'भोजन' ही मानव जाति के लिए विष का काम करता है, किन्तु सब गलत काम का कारण अधूरा ज्ञान (अज्ञान) है - उन्होंने सिद्धि प्राप्ति पर जोर दिया...जिसके लिए आज समय की कमी है :)

हमारी अनपढ़ माँ भी एक कहावत दुहराती थी, जिसका सत्व हिंदी में है, "सब घोडे में बैठे हैं तो मैं छत पर ही चढ़ जाऊं." :) यानि जैसे एक स्थान से गंतव्य तक जाने के लिए सही साधन आवश्यक है वैसे ही 'विकास' भी चौतरफा होना आवश्यक है..."सर्वे सुखिना भवन्तु, सर्वे सन्तु
निरामया..."

sudo.inttelecual said...

राज ठाकरे मुंबई में बिहारी को पिटता है तो वो जय महराष्ट्र है
सुरेश जी को तो किसी ने नहीं पीटा
मुंबई में लोकल ट्रेन का ज्यादा भैलू है क्यों की सबको कम में टाइम पे पहुचना है
बिहार में एक्सप्रेस ट्रेन जिसमे सुरेश जी जैसे एलिट बैठे थे उसे जाने के लिए बिहार की जो भी लोकल ट्रेन है उसे रोक दिया जाता है . क्योकि बिहार में ऑफिस टाइम पे पहुचना जरूरी नहीं है
रवीश जी यही बिहार है
अपने एक बिहार के बारे में कुछ अच्छा लिखना चाहा तो सबको मिर्ची लगने लगी
अंग्रेजो का मुंबई अब मराठियों का सिर्फ हो गया ?

kumar Dheeraj said...

विहार बदल रहा है जी, अच्छी खबर आपने सुनायी है । विहार में बदलाव के बयार अगर चल पड़े है तो उसमें नीतीश बाबू का योगदान सबसे अधिक है । लेकिन अगर १५ साल से पिछड़ा हुआ था तो उसमें उन लोगो का कम योगदान नही था जो शहर आकर खुद मलाई खाने लगे और बेचारे विहार को अकेले अपने लिए छोड़ दिया । आज अगर लोग विकास की बात विहार में कर रहे है तो विकास हो रहा है लेकिन जब नही हो रहा था तो कौन आवाज लगा रहे थे कि विकास की बात होनी चाहिए । न ही हमने किया है और न ही आपने किया है जो टेलीविजन स्कीन पर अपना चेहरा दिखलाते रहते है । विकास ने गति पकड़ी है तो नीतीश की जय हो अगर नही थी तो जिम्मेदार हम सभी है । प्रवासी कहलाने का शौक खासकर मुझे नही है धन्यवाद

कुमार आलोक said...

बिहार बदल रहा है ... लालू तो पूरी तरह रुट आउट हो गये ..अब भला बिहार को तो जबरन बदलाव की राह पर लाने का काम तो मीडिया ही कर सकता है । क्या बदला है उसका आंकडा भी आपको पेश करना चाहिये था ? पहले जन प्रतिनिधियों की ही बात करें सारे विधानसभा हल्के के प्रतिनिधीयों के विकास का लेखा जोखा लिजीये ..लूट मची है योजनाओं के क्रियान्वयन पर । अफसरशाही का आलम ये है कि मजलूमों की आवाज दबकर रह गयी है । जनता दरबार का नाटक दिखाकर पब्लिक में कन्फ्यूशन फैला कर रख दि.या गया है । जनता दरबार के फरियादियों से मिलीये और उनसे पूछिये कि क्या हुआ आपकी समस्याओं के निराकरण का ..९० फीसदी लोग कहेंगे जूते घिस गये पर हुआ कुछ नही । आरा के डीएम ने कह दिया कि मारीशस के प्रथम प्रधानमंत्री का जन्मस्थान इसी जिले में है और वो कुर्मी जाति से ताल्लुक रखते थे । बस इसके लिये उन्हें बतौर इनाम दिया गया ....पटना के जिलाधिकारी का पद तुरंत उन्हें प्रदान करा दिया गया । रह गयी आम चुनाव की बात ...प्रभुनाथ हार गये तो जीते कौन उमाशंकर सिंह ..खूंखार जीतेन्द्र स्वामी के पिता ...जदयू के जहानाबाद के सांसद कौन है ? पशुपालन घोटाले के एक प्रमुख आरोपी ..,.शिवहर से राजद छोडकर तुरंत एनडीए की सदस्यता लेकर रातों रात एमपी बनी रमा देवी कौन है ? दल बदल का रिकार्ड बनानेवाले मुजफ्फरपुर के सांसद कैप्टन निषाद से बदलाव की कौन सी उम्मीद लगाये बैठे है ? मुन्ना शुक्ला वैशाली से जीतते जीतते रह गये ..भला हो कांग्रेसी उम्मीदवार का जो रघुवंश बाबू की प्रतिष्ठा बचा गया । पिछले आम चुनावों के यूपीए के गठबंधन पर नजर डालिये ..कांग्रेस , राजद , लोजपा और वामपंथी पार्टियों के मतों को मिला दिजीये ।सन २००९ के चुनावों के परिणाम नीतिश जी का बैंड बजा देंगे । मेरे कहने का ये कतइ मकसद नही कि मैं लालू या पासवान का समर्थन कर रहा हूं दोनों अर्श से फर्श पर आ गये ..और ये दोनों के दूरगामी भविष्य की बेहतरी के लिये बढिया है ...लेकिन रातों रात नीतिश को आपने विकास का अवतार बना दिया गले नही उतरा ।

