इस मार्ग के प्रायोजक हैं वोडाफोन

दिल्ली से जालंधर जा रहा था। सोनीपत पहुंचते ही अहसास हो गया कि मुझे जो कुछ भी दिख रहा है उसमें कुछ चीज़ हैं जो बार बार दिख रही हैं। सफ़र के दौरान और अगले किसी शहर या उससे पहले आने वाले ढाबे तक पहुंचने से पहले वो चीज़ पहुंची होती है। यानी फिर नज़र आ जाती है। सड़क मार्ग से यात्रा करना कुछ चुनिंदा विज्ञापनों के साथ ही यात्रा पूरी करने के बराबर हो गया है।

आप कहीं भी नज़र दौड़ाइये। जो भी दिखेगा उसमें वोडाफोन का विज्ञापन ज़रूर दिखेगा। बहुत दूर खेत में हरियाली देखना चाहते हैं तो देखिये। लेकिन इस बात की पूरी गारंटी है कि खेत में खड़े मोबाइल टावर पर भी लाल रंग के बोर्ड पर वोडाफोन लिखा दिखेगा।अगर आप किसी ढाबे पर रुकना चाहते हैं तो बेशक ठहरिये। लेकिन अब अनमोल वैष्णव ढाबा का नाम नज़र नहीं आएगा। ढाबे का नाम वोडाफोन के बोर्ड से छिप गया है। दरवाज़े पर भी वोडाफोन लिखा मिलेगा। सड़क से लगी तमाम दीवारों पर वोडाफोन मिलता है। मतलब साफ है आप वोडाफोन के बोर्ड या होर्डिंग को बिना देखे, दिल्ली से जालंधर तक की कोई भी यात्रा पूरी नहीं कर सकते हैं।

इस बार के सफर में यह ख्याल आते ही मैं गौर करने लगा। देखने लगा कि हाईवे के दोनों तरफ किस तरह के विज्ञापनों का राज है। जल्दी है स्थिति साफ हो गई। खेत, सड़क, ढाबा और दीवार पर वोडाफोन को अगर कोई टक्कर देता है तो वो है- एयरटेल का बिलबोर्ड। बीच बीच में टाटा और सेल वन की होर्डिग याद दिलाते हैं कि भई हम भी हैं। हमें मत भूलिये या फिर आप वोडाफोन और एयर टेल को देख देख कर ऊब गए हों तो हमें भी देखिये। मोबाइल कंपनियों ने किस रणनीति के तहत हाईवे पर कब्ज़ा किया है पता नहीं। सरकार को भी नहीं दिखता कि इतने होर्डिग की वजह से दुर्घटना हो सकती है। किसी का ध्यान बंट सकता है।

मोबाइल कंपनियों के बाद नंबर आता है कोका कोला और पेप्सी का। यहां भी कोका कोला की मौजदूगी वोडाफोन की तर्ज पर सर्वाधिक है। हर दरो-दीवार पर कोका कोला का विज्ञापन दिखता है। पेप्सी का विज्ञापन टाटा और सेल वन के विज्ञापन की तरह कभी कभी आता है। साफ्ट ड्रिंक के विज्ञापनों ने ढाबों को अपना निशाना बनाया है। मोबाइल कंपनियों से भी ज़्यादा संख्या में ढाबे के बोर्ड और दीवार पर साफ्ट ड्रिंक यानी कोका कोला के विज्ञापन का राज है। इसके अलावा सीमेंट कंपनियों के विज्ञापनों का भी अच्छा खासा दबदबा है। अल्ट्रा टेक, बुलंद सीमेंट और जे के सीमेंट का विज्ञापन भी बार बार आता है। मोबाइल और साफ्ट ड्रिंक कंपनियों से खाली बचे जगह पर इनका ही कब्जा है। बुलंद भारत की तस्वीर पेश करते सीमेंट के ये विज्ञापन चमकते रहते हैं। सफर में आइडिया देते रहते हैं कि घर पहुंच कर बाथरूम की रिपेयरिंग अमुक शक्तिशाली सीमेंट से करवाऊंगा।