नवीन कुमार 'रणवीर' said...

निलोत्पलजी, बात रिक्शेवालों की सुनकर राय बनानें की नहीं है,मेरे कमेंट को पूरा पढ़िए पहले, उसमें मैनें लिखा है कि वही सोच हमारे-तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लोगों की भी है,मैनें जिन जगहों के अपनें अनुभवों का जिक्र किया है, उसमें आपको जरा भी शंका रहेगी की वहा रहनें वाले लोग जरा कम पढ़े-लिखे होंग? राय मैं अपने मन से नहीं बना रहा हूं, मैनें जिंदगी में अपनें "अनुभवों के अनुभव" से सीखा है,जितनें बिहार के लोग बिहार के लिए दूसरे राज्यों में आकर लड़ना जानतें है उतना वहां कि सरकार,प्रशासन,सामंतवादी सोच,और दबंगई के खिलाफ नहीं लड़ सकते, जिससे कि आपके और मेरे जैसे लोगों को यहां बहस करनें की जरूरत न पड़े,और रही बात बिहारी मित्रों के साथ मेरे अनुभवों की तो आप मेरे ब्लॉग पर 'आईआईएमसी का पूर्व-छात्र मिलन समारोह' पोस्ट पढ़ें। जिसके बारे में आप जानते हैं उसके बारे में ही कहते हैं,जातिवाद का जो दंश बिहार को खा गया उस पर परदा ड़ालकर आप बिहार के बाहर आकर बिहारियों के हित की बात करते हैं...।

hamarijamin said...

Bihar pratibha ka brand to pahale se hai,vikas ke sabhi paimane pa khara utar sake--yeh sabhi logo ki chah hai.

hamarijamin said...

Naya Bihar,Nitish kumar ---sarthak ho sake to Prabhu kripa hogi!nitishji janadesh ko vikash ke vishwas se bhar dein to yeh jantantra ka samman hoga.

dharmendra said...

kya hamlog castism se bahar nikal chuke hain. agar aaj singh, jha, sukla, dubey chaubey nitish ki tarif kar rahey hai to iska matlab yeh nahi ki aaj nitish unki god me khel rahe hain. yeh tarif us din bhi jari rahegi jis din nitish(jo bihar me modi ko nahi gushne ki baat karte hai aur chunav ke baad punjab me gale milte hain)navin patnayak ki tarah alag ho jayenge. aaj yahi chaubey dubey navin ko gali de rahen hain. kya nitish ko ye gaali nahi denge. ravish bhaiya aap bhi abhijatya group ke patrakar hain, kya aapko lagta ke mandal ke baad hi desh aur bihar me castism ki rajniti shuru hui. kya hamara desh lalu region me khand khand hua. kya aaj hamare samaj me catism ki jo zahar hai woh kewal in lalu ke region me phaila hai. kisi brahman ko kuch meter ki duri par dekhkar ek dalit jameen par so jata tha wo castism nahi tha. kya satta ki malai aap log hi khawoge. agar jagnath mishra ne biskoman bhavan me kewal maithli brahmno ko rakha wo castism nahi tha. aap jaise baudhik aadmi bhi cast ki rajniti ko itni jaldi nakar raha hai. bhaiya apne dil se puchiye ki aaj tak ish congress, sangh aur aapke left ne kitne backward aur dalit ko aage badhaya hai. ander me jahar to bahut hai lekin uska kya faida, aakhir hasua to apne taraf hi to khichta hai.

sushant jha said...

बिहार पर शुरु हुआ हर विमर्श अंतत:जातीय विमर्श में अपनी मुक्ति खोजता है। बिहार के पिछड़ेपन के लिए जाति प्रेरित(या जातिग्रस्त?)राजनीति का अहम रोल है ये बात मानने में शायद ही किसी को हर्ज हो-लेकिन यहां का जातिवाद इसलिए इतना वीभत्स दीखता है कि इस पर आर्थिक विकास की चाशनी नहीं लगी है। जरा, टीवी स्क्रीन पर नजर दौड़ाईये और देखिए कि शाइनिंग पंजाब किन जातीय अतर्विरोधों से से पिछले कई दिनों से झुलस रहा है। अतीत के भूत हमारा पीछा इतनी जल्दी नहीं छोड़नेवाले...आखिर हम सिंहों, झाओं और मिश्राओं के इतनी जल्दी कैसे भूल सकते हैं। लेकिन हमें इन सब चीजों से आगे बढ़ना होगा और कुछ लोग आगे बढ़े भी हैं। आज बिहार के गांवो में पचास साल पहले जैसा तनाव नहीं दिखता। ये बिहार जैसे ठहरे हुए सूबे के लिए बड़ी बात है।

दूसरी बात ये कि बिहार में जातिवाद खत्म हो गया ये कहना बेवकूफी है, लेकिन उसका स्वरुप चेंज हो रहा है। समाजिक न्याय सैद्धांतिक रुप से लागू हो गया है-उसे जमीन पर उतरना बाकी है। दूसरों को दबाने की बात लोग ‘मजबूरन’ नहीं सोच रहे लेकिन जातीय तिकड़म और समीकरण इतनी जल्दी नहीं जानेवाले। जाति जुबान पर भले ही कम हो गया हो लेकिन वो दिलो-दिमाग में अभी भी जड़ जमाए हुए है। और इसको कमजोर करने के लिए हमें उन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा जो साक्षरता, औद्यैगिक विकास और आधुनिक सोच से आती है।

लेकिन जब हम जाति जैसे मसलों पर सोंचते हैं तो क्या हम जेनरलाईज्ड नहीं हो जाते ? हम अक्सर अतीत को अपने दिमाग में रखकर नहीं सोचतें...? मजे की बात ये कि हम ऐसा करते वक्त सिर्फ संघर्षों और टकराव के बिंदु पर ही अटक जाते हैं जबकि समाज में हर दिन कई वजहों से, कई बारीक बदलाव आ रहा हैं..जो हमारे विश्लेषण में जगह नहीं पाता। हम तकनीक, संचार, राजनीति, साक्षरता,(खासकर महिला साक्षरता) जैसी चीजों से हो रहे बदलाव को ध्यान में नहीं रखते और सोचते हैं कि बिहार वैसा ही है जैसे 80 के दशक में मिश्राजी के राज में या उसके बाद लालूजी के वक्त था। हमारे चिंतन में समाजिक भाईचारे और मिलन के वे छोटे-छोटे एहसास नदारत होतें हैं जो कई दफा समान आर्थिक स्थिति, साक्षरता और दूसरे हालातों से पैदा होते हैं।

उपर्युक्त बातों का मतलब बिहार का गौरवगान नहीं न हीं किसी ’स्वर्णयुग’ की नॉस्टेल्जिया है। मतलब सिर्फ इतना ही है कि मामला अब अतीत की आलोचना से आगे बढ़ चुका है।

शिशिर उइके (वनमानुष) said...