बीच बीच की दीवारों में मर्दाना कमजोरी का अचूक ईलाज करने वाले हकीम हसन और रहमत खान का भी नाम आता है। पेट्रोल पंप के नज़दीक आते ही मोबील कंपनियों के विज्ञापन शुरू हो जाते हैं। एक्स्ट्रा माइल, टब्रोजेट आदि के विज्ञापन। और जैसे ही कोई शहर आता है बैटरी के विज्ञापनों की अचानक बाढ़ आ जाती है। एक्साइ़ड बैटरी, बेस बैटरी और तेज़ बैटरी के विज्ञापन दिखे। सड़कों की हालत बेहतर होने से स्प्रिंग के विज्ञापन कम दिखते हैं। इक्का दुक्का ही।

अगर आपने शराब के विज्ञापन न देखें तो मेरा चैलेंज है कि कोई सफर पूरा हो ही नहीं सकता। ठेका शराब देसी या ठेका देसी शराब। हाईवे पर शराब की दुकानों का कब्जा हो चुका है। बीच बीच में शराब पीकर गाड़ी न चलाने का सरकारी विज्ञापन मज़ाक की तरह लगता है। सरकार को इतनी ही चिंता है तो इन दुकानों का ठिकाना बदल दे। बीच सड़क पर शराब उपलब्ध करा कर सफर में झूमने की तमाम सुविधाएं आसान हैं। ब्लेंडर्स प्राइड,किंगफिशर बीयर,ठंडी बीयर,शार्क टूथ,रायल चैलेंज,मैक्डोवल के विज्ञापनों की मार मची है।

इन सब का मतलब क्या निकाला जाए। क्या आप यह जानने के लिए हाईवे पर सफ़र करते हैं कि शराब,सीमेंट,मोबाइल और मोबील के कौन से नए ब्रांड बाज़ार में आ गए हैं। वैसे ज़्यादातर ब्रांड पुराने ही होते हैं। जिनका आप हाईवे पर आने से पहले शहर में कर चुके होते हैं। जो भी हो हाईवे पर सफर करने का रोमांच ख़त्म हो रहा है। ऐसा लगता है कि आप विज्ञापनों की तलाश में निकले हैं। दिल्ली से जालंधर पहुंच जाइये। कोई भी शहर या कस्बा एक दूसरे अलग नहीं लगेगा। हर तरफ इन्हीं कंपनियों के बोर्ड मिलेंगे। लगेगा ही नहीं कि पिछला शहर गुज़र गया है और अगला आ गया है। यही हाल तमाम हाईवे का हो गया है। अतिक्रमण की हद तक ये विज्ञापन हाईवे को घेरे हुए हैं। सरकार को चाहिए अब इनसे पैसे ले। हर हाईवे को प्रायोजित कर दें। यात्रियों के सर से टोल टैक्स का बोझ उतर जाएगा।

23 comments:

मुंहफट said...

अच्छी जानकारी के लिए धन्यवाद

sanjay patel said...

रवीश भाई;
एक भरा-पूरा नैक्सस है इस तरह के काम को अंजाम देने के लिये. एक ज़माना था कि मेरे शहर इन्दौर से मुबंई -दिल्ली का रेल सफ़र करना हो तो मीटरगेज से रतलाम जंक्शन जाना पड़ता था. रास्ते में कहीं केसरिया दूध,कहीं चिवड़ा , कहीं गुलाब जामुन और कहीं की कचोरी की वजह से गाँव -क़स्बे जाने जाते थी. अब वह पहचान इन होर्डिंग्स और वॉल पेंटिंग्स मे ख़ारिज हो गई है. रतलाम और बीच के शहरों से (बीते कल के गाँव और क़स्बे अब शहर ही बनते जा रहे हैं)हज़ारों युवक इन्दौर रोज़गार की तलाश में आते हैं जो इन ब्राँड्स के ख़रीदार है जिनके इश्तेहार आपने हालिया यात्रा में देखे और इस पोस्ट में ज़िक्र किया. ये सारी एडवरटाइज़िंग हमारी ज़िन्दगी का अतिक्रमण कर रही है . इन इश्तेहारो से ग्राहक मॉल्स की तरफ़ आ रहा है.सेठ हुकुमचंदे(अपने ज़माने के कॉटन किंग जो अपने समय में मैनचेस्टर की मिलों के कपड़े की क़ीमत तय करते थे) कर्नल सी.के नायडू,मुश्ताक अली,उस्ताद अमीर ख़ा और हुसैन के लिये नहीं इन अट्टालिकाओं से मॉल का शहर बनता जा रहा है. मेरा दावा है कि इन्दौर आने वाले ये बेरोज़गार युवक इन अज़ीम शख़्सीयतों (जिनका मैने ऊपर ज़िक्र किया) को पहचानते भी नहीं हैं क्योंकि अब इनका कोई ब्राँड प्रमोटर नहीं है इस शहर में ..ये तो एशियन पेंट्स,कोकाकोला,पैप्सी,आयडिया,एयरटेल और रिलायंस मोबाइल को जानने वाली पीढ़ी है. रवीश भाई वह दिन दूर नही जब ये हमारे घरों से हमारे बाप-दादाओं और स्कूलों से महापुरूषों के चित्र हटा कर अपने ब्राँड्स के फ़्रेम किये इश्तेहार टांगेगे..और हम टंगवाएंगे...प्रीमियम जो मिलेगा इन्हें डिस्प्ले करने का...जब सब धंधे पर आमाद हैं तो इस देश का अवाम क्यों नहीं