बिहार के बारे में ज्यादा नहीं जानता...हालांकि समाचारों में बिहार किसी न किसी कारण से छाया ही रहता है..तब भी नहीं जानता...मेरी एक दोस्त हैं..बिहार की हैं..उनसे पूछता हूँ तो वो भी चुप्पी साध जाती हैं...शायद वो खुद भी बिहार को ठीक तरह से नहीं जानती... आपके ब्लौग और यहाँ प्रकाशित टिप्पणियों से बिहार के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला...इसी तरह लिखते रहिये और हम सभी का ज्ञानवर्धन करते रहिये.

गुस्ताख़ said...

सुशांत जी, बिहार ही नहीं देश में हर विमर्श अंततः जाति-विमर्श पर टिक जाता है। संसद में महिला आरक्षण विधेयक ही लीजिए। जाति के नाम पर ही तो लटक गया है। दूसरी बात, बिहार और मीडिया-जहां बिहारियों की तादाद रेखांकित किए जाने योग्य है- अब कुमार-युग में जी रहा है। बिहार में नीतिश कुमार है एनडीटीवी में रवीश कुमार। कुमार उपनाम से जाति का पता नहीं चलता। लेकिन क्या इससे भी आगे यह बात नहीं है कि नीतिश कुमार का वोट बैंक भी एक खास जाति के लोगो में तगड़ा है। और हर चुनाव जाति के आधार और समीकरणों को ध्यान में रखकर लड़ा जाता है।

लालू युग में जातिवाद कम होने की बजाय बढा ही। और ऐसे जातिवाद फतवा जारी करने और अरण्य रोदन से कम भी नहीं होगा। देखता हूं कि जातिवाद का ठीकरा बिहार के सर पर फोड़कर लोग बाग-बाग हो रहे हैं। लेकिन मेरा मानना है कि जाति के चक्कर में दिल्ली महाराष्ट्र, दक्षिण के राज्य, हरियाणा, पंजाब-जैसा कि आपने उल्लेख किया है सचखंड ौर सच्चा सौदा के संदर्भ में- यूपी, उड़ीसा, हर राज्य घनचक्कर हैं। कहीं कम कही ज्यादा।

जाति के कंपार्टमेंट को कम करना है तो पहले आरक्षण और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसी नीतियों से बाहर निकलना होगा। और जाति ही क्यों संप्रदायवाद पर लोग क्यों चुप्पी साध जाते हैं। विकास के ढूहों पर खड़े लोग अपने खूनी पंजे पीछे क्यों छुपा लेते हैं? जब तक देश के सभी नागरिकों को एक समान, बिना उनके उपनामों और मज़हब के, कानून की नजर में एक नहीं माना जाएगा। जाति-फाति मिटाने की बात करना ढोंग है।

वैसे, खुद को जातितोड़क मानने वाले मीडिया के लोग एक दूसरी तरह के जातिवाद से ग्रस्त हैं। लेकिन वह जाति कास्ट की नहीं है, लेकिन है खानदानी। फिल्मों की ही तरह पिता का काम मीडिया में आगे बढ़ाने के काम में आता है। है या नहीं। आईएएस-पुत्रों और बड़े पत्रकार-पुत्रों के लॉन्चिंग पर कुछ कहेंगे? बिना जैक के नौकरी खोजने वाले किसी भी फ्रैशर के फ्रस्टेशन में इसका जवाब मिल सकता है। रवीशजी, ये भी जातिवाद ही है। कुछ वैसा ही कि पिता के काम-धंधे से बेटे की जाति तय कर दी जाए। उत्तर-वैदिक काल में शायद जाति का निर्धारण ऐसे ही हुआ था। है न?

RAJ said...

बधाई हो....आज पहली बार रविश जी ने कोई अछा ब्लॉग लिखा है बिना किसी लाग लपेट .....

बिहार के विकास से ही देश का भला होना है ये तो तय है पर वहाँ के नेता ज़रा देर से ये बात समझ पाए...

नीतीश जी को शुभकामनाएँ...........

sushant jha said...