JC said...

Ravishji aur Patelji, Aj ek school ke vidyarthhi ke pas bhi ‘time’, yani samaya nahin hai, jabki hamare poorvaj, ‘Yogi’, gahrai tak le jaye gaye athva ja paye: ‘satya’ aur uske pare ‘param satya’ ki khoj mein bhi.

Gahrai mein paye jane wale moti saman satya ko jan we kah gaye, “Parivartan prakriti ka niyam hai”, “Yeh sansar mithya hai: ek mithya bazaar/ yahan kewal jhoot hi bikta hai”, adi, adi…”Hari anant/ Hari katha anant…”

Yadi ap ek film ki charkhi ko ulta chalayein tab yadi koi vyakti asal mein perd se phal tord raha ho, wo dikhai dega use vapis jordte!

Uprokt anusar prakriti mein yahi hota jan unhone kal ko Satya Yuga se Kali Yuga ki ore jane ke karan manav ko bhoot ka bhram samjhaya – wo hamari Kaliyuga mein mandbuddhi ke karan hamari samajh ke pare bataya, aura aam aadmi aur Bhagwan ko ‘apsmara purush’ aur Natraj Shiva ke madhyam se pracharit kiya…aur Mahabharat ki kahani ke madhyam se Dhritrashtra ko hamara poorvaj darshaya, yadyapi hum uske poorvaj the :-) Sanjaya ke madhyam se jataya ki Vodafone hamare bhiter hi hai :-)

Indore se Ujjain door pehle bhi nahin tha :-) Aur, mana jata hai ki Punjab, Jullundur ke pas Hoshiarpur mein kisi samaya yoginiyon dwara kisi ek ved ka sankalan kiya gaya :-)

aprajita said...

सर आपका दिमाग बहुत चलता है..हमेशा कुछ observe करते रहते हो...

भुवनेश शर्मा said...

टोल ना लगे तो विज्ञापन देखने को हम भी तैयार हैं जी....और विज्ञापन देखने की फीस मिलने लगे तो कार को ही अपना आशियां बना लें :)

omkar said...

Sanjay ji aur ravish ji kushi hai ki aap bhi bajarwad ke is tandav se dukhi hai,kyoki bahut logo ko dukhi hone ka bhi samay nahi hai.

neelima sukhija arora said...

sab bajarvaad ki mayaa hai , ye kewal dilli jalandhar jaise commercial aur busy roots ka hi haal nahi , prakriti ke karib maane jaane wale hill stations ka to aur bura bhi haal hai. wahan to ek pahadi aur pathar rang diya gaya hai.

anil said...

रवीश जी हाइवे पर बोर करते इन विज्ञापनों को बहुत सही पकड़ा है आपने ....और हमेशा की तरह आपके लेख पर टिप्ण्णी देकर अपने आप को विद्वान समझने वाले फोकटियों को आपने एक मौका और दिया .....यकीन मानिये ये हमेशा इसी ताक में रहते हैं कि कब आपका लेख आये और ये अपनी सारी विद्वता उस पर कमेंट लिखने में उड़ेल दें...............

JC said...

Hahaha! Fokatiya shabda bardhiya laga :-) Ravishji ka mun karta hai kuch kahne ko, to fokatiyon ka bhi karta hoga unse baat karne ka.

‘Bazaar’ shabda hamare phokatiye poorvajon ne bhi Angrezon se pehle istemal kiya, aur use mithya yani jhoota bataya...

Bazaar ki pakarda Manmohan Singhji ki bahut achchi mani gayi aur is karan we aj hamare poojyaniya Pradhan Mantri hain. Bazaarvad hai to uska mukhya karan hein wo.