गुस्ताख उर्फ मंजीतजी...दूसरे राज्यों में व्याप्त जातिवाद की बात मैं मानता हूं लेकिन मैंने ज्यादा उस पर चर्चा इसलिए नहीं की क्योंकि मैं दूसरे राज्यों के बहाने बिहार के जातिवाद को जस्टिफाई करने जैसा कुछ काम नहीं करना चाहता था। लेकिन एक बात मुझे समझ नहीं आई कि आरक्षण और 'तुष्टिकरण' को खत्म करके जातिवाद को कैसे खत्म किया जा सकता है? वैसे भी ये शब्द खासकर तुष्टिकरण तो संघ के डिक्शनरी में इजाद किया गया है, उसका संदर्भ ब्रांड बिहार और जातीय विमर्श से मेल नहीं खाता।

रही बात आरक्षण की तो इस पर लगभग आमसहमित बन गई है और सबसे बड़ी अदालत ने भी इसे सही माना है। तात्कालिक तौर पर भले लगे कि इससे जातिवाद मजबूत हुआ है लेकिन लंबे समय के लिए ये बड़ा फलदायी है-मुझे लगता है कि इसे एक झटके में खारिज करने के फैसले पर आप फिर से विचार करें। आरक्षण,आजाद भारत में सबसे बड़ा राजनैतिक, समाजिक और आथिर्क विमर्श है-यह एक ऐसा समुद्र मंथन है जिससे ज्यादातर अमृत ही निकला है, विष एकाध बार ही।

आपने बाप-बेटे और पारिवारिक रिश्तों के बल पर नौकरी की बात की है-उसे मैं मानता हूं। दरअसल यह दुर्वल मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति है और इससे पूरी तरह मुक्त होना किसी भी व्यवस्था में संभव नहीं-फिर भी जातिवाद से इसकी तुलना नहीं की जा सकती जो सामूहिक रुप से किसी को बेवजह या तो गले लगा लेती है या बिल्कुल खारिज कर देती है।

dharmendra said...

sushant sir, aapki vichar swagatyogya hai. kash really hamara bihar aur humlog badal jate, unki soch badal jati. mujhe khushi hai ki reservation ko support karne walo me koi jha bhi hai varna log aaj bhi vp singh ko kya kya nahi kahte hain. sushant sir 1965 or 66 me america me rang bhed kannon banaya gya aur aaj waha ka president ek black hai. jiska pura america ne swagat kiya lekin kya hamare yahan yeh sab possible abhi dikhta hai. lekin kuch bhi ho aapke bichar subh hain aur bihari ko ispar chlna hoga.

rahul said...

एक बिहारी सौ बीमारी....

Piyush R Sahay said...

bihar badal raha hain or bahutjald hi ek viksit rrajya ke rup mein ubherega....nitish kumar ne yah bta diya hain ki mehnat or imandaari se kuch bhi sambhav hain...



www.piyushrsahay.blogspot.com

JC said...

बिहार में बदलाव तो दिख रहा है किन्तु ऐसा लग रहा है कि बिहार के इतिहास के कारण आम आदमी कों, बिहारियों कों भी, विश्वास नहीं हो पा रहा है कि यह स्तिथि ज्यादह देर तक इसी तरह बनी रह सकती है...समय ही शायद बता पायेगा 'ऊँट किस करवट लेटेगा'...किन्तु 'आशा पर संसार टिका है'...जय हो!

dharmendra said...

rahul jee bas itna hi kahoge. aur aage badho.

Abhishek Mishra said...

Ummidon ka dabav Bihar mein kuch aur sakaratmak parivartan laye, yahi kaamna hai.

rahul said...

पता नही बिहार कितना बदला है....लेकिन मेरी राय बिहारियों के बारे में सिर्फ इतनी ही है कि वो पीठ पीछे बुराई और चुगली करने ,,,,खेमेबाजी करने और बॉस लोगों को तेल लगाने में माहिर होते हैं.....

Amit said...