Ganatantra mein Ravishji bhi kisi din yeh pad pa sakte hain. Tab unhein bhi phokatiye hi gher lenge aur ‘nuke deal’ nahin karne denge…Ravishji ko iske liye taiyyari abhi se karni hogi, nahin?

maheshwar said...

ravish vie apne bat to thik likha hai ki in hording aur baner se durghatna ke sath hi kudrat ko nihar pane me dikkat ati hai. lekin ant me apne jo bat likhi hai ki sarkar ko in poster aur hording ke liy paisa lena chahiy. in bato me anterdawand hai. koiki ap ek taraf ise durghata ka karak mante hai dusari or ise sarkari giraft me karne ke bat karake badhawa de rahe hai. sarkari girft me jane se vale hi tole tax kam ho yea na holekin dhadhlebaji ka bazar jarur garm hoga. darasal mere hisab se ise band karne aur sarkari dare me lane se faida nahi . koyki rokne se jaha is field ke logo me berojgari aa jaegi. iska nidan hai in parchar ke sath hi samajupygi aur jankari wala board ye kampaniya lagawe.
Maheshwar A N Itv

सुशील राघव said...

ravish ji namaskar
mere ye vichar 'vodafone' ke artical ke liye nahin hai. raat ke 1.15 baje hain, 'khabaron ki khabar' ka repeat telecast dekha to bahut achchha laga. aapko anchoring karte hua dekhana ek sukhad ehasas hota hai. es se pahle jab petrol ke daam baade the tab bhi aapne pankaj ji ke sath program kiya tha vo bhi achchha tha. mere paas aapka email nahin hai isiliye yahan par aapni prtikiya de raha hun. agar aap chahen to aap aapna email mujhe de sakte hain. mera email hai raghav.sushil@gmail.com. aapko nayi paari ke liye bahut-bahut shubhkamnayen.

राम एन कुमार said...

रवीश जी!! आजकल हम भी ट्रेवल करते समय यही होअर्डिंग सब देखते है, और सोचते है की आख़िर हमसे टोल टैक्स क्यो ले रही है सरकार, हम सोचते थे की यह लोग इसके लिए टैक्स देते होंगे.......हमने देखा है हच को वोदाफोन बनते हुए. हमने देखा है की कैसे रातो रात हर एक होर्डिंग बदल गए, हर जगह सब जगह.
अगर रस्ते मी शराब की दुकान न हो, लोग बोर होने लगते है. दारू के बिना यात्रा अधूरी है.....सरकार को इन सरे धाबो और दारू की दुकानों पर विशेष टैक्स लगाना चाहिए.

JC said...

Gantantra mein aj her vyakti ke saman adhikar samvidhan mein prapt karaye jane ke karan blog mein apne swayam ke vichar bhi prastut karne ka saubhagya sabhi ko prapt hai. Yeh awashyak nahin ki jo her koi kahe ya likhe wo sabko manya ho. ‘Pasand apni apni khayal apna apna’. Jo comment pasand nahin ata use blog ke malik vaise bhi ‘delete’ kar hi dete hain. Ravishji to chup hein. Chalo bidai se pehle mahaul halka karein Jalandhar ke name per:

Ek Angrez aur ek thorda pardha-likha bharatiya ek Amritsar se Dilli train main sath-sath safar kar rahe the. Angrez ne khirdki band karte hue kaha, “I am suffering from Cold.” Bharatiya ne tapak se khush hote hue hath milaker kaha, “Glad to meet you! I am ‘safaring’ from Jalandhar!”
Kyunki ek shahar ke atirikt, Jalandhar ek bimari ka nam bhi hai – jismein pate mein pani bhar jata hai – aur saubhagya se ek vaidya bhi usi dibbe mein the, unhone dono ko ek-ek purdiya pakarda di!

Kabir said...

nice content
u know a 15 yr boy has taken mission to revive indian culture and tradition

u can catch him at http://www.amazepoint.com/founder.html

Kabir said...

Very Nice Content
One thing i would like to share with you that a 15 yr boy has taken a mission to revive indian amazes.
you can see his views at http://www.amazepoint.com/founder.html

mukesh kumar said...