सालों पहले एक बार बिहार गया था। कुछ दिनों तक रुका भी। इत्तफ़ाक से मैं पटना या किसी बड़े शहर में नहीं गया था, बल्कि मैं बांका ज़िले के एक इंटीरियर प्लेस में गया था। वहां बिताए उन सिर्फ़ कुछ दिनों की यादें अब भी साथ हैं। अगर उस दौर को याद करूं (और विकास के मामले को नज़रअंदाज़ कर दूं) तो मुझे तब भी वो जगह रहने लायक लगी थी। हां ये ज़रूर था कि बिजली, मोबाइल जैसी चीज़ें तब वहां नहीं थीं। ये अच्छी बात है अगर अब बदलाव आ रहा है, क्योंकि बाकी चीज़ों में तो बिहार कभी पीछे नहीं था।

dharmendra said...

rahul ji. mujhe nahi malum ki aap kahan se hain. main aapki baat se bhi puri tarah asahmat nahi hun. lekin yeh aapki mansikta galat hai. har samaj me alag alag log hote hai. iske liye pure pradesh ke logo ko gali dena sahi nahi hai. bhai saheb aaj videsho me jo indian jhanda buland kiye huen hai unke bare me bhi yehi bola jata hai. aise bhi jab koi insan kisi dusre ke samne kamjor parta hai to woh aap jaisa kuch baatey kehkar apne ko santust karta hai. bhagwan aapko sadbudhi de.

SACHIN KUMAR said...

SACHIN KUMAR

देखिए जब कुछ Engouh हो जाता है तो बदलाव की जरूरत होती। INDIAN POLITICS को देखिए। गठबंधन का दौर चला। आज भी है। लेकिन ये गठबंधन का अलग रूप है। कोई मजबूर है समर्थन देने को। सब झोली बढ़ाए है। कांग्रेस कह रही है कि बस करिए हमें नहीं चाहिए। यूपी की हालत देखिए। माया मिली न राम। जीत गया पंजा। माया-मुलायम किंग मेकर बनने के चक्कर में कहीं के ना रहे। अब दोनों ही कांग्रेस का समर्थन कर रहे है। वहीं हाल बिहार का है। काफी कुछ हुआ। बाढ़ आयी तब राजनीति हुई...चली गई तब भी। जात-पात की राजनीति की भी चरम हो गई। जब जनता चेंज करती है तो आपको कुछ करना ही पड़ता है। लालू-राबड़ी के जाने के बाद नीतीश आए। वादे के साथ की हम बदलाव लाएंगे। चाहे मजबूरी में या फिर चाह कर कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा। सही है दो महीने और साल भर में सबकुछ नहीं बदला जा सकता। वक्त चाहिए। काम करते रहिए...बदलाव तो खुद ब खुद आ जाएंगे। लेकिन ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। अगर एनडीए की जीत से आप ये समझने लगे की नीतीश अपराजित हो गए...तो ऐसा नहीं है। ये लालू और रामविलास के miscalculation का नतीजा है। अगर साथ लड़े होते तो 20-25 सीट जीत रहे थे। खैर। इसका मतलब ये भी नहीं कि बिहार में नीतीश राज में कुछ नहीं हुआ। हुआ..अभी बहुत कुछ बाकी है। क्योंकि इतना कुछ खोया जा चुका है कि वक्त चाहिए एक दो साल नहीं कई दशक लग जाएंगे अपनी प्राचीन गौरव को हासिल करने में। हम उम्मीद यहीं कर सकते है कि दिन-ब-दिन बेहतरी की ओर बिहार बढ़ता जाए।

Ajeet Singh said...

Ravish ji, you have indentified the real cause of changing Bihar. Realy now Bihar is entering in new era of change and politics.

Nirala said...

Adarniye Rahul Jee,

App bhi BHARAT MAA KE BETE HAI MAI BHI ISI MAA KA BETA HU. MAI BIHAR KA HU OR MANTA HU HUME BAHUT SI KAMJORI HAI OR INHE SUDHAENA HAI. PAR APPKI BHASHA PADH KAR AISA LAGA KI AAPKO GHAR ME ACHE SANSKAR NAHI MILE HAI. AISE BHASA KE LIYE APP NAHI AAPKA SANSKAR JAWABDEH HAI.
MARI BAAT KO ANAYATHA NA LE..
APPKA NIRALA

Nirala said...

हमें तो अपनों ने लूटा गिरो में कहा दम था, मेरी कसती थी डूबी वह जहा पानी कम था। कितना सही लगता है बिहार के सन्दर्व में, आज मंत्रिमडल में मीरा कुमार और सुबोध कान्त सही को छोड़ कर कोई भी बिहार का प्रतनिधि नही है। क्या इससे बिहार के विकाश पर कोई प्रभाव नही परेगा? हमारा यही चरित्र है, जो हमें बिहार में फीसदी और बिहार के बाहर अवाल बनता है। हमारेयही सोच और मानसिकता हमें पीछे धकेल रही है। हम दूरदर्शी नही है, पिचले २० साल से बिहार में हमेश केन्द्र विरोधी पार्टी सत्ता में रही है और विकाश पिचार्ता रहा है। लालू और नीतिश ने कुछ हद तक इसे ठीक करने की कोशिश की है पैर ओ नाकाफी है। हमारे बिहारी पत्रकार (अब डेल्ही वाले या नेशनल पत्रकार कहे) भी इस मानसिकता में चार चाँद लगाये है। वास्तव में हम बिहारी इतने तेज़ होते है की हम कालिदास को भी पीछे चोर देते है(जिस पैर पैर बैठते है उसे की काट देते है)। खैर अब साधना चैनल, सहारा समय जिसे न्यूज़ चैनल को न्यूज़ कोल्लेक्ट करने की जरूरत नही है ओ भी लाफ्टर शो देखा कर टाइम पास कर सकते है। देखना ये भी है की नीतिश jइ को केन्द्र सरकार से कितना धन प्राप्त कर सकते है। aभी तक तो केन्द्र की बेरुखी का बहाना चलता रहा है।
अब देखना है की रघुवश बाबु & लालू ने बिहार को फंड दिलवाने में मदद की थी की नही? और नीतिश जी इस बार अपने बल पे कितना फंड लेट है। उन प्रोजेक्टों का क्या होगा जो लालू, रघुवंश जी ने शुरू की। या बिहारी एक बार फिर ठगा जाएगा इस टीवी प्रोपंगादा यूध में । आखिर विकास के लिए फंड तो चाहिए न? भाषण से विकाश तो नही होता उसके लिए रुपया चाहिए।

निखिल आनन्द गिरि said...

एक ब्रांड तो आप हैं ही कम से कम....निसंदेह..

INDAL YADAV said...

BIHAR KE VIKASH KE LIYE NITISHJI KO DHANYAVAD

INDAL YADAV

anil yadav said...
This comment has been removed by the author.
JC said...

अटलजी से किसी ने कहा कि वे 'अटल' हैं. तो उन्होंने कहा, "मैं बिहारी भी हूँ!"
शायद 'बिहारी' हम सब भारतियों मैं है किन्तु हम 'कागज़ी भारती' पहले बिहारी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, राजस्थानी, हिमाचली, महाराष्ट्रियन, गुजराती, इत्यादि इत्यादि हैं.

शायद अंग्रेजों के कारण इतिहास के एक पन्ने पर थोड़े समय के लिए सब 'भारती' अवश्य कहलाये जा सकते हैं. जब हमारे सब के अंदर 'स्वतंत्रता' की चाह एक चिंगारी के समान उत्पन्न हुई. और दिखावे की कागज़ी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात बुझ गयी. और हम फिर से बैताल की तरह पेड़ से उल्टे लटक गए :)

निसंदेह हमारा भारत 'महान' है!

जय माता की!

Jitendra said...

ek naya brand bengal me bhi paida hua hai. Mamta brand. Aaj kal bahut dhum macha raha hai ye brand. Kuchh ees brand ke baare me bhi likha jaye.

apne-apne ajnabi said...

rahul tumhare pitaji ka naam raj thakre hai na, sachi bolna beta.

Nirala said...

Rahul,
Aapne jo bihari logo ke bare me rai di use sirf bihar tak hi simit kyo rakhate hai, National leval pe hi dekh le jo log rahul or sonia ke chamache hai mantripad unhe hi mila. Maharastra ko dekh le Baba ampte or prakash Ampte chnav nahi jit sakte lekin deshmukh jeet jate hai or to or unhe ticket bhi mil jata hai. Kya aap ise chamchagiri nahi mante? Akhir Bombay ki chamak dhamak ke piche kitne marathi logo ki atmhatya chipi hai.
Vicharo ka doglapan aap kaha doodhate to o to aap ki ass-pass hi hai

maddy said...

great man great
aap media wale hi aise bihar ko bihar brand banane mai madat karoge
aap bihar ke strenth ko logo mai laoo wo log khud hi waha ke weeknws ko khatm kar denge
its realy great job u do