Sir, i have been your ardent fan over the years. I know you would have prefered my comments in hindi but i am weak in typing hindi. I in fact have realised that true form of journalism is carried out by you people. It is amazing to see the range of subjects you choose and most importantly the way you ineract. I siply love your PTC, style of speaking. I sense the feeling of connecting to your stories. Congratulations on finaly coming on tv as news reader. I saw ur report on rat. Sir you have been my source of inspiration although i know you hate word SIR. I make it a point to watch all your programs and i have group of friends who adore and rspect you for what you cover and report. Plz remain the same and bless me with ur good wishes.

mukesh kumar, Sub Editor, cricket today

ravish said...
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ravish said...

राम एन कुमार का आइडिया ज़बरदस्त है। अगर सरकार कंपनियों से पैसा ले ले तो हम सब सफरमयी लोग टोलटैक्स से मुक्त हो जाएंगे।

सुबोध और मुकेश जी

दुनिया में कभी भी और कहीं भी ख़बर का पैमाना नहीं बदला है। सिर्फ व्यक्त करने का माध्यम और उस माध्यम के भीतर पेश करने का तरीका बदला है। इस बात की पुष्टि सैंकड़ों शोध से हो चुकी है। यह सब बहाना है कि आजकल लोगों को ये चाहिए और वो चाहिए। हिंदुस्तान में अभी तक पत्रकारिता ही थी। यलो जर्नलिज़्म का ज़िक्र दूसरे देशों के संदर्भ में आता था। लेकिन उनके यहां से भी यलो जर्नलिज़्म ख़त्म नहीं हुआ बल्कि एक संस्था के रूप में मौजूद है। अब हमारे यहां हो गया है। फर्क यही है।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हमारे यहां खबर का पैमाना बदल गया है। वो तमाम चैनल जब न्यूज करते हैं तो वहीं करते हैं जो हम दिन भर करते हैं। वो लौटते हैं तो खबर के उसी पैमाने पर जिसे वो छोड़ कर बीच बीच में गजोधर भैया के पास चले जाते हैं। उत्साह बढ़ाने के लिए शुक्रिया

विनय जायसवाल said...

रवीश जी, आपने दिल की बात कह दी। अक्सर हम कुछ दोस्त विज्ञापनों पर चर्चा करते थे। लेकिन चर्चा का केन्द्र वे विज्ञापन ज्यादा हुए। जो हर शहर के शुरुआत का आभास दिलाते हैं। ये विज्ञापन सफ़ेद शब्दों में ऐसे दस्तक देते हैं की मालूम पड जाता है कि कोई शहर आ गया। समझ ही गए होगें, सेक्स के इलाज का भ्रम फैलाने वाले विज्ञापन। मेरा एक दोस्त बाकायदा सूची बनाकर रखा है कि किस रूट पर इस तरह के करीब कितने विज्ञापन हैं। सोचने वाली बात है,ऐसे विज्ञापन पर रोक क्यों नहीं है।

ravish said...

विनय जी
अपने मित्र से कहिये न कि विज्ञापनों वाली सूचि सार्वजनिक करें।

सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों हैं?
इस शहर में हर शख्स विज्ञापन सा क्यों हैं?

Kabir said...

and Ravish sir never it will change also. Please keep continue posting your articles I am fond of your aricles.

विनय जायसवाल said...

रवीश जी, मैंने अपने मित्र से ये अनुरोध किया है। उसने जल्दी ही सार्वजनिक करने को कहा है।

राम एन कुमार said...

विनय जी!!
यह जो ताकत बढ़ाने का दावा करने वाले तथाकथित डॉक्टर है बड़े ऊंचे पहुँच वाले होते है. वोह जहा विज्ञापन करते है वह के लोकल एडमिनिस्ट्रेशन को गिफ्ट देते है,,,शारीरिक ताकत का ही सही.....लोकल बड़े लोग उनके क्लाइंट होते है...
विज्ञापन ग़लत नही है, ग़लत होता है उसका प्रेजेंटेशन. कुछ दिनों पहले हमारे पास एक कंडोम के विज्ञापन के लिए एक बिज़नस आया था और क्लाइंट का रेकुएस्ट था की विज्ञापन गरम होना चाहिए. आप गरम शब्द का जो भी उल्टा मीनिंग निकालाना चाहते है निकाल ले.

अनिल भाई---
आप बाकि लोगो को फोकटिया कहते है क्योंकि आप सबसे बड़े फोकटिया है.....और एक बात अगर हमारी विद्वता की पैमाना चाहिए तो कभी हमारी गली आ जाना....बात कही और बड़ी बड़ी बात कही में हमें महारत हासिल है.....
काश की हम भी मीडिया में होते!!! पत्रकार होते!!क्योंकि...................................